CAA का विरोध करने वालों पर ताबड़तोड़ गोलियां चलाने वाली यूपी पुलिस के अपराध को कम करके दिखाने के लिए भले ही पुलिस डिपार्टमेंट ने दावा कर लिया कि उसके 57 जवानों को गोली लगी है लेकिन मीडिया पड़ताल में ये बात झूठी पाई जा रही है।
एनडीटीवी के पड़ताल में पाया गया कि पूरे प्रदेश में सिर्फ एक पुलिस वाले को गोली लगी है। इसके साथ ही इस मीडिया ने दावा किया है कि पुलिस विभाग की तरफ से कथित पीड़ितों का नाम नहीं बताया जा रहा है। सिर्फ जिलेवार लिस्ट जारी की जा रही है। अब सवाल उठ रहे हैं कि 57 पुलिस वालों के गोली लगने का दावा किस आधार पर किया गया है ?
दूसरी तरफ प्रदर्शनकारियों की तरफ से दावा किया जा रहा है कि पुलिस ने उनपर गोलियां चलाई हैं, जिसमें कई लोग ना सिर्फ घायल हुए हैं बल्कि 20 से ज्यादा लोगों की जान चली गई है। प्रदर्शनकारियों के इस दावे की सच्चाई को तमाम वीडियो में देखा भी जा सकता है और मीडिया की पड़ताल में जांचा भी जा सकता है, जिससे स्पष्ट हो जाता है कि प्रदर्शनकारियों पर बेरहमी से गोलियां चलाई हैं और मामले में फंसता हुआ देख पुलिस ने विक्टिम कार्ड खेला है।
संभवत पुलिस विभाग ने यह दावा इसलिए किया है कि वो संदेश दे सके कि प्रदर्शनकारी बेहद हिंसक थे और पुलिस वालों पर गोलियां चला रहे थे इसलिए आत्मरक्षा में उन्होंने गोलियां चलाई। सीएए के विरोध में हो रहे प्रदर्शन पर पुलिस का रवैया बेहद उग्र रहा है। प्रदर्शनकारियों को न सिर्फ बुरी तरह से मारा-पीटा गया है बल्कि मौका मिलते ही उनकी जान लेने की कोशिश की गई है। यहां तक कि एक आरोप के मुताबिक मुजफ्फरनगर के एक मदरसे के बच्चों के साथ यौन उत्पीड़न भी हुआ है।
खबरों के मुताबिक इन बच्चों को लॉकअप में डालकर बुरी तरह से मारा पीटा गया, जबरदस्ती जय श्रीराम के नारे लगवाए गए और उनके गुप्तांगों में डंडे डालकर प्रताड़ित किया गया।
अमानवीय घटनाओं को अंजाम देने वाली यूपी पुलिस जिम्मेदार जवानों पर कार्यवाई करने बजाय जिस तरह से झूठी कहानियां गढ़ रही है, उसकी परतें धीरे-धीरे खुलती जा रहे हैं। जैसे-जैसे ग्राउंड रिपोर्ट आते जाएंगे योगी सरकार और उनके पुलिस प्रशासन द्वारा बोले गए एक-एक झूठ बेनकाब होते जाएंगे।
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