अंजना ओम कश्यप से मेरी मुलाकात मोतीलाल नेहरू कॉलेज के एक सेमिनार में हुई थी। हालांकि उसके अलग-अलग सेशन में हम वक्ता थे लेकिन श्रोताओं के उनसे सवाल के उनके जवाब के बाद उन्हें काउंटर किया था मैंने। अंजना का वही फॉर्मूला जवाब था कि जो दर्शक देखना चाहता है मीडिया वही दिखाती है। बाद में खाना खाते हुए एक-दूसरे से और संवाद हुआ।
हालांकि अंजना के जवाब में एक बात तो जरुर सच था कि कमोवेश मीडिया को उसके दर्शक प्रभावित करते हैं-कौन सा कार्यक्रम कितना देखा जाता है, इस स्तर पर। आज शाहीन बाग में उनकी रिपोर्टिंग यू ट्यूब पर उनकी दूसरी रिपोर्टिंग की तुलना में काफी ज्यादा लाइव देखी जा रही थी। तो क्या यह देखना ही अंजना और आजतक को बदल रहा है-यह अधूरा सत्य है, लेकिन सत्य तो है ही।
मीडिया कभी भी वायनरी में नहीं होती। गोदी मीडिया और क्रान्तिकारी मीडिया की बाइनरी। पूंजी के नियंत्रण के भीतर जितनी ढील है उसी में वह कभी आजतक होगी तो कभी एनडीटीवी। हालांकि अंजना ओम होने और रवीश कुमार होने में बहुत फर्क होता है। अरुण पूरी के नेतृत्व वाले अन्य माध्यम-मसलन इंडिया टुडे, लल्लनटॉप आदि सीधे एकरूप पैकेज नहीं हैं-एक पैकेज जरूर हैं। क्रेता की रूचि के अनुरूप। (नोट: यहां मैं मीडिया की बात कर रहा जी न्यूज, रिपब्लिक टीवी जैसे मुखपत्रों की नहीं जो भाजपा के सांसदों की अपनी दुकान है।)
लेकिन महाराष्ट्र चुनाव के बाद से आजतक थोड़ी-थोड़ी करवट ले रहा है, अपने ही हाउस के इंडिया टुडे जैसा हो रहा है, लल्लनटॉप जैसा नहीं। कुछ दिन पहले मैंने इस ओर इशारा किया था। इस बदलने के कारण ही ‘जेएनयू का स्टिंग’ हो गया या भाजपा के प्रवक्ताओं से आज थोड़े असुविधाजनक सवाल भी पूछे जा रहे हैं।
आज जब अंजना शाहीनबाग गयीं तो लगभग एक पत्रकार थीं। इसके पहले दो लोग एजेंट की तरह शाहीनबाग में घुसने की निरर्थक कोशिश कर चुके हैं। आज कार्यक्रम का फॉरमेट कुछ ऐसा था कि बीजेपी खुद ब खुद बेनकाब होती गयी। बीजेपी के नेताओं के भाषण के क्लिप के साथ शाहीन बाग की दर्जन भर महिलाओं से रैंडम लिया गया इंटरव्यू और उनका जवाब बीजेपी को अपने फॉर्मेट में अश्लील और झूठा शक्ल देता रहा-पूरे कार्यक्रम में भाजपा को धराशायी किया। और इस कार्यक्रम की प्रस्तोता थीं खुद अंजना ओम कश्यप जिनकी पत्रकारिता/ऐंकरिंग पिछले दिनों समर्पित हो चुकी थी।
आज की प्रस्तुति में अंजना ने स्त्री होने की संवेदना के साथ वैसे सवाल भी किये जिसे कोई गंजेडी मर्द पत्रकार अपने ठस्स के साथ नहीं कर सकता था। ऐसे गंजेडी मर्द पत्रकार शाहीनबाग से भगाये जाने के योग्य ही होते हैं। आखिर जनता का भी हक़ है कि किस पत्रकार से वो बात करे और किससे नहीं।

रही बात औरतों के जवाब की। उन औरतों के जवाब से सीएए, एनआरसी सहित राजनीति के बारे बहुत कुछ सीखा जा सकता है। आजतक का कार्यक्रम सरकार और भाजपा में साम्प्रदायिक एजेंडे को ध्वस्त करे या न करे उसे पस्त जरूर करेगा। इस कार्यक्रम का इरादा जितना स्पष्ट था उतनी ही स्पष्टता से औरतों ने और उपस्थितों ने जवाब दिया।

और थोड़ी राजनीतिक शर्म यदि पार्टी में बची होगी, जिसकी उम्मीद कम ही है, तो 500 रूपये पर प्रोटेस्ट में बैठने के प्रोपगंडा पर औरतों के जवाव को सुनकर वह पश्चाताप जरूर करेगी कि उसने यह मर्दवादी जुमला क्यों उछाला। वैसे अंजना ने भी क्या खूब बाइंड अप कमेंट बोला, ‘ ऐसा कोई नोट इस सरकार ने नहीं छापा है, जिससे इन महिलाओं को खरीदा जा सके।’
Sanjeev Chandan ji के फेसबुक वॉल से ली गई है ये लेखक का निजी विचार है।
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