क्या आपको शर्म आ रही है कि आप एक जिन्दा लाश बन चुके हैं ?

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19 November 2019 (Publish: 05:59 PM IST)

क्या आप सभी को शर्म आ रही है कि जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों पर लाठियाँ बरसाईं गईं ?

क्या आपको शर्म आ रही है कि एक नेत्रहीन छात्र पर लाठियाँ बरसाई गईं ?

क्या आपको शर्म आ रही है कि ग़रीब छात्रों को उच्च शिक्षा मिलने के हक़ को कुचला जा रहा है?

क्या आपको शर्म आ रही है कि चैनलों के ज़रिए एक यूनिवर्सिटी के ख़िलाफ़ अभियान चलाया जा रहा है?

क्या आपको शर्म आ रही है कि जिन वकीलों से पिट कर जो महिला आई पी एस अपना केस तक दर्ज नहीं करा सकीं?

क्या आपको शर्म आ रही है कि पिटने वाले जवानों का साथ पुलिस के अफ़सरों ने नहीं दिया ?

क्या आपको शर्म आ रही है कि उन जवानों ने ही छात्रों को पीटा?

क्या आपको शर्म आ रही है कि सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार शिक्षा के नाम पर वसूला गया दो लाख करोड़ पूरी तरह ट्रांसफ़र नहीं किया गया है?

क्या आपको शर्म आ रही है कि सीएजी की इस रिपोर्ट के बारे में पता नहीं था जिसकी खबर फ़रवरी 19 में मनीकंट्रोल डॉट कॉम पर छपी थी ?

क्या आपको शर्म आ रही है कि 2007 से प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के नाम पर वसूला गया 94000 करोड़ अभी तक शिक्षा कोष में नहीं दिया गया है ?

क्या आपको शर्म आ रही है कि यह पैसा ख़र्च होता तो गाँव से लेकर शहर के ग़रीबों को टॉप क्लास शिक्षा मिलती ?

क्या आपको शर्म आ रही है कि आप दंगाई, माफिया नेताओं के समर्थन में खड़े होते हैं और छात्रों के समर्थन में नहीं ?

क्या आपको शर्म आ रही है कि आप संसाधनों को लूटने वाले उद्योगपतियों के समर्थन में चुप रहते हैं लेकिन छात्रों के ख़िलाफ़ बोलते हैं ?

क्या आपको शर्म आ रही है कि आई टी सेल एक पोस्ट लिख देता है, गाली देता है तो आप चुप हो जाते हैं ?

क्या आपको शर्म आ रही है कि आप एक लाश बन चुके हैं ?

क्या आपको लाशों का लोकतंत्र नज़र आ रहा है ?

Courtesy: यह पोस्ट रवीश कुमार जी के फेसबुक वाल से लिया गया है।

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