बात सितंबर 2021 की है। मैं परीक्षा के सिलसिले में नवलगढ़ राजस्थान जा रहा था। रात के 10:30 बजे हमारी ट्रेन दिल्ली के सराय रोहिल्ला रेलवे स्टेशन से थी। ये सराय मुग़लो के जमाने मे बने थे और दिल्ली में ये कई है। ये बाहर से आने वाले मुसाफिरों के आराम करने की जगह थी । तब लोग घूमने रोमांच के लिए नही जाते थे। अपने काम, व्यापार आदि के लिए जाते थे और घोड़ो का इस्तेमाल होता था। तब ये सराय उनके काम आते थे। ये रात बिताने और ठहराने की जगह थे और मुफ्त थे।
ट्रैन सुबह के साढ़े 4 बजे नवलगढ़ में थी। ये एक छोटा सा शहर है जो झुनझुनू ज़िले में है। इसके बिल्कुल पास सीकर है जो एक ऐतिहासिक जगह है और वहां कई ऐतिहासिक और पुरातात्विक हवेलियां हैं। नवलगढ़ में भी कुछ हैं। ये क्षेत्र राजस्थान के उत्तर पूर्वी भाग में है और उत्तर प्रदेश और हरियाणा से लगा हुआ है।
पुरातन काल मे इसे सोने का शहर भी कहा जाता था। नवलगढ़ का रेलवे स्टेशन साफ और छोटा है। ये स्टेशन पुराने स्टेशनो के जैसा है, जहाँ स्टेशन पर ही बड़े पेड़ है, कुछ बरगद, कुछ खेजड़ी और कुछ नीम के पेड़ हैं। आज कल के स्टेशन जैसे नहीं जहां स्टील की कुर्सियां , चारो ओर से बंद एयर कंडीशन जैसे वातावरण और पेड़ पौधों का नाम तक नहीं। आधुनिकता की निशानी मशीनी विकास नही हो सकता। आधुनिकता तभी कही जा सकती है जब मशीनी विकास के साथ- साथ मनुष्य के सोच का विकास, जीव जंतुओं का पारस्परिक विकास , वनस्पतियों का पारस्परिक विकास हो। किसी एक का विकास और दूसरे का विनाश आधुनिकता कैसे? ये संवहनीय मतलब सस्टेनेबल विकास नहीं। खेजड़ी के वृक्ष राजस्थान के लिए खास है। यहां पानी कम है और कम पानी मे जीवित रहने वाले पेड़ों की एक खास किस्म खेजड़ी के पेड़ हैं। ये कम पानी मे जी सकते है और सूखा पड़ने पर भी हरे रहते है। इनके पत्तो को गाँववाले अपने मवेशियों को खिलाने में इस्तेमाल करते है, साथ ही सूखा पड़ने पर इन पत्तों से सब्जी भी बनाते है। दशहरे पर खेजड़ी के पेड़ की पूजा भी होती है और पेड़ के नीचे मूर्ति भी स्थापित कर देते है। कदाचित इस पेड़ की उपयोगिता को दूसरी पीढ़ियों तक पहुँचाने के लिए पूर्वजों को यही रास्ता समझ आया होगा। नीम के पेड़ों पर तोते हैं और बरगद के पेड़ों पर गौरैया, चिड़िया और मधुमखियों का छत्ता।स्टेशन के करकट पर कबूतर और फाख्ता। स्टेशन के अहाते में और दूसरी तरफ चिड़ियों के पानी पीने के लिए मिट्टी के कई बर्तन हैं। यहां हर साल पानी की कमी से मोर मर जाते है। अहाते में पेड़ पर चढ़ने वाली अनगिनत चीटियां हैं, गिलहरियां हैं और कीड़े भी हैं। इन्ही पेड़ों के बीच में यात्रियों के लिए बैठक बने हैं और पीने का पेय। साथ ही प्रसाधन है पुरुष और महिलाओं के लिए अलग अलग। पानी आता हुआ और साफ़। पानी के इस्तेमाल से लेकर स्टेशन पर चढ़ने तक विकलांग साथियों का ध्यान रखा गया है।
स्टेशन के चारो ओर लकड़ी की रेलिंग है और उसके पीछे खेतों में ढोरों का झुंड जिसमे कुछ गायें, बछड़े और बैल चर रहें है।
यहां ठीक ठाक वनस्पति है, यद्यपि राजस्थान का दो तिहाई हिस्सा रेगिस्तान है और थार रेगिस्तान का लगभग साठ प्रतिशत हिस्सा राजस्थान में है, और कुछ कच्छ और पाकिस्तान में। इसके पूर्वोत्तर और दक्षिणी भाग में वनस्पति है। जैसलमेर और बाड़मेर का ज्यादातर भाग रेतीला है।
स्टेशन और प्रसाधन दोनो साफ सुथरे हैं। ये सब देख के मुझे काफी कुछ सीख मिली। सबको अपने अधिकारों की आज़ादी का प्रयोग अपने कर्तव्यों को धयान में रख कर करना चाहिए। अगर सबको स्टेशन पर बैठने की आज़ादी है तो ये धयान रहे कि वे ऐसा कोई काम न करें जिससे दूसरे इंसानो और जीवों के अनुभव में हस्तक्षेप हो। कोई नज़दीक बैठा हो तो धीरे बोले जिससे वो डिस्टर्ब न हो, कुछ खाया हो तो कूड़ेदान में फेंके जिससे जो आपके बाद आये उसे भी वैसे ही वातावरण मिले जैसा कि आपको मिला, फिर चाहे वो स्टेशन हो या प्रसाधन या नीचे बैठने से पहले चीटियों का धयान रखना ही क्यों ना हो। जब ट्रेन में बैठे तब पॉलिटिक्स की बातें न करें। सबके राजनीतिक मत अलग हो सकते हैं और लोकतंत्र की शोभा भी यही है। पर ध्यान रहे कि आपकी वजह से दूसरे का निजी अनुभव कड़वा न हो। यदि आपको प्रसाधन साफ मिला था तो ध्यान रहे कि आपके बाद वाले को भी वैसा ही मिलना चाहिये। आपकी वजह से उसका निजी अनुभव कड़वा नही होना चाहिए। इसी को अधिकारों के साथ कर्तव्यों का पालन करना कहा जाता है। यदि बुजुर्ग हैं तो नीचे वाली सीट ऑफर करें। आपकी वजह से उनका निजी अनुभव बेहतर होगा। इससे वातावरण में जो बैलेंस बना हुआ है वो डिस्टर्ब नही होगा और ये और मजबूत होगा। सबको वही वातावरण मिलना चाहिए जब वो तब मिला था जब आप नही थे और वैसा ही रहना चाहिए जब आप वहां नही होंगे। किसी का निजी अनुभव आपके कारण कड़वा नही होना चाहिए। मैंने मनुष्यों-मनुष्यों के बीच और मनुष्यों-जीवों के बीच पारस्परिक संबंधों के बारे में पहले भी लिखा है पर यहां उसका जीवंत उदाहरण है।
मनुष्यों को दूसरे मनुष्यों के साथ और जीवों के साथ पारस्परिक तालमेल बना के रखना आना चाहिए और यही जीने की कला है।
ये संसार सिर्फ इंसानो का नहीं है, यहां जानवर है, चिड़ियाँ हैं, जीव जंतु है, वनस्पति है, कीड़े मकोड़े है । ये संसार, ज़मीन सभी की है और सभी का इसपर बराबर अधिकार है। हमें पारस्परिक तालमेल बना के जीने आना चाहिए, तभी मनुष्यों और जीवों दोनो का संरक्षण संभव है और तभी जीने का मज़ा भी है।
जब वैज्ञानिकों ने मनुष्य का वैज्ञानिक नाम दिया था होमो सेपियंस, उसका मतलब था बुद्धिमान मानव। अगर मानव को दूसरे मानवों और जीव जंतुओं के साथ पारस्परिक तालमेल बनाकर साथ में रहना नही आता तो वो बुद्धिमान कैसे?
-मजबुद्दीन
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