नई दिल्ली: (फरहीन सैफी) तालिबान को अफगानिस्तान पर कब्जा किए और अशरफ गनी की सरकार को उखड़े हुए 100 दिन पूरे हो गए हैं।
तालिबान समझ आ गया है कि किसी देश पर कब्जा करना तो आसान है, लेकिन उस देश को चलाना बेहद मुश्किल है। किसी देश के हाल को परखने के लिए सौ दिन बहुत ज़्यादा तो नहीं होते लेकिन अफ़ग़ानिस्तान के लिए बीते सौ दिन बहुत ख़ास रहे हैं।
इस दौरान अफ़ग़ानिस्तान में बहुत कुछ बदल चुका है। राष्ट्रपति अशरफ ग़नी की अगुवाई में चलने वाली सरकार की जगह तालिबानी सरकार ले चुकी है।
दुनिया के किसी भी देश ने इस सरकार को मान्यता नहीं दी है। और न ही बाकी देशों की तरह संयुक्त राष्ट्र ने इसके झंडे को मान्यता प्राप्त की है।
तालिबान की चुनोतियाँ
तालिबान ने एक अहम वादा सुरक्षा को लेकर किया था। लेकिन स्थितियां तालिबान के काबू में नहीं दिखती हैं। सबसे बड़ी चुनौती इस्लामिक स्टेट की ओर से मिल रही है। हाल में संयुक्त राष्ट्र ने बताया है कि अफ़ग़ानिस्तान में लगभग हर जगह इस्लामिक स्टेट मौजूद है। इसके संके किसी त अगस्त से ही मिल रहे हैं।
अफगानिस्तान में जबसे तालिबानी सत्ता आई है उसके बाद से ही महिलाओं के काम करने और लड़कियों की पढ़ाई पर रोक लगा दी गई, पाबंदी की वजह से अमेरिका के साथ साथ पश्चिम देशों ने अफ़ग़ानिस्तान की मदद करनी बंद कर दी है।
तालिबान के काबुल पर कब्जे के बाद से अधिकतर महिला कर्मचारी अपने घरों तक सीमित हैं। काबुल में महिलाओं ने लगातार प्रदर्शन किए हैं, लेकिन स्थिति में ज़्यादा बदलाव नहीं हुआ है। महिला पत्रकारों को भी काम करने की इजाज़त नहीं है। स्वास्थ्य के क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं समेत कुछ ही महिलाओं को काम करने की अनुमति है।
भूख और गरीबी
तालिबान के काबुल पर कब्जे के बाद से अफगानिस्तान के सामने भुखमरी की समस्या भी खड़ी हो गई है। देश की अर्थव्यवस्था बुरी तरह लड़खड़ा गई है। पश्चिमी देशों के मदद बंद करने से अर्थव्यवस्था लड़खड़ा गई है।
लाखों की संख्या में अफ़ग़ानिस्तान के नागरिक देश छोड़कर जा चुके है। संयुक्त राष्ट्र ने आगाह किया है कि अफ़ग़ानिस्तान के 2.3 करोड़ से अधिक लोगों को भूख से बचाने के लिए वर्ल्ड फूड प्रोग्राम (डब्ल्यूएफपी) को अनाज की आपूर्ति बढ़ानी होगी।
हाल में अफ़ग़ानिस्तान का दौरा करने वाले डब्ल्यूएफपी के कार्यकारी निदेशक डेविड बेस्ली ने कहा, “यहां के हालात आप जितना सोच सकते हैं, उससे ज़्यादा बुरे हैं। वास्तव में, हम अब धरती के सबसे ख़राब मानवीय संकट पैदा होने के ख़तरे को देख रहे हैं।
अगर अफगानिस्तान का मौसम उतना ही ख़राब हो जाए, जैसा कि विशेषज्ञ भविष्यवाणी कर रहे हैं, तो अफ़ग़ानिस्तान में गंभीर भुखमरी और अकाल का ख़तरा पैदा होने की आशंका है।
अगस्त में तालिबान के अफ़ग़ानिस्तान की सत्ता में आने से पहले, माना जा रहा था कि राष्ट्रपति अशरफ़ ग़नी की सरकार अंतरराष्ट्रीय समुदाय की मदद से सर्दियों के दौरान आने वाले ख़तरे से निपट लेगी। लेकिन जब उनकी सरकार गिर गई तो मदद मिलने का भरोसा भी गायब हो गया।
पश्चिमी देशों ने अफ़ग़ानिस्तान को मदद पर रोक लगा दी है। वे एक ऐसे शासन की मदद नहीं करना चाहते, जो लड़कियों को शिक्षा हासिल करने से रोके और देश में शरिया क़ानून फिर से लागू करे।
संयुक्त राष्ट्र और उसके सहयोगी संगठन दुनिया के तमाम देशों और अमीर मुल्कों के अरबपतियों से अफ़ग़ानिस्तान की तत्काल मदद करने की अपील कर रहे हैं।
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