पटना के लेखक अरुण सिंह की किताब “पटना एक खोया हुआ शहर” और गगन गिल की कविता संग्रह “थपक थपकत दिल”और “मैं जब तक आई बाहर”का किया गया विमोचन
मिल्लत टाइम्स,पटना:पटना लिटरेचर फेस्टिवल के तीसरे दिन आज की शुरुआत हर शहर कुछ कहता है सत्र से हुआ। सत्र में पटना कलम पर लिखने वाले पत्रकार अरुण सिंह, पत्रकार विकास झा और हिमाचल के साहित्यकार प्रत्युष गुलेरी और पत्रकार चिंकी सिंहा ने किया। विकास झा ने केदारनाथ अग्रवाल की किताब धरतीपुत्र के बारे में बताते हुए कहा कि जिस शहर में रहते है सिर्फ वही हमारी जिम्मेदारी नही है। बल्कि पूरी वसुंधरा हमारी है। मेरा जन्म दरभंगा में हुआ मैं सीतामढ़ी का हुआ अब किस शहर को मैं अपना कहूँ। डोमनिक लोपियर ने कोलकाता पर सिटी ऑफ जॉय लिखा। अब सोचिये इतनी दूर से कोई आकर कोलकाता पर लिखता है जो उस शहर का पर्याय हो जाता है। पटना फल्गु नदी की तरह है जहाँ ऊपर केवल रेत ही रेत है और नीचे पानी ही पानी। पत्रकार और साहित्यकार अवधेश प्रीत ने अशोक राजपथ के बारे में बताते हुए उन्होंने कहा कि मैं अपने घर से जहाँ भी जाता हूँ अशोक राजपथ मेरे साथ जाता है। पटना एक वाहिद शहर और अशोक राजपथ एक वाहिद शहर है। इसपर एक ओर तो तमाम कॉलेज है वही दूसरी ओर उनसे जुड़ी हुई बाजार है। मैं ढूंढता रहा कि क्या ऐसा कोई शहर जहा एक तरफ तमाम कॉलेज है और दूसरी ओर आबादी। बिहार में जितने आंदोलन हुए उसका गवाह रहा है।
पटना एक खोया हुआ शहर” के बारे में बताते हुए अरुण सिंह ने कहा कि 1541 में जब शेरशाह ने अपना फोर्ट बनवाया उस समय के बाद पटना का पुनरुथान हुआ । इस किताब में 1541 से लेकर अब तक पटना के बदलने की कहानी है। 1641 के बाद यह शहर तेजी से बदलने लगा। पहले इसका नाम पट्टन था । पटना नाम शेरशाह का दिया हुआ है। मुगल काल मे पटना व्यापर का केंद्र बना। पटना की शोहरत बढ़ गयी थी ईरान इराक से भी यात्री पटना आने लगे थे। यह से सिल्क पर्शिया जाता था । पटना का 2500 सालों का इतिहास रहा है। यहां जो ट्रेवलर आये अलग अलग देशों के मिर्ज़ा मोहम्मद बहबहानी थॉमस सादिक, अल त्रिवनिंग, मनूची, एम्मा रोबर्टा थॉमस जैसे यात्रियों ने जो लिखा उनसे तात्कालिक पटना का पता चलता है। यह किताब उन्हीं संस्मरणों को आधार बना का लिखी गई है।

त्रिपुरारी शरण ने कहा की आज प्रकृति को बचाना बहुत जरुरी हैं क्लामेट चेंज के परिवर्तन को रोकने के लिए सभी को प्रयास करना चाहिए. रत्नेश्वर सिंह ने कहा की प्रकृति में बदलाव स्वत :होता हैं . सुभाष शर्मा ने कहा की जलवायु दीर्घकाल देखा जा सकता हैं लेकिन मौसम को कुछ दिनों तक ही !उन्होंने कहा की विश्व में 42 लाख लोग सालाना प्रदुषण से मरते हैं और भारत में 20 लाख लोग. निर्देश निधि ने कहा की नदी की अपनी संस्कृति होती हैं . अपना जीवन होता हैं .उन्होंने ये भी कहा नदियों को साफ करने का जिम्मा सिर्फ सरकारों का ही नहीं बल्कि देश के हरेक नागरिकों का भी होता हैं।
कानून ,समाज और स्वतंत्रता के सत्र के दौरान छतीसगढ़ से आई रवीना बरिहा ने कहा कि मानव का प्राकृतिक व्यवहार होता है कि सभी चीजों को धारणाओं में ही देखता है! ज्ञान के दायरे के विकास नहीं होने के कारण हमारे किन्नर समाज को नजरंदाज किया जाता है! स्वतंत्रता की नीव पर ही कोई स्वच्छ समाज का निर्माण हो सकता है! भारत में जब जब बौद्धिक विकास हुआ है किंनरो को स्थान मिला है. रवीना ने किन्नरों के हालात पर एक कविता सुनाया छोटा सा एक बच्चा जनमा आचल की छांव में . पटना की ट्रांसजेंडर एक्टिविस्ट रेशमा प्रसाद ने कहा कि वे आठ सालो से साहित्य, आर्थिक, कला में अपने समुदाय को अधिकार दिलाने के लिए लर रही हूं !साहित्य में किन्नर विमर्श को अधिक से अधिक शामिल किया जाया जानी चाहिए! अभी भी हमारी सामाजिक आजादी पथ पर ही है! हक की लड़ाई का कोई अंत नहीं होता है।

कविताएं कुछ कहती है नामक सत्र में मगही कवि उमाशंकर, बज्जिका कवि पराशर जी और अंगिका से आरोही जी ने अपनी बात रखी। इस सत्र का संचालन आराधना प्रधान ने किया। उमाशंकर जी ने अपना परिचय देते हुवे कहा कि ‘धरती के की हाल बतइयो,पूछ ल जाके सविता से हमरा से हमार हाल न पूछही,पूछ ल जाके कविता से’. उन्होंने अपनी अंतिम बात रखते हुए मथुरा प्रसाद और रामनरेश वर्मा की कविता को पढ़ते हुए अपनी बात खत्म की. पराशर जी ने कहा कि भक्तिकाल किसी भी भाषा के लिए स्वर्णिम काल है. उन्होंने कहा कि बज्जिका भाषा के लिए 20वीं शताब्दी ही उसकी आधुनिक काल है. रहमत उल्ला पहला महाकाव्य हैं बज्जिका के लिए जिनका पहला महाकाव्य जमुनामा जो 1950 में आई. उन्होंने बताया कि बज्जिका में दो रामायण लिखी गईं हैं एक डॉ०अवधेश और दूसरा डॉ०नवल किशोर श्रीवास्तव के द्वारा. उन्होंने कहा कि बाजारवाद के दौर के पिछड़ा हुआ है. ‘तेजाब शाम के बर्साइह हमरा गाँव मे’ कविता को पढ़ते हुए अपनी बात को खत्म किये. आरोही जी ने अंगिका के बारे में बताते हुए कहा कि अंगिका के पुनर्जन्म हो रहा है लेकिन मीडिया उसे आगे नही बढ़ने दे रही है. अपनी “पोती”शीर्षक नामक कविता को पढ़ते हुए आरोही जी अपनी बातों को खत्म किया.
कोई बतलाये की हम बतलाये क्या-ग़ालिब सत्र में शीन काफ निज़ाम ने कहा कि ग़ालिब को उनके शायरी से ज्यादा उनके खतों से जाना जा सकता है . उनकी शायरी तो उनके खतों से निकली है . जगजीत सिंह ग़ालिब के ग़ज़लों को गाना चाहते थे लेकिन गाने से ही पहले उनकी मृत्यु को गयी। उन्होंने हँसते हुए कहा कि ग़ालिब के शायरी को पढ़ते वक्त लगता है की वो टेलीविज़न देख-देख के लिखे हैं। कासिम खुर्शीद ने कहा कि ग़ालिब साहब कहते थे कि ये जो मेरे कलम की खरखराहट है वो खरखराहट नही कोई फरिस्ता है जो मेरे कलम को आगे बढ़ा रहा है. उन्होंने कहा कि अच्छा शायर वो है “जो सवाल पूछता है, सवाल खत्म नही होते और जवाब खत्म हो जाते हैं”और ग़ालिब साहब सवाल पूछते थे इसीलिए वो मुझे पसंद हैंउन्होंने कहा कि ग़ालिब साहब को मोमिन की एक शायरी बहुत पसंद थी “तुम मिरे पास होते हो गोया,जब कोई दूसरा नही होता”और इसीलिए ग़ालिब को मोमिन पसंद थे, ग़ालिब ये भी कहते थे कि ये जो मोमिन ने लिखा है वो मुझे लिखना था।
मीडिया में उभरती प्रवासी की छवि मारिसश से आए रामदेव धुरंधर ने कहा भारत की मीडिया और हमारे देश मीडिया में काफी अंतर हैं !भारत की मीडिया काफी हद तक स्वतंत्र होकर काम करती हैं लेकिन हमारे देश में मीडिया हमेशा फ़्रांसिसी के हाथों में रहा हैं . उन्होंने ये भी कहा हमारे यहाँ प्रधानमंत्री भी भारतीय मुल के ही हैं . पुष्पेंद्र ने मीडिया में प्रवासी की छवि पर बोलते कहा की हमारी मीडिया प्रवासीयों कोई लेकर चर्चा ही नहीं करता हैं . हमारी मीडिया प्रवासीयों, रिलीफ कैंपो के मुद्दे पर फर्क ही नहीं समझता हैं . अनंत विजय ने कहा की प्रवासियों को लेकर मीडिया क्यों नहीं बात करता हैं !इसका समाधान क्या हैं? और इसको बहस का मुद्दा बनाना चाहिए !
साहित्य और कला का संरक्षण और नैतिकक मूल्यों पर उसका प्रभाव सत्र में इम्तियाज अहमद ने कहा कला और साहित्य हमारे नैतिक मूल्यों से जुड़े हुए हैं हिंदुस्तान की परम्परा समावेशी रही हैं .उनको संरक्षण की जरुरत हैं . शक्ति सिंह ने कहा भारत में दर्शन में कई रूप हैं .भारत में इतिहास और साहित्य हमेशा साथ साथ चलता हैं .साहित्य अपने शब्दो से विचारों को व्यक्त करता हैं .साहित्यकार और इतिहासकार तथ्य के आगे नहीं जाते हैं. व्यास जी ने कलाओ, साहित्य का संरक्षण पर जोड़ दिया. उन्होंने यूरोप के रेनेशा पर चर्चा की व्यास जी ने यह भी कहा अगर मनुष्यता को बचाना हैं तो सभ्यता और साहित्य का संरक्षण बहुत जरूरी हैं . विनोद ने कहा हमारे देश में सांस्कृतिक भूख ज्यादा ही हैं और हिंदुस्तान का लेखक हमेशा गरीब ही रहा हैं ! रंगकर्मी अनीश अंकुर ने कहा की बहुत जरूरी हैं कला और साहित्य का संरक्षण करके आने वाली पीढ़ी को उनसे अवगत कराना. कैलाश झा ने मधुबनी पेंटिंग, पंजी आदि पर चर्चा की
मैथिली एक संस्कृति सत्र में तारानंद वियोगी- ने कहा कि विद्या और व्यक्तित्व ही मिथिला की पहचान है। मैथिली समुदाय अतीत का मारा हुआ समाज है। 1910 में अंग्रेज सरकार मैथिली को राष्ट्रीय अधिकार दे रही थी लेकिन यादव महासभा के विरोध पर बिल पास न हो सका। रविन्द्र नाथ टैगोर ने मैथिली को अपनी मौसी भाषा कहा था। वर्तमान की मैथिली पुरुस्कार वितरण बेहद चिंता जनक। मिथिला पेंटिंग में युवाओं के प्रवेश से यह कला अब ग्लोबल हो चुका है, मैथिली की बुलंद आवाज जयपुर लिटरेचर फेस्टिवल तक पहुंचा जिसमें मैथिली के लिए सत्र रखा गया था . डॉ उषा किरण खान ने कहा कि मैथिली संस्कृति समावेशी नहीँ है इसलिए मैथिली संस्कृति का विस्तार नही हुआ। कालजयी रचना को भाषा कभी नहीं भूलती है, जो धरती पर है वही तो संस्कृति है। भाषा अस्मिता अपने आप मे इतनी बड़ी बात है कि बांग्लादेश राष्ट्र का निर्माण हो गया था। मैथिली पुस्तकों का अनुवाद होना चाहिए और अनुवाद विभाग का गठन करके अपने बेहतरीन पुस्तकें विश्व साहित्य में जाय. कार्यक्रम में गगन गिल के पुस्तक का लोकार्पण उषा किरण खान आलोक धन्वा, राम बचन राय शीन काफ निज़ाम के द्वरा किया गयालेखकों ने गगन गिल और उनके लेखन शैली पे प्रकाश डाला। गगन गिल ने अपने चुनिंदा कविताओं का पाठ किया।
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