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  • बिहार में ओवेसी और मांझी के गठबंधन ने बढ़ाई राजनीतिक दलों की चिन्ता

    मोहम्मद फारूक सुलेमानी,
    दलित और अल्पसंख्यकों के मुद्दों को बेबाकी से रखने वाले और सविधान की दुहाई देने वाले एम आई एम के बड़े नेता असदुद्दीन ओवैसी का सियासी बवंडर उस समय और उबाल में आ गया जब दलित नेता और बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी ओवैसी की एम आई एम से गठबंधन लगभग तय हो गया है ।

    गत विधानसभा चुनाव में बीजेपी सत्ता की ओर अग्रसर हो रही थी उस समय मोहन भागवत के आरक्षण हटाने के बयान को लालू ने खूब भुनाया था जिसका नतीजा यह हुआ कि राजद सत्ता पर काबिज हो गई।
    अब यहां दलित और मुस्लिम गठबंधन से आने वाली बिहार विधानसभा चुनाव में ओवेसी की एंट्री भी धमाकेदार होने वाली है । जितना राम मांझी की पार्टी हिंदुस्तानी आवाम मोर्चा(हम) बिहार की 50 से अधिक सीटों पर सीधा प्रभाव है । जबकि एक दर्जन सीटों पर काबिज होना लगभग तय माना जा रहा है इधर असदुद्दीन ओवैसी की पार्टी बिहार के पूर्वांचल में एक दर्जन सीटों पर आसानी से जीत दर्ज होने का दावा कर रही है ।

    अगर यहां के राजनीतिक समीकरण फिट बैठे तो कई राजनीतिक दलों की नींद उड़ा सकते हैं । ऐसे असदुद्दीन ओवैसी बिहार में फिलहाल वो दलित मुस्लिम और पिछड़ों पर उनकी गहरी नजर हैं , भाई अकबरुद्दीन ओवैसी को बिहार के विधानसभा चुनाव के प्रसार में अलग रखा जा सकता है क्योंकि अक्सर उनके भाई के बयान असदुद्दीन के लिए सिर दर्द भी बने हुए है। आगामी बिहार विधानसभा चुनाव में जितेंद्र राम और असदुद्दीन की एक मंच पर संबोधित करना दलित मुस्लिम की नई राजनीतिक समीकरण को जन्म दे सकता है । राजनीति में कोई स्थाई दोस्त या दुश्मन नहीं होता ऐसी में ओवेसी की पार्टी से कई राजनीतिक पार्टियां भी गठबंधन का ऐलान कर सकती है , इसलिए लालू के बेटे तेजस्वी अपने बयानों को फूंक फूंक कर दे रहे हैं । उनका एक बयान राजद के मुस्लिम वोट बैंक में सेंध लगाने में ओवैसी के लिए फायदेमंद हो सकता है । इसी ओवेसी के लिए बिहार में खोने के लिए कुछ भी नहीं है इसीलिए वह खुलकर बिहार में नीतीश कुमार को जमकर कोस रहे हैं । इधर बिहार के कई सामाजिक कार्यकर्ता वकील दलित नेता मुस्लिम धार्मिक गुरु खुलकर एम आई एम का दामन थाम रहे हैं । अगर ओवैसी की पार्टी सरकार बनाने की स्थिति में रही तो कांग्रेस के पूर्व दिग्गज नेता और वर्तमान में एम आई एम के बिहार में सबसे बड़े नेता अख्तरुल इमान पर दांव खेला जा सकता है । हालांकि उम्मीद जताई जा रही है कि दलित नेता जितेंद्र मांझी को गठबंधन का मुख्यमंत्री का उम्मीदवार का ऐलान कर सकती है । ऐसे में अन्य राजनीतिक दलों का अल्पसंख्यक और दलित वोट बैंक मैे सैध लगना तय मानी जा रही है , ऐसे में इन राजनीतिक पार्टियों के लिए ओवैसी की एंट्री चिन्ता का बढा रही है । यह तो वक्त ही बताएगा कि बिहार में किसकी बहार होगी लेकिन यह तो तय माना जा रहा है कि औवेसी की एन्ट्री फ्रन्टफुट पर ही रहेगी।
    मोहम्मद फारुक सुलेमानी
    (युवा लेखक )

  • बाड़मेर में मुस्लिम परिवारों का कोई धर्म परिवर्तन नहीं हुआ:सुलेमानी

    बाडमेर:सिणधरी उपखंड के मोतीसरा राजस्व ग्राम में 50 मुस्लिम परिवारों के 250 लोगों द्वारा मुस्लिम धर्म से हिंदू धर्म बदलने की घटना को स्टूडेंट ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इंडिया( एमएसओ) ने सिरे से नकार दिया है । यह सभी परिवार पहले से ही हिंदू हैं और कंचन समाज से ताल्लुक रखते हैं । धर्म परिवर्तन करने वाले लोगों ने खुद दावा किया है कि वह शुरु से ही हिंदू धर्म की रीति रिवाज और त्यौहारो को मनाते हैं।

    ऐसे में सवाल उठता है आखिर मुसलमान कैसे हुए?
    वही धर्म परिवर्तन करने वाली ढाडी समाज के जिला अध्यक्ष सुखदेव मालिया ने अपनी समाज में इस तरह की घटना को सिरे से नकार दिया है । मुस्लिम स्टूडेंट ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इंडिया के मोहम्मद फारूक सुलेमानी ने बताया कि इन परिवारों का आसपास कहीं भी मुस्लिम समाज से कोई ताल्लुक नहीं रहा है । धर्म परिवर्तन करने वालों के नाम हरजी राम , शुभम राम , मेघराज और जगन हैं ।
    . ऐसे में यह किसी भी मुस्लिम परिवार द्वारा हिंदू धर्म की परिवर्तन की खबर झूठी है , सिर्फ संप्रदाय की बात फैलाने के मकसद से माहौल खराब किया जाए है। एक हिंदू समाज का हिंदू में ही धर्म परिवर्तन सवालों के घेरे में है । मुस्लिम स्टूडेंट ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इंडिया के प्रदेश सचिव सुलेमानी ने यह भी आरोप लगाया अमन चैन शांति वाले प्रदेश में तथाकथित संगठन सांप्रदायिकता की फसल बोना चाहता है जिसको किसी भी हाल में कामयाब नहीं होने दिया जाएगा

  • मानसून और बाढ़ कि स्थिति से निपटने के लिए प्रधानमंत्री मोदी ने छह मुख्यमंत्रियों से बात की बेहतर तालमेल पर दिया जोर

    नई दिल्ली:प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक की. बैठक में प्रधानमंत्री मोदी ने बाढ़ की स्थितियों से निबटने के लिए राज्य सरकार की तैयारियों की समीक्षा की. इस बैठक में असम, बिहार, उत्तर प्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक और केरल के मुख्यमंत्री शामिल हुए. पीएम मोदी ने 6 राज्यों के मुख्यमंत्रियों से चर्चा के दौरान राज्य और केंद्र की एजेंसियों के बीच बेहतर तालमेल पर जोर दिया। पीएम ने बाढ़ की अग्रिम चेतावनी के लिए एक स्थायी सिस्टम और टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल की बात कही। इस दौरान केंद्रीय रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, केंद्रीय स्‍वास्‍थ्‍य मंत्री हर्षवर्धन, गृह राज्‍य नित्‍यानंद राय और जी किशन रेड्डी के अलावा वरिष्‍ठ अधिकारी मौजूद रहे।

  • CAA & NRC पर इम्पार ने लोगों से मांगा सुझाव।

    सांसद रघु के राजू से मुलाक़ात कर के CAA & NRC की समस्याओं से उनको अवगत कराया और उसकी बारीकियां भी बताईं

    नयी दिल्ली: इम्पार ने NRC & CAA के बारे में मुस्लिम समुदाय की चिंताओं से अवगत कराने के लिए पांच सदस्यीय प्रतिनिधिमंडल के साथ विधायी नियमों पर संसदीय उपसमिति के अध्यक्ष और सांसद रघु के राजू से उनके आवास पर मुलाकात की। डॉ एमजे खान के नेतृत्व वाले प्रतिनिधिमंडल ने सांसद महोदय को बताया कि किस तरह से आसाम में लोगों को समस्याओं का सामना करना पड़ा। उन्होंने बताया कि किस तरह से बड़े पैमाने पर सभी समुदायों के लोगों को परेशानियों के साथ-साथ टॉर्चर और करेक्शन से गुजरना पड़ता है, क्योंकि डॉक्यूमेंट जमा करना कोई आसान काम नहीं है। ऐसे समय में जबकि भारत जैसे लोकतांत्रिक और महान देश में बाढ़ की वजह से लाखों लोग हर साल पलायन करते हैं। उनके पास डॉक्यूमेंट कहां होंगे ? और वह कैसे डोकोमेंट ला सकते हैं ?

    प्रतिनिधिमंडल ने सांसद को यह भी बताया कि 1.80 मिलियन लोग अपनी नागरिकता प्रमाणित करने में असमर्थ होंगे, जिसमें 1.20 मिलियन हिंदू समुदाय के लोग शामिल होंगे। प्रतिनिधिमंडल ने मिस्टर राजू से अनुरोध किया कि वह प्रतिनिधिमंडल और इंपार द्वारा व्यक्त की गई चिंताओं से गृह मंत्रालय को अवगत कराएं और अगर एनआरसी CAA लाना जरूरी ही हो तो ऐसे कानून बनाए जाएं जो आसान हों और जिसमें लोगों के साथ भेदभाव की संभावना 0% भी ना हो, ताकि लोगों को अपनी नागरिकता प्रमाणित करने में किसी तरह की कोई दिक्कत या परेशानी ना आए।

    इम्पार के प्रतिनिधिमंडल ने बताया कि मिस्टर राजू ने उनके द्वारा बताई गई समस्याओं को हमदर्दाना तरीके से न सिर्फ सुना बल्कि उन्होंने इस बात का आश्वासन भी दिया कि वह हर तरह से मदद करेंगे, जिससे लोगों को किसी तरह की कोई दिक्कत परेशानी ना आए। इम्पार ने यह भी कहा कि जल्द ही विस्तार से कम्युनिटी कंसर्न को लेकर के 1 नोट भी वह सांसद महोदय को सौंपेगा और उनसे अपेक्षा करेगा कि वह गृह मंत्रालय को इसे भेजें, ताकि गृह मंत्रालय इस पर संवेदनशील होकर के गौर करे।

    सांसद ने इम्पार के प्रतिनिधिमंडल को यह भी कहा कि वह विस्तार से एक प्रेजेंटेशन उन्हें दें, ताकि वह इसके बारे में आगे की कार्यवाही कर सकें। साथ ही उन्होंने इम्पार से कहा कि वह कमेटी के बाकी 15 मेंबरों से भी मुलाकात अलग-अलग करें और उन को कम्युनिटी की समस्याओं और चिंताओं से अवगत कराएं। साथ ही देशवासियों को जो परेशानियां आ सकती हैं या असम समेत देश के विभिन्न कोनों जैसे बाढ़ ग्रस्त इलाकों के जो अनुभव हैं, उससे कमेटी के बाकी 15 सदस्यों को अवगत कराएं। इंपार ने लोगों से अपील की है कि लोग बेहतर तरीके जो उनके मन और दिमाग में हैं उन को भेजें ताकि इंपार बाकी समिति के सदस्यों से मुलाकात करके उन्हें उनके बारे में अवगत कराए और बेहतरीन पेरजेंटेशन दे।

  • J&K के एलजी बदले:मनोज सिन्हा जम्मू-कश्मीर के नए उपराज्यपाल होंगे,राष्ट्रपति ने गिरीश चंद्र मुर्मू का इस्तीफा मंजूर किया

    नई दिल्ली
    मनोज सिन्हा पिछले साल यूपी की गाजीपुर सीट से लोकसभा चुनाव हार गए थे।

    गिरीश चंद्र मुर्मू केंद्र शासित जम्मू-कश्मीर के पहले उपराज्यपाल थे, उन्होंने बुधवार को इस्तीफा दिया था
    चर्चा है कि मुर्मू को कैग बनाकर दिल्ली भेजा जा रहा है, क्योंकि मौजूदा कैग राजीव महर्षि इसी हफ्ते रिटायर हो रहे है

    पूर्व रेल राज्य मंत्री मनोज सिन्हा (61) जम्मू-कश्मीर के नए उपराज्यपाल होंगे। राष्ट्रपति भवन ने यह जानकारी दी है। सिन्हा मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में रेल राज्य मंत्री और संचार राज्य मंत्री रह चुके हैं। हालांकि, पिछले साल गाजीपुर सीट से लोकसभा चुनाव हार गए थे। यूपी में 2017 के विधानसभा चुनाव के बाद उनका नाम मुख्यमंत्री उम्मीदवार के रूप में भी चर्चा में आया था।

    गाजीपुर जिले के मोहनपुरा में जन्मे सिन्हा पूर्वी उत्तर प्रदेश के पिछड़े गांवों के विकास से जुड़े कामों में सक्रिय रहे थे। पॉलिटिकल करियर की शुरुआत छात्र राजनीति से हुई। 1982 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के प्रेसिडेंट चुने गए थे। 1989 से 1996 तक भाजपा की नेशनल काउंसिल के सदस्य रहे। 1996 में पहली बार लोकसभा पहुंचे। 2014 में उन्होंने तीसरी बार लोकसभा चुनाव जीता था।

    गिरीश चंद्र मुर्मू को कैग की जिम्मेदारी मिल सकती है
    राष्ट्रपति रामनाथ कोविंद ने गिरीश चंद्र मुर्मू का इस्तीफा मंजूर कर लिया है। मुर्मू केंद्र शासित जम्मू-कश्मीर के पहले उपराज्यपाल थे। उन्होंने बुधवार को इस्तीफा दे दिया था। 1985 बैच के आईएएस ऑफिसर मुर्मू गुजरात कैडर के अफसर हैं। सूत्रों के मुताबिक, मुर्मू को कॉम्पट्रॉलर एंड ऑडिटर जनरल ऑफ इंडिया (कैग) बनाकर दिल्ली भेजा जा रहा है। फिलहाल राजीव महर्षि कैग हैं और वे इसी हफ्ते रिटायर हो रहे हैं।

    मुर्मू के अचानक इस्तीफे पर उमर अब्दुल्ला ने सवाल उठाए
    5 अगस्त यानी एक दिन पहले जब कश्मीर में धारा 370 हटने का एक साल पूरा हुआ, ठीक उसी दिन सोशल मीडिया और वॉट्सऐप ग्रुप्स पर अचानक मुर्मू के इस्तीफे की खबर वायरल हुई। जम्मू-कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इस पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि लेफ्टिनेंट गवर्नर से जुड़ी चर्चा अचानक कैसे शुरू हो गई?


  • बाबरी मस्जिद,मस्जिद थी और सदैव मस्जिद रहेगी।आक्रामक क़ब्ज़े से वास्तविकता नहीं परिवर्तित हो जाती।सुप्रीम कोर्ट ने अपना निर्णय सुनाया लेकिन न्याय को शर्मसार किया है:ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड

    नई दिल्ली, 4 अगस्त 2020, आज जबकि बाबरी मस्जिद के स्थान पर एक मंदिर की आधारशिला रखी जा रही है, ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड अपने दीर्घकालिक स्टैंड को दोहराना आवश्यक समझता है कि शरीअत की रोशनी में जहां एक बार मस्जिद स्थापित हो जाती है वह क़यामत तक मस्जिद ही रहती है इसलिए बाबरी कल भी मस्जिद थी और आज भी मस्जिद है और इनशाअल्लाह भविष्य में भी रहेगी। मस्जिद में मूर्तियों को रख देने से, पूजा पाठ आरंभ करने से, लम्बे समय से नमाज़ पर प्रतिबंध लगा देने से मस्जिद की स्थिति समाप्त नहीं हो जाती।

    आल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के महासचिव हज़रत मौलाना मुहम्मद वली रहमानी ने एक प्रेस बयान में कहा कि यह हमेशा से हमारा स्टैंड रहा है कि बाबरी मस्जिद किसी भी मंदिर या किसी हिंदू पूजा स्थल को ध्वस्त करके नहीं बनाई गई थी। नवंबर 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने भी पुष्टि की कि बाबरी मस्जिद के नीचे खुदाई में जो अवशेष मिले हैं वे बारहवीं शताब्दी की किसी इमारत के थे, बाबरी मस्जिद के निर्माण से चार सौ वर्ष पूर्व इसलिए किसी मन्दिर को ध्वस्त करके मस्जिद का निर्माण नहीं किया गया। सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट तौर पर कहा कि 22 दिसंबर 1949 की रात तक बाबरी मस्जिद में नमाज़ होती रही है। सर्वोच्च न्यायालय का यह भी मानना है कि 22 दिसंबर 1949 को मूर्तियों को रखना अवैध था। सर्वोच्च न्यायालय यह भी मानता है कि 6 दिसंबर 1992 को बाबरी की शहादत एक अवैध, असंवैधानिक और आपराधिक कृत्य था। अफ़सोस कि इन सभी स्पष्ट तथ्यों को स्वीकार करने के बावजूद कोर्ट ने अन्यायपूर्ण निर्णय सुनाया। मस्जिद की ज़मीन उन लोगों को सौंप दी जिन्होंने आपराधिक रूप से मूर्तियों को रखा और इसको शहीद किया।

    बोर्ड के महासचिव ने कहा “चूंकि सर्वोच्च न्यायालय देश की सर्वोच्च अदालत है इसलिए उसके अंतिम निर्णय को स्वीकार करने के अलावा कोई विकल्प नहीं है हालांकि हम यह अवश्य कहेंगें कि यह एक क्रूरतापूर्ण और अन्यायपूर्ण निर्णय है जो बहुसंख्यकों के पक्ष में दिया गया।” सर्वोच्च न्यायालय ने 9 नवंबर 2019 को अपना फैसला सुनाया लेकिन इसने न्याय को अपमानित किया है। अल्हम्दुलिल्लाह भारतीय मुसलमानों के प्रतिनिधित्व व सामूहिक प्लेटफॉर्म ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड और अन्य पक्षों ने भी अदालती लड़ाई में कोई कसर नहीं रखी। यहाँ यह कहना अत्यन्त महत्वपूर्ण है कि हिंदुत्व तत्वों का यह पूरा आंदोलन उत्पीड़न, धमकाने, झूठ पर आधारित था। यह एक राजनीतिक आंदोलन था जिसका धर्म या धार्मिक शिक्षाओं से कोई लेना-देना नहीं था। झूठ और उत्पीड़न पर आधारित कोई इमारत देर तक खड़ी नहीं रहती।

    महासचिव ने अपने बयान में आगे कहा कि स्थिति चाहे कितनी भी खराब क्यों न हो, हमें हिम्मत नहीं हारनी चाहिए और हमें अल्लाह पर भरोसा रखना चाहिए। हमें विपरीत परिस्थिति में जीने की आदत बनानी चाहिए। स्थिति सदैव एक जैसी नहीं रहती है। अल्लाह तआला क़ुरआन में इरशाद फ़रमाता है { ये समय के उतार चढ़ाव हैं, जिन्हें हम लोगों के बीच प्रसारित करते रहते हैं} इसलिए हमें निराश होने की कदाचित आवश्यकता नहीं है और हमें स्वयं को स्थिति के सामने समर्पण नहीं करना है। हमारे समक्ष इस्तांबुल की आया सोफ़िया मस्जिद का उदाहरण इस आयत की मुंह बोलती तस्वीर है। मैं भारत के मुसलमानों से अपील करता हूं कि वे सुप्रीम कोर्ट के फैसले और मस्जिद की भूमि पर मंदिर के निर्माण से हतोत्साहित न हों। हमें याद रखना चाहिए कि तौहीद (एकेश्वरवाद) का विश्व केंद्र और अल्लाह का घर काबा लंबे समय तक बहुदेववाद और मूर्तिपूजा का केंद्र रहा है। अन्ततः मक्का की विजय के बाद प्यारे नबी ﷺ के माध्यम से फिर से तौहीद का केंद्र बन गया। हमारी ज़िम्मेदारी है कि ऐसे नाज़ुक अवसर पर ग़लतियों से तौबा करें, अपने अख़लाक़ और चरित्र को संवारें, घर और समाज को दीनदार बनाएं और पूरे साहस के साथ प्रतिकूलता का सामना करने का दृढ़संकल्प लें।

  • हरियाणा:घासेड़ा पहुंचे आफताब आलम,मोब लिंचिंग पर सीएम से मांगा जवाब

    हरियाणा कांग्रेस विधायक दल के उप नेता व नूह से विधायक चौधरी आफताब अहमद व पीसीसी सदस्य व उनके अनुज महताब अहमद रविवार को घासेड़ा पहुंचे और मोब लिंचिग के पीड़ित लुकमान व उनके परिवार से मुलाकात की व उन्हें आश्वस्त किया कि उन्हें न्याय दिलाने के लिए वो प्रदेश सरकार से लड़ाई लड़ेंगें व दोषियों को सजा दिलाने का काम करेंगे।

    बता दें कि बीते शुक्रवार गुड़गांव में असामाजिक तत्वों की भीड़ ने मेवात के लुकमान पर लाठी डंडों व हथोडियों से हमला कर दिया था, जिस दौरान पुलिस भी वहां मौजूद थी।

    सीएलपी उप नेता आफताब अहमद ने पीड़ित के परिवार से कहा कि वो उनके साथ खड़े हैं और न्याय दिलाने में हर संभव सहयोग करेंगे। आफताब अहमद ने कहा कि पूरा इलाका पीड़ित परिवार के साथ खड़ा है।

    सीएलपी उप नेता आफताब अहमद ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि गांधी ग्राम घासेड़ा के लुकमान पर गलत विचारधारा से प्रभावित लोगों द्वारा हमला ना केवल लुकमान के शरीर पर हमला है बल्कि गांधी की विचारधारा व देश के लोकतंत्र पर गोडसे वादी विचारधारा का हमला है। सबसे बड़ी हैरानी व शर्म की बात ये है कि पुलिस प्रशासन की मौजूदगी में ये दुस्साहस हुआ है, जो प्रशासन व सरकार को भी सवालों के घेरे में लाता है।

    आफताब अहमद ने कहा कि जिस दिन
    ये मामला हुआ उसी दिन गांव के लोगों ने उनके संज्ञान में ये मामला लाया, आफताब अहमद ने पुलिस कमिश्नर के के राव से तुरंत बात की और कानूनी कार्रवाई करने की बात उनसे कहा, लेकिन एफआईआर में पूरी धाराएं तक नहीं लगाई हैं और ना ही सरकार ने पीड़ित का इलाज कहीं कराया, ये बहुत शर्मनाक है। उन्होंने पुलिस कर्मचारियों पर भी एफआईआर दर्ज करने की मांग की है। आफताब अहमद ने कहा कि मुख्यमंत्री मेवात को जवाब दें कि पिछले छह सालों में ऐसे मामले मेवातियों से क्यूं हुए?

    कांग्रेस विधायक दल के उप नेता आफताब अहमद ने चेतावनी देते हुए कहा कि सरकार दोषियों पर कार्रवाई करे, पीड़ित परिवार को न्याय दे अन्यथा मेवात अब सरकार के खिलाफ आंदोलन की राह पर जाने की बात गंभीरता से सोच सकता है। क्योंंकि लगातार ऐसी घटनाएं सामने आ रही हैं। इस बीजेपी सरकार में गैर सामाजिक तत्व ऐसे कामों में लगे हैं जो आपसी भाईचारे को खराब करने की दिशा में होते हैं।

    नूह विधायक चौधरी आफताब अहमद ने कहा कि कानून की धज्जियां उड़ाई जा रही है, मेवात में प्रदेश में सबसे अधिक गौ पालक हैं और मेवात के लोग अपने मवेशियों को अपने बच्चों की तरह ही प्यार करते हैं।

    आफताब अहमद ने कहा कि वो निजी रूप से भी और पूरा इलाका भी पीड़ित परिवार के साथ हर तरीके से खड़े हैं और मदद करेंगें।

    कांग्रेस विधायक दल के नेता आफताब अहमद ने मांग की है कि मोब लिंचिग के लिए कठोर से कठोर कानून बनाया जाए। इस दौरान गांधी ग्राम घासेड़ा के गणमान्य लोग उपस्थित रहे।

  • मुख्यमंत्री गहलोत समर्थक दस निर्दलीय विधायको के खिलाफ न्यायालय का दरवाजा खटखटाया जा सकता है।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    दलबदल कानून के तहत राजनीतिक दल से जीते विधायको को एक कानून के दायरे मे बांधते हुये विधायक काल पुरा करने तक उन्हें शर्तो से बांधा गया है। उसी तरह निर्दलीय विधायकों को भी कुछ शर्तों के तहत बांधा गया है। निर्दलीय विधायक किसी भी राजनीतिक दल मे शामिल नही हो सकता है।वह उस कार्यकाल मे निर्दलीय विधायक बने रहकर ही अपना कार्यकाल पुरा कर सकता है।

    राजस्थान के वर्तमान कुल तेराह निर्दलीय विधायको मे से दस निर्दलीय विधायक गहलोत घटक के समर्थन मे। उनको इस तरह की आजादी भी मिली हुई है कि वो किसी भी दल का समर्थन कर सकते है लेकिन किसी दल विशेष के पार्टी स्तर के कार्यक्रमो मे भाग नही लेने की शर्त उन पर लागू होना बताते है। जबकि संयम लोढा, महादेव सिंह, बाबूलाल नागर , राजकुमार, आलोक बेनीवाल, बलजीत यादव, कांतिलाल मीणा सहित सहित दस निर्दलीय विधायक मुख्यमंत्री निवास व होटल के बाड़ेबंदी मे आयोजित होने वाली कांग्रेस विधायक दल की बैठक मे शामिल श होने से प्रतीत होता है कि वो निर्दलीयों विधायक की बजाय अन्य दल की कार्यवाही मे हिस्सा लेकर वो किसी खास के विधायक होना अधिक पसंद कर रहे है।

    कुल मिलाकर यह है कि कांग्रेस विधायक दल की बैठको मे दस निर्दलीय विधायकों के शामिल होते रहने को लेकर कुछ लोग उनकी सदस्यता को खत्म कराने को लेकर अदालत का दरवाजा खटखटाया जा सकता है।

  • बसपा विधायको के विलय प्रक्रिया की खामियां राजस्थान कांग्रेस सरकारी के गले की फांस बना।

    ।अशफाक कायमखानी।
    जयपर: कहते है कि जब किसी की चलती रहती है तो हाथी भी आसानी से निकल जाता है। लेकिन जब कानून के दावपेंच की उलझन मे कोई घटना उलझ जाये तो मानो किड़ी का भी बचकर निकलना मुश्किल हो जाता है।उसी तरह 2008 की तरह इस दफा भी गहलोत सरकार द्वारा बसपा के सभी छ विधायको के कांग्रेस मे मिलाने को लेकर अब जाकर विलय प्रक्रिया के कानून के दावपैच मे उलझना कांग्रेस के गले की फांस बनता नजर आ रहा है। जो मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के लिये ना उगलते बन रहा है ओर नाही निगलते बन रहा है।
    राजस्थान के बसपा के सभी छ विधायको के कांग्रेस मे विलय को लेकर उठ रहे सवालो का जवाब मुख्यमंत्री गहलोत कोई कानूनी दलील से ना देकर राज्यसभा मे टीडीपी के चार सदस्यों के भाजपा मे शामिल होने का बार बार उदाहरण देकर अपना बचाव करते नजर आ रहे है। इस मसले पर कानून के अनेक जानकारों से बात करने पर अनेक रोचक तथ्य निकल कर आ रहे है। जिनके बाद लगता है कि उक्त मामले को लेकर जो माननीय सर्वोच्च न्यायालय का जजमेंट आयेगा वो एक अलग न नई नजीर बनेगी।
    बसपा के छ विधायको के विलय प्रक्रिया जैसे अनेक विवादो को लेकर सर्वोच्च न्यायालय का जिन जिन लोगो ने अबतक दरवाजा खटखटाया है वो सभी व्यक्ति विशेष ने खटखटाया है। अब पहली दफा व्यक्ति विशेष की बजाय किसी राष्ट्रीय पार्टी ने अपने विधायको की विलय प्रक्रिया के विरोध को लेकर दरवाजा खटखटाया है। जिस मामले मे काफी जान बताते है। दुसरा पहलू यह है कि राष्ट्रीय पार्टी के विधायक अगर किसी अन्य दल मे शामिल होते है तो उनको पहले अलग पार्टी का विधीवत गठन करना होता है फिर पार्टी को चुनाव विभाग मे रजिस्ट्रड करके उसको राजनीतिक दल के रुप मे मान्यता दिलवाने के बाद पार्टी का किसी अन्य पार्टी मे विलय किया जा सकता है। उक्त प्रक्रिया को राजस्थान के सभी छ:बसपा विधायको ने अपनाया नही है।
    कुल मिलाकर यह है कि राजस्थान मे गहलोत सरकार के राजनीतिक संकट के भंवरजाल मे फंसने के बाद आपसी आरोप-प्रत्यारोप लगाने के अलावा विभिन्न मसलो को लेकर अदालत के दरवाजे तक विवाद पहुंच चुके है। जिनमे से बसपा विधायको के कांग्रेस मे शामिल होने का विवाद कांग्रेस की गले की फांस बनता नजर आ रहा है। अगर विधानसभा सत्र के पहले अदालत का अंतरिम आदेश बसपा विधायको को मतदान से अलग रखने का आता है तो गहलोत सरकार के लिये यह बडा झटका साबित हो सकता। वही मान्यता प्राप्त राष्ट्रीय पार्टी के विधायको के किसी दूसरे मान्यता प्राप्त राजनीतिक दल मे विलय करने के विरोध मे पार्टी द्वारा अदालत का दरवाजा खटखटाने को लेकर आने वाला जजमेंट भारत के राजनीतिक इतिहास मे एक नई नजीर बन सकता है।

  • अशोक गहलोत के अपने आपको मुख्यमंत्री बनाये रखने की जीद के चलते दर्ज रपट मे दफा 124-A की मामूली चूक से राजस्थान का खेल बिगड़ा।

    अशफाक कायमखानी।
    जयपुर: पार्टी मे पनपने वाले अपने कम्पिटिटर को योजनाबद्ध तरीके से राजनीतिक रुप से निपटाने के जादूगर के तौर पर मशहूर अशोक गहलोत अपने आपको प्रदेश मे सर्वेसर्वा बनाये रखने के लिये जो चाले आज तक चलते रहे है उनमे उनमे अक्सर सफल होते रहने से उत्साहित होने के कारण अबकी दफा अपने साथी तत्तकालीन उपमुख्यमंत्री सचिन पायलट को राजनीतिक रुप से निपटाने की लम्बे समय से कोशिश करने के चलते उनके खिलाफ दर्ज रपट मे 124-A देश द्रोह लगवाने की मामूली चूक व पायलट के धेर्य व उठे कदम का आंकलन ठीक से नही करने की चूक के चलते मुख्यमंत्री गहलोत को आज यह मुश्किल हालात राजनीतिक जीवन मे पहली दफा देखने पड़ रहे है। मोजुदा राजनीतिक संकट मे उनकी कथित तौर पर अबतक बनाई जाती रही गांधीवादी छवि को भी भारी धक्का लगने के साथ ही उनके केवल स्वयं को मुख्यमंत्री पद पर बनाये रखने के लिये वो सबकुछ राजनीतिक रुप से करने की जीद पर अड़े रहने वाले एक अलग छवि के नेता के तौर पर प्रचलित करके उनको रख दिया है।

    मुख्यमंत्री गहलोत से मिलने के लिये मंत्रियो व उनके दल के विधायको को कई दिनो तक मशक्कत करनी होती थी। आज उपजे राजनीतिक संकट मे समय ने क्या पलटी मारी है कि बाड़ेबंदी मे बंद समर्थक विधायकों से वो स्वयं होटल जाकर साथ बैठ रहे है ओर होटल मे सो रहे है तथा मान मनुहार करने के अलावा उनके बताये कार्यो को हवा की तरह निपटाये जा रहे है। होटल की बाड़ेबंदी मे बंद विधायको की पसंद अनुसार रोजाना अधिकारियों की तबादला सूचीया आने की चर्चा आम जबान पर है। जिस आदेश केनिकलवाने के लिये विधायकों के दौड़ लगाते लगाते उनके जूते घिस जाया करते थे वोही आदेश अब होटल मे बंद विधायकों की पसंद अनुसार जारी हो रहे बताते है।

    राजनीतिक टिप्पणी कार बताते है कि एक पंखवाड़े पहले राज्यसभा चुनाव मे कांग्रेस के खाते मे 123 मत पड़ने के बाद अचानक मुख्यमंत्री गहलोत को पार्टी के अंदर अपने कम्पिटिटर पायलट को कुचलने के लिये महेश जौशी द्वारा ऐसीबी व एसओजी मे रपट विभिन्न धाराओं के साथ 124-A मे दर्ज करवाने की जल्दबाजी करने की जरूरत क्यो पड़ी। साथ ही सचिन पायलट व दो मंत्रियों को बरखास्त करने की जल्दबाजी से लगता है कि गहलोत ने यह सबकुछ करने का मन बहुत पहले से बना रखा था। लेकिन यह सबकुछ अब सूलह सफाई मे सबसे बडी बांधा बनता नजर आ रहा है। मुख्यमंत्री को सोचना चाहिये था कि सभी नेता ताकत से कुचले नही जा सकते है। कभी कभार कछुआ व खरगोश की दौड़ वाली कहानी की भी पुनरावृति होती है।

    मुख्यमंत्री गहलोत व दिल्ली हाईकमान मे उनके खास पदाधिकारी साथियो का समर्थन पाकर व दर्ज रपट के बावजूद जब पायलट खेमा दवाब मे आता नही दिखने के बाद जब विधानसभा सत्र मे पायलट समर्थक विधायकों द्वारा भाग लेने की घोषणा से हाईकमान के हाथ-पैर फूलने लगे है। सदन मे गहलोत खेमा हारे या सचिन पायलट खेमा हारे, तो उस स्थिति मे हारेगी तो कांग्रेस ही। राजस्थान मे अगर ऐसी नजीर पड़ती है तो वो नजीर कांग्रेस को अन्य प्रदेशो मे भी परेशान कर सकती है। ऐसे हालात को भांपकर दिल्ली के जो नेता पहले गहलोत से मिलकर पायलट खेमे को कुचलने की बात करते थे वो नेता ही अब बीच का रास्ता निकलने की भागदौड मे लगे हुये है। अगर समझोता होता है तो उस स्थिति मे एकदफा गहलोत को मुख्यमंत्री पद से हटना होगा ओर पायलट को भी पहले हट चुके पदो से अभी भी दूर होने पर हां करनी होगी। गहलोत के पास उपरी तौर पर 99 के बहुमत का आंकड़ा नजर आने मे काफी पोल होने का स्वयं गहलोत को भी अहसास है। वही हाईकमान भी उस खतरे का भलीभांति भांप चुका बताते है।

    कुल मिलाकर यह है कि अपनी आदत के मुताबिक मुख्यमंत्री अशोक गहलोत द्वारा पार्टी के अंदर मोजूद अपने कम्पिटिटर को कुचलने के लिये पावर का बेजा उपयोग करते हुये 124-A मे उन्हें गिरफ्तार करने की कोशिश का अहसास पायलट समर्थको को समय रहते होने के बाद उनके राजस्थान छोड़कर SOG व ACB की पहुंच से दूर चले जाने से गहलोत को काफी धक्का लगा है।आहूत विधानसभा सत्र मे पायलट समर्थक विधायकों के भाग लेने की घोषणा के बाद कांग्रेस नेताओं के हाथ-पैर फूलने लगे है। वो अब हर हाल मे बीच का रास्ता निकालने मे भागदौड करने लगे है। पर उस निकाले जाने वाले रास्ते पर गहलोत व पायलट का सहमत होना राजनीतिक संकट से कांग्रेस को उभारने के लिये काफी निर्भर करेगा।