मानव गरिमा

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27 May 2021 (Publish: 01:44 PM IST)

मानव गरिमा
आज इस कलयुग में हर जगह घृणा की अग्नि प्रज्ज्वलित है चाहे वह सामाजिक हो राष्ट्रीय हो या अंतरराष्ट्रीय हो,
हम एक-दूसरे से ईर्ष्या करते हैं और मानवाधिकारों का उल्लंघन करने के लिए तत्पर हो गये हैं, जबकि जीवन में मनुष्य का उद्देश्य मानव प्रेम और अंतरंगता का सिद्धांत है और कुछ भी नहीं क्योंकि ईश्वर ने हम मनुष्यों को महान प्रेम के साथ सर्वश्रेष्ठ संरचना में बनाया और बहुत कुछ प्रदान किया है, क्यूंकि क़ुरआन सारे जगत का पथ प्रदर्शक है, तो उसमें ईश्वर कहता है कि:
(“निश्चित रूप से हमने मनुष्य को सर्वश्रेष्ठ (संयम और संतुलन)सरंचना में बनाया है।”)
(सूरह तीन आयत-4)
व्याख्या-
क्योंकि मनुष्य का सार प्रेम है और मनुष्य की उत्पत्ति प्रेम है। ईश्वर ने मनुष्य को प्रेम की दृष्टि से देखा है और हमें प्रेम के एक आदर्श व सर्वश्रेष्ठ संरचना में ढाला है। इसलिए प्रेम ही मनुष्य का वास्तविक आधार है ,हमें चाहिए कि एक दूसरे के साथ आपसी सद्भाव और प्रेम रखना चाहिए और प्रेम को अपना घर बनाना सदियों से मनुष्य का ही तरीका रहा है और हम सभी को ईश्वर के लिए एक दूसरे से प्रेम करना चाहिए, जैसा कि पवित्र हदीस में है –
पवित्र पैगंबर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि व आलिही वसल्लम) ने कहा:
“अल्लाह कहता है:
जो लोग मेरी गरिमा व महिमा की वजह से एक दूसरे से प्रेम करते हैं, तो पुनरुत्थान के दिन उनके लिए एक प्रकाश के आसन होगें जिसको देख कर सारे पैगंबर(शांति उन पर हो) और शहीद आश्चर्य करेंगे।”
– {तिरमिज़ी, #2390}
वास्तव में मनुष्य वह है जो ईश्वर के लिए समाजी, राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय एकता बनाये रखे और एक दूसरे के साथ प्रेम और आपसी सद्भाव रखे और अपने हृदय में किसी के लिए घृणा न रखे है और मानव अधिकारों का उल्लंघन न करे और बिना किसी कारण के रक्तपात से बचे।
ऐसे ही मनुष्यों पर ईश्वर की विशेष कृपा होगी कि उनको प्रलय के दिन जब सब चितां में होंगे तो उनको प्रकाश के आसन दिए जाएंगे और उस समय ऐसे लोगों पर हर किसी को आश्चर्य होगा,
क्योंकि मनुष्य की उत्पत्ति प्रेम के कारण है, इसलिए मनुष्य का उद्देश्य एक दूसरे से प्रेम करते हुए अपने जीवन में अग्रसर होने के सिवा और कुछ नहीं होना चाहिए ।
यही प्रेम की शिक्षा हमें अपने पूर्वजों से मिली है और हमारे धार्मिक पूर्वजों ने हमें आपसी प्रेम, सौहार्द व समझौते की ओर आकर्षित किया है और प्रेम की शिक्षा को बढ़ावा देने में एक महान भूमिका निभाई है।
उन्हीं सूफि संत में से एक प्रसिद्ध सूफी संत हजरत हाजी हाफिज कारी सैयद वारिस अ़ली शाह साहिब(ईश्वर उनकी पवित्र आत्मा को और पवित्र करे)(देवी शरीफ) ने कहा:
1- “संसार का प्रेम मनुष्य को पशु बना देता है, और परमेश्वर का प्रेम मनुष्य को दूत जैसा बना देता है।”
2- “स्वर्गदूतों को आंशिक प्रेम मिला और मनुष्य को पूर्ण प्रेम दिया गया”
3- “मनुष्य प्रेम के कारण प्राणियों में श्रेष्ठतम बना”
परिणाम-
यह संसार का प्रेम(स्त्री, भूमि, धन) जिसके कारण मनुष्य स्पष्ट रूप से पशु की भाँति बन गया है और मानवाधिकारों का उल्लंघन करने लगा है लेकिन जब हमें ईश्वरीय सहायता व कृपा मिलती है और तब हम एक दयालु ईश्वरीय व्यक्ति की शरण लेते हैं जो हमें वास्तविक्ता का ज्ञान देते है तो हम पाते हैं कि हम मनुष्य ईश्वर के प्रेम की एक निशानी और उसकी सर्वश्रेष्ठ रचना हैं, क्योंकि प्रेम के कारण ही ईश्वर ने मनुष्य को श्रेष्ठ आकार दिया है, और इस प्रेम के कारण मनुष्य भी दूत के भाँति बन जाता है, इसलिए हम मनुष्यों को अपनी वास्तविक्ता पर दृष्टि रखनी चाहिए, अर्थात प्रेम के साथ एक दूसरे से सौहार्द व सद्भाव रखना चाहिए।
मनुष्य का कल्याण इसी मे है कि-मानव जाति ईश्वर के लिए समाजी, राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय प्रेम, सौहार्द व एकता बनाए रखे और ईश्वर को धन्यवाद देता रहें कि उसने हमें प्राणियों में सबसे श्रेष्ठ बनाया है।

लेख-
– इंजीनियर जाबिर खान वारसी-(लखनऊ)

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