मेरे भाई अनाज के एक एक दाने को महत्वपूर्ण समझो उस की क़द्र करो. शायद हमें न पता हो मगर दुनिया में ऐसे लोग भी हैं जो अनाज के एक एक दाने के लिए तरस रहे हैं और मर रहे हैं .
आइये आप को मिलाता हूँ उन रोहंगियांस से जो भूक से तड़प तड़प के मर गए. यह बात तो सभी दर्शाने का असफल प्रयत्न करते हैं की म्यांमार में मुस्लिम समुदाय पूरे सुख चैन और शांति से रह रहे हैं उन्हें किसी प्रकार की कोई समस्या नहीं वहाँ अवस्था पूरी तरह से सामान्य है. लेकिन क्या आप को मालूम है की यह एक बहुत बड़ा झूठ है.
बीबीसी हिंदी की रिपोर्ट के अनुसार अभी कुछ दिनों ही की बात है कि रोहंगियन का एक दल अपने बेहतर कल, अच्छे जीवन और सुखी समाज की खोज में लगभग चालीस लोगों के साथ समंदर के रस्ते से म्यांमार प्रान्त से बांग्लादेश निकल पड़े जिन में कुछ पुरुष महिलाएं तथा बच्चे भी थे. पलायन करने वालों ने अपनी जीवन की सम्पत्तियाँ बेच कर और अपने परिचित लोगों से धन उधार ले कर अपने रास्ते का बंदोबस्त किया. रास्ता बहुत कठिन था लेकिन अत्याचारों से बेहाल मज़लूम रोहंगिया सुख की किरण और एक नए जीवन की तलाश के सहारे आगे बढ़ रहे थे उन्हें क्या पता था उन के साथ क्या कुछ होने वाला है किसी तरह वो मलेशिया की सीमा के निकट पहुँच गए फिर क्या था उन्हें कोरोना के नाम पर वहीँ समंदर में ही रोक लिया गया और किसी प्रकार की सहायता भी नहीं की गयी और फिर उनकी नाव वापस बांग्लादेश की तरफ घुमा दी गयी. रस्ते में उनका खाना ख़त्म हो गया वहां पर खाने के लिए कुछ भी नहीं बचा ऊपर देखो तो सुर्ख आसमान और नीचे देखो तो नीला गहरा समंदर, दूर दूर तक नज़रें दौड़ाने पर भी कोई सहायता के लिए मौजूद ना था. वो मारे भूक के तड़पने और बिलकने लगे, पीने के लिए समान जल भी पर्याप्त ना था उनकी आँखों के सामने गहरा कोहरा छाने लगा लोग मरे भूक के बेहोश होने लगे. उन पर समंदर के खारे पानी के छींटे मारे जाते तो होश आता वो निरंतर नौ नौ दिनों तक भूके रहे. देखते ही देखते लोग तड़प तड़प कर भूक से मरने लगे जो लोग मर जाते उन्हें उसी समंदर में उठाकर फ़ेंक दिया जाता और दूसरे के मरने का इंतज़ार किया जाता. एक महिला ने रोते हुए अपने बारे में बताया मैं नौ दिनों तक भूकी रही मेरी बहन को पीलिया था उस ने खारा पानी पी लिया था और गिर पड़ी जिस से उस की मृत्यू हो गयी. मैं बहुत रोई चिल्लाई लेकिन उसे भी मेरी आँखों के सामने समंदर में फ़ेंक दिया गया, इ्स घटना को मैं बर्दाश्त नहीं कर पाई मैं भी अपनी जान देना चाह रही थी लेकिन एक लड़के ने मुझे रोक लिया. हममे से एक एक करके सब मरने लगे मुझे यक़ीन हो गया था कि मैं भी मर जाउंगी. हम चालीस में से लगभग बीस लोग मर गए जिन्हे दरिया ही में दफ़न कर दिया गया. हम पचास दिनों के बाद बांग्लादेश सीमा के जलीय तट पर पहुंचे हमें लगा था हम अपने परिजनों से कभी नहीं मिल पाएंगे परन्तु ईश्वर ने हमें नयी जीवन और नया आस दिया.
मेरी सभी के लिए यही प्रार्थना और विनती है कि ईश्वर इतना कठोर परीक्षा किसी की न ले और आप सब अनाज के प्रत्येक दाने की रक्षा करें और उस की क़द्र करें .
Saiyad Ahmad
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