नई दिल्ली:(फरहीन सैफी) लोकसभा में बुधवार को भाजपा सांसद निशिकांत दुबे ने समान नागरिक संहिता लागू करने के लिए कानून बनाने की मांग की। उन्होंने इलाहाबाद हाईकोर्ट की हालिया व्यवस्था का उल्लेख करते हुए कहा कि आजादी के 75 साल बाद भी इसे लागू न किया जाना दुख की बात है।
उन्होंने कहा कि धर्म के आधार पर बंटवारे के बावजूद भारत धर्मनिरपेक्ष देश है। यहां किसी धर्म के द्वारा बनाए गए पर्सनल लॉ को स्वीकार नहीं किया जा सकता। हम समान नागरिक संहिता कानून लागू नहीं कर रहे, इसलिए इसमें अदालतों को लगातार दखलंदाजी करनी पड़ रही है।
आइये जानते है यूनिफॉर्म सिविल कोड है क्या
इस मुद्दे पर एक लंबे अरसे से बहस होती आई है। संविधान के भाग 4 के आर्टिकल 44 में कहा गया है कि राज्य को मुनासिब वक़्त आने पर सभी मजहबों के लिए समान नागरिक सहिंता (Uniform Civil Code) बनाने की हिदायत दी गई है। समान नागरिक संहिता का मतलब देश के हर नागरिक के लिए एक जैसा कानून होता है, भले ही वह शख्स किसी भी मज़हब या तबके का हो।
जैसे शादी, तलाक, जमीन- जायदाद इन सब को लेकर सभी धर्मों के अपने अपने अलग अलग कानून है जिसे पर्सनल लॉ कहते है। काफी सारे देशो में ये कानून लागू हो चुके हैं मगर हिंदुस्तान में अभी तक ऐसा नहीं हो सका है।
कोर्ट ने इस कानून पर क्या कहा
हाई कोर्ट ने 1985 में सुप्रीम कोर्ट की तरफ से जारी एक निर्देश का हवाला देते हुए निराशा जताई कि तीन दशक बाद भी इस कानून को गंभीरता से नहीं लिया गया है। हाल ही में सुप्रीम कोर्ट के पूर्व चीफ जस्टिस एस ए बोबडे ने भी गोवा के यूनिफॉर्म सिविल कोड की तारीफ की थी।
बतौर सीजेआई गोवा में हाई कोर्ट बिल्डिंग के उद्घाटन के मौके पर चीफ जस्टिस ने कहा था कि गोवा के पास पहले से ही ऐसा यूनिफॉर्म सिविल कोड है जिसकी कल्पना संविधान निर्माताओं ने की थी।
इस मामले को गम्भीरता से लेते हुए दिल्ली हाई कोर्ट ने एक केस की सुनवाई के दौरान देशभर में समान नागरिक संहिता (Uniform Civil Code) लागू करने की वकालत की।
कोर्ट ने कहा कि अब समाज में धर्म, जाति और समुदाय की परंपरिक रूढ़ियां धीरे धीरे टूट रही हैं, इसलिए समय आ गया है कि संविधान की धारा 44 में निहित समान नागरिक संहिता की तरफ कदम बढ़ाया जाए
मुसलमान क्या सोचते हैं इस कानून पर
ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने समान नागरिक संहिता को संवैधानिक अधिकारों के खिलाफ बताया है। रविवार को बोर्ड ने सरकार से कहा कि वह इस संहिता को किसी भी सूरत में लागू नहीं करे। बोर्ड ने सरकार से यह भी कहा है कि वो ऐसी कोई भी संहिता लागू न करे। बोर्ड द्वारा जारी प्रस्ताव में कहा गया है कि हिंदुस्तान में अनेक धर्मों और रवायत के मानने वाले लोग रहते हैं।
ऐसे में समान नागरिक संहिता इस देश के लिए बिल्कुल भी ठीक नहीं है और ऐसी संहिता लागू करने की दिशा में उठाया जाने वाला कोई भी कदम हमारे संवैधानिक अधिकारों का हनन होगा। प्रस्ताव में इस्लाम के धर्म प्रचारकों को अवैध धर्मांतरण के आरोप में गिरफ्तार किए जाने और कुछ सांप्रदायिक लोगों द्वारा खुलेआम धर्मांतरण का नारा लगाने के बावजूद उनके खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं किए जाने पर निराशा भी जाहिर की गई है।
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