उपेंद्र कुशवाहा के महागठबंधन में शामिल होने का बिहार की सियासत में क्या होगा असर??सबनवाज अहमद

विश्लेष्ण:-
चुनावी गणित के लिहाज से देखें तो बिहार की 243 विधानसभा सीटों में करीब 63 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां कुशवाहा समुदाय के मतों की संख्या 30 हजार से ज्यादा है.

उपेंद्र कुशवाहा आखिरकार महागठबंधन में शामिल हो गए. गुरुवार को जब उन्होंने इस बात का ऐलान किया तो उनके साथ आरजेडी नेता तेजस्वी यादव, हम नेता जीतन राम मांझी, कांग्रेस नेता शाक्ति सिंह गोहिल और अहमद पटेल के अलावा शरद यादव भी मौजूद थे. जाहिर है यह बिहार की राजनीति के लिए बड़ा बदलाव माना जा रहा है. जातीय गोलबंदी के लिहाज से भी एक नया समीकरण बना है, लेकिन सवाल ये है कि उपेन्द्र कुशवाहा के एनडीए छोड़ने और महागठबंधन में शामिल होने का असर धरातल की राजनीति पर कितना होगा??.

आंकड़ों के लिहाज से देखें तो 2014 के लोकसभा चुनाव में कुशवाहा की पार्टी आरएलएसपी ने एनडीए के साथ गठबंधन किया था, लेकिन पार्टी अकेले दम पर महज 3 प्रतिशत वोट ही ला पाई थी. दूसरी ओर, उस समय नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने 2014 के चुनाव में अकेले 15 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया था.

जाहिर है वोट शेयर के मामले में आरएलएसपी से जेडीयू ने पांच गुना ज्यादा वोट शेयर हासिल किए थे. 2015 के विधानसभा चुनाव में आरएलएसपी के साथ आने के बाद भी कुशवाहा वोटर एनडीए के साथ नहीं आए थे. यही नहीं, कई उपचुनावों में भी कुशवाहा समाज ने एनडीए का साथ नहीं दिया था, यानी उपेन्द्र कुशवाहा फैक्टर का फायदा एनडीए को अधिक नहीं मिला है.

चुनावी गणित के लिहाज से देखें तो बिहार की 243 विधानसभा सीटों में करीब 63 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां कुशवाहा समुदाय के मतों की संख्या 30 हजार से ज्यादा है. किसी भी विधानसभा में 30 हजार मतदाता बहुत अहम फैक्टर हैं. इसके अलावा बाकी विधानसभा सीटों पर भी कुशवाहा मतदाता की संख्या मामूली नहीं है, लेकिन सवाल यही उठता है कि कुशवाहा समुदाय में उपेन्द्र कुशवाहा कितनी पकड़ रखते हैं.

दरअसल बिहार में कुशवाहा समुदाय 6 से 7 प्रतिशत तक की हिस्सेदारी रखती है. अब तक इस तबके का अधिकतर वोट नीतीश कुमार के पाले में ही गिरता रहा है. वहीं बिहार में अब सियासी समीकरण भी बदल गए हैं, क्योंकि नीतीश कुमार एनडीए गठबंधन में हैं. जाहिर है गठबंधन का वोट शेयर और बढ़ने की संभावना है. मीडिया के तमाम सर्वे भी यही बता रहे हैं कि नीतीश के आने से एनडीए की स्थिति मजबूत है. ऐसी स्थिति में अगर कुशवाहा एनडीए से अलग भी होते हैं तो बीजेपी को इसका खास मलाल नहीं होगा.

हकीकत ये है कि 2013 में राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के गठन के बाद भी कुशवाहा मास के नहीं, मीडिया के लीडर रहे हैं. जमीन पर उनका जनाधार उतना कभी नहीं रहा है, जितना उन्हें महत्व मिलता रहा है. साढ़े चार साल तक केंद्रीय मंत्री रहते हुए भी कुशवाहा का बिहेवियर सीजन्ड पॉलिटिशियन का रहा है. ऐसे में उनकी विश्वसनीयता पर हमेशा सवाल रहे हैं. वहीं 2005 में नीतीश कुमार में लोगों की एक विश्वसनीयता बनी है. 15 साल में काम के बदौलत बिहार की राजनीति में अपना एक इम्पैक्ट बना लिया है. लेकिन जबसे नितीश ने महा गठबंधन से नाता तोड़ा है माइनॉरिटी वोट बैंक राजद के साथ दिखाई दे रहा है, और इधर बढ़ते अपराध की वजह से इसमें भारी गिरावट भी आई है, जनता नीतीश कुमार की राजनीतिक पलटी की वजह से पसन्द भी नही कर रहे है।

दूसरी बड़ी बात ये है कि कुशवाहा की पार्टी के दो विधायक और एक मात्र एमएलसी ने साथ छोड़ एनडीए का दामन थाम लिया है. वहीं कुशवाहा के समर्थन में जो नेता नजर आ रहे हैं उनमें सांसद अरुण कुमार एनडीए के साथ रहने की दलील देते रहे हैं. नागमणि और भगवान सिंह कुशवाहा जैसे नेता दलबदल में माहिर रहे हैं.

ऐसे हालात में जिस ‘सियासी खीर’ की उम्मीद उपेन्द्र कुशवाहा कर रहे थे शायद उसका स्वाद कुछ खास न हो. क्योंकि इसका राजनीतिक लाभ उन्हें उतना नहीं मिलने जा रहा जितने की वे उम्मीद किए बैठे हैं. हालांकि इसका फायदा आरजेडी जरूर उठाएगी और बिहार में पिछड़ी और दलित जातियों के एक चेहरे के तौर पर तेजस्वी के लिए एक परसेप्शन जरूर बनेगा. बहरहाल आने वाले वक्त में बिहारी राजनीति में फिलहाल पक रही सियासी खीर जमीन पर कितना असर दिखाती है यह देखना दिलचस्प होगा.

लेखक_
सबनवाज अहमद
(पत्रकारिता छात्र मानु हैदराबाद)

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is a young journalist & editor at Millat Times''Journalism is a mission & passion.Amazed to see how Journalism can empower,change & serve humanity