क्यों लालू प्रसाद यादव को बिहार में सामाजिक न्याय का मसीहा कहा जाता है?

Zain Shahab Usmani

भारतीय राजनीति के बहुचर्चित बिहारी नेता लालू प्रसाद यादव की उम्र 73 साल हो गई है। वो गोपालगंज ज़िले के फुलवरिया गाँव में एक गरीब यादव परिवार में जन्मे थे।

स्कूलिंग के बाद पटना यूनिवर्सिटी में स्नातक और कानून की पढ़ाई के दौरान छात्र राजनीति में लालू ने कदम रखा। धीरे-धीरे उनकी सक्रियता बढ़ने लगी। पटना यूनिवर्सिटी के छात्र यूनियन का चुनाव जीतकर प्रेसिडेंट बन चुके लालू ने सक्रिय राजनीति में आने का संकेत दिया।

जेपी आंदोलन में लालू और निखरे

जब इंदिरा गाँधी का विरोध शुरू हो चुका था तब लालू यादव जेपी के साथ आंदोलन में शामिल हो चुके थे। फिर जब देशभर में इमरजेंसी लगी तो पूरे देश में नेताओं के साथ लाखों आंदोलनकारियों को भी जेल में बंद कर दिया गया। उन आंदोलनकारियों में लालू भी थे।

जब इमरजेंसी खत्म हूई तो 1977 के लोकसभा चुनाव में जेपी की अगुआई में जनता पार्टी को जीत मिली। काँग्रेस पहली बार देश की सत्ता से बाहर हो गई। तब लालू प्रसाद यादव 29 वर्ष के युवा सांसद के तौर पर सारन लोकसभा सीट से चुनाव जीतकर लोकसभा में पहुंचे।

सक्रिय राजनीति में लालू का कद बढ़ता चला‌ गया

लोकसभा चुनाव जीतने के बाद शुरू हुआ बिहार में लालू प्रसाद यादव का राजनीतिक सफर। सन् 1980 से सन् 1989 तक 2 बार बिहार विधानसभा के सदस्य रहे और विपक्ष के नेता के तौर पर ख्याति प्राप्त की।

बिहार में सत्ता ने करवट ली और साल 1990 में लालू प्रसाद यादव बिहार के मुख्यमंत्री बन गए। देखते ही देखते सामाजिक न्याय के मसीहा के तौर पर लालू की छवि बन गई। बिहार की सत्ता में पिछड़ों का प्रतिनिधित्व बढ़ते ही पूर्ण रूप से बदलाव आ चुका था।

कभी बिहार की जो राजनीति सवर्णों के इर्द-गिर्द घूमती थी, वह अब नए रूप में पिछड़ों और वंचितों के इर्द-गिर्द घूमने लगी। उसी सामाजिक न्याय के आन्दोलन का ही नतीजा है कि आज नीतीश कुमार बिहार के मुख्यमंत्री हैं। एक समय ऐसा भी आया कि जीतन राम मांझी भी बिहार के मुख्यमंत्री बने। इस बदलाव के बाद बिहार में कई नेता उभरे।

बिहार की राजनीति का वह 15 साल

लालू प्रसाद यादव यादव सन् 1990 से लेकर 2005 तक अकेले अपने दम पर बिहार की सत्ता पर अपनी पकड़ बनाए रखने में कामयाब रहे। जिसका मुख्य कारण मुस्लिम-यादव गठजोड़ है।

जिसके तहत ठोस जनाधार और अन्य पिछड़ी जातियों के सहयोग से अपनी चुनावी रणनीति बनाए रखने में लालू कामयाब होते रहे।

आज भी है लालू के पास मज़बूत जनाधार

आज भी लालू प्रसाद यादव के पास एक मज़बूत जनाधार है, जो बिहार के अंदर किसी दल या नेता के पास नहीं है। इसका उदाहरण 2004 के लोकसभा चुनाव के नतीजों में दिखाई दिया है।

फिर 2015 के विधानसभा चुनाव में जब-जब लालू यादव कमज़ोर हुए और खुद को किंग मेकर के रूप में दर्शाया, तो यह साबित हो गया कि लालू यादव के पास मज़बूत जनाधार था और है।

बात कहने का लालू का अपना खास अंदाज़

अपनी बात कहने का लालू यादव का खास अंदाज़ है। रेलवे में कुल्हड़ की शुरुआत करने से लेकर चरवाहा स्कूल खोलने और दलितों की बस्तियों में जाकर बच्चों को अपने हाथों से नहलाने का लालू यादव का अंदाज़ हमेशा ही सुर्खियों में रहता है। अपने विरोधियों पर भी वो अलग ही तेवर में हमला करते रहे हैं।

लालू ने अपने खास अंदाज़ के ज़रिये किसी को भी नहीं छोड़ा। वो मोदी, अमित शाह या फिर भाजपा सभी पर हमलावर दिखाई देते हैं। शायद ही देशभर में कोई भाजपा के विरोध में लालू प्रसाद यादव के बराबर आक्रमक हो।

अब तक देशभर में लालू यादव की छवि एक मज़बूत सेक्युलर और भाजपा विरोधी नेता की रही है। लालू प्रसाद यादव को उनकी इसी छवि ने बिहार में सामाजिक न्याय का मसीहा बना दिया।

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