नई दिल्ली, (रुखसार अहमद) देश की आज़ादी के प्रथम संग्राम में अपनी शहादत देने वाले पत्रकार मौलवी मोहम्मद बाक़र का जन्म 1790 में दिल्ली में हुआ था। उन्होंने अपनी पढ़ाई दिल्ली कॉलेज से की थी। अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद दिल्ली कॉलेज में अध्यापन और राजस्व विभाग में तहसीलदार के रूप में भी कई नौकरियां कीं, लेकिन उन्होंने जिसको अपना लक्ष्य बनाया वह था पत्रकारिता और देश सेवा।
1836 में जब अंग्रेज़ों की सरकार ने प्रेस अधिनियम में संशोधन के बाद समाचार पत्रों के प्रकाशन की अनुमति दी तो उन्होंने पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रवेश करके लोगों को जागरूक करने का काम किया। 1837 में उन्होंने साप्ताहिक देहली उर्दू अखबार के नाम से अपना समाचार पत्र निकालना शुरू कर दिया। यह देश का दूसरा उर्दू अख़बार था। इससे पहले उर्दू भाषा में ‘जामे जहांनुमा’ अख़बार कलकत्ता से निकलता था। यह अखबार 21 सालों तक चला जो उर्दू पत्रकारिकता के क्षेत्र में मील का पत्थर सबित हुआ।
इस अखबार की मदद से बाक़र साहब ने अपने सामाजिक मुद्दों के साथ-साथ जनता में राजनीतिक जागरूकता लाना और विदेशी शासकों के खिलाफ एकजुट करने का काम किया। उनके अख़बार की कीमत सिर्फ 2 रुपये थी। बाक़र साहब ने अपने अखबार का दिल्ली में ना सिर्फ बल्कि दिल्ली के आसपास के इलाकों में अंग्रेजी साम्राज्यवाद का विरोध करते हुए जनमत तैयार करने में अपने अखबार का भरपूर उपयोग किया। बाक़र साहब ने 1857 में क्रांतिकारियों द्वारा फिरंगियों के खिलाफ बगावत का बिगुल फूंक दिया और मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर को सभी क्रान्तिकारी बन्धुओं द्वारा अपना नेता चुन लिया गया।
इस खुशी में बाक़र साहब ने अपना समर्थन जताने के लिए अपने अखबार का नाम बदलकर “देहली उर्दू अखबार” से अखबार उज़ ज़फर रख दिया था। 4 जून 1857 को हिंदू मुस्लिम एकता के कट्टर समर्थक मौलवी बाक़र दोनों समुदायों से अपील करते हुए अपने अखबार में लेख छापते हुए लिखते हैं – यह मौका मत गंवाओ, अगर चूक गए तो फिर कोई मदद करने नहीं आएगा। यह अच्छा मौका हैं, तुम फिरंगियों से निजात पा सकते हो।
जब यह विद्रोह असफल हो गया तो क्रांति के महानायक मुगल सम्राट बहादुर शाह ज़फर को गिरफ्तार कर लिया गया। दिल्ली पर अंग्रेजी हुकूमत का कब्ज़ा हो गया। इसके बाद अंग्रेज़ एक-एक भारतीय सिपाहियो को ढूंढकर काला पानी, फांसी और तोपों से उड़ाने की सज़ा देने लगे। इसी के साथ 14 सितंबर 1857 को मौलवी बाक़र साहब को भी गिरफ्तार कर लिया गया। मौलवी बाक़र साहब को गिरफ्तार करने के बाद कैप्टन हडसन के सामने पेश किया गया। उसने उन्हें मौत की सज़ा का फैसला सुनाया। इसके तहत 16 सितंबर 1857 को दिल्ली गेट के सामने पत्रकार मौलवी मोहम्मद बाक़र को तोप से उड़ा दिया गया।
उनकी याद में इस साल प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने उनकी जंयती पर एक कॉन्फ्रेंस का आयोजन किया गया। इस प्रोग्राम में कई वरिष्ठ पत्रकार शामिल हुए। इस मौके पर वरिष्ठ पत्रकार मासूम मुरादाबादी कि पुस्तक 1857 की क्रांति और उर्दू सहाफत का विमोचन भी हुआ जो मौलवी बाक़िर के कारनामों पर लिखी गई है। इस मौके पर प्रेस क्लब कि ओर से दो नौजवान पत्रकार (मिल्लत टाइम्स के एडिटर इन चीफ शम्स तबरेज़ क़ासमी और टाइम्स ऑफ इंडिया की पत्रकार स्वाति माथुर) को अमर शहीद मौलवी बाक़र पुरस्कार से सम्मानित किया गया। शम्स तबरेज़ क़ासमी को सच्ची पत्रकरिकता करने पर सम्मानित किया गया।
शम्स तबरेज़ क़ासमी ने बताया कि उन्होंने शाहीन बाग प्रोटेस्ट, दिल्ली दंगा, किसान आंदोलन को लेकर लोगों तक सच्ची खबरे पहुंचाई है। उनके इस काम को देखते हुए प्रेस क्लब ऑफ इंडिया ने मौलवी बाक़र पुरस्कार से सम्मानित किया। मिल्लत टाइम्स हर उस खबर को कवर करता है जिसे मेन स्ट्रीम मीडिया नहीं दिखाता। मिल्लत टाइम्स के चीफ एडिटर ने अपनी फाजिल की पढ़ाई देवबंद से और ग्रेजुएशन जमिया से की है। उन्होंने कहा जिस तरह मौलवी बाक़र साहब ने कभी हार नहीं मानी उसी तरह में भी कभी हार नहीं मानूंगा। मिल्लत टाइम्स भी सच के साथ खड़ा था और रहेगा।
मिल्लत टाइम्स शुरू से ही गरीबों, कमजोरों, अल्पसंख्यकों और उत्पीड़ितों के मुद्दों को उठाता रहा है। जिन्हें मुख्यधारा की मीडिया नजरअंदाज करती है। उन्होंने यह भी कहा कि इस अवॉर्ड का श्रेय हमारी पूरी टीम को जाता है। इस मौके पर शम्स तबरेज कासमी ने प्रेस क्लब ऑफ इंडिया, प्रबंध समिति के सदस्य ए.यू. आसिफ और प्रसिद्ध पत्रकार मारूफ रजा को का भी शुक्रिया अदा किया।
टाइम्स ऑफ इंडिया की पत्रकार स्वाति माथुर ने कहा, मौलवी बाक़र पुरस्कार के तहत पहली बार चयनित होना मेरे लिए सम्मान की बात है। उन्होंने कहा कि उनके जीवन की सबसे महत्वपूर्ण रिपोर्ट मुंबई के ताज होटल पर हुए हमले के दौरान बनी रिपोर्ट थी। जिस के आधार पर आज उन्हें इस पुरस्कार से सम्मनित किया गया है।
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