मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ ने धार स्थित भोजशाला-कमाल मौला मस्जिद विवाद पर अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने हिंदू पक्ष की दो जनहित याचिकाएं स्वीकार करते हुए कमाल मौला मस्जिद को मंदिर माना और हिंदुओं को वहां पूजा की अनुमति दे दी।
एएसआई रिपोर्ट और ऐतिहासिक दस्तावेजों पर भरोसा
जस्टिस विजय कुमार शुक्ला और जस्टिस आलोक अवस्थी की पीठ ने कहा कि भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) की रिपोर्ट और ऐतिहासिक अभिलेखों से संकेत मिलता है कि यह स्थल परमार राजा भोज से जुड़ा था और यहां देवी सरस्वती का मंदिर तथा संस्कृत शिक्षा केंद्र मौजूद था।
अदालत ने कहा कि विवादित परिसर का धार्मिक स्वरूप वाग्देवी (मां सरस्वती) मंदिर के रूप में स्थापित होता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि लंदन संग्रहालय में रखी मां सरस्वती की प्रतिमा को वापस लाने के संबंध में सरकार उचित निर्णय ले सकती है।
नमाज की अनुमति देने वाला आदेश रद्द
हाई कोर्ट ने एएसआई द्वारा मुस्लिम पक्ष को नमाज की अनुमति देने वाला पूर्व आदेश रद्द कर दिया। साथ ही स्पष्ट किया कि परिसर के संरक्षण और प्रबंधन पर एएसआई का पूर्ण नियंत्रण रहेगा।अदालत ने यह भी कहा कि यदि मुस्लिम पक्ष धार जिले में मस्जिद निर्माण के लिए वैकल्पिक भूमि चाहता है, तो राज्य सरकार कानून के अनुसार उसके आवेदन पर विचार कर सकती है।
मुस्लिम पक्ष जाएगा सुप्रीम कोर्ट
हाई कोर्ट के फैसले के बाद मुस्लिम पक्ष ने इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का फैसला किया है। धार शहर के काजी वकार सादिक ने कहा कि वे फैसले का अध्ययन करने के बाद सर्वोच्च अदालत का रुख करेंगे।
असदुद्दीन ओवैसी ने कहा कि हमें उम्मीद है कि सुप्रीम कोर्ट इस मामले को सुलझाएगा और इस आदेश को रद्द कर देगा।
भोजशाला का तिहासिक महत्व
हिंदू परंपरा के अनुसार भोजशाला का निर्माण 11वीं शताब्दी में परमार वंश के प्रसिद्ध राजा भोज ने करवाया था। राजा भोज को विद्या और साहित्य का संरक्षक शासक माना जाता है। कहा जाता है कि उन्होंने यहां संस्कृत शिक्षा का एक बड़ा केंद्र स्थापित किया था। हिंदू पक्ष का दावा है कि यह स्थान देवी सरस्वती (वाग्देवी) का मंदिर था, जहां ज्ञान और विद्या की पूजा होती थी।
कुछ ऐतिहासिक संदर्भों में भोजशाला को संस्कृत विश्वविद्यालय या विद्या केंद्र के रूप में भी उल्लेखित किया गया है। हिंदू संगठनों का कहना है कि यहां देवी सरस्वती की एक प्रसिद्ध मूर्ति भी थी, जिसे बाद में ब्रिटिश काल में लंदन ले जाया गया।
मुस्लिम पक्ष का दावा
मुस्लिम पक्ष इस स्थल को “कमाल मौला मस्जिद” मानता है। मुसलमानों के अनुसार 13वीं और 14वीं शताब्दी में जब मालवा सल्तनत में मुस्लिम शासकों का शासन स्थापित हुआ, तब इस स्थान को मस्जिद में बदल दिया गया और यहां सदियों तक नमाज़ अदा की जाती रही।
मुस्लिम पक्ष का कहना है कि केवल ऐतिहासिक दावों के आधार पर किसी स्थान को मंदिर घोषित नहीं किया जा सकता, क्योंकि यहां कई सौ वर्षों से इस्लामी इबादत होती रही है। उनका तर्क है कि यदि किसी स्थान पर सदियों से मस्जिद के रूप में धार्मिक गतिविधियां चल रही हों, तो उसे केवल पुरातात्विक व्याख्याओं के आधार पर नहीं बदला जा सकता।
मुस्लिम संगठनों ने अदालत में यह भी कहा कि ASI की रिपोर्ट पक्षपातपूर्ण थी और उसे हिंदू पक्ष के दावों को मजबूत करने के लिए तैयार किया गया। उनके अनुसार मस्जिद की इस्लामी पहचान, मेहराब, वास्तुकला और ऐतिहासिक उपयोग को नजरअंदाज किया गया।
