क्या हमारी राजनीति और उसके शिल्पकार, सत्तासीन दल इसके लिए एक प्रतिबद्धता के साथ”पुनरकल्पना “को तैयार हैं? गालीब खां।

पटना-: (मिल्लत टाइम्स टाइम्स)बस यूंही, चलते_चलते भारतीय लोकतंत्र का बंगाल, असम, केरल, तमिलनाडू, पुडुचेरी के विधान सभाओं का चुनावी नतीजा आ गया।
इन बातों का इजहारे ख्याल महान शिक्षावादी गालीब खां ने कही।
उन्होंने कहा कि अगर ठंडे दिमाग़ से इस mandate को देखा जाय तो74 साल के इस युवा लोकतंत्र को सोचने_समझने साथ ही उसपे आगे बढ़ने का काफी सीख देता है, क्या हमारी राजनीति और उसके शिल्पकार, सत्तासीन दल इसके लिए एक प्रतिबद्धता के साथ “सोचने, पुनरकलपना”को तैयार हैं? भोले_भाले नागरिकों की जान जोखिम में डाल कर इस”कथित सफलता से हमारे राज नेता विशेषकर केंद्र में सत्तासीन दल, हमारे”प्रधान सेवक और उनकी “चौकड़ी”कुछ सीख ले पाएगी? इस युवा लोक तंत्र को एक “समावेशी चश्मे”से देखने कि कोशिश करेगी? क्या हमारा ज़मीर फरोश”चौथा खंभा (मीडिया) भी अपना एक जन पक्षीय नरेटिव बना पाएगा? क्या मध्यम और उच्च मध्यम वर्ग, कुलीन वर्ग इस mandate से अब भी कुछ सीख पाएगा, यह तो आने वाला समय बताएगा? हम भी देखेंगे? इन पांच राज्यों के चुनाव परिणाम चिख़_चिख कर कह रहें है”बहुत हो गईं नफरत की राजनीति, बहुत हो गई सत्ता का दुरुपयोग, बहुत हो गया राम_और रहीम “अब इन्हें बन्द करो, इन्हे अरब सागर और बंगाल की खाड़ी में दफ़न कर दो? अब आओ नए खाब को पालें, अपनी democracy को reumagine करें जो समावेशी हो, जो कल्याणकारी ही (जिसे हम करीब_करीब भूलते जा रहें है) जो जन पक्षीय हो, जिसमें रोटी दवाई, कपड़ा, मकान की गारंटी ही यानी हम अपने युवा लोक तंत्र को एक मानवीय चेहरा दें जो पिछले पांच_सत सालों में दाग़दार हो गया है या यों कनहें कि दाग़दार बना (सचेतन रूप में) दिया गया है? यह समय है हम अपने डेमोक्रेटिक सिस्टम उसके संस्थानों को नए सिरे से re imagine करें, उसका एक ठोस रोड मैप बनाएं साथ ही व्यक्तिगत सामूहिक अकाउंटेबिलिटी निर्धारित हो। यह अकाउंटेबिलिटी तब ही नसुनिचित होगा जब देश का प्रधान सेवक ख़ुद अपनी अकाउंटेबिलिटी की गारंटी करे। सरकारें आयेंगी, सरकारें जाएंगी मगर इस covid में जीन जनों ने अपनी सांस खो दी, उनके परिवार को एक मस्का, सपना और रोटी कपड़ा मकान दवाई तो