अगर किसानों का आंदोलन 2104 के पहले हुआ होता, तो कैसे रहता मीडिया का रोल !

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12 December 2020 (Publish: 10:21 AM IST)

नई दिल्ली (असरार अहमद )……….किसान आंदोलन लगातार कई दिनों से देश भर में चल रहा है खास तौर पर देश की राजधानी के अलग अलग बॉर्डर पर किसानो का जबरदस्त आंदोलन चल रहा है. तक़रीबन हर बॉर्डर को किसानो ने बंद कर रखा है यूँ समझ लीजिये उस पर किसानों कब्ज़ा हो गया है कई मर्तबा सरकार से किसान नेताओं की बात भी हुयी लेकिन सरकार मीटिंग के दौरान इधर उधर की बाते ही करती रही किसानो की मांग मानने के लिए केंद्र सरकार किसी भी सूरत में तैयार नहीं है तो वहीँ पर अब किसान नेताओं ने भी एलान कर दिया है की अब हमारा आंदोलन और तेज़ होगा.

किसानों को मनाने में भले ही मोदी सरकार ने पूरी ताक़त झोंक दी हो लेकिन किसान बॉर्डर से हटने के लिए तैयार नहीं है किसान अपने आंदोलन से टस से मस होने के लिए तैयार नहीं हैं। बुधवार शाम को हुई प्रेस कॉन्फ्रेन्स में किसान नेताओं ने कहा है कि उन्हें केंद्र सरकार की ओर से भेजा गया प्रस्ताव क़तई मंजूर नहीं है और वे अपने आंदोलन को और तेज़ करेंगे।

आप सोचिये की यही आंदोलन अगर 2014 से पहले हुआ होता तो क्या होता है अगर ऐसे ही किसान अपने ट्रेक्टर के साथ दिल्ली के सभी बॉर्डर पर कब्ज़ा कर लिए होते तो क्या होता.

पंजाब और हरयाणा के किसान अपने पूरे सामान के साथ खुली आसमान के नीचे ठण्ड रातों में सो रहे होते तो क्या होता ?
पूरे देश के कोने कोने से किसान इसी तरह दिल्ली कूच किये होते तो क्या होता ?
क्या ऐसे ही 2014 से पहले भी होता की मीडिया की तरफ किसानो के आंदोलन को खालिस्तानी बता दिया जाता ?
जिस तरह से आज कुछ मीडिया हाउस ने किसानो के शांतिपूर्ण प्रदर्शन को खालिस्तानी बता रहे हैं.बताया जा रहा है की किसानो को बहकाया जा रहा है बताया जा रहा है की किसानो के आंदोलन में देश विरोधी नारे लग रहे हैं.

अगर ये आंदोलन 2014 से पहले हुआ होता तो बड़े बड़े एंकर और रिपोर्टर किसानो के आंदोलन में ही रात गुजारते और सुबह होते ही
किसानो की आपबीती सुनना शुरू कर देते न जाने कितने कितने घंटों तक लाइव कवरेज चलाते.
लेकिन आज मीडिया ने इस आंदोलन को देश मुखालिफ बता दिया है,किसानो को खालिस्तानी बता दिया गया, लेकिन इन सब के बावजूद भी किसान अपने मजबूत हौसलों के साथ डटे रहे और एलान कर दिया है की अब आगे और भी मजबूत होंगे.

मोदी सरकार को समझ नहीं आरहा है कि आख़िर वह करे तो क्या करे। न उगलते बन रहा है और न ही निगलते पंजाब-हरियाणा के किसानों ने दिल्ली-हरियाणा के बॉर्डर्स पर डेरा डाल दिया है। किसानों का जमावड़ा बॉर्डर्स पर दिन बा दिन बढ़ते ही जारहा है। ठंड के दिनों में बुजुर्ग, बच्चे और महिलाएं अपनी मांग को लेकर डटे हुए हैं और पीछे हटने के लिए तैयार नहीं हैं। दूसरी ओर, केंद्र सरकार भी कृषि क़ानूनों को वापस लेने के लिए तैयार नहीं दिखती।

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