दंगा पर काबू पाने में सरकार नाकाम क्यों ?

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08 March 2020 (Publish: 05:39 PM IST)

नज़रिया:डॉ मोहम्मद मंजूर आलम
हिंदुस्तान में दंगा और मुस्लिम विरोधी हमलों का इतिहास बहुत पुराना है आजादी से लेकर अभी तक मुस्लिम विरोधी दंगों का सिलसिला जारी है अन्य मौके पर विभिन्न शहरों में मुसलमानों का कत्लेआम हुआ है मुसलमानों के घर लूट गए हैं मुसलमानों के घर जलाए गए हैं उनकी दुकान तबाह व बर्बाद की गई है मस्जिद मदरसा और अन्य धार्मिक स्थल पर हमला होता रहा है और हर जगह फसाद में पुलिस का भी रोल होता है पुलिस दंगाइयों पर काबू पाने के बजाय उसका साथ देती है, जमशेदपुर फसाद हो, नीली का कत्लेआम हो ,भागलपुर फसाद हो या फिर 2002 का गुजरात कत्लेआम हर एक फसाद और कत्लेआम में मुसलमानों का जानी माली नुकसान हुआ है यही मामला 2020 के दिल्ली फसाद का है यहां भी मुसलमानों पर एकतरफा हमला हुआ उनकी दुकानों को जलाया गया मकानों को लूटा गया है और फिर आग के हवाले कर दिया गया इस पूरे फसाद में दिल्ली पुलिस ने भी दंगाइयों और फसादियों का साथ दिया

पुलिस की जिम्मेदारी और कर्तव्य अमन व शांति बरकरार रखना लायन एंड ऑर्डर को कंट्रोल करना और देश का अमन व शांति खराब करने वालों को कानून के शिकंजे में करना है लेकिन भारत में लगातार इसके खिलाफ उल्टा हो रहा है संविधान का एहतराम खत्म हो चुका है कानून का डर नहीं रह गया है और जिनकी जिम्मेदारी कानून का पालन करना है वह खुद कानून की धज्जियां उड़ा रहे हैं दिल्ली दंगा ने एक मर्तबा फिर सारे दंगा की इतिहास को ताजा कर दिया है पुलिस और प्रशासन पर सवाल उठना शुरू हो गया है और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि दंगा के मुजरिमों को सजा क्यों नहीं मिलती है ? मजलूमों के साथ इंसाफ क्यों नहीं होता है ? क्या भागलपुर दंगा के मुजरिमों को सजा मिल गई ? क्या मजलूम ओ को इंसाफ मिल गया ? 2002 के गुजरात दंगा में जो लोग शामिल थे उसे सजा मिल गई ? मजदूरों को इंसाफ मिल गया ? जिस पुलिस और प्रशासन ने दंगा को अंजाम दिया था उनके किरदार की जांच हो गए क्या ? मुजफ्फरनगर दंगा के मुजरिमों को सजा मिल गई क्या ? उनके खिलाफ चार्ज शीट दाखिल हो गई ? हर सवाल का जवाब नहीं मैं मिलेगा आखिर क्यों दंगा के मुजरिमों को सजा क्यों नहीं मिल रही है दंगाइयों के खिलाफ हुकूमत एक्शन क्यों नहीं लेती है हमेशा भारत में हिंदू मुस्लिम कराया जाता है क्या हिंदू मुस्लिम दंगा भारत की तरक्की के राह में रुकावट नहीं है क्या इस तरह के दंगा से देश का नुकसान नहीं होता है

उत्तर पूर्वी दिल्ली में जो दंगा और कत्लेआम हुआ है उसके पीछे कई सारे लोगों का का हाथ है लेकिन सबसे महत्वपूर्ण दिलों में कानून का डर ना होना और दंगाइयों को पुलिस का साथ मिलना है इस दंगा के पीछे देश की मीडिया का भी हाथ है जिसने पिछले 5 सालों में सिर्फ नफरत को फैलाने और हिंदू मुस्लिम समाज को बांटने का काम किया है सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि दिल्ली भारत की राजधानी है यहां पार्लियामेंट हाउस है , सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट है राष्ट्रपति भवन है , सभी बड़े संस्थान हैं , फौज की बड़ी तादाद यहां मौजूद होती है , पुलिस की बड़ी टुकड़ी रिजर्व में होती है प्रधानमंत्री और गृहमंत्री समेत सभी महत्वपूर्ण सियासी लीडर और आला अफसर का दिल्ली केंद्र है इसके बावजूद दिल्ली में 3 दिनों तक फसाद होता रहा है इंसानों का कत्लेआम हुआ दुकानों को जलाया गया मकानों को लूटा गया तबाह बर्बाद किया गया और हर तरह से नुकसान पहुंचाया गया 3 दिनों तक यह सब होता रहा लेकिन सरकार और प्रशासन ने इस दंगा पर काबू पाने की कोई कोशिश नहीं की इस दंगा ने हिंदुस्तान की गंगा जमुनी तहजीब को एक बार फिर नुकसान पहुंचाया है हिंदू मुस्लिम एकता को खतरे में डाल दिया है अल्पसंख्यक समुदायों के दिल में बहुसंख्यक समुदायों का खौफ बैठाने की कोशिश हुई है यह मैसेज दिया गया है कि मुसलमान बहुसंख्यक समुदाय के रहमों करम पर है इसे एक दायरे में रहना होगा अगर वह उस दायरे से बाहर निकलने की कोशिश करते हैं सरकार के खिलाफ आवाज उठाते हैं तो उसे इसका अंजाम भुगतना होगा क्या यह लोकतांत्रिक है , क्या यह सेकुलरिज्म है , क्या या डेमोक्रेसी है , क्या अब संख्या को के साथ इंसाफ है , क्या यह अब संसद के हक की पासदारी है

हिंदुस्तान की आजादी में हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई आदिवासी और सभी धर्म के लोग शामिल थे देश का संविधान लोकतांत्रिक और सेक्युलर है इस देश पर सबका बराबर का हक है यहां सदियों से विभिन्न मजहब के मानने वाले आबाद रहे हैं ऐसे में यह कहना कि यह देश सिर्फ हिंदुओं का है मुसलमान और ईसाई दूसरे दर्जे का नागरिक है यह देश के हजारों साल पुरानी इतिहास कल्चर के खिलाफ है यह लोकतंत्र और संविधान के खिलाफ है ऐसी कोशिश देश के लिए मुसीबत और तरक्की की राह में बहुत बड़ी रुकावट है देश के संविधान संवैधानिक संस्थानों न्यालय खासतौर पर न्यालय की जिम्मेदारी है कि वह संविधान की रक्षा करें अपने खुद मुखतारी और आजादी को बरकरार रखते हुए देश के निजाम चलाने में कर्तव्य का वाहन करें इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व जज जगमोहन लाल सिन्हा जैसा किरदार अपनाने की जरूरत है जिन्होंने इंसाफ की तराजू को झुकने नहीं दिया और उस समय के प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला दिया फैसला मामूली नहीं था लेकिन अंझानी जज ने न्यालय का एहतराम बाकी रखा कानून के सामने किसी पद और सरकार को नहीं देखा यह फैसला देश के न्यालय पर लोगों के भरोसे को बढ़ाता है मजलूम और कंधों को हौसला देता है लोग चाहते हैं कि न्यायालय में आज वही हौसला वही इंसाफ और रवायत दोहराई जाए , हाल के दिनों में जस्टिस मुरली धरन ने भी इंसाफ कायम करने की कोशिश की न्यालय का वजूद और एहतराम बरकरार रखते हुए दिल्ली दंगा पर सख्त रुख अपनाया तब सरकार यह बर्दाश्त नहीं कर पाई और रातों-रात उनका ट्रांसफर कर दिया गया आम जबान में इसे कहा जाता है कि न्यायालय व इंसाफ पर काम करने वाले जज को इसकी कीमत चुकानी पड़ी जस्टिस मुरलीधरन ने जो कुछ किया वह काबिल ए मिसाल है अंजाम से घबराए बगैर इंसाफ करना देश और देश की तरक्की के लिए जरूरी है और इसी राह पर सभी जज को चलने की जरूरत है

दंगे फसाद और बसादात से हमेशा गंगा जमुनी तहजीब को नुकसान हुआ है देश की एकता को नुकसान पहुंचा है देश की खुशहाली और समाज की तरक्की का नुकसान हुआ है दिलों में दूरियां पैदा हुई है आम नागरिकों की मौतें हुई हैं उनके दुकान और मकान बर्बाद हुए हैं और उसके बदले में कुछ लोगों ने सियासत चमकाई है कुछ को कुर्सियां मिली है इसलिए लोगों में बेदारी और उन्हें इसके नुकसान का एहसास होना जरूरी है सरकार की जिम्मेदारी है कि वह दंगा को रोके पुलिस अपना काम जिम्मेदारी के साथ अंजाम दे दंगाइयों का साथ देने के बजाय दंगाइयों के खिलाफ एक्शन ले देश में अमन व शांति बनाए क्योंकि देश और देश की तरक्की के लिए कानून की पालन कानून का खौफ और कानून पर अमल करना जरूरी है जब लोगों के दिलों से कानून का खौफ खत्म हो जाता है तो देश में अनार की फैल जाती है और फिर इसकी आग उन लोगों तक पहुंच जाती है जो इसे बढ़ावा देते हैं इसलिए देश की भलाई इसी में है कि हिंदू मुस्लिम के बीच नफरत का सिलसिला बंद किया जाए इस को पनपने से रोका जाए और भाईचारा को फरोग दिया जाए लिखना जरूरी यह है कि जब हमारे पूर्वजों ने भारत के संविधान का निर्माण किया तो इन्होंने विधायिका , प्रशासन और न्यालय सभी को एक दूसरे से अलग रखा हर एक की जिम्मेदारियां अलग-अलग दी गई इसका मकसद यही था कि देश में पारदर्शिता रहेगी करप्शन नहीं होगा एक का दूसरे पर दबाव नहीं रहेगा बल्कि सभी संस्थान पूर्ण आजादी के साथ संविधान के मुताबिक काम करेंगे खासतौर पर न्यायालय को सबसे अलग रखा गया ताकि उसकी वर्चस्व कायम रहे मुकम्मल आजादी और हथियार के साथ न्यालय अपना काम करें वह सरकार के दबाव के सामने झुकने और किसी भी बात से आकर्षित होने के बजाय हक की बुनियाद पर फैसला करें लोग चाहते हैं कि पूर्वजों का यह संविधान और दस्तूर इस तरह के मुताबिक बरकरार रहे न्यालय मुकम्मल तौर पर आजाद रहकर अपना काम करें इंसाफ का तराज़ू कभी भी थोड़ा सा भी ना झुके

(लेखक:ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल के जनरल सेक्रेटरी हैं)

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