Blog

  • गूगल ने प्ले स्टोर से हटाया पेटीएम का ऐप

    गूगल ने प्ले स्टोर से पेटीएम का ऐप हटा दिया है. गूगल का कहना है कि पेटीएम ने ऑनलाइन गैम्बलिंग की शर्तों का उल्लंघन किया है. पेटीएम भारत का एक अहम स्टार्ट-अप है और दावा है कि इसके महीने के तौर पर पाँच करोड़ एक्टिव यूज़र्स हैं.

    गूगल ने कहा है कि ऑनलाइन जुआ और दूसरे अनियमित गैम्बलिंग ऐप्स जो सट्टा को बढ़ावा देते हैं, उन्हें प्ले स्टोर रोकता है और पेटीएम लगातार प्ले स्टोर की नीतियों का उल्लंघन कर रहा है.

    गूगल की वाइस प्रेसिडेंट सुजेन फ्रे ने कहा है कि गूगल प्ले इस तरह से डिज़ाइन किया गया है कि ये हमारे ग्राहकों को एक सुरक्षित एहसास देता है. इसके साथ ही डेवलपर्स को ऐसा प्लेटफ़ॉर्म मुहैया कराती है जो उन्हें एक टिकाऊ बिज़नेस का अवसर मुहैया कराता है. हम अपनी वैश्विक नीतियों को हमेशा ऐसे तैयार करते हैं जिसमें सभी पक्षों का ख्याल रखा जाता है.

    “गैम्बलिंग पॉलिसी को लेकर भी हमारा यही उद्देश्य होता है. हम किसी भी ऑनलाइन जुआ और दूसरे अनियमित गैम्बलिंग एप्स जो सट्टा को बढ़ावा देते हैं, उनकी अनुमति नहीं देते हैं. अगर कोई ऐप ग्राहकों को किसी बाहरी लिंक पर ले जाता है जहाँ किसी पेड टूर्नामेंट या नक़दी जीतने का ऑफ़र किया जाता है तो यह हमारे नियमों का उल्लंघन है.”

    लेकिन पेटीएम ने अपने आधिकारिक ट्विटर हैंडल से ट्वीट किया है कि प्रिय पेटीएम यूज़र्स, पेटीएम एंड्रॉयड एप गूगल ऐप स्टोर पर नए डाउनलोड और अपडेट्स की वजह से उपलब्ध नहीं है. जल्द ही यह वापस आएगा. आपके पैसे पूरी तरह से सुरक्षित हैं और आप अपना पेटीएम ऐप पहले की तरह ही इस्तेमाल कर सकते हैं.

    नवंबर 2016 में जब देश में अचानक नोटबंदी की घोषणा हुई तब पेटीएम का व्यापार भी अप्रत्याशित रूप ऊपर उठा था.

    साल 2010 में इस कंपनी की शुरुआत नकदी रहित लेनदेन के विकल्प के रूप में हुई थी.

    लेकिन भारतीय उपभोक्ताओं की नकदी पर अधिक निर्भरता के कारण उसके सामने काफ़ी कठिनाइयां थीं.

    छह सालों में इसके 12.5 करोड़ उपयोगकर्ता थे. हालांकि, इसको छोटी दुकानों और व्यापारियों के साथ जोड़ भी दिया गया लेकिन फिर भी लेनदेन की संख्या काफ़ी कम रही थी.

    लेकिन नोटबंदी की घोषणा के तीन महीने बाद ही इसके उपयोगर्ताओं में 50 फ़ीसदी की बढ़ोतरी हुई.

  • जामिआ मिल्लिया इस्लामिआ के साथ भेदभाव को लेकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नाम खुला खत .

    सेवा,
    श्री नरेंद्र मोदी,
    माननीय प्रधान मंत्री,
    साउथ ब्लॉक,
    रायसीना हिल्स
    नई दिल्ली -110001

    आदरणीय प्रधानमंत्री साहब,

    मैं एक गंभीर मामले की ओर आपका ध्यान आकर्षित करना चाहता हूं जो हमारे देश के भविष्य के सम्बंध में है।

    जामिया मिलिया इस्लामिया, एक केंद्रीय विश्वविद्यालय जिसका सपना स्वतंत्रता संग्राम के दौरान देखा गया था और आंदोलन के कर्ता-धर्ताओं द्वारा इसे एक निश्चित रूप दिया गया था, इस वर्ष यह शताब्दी वर्ष मना रहा है।
    चौतरफा उत्कृष्टता हासिल करने में जामिया के अथक प्रयासों का फल मिला है और विश्वविद्यालय ने MHRD मूल्यांकन में पहला स्थान हासिल किया है। जामिया ने अंतर्राष्ट्रीय रैंकिंग में अपनी स्थिति में उल्लेखनीय सुधार किया है। ये उपलब्धियां छात्रों, शिक्षकों, प्रशासन और कर्मचारियों की कड़ी मेहनत के कारण संभव हो पाई हैं।
    इस तरह के प्रभावशाली एवं उल्लेखनीय उपलब्धियों के बावजूद, यह जानकर निराशा होती है कि केंद्र सरकार उस संस्था को सहयोग नहीं दे रही है, जो न केवल शिक्षा के क्षेत्र में उत्कृष्टता हासिल करती है, बल्कि राष्ट्र निर्माण में भी योगदान देती है।

    सौ साल पूरे करने वाली संस्था को 100 करोड़ रुपये का विशेष अनुदान देने का हमारे देश में चलन रहा है।  इस फंड का उपयोग शैक्षिक बुनियादी ढांचे को और मजबूत करने के लिए किया जाता है। हालांकि, जामिया मिलिया इस्लामिया को 100 साल की एक बहुत ही सफल और ऐतिहासिक पारी को पूरा करने के अवसर पर कोई भी शताब्दी वित्तीय अनुदान नहीं मिला। शिक्षक दिवस के अवसर पर, जामिया टीचर्स एसोसिएशन (JTA) ने भी विश्वविद्यालय के बुनियादी ढांचे और शैक्षणिक और शोध सुविधाओं में सुधार के लिए 100 करोड़ रुपये के अनुदान को जारी करने के लिए आपसे अनुरोध किया था। हालाँकि इस सम्बंध में आप की तरफ़ से आज तक कोई पहल नहीं हुई है।

    जामिया से एक और महत्वपूर्ण अनुरोध है जो लंबे समय से सरकार के पास लंबित है। विश्वविद्यालय ने केंद्र सरकार से अनुरोध किया था कि वह मेडिकल कॉलेज और अस्पताल स्थापित करने की अनुमति दे।  मेडिकल कॉलेज और अस्पताल की स्थापना से राष्ट्रीय स्वास्थ्य क्षेत्र को बेहतर बनाने के साथ-साथ उच्च गुणवत्ता वाले डॉक्टरों को तैयार करने में मदद मिलेगी। मैं आपसे जामिया को मेडिकल कॉलेज और अस्पताल स्थापित करने की अनुमति देने का अनुरोध करूंगा। यह निर्णय राष्ट्रीय राजधानी में सस्ती कीमत पर गुणवत्तापूर्ण चिकित्सा सेवाओं के लिए लगातार बढ़ती आवश्यकता को संभालने में मदद करेगा।

    जामिया भी MHRD/ UGC द्वारा नियमित धन जारी करने में लंबे समय से संघर्ष कर रहा है। इसके बकाया बिलों का एक अंबार लगा हुआ है, जिसमें चिकित्सा प्रतिपूर्ति बिल शामिल हैं जो करोड़ों की राशि के हैं। शिक्षक बड़ी मुश्किल में हैं क्योंकि सरकार उनके वास्तविक मुद्दों की लगातार अनदेखी कर रही है। धन की कमी ने जामिया को विशेष विषयों के लिए रिक्त पदों / पदों को भरने से रोक दिया है।  वित्तीय संकट के कारण विश्वविद्यालय वर्तमान सत्र में लगभग 200 शिक्षकों, अतिथि / संविदात्मक संकायों की भर्ती नहीं कर सका। जामिया प्रशासन को अनुसंधान विद्वानों को शिक्षण भार सौंपने के लिए मजबूर किया गया है। आप इस बात को मानेंगे कि ऐसा ज़्यादा समय तक नहीं चल पाएगा क्योंकि यह विश्वविद्यालय में अध्येताओं के शिक्षण और शोध की गुणवत्ता पर प्रतिकूल प्रभाव डालेगा। Covid-19 के बीच यह पीएचडी के छात्रों पर एक अतिरिक्त मनोवैज्ञानिक बोझ डालेगा। छात्र: शिक्षक अनुपात और आने वाले वर्षों में विश्वविद्यालय की रैंक पर प्रतिकूल प्रभाव डाल सकता है।

    इसलिए, मैं आपसे जामिया मिलिया इस्लामिया को देय धनराशि जारी करने के लिए एमएचआरडी को निर्देशित करने का अनुरोध करता हूं।

    जामिया का महात्मा गांधी के साथ एक लंबा और ऐतिहासिक संबंध रहा है। जनवरी 1925 में, जब जामिया को धन की कमी के कारण बंद होने का खतरा था, तो गांधीजी ने हकीम अजमल खान से कहा, “आप को रूपये की दिक़्क़त है तो मैं भीख माँग लूँगा लेकिन जामिया बंद नहीं होनी चाहिये।” हमारे राष्ट्रपिता जामिया को चलाने के लिए भीख मांगने के लिए तैयार थे, लेकिन दुर्भाग्य से आज इस संस्था को आर्थिक रूप से घुटन देने का प्रयास किया जा रहा है।
    मैं यह सुनिश्चित करने के लिए आपके हस्तक्षेप की मांग करता हूं कि जामिया मिलिया इस्लामिया के साथ भेदभाव नहीं किया जाए और उसे इसका हक दिया जाए क्योंकि एक राष्ट्र का भविष्य उसके युवा को दी जाने वाली शिक्षा की गुणवत्ता पर निर्भर करता है जो हमारे द्वारा स्थापित और चलाए जा रहे संस्थानों की गुणवत्ता पर निर्भर करता है। एक शैक्षिक संस्थान में निवेश एक राष्ट्र के भविष्य में निवेश है।

    आशा है कि आप विश्वविद्यालयों, कॉलेजों और शोध केंद्रों को समयबद्ध तरीके से धनराशि जारी करने को सुनिश्चित करके एक शिक्षित समाज के निर्माण करने की अपनी प्रतिबधिता को प्रदर्शित करेंगे।

    हार्दिक शुभकामनाओं सहित,

    सादर,

    (कुंवर दानिश अली)

  • उमर ख़ालिद की गिरफ़्तारी पर जयपुर में विरोध प्रदर्शन, उठी UAPA रद्द करने की गूंज।

    जयपुर। भारत की राजधानी दिल्ली में फ़रवरी में हुए नागरिकता कानून (CAA) के विरोध प्रदर्शन के बाद नॉर्थ ईस्ट दिल्ली के कई इलाकों में भड़के सांप्रदायिक दंगों के मामले में दिल्ली पुलिस ने बीते रविवार जेएनयू के पूर्व छात्र नेता उमर खालिद को गिरफ्तार कर लिया। खालिद पर अवैध गतिविधि रोकथाम अधिनियम (UAPA) के अलावा 18 अन्य धाराएँ लगाई गई हैं जिसके बाद उन्हें सोमवार को 10 दिन की पुलिस रिमांड पर भेज दिया गया है।

    उमर की गिरफ्तारी के बाद देश के कई हिस्सों से तमाम जानी मानी हस्तियों और सामाजिक कार्यकर्ताओं ने पुलिस की इस कार्यवाही के खिलाफ विरोध दर्ज करवाया, इसी क्रम में मंगलवार (15 सितंबर) को जयपुर के गांधी सर्किल पर प्रदेश की स्टूडेंट कम्युनिटी की तरफ से विरोध प्रदर्शन किया गया।

    प्रदर्शन में विरोध दर्ज कराने पहुंची CPI नेता निशा सिद्धू ने कहा कि, दिल्ली दंगों में पुलिस की कार्यवाही पूर्वाग्रह से ग्रसित है, जिसको गिरफ्तार करना चाहिए वो तो खुलेआम घूम रहे हैं। पुलिस तमाम छात्रों और कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर हमारी आवाज़ दबाना चाहती है, जो लोकतंत्र में संभव नहीं है।

    वहीं मजदूर किसान शक्ति संगठन के मुकेश गोस्वामी ने कहा कि, देश के प्रधानमंत्री तानाशाह की तरह व्यवहार कर रहे हैं और दिल्ली पुलिस दंगा भड़काने वालों की चापलूसी कर रही है जिसकी आड़ में निर्दोष लोगों को जेलों में भरा जा रहा है. उन्होंने राजस्थान पुलिस पर सवाल उठाते हुए कहा कि” अशोक गहलोत और अमित शाह की पुलिस में कोई फ़र्क़ नहीं रह गया. कांग्रेस को समझ लेना चाहिए कि उन्हें अब प्रताड़ितों के साथ खड़ा होना ही होगा”। इसके साथ ही राजस्थान समग्र सेवा संघ के सवाई सिंह का कहना था कि देश में लोकतंत्र का गला घोटा जा रहा है, विरोध की आवाज़ उठाने वाले देशद्रोही बनाये जा रहे हैं।

    मालूम हो कि उमर खालिद पर CAA के खिलाफ दिल्ली में दंगा फैलाने की साजिश के आरोप लगे हैं। पुलिस के मुताबिक खालिद ने अमेरिका राष्ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप की यात्रा के दौरान लोगों से सड़कों पर उतरने की अपील की थी। हालाँकि दिल्ली पुलिस की दंगों पर की जा रही जाँच पर सवाल उठ रहे हैं।

    सामाजिक कार्यकर्ता राशिद हुसैन ने कहा की “ नागरिकता संशोधन अधिनियम के ख़िलाफ़ पूरे देश में शांति पूर्वक विरोध प्रदर्शन हुए जिसमें सभी धर्मों की संविधान संरक्षण की वकालत करने वाले लोग शामिल हुए. लेकिन भाजपा नेताओं ने अनर्गल बयान दिए जिससे साम्प्रदायिकता बढ़ी और दंगे भड़क उठे.” वहीं विरोध प्रदर्शन में नागरिक मंच से अनिल गोस्वामी, CPM नेता संजय माधव, AIRSO नेता रितांश आज़ाद, राशिद हुसैन, विजय स्वामी, मानस भूषण, अहमद कासिम जैसे कई सामाजिक कार्यकर्ता मौजूद रहे।

  • तीन किसान बिलों का विरोध करेगा अकाली दल, सांसदों को विरोध में वोटिंग का व्हिप जारी किया, 10 बातें..

    किसानों से संबंधित तीन विधेयकों (farm sector bills)को लेकर पंजाब के किसानों में असंतोष बढ़ता जा रहा है. केंद्र की एनडीए सरकार के सहयोगी अकाली दल (Akali Dal)ने इस मामले में अपने सांसदों को व्हिप जारी किया और संसद के मॉनसून सत्र में आने वाले इन विधेयकों के खिलाफ वोट करने को कहा है.

    किसानों से संबंधित तीन विधेयकों (farm sector bills)को लेकर पंजाब के किसानों में असंतोष बढ़ता जा रहा है. केंद्र की एनडीए सरकार के सहयोगी अकाली दल (Akali Dal)ने इस मामले में अपने सांसदों को व्हिप जारी किया और संसद के मॉनसून सत्र में आने वाले इन विधेयकों के खिलाफ वोट करने को कहा है. इन विधेयकों को किसान विरोधी करार देते हुए राज्‍य के किसानों ने मांग की है कि इन्‍हें वापस लिया जाए. किसानों ने चेतावनीभरे लहजे में कहा है कि पंजाब का जो भी सांसद इन विधेयकों का पार्लियामेंट में समर्थन करेगा, उसे गांवों ने घुसने नहीं दिया जाएगा.

    1. पूरे पंजाब में किसान इन विधेयकों के खिलाफ प्रदर्शन कर रहे हैं और इसके खिलाफ रास्‍ता जाम कर रहे हैं. भारतीय किसान यूनियन (लखोवाल) के महासचिव हरिंदर सिंह ने इन बिलों को ‘कोरोना वायरस से भी बदतर’ बताया है. उन्‍होंने कहा कि यदि इन्‍हें लागू किया गया तो किसान, आढ़तिये और कृषि मजदूर बुरी तरह प्रभावित होंगे.
    2. किसानों ने चेतावनीभरे लहजे में कहा है कि पंजाब का जो भी सांसद इन विधेयकों का पार्लियामेंट में समर्थन करेगा, उसे गांवों ने घुसने नहीं दिया जाएगा.
    3. केंद्र सरकार संसद के मौजूदा मानसून सत्र में किसानों से संबंधित कृषक उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा प्रदान करना) विधेयक, 2020, कृषक (सशक्तिकरण और संरक्षण) मूल्य आश्वासन और कृषि सेवा पर करार विधेयक और आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक, 2020 लेकर आई है। आवश्यक वस्तु (संशोधन) विधेयक मंगलवार को लोकसभा से पारित हो गया।
    4. शिरोमणि अकाली दल के नेता सुखबीर सिंह बादल ने इस पर चर्चा में कहा था कि इस कानून को लेकर पंजाब के किसानों, आढ़तियों और व्यापारियों के बीच बहुत शंकाएं हैं. सरकार को इस विधेयक और अध्यादेश को वापस लेना चाहिए.
    5. शिरोमणि अकाली दल (SAD)के नेताओं ने मंगलवार को बीजेपी प्रमुख जेपी नड्डा से मुलाकात कर आग्रह किया था कि केंद्र सरकार को कृषि से संबंधित इन तीन विधेयकों पर किसानों की चिंताओं का निराकरण करना चाहिए. पार्टी ने इन विधेयकों को संसदीय समिति में भेजने की मांग की थी.
    6. शिरोमणि अकाली दल के विरोध के बारे में पूछे गए एक सवाल के जवाब में नड्डा ने कहा, ‘‘हम उनके साथ बातचीत कर रहे हैं. सारी चीजों के बारे में जानकारियां भी दे रहे हैं. बात भी हो रही है और चर्चा भी कर रहे हैं. अभी से नहीं, लगातार हो रही है. उनकी चिंताओं को ध्‍यान में रखा जाएगा. चर्चा के माध्यम से ही हम आगे बढ़ रहे हैं और आगे बढ़ेंगे.”
    7. बीजेपी प्रमुख जेपी नड्डा ने कहा कि किसानों से संबंधित जिन तीन विधेयकों को केंद्र सरकार संसद में लेकर आई है वे बहुत ही क्रांतिकारी हैं, जमीनी स्तर पर परिवर्तन लाने वाले हैं और किसानों की तस्वीर बदलने वाले हैं.
    8. पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने भी कहा है कि संसद में पेश किए गए कृषि क्षेत्र से संबंधित विधेयकों से इस सीमावर्ती राज्य में ‘‘अशांति और असंतोष” फैल सकता है जो कि पहले ही पाकिस्तान द्वारा अशांति फैलाने की हरकतों से लगातार जूझ रहा है.
    9. सीएम अमरिंदर ने इस संबंध में राज्यपाल वी पी सिंह बदनौर को एक ज्ञापन सौंपने के लिए कांग्रेस प्रतिनिधिमंडल की अगुवाई की और केन्द्र संसद में इन विधेयकों को आगे नहीं बढ़ाए, इस पर उनसे हस्तक्षेप करने का अनुरोध किया.
    10.  इस मौके पर सीएम अमरिंदर के साथ पंजाब कांग्रेस प्रमुख सुनील जाखड़ और अन्य लोग मौजूद थे. सीएम ने राज्यपाल से कहा कि राष्ट्रव्यापी संकट के बीच वर्तमान खरीद प्रणाली के साथ किसी भी प्रकार की छेड़छाड़ से राज्य के किसानों के बीच ‘‘सामाजिक अशांति” पैदा हो सकती है.

  • उर्मिला मातोंडकर का कंगना रनौत पर निशाना, बोलीं-फिल्म इंडस्ट्री नशेड़ी है तो पीएम मोदी ने मिलने के लिए क्यों बुलाया

    उर्मिला मातोंडकर (Urmila Matondkar) ने कंगना रनौत (Kangana Ranaut) के बयानों को अशोभनीय करार देते हुए उनपर निशाना साधा.

    नई दिल्ली: सुशांत सिंह राजपूत (Sushant Singh Rajput) के निधन के बाद से ही समूचे बॉलीवुड गलियारे पर निशाना साधा जा रहा है. एक्ट्रेस कंगना रनौत (Kangana Ranaut) के बयान लगातार मीडिया की सुर्खियों में हैं. हाल ही में जया बच्चन (Jaya Bachchan) ने बॉलीवुड को निशाना बनाए जाने पर संसद में बयान दिया. उन्होंने बिना नाम लिए कहा था कि कुछ लोग जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं. जया बच्चन के इस बयान पर कंगना रनौत (Kangana Ranaut) ने ट्वीट कर कहा कि कौन सी थाली दी है जया जी और उनकी इंडस्ट्री ने? ये मेरी अपनी थाली है जया जी आपकी नहीं. अब इस पूरे मामले पर बॉलीवुड एक्ट्रेस उर्मिला मातोंडकर (Urmila Matondkar) ने एनडीटीवी से खास बातचीत की है और अपने विचार रखे हैं.

    उर्मिला मातोंडकर (Urmila Matondkar) ने कहा: “अगर हमारी इंडस्ट्री नशेड़ियों का अड्डा है तो इतने सालों तक कैसे देश की सबसे बड़ी इंडस्ट्री रह पाई. इस इंडस्ट्री में बड़े-बड़े लोग आए और फिल्मों के जरिए देश को नई दिशा दी. राज कपूर और दिलीप कुमार जैसे कई बड़े कलाकारों ने देश के लिए शानदार फिल्में बनाईं. बॉलीवुड पूरे विश्व में सबसे बड़ी इंडस्ट्री है. तनी बड़ी नशेड़ी इंडस्ट्री इस मुकाम पर पहुंची है तो जरूर कोई बात होगी. पीएम मोदी (PM Modi) ने इसी नसेड़ी इंडस्ट्री को मिलने के लिए बुलाया था. उन्होंने कलाकारों से महात्मा गांधी के विचारों को आदगे बढ़ाने के लिए कहा था. अगर इंडस्ट्री में सब नशेड़ी हैं तो पीएम मोदी ने उनका साथ क्यों मांगा था.”

    उर्मिला मातोंडकर (Urmila Matondkar) ने कंगना रनौत (Kangana Ranaut) के बयानों को अशोभनीय करार देते हुए उनपर निशाना साधा. उन्होंने  कहा: “मुझे लगता है कि उन्होंने कई बार गलत टिप्पणी की हैं, जो अशोभनीय है. उन्होंने मुंबई को पीओके कहा और साथ ही मुंबई पुलिस पर भी सवाल उठाया. जया बच्चन ने उनके जन्म से पहले काम किया है. उन्होंने हमेशा समाज के लिए आवाज उठाई है और सही बात की है. अभद्र भाषा का प्रयोग नहीं करना चाहिए. लोग समझेंगे और सच्चाई जानेंगे.”

    उर्मिला मातोंडकर (Urmila Matondkar) ने आगे कहा कि फिल्म इंडस्ट्री पर सवाल उठा है तो मैं सामने आई हूं. जिनके करोड़ों रुपये लगे होते हैं वो डर से पीछे हटे हैं इसलिए वो बात नहीं कर रहे हैं. कुछ लोगों से निजी दुश्मनी की वजह से पूरी इंडस्ट्री को बदनाम करना गलत बात है. उर्मिला मातोंडकर ने कहा कि अगर कंगना के पास कोई ड्रग मामले में सबूत है तो नारकोटिक्स डिपार्मेंट को सौंपना चाहिए.

  • बाबरी विध्वंस : फैसला 30 सितंबर को, कोर्ट ने आडवाणी, उमा समेत सभी 32 आरोपियों को मौजूद रहने को कहा

    बाबरी विध्वंस मामले में लखनऊ में सीबीआई की स्पेशल कोर्ट 30 सितंबर को फैसला सुनाने वाली है. कोर्ट ने मामले में सभी 32 मुख्य आरोपियों को इस दिन सुनवाई में शामिल होने को कहा है.

    बाबरी विध्वंस मामले में (Babri Demolition Case) लखनऊ में सीबीआई की स्पेशल कोर्ट (CBI Special Court) 30 सितंबर को फैसला सुनाने वाली है. कोर्ट ने मामले में सभी 32 मुख्य आरोपियों को इस दिन सुनवाई में शामिल होने को कहा है. इनमें भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेताओं जैसे- लालकृष्ण आडवाणी, उमा भारती, मुरली मनोहर जोशी और कल्याण सिंह भी शामिल हैं. इस केस में स्पेशल सीबीआई सीबीआई जज एसके यादव फैसला सुनाने वाले हैं.

    इसके पहले स्पेशल जज ने 22 अगस्त को ट्रायल का स्टेटस रिपोर्ट देखने के बाद मामले की सुनवाई पूरी करने की समय सीमा को एक महीना बढ़ाकर 30 सितंबर तक कर दिया था. कोर्ट ने ट्रायल पूरी करने के लिए 31 अगस्त तक का वक्त दिया था. मामले में दो सितंबर से फैसला लिखना शुरू किया जाना था. सुनवाई के दौरान वरिष्ठ वकील मृदल राकेश, आईबी सिंह और महिपाल अहलूवालिया ने आरोपियों की तरफ से मौखिक दलीलें पेश की. इसके पहले कोर्ट ने नाराजगी जताई थी कि बचाव पक्ष अपना लिखित जवाब दाखिल नहीं कर रहा. स्पेशल जज ने बचाव पक्ष के वकील से कहा था कि अगर वह मौखिक रूप से कुछ कहना चाहते हैं तो 1 सितंबर तक कह सकते हैं, वरना उनके मौके खत्म हो जाएंगे.

    इसके बाद सीबीआई के वकीलों ललित सिंह, आर.के. यादव और पी. चक्रवर्ती ने भी मौखिक दलीलें दीं थीं. सीबीआई सुनवाई के दौरान आरोपियों के खिलाफ 351 गवाहों और लगभग 600 दस्तावेज प्रस्तुत कर चुकी है. अदालत को फैसला करने में सीबीआई के गवाहों और दस्तावेजों पर गौर करना है. एजेंसी पहले ही 400 पेजों की लिखित बहस दाखिल कर चुकी है.

    बता दें कि बाबरी मस्जिद को कारसेवकों ने दिसंबर, 1992 में ढहाया था. उनका दावा था कि अयोध्या में यह मस्जिद भगवान राम के ऐतिहासिक राम मंदिर के स्थान पर बनाई गई थी. बाबरी विध्वंस मामले में अदालत का फैसला 28 साल बाद आ रहा है.

  • कंगना रनौत ने किया जया बच्चन पर पलटवार तो स्वरा भास्कर बोलीं- शर्मनाक, बड़ों की इज्जत करना…

    कंगना रनौत (Kangana Ranaut) को अब स्वरा भास्कर (Swara Bhasker) ने जवाब दिया है. स्वरा भास्कर ने कंगना रनौत के ट्वीट का जवाब देते हुए कहा कि शर्मनाक कमेंट. बड़ों की इज्जत करना भारतीय संस्कृति का पहला सबक है और तुम तो कथित राष्ट्रवादी हो.

    नई दिल्‍ली: जया बच्चन (Jaya Bachchan) ने बीते दिन बीजेपी सांसद रवि किशन और कंगना रनौत (Kangana Ranaut) को आडे़ हाथों लेते हुए कहा था कि जिस थाली में खाते हैं उसी में छेद करते हैं. जया बच्चन के इस बयान को लेकर कंगना रनौत ने भी उनपर पलटवार किया. उन्होंने ट्वीट कर कहा था कि कौन सी थाली दी है जया जी और उनकी इंडस्ट्री ने? ये मेरी अपनी थाली है जया जी आपकी नहीं. कंगना रनौत की इस बात पर अब स्वरा भास्कर (Swara Bhasker) ने भी जवाब दिया है. स्वरा भास्कर ने कंगना रनौत के ट्वीट का जवाब देते हुए कहा कि शर्मनाक कमेंट. बड़ों की इज्जत करना भारतीय संस्कृति का पहला सबक है और तुम तो कथित राष्ट्रवादी हो.

    कंगना रनौत (Kangana Ranaut) के ट्वीट पर स्वरा भास्कर (Swara Bhasker) ने उन्हें जवाब देते हुए लिखा, “शर्मानक कमेंट, कृप्या बस करो अब. अपने जहन की गंदगी खुद तक सीमित रखो. गाली देनी है तो मुझे दो. मैं तुम्हारी बकवासें खुशी-खुशी सुनूंगी और यह कीचड़ कुश्ती लड़ूंगी तुम्हारे साथ. बड़ों की इज्जत भारती संस्कृति का पहला सबक है- और तुम तो कथित राष्ट्रवादी हो.” स्वरा भास्कर का यह ट्वीट खूब वायरल हो रहा है, साथ ही लोग इसपर जमकर कमेंट भी कर रहे हैं. बता दें कि स्वरा भास्कर ने कंगना रनौत के ट्वीट को रिट्वीट करते हुए यह जवाब दिया.

    बता दें कि स्वरा भास्कर और कंगना रनौत (Kangana Ranaut) एक साथ फिल्म ‘तनु वेड्स मनु’ में एक साथ नजर आई थीं. वहीं, कंगना रनौत की बात करें तो उन्होने जया बच्चन (Jaya Bachchan) पर पलटवार करते हुए लिखा, “कौन सी थाली दी है जया जी और उनकी इंडस्ट्री ने? एक थाली मिली थी, जिसमें दो मिनट के रोल आइटम नम्बर्ज़ और एक रोमांटिक सीन मिलता था. वो भी हेरो के साथ सोने के बाद, मैंने इस इंडस्ट्री को फेमिनिज्म सिखाया, थाली देश भक्ति नारीप्रधान फिल्मों से सजाई, यह मेरी अपनी थाली है जया जी आपकी नहीं.” बता दें कि बीते दिन जया बच्चन ने बॉलीवुड को लेकर राज्यसभा में बयान दिया था.

     

     

  • मुख्यमंत्री अशोक गहलोत धीरे धीरे सचिन पायलट खेमे को कमजोर करने मे कामयाब होते नजर आ रहे है!

    अशफाक कायमखानी।

    जयपुर।राजस्थान कांग्रेस मे पीछले दो महीनों की उठा-पटक के बाद कांग्रेस हाईकमान द्वारा गहलोत-पायलट खेमे को एकजुट करने का संकेत देने के बावजूद दोनो नेताओं मे चली आ रही अदावत का रुप बदलने के बावजूद उसी तरह अदावत आज भी जारी है। पहले उक्त दोनो नेताओं मे मुकाबला उन्नीस-बीस का था लेकिन जब से पायलट से उपमुख्यमंत्री व प्रदेश अध्यक्ष पद छीना गया है तब से मुख्यमंत्री गहलोत का पलड़ा काफी भारी होता नजर आ रहा है।

    पार्टी कार्यकर्ताओं व जनता की भावनाओं के विपरीत केवल मात्र विधायकों को खुश रखकर उनके बल पर अपनी सरकार चलाकर जैसे तैसे करके पूरे पांच साल मुख्यमंत्री पद पर चिपके रहने के माहिर अशोक गहलोत पीछले अपने दो मुख्यमंत्री कार्यकाल के बाद आम चुनाव मे कांग्रेस के बूरी तरह हारने से कोई सबक लिये बीना इस दफा भी उन सब पुरानी गलतियों से बढकर अब भी गलती कर रहे है जो पहले करते आये है। गहलोत सरकार के गठन को करीब दो साल होने को आने के बाद भी आम जनता मे इस बात पर एक राय है कि अगले आम विधानसभा चुनाव मे कांग्रेस का बूरी तरह हारना तय है केवल बहस इस बात पर हो रही है कि कांग्रेस दस सीट तक जीत पायेगी या नही।

    गहलोत जब जब मुख्यमंत्री बनकर सत्ता मे आये है तब तब उन्होंने अपनी विपक्षी पार्टी भाजपा को कमजोर करने की बजाय अपने ही दल मे उनके स्वयं के मुकाबले उभरने वाले नेताओ को कमजोर करने मे सत्ता के पावर की ताकत का भरपूर उपयोग करते आये है। गहलोत अपने इस वर्तमान कार्यकाल मे भी पुराने इतिहास को दोहराते हुये शूरुआत से ही सचिन पायलट को राजनीतिक तौर पर कमजोर करने मे अपनी पुरी ताकत लगाते आ रहे। सचिन पायलट को कमजोर करने मे अशोक गहलोत को अब तक काफी कामयाबी भी मिलती नजर आ रही है।

    1998 मे अशोक गहलोत के पहली दफा मुख्यमंत्री बनने के बाद उनको अब तक प्रदेश अध्यक्ष के रुप मे केवल सीपी जोशी व सचिन पायलट से ही चेलेंज मिल पाया था। वर्तमान अध्यक्ष डोटासरा सहित बाकी सभी बने अध्यक्ष गहलोत की दया के पात्र के तौर पर ही साबित हुये व हो रहे है। यानि जोशी व पायलट को छोड़कर बाकी सभी की स्वयं विवेक अनुसार राय ना होकर वही राय रही जो मुख्यमंत्री गहलोत की राय रही व है।

    मुख्यमंत्री गहलोत अपने मुकाबिल कांग्रेस मे खड़े होने वाले सचिन पायलट को कमजोर करने मे तब से लगे हुये थे जब वो प्रदेश अध्यक्ष बने थे। अभी दो महीने पहले सम्पन्न राज्यसभा चुनाव के समय सचिन पायलट को कमजोर करने का मुख्यमंत्री गहलोत का पहला प्रयास विफल होने के बावजूद लगातार मोके की तलाश मे गहलोत रहे। दुसरा प्रयास पायलट व कुछ विधायको के दिल्ली जाने की खबर के साथ अपने खास महेश जोशी द्वारा ऐसीबी व एसओजी मे 124-A सहित अन्य गम्भीर आरोपो मे प्राथमिकी दर्ज करने के बाद अपने समर्थक विधायकों की बाड़ेबंदी करके अपने पक्ष व पायलट के विरोध मे माहोल बना कर अचानक पायलट को उपमुख्यमंत्री व प्रदेश अध्यक्ष पद से हटाकर अपने पिछलग्गू गोविंद डोटासरा को अध्यक्ष बनाकर बडी कामयाबी हासिल करके पायलट खेमे की कमर तोड़ दी। इसके बाद पायलट, रमेश मीणा व विश्वेंद्र सिंह के मंत्री पद से हटने के बाद 13-सितम्बर को जिले के प्रभारी मंत्रियों का जिला बदलकर इस तरह कामयाबी पाई कि पायलट व उनके समर्थक विधायकों के प्रभुत्व वाले जिलो का प्रभारी मंत्री उनको बना दिया जो मुख्यमंत्री के खासम खास है।जो अब मुख्यमंत्री की मंशा अनुसार रिपोर्ट तैयार करते रहने के साथ साथ पायलट खेमे पर नजदीक से नजर रख पायेंगे।इससे उन जिलो मे धीरे धीरे पायलट समर्थक विधायकों का प्रभाव भी कम किया जा सकेगा।

    मुख्यमंत्री गहलोत द्वारा अब तमाम राजनीतिक नियुक्तियों का कार्य भी जल्द पुरा कर लेने की सम्भावना है। पहले प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट राजनीतिक नियुक्तियों के मनोनयन मे गहलोत से अलग मत रखकर हिस्सेदारी की बात करते थे। अब डोटासरा के अध्यक्ष बनने के बाद गहलोत की बल्ले बल्ले है। अब मुख्यमंत्री स्तर पर होने वाले तमाम फैसलो मे डोटासरा की केवल मात्र हां होगी , किसी तरह की ना नुकर किसी हालत मे डोटासरा की नही होना माना जा रहा है।

    कांग्रेस के केन्द्रीय स्तर पर सगठन मे पीछले दिनो हुये बदलाव मे सचिन पायलट को दूर रखकर अशोक गहलोत को बडी सफलता मिलना माना जा रहा है। अब मुख्यमंत्री राजस्थान मे होने वाली राजनीतिक नियुक्तियों मे पायलट समर्थकों को पूरी तरह किनारे लगाते हुये अपने खास लोगो का मनोनयन करके करने जा रहे है। मुख्यमंत्री स्तर पर चयनित नामो पर हां कहना ही वर्तमान प्रदेश अध्यक्ष के पास केवल मात्र विकल्प माना जा रहा है।

    कुल मिलाकर यह है कि मुख्यमंत्री गहलोत अपना बचा कार्यकाल भी जनता की भावनाओं की परवाह किये वगैर केवल मात्र विधायकों को खूश रखने के वो सब काम करेगे जो जरुरी है। साथ ही वो अब पार्टी की मजबूती के बजाय सचिन पायलट को निचले पायदान पर धकेलने के प्रयास को तेजी देगे। फिर भी देखते है कि गहलोत-पायलट मे तू ढाल ढाल मै पात पात की जंग मे कोन कितना एक दुसरे को कमजोर कर पाते है।

  • कानपुर में कोरोना से मरने वालों की संख्या यूपी में सबसे ज़्यादा, क्या है वजह?

    लखनऊ में एक न्यूज़ चैनल के रिपोर्टर रहे 30 साल के युवा शख़्स की कानपुर में कोरोना से बीते दिनों मौत हो गई. कोरोना वायरस के संक्रमण की पुष्टि होने के बाद से वह कानपुर में अपने घर पर ही होम आइसोलेशन में थे.

    कोरोना पॉज़िटिव रिपोर्ट आने के चौथे दिन उनकी तबीयत बिगड़ने लगी. जिसके बाद उन्हें पहले एक प्राइवेट कोविड अस्पताल में भर्ती कराया गया. हालत में सुधार नहीं होने पर कानपुर कैंट में स्थित सेवन एयरफ़ोर्स हॉस्पिटल में रेफ़र कर दिया गया

    परिवार वालों के मुताबिक़ इलाज के दौरान उन्हें दो बार प्लाज़्मा थेरेपी दी गई, साथ ही रेमडेसिवीर इंजेक्शन भी लगाए लगे. उन्हें लगातार वेंटीलेटर पर ही रखा गया. उनके बड़े भाई ऋषि शुक्ला बताते हैं कि रात तक डॉक्टर्स ने भाई की हालत स्थिर होने की जानकारी दी थी, लेकिन सुबह जब वह अस्पताल पहुंचे तो उनको भाई की मौत की ख़बर मिली.

    शुक्ला परिवार जिस असमय दुख के दौर से गुज़र रहा है, वैसा दुख कानपुर के कई परिवारों को झेलना पड़ रहा है और हर दिन उनकी संख्या बढ़ती जा रही है.

    भारत के सबसे बड़े राज्य उत्तर प्रदेश में कोरोना संक्रमण से सबसे ज़्यादा मौतें कानपुर में ही हुई हैं. हालांकि, प्रदेश की राजधानी लखनऊ बहुत पीछे नहीं है. 12 सितंबर तक कोरोना से कानपुर में 527 लोगों की मौत हो चुकी है, जबकि लखनऊ में 516 लोगों की.

    लेकिन कानपुर की स्थिति इसलिए भी ज़्यादा गंभीर है क्योंकि लखनऊ की तुलना में कोरोना संक्रमण के मरीज़ों की संख्या कानपुर में आधी है. रविवार को लखनऊ में जहां 847 नए संक्रमण के मामले सामने आए वहीं, कानपुर में महज़ 338. लखनऊ में कुल सक्रिय मरीज़ों की संख्या नौ हज़ार से ज़्यादा है जबकि कानपुर में 4500 से ज़्यादा.

    इस हिसाब से देखें तो 12 सितंबर तक कानपुर में कोरोना से होने वाली मृत्यु दर 2.65 प्रतिशत है जबकि लखनऊ में मृत्युदर 1.31 प्रतिशत है. मृत्युदर के हिसाब से कानपुर के बाद यूपी में मेरठ दूसरे नंबर पर है जहां कोरोना संक्रमण से होने वाली मृत्युदर 2.63 प्रतिशत है. अभी तक वहां 171 लोगों की मौत हुई है.

     

     

  • उत्तर प्रदेश की योगी सरकार विशेष सुरक्षा बल के गठन को लेकर घिरी

    उत्तर प्रदेश सरकार ने रविवार को विशेष सुरक्षा बल के गठन की अधिसूचना जारी कर दी, जिसके तहत सुरक्षा बलों को किसी भी व्यक्ति को बिना वारंट गिरफ़्तार करने, तलाशी लेने और ऐसे ही कई असीमित अधिकार मिल जाएँगे.

    विशेष सुरक्षा बलों की तैनाती शुरुआत में सरकारी इमारतों, धार्मिक स्थलों जैसी महत्वपूर्ण जगहों पर होगी और निजी क्षेत्र के प्रतिष्ठान भी पैसे देकर इनकी सेवाएँ ले सकेंगे.

    हाल ही में विधानसभा के संक्षिप्त मॉनसून सत्र में इस विधेयक को पारित किया गया था और फिर राज्यपाल की मंज़ूरी मिलने के बाद इसे लागू करने की अधिसूचना जारी कर दी गई है.

    उत्तर प्रदेश के अपर मुख्य सचिव (गृह) अवनीश अवस्थी ने विशेष सुरक्षा बल के गठन की अधिसूचना जारी करते हुए बताया कि इसका मुख्यालय लखनऊ में होगा और अपर पुलिस महानिदेशक स्तर के अधिकारी इस विशेष पुलिस बल के प्रमुख होंगे.

    अपर मुख्य सचिव अवनीश अवस्थी ने बताया कि यूपी एसएसएफ़ के पास इलाहाबाद हाईकोर्ट, लखनऊ खंडपीठ, ज़िला न्यायालयों, राज्य सरकार के महत्वपूर्ण प्रशासनिक कार्यालयों, पूजा स्थलों, मेट्रो रेल, हवाई अड्डों, बैंकों और वित्तीय संस्थाओं, औद्योगिक प्रतिष्ठानों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी होगी.

    पैसे देकर निजी क्षेत्र के प्रतिष्ठान भी इसकी सेवाएँ ले सकेंगे और उन परिस्थितियों में भी पुलिस बल के ये असीमित अधिकार बने रहेंगे.

    अधिनियम के अनुसार अगर विशेष सुरक्षा बल के सदस्यों को यह विश्वास हो जाए कि कोई भी अभियुक्त कोर्ट से तलाशी वारंट जारी करने के दौरान भाग सकता है या अपराध के साक्ष्य मिटा सकता है, तो ऐसी स्थिति में उस अभियुक्त को तुरंत गिरफ़्तार किया जा सकता है.

    यही नहीं, अभियुक्त के घर और संपत्ति की तत्काल तलाशी भी ली जा सकती है. इसके लिए सर्च वारंट या मजिस्ट्रेट की अनुमति की ज़रूरत नहीं होगी. हालांकि ऐसा करने के लिए एसएसएफ़ जवान के पास पुख़्ता सबूत होने चाहिए.

    अधिनियम के मुताबिक़, ऐसी किसी भी कार्रवाई में सुरक्षा बल के अधिकारी या सदस्य के ख़िलाफ़ मुक़दमा दर्ज नहीं कराया जा सकेगा और बिना सरकार की इजाज़त के न्यायालय भी विशेष सुरक्षा बल के किसी सदस्य के विरुद्ध किसी अपराध का संज्ञान नहीं लेगा.

    इस अधिनियम के गठन पर कई तरह के सवाल उठ रहे हैं. राजनीतिक दलों ने अधिनियम को काला क़ानून बताते हुए इसे तत्काल रद्द करने की मांग की है.