भारतीय सांसदो की तादाद मे इजाफा होने की सम्भावना पर एक नई बहस शूरु।

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20 December 2019 (Publish: 05:10 PM IST)

अशफाक कायमखानी।
जयपुर|भारत मे लोकसभा क्षेत्रो का नये रुप मे पहला परिसीमन 1971 की जनसंख्या का आधार मानकर 1977 के लोकसभा चुनाव मे व उसके बाद 2001 की जनगणना को आधार मानकर किये गये परिसीमन के मुताबिक 2008 के लोकसभा चुनाव होने के बाद संसद से 2025 तक नये तौर पर परिसीमन नही होने की लगी हुई रोक को हटाने व लोकसभा के सांसदों की तादाद बढाकर एक हजार करने की वकालत पीछले दिनो साबिक राष्ट्रपति प्रवण मुखर्जी द्वारा एक समारोह मे करने के बाद देश मे एक नई बहस को जन्म दे दिया है।

1977 मे भारत मे जब 1971 की जनगणना को आधार मानकर लोकसभा क्षेत्रों का परिसीमन किया गया था। जब भारत की आबादी पचपन करोड़ थी जो अब बढकर दूगनी से अधिक हो गई बताते है। एवं 2001 की आबादी को आधार मानकर किये गये परिसीमन के 2008 मे हुये लोकसभा चुनाव मे प्रत्येक क्षेत्र मे आठ से नो लाख मतदाता होते थे जो अब बढकर सोलह से अठारह लाख मतदाताओं वाले लोकसभा क्षेत्र हो गये है। यानि आबादी को आधार माने तो लोकसभा की सीटो मे कम से कम दूगना इजाफा तो होना चाहिए। ओर उसी के अनुपात मे राज्य सभा की सीटो मे भी इजाफा किया जा सकता है।

भारत के उनतीस राज्य व सात केंद्र शासित प्रदेशों की लोकसभा मे दो मनोनीत सांसदों को छोड़कर कुल 545 मे से 543 निर्वाचित सांसदो की तादाद के अलावा राज्य सभा की 245 सांसदों की तादाद मे इजाफा होने की रोक अगर संसद अब हटा लेती है, तो अगले चुनाव नये परिसीमन के आधार से करवाये जा सकते है। अगर संसद 2025 तक रोक नही हटाती है तो 2021 की जनसंख्या को आधार मानकर नये परिसीमन की कार्यवाही 2026 मे शुरू होगी जिसके मुकम्मल होने पर 2030 के चुनाव नये परिसीमन व सांसदो की नई तय होने वाली तादाद के अनुसार हो पायेंगे।

हालांकि नियमों के मुताबिक परिसीमन मे किसी भी दल को कोई फायदा होने की बात चाहे कोई नही स्वीकारें लेकिन यह तय है कि सत्ताधारी दल को नये परिसीमन को अपने मुताबिक करने व करवाने मे काफी फायदा मिलता है। पूर्व राष्ट्रपति प्रवण मुखर्जी जी की एक समारोह मे सांसदो की तादाद बढाने व नये तौर पर परिसीमन करने के लिये संसद की रोक हटाने की अपील को हल्के मे नही लिया जा सकता है। इस अपील के बाद सांसदो की तादाद बढने व समय के पहले परिसीमन होने के लिये संसद की रोक हटने की सम्भावना जौर पकड़ती जरूर नजर आ रही है।

अब कभी भी भारतीय संसद के सदस्यों की तादाद मे इजाफा होगा तो उसमे राज्य की जनसंख्या को आधार मानकर सदस्यों की तादाद तय की जायेगी। इस फोरमूले को मध्य रखकर सोचे तो जनसंख्या कंट्रोल करने वाले दक्षिणी राज्यों को मुकाबले हिन्दी भाषी व अन्य पश्चिमी राज्यों मे सदस्यों की तादाद अधिक बढेगी। जिसको लेकर दक्षिणी भारत के राज्यों मे असंतोष पैदा हो सकता है।

कुल मिलाकर यह है कि साबिक राष्ट्रपति प्रवण मुखर्जी के एक समारोह मे संसद सदस्यों की तादाद एक हजार करने के साथ संसद द्वारा 2025 तक नये परिसीमन व सदस्यों की संख्या बढाने पर लगी रोक को हटाने की अपील करने को हल्के मे नही लिया जा सकता है। सदस्यों की तादाद व नये तोर पर लोकसभा क्षेत्रो के परिसीमन होने की सम्भावना काफी बढ चुकी है।

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