नई दिल्ली: (रुखसार अहमद) बदायूं से दिल्ली का सफर नजीब अहमद के लिए सपने की तरह था। लेकिन वहीं सपना उसकी जान का दुश्मन बनकर रह गया। जेएनयू में एमएससी बायोटेक्नोलॉजी में दाखिला लेकर वह वैज्ञानिक बनना चाहता था। सपना था अपनी अम्मी और परिवार के लिए नाम और शोहरत कमाना चाहता था।
13 अक्तूबर 2016 को बदायूं से जेएनयू कैंपस के लिए निकलने से पहले उसने अम्मी से जल्द घर लौटने का वादा किया था, लेकिन उसे वह पांच साल बाद भी पूरा नहीं कर पाया है।
आज नजीब अहमद को लापता हुए पूरे 5 साल हो गए। लेकिन एक मां को अबतक उसका बेटा नहीं मिल पाया। देश की सबसे स्मार्ट कही जाने वाली दिल्ली पुलिस से लेकर सीबीआई तक के हाथ खाली हैं। मैं अक्सर एक ही सवाल करती हूं कि मेरे बेटे की जगह किसी नेता या अधिकारी का बेटा होता, तब भी जांच एजेंसियां ऐसे ही खाली हाथ अदालत में खड़ी होतीं। पुलिस आरोपियों के मोबाईल का पैटर्न लॉक तक नही खुला पाई है जिसकी वजह से CBI ने अदालत में क्लोज़र रिपोर्ट लगा दी है।
एक मां नेता, पुलिस, केंद्रीय गृह मंत्री, प्रधानमंत्री से लेकर अदालत के चक्कर काटती रही, पर सबकी चुप्पी टूटती ही नहीं है। आंखों में आंसू और हाथों में बेटे का फोटो थामे बेबस फातिमा नफीस हर आहट पर पूछती हैं कि मेरा नजीब आ गया या उसका कुछ पता लगा? फातिमा का आरोप है कि एबीवीपी के छात्रों को बचाने के लिए सुरक्षा एजेंसियां भी चुप हैं। उनका कहना है कि कैंपस से लापता होने से पिछली रात नजीब के साथ उन्हीं छात्रों ने मारपीट की थी। सोशल माडिया पर भी नजीब को लेकर एक ही सवाल उठता है, अखिर नजीब कहां है। पुलिस इस मामले में कोई जांच क्यों नहीं करती।
कब क्या हुआ…
14 अक्तूबर 2016 की रात कैंपस स्थित हॉस्टल में नजीब अहमद और कुछ छात्रों के बीच मारपीट हुई।
15 अक्तूबर को माही-मांडवी हॉस्टल से नजीब अहमद लापता हो गया।
17 अक्तूबर को विश्वविद्यालय प्रबंधन ने परिजनों के साथ दिल्ली पुलिस में उसके लापता होने की शिकायत दर्ज कराई।
इसके बाद दिल्ली पुलिस की जांच चलती रही। परिजनों की मांग पर अदालत ने जांच का जिम्मा सीबीआई को सौंपा। आज तक किसी भी जांच एजेंसी के पास नजीब से जुड़ी कोई जानकारी नहीं मिली है।
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