स्वतंत्रता आंदोलन में मुसलमानों का योगदान…

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15 August 2021 (Publish: 06:05 AM IST)

मासूमा सिद्दिक़ी…

आज भारत को आजाद हुए 75 साल पूरे हो रहे हैं। जसका जशन पूरा हिंदुस्तान मना रहा है। अंग्रेजों की 200 साल गुलामी के बाद 1947 में 15 अगस्त के दिन भारत को आजादी मिली। लेकिन क्या सच में हम आज़ाद हो पाए हैं। भारत को आजादी प्राप्त करने में हमारे देश के महान नेता महात्मा गाँधी की अगुवाई में इस आजादी की लड़ाई को लड़ा गया ये बात सभी लोग जानते हैं, लेकिन क्या कभी कोई सोचता है कि वर्ष 1947 में भारत कैसे आज़ाद हो गया? क्या इस लड़ाई को गांधी जी अकेले लड़ रहे थे? 15 अगस्त, 1947 को जो हमें आजादी मिली, वह आसानी से नहीं मिल गई। इसके लिए हमें बड़ी कुर्बानियां देनी पड़ी है और लंबा संघर्ष करना पड़ा है। महात्मा गांधी, भगत सिंह, नेताजी सुभाष चंद्र बोस, सरदार वल्लभभाई पटेल, डॉ.राजेंद्र प्रसाद, मौलाना अबुल कलाम आजाद, सुखदेव, गोपाल कृष्ण गोखले, लाला लाजपत राय, लोकमान्य बालगंगाधर तिलक, चंद्र शेखर आजाद के साथ ही नवाब सिराजुद्दौला, अशफाक उल्लाह खान, खान अब्दुल गफ्फार खान, शेरे-मैसूर टीपू सुल्तान, शहजादा फिरोज शाह, बेगम हजरत महल, मौलाना अहमदुल्लाह शाह और मौलाना जफर अली खान जैसे कई मुसलमानों ने भी स्वतंत्रता आंदोलन में अपनी अहम भूमिका निभाई।

मौलाना हुसैन अहमद मदनी’ ने अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ फतवा दिया कि अंग्रेजों की फौज में भर्ती होना हराम है। अंग्रेजी हुकूमत ने मौलाना के खिलाफ मुकदमा दायर कर दिया। सुनवाई में अंग्रेज़ जज ने पूछा, “क्या आपने फतवा दिया है कि अंग्रेज़ी फौज में भर्ती होना हराम है?”मौलाना ने जवाब दिया, ‘हां फतवा दिया है और सुनो, यही फतवा इस अदालत में अभी दे रहा हूं और याद रखो आगे भी ज़िन्दगी भर यही फतवा देता रहूंगा।’ इस पर जज ने कहा, “मौलाना इसका अंजाम जानते हो? सख्त सज़ा होगी।”जज की बातों का जवाब देते हुए मौलाना कहते हैं कि फतवा देना मेरा काम है और सज़ा देना तेरा काम, तू सज़ा दे। मौलाना की बातें सुनकर जज क्रोधिए हुए और कहा कि इसकी सज़ा फांसी है। इस पर मौलाना मुस्कुराते हुए अपनी झोली से एक कपड़ा निकाल कर मेज पर रखते हैं।
अब जज पूछते हैं, “यह क्या है मौलाना?” मौलाना उनका जवाब देते हुए कहते हैं कि यह कफन का कपड़ा है। मैं देवबंद से कफन साथ में लेकर आया था। अब जज कहते हैं, “कफन का कपड़ा तो यहां भी मिल जाता।”
इस पर मौलाना जवाब देते हैं कि जिस अंग्रेज़ की सारी उम्र मुखालफत की उसका कफन पहनकर कब्र में जाना मेरे ज़मीर को गंवारा नहीं। गौरतलब है कि फतवे और इस घटना के असर में हज़ारों लोग फौज़ की नौकरी छोड़कर जंग-ए-आज़ादी में शामिल हो गए।
1772 मे शाह अब्दुल अजीज ने अंग्रेजों के खिलाफ जेहाद का फतवा दे दिया। (हमारे देश का इतिहास 1857 की मंगल पांडे की क्रांति को आज़ादी की पहली क्रांति माना जाता हैं) जबकि सचाई यह है कि शाह अब्दुल अजीज ने 85 साल पहले हिन्दुस्तानियों के दिलों मे आजादी की क्रांति की लौ जला दिया था। इस जेहाद के जरिए उन्होंने कहा कि अंग्रेजों को देश से निकालो और आजादी हासिल करो। यह फतवे का नतीजा था कि मुसलमानों के अंदर एक शऊर पैदा होना शुरू हो गया कि अंग्रेज़ लोग सिर्फ अपनी तिजारत ही नहीं चमकाना चाहते बल्कि अपनी तहज़ीब को भी यहां पर ठूसना चाहते हैं।
हैदर अली और बाद में उनके बेटे टीपू सुल्तान ने ‘ब्रिटिश इस्ट इंडिया कंपनी’ के प्रारम्भिक खतरे को समझा और उसका विरोध किया। टीपू सुल्तान भारत के इतिहास में एक ऐसे योद्धा भी थे जिनकी दिमागी सूझबूझ और बहादुरी ने कई बार अंग्रेजों को घुटने टेकने पर मजबूर कर दिया। अपनी वीरता के कारण ही वह ‘शेर-ए-मैसूर’ कहलाए। अंग्रेज़ों से लोहा मनवाने वाले बादशाह टीपू सुल्तान ने ही देश में अंग्रेज़ों के ज़ुल्म और सितम के खिलाफ बिगुल बजाय था और जान की बाज़ी लगा दी मगर अंग्रेजों से समझौता नहीं किया। टीपू अपनी आखिरी सांस तक अंग्रेज़ों से लड़ते-लड़ते शहीद हो गए। टीपू की बहादुरी को देखते हुए पूर्व राष्ट्रपति डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम ने उन्हें विश्व का सबसे पहला रॉकेट आविष्कारक बताया था।
बहादुर शाह जफर (1775-1862) भारत में मुगल साम्राज्य के आखिरी शहंशाह और उर्दू भाषा के माने हुए शायर थे। उन्होंने 1857 के प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय सिपाहियों का नेतृत्व किया। इस जंग में हार के बाद अंग्रेजों ने उन्हें बर्मा (अब म्यांमार) भेज दिया जहां उनकी मृत्यु हुई। 1857 का भारतीय विद्रोह, जिसे प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, सिपाही विद्रोह और भारतीय विद्रोह के नाम से भी जाना जाता है, वह ब्रितानी शासन के विरुद्ध एक सशस्त्र विद्रोह था। यह विद्रोह दो वर्षों तक भारत के विभिन्न क्षेत्रों में चला। इस विद्रोह का आरंभ छावनी क्षेत्रों में छोटी झड़पों तथा आगजनी से हुआ था परन्तु जनवरी मास तक इसने एक बड़ा रूप ले लिया। विद्रोह का अंत भारत में ईस्ट इंडिया कंपनी के शासन की समाप्ति के साथ हुआ और पूरे भारत पर ब्रिटिश ताज का प्रत्यक्ष शासन आरंभ हो गया जो अगले 10 वर्षों तक चला।
गदर की बात करें तो इसका मुख्य उद्देश्य भारत में क्रांति लाना था जिसके लिए अंग्रेजी नियंत्रण से भारत को स्वतंत्र करना आवश्यक था। भोपाल के ‘बरकतुल्लाह’ गदर पार्टी के संस्थापकों में से एक थे जिन्होंने ब्रिटिश विरोधी संगठनों से नेटवर्क बनाया था। गदर पार्टी के ‘सैयद शाह रहमत’ ने फ्रांस में एक भूमिगत क्रांतिकारी रूप में काम किया और 1915 में असफल गदर (विद्रोह) में उनकी भूमिका के लिए उन्हें फांसी की सजा दी गई। फैजाबाद (उत्तर प्रदेश) के अली अहमद सिद्दीकी ने जौनपुर के सैयद मुजतबा हुसैन के साथ मलाया और बर्मा में भारतीय विद्रोह की योजना बनाई और 1917 में उन्हें फांसी पर लटका दिया गया।
लाल कुर्ती आंदोलन’ भारत में पश्चिमोत्तर सीमांत प्रांत में खान अब्दुल गफ्फार खान द्वारा भारतीय राष्ट्रीय काँग्रेस के समर्थन में खुदाई खिदमतगार के नाम से चलाया गया जो कि एक ऐतिहासिक आंदोलन था। विद्रोह के आरोप में उनकी पहली गिरफ्तारी 3 वर्ष के लिए हुई थी। उसके बाद उन्हें यातनाएं झेलने की आदत सी पड़ गई। जेल से बाहर आकर उन्होंने पठानों को राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ने के लिए ‘खुदाई खिदमतगार’ नामक संस्था की स्थापना की और अपने आंदोलनों को और भी तेज़ कर दिया।
सर सैय्यद अहमद खां ने ‘अलीगढ़ मुस्लिम आंदोलन’ का नेतृत्व किया। वे अपने सार्वजनिक जीवन के प्रारम्भिक काल में राजभक्त होने के साथ-साथ कट्टर राष्ट्रवादी थे। उन्होंने हमेशा हिन्दू-मुस्लिम एकता के विचारों का समर्थन किया और आज़ादी की लड़ाई में अपना महत्वपूर्ण योगदान दिया। 1884 ई. में पंजाब भ्रमण के अवसर पर हिन्दू-मुस्लिम एकता पर बल देते हुए सर सैय्यद अहमद खां ने कहा था कि हमें (हिन्दू और मुसलमानों को) ‘एक मन एक प्राण’ हो जाना चाहिए और मिल-जुलकर कार्य करना चाहिए। यदि हम संयुक्त हैं, तब एक-दूसरे के लिए बहुत अधिक सहायक हो सकते हैं। यदि नहीं तो एक का दूसरे के विरूद्ध प्रभाव दोनों का ही पूर्णतः पतन और विनाश कर देगा। इसी प्रकार के विचार उन्होंने केन्द्रीय व्यवस्थापिका सभा में भाषण देते समय व्यक्त किए। एक अन्य अवसर पर उन्होंने कहा था कि हिन्दू एवं मुसलमान शब्द केवल धार्मिक विभेद को व्यक्त करते हैं, परन्तु दोनों एक ही राष्ट्र हिन्दुस्तान के निवासी हैं।सर सैय्यद अहमद खां द्वारा संचालित ‘अलीगढ़ आंदोलन’ में उनके अतिरिक्त अन्य प्रमुख नेता भी थे। जैसे- नज़ीर अहमद, चिराग अली, अल्ताफ हुसैन और मौलाना शिबली नोमानी।
यह तो अभी तक कुछ ख़ास लोगों के नाम हमने आपको बातए हैं। ऐसे सैकड़ों मुसलमान थे जिन्होंने भारत की आज़ादी की लड़ाई में अपनी ज़िन्दगी को कुर्बान कर देश को आज़ाद कराया। इतना ही नहीं मुस्लिम महिलाओं में बेगम हज़रत महल, अस्घरी बेगम और बाई अम्मा ने ब्रिटिश के खिलाफ स्वतंत्रता के संघर्ष में योगदान दिया है।
जैसे हजारों स्वतंत्रता सेनानियों ने बलिदान दिया उसी तरह देश के मुसलमान भी दिलो जान से आज़ादी के लिए लड़े। तब जाकर हम आजाद फिजा में सांस लेने के काबिल हो पाए। इन सभी स्वतंत्रता सेनानियों ने बहुत मेहनत की। ब्रिटिश शासन से लड़ने में दिन-रात एक कर दिए। उन्होंने अपने आराम और जीवन के सारे सुख त्याग दिए। इनमें से भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफाकुल्लाह खान जैसे स्वतंत्रता सेनानियों तो अपनी जान तक देश पर कुर्बान कर दी।
तमाम क्रांतियों आंदोलनों के बाद लार्ड मांउंट बेटन ने 15 अगस्त 1947 को भारत को आजाद करने का निर्णय लिया। लेकिन स्वतंत्र होते- होते भारत अंग्रेजों के षड्यंत्र का शिकार हुआ और फूट डालने के नीति से भारत को एक सांप्रदायिक दंगों का शिकार होना पड़ा, जिसमे लाखों भारतीय मारे गए और भारत के दो टुकड़े हो गए एक भारत और दूसरा पकिस्तान | जिन लोगों को पाकिस्तान जाना था वो चले गए,, लेकिन जिन्होंने हिंदुस्तान की सरज़मी से सच्ची मोहब्बत की वो तब से अब तक यहीं मौजूद हैं। देश तो आज़ाद हो गया लेकिन मानसिकता गुलाम ही रही। उस वक़्त भी आरएसएस के लोग अंग्रेजों की गुलामी में रहे और आज भी मुट्ठीभर होकर अंधभक्तों की गुलामी में हैं। बहुत हैरत की बात तो यह है कि भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में इतने मुसलमानों के शहीद होने के बाद भी मुसलमानों के योगदान को नही समझा गया। बस पाकिस्तान के बन जाने से यही सुनने को मिला हमेशा की हिंदुस्तान के मुसलमान भी पाकिस्तान चले जाएं। इस सोच ने इनको इनके अंदर से खोखला कर दिया। ये लोग इंसान रहकर भी इंसानियत भूल गए। आज इक्कसवीं सदी के 75वें स्वतंत्रता दिवस पर भारत की क्या तस्वीर है सोचिये ज़रा.. मुसलमानों को जबरदस्ती जय श्री राम बुलवाया जा रहा, खुले आम दिल्ली की सड़कों पर उन्हें काटने जान से मारने की बात की जा रही है, मुसलमानों के अलावा दलितों पर अत्याचार, उनकी छोटी बच्चियों से रेप, मार काट सब कुछ खुले आम हो रहा है। वो इसलिए कि जिस मक़सद से भाजपा का गठन किया गया था, उस मक़सद को एक शक़्ल दी जा रही है, उस मक़सद को उसके अंजाम तक पहुंचाया जा रहा है। इतना जल रहे हैं नफ़रत की आग में कि ये तक भूल गए हैं कि-
”भारत छोड़ो” का नारा युसुफ मेहर अली ने दिया था।
”जय हिंद” का नारा आबिद हसन साफरानी ने दिया था।
”इंकलाब जिंदाबाद” का नारा हसरत मोहानी ने दिया था।
अल्लामा इकबाल ने तराना-ए-हिंद ”सारे जहां से अच्छा, हिंदोस्तां हमारा” लिखा था।
”मादरे-वतन भारत की जय” का नारा 1857 में अज़ीम उल्लाह खान ने दिया था।
”सरफरोशी की तमन्ना, अब हमारे दिल में है”, इसे 1921 में बिस्मिल अज़ीमाबादी ने लिखा था।
सुरैया तैयब जी ने तिरंगा को वह रूप दिया, जो हम आज देखते हैं।
कोई कितना भी कोशिश कर ले पर इन ऐतिहासिक तथ्यों को नहीं बदल सकता । मुझे अपने इतिहास पर , अपने देश पर और अपने भारतीय होने पर गर्व है । मुझे अफसोस ये है कि जिन मुसलमानों के बदौलत हमें आज़ादी नसीब हुई। उसी को आज के वक़्त में बीजेपी और आरएसएस जैसे संगठन हर वक़्त टारगेट करते रहते हैं। आख़िर कियूं उन मुसलमानों की कुर्बानी को भुला दिया गया। ये भगवा रंग पहने नफ़रत की आग में जलने वालों से ज़रा कोई पूछे क्या किया है इन्होंने हिंदुस्तान के लिए? ये तो उस वक़्त उस ज़माने में भी अंग्रेज़ों के दोस्त थे और आज भी भारत के दुश्मन बने फ़िर रहे हैं। इन नफ़रत फैलाने वाले लोगों ने बहुसंख्यक हिन्दू वर्ग में यह भ्रम फैला रखा है कि मुसलमानों ने इस देश की आज़ादी के लिए कुछ नहीं किया। ऐसे में उन्हें यह जान लेना चाहिए कि हिन्दुस्तान के लिए मुसलमान कुर्बानियां देतें आएं हैं और इंशाल्लाह आगे भी देते रहेंगे।
एक पत्रकार की हैसियत से लिखते हुए मेरी पूरे हिंदुस्तान से दरख्वास्त है कि अपने वतन अपनी सरज़मी से टूटकर मोहब्बत कीजिये, हमेशा साबित क़दम रहिये, हक़ पे रहिये, सच पे रहिये।

जय हिंद-जय भारत
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