भारत में धार्मिक स्थलों को लेकर विवाद कोई नई बात नहीं है, लेकिन बाबरी मस्जिद फैसले के बाद जिस तरह ऐतिहासिक मस्जिदों को लेकर नए-नए दावे और कानूनी लड़ाइयाँ सामने आ रही हैं, उसने देश के मुसलमानों के भीतर गहरी चिंता पैदा कर दी है। अब मध्य प्रदेश के धार में स्थित सदियों पुरानी कमाल मौला मस्जिद को लेकर आया हाईकोर्ट का फैसला भी उसी सिलसिले की एक नई कड़ी बन गया है।
बहुत से मुसलमानों के लिए यह सिर्फ एक संपत्ति विवाद नहीं है। यह पहचान, इतिहास, संविधान और भारत में धार्मिक सह-अस्तित्व के भविष्य का सवाल बन चुका है।
मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित कमाल मौला मस्जिद का इतिहास तेरहवीं सदी से जुड़ा हुआ माना जाता है। ऐतिहासिक विवरणों के अनुसार मालवा सल्तनत के दौर में एक सूफी बुज़ुर्ग कमाल शाह ने वहां एक धार्मिक और आध्यात्मिक केंद्र स्थापित किया था, जिसके भीतर एक मस्जिद बनाई गई। तब से लेकर आज तक यह स्थान लगातार मस्जिद के रूप में इस्तेमाल होता रहा है। इस ढांचे में गुम्बद, मेहराब और इस्लामी स्थापत्य कला की तमाम विशेषताएँ मौजूद हैं। सदियों तक यहां मुसलमान नमाज़ अदा करते रहे और कभी कोई बड़ा विवाद सामने नहीं आया।
महत्वपूर्ण बात यह है कि इस स्थान को लेकर विवाद बहुत बाद में शुरू हुआ। ब्रिटिश शासन के दौरान, लगभग 1904 में कुछ हिंदू संगठनों ने यह दावा करना शुरू किया कि यह स्थान मूल रूप से सरस्वती मंदिर था, जिसे परमार वंश के राजा भोज ने दसवीं सदी में बनवाया था। उनके अनुसार यह परिसर “भोजशाला” था, जिसे बाद में मस्जिद में बदल दिया गया।
लेकिन उस समय ब्रिटिश प्रशासन ने इन दावों को स्वीकार नहीं किया और इस स्थान को मस्जिद के रूप में ही मान्यता दी। इसके बावजूद हिंदू संगठनों की मांग धीरे-धीरे मजबूत होती गई और यह विवाद आगे चलकर अदालतों तक पहुंच गया।
साल 2003 में सरकार और आर्कियोलॉजिकल सर्वे ऑफ इंडिया (ASI) की ओर से एक साझा व्यवस्था लागू की गई। इसके तहत मंगलवार को हिंदू समुदाय को पूजा की अनुमति दी गई जबकि जुमे के दिन मुसलमान नमाज़ पढ़ते रहे। इस प्रकार दोनों समुदाय एक ही परिसर का अलग-अलग समय पर इस्तेमाल करने लगे। हालांकि हिंदू संगठन लगातार पूरे परिसर को मंदिर घोषित करने की मांग करते रहे।
यह विवाद नए मोड़ पर तब पहुंचा जब 2024 में ASI को इस परिसर का विस्तृत सर्वे करने का आदेश दिया गया। सर्वे के दौरान ASI ने दावा किया कि परिसर में संस्कृत शिलालेख, विशेष प्रकार के खंभे और कुछ ऐसे स्थापत्य अवशेष मिले हैं जो संकेत देते हैं कि यह ढांचा संभवतः दसवीं सदी का हो सकता है। ASI की रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि “ऐसा लगता है” कि यहां कभी राजा भोज के समय सरस्वती मंदिर मौजूद था।
यहीं से सबसे बड़ा विवाद शुरू होता है।
क्या सदियों से मस्जिद के रूप में इस्तेमाल हो रहे किसी धार्मिक स्थल की पहचान केवल ऐतिहासिक व्याख्या, अनुमान या संभावना के आधार पर बदली जा सकती है? क्या “ऐसा लगता है” और “संभवतः” जैसे शब्द किसी जीवित धार्मिक स्थल की स्थिति बदलने के लिए पर्याप्त आधार बन सकते हैं?
मुस्लिम पक्ष का कहना है कि मस्जिद होने के स्पष्ट प्रमाण मौजूद हैं। यह स्थान सदियों से मस्जिद के रूप में इस्तेमाल होता रहा है। यहां इस्लामी स्थापत्य मौजूद है। ऐतिहासिक रिकॉर्ड भी इसे मस्जिद बताते हैं। लेकिन आलोचकों के अनुसार मंदिर होने का कोई निर्णायक और ठोस प्रमाण अदालत के सामने पेश नहीं किया गया। ASI की रिपोर्ट भी मुख्य रूप से संभावनाओं और व्याख्याओं पर आधारित थी।
इसके बावजूद मध्य प्रदेश हाईकोर्ट ने लगभग 2000 पन्नों की ASI रिपोर्ट को आधार बनाकर यह फैसला सुना दिया कि यह स्थान राजा भोज द्वारा निर्मित सरस्वती मंदिर से जुड़ा हुआ है। अदालत ने मुस्लिम पक्ष से यह भी कहा कि वे मस्जिद के लिए किसी दूसरी जगह की मांग कर सकते हैं।
फैसले का यही हिस्सा सबसे ज्यादा चिंता पैदा कर रहा है। बहुत से लोगों का मानना है कि बाबरी मस्जिद फैसले के बाद अब ऐतिहासिक मस्जिदों को लेकर एक नया पैटर्न उभर रहा है, जहां सर्वे, पुरातात्विक दावे और अदालतों के माध्यम से उनकी धार्मिक पहचान को चुनौती दी जा रही है।
इस पूरे विवाद में सबसे बड़ा संवैधानिक सवाल 1991 के प्लेसेज़ ऑफ वर्शिप एक्ट को लेकर उठ रहा है। यह कानून उस समय बनाया गया था जब देश बाबरी मस्जिद विवाद की वजह से गंभीर तनाव का सामना कर रहा था। इस कानून का उद्देश्य स्पष्ट था — 15 अगस्त 1947 को देश के धार्मिक स्थलों की जो स्थिति थी, उसे बदला नहीं जाएगा।
इस कानून का मकसद यही था कि भारत बार-बार इतिहास के धार्मिक विवादों में न फंसे और देश में सांप्रदायिक सौहार्द बना रहे।
लेकिन कमाल मौला मस्जिद पर आया यह फैसला इस कानून की भावना को कमजोर करता हुआ दिखाई दे रहा है। अगर सदियों पुरानी मस्जिदों को अब पुरातात्विक व्याख्याओं और ऐतिहासिक दावों के आधार पर बदला जा सकता है, तो भविष्य में देश के कई अन्य धार्मिक स्थलों को भी इसी तरह कानूनी विवादों में घसीटा जा सकता है।
संवैधानिक विशेषज्ञों और मुस्लिम संगठनों का कहना है कि इस तरह की घटनाएं देश में लंबे समय तक अस्थिरता और सांप्रदायिक तनाव पैदा कर सकती हैं। उनका तर्क है कि अगर हर धार्मिक स्थल को इतिहास के आधार पर चुनौती दी जाने लगी, तो भारत लगातार धार्मिक मुकदमों और सामाजिक ध्रुवीकरण के दौर में फंस जाएगा।
दूसरी तरफ हिंदू संगठन इस फैसले को “ऐतिहासिक न्याय” बता रहे हैं। उनका कहना है कि जिन स्थानों पर पहले मंदिर थे, उन्हें हिंदू समाज को वापस मिलना चाहिए। हाल के वर्षों में इस सोच को राजनीतिक समर्थन भी मिला है।
लेकिन बड़ा सवाल यह है कि क्या सदियों पुराने ऐतिहासिक दावों के लिए वर्तमान सामाजिक शांति को दांव पर लगाया जा सकता है? क्या एक आधुनिक संवैधानिक लोकतंत्र मध्यकालीन विवादों के आधार पर चल सकता है?
कमाल मौला मस्जिद का मामला अब सिर्फ धार की एक इमारत तक सीमित नहीं रह गया है। यह भारत के संविधान, धार्मिक स्वतंत्रता, अल्पसंख्यक अधिकारों और देश के धर्मनिरपेक्ष ढांचे से जुड़ा एक बड़ा राष्ट्रीय सवाल बन चुका है।
संभावना है कि आने वाले समय में यह मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचेगा, जहां 1991 के प्लेसेज़ ऑफ वर्शिप एक्ट और धार्मिक स्थलों की संवैधानिक स्थिति पर फिर से बड़ी बहस हो सकती है।
फिलहाल इतना साफ है कि बाबरी मस्जिद के बाद कमाल मौला मस्जिद पर आया यह फैसला भारत में एक नई बहस को जन्म दे चुका है। यह बहस सिर्फ इतिहास की नहीं, बल्कि भारत के भविष्य, संविधान और सांप्रदायिक सौहार्द की भी है।
शम्स तबरेज़ कासमी
संपादक, मिल्लत टाइम्स
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