नई दिल्ली, (आसिफ इक़बाल) अली असगर अररिया ज़िला से तालुक़ रखते हैं, वह मदरसा अरबिया क़ासिम उल-उलूम, शिवहर, बिहार में हिफ्ज़ की पढाई करते हैं, ये उनका पहला स्वतंत्रा दिवस था। असगर के लिए इस समारोह में शामिल होना किसी उत्सव से कम नहीं था। ये मदरसा शिवहर से दक्षिण में आठ किलोमीटर पर हैं।
1921 में स्थापित ये मदरसा शिवहर के सबसे पुराने मदरसों मे से एक है। इस मदरसे इसके उस्ताद और तालिब ए इल्म का जंग ए आज़ादी में अहम रोल रहा, लोगों को स्वतंत्रा आंदोलन के लिए लामबंद करने में अहम भूमिका निभाई।

इस मदरसे के छात्रों ने नात, नज़्म, गीत के माध्यम से देश प्रेम को दर्शाया। एक छोटे से ड्रामे के माध्यम से वतन से मोहब्बत को जगाने की कोशिश की गई। इसी गाँव के निवासी मोहम्मद कुत्बुद्दीब साहब कहते हैं कि “मैं कई सालों से इस मदरसे के प्रोग्राम मे शामिल होता रहा हूँ, पर इस बार का प्रोग्राम हर साल से बेहतर रहा।”
मदरसे के नाज़िम (प्रिंसिपल साहब) मौलाना मोहम्मद अहमद आलम क़ासमी साहब कहते है “कि क्रोना महामारी के बाद होने वाले इस प्रोग्राम का बच्चों में बेसब्री से इंतेज़ार था, इसी वजह से बहुत मेहनत के साथ बच्चों ने तैयारी की”। जिसकी तारीफ वहाँ उपस्थित ग्रामीणों ने की।
हर घर तिरंगा उत्सव को भी इस मदरसे ने बखूबी अंदाज़ में मनाया, इस मदरसे के शिक्षक मास्टर इश्तेयाक साहब ने इस उतस्व के महत्व को बच्चों को बताया जिसका परिणाम ये हुआ कि सभी बच्चों ने अपने घरों पर भी तिरंगा लगाया।
इस पूरे प्रोग्राम को अंजाम तक पहुंचाने में नायाब नाज़िम जनाब अकरम साहब का अहम योगदान रहा। इस मौक़े पे मदरसा के उस्ताद वकील साहब, महफूज़ साहब, सनाउल्लाह साहब, रागिब साहब और बड़ी संख्या में अवाम की मौजूदगी रही
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