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  • श्मशान घाट की जमीन अपने नाम कराने पर, साक्षी महाराज के खिलाफ गैर जमानती वारंट जारी,

    बता दें कि साल 2012 में बीजेपी सांसद सहित मुकेश कुमार, जय प्रकाश, चोखेलाल, प्रेम सिंह ने साजिश करके श्मशान की जमीन का बैनामा अपने नाम करा लिया था. मामले की रिपोर्ट जबर सिंह ने एटा के थाना कोतवाली नगर में दर्ज कराई थी.

    मिल्लत टाइम्स,नई दिल्ली:बीजेपी सांसद साक्षी महाराज के खिलाफ एमपी-एमएलए स्पेशल कोर्ट ने गैर जमानती वारंट जारी किया है. ये वारंट धोखाधड़ी से श्मशान घाट की जमीन का बैनामा अपने नाम कराने, न्यायिक कार्य में सहयोग न करने और अदालत में हाजिर न होने के मामले में कोर्ट की तरफ से जारी किया गया है. इस मामले में पांच अन्य लोगों के खिलाफ भी कोर्ट ने गैर जमानती वारंट जारी किया है. इस मामले की सुनवाई 12 मार्च 2019 को होगी.

    बता दें कि साल 2012 में बीजेपी सांसद सहित मुकेश कुमार, जय प्रकाश, चोखेलाल, प्रेम सिंह ने साजिश करके श्मशान की जमीन का बैनामा अपने नाम करा लिया था. मामले की रिपोर्ट जबर सिंह ने एटा के थाना कोतवाली नगर में दर्ज कराई थी.

    पुलिस ने जांच के बाद इस मामले की रिपोर्ट और आरोप पत्र कोर्ट में पेश किया. आरोप पत्र दाखिल होने के बाद न्यायधीश ने पाया कि इसमें सभी नामजद लोगों पर अभी आरोप तय होने हैं और ये लोग कोर्ट में हाजिर नहीं हो रहे हैं. इसके बिना पर विशेष न्यायधीश ने गैर जमानती वारंट जारी कर दिया है.

    बता दें कि बीजेपी सांसद साक्षी महाराज अपने विवादित बयानों की वजह से चर्चा रहते हैं. पिछले साल उन्होंने कहा था कि कब्रिस्तान बनना ही नहीं चाहिए. अगर कब्रिस्तानों में हिंदुस्तान की सारी की सारी जमीन चली जाएगी तो खेती-खलिहान कहां होंगे?

    बीजेपी सांसद ने कहा था कि चाहे नाम कब्रिस्तान हो चाहे शमशान हो. सबका दाह संस्कार ही होना चाहिए. उनका कहना था कि किसी को गाड़ने की आवश्यकता ही नहीं है. दुनिया के बाकी मुस्लिम देशों में शवों को जलाया जाता है. उन्हें जमीन में नहीं गाड़ा जाता.

    साक्षी महराज का कहना था कि देश में ढ़ाई करोड़ साधू हैं अगर सबकी समाधी बनेगी तो कितनी जमीन जाएगी. वहीं 20 करोड़ मुस्लिम हैं. अगर सबको कब्र चाहिए तो हिन्दुस्तान में जगह कहां मिलेगी.

  • सरकार देना चाहती है 15-15 लाख लेकिन RBI पैसे नहीं दे रहा: रामदास अठावले

    मिल्लत टाइम्स,नई दिल्ली: अपने बयानों से अक्सर सुर्खियों में रहने वाले केंद्रीय मंत्री रामदास अठालवे ने एक बार फिर ऐसा बयान दिया है जिसकी चर्चा जोर शोर से हो रही है. अठावले ने कहा है कि मोदी सरकार तो 15 लाख देना चाहती है लेकिन आरबीआई पैसा नहीं दे रहा है.

    अठावले ने कहा, ”एक दम 15 लाख नहीं होंगे लेकिन धीरे धीरे मिलेंगे. इतनी बड़ी रकम सरकार के पास नहीं है. हम आरबीआई से मांग रहे हैं लेकिन वो दे नहीं रहे. इसमें तकनीकी समस्याएं हैं. यह एक साथ नहीं हो पाएगा, लेकिन धीरे-धीरे हो जाएगा.”

    अठावले ने प्रधानमंत्री मोदी की भी जमकर तारीफ की और विपक्ष पर निशाना साधा. उन्होंने कहा, ”नरेंद्र मोदी बहुत एक्टिव प्रधानमंत्री हैं. राफेल के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने क्लीन चिट दी है. इससे जुड़े सभी दस्तावेज जमा कर दिए गए हैं. विपक्षियों के पास कोई मुद्दा नहीं है, तीन चार महीने में सबकी हवा निकल जाएगी. नरेंद्र मोदी एक बार फिर प्रधानमंत्री बनेंगे.”

    हाल ही में कहा था- राहुल गांधी अब पप्पू नहीं, पापा बनना चाहिए.
    इससे पहले तीन राज्यों में कांग्रेस की जीत की बाद राहुल गांधी की ‘तारीफ’ की थी. अठावले ने कहा था कि कांग्रेस अध्यक्ष अब एक परिपक्व नेता बन गए हैं. अठावले ने कहा, “‘राहुल गांधी को पप्पू बोलते थे लेकिन मेरा ये सुझाव उनको है कि पप्पू नहीं आपको पापा होना चाहिए और पापा होने के लिए जल्दी शादी करनी चाहिए, आपको तीन राज्यों में सफलता मिली है. राहुल गांधी जल्दी शादी करें और पापा बनने के काम करें.”

    एबीपी के इनपुट के साथ

  • कमलनाथ ने सीएम बनते ही,कहा बिहार और यूपी से आए लोगों के कारण MP वालों को नहीं मिलता रोजगार

    मिल्लत टाइम्स,नई दिल्ली : मध्यप्रदेश में सीएम की शपथ लेते हैं कमलनाथ ने एक विवादित बयान दे दिया है उन्होंने कहा है कि बिहार और यूपी से आए हुए लोगों के कारण यहां रोजगार नहीं मिल पाता है इस विवादित बयान पर लोगों मे काफी गुस्सा है बिहार और यूपी के लोगों में काफी नाराजगी देखी जा रही है

    कर्जमाफी चुनावों के दौरान मुद्दा बनी मगर कमलनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद जो बात सुर्खियां बटोर रही है वो है उद्योगों को दिए जाने वाले अनुदान को लेकर नई सरकार की नीति। सत्ता संभालने के साथ ही कमलनाथ ने घोषणा की कि सरकार की ओर से अनुदान केवल उन्हीं उद्योगों को दिया जाएगा जिनमें 70 फीसदी स्थानीय लोग कार्यरत होंगे।

    मुख्यमंत्री पद संभालने के बाद मीडिया से रू-ब-रू हुए कमलनाथ ने कहा कि सरकार की ओर से केवल उन्हीं उद्योगों को अनुदान दिया जाएगा जिनसे मध्यप्रदेश के स्थानीय लोगों को रोजगार मिले। उन्होंने कहा कि बिहार और उत्तरप्रदेश के लोग रोजगार के लिए यहां आते हैं, जिस वजह स्थानीय लोगों को रोजगार नहीं मिलता। कमलनाथ ने कहा कि हमने अनुदान को लेकर यह फैसला इसलिए लिया है ताकि स्थानीय लोगों को अधिक से अधिक रोजगार मिल सके। नवनियुक्त मुख्यमंत्री ने चार वस्त्र पार्क (गारमेंट पार्क) खोलने की भी घोषणा की।

    कार्यभार संभालने के चंद घंटों में ही कमलनाथ ने राहुल गांधी के कर्जमाफी के एलान को पूरा किया। उन्होंने कहा कि मुख्यमंत्री के तौर पर पहली फाइल जिसपर मैंने दस्तखत किए वो किसानों के कर्जमाफी की है, जिसका वादा हमने अपने वचनपत्र में किया था। बता दें कि कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी ने सरकार बनने के 10 दिनों में कर्जमाफी का वादा किया था।

    कांग्रेस सरकार ने एक अध्यादेश जारी करके सरकारी और सहकारी बैंकों से 31 मार्च 2018 तक किसानों के 2 लाख तक के सभी कर्ज को माफ करने का आदेश जारी किया। कृषि विभाग के अधिकारियों ने कहा कि कम से कम 34 लाख किसानों को इसका फायदा होगा और सरकार पर 34 से 38 लाख करोड़ का बोझ पड़ेगा। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा कि जब बैंक बड़े उद्योगपतियों का 40 से 50 फीसदी कर्ज माफ कर देते हैं तो कोई कुछ नहीं कहता मगर जब किसानों के कर्ज माफ होते हैं तो सवाल उठते हैं। सरकार ने कन्यादान योजना के अंतर्गत मिलने वाली राशि को भी बढ़ाकर 28 हजार से 51 हजार कर दिया है।

    आरएसएस की शाखाओं को सरकारी संस्थानों में प्रतिबंधित होने के सवाल पर उन्होंने कहा कि यह आदेश केंद्र और गुजरात सरकार की तर्ज पर लिया गया है और इसमें कुछ भी नया नहीं है।

  • दुसरे टेस्ट मे आस्ट्रेलिया ने भारत को हराया सिरीज़ 1-1 से बराबर

    मिल्लत टाइम्स:भारत और ऑस्ट्रेलिया के बीच पर्थ में खेले गए टेस्ट मैच में टीम इंडिया को कंगारूओं ने 146 रनों से हरा दिया है.
    भारत की इस हार के बाद टेस्ट सिरीज़ 1-1 से बराबर हो गई है.
    चार टेस्ट मैचों की सिरीज़ में पहला मैच भारत ने जीता था.

    दूसरे टेस्ट में टॉस जीतकर पहले बल्लेबाज़ी करते हुए ऑस्ट्रेलिया ने पहली पारी में 326 और दूसरी पारी में 243 रन बनाए थे.
    इसके जवाब में टीम इंडिया पहली पारी में 283 बनाकर पवेलियन लौट गई. वहीं दूसरी पारी में भारत सिर्फ़ 140 रन बना सका.

    किस ख़िलाड़ी ने बनाए कितने रन?
    भारत की तरफ़ से मैच में कप्तान विराट कोहली ने पहली पारी में सर्वाधिक 123 रन बनाए. वहीं दूसरी पारी में कोहली ने 17 रन बनाए.

    ऑस्ट्रेलिया की तरफ़ से हैरिस ने पहली पारी में 70 और दूसरी पारी में 20 रन बनाए. वहीं यूटी ख्वाजा ने पहली पारी में 5 और दूसरी पारी में 72 रन बनाए.

    ऑस्ट्रेलियाई गेंदबाज़ एन एम लॉयन ने पहली बारी में पांच और दूसरी पारी में तीन विकेट लिए. वहीं एम ए स्टार्क ने पहली पारी में दो और दूसरी पारी में तीन विकेट झटके.
    भारतीय गेंदबाज़ ईशांत शर्मा ने पहली बारी में चार विकेट और दूसरी पारी में एक विकेट लिया. वहीं मोहम्मद शमी ने दूसरी पारी में छह विकेट झटके.

    क्यों ख़ास रहा पर्थ का मैच?
    ये मैच इसलिए भी ख़ास रहा क्योंकि ऑप्टस मैदान में ड्रॉप-इन पिच है. लेकिन ये कौन सी पिच होती है और ड्रॉप-इन का मतलब क्या होता है?

    ये ऐसी पिच होती है, जिसे मैदान या वेन्यू से दूर कहीं बनाया जाता है और बाद में स्टेडियम में लाकर बिछा दिया जाता है. इससे एक ही मैदान को कई अलग-अलग तरह के खेलों में इस्तेमाल किया जा सकता है.

    सबसे पहले पर्थ WACA के क्यूरेटर जॉन मैले ने वर्ल्ड सिरीज़ क्रिकेट के मैचों के लिए ड्रॉप-इन पिचें बनाई थीं, जो साल 1970 के दशक में ऑस्ट्रेलियाई कारोबारी केरी पैकर ने आयोजित कराई थी.
    इस सिरीज़ में ये पिच इसलिए अहम थीं क्योंकि उसका ज़्यादातर क्रिकेट डुअल पर्पज़ वेन्यू, यानी ऐसे जगह खेला गया, जहां एक से ज़्यादा खेल हो सकते थे. इसकी वजह ये थी कि टूर्नामेंट के मैच क्रिकेट के प्रभुत्व वाले इलाक़े से बाहर हुए थे.

    क्या होती हैं ड्रॉप-इन पिचें?
    ये ऐसी पिच होती है, जिसे मैदान या वेन्यू से दूर कहीं बनाया जाता है और बाद में स्टेडियम में लाकर बिछा दिया जाता है.

    इससे एक ही मैदान को कई अलग-अलग तरह के खेलों में इस्तेमाल किया जा सकता है.
    सबसे पहले पर्थ WACA के क्यूरेटर जॉन मैले ने वर्ल्ड सिरीज़ क्रिकेट के मैचों के लिए ड्रॉप-इन पिचें बनाई थीं, जो साल 1970 के दशक में ऑस्ट्रेलियाई कारोबारी केरी पैकर ने आयोजित कराई थी.

  • काँग्रेस देश कि पार्टी या गाँधी नेहरू परिवार कि ज़ागीर?जिशान नैय्यर

    कांग्रेस का मतलब एक ज़माने में होता था भारतीय जनमानस कि पार्टी इसमें सभी धर्मों जातियों फिरकों के लोग होते थे यही वज़ह थी कि आज़ादी का आंदोलन कामयाब रहा और देश लम्बे संघर्ष के बाद आज़ाद हुआ.

    1911 में बनारस हिन्दू विश्विद्यालय के संस्थापक और भारत रत्न पंडित मदन मोहन मालवीय जब कांग्रेस के अध्यक्ष बने उसी समय वो अख़िल भारतीय हिन्दू महासभा के भी अध्यक्ष थे.

    गाँधी जी के हत्यारे नाथू राम गोडसे उसी संगठन से जुड़े हुए थे.आरएसएस के संस्थापक के वी हेडगेवार और जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुख़र्जी भी काँग्रेस के थे और नेहरू के कैबिनेट मंत्री रहें.वही जनसंघ बाद में बीजेपी बनी.

    मोहम्मद अली जिन्ना भी एक उदहारण है.पहले कांग्रेस के अधयक्ष भी रहे बाद में मुस्लिम लीग बनाई.कहने का मतलब ये है कि उस समय अलग अलग विचारधारा और जाति धर्मों के लोग भी काँग्रेस में थे.

    लेक़िन आज़ादी मिलने के बाद कांग्रेस पार्टी पर गांधी नेहरू परिवार का एकाधिकार बढ़ता चला गया जो आज अपने चरम पर है.

    गाँधी नेहरू परिवार से ज़रा सा भी इतेफ़ाक़ ना रखने का अंज़ाम के,कामराज, नरसिम्हा राव,सीताराम केसरी और प्रणव मुख़र्जी भुगत चूके हैं.

    प्रणव मुख़र्जी के बारे में कहा जाता है उनके पास तीन मौक़े थे जब वो प्रधानमंत्री बन सकतें थे 1984 इंदिरा गांधी कि हत्या के समय 2004 और 2012 लेक़िन गांधी नेहरू परिवार को उनके वफ़ादारी और ईमानदारी पर शक़ था.

    जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी तब उस दिन राजीव गांधी प्रणव मुख़र्जी और शीला दीक्षित कलकत्ता में किसी कार्यक्रम में थे ख़बर मिलते ही दिल्ली लौटने लगे हवाई जहाज़ में राजीव गाँधी ने प्रणव मुख़र्जी से पुछा जब पंडित नेहरू का देहांत हुआ था तब किया हुआ था.

    प्रधानमंत्री के देहांत के बाद किया प्रकिर्या होती है प्रणव मुख़र्जी का जवाब था गुलज़ारी लाल नंदा को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाया गया था.क्योंकि उस वक़्त वो सरकार में नम्बर 2 कि हैसियत रखते थे.

    राजीव गांधी को ये बात खटक गयी क्योंकि उस वक़्त प्रणव मुख़र्जी सरकार में नम्बर 2 कि हैसियत रखते थे, जब इंदिरा गांधी विदेश जाती थी तब उनका कामकाज़ देखते थे.

    राजीव गांधी को ये बात नागवार गुज़री और उनको लगा कि प्रणव मुख़र्जी ख़ुद प्रधानमंत्री बनने के लिए ये सब बोल रहें हैं दोनों में मन मोटाव हुआ बाद में प्रणव मुख़र्जी को पार्टी से निकाल भी दिया ख़ुद कि पार्टी भी बनाई और कई साल बाद फ़िर कांग्रेस में वापिस लाये गये.

    के कामराज को भारतीय राजनीति का किंगमेकर कहा जाता है उन्होंने ने लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनाया था बाद में इंदिरा गांधी ने ही उन्हें पार्टी में अलग थलग कर दिया.आख़िरी समय में उनको पूछने वाला कोई नही था.

    नरसिम्हा राव पर सोनिया गांधी के जासूसी का इल्ज़ाम था,कई जानकार बताते हैं कि सोनिया गांधी उनको फ़ोन पर लम्बा इंतेज़ार और मिलने के लिये घंटों इंतेज़ार कर बाती थीं.

    वैसे इतिहास उनको बाबरी विध्वंश का दोषी मनमोहन सिंह कि ख़ोज और आर्थिक उदारीकरण के नायक के तौर पर भी याद करता है लेक़िन जब 2004 में उनकी मृत्यु हुई तो उनके शव को 24 अक़बर अली रोड यानि काँग्रेस मुख्यालय भी नही ले जाने दिया गया.ये सब सोनिया गाँधी के इशारे पर हुआ.

    सीताराम केसरी काँग्रेस के आख़िरी अधयक्ष थे जो ग़ैर गाँधी नेहरू परिवार से थे, पत्रकार राशिद किदवई ने अपनी किताब ‘ए शार्ट स्टोरी ऑफ द पीपल बिहाइंड द फॉल एंड राइज ऑफ द कांग्रेस’ में लिखते हैं कि दिल्ली के 24, अकबर रोड स्थित मुख्यालय से सीताराम केसरी को बेइज्जत कर निकाला गया था.

    उन्हें कांग्रेस से निकालने की मुहिम में सोनिया गांधी को प्रणव मुखर्जी, ए के एंटनी, शरद पवार और जितेंद्र प्रसाद का पूरा सहयोग मिला.क्योंकि वो दलित समाज से थे.

    कांग्रेस पार्टी में नेहरू-गांधी परिवार से बाहर के नेताओं को याद करने की, उनकी पुण्यतिथि या जन्मदिवस मनाने की परंपरा का अभाव रहा है इसलिए वर्षों के बाद भी इतने बड़े नेता को कभी भी याद नहीं किया गया.

    पिछले महीने 11 नवम्बर को ही ले लीजिये मौलाना आज़ाद की जयंती थी पर राहुल गांधी और काँग्रेस पार्टी कि तरफ़ कोई ट्वीट भी नही किया गया मैं सुबह से शाम उसको ढूँढता रहा है.

    लेक़िन नही मिला जब संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में श्रद्धांजलि कि बात आई तो सिर्फ 3 सांसद मौजूद थे.सोनिया राहुल तो दिल्ली में ही थे उसदिन श्रद्धांजलि देने क्यों नही गये पता नही?

    3 दिन बाद 14 नवम्बर को पंडित नेहरू की जयंती थी उसदिन सब कुछ हुआ ट्वीट भी किए गए और समाधि स्थल पर श्रद्धांजलि सभा भी आयोजित किया गया.

    मौजूदा दौर में काँग्रेस का मतलब परिवार प्राइवेट लिमिटेड हो गया है वैसे परिवारवाद का चलन सभी पार्टीयों में है लेक़िन काँग्रेस में ये सबसे ज़्यादा दिखने को मिलता है.

    किया सोनिया गाँधी के बाद राहुल ही अध्यक्ष के लायक़
    थे?

    वो तो भला हो कि काँग्रेस तीन राज्यों को जीतने में कामयाब रही वरना राहुल गाँधी के नेतृत्व पर सवालिया निशान लगे रहतें.

    काँग्रेस में तो तरह के नेता हुए हैं एक जो राज्यों में कामयाब रहें और एक दिल्ली दरबार में जो दिल्ली दरबार में कामयाब रहें उनमें कमलनाथ अशोक गहलोत अहमद पटेल जैसे लोग शामिल है

    कमलनाथ के बारे कहा जाता है वो इंदिरा गांधी के तीसरे बेटे थे,गहलोत का भी इंदिरा राजीव और संजय गाँधी के क़रीबी रहें आज इसका सिला उनको मुख्यमंत्री बना कर दिया गया है.

    जिस खानदान ने देश को 3 दिग्गज़ प्रधानमंत्री दिए उसमें राहुल गाँधी का किया स्थान है पता नही?

    लेक़िन अग़र 2019 में राहुल कामयाब हुए तो फ़िर उनकी लोकप्रियता में इज़ाफ़ा होगा अग़र हार मिली तो फ़िर पार्टी में भी बग़ावत के सुर मज़बूत होंगे.फ़िर पार्टी को कुछ नया सोंचना होगा.भले 3 राज्यों काँग्रेस ने वापसी कि हो लेक़िन पूर्वोतर इतिहास में पहली बार काँग्रेस मुक्त हो गया काँग्रेस का आख़िरी क़िला मिज़ोरम भी अब ढह गया है.2019 कि डगर बहुत कठिन राहुल एंड कंपनी के लिये देखना दिलचस्प होगा किया महागठबंधन राहुल को अपना नेता मानेगा?

    Zeeshan Naiyer
    Student Department Of Mass Communication & Journalism
    Maulana Azad National Urdu University Hyderabad

  • गंभीर स्थिति इंसाफ पसंद और धर्मनिरपेक्ष वर्ग की जिम्मेदारियां:डॉ मोहम्मद मंजूर आलम

    भारत एक महानतम लोकतांत्रिक देश है, उसका संविधान व्यापक और बहुत सारी खूबियों का हामिल है .यहाँ सभी वर्गों, धर्मों और समूह को एक तरह के अधिकार  दिए गए हैं, उनकी सामाजिक, शैक्षिक आर्थिक विकास को सुनिश्चित करने की  बात की गई है। लेकिन पिछले साढ़े चार वर्षों में जिस तरह के हालात पैदा हो गए हैं,
    जिस तरह कानून की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। संविधान से खिलवाड़ किया जाने लगा है।इतिहास बदलने की कोशिश की जा रही है।  और कमजोर वर्गों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। उसके बाद इस तरह के सवाल देश भर में उठने लगे हैं कि क्या देश के संविधान को बचाने की जिम्मेदारी केवल मुसलमानों की है?

    क्या यह संभव है जिन लोगों ने देश की आज़ादी में कोई बलिदान नहीं दिया था वह संविधान की रक्षा के लिए कोई काम करेंगे ?
    क्या यह संभव है कोई समूह सीमित स्वार्थों और उद्देश्यों के लिए राजनीतिक हत्कण्डा अपनाए और वह पुरे तोर पर कानून के सुरक्षा का फ़र्ज़ अंजाम दे?
    क्या यह संभव है कि जो वर्ग नफरत की आग को लौ बनाने पर विश्वास रखता हो वह देश में  अमन और  शांति  पैदा कर सकेगा ?
    क्या यह संभव है जिस समूह का देश के संविधान पर भरोसा और विश्वास नहीं है वह संविधान का पालन कर पाएगा?
    क्या यह संभव है जो समूह देश के संविधान के खिलाफ अपना एक अलग संविधान पेश करने की योजना रखता हो वह संविधान को अमली जामा पहनाने की कोशिश करेगा?
    क्या यह संभव है जिन लोगों ने अंग्रेजों के लिए जासूसी की थी वह आज आज़ाद भारत में यहाँ के नागरिकों के लिए कोई बेहतर योजना बना सकेगा?
    यह ऐसे प्रश्न हैं जो देश के हर नागरिक की ज़ुबान पर हैं,
    साढ़े चार सालों के दौरान जो कुछ हुआ उसके आधार पर इस तरह के सवालों का उठना निश्चित और स्वाभाविक बन चुका है।

    हर कोई इन्साफ पसंद , धर्मनिरपेक्ष और सच्चा हिंदुस्तानी इसी सोच में है कि क्या भारत का संविधान खतरे में पड़ गया है? ऐसे हालात में कुछ ऐसे सवालात भी उठने लगे हैं कि आखिर भारत को आज़ादी किसने दिलाई?
    क्या देश के किसान अंग्रेजों की लाठी और गोली के शिकार नहीं हुए?
    क्या आम मजदूर और गरीबों ने गुलामी के बंधनों को गले से निकाल कर स्वतंत्रता का अलक नहीं जलाया ? क्या युवाओं और छात्रों ने देश की स्वतंत्रता के लिए बलिदान नहीं दिया?
    क्या भारत के मुसलमानों ने मौलाना आजाद के इस संदेश को स्वीकार नहीं किया, जिसमें उन्होंने जामा मस्जिद से घोषणा करते हुए कहा था कि भारतीय मुसलमानों कहाँ जा रहे हो तुम ! यहीं रुक जाओ, यह तुम्हारे पूर्वजों की भूमि है, इससे तुम्हारी यादें, इतिहास और सभ्यता जुड़ीं हैं

    क्या दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों ने देश को आजाद कराने के लिए बलिदान नहीं दिया?.20 हजार से अधिक उल्मा को आजादी की लड़ाई के इल्ज़ाम में अंग्रेजों ने तख्ता दार पर लटका दिया था।
    क्या यह स्वतंत्रता के लिए बलिदान और संघर्ष नहीं माने जाएंगे ?।

    सच्चाई यही है कि भारत की स्वतंत्रता में सभी समूहों, वर्गों और धर्मों की भूमिका है! हाँ अगर किसी समूह ने देश की स्वतंत्रता में भाग नहीं लिया था बल्कि उसने अंग्रेजों का साथ दिया था तो वह आरएसएस और संघ के लोग हैं । जिसने उस समय भी स्वतंत्रता की लड़ाई में हिस्सा नहीं लिया और आज भी वह देश को आजाद रखने के बजाय गुलाम बनाने के प्रयासों में लगे हुए हैं ।

    आश्चर्य इस बात पर है कि ऐसी शक्ति भारत में अब सत्ता पर काबिज हो चुकी है और देश पर शासन कर रही है लेकिन कया आने वाले समय में भी जनता ऐसी शक्ति को सत्ता सौंपेगी? उन्हें केंद्र कि राजनीति में प्रतिनिधित्व का मौका देगी ? ऐसे सवालों पर सोचना और विचार करना देश की सुरक्षा, उज्जवल भविष्य और संविधान की रक्षा के लिए आवश्यक हो गया है ।और इसीलिए आजकल ऐसे सवाल पूछे जाने लगे हैं। क्या यह बात सही नहीं है कि भारतीय जनता की याददाश्त बहुत कमजोर हो चुकी है ,क्या यह बात सही नहीं है कि जब कभी देश और संविधान पर आंच आया यहाँ की जनता ने पूरी ताकत के साथ उसका मुकाबला किया .क्या यह बात ऐतिहासिक सत्य नहीं है कि जब कभी देश में किसी ने अत्याचार के पहाड़ तोड़े, क्रूर प्रणाली थोपी तो उसके खिलाफ जनता सीना सुपर हो गई .क्या यह मान लिया जाए कि इतना बड़ा बलिदान वे लोग भुला देंगे।

    संविधान ने कुछ मौलिक अधिकार दिए हैं चाहे वो मुसलमान हों ,या हिंदू ,दलित हों, या आदिवासी, ईसाई हों या बौद्ध, अल्पसंख्यक हों या बहुमत। क्या यह संभव है कि इन सबके समझदार वर्ग के सामने संविधान का उल्लंघन किया जाये । धन को चंद हाथों में गिरवी रख दिया जाये , गरीबों और मजदूरों का शोषण किया जाये , रोजगार के अवसर बंद कर दिए जाएं, शिक्षा प्रणाली को तबाह व बर्बाद कर दिया जाए , देश की सभ्यता और संस्कृति से खिलवाड़ किया जाए , इतिहास को बदल दिया जाए। और यह सब के सब अपनी आँखें बंद रखेंगे?

    क्या यह भी संभव है कि सभी मीडिया, विश्व एजंसियां ,इंटरनैशनल रिपोर्ट से नजर हटाते हुए सिर्फ पीएम मोदी की टिप्पणी को जनता स्वीकार कर लेगी जिसमें सब कुछ ठीक-ठाक बताया जाता है?
    क्या यह बात सच नहीं है कि लोकतंत्र के रक्षक जहां आम नागरिक होते हैं वहीं मीडिया को गैर लिखित रूप में चौथा स्तंभ माना जाता है
    फिर क्या इसके बावजूद मीडिया अपना योगदान नहीं देगा ? मीडिया के लोगों ने भी प्रतिज्ञा कर रखा है  कि उसे अपना कर्तव्य भुगतान नहीं करना है? क्या देश के पत्रकारों ने भी यह तय कर लिया है कि अन्याय के खिलाफ वह अपनी आवाज अब बुलंद नहीं करेंगे ? क्या तथ्य और सच बोलने वाले पत्रकारों ने भी सरकार के सामने अपनी हार स्वीकार कर ली है? क्या स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया अब केवल जनसंपर्क (पीआर) का रोल अदा करेगा?
    क्या मीडिया अब सवाल करना बंद कर देगा ? क्या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की जिम्मेदारी केवल खबरों को पेश करना है? क्या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने सत्ताधारियों से सवाल करने का सिलसिला बंद कर दिया है?।
    मौजूदा परिस्थितियों में मीडिया ने अपना ट्रेंड बदल दिया है .संसी ख़बरों को पेश करने के अलावा सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना और शासकों से सवाल करना लगभग बंद हो चूका है ,

    चुनाव आयोग, सीबीआई, आरबीआई और सुप्रीम कोर्ट जैसे संवैधानिक संस्थाओं में स्पष्ट हस्तक्षेप हो  रही है। देश की वर्तमान सरकार इन सभी संवैधानिक स्थलों के स्वतंत्रता को छीन कर अपने मर्जी के अनुसार चलाना चाहती है, इन संस्थाओं की संप्रभुता पर हमला करके उन्हें अपने राजनीतिक एजेंडे को पूरा करने  के
    लिए इस्तेमाल कर रही है ।लेकिन मीडिया में सन्नाटा और खामोशी है।

    आज के ब्लॉग में यह सारे सवाल हम इसलिए उठा रहे हैं, बहुत खुलकर इस बात को पेश करने का मुख्य कारण यह है कि 2019 के आम चुनाव हमारे सामने है। इस चुनाव में इन सरे सवालात को उठाना और जनता तक पहुंचाना बहुत जरूरी है .देश की मेनस्ट्रीम मीडिया से  हमें ज्यादा कुछ उम्मीद नहीं है, विश्वास मानिए कि मेनस्ट्रीम मीडिया और विशेष रूप से टीवी चैनलों पर हिन्दू-मुस्लिम के बीच नफरत पैदा करने वाली खबरों को प्राथमिकता दी जाएगी।भड़काऊ नेताओं के बयान दिखाये जाएंगे, मूल विषय पर कुछ चर्चा नहीं होगी, अब वहाँ हाथापाई और युद्ध भी शुरू हो गई है।
    सरकार की उपलब्धियों को गिनने के अलावा कुछ और नहीं दिखाया जाएगा .विश्व एजेंसियों की सूचना को अनदेखा करके फर्जी सर्वेक्षण और रिपोटस प्रसारित किए जाएंगे ऐसे हालात में अल्पसंख्यकों, मुसलमानों, दलितों, आदिवासियों, किसानों, युवाओं, छात्रों, देश के पिछड़ों और सभी न्यायप्रिय धर्मनिरपेक्ष नागरिकों की जिम्मेदारी बनती है कि वह जनता तक सही बात पहुंचायें।

    वैकल्पिक स्रोत का उपयोग करके उन्हें तथ्यों से अवगत कराएं, संघ और साम्प्रदायिक शक्तियों की साज़िशों से उन्हें सूचित कराएं । उनके सांप्रदायिक इरादे और नापाक मंसूबों के बारे में चर्चा करें ।
    हमें उम्मीद है कि हमारे नागरिक इन बातों का पालन करेंगे और 2019 के आम चुनाव के संदर्भ में ऐसी कोई नीति बनाएंगे। हर घर तक सही संदेश पहुंचाएंगे ।

    2019  का आम चुनाव करीब है .पांच राज्यों के चुनाव ने यह तथ्य बता दी है कि मोदी मंत्र टूट चुका है .जनता भावनात्मक और घृणा अपमानजनक राजनीति अस्वीकार कर दी  है। राम मंदिर निर्माण, नामों का परिवर्तन, मुसलमानों को भगाने, गौरक्षा , भीड़ हिंसा जैसी नीति देश की जनता ने स्वीकार नहीं किया है, उन्हें रोज़गार, शिक्षा, सामाजिक विकास, शांति और समाज में बंधुत्व चाहिए। उनकी सर्वोच्च जरूरत गरीबी से मुक्ति और रोजगार के अवसर हैं सेकुलर पार्टियों को इन्हीं एजेंडों के साथ मैदान में आना होगा ।जनता के दिल की धड़कन सुननी पड़ेगी।
    हालिया विधानसभा चुनाव के नतीजों ने यह भी बता दिया की हिन्दू-मुस्लिम और धर्म की राजनीति सफलता का तर्क नहीं  है। इसलिए अब धर्मनिरपेक्ष दलों के लिए भी आवश्यक है कि वह देश का मिजाज समझे  ।जनता के उम्मीदों को पूरा करे , देश की भलाई, अर्थव्यवस्था की मजबूती, रोजगार आपूर्ति और उत्कृष्ट शिक्षा प्रणाली मुहैया कराने पर विशेष ध्यान दे .सभी को साथ लेकर चलने का मिसाल कायम करे, समाज के सभी वर्गों के दिलों की धड़कन सुनकर राजनीति करे।

    कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियों पर यह जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि वे छोटे और क्षेत्रीय दलों को साथ लेकर चले, उन्हें भी मौका दे और एक मजबूत रणनीति अपनाई जाए जिसमें किसानों, अल्पसंख्यकों, कमज़ोरं, दलितों, आदिवासियों, छात्रों, महिलाओं और देश के सभी नागरिकों को बराबर का अधिकार मिले .आज़ादी, समानता और न्याय से कोई वंचित न रहे अन्यथा फिर धर्मनिरपेक्ष दलों का भी वही हश्र होगा जो भाजपा का हुआ है।

    लेखक मशहूर स्कालर और आल इंडिया मिल्ली कॉउंसिल के महासचिव हैं

  • सीतामढ़ी:दंगाइयों और जैनुल के हत्यारों को पकड़ने में नाकाम रहे एसपी विकास वर्मन का तबादला,नए एसपी होंगे सुजीत कुमार

    मो० तौफीक/मिल्लत टाइम्स: सीतामढ़ी में हुए दंगे तथा मोब लिंचिंग में एक 80 वर्षीय वृद्ध जैनुल अंसारी की निर्मम हत्या कर आग मे जला दिया गया था इस बड़ी घटना पर विकास बर्मन के द्वारा मुजरिम पर कोई कार्रवाई ना करने पर सीतामढ़ी के लोगों में काफी गुस्सा बना हुआ था

    लोगों ने इनकी ट्रांसफर की मांग कर रहे थे बिहार अल्पसंख्यक मंत्री खुर्शीद आलम बिहार सीतामढ़ी जिला में आए थे एक प्रोग्राम में भाग लेने तो लोगों ने उन पर भी अपना गुस्सा दिखाया था और लोगों ने दंगाइयों पर तुरंत कार्रवाई करने का करने की मांग की थी

    क्या है पूरा मामला
    20 अक्टूबर को दुर्गा पूजा के टाइम में दंगा हो गया था दो समुदायों के बीच काफी जान माल का नुकसान हुआ था लेकिन दंगाइयों पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई थी वहीं बेकसुरो को अरेस्ट कर लिया गया

    आपको बता दें कि उसी दिन एक 80 वर्षीय जैनुल जैनुल अंसारी की भीड़ द्वारा निर्मम हत्या कर जिंदा जला दिया गया था हद तो यह हो गई कि सीतामढ़ी के एसपी विकास वर्मन ने अभी तक जैनुल अंसारी की हत्या का fire तक दर्ज नहीं की है तभी से वहां के लोगों का गुस्सा लगातार देखने को मिल रहा था और लोग बिहार सरकार से एसपी के ट्रांसफर की मांग कर रहे थे और मुजरिम के ऊपर कार्रवाई की मांग कर रहे थे

    आपको बता दें कि जैनुल अंसारी की मोब लिंचिंग के मामले पर सबसे पहली रिपोर्टिंग मिल्ल्त टाइम्स ने 12 मिनट की वीडियो बनाकर की थी जिस पर पटना क्राइम ब्रांच ने नोटिस भेज दिया था, उस नोटिस मे उन्होंने मुतालबा क्या था कि आप इस वीडियो को हटा दें

  • बहुजन आंदोलन को मजबूत कर मोदी को वापस गुजरात भेजेंगे’सिर्फ दलित नहीं OBC समेत 85 फिसदी लोग मेरे साथ:चंद्रशेखर

    आजाद ने कहा कि सिर्फ दलित नहीं बल्कि ओबीसी समेत 85 फीसदी तबका उनकी बात सुनता है. उन्होंने कहा कि हमने बिजनौर, गुजरात में मुस्लिमों के साथ बैठक की. ओबीसी समाज की रैली भी की है, तो ऐसा नहीं है कि हम सिर्फ एक ही तबके की बात कर रहे हैं.

    मिल्लत टाइम्स,नई दिल्ली: भीम आर्मी के सहसंस्थापक चंद्रशेखर आजाद ने आजतक के एक प्रोग्राम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर जमकर हमला बोला. उन्होंने कहा कि उनका मकसद है कि वह बहुजन मूवमेंट को इतना मजबूत कर देंगे कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को वापस गुजरात भेज देंगे.

    उन्होंने कहा कि मैं राजनीति नहीं कर रहा हूं, ना ही राजनीति में आ रहा हूं. लेकिन मेरे ऊपर कई तरह के आरोप लग रहे हैं, आरोप तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भी लग रहे हैं. उन्होंने कहा कि पीएम मोदी पर राफेल को लेकर आरोप लग रहे हैं. हम पूरे देश में बहुजन आंदोलन को इतना मजबूत करेंगे कि 2019 में नरेंद्र मोदी को वापस गुजरात भेज देंगे.

    आजाद ने कहा कि सिर्फ दलित नहीं बल्कि ओबीसी समेत 85 फीसदी तबका उनकी बात सुनता है. उन्होंने कहा कि हमने बिजनौर, गुजरात में मुस्लिमों के साथ बैठक की. ओबीसी समाज की रैली भी की है, तो ऐसा नहीं है कि हम सिर्फ एक ही तबके की बात कर रहे हैं.

    उन्होंने कहा कि अब मैं महाराष्ट्र जा रहा हूं, वहां भीमा कोरेगांव जाऊंगा. कुछ लोग मुझे जाने से रोक रहे हैं, लेकिन फिर भी जाएंगे. हम लाठी खाएंगे, जेल जाएंगे लेकिन अपनी बात पूरी करवाएंगे.

    आजाद ने कहा कि वह अभी राजनीति में नहीं आएंगे, लेकिन देश के हर हिस्से में जाएंगे. लोगों को जागरूक करेंगे, ताकि आने वाले आंदोलन के लिए लोगों को तैयार किया जाए. उन्होंने कहा कि मैं तेजस्वी यादव की पार्टी, समाजवादी पार्टी, आरएलएसपी, बहुजन समाज पार्टी जैसे दलों से बात करेंगे और उन्हें मजबूत करेंगे.

  • कश्मीरी नागरिकों की मौत पर जश्न मनाने वाले मेरे सेक्युलरिज़्म के ठेकेदारों आपका बहुत बहुत शुक्रिया:डॉ० उमर फारूक अफ़रीदी

    चंद दिनों पहले की बात है जब इज़राइल में आम आदमी पार्टी की विधायक “अलका लांबा” और समाजवादी पार्टी की पूर्व प्रवक्ता “पंखुड़ी पाठक” जी सेक्यूलरिज़्म की मूल शिक्षा को अर्जित करने गयी थी जिसमें सेक्युलरिज़्म के कई बहुत सारे और भी महारथी थे जो सब मिलकर भारत की गंगा जमुना तहज़ीब इज़राइल में जाकर बचाने की शिक्षा लेकर आये थे उनके नाम क्रमशः ये थे..

    अनिल यादव राष्ट्रीय प्रवक्ता सपा,
    वाहिद पारा राष्ट्रीय प्रवक्ता PKP
    पवन खेड़ राष्ट्रीय प्रवक्ता कांग्रेस
    पंखुरी पाठक राष्ट्रीय प्रवक्ता सपा
    बाबू मुरुगावेल प्रवक्ता AIAMK
    डा. राजू वाघमारे प्रवक्ता कांग्रेस
    अलका लाम्बा विधायक आप,
    रितेश पांडेय विधायक, बसपा
    अदिति सिंह विधायक एन.सी.पी
    धनञ्जय मुंडे एमएलसी, कांग्रेस
    अमृता धवन पूर्व अध्यक्ष एनएसयूआई

    इस लिस्ट में
    श्वेता शालिनी प्रवक्ता भाजपा
    शज़िया इल्मी राष्ट्रीय प्रवक्ता भाजपा
    विकास पांडेय संस्थापक आई सपोर्ट नमो का भी नाम है पर वे तो घोषित कम्यूनल हैं ही,

    हाल ही सेक्युलरिज़्म की चैंपियन अलका लांबा के द्वारा कश्मीरी नागरिकों की हत्या पर आए ट्वीट को देखने के बाद मुझे इस बात से क़तई कोई हैरत नहीं हुई कि वो कश्मीरी मुस्लिमों की हत्या पर अपनी विचारधारा को खुलकर स्प्ष्ट कर रही हैं , बस मायूस इस बात से हूँ कि ये सब जानने के बावजूद अपनी आंखों पर पट्टी बांधे वो मुस्लिम नौजवान जो इनके पीछे अपनी जवानियों को बर्बाद किये जा रहे हैं क्या वे अब भी इन कथित सेक्युलरिज़्म की खाल ओढ़े बागड़ बिल्लों की खुली असलियत देखकर भी अपनी आंखों पर पड़े पर्दे को उठा पाएंगे और क्या वो इस बात को अब भी समझ पाएंगे इज़राइल का जो यार है वो कैसे तुम्हारा दोस्त और अलम्बरदार है?

    शाबाश अलका और सेक्युलरिज़्म के महारथियों हम अंधों को आंखे देने के लिए बाक़ी बस अब ईश्वर से प्राथना है कि काश वो हमारी क़ौम को तुम्हारी दी हुई इन आँखों मे वो बीनाई दे सके जिससे हम वो सब देख सकें जिससे अब तक महरूम हैं !!

    बाक़ी कश्मीरी नागरिकों की मौत पर जश्न मनाने वाले मेरे सेक्युलरिज़्म के ठेकेदारों आपका बहुत बहुत शुक्रिया !!
    #काॅलम_निगार
    डा○ उमर फारूक़ आफरीदी

  • राम मंदिर पर भाजपा बिल लाई तो अदालत में देंगे चुनौती: मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड

    मिल्लत टाइम्स: ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने रविवार को कहा कि सरकार द्वारा अयोध्या में मंदिर निर्माण के लिये अध्यादेश लाये जाने और तीन तलाक पर संसद में कानून बनाए जाने की स्थिति में वह उन्हें अदालत में चुनौती देगा। बोर्ड ने यह भी कहा कि मंदिर के लिये कानून बनाने की मांग कर रहे कुछ हिन्दूवादी संगठनों के भड़काऊ बयानों पर सरकार रोक लगाये और और उच्चतम न्यायालय उनका संज्ञान ले।

    बोर्ड की कार्यकारिणी समिति की यहां हुई बैठक के बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में बोर्ड के वरिष्ठ सदस्य कासिम रसूल इलियास ने बताया कि केंद्र सरकार तीन तलाक पर अध्यादेश लाई है। इसकी मियाद छह महीने होगी। अगर यह गुजर गई तो कोई बात नहीं लेकिन अगर इसे कानून की शक्ल दी गई, तो बोर्ड इसको उच्चतम न्यायालय में चुनौती देगा।

    उन्होंने कहा कि यह अध्यादेश मुस्लिम समाज से सलाह-मशवरा किए बगैर तैयार किया गया है और अगर सरकार इसे संसद में विधेयक के तौर पर पेश करेगी तो बोर्ड की समिति सभी धर्मनिरपेक्ष दलों से गुजारिश करेगी कि वे इसे पारित ना होने दें। इलियास ने बताया कि बोर्ड का स्पष्ट रुख है कि वह बाबरी मस्जिद मामले में अदालत के अंतिम फैसले को स्वीकार करेगा।

    बैठक में यह भी राय बनी कि सरकार मंदिर बनाने के लिए अध्यादेश या कानून लाने की मांग के साथ दिए जा रहे जहरीले बयानों पर रोक लगाए और उच्चतम न्यायालय भी इसका संज्ञान ले। बोर्ड के सचिव जफरयाब जीलानी ने इस मौके पर कहा कि अयोध्या के विवादित स्थल पर यथास्थिति बरकरार रहने की स्थिति में कानूनी तौर पर कोई अध्यादेश नहीं लाया जा सकता।

    यही वजह है कि सरकार ने यह रुख दिखाया है कि वह अध्यादेश नहीं लाएगी। अगर कोई अध्यादेश आता भी है तो वह कानूनन सही नहीं होगा और बोर्ड उसको चुनौती देगा।

    इस सवाल पर कि बोर्ड मंदिर बनाने के लिए विश्व हिंदू परिषद तथा अन्य कुछ संगठनों द्वारा विभिन्न आयोजन करके सरकार पर दबाव बनाए जाने की आड़ में दिये जा रहे भड़काऊ बयानों की शिकायत उच्चतम न्यायालय से क्यों नहीं करता, जीलानी ने कहा कि यह हमारे लिये मुनासिब नहीं है।

    हमारा मानना है कि जो लोग इस तरह के बयान दे रहे हैं उनके खिलाफ सरकार कार्रवाई करे और उच्चतम न्यायालय भी इसका संज्ञान ले। उसके लिये उपाय सोचा जा रहा है। उन्होंने कहा कि उच्चतम न्यायालय कह चुका है कि राम जन्मभूमि आंदोलन किसी पार्टी का कार्यक्रम हो सकता है, किसी सरकार का नहीं, क्योंकि हुकूमत धर्मनिरपेक्षता से आबद्ध है।

    जीलानी ने कहा कि उच्चतम न्यायालय में इस्माइल फारूकी मामले पर निर्णय के दौरान कहा गया है कि इस फैसले का असर अयोध्या मामले पर नहीं पड़ेगा। बोर्ड ने इसका स्वागत किया है। विवादित स्थल पर मालिकाना हक से जुड़े मुकदमे की सुनवाई अब शुरू होनी है।

    अदालत यह कह चुकी है कि वह इस मसले का आस्था के आधार पर नहीं बल्कि जमीन पर मालिकाना हक के मुकदमे के तौर पर निर्णय करेगी। इलियास ने बताया कि बैठक में बोर्ड की दारुल कजा कमेटी की रिपोर्ट पेश की गई, जिसमें बताया गया कि इस साल देश में 14 नई दारुल कजा का गठन किया गया है।

    इस महीने के अंत तक कुछ और स्थानों पर भी इन्हें कायम किया जाएगा। दारुल कजा में कम वक्त में जायदाद, वरासत और तलाक जैसे मामलों का निपटारा किया जाता है। इससे बाकी अदालतों के बोझ को कम करने में मदद मिलती है।

    उन्होंने बताया कि बैठक में यह फैसला किया गया है कि दारुल कजा के अब तक दिये गये फैसलों का दस्तावेजीकरण किया जाएगा ताकि अदालत के बोझ को कम करने में दारुल कजा के योगदान को दुनिया के सामने लाया जा सके।