सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को 2020 दिल्ली दंगा मामले के पिछले छह सालों से जेल में बंद उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत न दिए जाने पर असहमति जताई हैं। अदालत ने कहा कि भारतीय कानून में मूल सिद्धांत यही है कि जमानत नियम है और जेल अपवाद।
दूसरे मामले की सुनवाई में की टिप्पणी
जस्टिस जस्टिस बी वी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की पीठ जम्मू-कश्मीर के नार्को-टेरर मामले के आरोपी सैयद इफ्तेखार अंद्राबी की जमानत याचिका पर सुनवाई कर रही थी। अदालत ने उन्हें जमानत देते हुए कहा कि लंबी अवधि तक बिना मुकदमा पूरा हुए जेल में रखना संविधान के अनुच्छेद 21 के खिलाफ है।
उमर खालिद और शरजील इमाम का जिक्र
फैसले में पीठ ने कहा कि 2021 के के. ए. नजीब मामले में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया था कि कठोर कानूनों, जैसे UAPA, के तहत भी यदि मुकदमे में अत्यधिक देरी हो रही हो तो आरोपी को जमानत दी जा सकती है।
अदालत ने संकेत दिया कि यही सिद्धांत उमर खालिद और शरजील इमाम के मामलों में भी लागू हो सकता था, लेकिन जनवरी 2026 में दूसरी पीठ ने उनकी जमानत याचिकाएं खारिज कर दी थीं।
जस्टिस उज्ज्वल भुइयां ने कहा कि कम सदस्यीय पीठ बड़ी पीठ द्वारा तय कानूनी सिद्धांतों से बंधी होती है। यदि किसी फैसले पर संदेह हो, तो मामले को बड़ी पीठ के पास भेजा जाना चाहिए।
क्या कहा कोर्ट ने?
अदालत ने कहा:
“जमानत नियम है और जेल अपवाद। यह संविधान के अनुच्छेद 21और 22से निकला मूल सिद्धांत है”
दिल्ली दंगा मामले में स्थिति
जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने गुलफिशा फातिमा सहित कई आरोपियों को सशर्त जमानत दी थी, लेकिन उमर खालिद और शरजील इमाम की याचिकाएं खारिज कर दी थीं। दोनों सितंबर 2020 से जेल में बंद हैं।
सुप्रीम कोर्ट की ताजा टिप्पणियों के बाद उमर खालिद और शरजील इमाम की ओर से दोबारा जमानत याचिका दायर किए जाने की संभावना बढ़ गई है। अदालत की इस टिप्पणी को उनके मामलों में महत्वपूर्ण कानूनी आधार माना जा रहा है।
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