नई दिल्ली, ज्ञानवापी मस्जिद मामले में अंजुमन इंतजामिया मसाजिद कमेटी के सचिव सैयद मोहम्मद यासीन ने एनडीटीवी से बात करते हुए कई अहम खुलासे किए।
सबसे पहले तो उन्होनें कहा कि जिसे मीडिया और लोग शिवलिंग बता रहे हैं वह एक फव्वारा है, उसकी पाइप सड़ जाने की वजह से उसे हटा दिया गया है वरना आज भी उससे पानी निकलता। आज भी वह सड़े हुए पाइप मस्जिद परिसर में मौजूद हैं।
जिस दिन सर्वे हुआ उस वक्त उस फव्वारे की जांच की गई थी उसमें 64 सेमी तक छेद है। यासीन साहब ने फव्वारे के लंबाई की बात करते हुए कहा कि वह ज्यादा से ज्यादा दो से ढाई फीट लंबा है। उन्होंने फव्वारे और हौज की निर्माण की बात करते हुए कहा कि फव्वारा कब बना है इसकी कोइ अधिकारिक पुष्टि तो नहीं है परंतु हौज मस्जिद के बनने के समय का है। ये हौज पत्थर की ईंट का बना हुआ है।
उन्होंने यह भी कहा कि पुरानी जितनी भी शाही मस्जिदें होती थी उन सबमें हौज बने होते थे और फव्वारे भी लगे होते थे। आप जामा मस्जिद और ताजमहल में भी देख सकते हैं।
मस्जिद की निर्माण पर बात करते हुए यासीन साहब ने कहा कि इसका कोई सही इतिहास नहीं है पर लोगों का मानना है कि इनका निर्माण जौनपुर के शर्की सुलतानों ने करवाया था। बाद में मुगल बादशाह अकबर ने भी कुछ तब्दीलियां की। फिर आखिर में औरंगजेब ने भी मस्जिद में कुछ तब्दीलियां की थी।
उन्होंने बगल में बने मंदिर के बात पर कहा कि वह मंदिर नहीं है बल्कि अकबर के ज़माने का दिन ए इलाही का मरकज है। यासीन साहब ने कहा कि उस हौज के नीचे दो कब्रें हैं जहां हर साल उर्स मनाया जाता था। 1936–1937 के फैसले के अनुसार मुसलमानों को वहां उर्स मनाने का अधिकार भी है। 1942 में हाइकोर्ट ने भी उर्स मनाने की इजाजत दी थी। हालांकि अभी वहां उर्स नहीं मनाया जाता है।
यासीन साहब ने एनडीटीवी के पत्रकार से बात करते हुए कहा कि जिस नंदी की चर्चा हो रही है वह वह औरंगजेब के समय का नहीं है बल्कि 1860–1880 के बीच नेपाल नरेश ने स्थित की थी। बाद में अंग्रेजों ने हिंदू मुसलामानों को लड़ाने के लिए इसका रुख मस्जिद की तरफ़ कर दिया था, जिसका मुसलामानों ने उस वक्त विरोध भी किया था।
उन्होंने तहखाने के बारे में भी जिक्र किया कि जिसे लोग जमीन के नीचे बता रहे हैं वह नीचे है ही नहीं बल्कि जमीन के बराबर मौजूद है। मस्जिद एक मंजिल ऊपर बनी हुई है। उन तहखानों में किराए दार भी रहते थे जिनमें एक यादव जी भी थे, जो चाय बेचते थे।
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