नई दिल्ली: संभल हिंसा मामले में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (NSA) के तहत हिरासत में बंद अफ़रोज़ को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत मिली है। सुप्रीम कोर्ट ने उनकी निवारक हिरासत को रद्द कर दिया है और उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया है।
यह मामला नवंबर 2024 में संभल की शाही जामा मस्जिद के अदालत के आदेश पर हुए सर्वे के बाद हुई हिंसा से जुड़ा है, जिसमें चार लोगों की मौत हुई थी। सितंबर 2026 में सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर सवाल उठाया था कि क्या पुलिस हिरासत में कथित तौर पर दिए गए कबूलनामे के आधार पर NSA के तहत निवारक हिरासत का आदेश दिया जा सकता है।
सुप्रीम कोर्ट में पुलिस हिरासत के कबूलनामे पर सवाल
सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की पीठ ने 8 सितंबर 2026 की सुनवाई में पुलिस हिरासत में कबूलनामे की प्रासंगिकता पर सवाल उठाए थे। अदालत ने पूछा था कि क्या ऐसा बयान NSA के तहत निवारक हिरासत के लिए जरूरी ‘सब्जेक्टिव सैटिस्फैक्शन’ का आधार बन सकता है। इसके बाद पीठ ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद अब अफ़रोज़ की NSA के तहत निवारक हिरासत रद्द हो गई है। साथ ही उत्तर प्रदेश सरकार पर 10 लाख रुपये का जुर्माना लगाया गया है।
इलाहाबाद हाईकोर्ट के आदेश को चुनौती
अफ़रोज़ के खिलाफ 13 अक्टूबर 2025 को NSA के तहत हिरासत का आदेश जारी किया गया था। इससे पहले उन्हें संभल हिंसा से जुड़े एक मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट से जमानत मिल चुकी थी। उपलब्ध रिकॉर्ड के मुताबिक, जिला मजिस्ट्रेट ने बाद में निवारक हिरासत का आदेश पारित किया था।
अफ़रोज़ की ओर से सुप्रीम कोर्ट में दलील दी गई कि पुलिस हिरासत में तौर पर दिया गया कबूलनामा कानूनन स्वीकार्य आधार नहीं हो सकता। उनके वकील ने यह भी तर्क दिया कि केवल कई एफआईआर दर्ज होने से किसी व्यक्ति को बिना मुकदमे के निवारक हिरासत में रखने का आधार नहीं बन जाता।
यूपी सरकार ने क्या दलील दी?
उत्तर प्रदेश सरकार ने हिरासत के आदेश का बचाव करते हुए कहा कि अफ़रोज़ की रिहाई से सार्वजनिक व्यवस्था प्रभावित होने और इसी तरह की गतिविधियों की आशंका थी। सरकार की ओर से कहा गया कि उपलब्ध सामग्री के आधार पर जिला मजिस्ट्रेट ने अपनी संतुष्टि के बाद NSA के तहत कार्रवाई की थी।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने जून 2026 में अफ़रोज़ की NSA हिरासत को चुनौती देने वाली याचिका खारिज कर दी थी और माना था कि हिरासत के आदेश के समर्थन में संबंधित सामग्री मौजूद थी। हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान पुलिस कस्टडी में दिए बयानों की कानूनी वैधता पर गंभीर सवाल उठाए और इसे राज्य सरकार की ‘आत्म-संतुष्टि’ का कमजोर आधार माना।
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