धर्म परिवर्तन से डरने वाले संघ परिवार की मुस्लिम विरोधी सरकारों ने “लवजिहाद” के ख़िलाफ़ क़ानून बनाने का बवंडर पूरे ज़ोर-शोर से मचाना शुरू कर दिया है। लेकिन सवाल यह है कि यह लवजिहाद है क्या ? संघ परिवार का प्रोपेगण्डा यह है कि मुस्लिम नौजवान हिन्दू लड़कियों को प्रेम के जाल में फांस कर उनसे शादी करते हैं और शादी से पहले या शादी के बाद लड़की का धर्म परिवर्तित करा देते हैं। प्रेम के नाम पर इस तरह की धोखेबाज़ी अगर कहीं है भी तो इसे जिहाद कैसे कहा जा सकता है और संघ परिवार इसे लव-जिहाद क्यों कहता है ?
दरअस्ल बात यह है कि संघ परिवार जिहाद जैसी पवित्र शब्दावली का ग़लत इस्तेमाल करके इस्लाम और इस्लाम की जिहाद प्रक्रिया को बदनाम करना चाहता है। लेकिन संघ परिवार की सरकारों को इस नाम से कोई क़ानून बनाने के लिए सबसे पहले लव-जिहाद की तार्किक और शाब्दिक परिभाषा करनी होगी। मनमानी परिभाषा करने से काम भी नहीं चलेगा और वह क़ानूनी रूप से मान्य भी नहीं होगी। मुस्लिम संगठन अगर चाहें तो इस नाम पर सरकार के ख़िलाफ़ धर्म के अपमान में मुक़दमा करने का ठोस आधार बनता है।
जिहाद इस्लाम की एक धार्मिक शब्दावली है और इसका अर्थ ऐसे संघर्ष और संग्राम से है जो इंसानों को ख़ुदा से जोड़ने के लिए किया जाता है। लेकिन ख़ुदा से जोड़ने की यह प्रक्रिया न तो बलपूर्वक किसी की मान्यता को बदलने की प्रक्रिया है और न छल व कपट या झूटे प्रेम के जाल में किसी को फांसने का नाम है। क्योंकि इस्लाम में धर्म या आस्था के मामले में किसी पर ज़ोर ज़बरदस्ती करना भी पूरी तरह हराम है और झूट, धोखा या चोरी छिपे प्रेम सम्बंध बनाना भी इस्लाम की शिक्षाओं के विपरीत है। ख़ुदा से जोड़ने की इस प्रक्रिया के तरीक़े और सिद्धांत ख़ुद ख़ुदा ने बताए हैं और ख़ुदा के बताए गए तरीक़ों के मुताबिक़ ही जिहाद किया जा सकता है और किया जाता है। इस जिहादी प्रक्रिया का मूल सिद्धांत यह है कि धर्म के मामले में कोई ज़बरदस्ती नहीं है (क़ुर्आन 2:256), दूसरा मूल सिद्धांत यह है कि ख़ुदा का संदेश पहुंचाने या समझाने वाले की ज़िम्मेदारी दूसरे व्यक्ति के पीछे पड़ कर उसको किसी भी तरह मुसलमान बना लेना नहीं है, बल्कि तर्कपूर्ण तरीक़े से और शालीनता व विनम्रता के साथ उसे ख़ुदा का बन्दा बनने की दावत देना और मरने के बाद के जीवन में ख़ुदा के सामने पेश होने के विश्वास को उसके अन्दर जगाना है (क़ुर्आन 16:125; 88:22;)। इस दावत को मानना या ना मानना और मरने के बाद के अंजाम पर विश्वसास करना या न करना हर व्यक्ति की अपनी मर्ज़ी पर है और इसकी आज़ादी उसे हर हाल में हासिल है। ख़ुदा ने बन्दों को आज़ाद पैदा किया है और वह हर बन्दे के लिए मान्यताओं की आज़ादी को बनाए रखने का हुक्म देता है। इस्लाम की इस जिहाद प्रक्रिया का तीसरा मूल सिद्धांत यह है कि यह संघर्ष केवल अल्लाह के आदेश को पूरा करने के लिए और अल्लाह से इसका बदला पाने की नियत से ही किया जा सकता है, यह किसी के स्वार्थ और निजी हित के लिए किया जाने वाला काम नहीं है (क़ुर्आन 34:47)।
इस्लाम में शादी करने का हुक्म है और अपनी पसन्द की शादी करने की आज़ादी है। शादी के लिए इस्लाम में आदर्श तरीक़ा यह है कि लड़के और लड़की के अभिभावक दोनों की मर्ज़ी और पसन्द को पूरा करने के लिए आपस में बातचीत करके रिशते पर सहमति बनाते हैं और फिर निकाह की बैठक में लड़का और लड़की एक दूसरे के जीवन साथी बनने का हलफ़ लेते हैं। लेकिन इस्लाम में इसकी भी पूरी इजाज़त है कि किसी की मध्यस्थता के बग़ैर लड़का और लड़की आपस में शादी करना तय करें और निकाह की बैठक में निकाह की घोषणा कर दें। इस्लामी शरीअत के अनुसार एक मुसलमान लड़का या लड़की किसी दूसरे मुसलमान से ही शादी कर सकता है इसलिए कोई ग़ैर मुस्लिम लड़का या लड़की अगर किसी मुसलमान लड़की या लड़के से शादी करने पर राज़ी होता या होती है तो इस्लामी शरीअत को मानने वाला मुसलमान लड़का या लड़की और उसके घर वाले उसके सामने यह प्रस्ताव रखते हैं कि अपनी धार्मिक आस्था को ठीक करके अपने पैदा करने वाले ख़ुदा से अपना सम्बंध जोड़े। इस प्रस्ताव को मानना या न मानना दूसरे पक्ष की अपनी मर्ज़ी पर आधारित है। इस तरह की शादी को इस्लाम मान्यता देता है और मुसलमान इसे सहर्ष स्वीकार करते हैं।
लेकिन शादी के लिए इस्लाम क़ुबूल करना एक अलग बात है और इस्लाम क़ुबूल कराने के लिए शादी करना एक अलग बात है। व्यक्ति की आज़ादी के लिहाज़ से इन दोनों तरह की बातों पर इस्लाम में कोई रोक नहीं लगाई गयी है लेकिन इस्लाम के प्रसार के लिए ऐसी कोई योजना बनाने की शिक्षा भी इस्लाम में नहीं दी गयी है। अलबत्ता इस्लामी शरीअत में शादी के बग़ैर प्रेम सम्बंध बनाना ग़ैर क़ानूनी है इसलिए किसी भी प्रेमी युगल के लिए ज़रूरी है वह निकाह करके परिवारिक बंधन बनाए और इसे निभाए।
प्रेम, धर्म परिवर्तन और निकाह का यह मुद्दा आज के ज़माने में इसलिए सामने आ रहा है कि आज की सेकुलर संस्कृति में, स्कूल व कालेज और दफ़्तरों में मुसलमान लड़के भी ग़ैर मुस्लिम लड़कियों के साथ मिलते जुलते हैं और कुछ मुस्लिम लड़कियां भी ग़ैर मुस्लिम लड़कों के सम्पर्क में आती हैं। इस्लाम में इस तरह के खुले मेलजोल को पसन्द नहीं किया गया है क्योंकि इससे अमर्यादित सम्बंध पनपते हैं जबकि इस्लाम मर्यादा और आत्मा की पाकी का धर्म है। मगर इस सेकुलर संस्कृति में काम करने वाले जो मुसलमान लड़के व लड़कियां गुनाह से पाक जीवन बिताने की पक्की भावना रखते हैं उनके लिए जायज़ रास्ता यही है कि वह प्रेम की भावना को शादी के रिश्ते में बदलें। प्रेम मन की भावना है और शादी व धर्म परिवर्तन लड़के या लड़की का व्यक्तिगत अधिकार है इसलिए इसके खिलाफ़ क़ानून बनाना ख़ुद एक ग़ैर क़ानूनी काम है और संविधान के ख़िलाफ़ है।
धर्म परिवर्तन से डरने वाले संघ परिवार की मुस्लिम विरोधी सरकारें ऐसे असंवैधानिक क़ानून बनाने के प्रयास लम्बे समय से करती आ रही हैं लेकिन हर बार मुंह की खाती हैं। जब तक मौजूदा संविधान बाक़ी है और अदालत का अदालती चरित्र बचा हुआ है तब तक इनकी मंशा पूरी होना मुश्किल है। अभी कल ही इलाहाबाद हाई कोर्ट ने ऐसे एक मामले को ख़ारिज करते हुए कहा है कि भारत का संविधान सभी को अपनी पसन्द के व्यक्ति के साथ जीवन बिताने का अधिकार देता है और निजी सम्बंधों में हस्तक्षेप करना दो बालिग़ लोगों की पसन्द की आज़ादी के मौलिक अधिकार का उल्लंघन होगा। और कल ही उत्तरप्रदेश सरकार की एक स्पेशल इन्वेस्टीगेशन टीम ने कानपुर में धर्म बदल कर विवाह करने के 19 मामलों की जांच रिपोर्ट जारी की है जिसमें साफ़ कहा है कि बलपूर्वक धर्म परिवर्तन और विदेशी फण्डिंग का या इस तरह के मामलों में किसी संगठित योजना का कोई सुबूत नहीं मिला है।
अदील अख़तर
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