NRC, वोटर ID, पैन समेत 15 दस्तावेज दिखाए, फिर भी कोर्ट ने नहीं माना भारतीय नागरिक

Millat Times Staff

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02 July 2026 (Publish: 02:44 PM IST)

असम में नागरिकता से जुड़े एक मामले में गौहाटी हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए एक व्यक्ति की याचिका खारिज कर दी। याचिकाकर्ता ने अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए 1951 की एनआरसी, कई वर्षों की मतदाता सूची, पैन कार्ड, वोटर आईडी और स्कूल प्रमाणपत्र समेत कुल 15 दस्तावेज अदालत में पेश किए थे। इसके बावजूद अदालत ने माना कि वह कानूनी रूप से अपनी नागरिकता साबित नहीं कर सका और विदेशी न्यायाधिकरण (Foreigners Tribunal) के फैसले को बरकरार रखा।

अदालत ने अपने फैसले में कहा कि केवल बड़ी संख्या में दस्तावेज पेश कर देना पर्याप्त नहीं है। नागरिकता साबित करने के लिए यह भी जरूरी है कि दस्तावेज कानून के अनुसार स्वीकार्य हों, उनमें आपसी विरोधाभास न हो और उनसे व्यक्ति का अपने पूर्वजों से स्पष्ट संबंध स्थापित होता हो।

क्या था पूरा मामला?

याचिकाकर्ता असम का एक दिहाड़ी मजदूर है, जिसकी पहचान कानूनी कारणों से सार्वजनिक नहीं की गई है। उसने विदेशी न्यायाधिकरण के समक्ष अपनी भारतीय नागरिकता साबित करने के लिए 15 दस्तावेज पेश किए थे।

इन दस्तावेजों में 1951 की एनआरसी में दर्ज उसके पिता और दादा-दादी के नाम, 1966 से 2017 तक की विभिन्न मतदाता सूचियां, वर्ष 1973 का भूमि खरीद दस्तावेज, वर्ष 2017 का स्कूल प्रमाणपत्र, पैन कार्ड और मतदाता फोटो पहचान पत्र (EPIC) शामिल थे।

याचिकाकर्ता ने यह भी कहा कि उसका परिवार नदी कटाव के कारण समय-समय पर कई गांवों में जाकर बसता रहा। उसने अपने पक्ष में अपने पिता की मौखिक गवाही भी अदालत के सामने रखी।

अदालत ने दस्तावेज क्यों नहीं माने?

गौहाटी हाईकोर्ट ने 1951 की एनआरसी की प्रति को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। अदालत ने कहा कि यह केवल कंप्यूटरीकृत प्रति थी, जिसे भारतीय साक्ष्य कानून के अनुसार आवश्यक प्रमाणपत्र के साथ प्रस्तुत नहीं किया गया था। इसलिए इसे वैध इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य नहीं माना जा सकता।

अदालत ने यह भी कहा कि जनगणना अधिनियम, 1948 की धारा 15 के तहत जनगणना से जुड़े रिकॉर्ड सीधे नागरिकता साबित करने के लिए स्वीकार्य साक्ष्य नहीं होते।

स्कूल प्रमाणपत्र को भी अदालत ने स्वीकार नहीं किया क्योंकि न तो स्कूल के प्रधानाचार्य को गवाह के रूप में पेश किया गया और न ही प्रवेश रजिस्टर अदालत के सामने रखा गया। वहीं, 1973 के भूमि दस्तावेज से यह साबित नहीं हो सका कि संबंधित जमीन कानूनी रूप से परिवार के उत्तराधिकारियों तक कैसे पहुंची।

पैन कार्ड और वोटर आईडी भी नहीं बने नागरिकता का आधार

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि पैन कार्ड और वोटर आईडी भारतीय नागरिकता का कानूनी प्रमाण नहीं हैं। अदालत ने कहा कि ये केवल पहचान और कर संबंधी दस्तावेज हैं, इसलिए इनके आधार पर किसी व्यक्ति की नागरिकता तय नहीं की जा सकती।

मतदाता सूचियों की जांच में भी अदालत को कई विसंगतियां मिलीं। अलग-अलग वर्षों की सूचियों में परिवार के सदस्यों की उम्र में असामान्य अंतर पाया गया। इसके अलावा परिवार के नाम अलग-अलग गांवों की मतदाता सूचियों में दर्ज थे, लेकिन उनके बीच कोई विश्वसनीय दस्तावेजी संबंध स्थापित नहीं किया जा सका।

मौखिक गवाही को भी नहीं माना पर्याप्त

याचिकाकर्ता ने अपने पिता की मौखिक गवाही के जरिए यह समझाने की कोशिश की कि नदी कटाव के कारण परिवार को बार-बार गांव बदलना पड़ा, जिससे अलग-अलग स्थानों पर रिकॉर्ड बने।

हालांकि, अदालत ने कहा कि नागरिकता जैसे मामलों में केवल मौखिक गवाही पर्याप्त नहीं होती। ऐसे मामलों में दस्तावेजी साक्ष्य सबसे महत्वपूर्ण होते हैं और उन्हें कानून के अनुसार प्रमाणित करना भी जरूरी है। अदालत ने यह भी पाया कि जिरह के दौरान पिता की गवाही और उपलब्ध दस्तावेजों में कई विरोधाभास सामने आए, जिससे याचिकाकर्ता का दावा और कमजोर हो गया।

दस्तावेजों में विरोधाभास भी बना बड़ी वजह

हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि कई दस्तावेजों में गंभीर विरोधाभास पाए गए। उदाहरण के तौर पर, एक मतदाता सूची में परिवार के एक सदस्य की उम्र 25 वर्ष दर्ज थी, जबकि लगभग 10 वर्ष बाद उसी व्यक्ति की उम्र केवल 29 वर्ष दिखाई गई।

इसके अलावा कई ऐसे लोगों के नाम भी रिकॉर्ड में थे, जिनके साथ याचिकाकर्ता का पारिवारिक संबंध दस्तावेजों के जरिए साबित नहीं किया जा सका। अदालत ने माना कि इन विसंगतियों के कारण वंशावली और नागरिकता का दावा विश्वसनीय नहीं रहा।

अदालत ने क्या कानूनी सिद्धांत बताया?

गौहाटी हाईकोर्ट ने कहा कि विदेशी अधिनियम, 1946 की धारा 9 के अनुसार यदि किसी व्यक्ति की नागरिकता पर सवाल उठता है, तो उसे स्वयं यह साबित करना होता है कि वह भारतीय नागरिक है। यानी नागरिकता साबित करने का भार संबंधित व्यक्ति पर होता है, सरकार पर नहीं।

अदालत ने निष्कर्ष निकाला कि याचिकाकर्ता अपने दस्तावेजों और मौखिक गवाही के आधार पर भारतीय नागरिकता साबित करने में असफल रहा। इसलिए विदेशी न्यायाधिकरण के आदेश में कोई कानूनी त्रुटि नहीं पाई गई और उसकी याचिका खारिज कर दी गई।

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