चुनाव आयोग के विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान का असर अब सरकारी योजनाओं पर भी दिखने लगा है। पश्चिम बंगाल और बिहार सरकार ने फैसला किया है कि जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटाए गए हैं, उन्हें फिलहाल सरकारी और कल्याणकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिलेगा।
बिहार और बंगाल में लाखों नाम हटे
एसआईआर अभियान के दौरान बिहार में करीब 65 लाख और पश्चिम बंगाल में 91 लाख नाम मतदाता सूची से हटाए गए। चुनाव आयोग ने यह कार्रवाई मृत, डुप्लीकेट और अपात्र मतदाताओं के नाम हटाने के लिए की थी।
बंगाल में 1 जून से नई योजना
पश्चिम बंगाल सरकार 1 जून से महिलाओं के लिए ‘अन्नपूर्णा भंडार’ योजना शुरू करने जा रही है। इस योजना के तहत हर महीने 3,000 रुपये दिए जाएंगे। सरकार ने साफ किया है कि जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हट गए हैं, उन्हें इस योजना का लाभ नहीं मिलेगा।
राज्य सरकार का कहना है कि यदि बाद में किसी व्यक्ति का नाम दोबारा वोटर लिस्ट में जुड़ जाता है, तो उसे योजनाओं का लाभ फिर से मिल सकेगा।
बिहार में राशन और बैंक खातों पर असर
बिहार सरकार ने भी स्पष्ट किया है कि जिन लोगों के नाम वोटर लिस्ट से हटे हैं, वे राशन और अन्य सरकारी योजनाओं के पात्र नहीं होंगे। ऐसे लोगों के बैंक खातों से जुड़ी सुविधाओं की भी समीक्षा की जाएगी।
सरकार का तर्क
दोनों राज्य सरकारों का कहना है कि इस फैसले का उद्देश्य फर्जी लाभार्थियों, मृत व्यक्तियों और गैर-पात्र लोगों को सरकारी योजनाओं से बाहर करना है, ताकि वास्तविक जरूरतमंदों तक लाभ पहुंच सके।
विपक्ष ने उठाए सवाल
विपक्षी दलों ने इस फैसले पर सवाल खड़े किए हैं। उनका कहना है कि वोटर लिस्ट में नाम न होना किसी व्यक्ति की नागरिकता या सरकारी योजनाओं की पात्रता तय करने का आधार नहीं होना चाहिए। कांग्रेस नेता पी. चिदंबरम ने इस कदम को बेहद चिंताजनक बताया है।
टीएमसी का आरोप: बंगाल में अल्पसंख्यक और प्रवासी बहुल इलाकों में इस अभियान पर काफी विवाद हुआ था। ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी ने आरोप लगाया था कि इसका मकसद सिर्फ वोटरों को दबाना है।
