CAA/NRC के प्रोटेस्ट का केंद्र बिंदु जामिया मिल्लिया इस्लामिया रहा है। छात्रों ने बख़ूबी अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाहन किया है। आज उसकी क़ीमत भी चुकानी पड़ रही है। जामिया के छात्र मीरान हैदर और सफूरा जरगर जब्कि जामिया ओल्ड बॉयज एलुमनी के शफाउर्रह्मान को UAPA के अंतर्गत गिरफ्तार किया जा चुका है। इनकी गिरफ्तारी के बाद चारों तरफ़ ख़ामोशी छायी हुई है। विशेष रूप से उन ख़ेमों में खामोशी है जो लोग संविधान बचाने की लड़ाई लड़ रहे थे।
चूँकि जामिया मिल्लिया इस्लामिया इस आंदोलन का केंद्र था इसलिए बड़े-बड़े नेता संविधान बचाने के लिए जामिया के आंदोलन में शामिल होने आये थे। शशि थरूर, सलमान खुर्शीद, कन्हैया कुमार, स्वरा भाष्कर, मेधा पाटेकर, सुशांत सिंह राजपूत, अनुराग कश्यप, यशवंत सिन्हा, एसटी हसन, प्रोफेसर मनोज झा, अल्का लाम्बा, पप्पू यादव इत्यादि के नाम प्रमुख है। आंदोलन की शुरुआत जामिया से हुई थी इसलिए सरकार की नज़र जामिया के ऊपर अधिक है।
सबसे पहले शाहीनबाग़ आंदोलन की शुरुआत करने वाले शरजील ईमाम को UAPA और सेडिशन के चार्ज में गिरफ्तार किया गया। उसकी गिरफ्तारी पर सारे लिबरल और सेक्युलर गैंग ख़ामोश रहे। बल्कि मुसलमान एक्टिविस्टों ने भी शरजील के नाम पर किनारा कर लिया। इसी बीच डॉ कफ़ील खान के ऊपर रासुका लगाया गया। उनकी गिरफ्तारी भी कुछ दिन के बाद सोशल मीडिया में दबकर रह गयी।
लेकिन मेरे लिए चिंता करने वाला विषय जामिया के छात्रों की लगातार हो रही गिरफ्तारी है और उससे भी अधिक चिंता की बात संविधान बचाने के लिए भाषण देने जामिया आये नेताओं की ख़ामोशी है। मैं शशि थरूर, सलमान खुर्शीद, कन्हैया कुमार, स्वरा भाष्कर, मेधा पाटेकर, सुशांत सिंह राजपूत, अनुराग कश्यप, यशवंत सिन्हा, एसटी हसन, प्रोफेसर मनोज झा, अल्का लाम्बा, पप्पू यादव इत्यादि के ट्विटर पोस्ट को लगातार फॉलो करने की कोशिश कर रहा था। मैं ट्विटर देखकर बिल्कुल अंदर से हिल गया हूँ। इस लॉकडाउन वाले दौर में जब भीड़ के साथ विरोध दर्ज नहीं कर सकते है तब विरोध करने के लिए ट्विटर ही एकमात्र जरिया है। मग़र मुझें निराशा हाथ लगी।
लॉकडाउन में सरकार अपना काम कर रही है। वह छात्रों को लगातार गिरफ्तार कर रही है। लेकिन उसका विरोध ट्विटर के जरिये एक पोस्ट लिखकर भी नहीं किया जा रहा है। स्वरा भाष्कर की तरफ़ से जामिया के छात्रों के लिए एक भी ट्वीट नहीं है। बल्कि एक-दो रिट्वीट है। लेकिन उसमें भी जामिया के छात्रों पर नहीं बल्कि उमर ख़ालिद, तेलतुंबड़े और नौलखा की चर्चा है। छात्र राजनीति से उभरे कन्हैया कुमार के ट्विटर हैंडल पर भी सन्नाटा नज़र आता है। हालाँकि अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत ने एक भी ट्वीट नहीं किया है मगर कुछ रिट्वीट पड़े हुए है। यही हाल अभिनेता जीशान अय्यूब का है। सलमान खुर्शीद अपने ट्विटर हैंडल का इस्तेमाल राजनीति के लिए कम और मुक़दमा लड़ने के लिए क्लाइंट ढूंढने में अधिक इस्तेमाल कर रहे है। शशि थरूर रोमांटिक साहित्य से सम्बंधित पोस्ट कर रहे है। बड़बोले नेता पप्पू यादव अर्नब गोस्वामी से ट्विटर पर जंग लड़ रहे है। एसटी हसन का ट्विटर तो मुर्दाघर बन चुका है। एक हद तक मनोज झा अपनी पार्टी छात्र नेता होने के कारण मीरान के लिए खड़े नजर आये है। वह मीरान से मिलने भी गये थे और लीगल सहायता की बात भी कर चुके है। बाक़ी जो लोग ठीक-ठाक भीड़ को प्रभावित करते है वह सभी लोग ख़ामोश है।
मेरी चिंता इस बात को लेकर है कि जब लॉकडाउन में सरकार अपना काम कर रही है और छात्रों को गिरफ़्तार करके UAPA का चार्ज लगा रही है तब बड़े-बड़े नेता ख़ामोश क्यों है? क्या सिर्फ़ इसलिए ख़ामोश है कि लॉकडाउन चल रहा है? लेकिन ट्विटर पर ख़ामोशी का कोई कारण समझ नहीं आता है। इस पूरे मामले में जेएनयू छात्रसंघ की भूमिका भी बहुत निराशजनक है। पूछताछ के दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय में वामदल की छात्रनेता कंवलप्रीत कौर का मोबाइल फोन दिल्ली पुलिस क़ब्ज़ा कर लेती है। इस मामले को लेकर सभी एक्टिविस्टों की नींद खुलती है और धड़ाम-धड़ाम ट्विट और पोस्टर जारी होने लगते है। यह सेलेक्टिव एक्टिविज़्म बेहद निराशाजनक है। आज जब संविधान बचाने के लिए मीरान, सफूरा और शफाउर्रह्मान UAPA जैसा ख़तरनाक चार्ज झेल रहे है तब बड़े नेताओं की चुप्पी बड़ी परिशान कर रही है।
(लेखक:तारिक़ अनवर चम्पारणी)
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