नई दिल्ली, साल 2009 में केरल के 5 मुसलमानों को NIA ने आतंकवाद के आरोप में गिरफ्तार करके जेल भेज दिया था। 13 सालों बाद एनआईए की स्पेशल अदालत ने कहा है कि इनके खिलाफ एक भी इल्जाम साबित नहीं हो सका है, केवल अदालत का वक्त बर्बाद किया गया है।
दऱअसल NIA की कोच्चि विशेष अदालत ने बेंगलुरू विस्फोट मामले के दो आरोपियों थदियांतावीदे नज़ीर और शराफुद्दीन सहित पांच मुस्लिम लोगों को बरी कर दिया। उनपर सभी इल्जाम गलत बताए गए।
दऱअसल साल 2009 में केरल के कन्नूर से तीन मुसलमानों को गिरफ्तार किया गया था और दो को बेंगलुरू बम धमाके मामले मे गिरफ्तार किया। इन सभी पर आरोप थे कि इन्होंने विस्फोटक पदार्थों को अवैध तरीके से अपने घर रखा और दहशतगर्दी साजिश रची।
NIA ने इन सबके घर पर रेड मारी और सभी को गिरफ्तार किया। NIA को गिरफ्तारी के दौरान किसी के पास से कुछ नहीं मिला था। लेकिन NIA ने सबूत के तौर पर कहा है की उन्होंने विस्फोटक पदार्थों को कही छुपाकर रखा है, इसी बुनियाद पर हमने इन्हें गिरफ्तार किया।
NIA ने पांच लोगों को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया। जब मामला कोर्ट पहुंचा तो पुरे केस में खुलासा हुआ की सभी पर आरोप गलत लगाए गए और कोर्ट ने 13 साल बाद बरी कर दिया।
कोर्ट ने कहा है की किसी को शक के आधार पर गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। पुलिस को इन पर शक था कि इनके पास विस्फोटक सामान है, इसी कारण इन्हें गिरफ्तार किया था। लेकिन जब कोर्ट में केस चला तब साबित हुआ की उनपर लगे आरोप गलत थे।
द हिंदू की रिपोर्ट के मुताबिक कोर्ट ने कहा है की इस तरह किसी को फंसाया नहीं जा सकता। अगर किसी की गिरफ्तारी होती है तो, इल्जाम लगाया जाता है तो उसे साबित करना भी जरूरी है। उसके जुर्म को साबित करने के लिए दलीलें भी होनी चाहिए।
कोर्ट ने कहा की इसी तरह के केस जिनमें सच्चाई नहीं होती, दलीलें नहीं होती ऐसे केस कोर्ट का वक्त खराब करते है। जरूरी केसों पर तवज्जो नही दिया जाता है, ऐसे मामलों में वक्त चला जाता है, एक शक के कारण ऐसे में किसी के 13 साल बर्बाद हो जाते, NIA को आगे से इन बातों का ध्यान रखना चाहिए।
पांचों पर NIA एक भी आरोप साबित नहीं कर सकी। कोर्ट ने कहा की आरोपी आरोपमुक्त करने के हकदार थे क्योंकि यह दिखाने के लिए कोई सबूत नहीं था कि किसी भी आरोपी व्यक्ति का कभी भी सामग्री के कब्जे से कोई संबंध था।
बता दें पांचों का प्रतिनिधित्व अदालत में वकीलों ने किया था, लेकिन उन्होंने आरोप तय करने पर बहस नहीं की। कोर्ट ने खुद ही अभिलेखों का निरीक्षण किया और डिस्चार्ज करने का आदेश दिया।
विस्फोटक सामग्री पुलिस टीम को मिली, जिसने 2009 में तलाशी ली थी। विस्फोटक पदार्थ अधिनियम की धारा 4 के तहत अपराध को साबित करने के लिए अदालत ने कहा कि, इस बात का सबूत होना चाहिए कि आरोपी के पास कोई विस्फोटक था या उसके नियंत्रण में था, जीवन को खतरे में डालने या संपत्ति को गंभीर चोट पहुंचाने के इरादा या किसी अन्य व्यक्ति को जीवन को खतरे में डालने या भारत में संपत्ति को गंभीर चोट पहुंचाने के लिए सक्षम करने के इरादे से थे। लेकिन NIA एक भी दावा साबित नहीं कर सकी और 13 साल बाद पांचो को बरी कर दिया गया।
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