‘गुंडा एक्ट’ के दुरुपयोग पर इलाहाबाद हाईकोर्ट सख्त, कहा- यह उत्पीड़न का हथियार नहीं

Millat Times Staff

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12 September 2026 (Publish: 09:13 AM IST)

प्रयागराज: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने उत्तर प्रदेश में उत्तर प्रदेश कंट्रोल ऑफ गुंडाज एक्ट, 1970 के इस्तेमाल को लेकर गंभीर टिप्पणी की है। कोर्ट ने कहा कि बार-बार अदालतों की चेतावनी के बावजूद सरकार इस कानून का इस्तेमाल उत्पीड़न के औजार के तौर पर कर रही है।

यह टिप्पणी जस्टिस सुभाष विद्यार्थी ने जाहिद अली बनाम उत्तर प्रदेश राज्य एवं 4 अन्य मामले में की। कोर्ट ने गोंडा के जिलाधिकारी द्वारा जाहिद अली को ‘गुंडा’ घोषित करने और छह महीने के लिए जिले से बाहर रहने के आदेश को रद्द कर दिया।

‘गुंडा एक्ट का इस्तेमाल बेहद सावधानी से हो’

कोर्ट ने कहा कि गुंडा एक्ट ‘गुंडों’ पर नियंत्रण और उन्हें दबाने का एक प्रभावी कानून है, लेकिन इसका इस्तेमाल केवल बेहद स्पष्ट मामलों में सार्वजनिक अव्यवस्था या कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए ही किया जाना चाहिए।

हाईकोर्ट ने कहा कि अदालतें पहले भी राज्य सरकार को इस कानून के दुरुपयोग के खिलाफ आगाह करती रही हैं। किसी व्यक्ति को गंभीर अपराध में दोषी ठहराए बिना उसे सजा देने के लिए इस कानून का इस्तेमाल नहीं किया जा सकता।

कोर्ट ने टिप्पणी की कि उसके सामने लगातार ऐसे मामले आ रहे हैं, जो बताते हैं कि राज्य सरकार गुंडा एक्ट को उत्पीड़न के औजार के रूप में इस्तेमाल करने के अपने रवैये पर कायम है। अदालत ने मौजूदा मामले को भी कानून के दुरुपयोग का स्पष्ट उदाहरण बताया।

एक मामले में पहले ही बरी हो चुके थे जाहिद

मामले में पुलिस ने जाहिद अली को ‘गुंडा’ घोषित करने के लिए दो मुकदमों का हवाला दिया था। हाईकोर्ट ने पाया कि इनमें से एक मामले में जाहिद अली पहले ही बरी हो चुके थे। कोर्ट ने कहा कि जिस मामले में किसी व्यक्ति को बरी किया जा चुका है, उसमें उसकी संलिप्तता को बाद में उसे ‘गुंडा’ घोषित करने का आधार नहीं बनाया जा सकता। कोर्ट ने यह भी पाया कि जाहिद अली के खिलाफ कानून-व्यवस्था के लिए खतरा पैदा करने का कोई आरोप नहीं था।

अदालत ने कहा कि जाहिद अली ने जिलाधिकारी के सामने अपनी आपत्ति दाखिल करते समय अपनी बरी होने की जानकारी नहीं दी थी, इसलिए जिलाधिकारी को इस आधार पर गलती का जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता।

हालांकि, हाईकोर्ट ने कहा कि पुलिस को जाहिद के बरी होने की जानकारी होनी चाहिए थी। अदालत ने माना कि इसके बावजूद उस पुराने मामले का उल्लेख कर जिलाधिकारी के सामने जाहिद की एक गलत तस्वीर पेश की गई।

बाद में जाहिद ने कमिश्नर, देवीपाटन मंडल के सामने अपील में अपनी बरी होने की बात रखी, लेकिन अदालत के मुताबिक कमिश्नर ने उनके पक्ष में उठाए गए आधारों पर उचित तरीके से विचार नहीं किया।

2020 के एक मुकदमे से ‘आदतन अपराधी’ साबित नहीं होता

हाईकोर्ट ने कहा कि 2020 में दर्ज एक आपराधिक मामले में जाहिद की कथित संलिप्तता मात्र से यह साबित नहीं होता कि वह आदतन अपराध करता है, अपराध करने का प्रयास करता है या अपराध के लिए उकसाता है।

कोर्ट ने यह भी कहा कि 2020 में दर्ज केस और 2026 में जाहिद को गुंडा घोषित करने तथा जिले से बाहर करने के बीच काफी लंबा अंतर है। दोनों घटनाओं के बीच ऐसा कोई उचित संबंध नहीं है, जिसके आधार पर गुंडा एक्ट के तहत कार्रवाई को सही ठहराया जा सके। इसके बाद हाईकोर्ट ने गोंडा के जिलाधिकारी और देवीपाटन मंडल के कमिश्नर द्वारा जाहिद अली के खिलाफ पारित दोनों आदेशों को रद्द कर दिया। याचिकाकर्ता की ओर से अधिवक्ता कुंवर बहादुर सिंह ने पक्ष रखा, जबकि राज्य सरकार की ओर से अपर शासकीय अधिवक्ता रवि श्रीवास्तव पेश हुए।

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