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  • घोसी,तालाब में डूब ने से अधेड़ की हुई मौत

    मुजफ्फरुल इस्लाम,घोसी,मऊ। स्थानीय कोतवाली क्षेत्र के हाजी पुर मे सोमवार की रात स्पेयर्स पार्ट विक्रेता रामविनय सिंह पुत्र स्व० हिरामन सिंह उम्र 52 वर्ष की दरवाजे के सामने तालाब में डूब जाने से मौत हो गई । जानकारी के अनुसार रामविनय सिंह किसी निमंत्रण से बाइक द्वारा वापस घर लौट रहे थे। घर के पास ही खड़ंजे पर मोड़ होने के करण बाइक असन्तुलित होकर खड़ंजे से फिसल कर पोखरी में जा गिरी।अल सुबह घर के सदस्य ने पोखरे के किनारे उनकी बाइक एवं एक पैर का चप्पल देखा तो शोर मचाया । शोर सुनते ही गाँव के लोग इकट्ठे होकर शव को ढूढने प्रयास किया किन्तु शव मिलने में सफलता नहीं मिल सकी। पुलिस को सूचना देने के उपरांत मौके पर पहुँच पुलिस ने गोताखोरों के मदद से दो घंटे काफी मशक्कत के बाद शव को ढूढ़ निकाला। पुलिस ने शव को कब्जे में लेकर पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया।वहीं परिजनों का रो रो कर बुरा हाल हो रहा था।

  • दरभंगा:रुमी साहब की मृत्यु या हत्या? डी एम के जांच के आदेश का स्वागत,एसडीपीआई

    प्रेस विज्ञप्ति,दरभंगा बिहार
    बिरदीपुर दरभंगा के जिला परिषद और मुस्लिम समाज के बड़े कद्दावर नेता श्री जमाल अतहर उर्फ रुमी साहब के घर एसडीपीआई और पाॅपुलर फ्रंट अॉफ इन्डिया के संयुक्त टिम ने परिवार वालों से मिलकर संवेदना व्यक्त की और परिजनों को सांत्वना दिया

    एसडीपीआई दरभंगा के जिला कमिटी सदस्य मोअज्जम मोखतार ने कहा हालात उस तरफ सोचने पर मजबूर कर रहा है के मृतक की मृत्यु हुई या हत्या? दरभंगा डी एम का इस सम्बन्ध में जांच का आदेश सराहनीय कदम है, लेकिन जांच बिना किसी प्रभाव के पुरी ईमानदारी से सोंपी जाए, जिस तरह कि खबर मिल रही है के मृतक रुमी साहब के कोरोना जांच की रिपोर्ट निगेटिव आइ है तो प्रशासन का मृतक रुमी साहब को जबरदस्ती आनन फानन में दफन करना भी प्रशासन पर सवाल खरा करता है, साथ ही ये डी एम सी एच के स्वास्थ्यकर्मि के बर्ताव का भी डी एम सी एच पर भी प्रश्न चिन्ह खरा करता है-और मृतक की हत्या किये जाने का अंदेशा व्यक्त करता है-इतने बड़े लिडर के साथ जो हुआ क्या उसमें राजनीतिक हस्तक्षेप है? इन सभी चीजों की छानबीन करने की जरूरत है अन्यथा ऐसा जांच नही हुआ तो सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी आॅफइंडिया मामले की सच्चाई व न्याय के लिए संघर्ष करेगी।

    सोशल डेमोक्रेटिक पार्टी आॅफ इंडिया डी एम सी एच के डाक्टर एवं स्वास्थ्य कर्मियों द्वारा मृतक जमाल अतहर उर्फ रुमी के परिजनों के साथ मारपीट एवं 2 व्यक्ति को बंधक बनाए जाने के घटना की कड़े शब्दों में निंदा करती है और दोशियों पर जिला प्रशासन द्वारा अविलंब कार्यवाई की मांग करती है।

    पाॅपुलर फ्रंट अॉफ इन्डिया मिथिलांचल के अध्यक्ष डाक्टर मोहम्मद महबूब आलम ने कहा कि डी एम सी एच में आए दिन मरीजों और उनके परिवारों के साथ दुर्व्यवहार किया जाता है और फिर डी एम सी एच के दबाव में प्रशासन हमेशा एकतरफा कार्रवाई करता है- डी एम सी एच में गिता देवी को गलत रक्त चढाए जाने के कारण उनकी मृत्यु हो जाना और अब तक मृतक के परिजनों को न्याय और नुकसान के भरपाई के लिए सहायता राशि ना दिया जाना बहुत दुख की बात है, वहीं दूसरी घटना डी एम सी एच में एक नौजात शिशु को आई सी यू में चूहा काट काट कर मौत के घाट उतार देता है और उलटा डी एम सी एच प्रशासन एवं स्वास्थ्यकर्मि पीडित परिवार के साथ दूर व्यवहार करने लगता है पाॅपुलर फ्रंट अॉफ इन्डिया डी एम सी एच प्रशासन एवं जिला प्रशासन पर मरीज और उनके परिजनों के लिए उत्तम स्वास्थ्य प्रबंध करने की मांग करती है

  • घोसी,रोडवेज परिसर में भारी जल जमाव से जानलेवा बीमारियों का खतरा मंडराता हुआ

    मुजफ्फरुल इस्लाम
    घोसी,मऊ। स्थानीय नगर के मधुबन मोड़ स्थित रोडवेज परिसर का हाल इन दिनों किसी झील से कम नही है। बारिश से पूरे परिसर के 90 प्रतिशत हिस्से में जलजमाव होने के कारण बस स्टैंड से यात्रा करने वाले यात्रियों को समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। मूलभूत सुविधाएं न के बराबर है। गंदगी का अंबार बैठने की मुक्कमल व्यवस्था को मुँह चिढा रही तो जल निकासी न होने से परिसर में भारी जल जमाव से जानलेवा बीमारियों के साथ दुर्गन्ध से आने जाने वालों को लोगों को गम्भीर बीमारी का खतरा बरकरार है। प्रधानमंत्री जी का स्वच्छ भारत अभियान के प्रति सरकारी तंत्र ही निष्क्रिय दिख रहा।जल निकासी की समुचित व्यवस्था को लेकर रोड़वेज के अधिकारी तनिक भी सचेत नहीं दिख रहे।नगर के आकिब सिद्दिकी, अधिवक्ता अनिल मिश्रा,अभय तिवारी, खुर्शीद खान,शिवम साहू,आदि ने कहा कि उक्त परिसर मात्र प्राइवेट स्टैंड बन चुका है।सरकारी बसें भी रोडवेज परिसर में न जाकर मुख्यमार्ग से ही निकल जाती है।ऐसे में यात्रियों को यात्रा करने हेतु परेशानियों का सामना करना पड़ता है। जलजमाव की समस्या ज्यो की त्यों बनी हुई है।

  • राजस्थान:सीबीआई को जांच के लिए अब राज्य सरकार से इजाजत लेनी पड़ेगी

    आदेश से पहले जांच एजेंसी की टीम गहलोत समर्थक विधायक के घर पहुंची थी

    सीबीआई जांच में राज्य सरकार की अनुमति जरूरी किए जाने के बाद पहले दी गईं कई अनुमतियां भी रद्द कर दी गई हैं।

    राज्य सरकार अनुमति नहीं देती है तो सीबीआई कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकती है
    छत्तीसगढ़ में भूपेश बघेल सरकार और बंगाल में ममता सरकार पहले ऐसा ही आदेश जारी कर चुकी हैं

    राजस्थान के सियासी संग्राम के बीच अब केंद्र और राज्य सरकार के बीच भी घमासान शुरू हो गया है। राज्य सरकार ने एक आदेश जारी किया है कि सीबीआई को किसी जांच के लिए पहले उसकी इजाजत लेनी होगी। उसके बाद ही सीबीआई कोई एक्शन ले पाएगी। राज्य सरकार की सीनियर डिप्टी सेक्रेटरी रवि शर्मा ने यह आदेश जारी किया है। इससे ठीक पहले सीबीआई की टीम गहलोत समर्थक कांग्रेस विधायक कृष्णा पूनिया के जयपुर स्थित घर पहुंची थी।

    राज्य सरकार के इस आदेश के बाद अब सीबीआई किसी केस में सीधे जांच नहीं कर पाएगी। राजस्थान सरकार के गृह विभाग ने यह आदेश जारी किया है। जानकारी अनुसार, परिस्थिति के आधार पर ही सरकार किसी केस में जांच की इजाजत देगी। इसके साथ राज्य सरकार की ओर से पहले दी गई जांच की कई मंजूरियां भी रद्द कर दी गई हैं।

    केंद्र और राज्य के बीच टकराव हो सकता है

    राज्य सरकार के इस फैसले को मौजूदा सियासी उठापटक से जोड़कर देखा जा रहा है। चर्चा है कि गहलोत सरकार को इस तरह की आशंका है कि केंद्र की भाजपा सरकार कांग्रेस विधायकों पर दबाव बनाने के लिए सीबीआई का इस्तेमाल कर सकती है। कांग्रेस प्रवक्ता रणदीप सुरजेवाला ने भी पिछले दिनों जयपुर में आयकर विभाग की छापेमारी के बाद कहा था कि केंद्र सरकार केंद्रीय एजेंसियों को सक्रिय कर चुकी है।

    छत्तीसगढ़ और पश्चिम बंगाल भी लगा चुका हैं ऐसे प्रतिबंध

    सीबीआई को बिना अनुमति के आने से रोकने वाला राजस्थान कोई पहला राज्य नहीं है। इससे पहले छत्तीसगढ़ की भूपेश बघेल सरकार और पश्चिम बंगाल में ममता सरकार भी सीबीआई को आने से रोकने का आदेश जारी कर चुकी हैं।

    अब सीबीआई क्या करेगी?

    अब सीबीआई को जांच के लिए राज्य सरकार की अनुमति लेनी होगी। अगर किसी मामले में सीबीआई जांच करना चाहती है, लेकिन राज्य सरकार अनुमति नहीं देती है तो ऐसी स्थिति में सीबीआई कोर्ट का दरवाजा खटखटा सकती है।

    विधायक कृष्णा पूनिया के घर पर पहुंची सीबीआई

    राजस्थान में सीबीआई के अाने पर रोक लगाने वाला आदेश सरकार की तरफ से जारी करने से पहले ही खबर आई थी कि सीबीआई कांग्रेस विधायक कृष्णा पूनिया के जयपुर में जालूपुरा स्थित घर पहुंची। पूनिया के फेयरमोंट होटल पर होने के कारण वे आवास पर नहीं मिलीं, जिसके कारण सीबीआई को खाली हाथ लौटना पड़ा। बताया जा रहा है कि सीबीआई एएसओ विष्णु दत्त शर्मा सुसाइड केस में पूछताछ के लिए पूनिया के घर पहुंची थी।(इंपुट भास्कर)

  • मुख्यमंत्री गहलोत के बोल से आज पूरी कांग्रेस की क्षमता पर प्रश्न चिन्ह खड़ा हो गया।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    प्रदेश मे पायलट-गहलोत के मध्य बंटती नजर आ रही कांग्रेस एवं रोजाना घटते राजनीतिक घटनाक्रमो के चलते राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने आज पत्रकारों से मिलतें हुये राजस्थान कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष सचिन पायलट पर आरोपो की झड़ी लगाते हुये उनको नकारा व निकम्मा तक बता दिया। निकम्मा व नकारा बताने के बाद कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व पर भी सवाल उठने लगे है कि कांग्रेस पार्टी के सविधान अनुसार किसी भी प्रदेश अध्यक्ष की नियुक्ति करने से पहले राष्ट्रीय अध्यक्ष व शीर्ष नेतृत्व कण्डीडेट की उपयोगिता व काबलियत का सो दफा आंकलन करके मनोनयन करता है। मुख्यमंत्री गहलोत ने पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट को नकारा व निकम्मा बताकर एक तरह से पार्टी के शीर्ष नेतृत्व की क्षमता पर ही गम्भीर सवाल खड़ा कर दिया है।

    मुख्यमंत्री अशोक गहलोत आज पत्रकारों को सम्बोधित करते हुये अपनी छवि के विपरीत बोलते हुये काफी दवाब मे नजर आये। मुख्यमंत्री ने कहा कि वो राजस्थान मे मुख्यमंत्री बन कर आये है वो कोई बैंगन व सब्जी बेचने नही आये है।

    कुल मिलाकर यह है कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने आज की अपनी प्रैस कांफ्रेंस मे सचिन पायलट व भाजपा नेताओं पर अनेक गम्भीर आरोप लगाये है। शाम होते होते भाजपा प्रदेश अध्यक्ष सतीश पूनीया ने मुख्यमंत्री को चैलेंज करते हुये कहा कि उनके स्वयं व राठौड़ के दिल्ली जाकर बागी विधायकों से मिलने का आरोप सरसर गलत है। चाहे तो इस मामले की सीबीआई जांच करा ली जाये। दुसरी तरफ गहलोत द्वारा पायलट पर लगाये आरोपों पर स्वयं सचिन पायलट ने ज्यादा कुछ नही कहा पर दुख होना बताया। पूर्व मंत्री विश्वेंद्र सिंह व हेमाराम चोधरी ने वीडियो जारी करके मुख्यमंत्री को घेरते हुये उनके द्वारा पूर्व प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट पर आरोप लगाने को दुर्भाग्यपूर्ण बताया है।

  • राजस्थान के राजनीतिक घटनाटक्रम के लिये अगला सप्ताह महत्वपूर्ण होगा।

    अधिकांश राजनीतिक पण्डित गहलोत द्वारा बहुमत सिद्ध करना मान रहे है लेकिन ऊंट आखिर समय तक किसी भी करवट बैठ सकता है।

    ।अशफाक कायमखानी।जयपुर
    पिछले दस दिन से राजस्थान की राजनीति मे अचानक आये भूचाल के कुछ हदतक निर्णायक मोड़ पर पहुंचने के लिये अगला सप्ताह काफी महत्त्वपूर्ण माना जा रहा है। बीटीपी के दो विधायको व एक माकपा से निलम्बित विधायक के साथ आने के अलावा दस निर्दलीय विधायकों का स्पोर्ट पुख्ता होने के बाद मुख्यमंत्री अशोक गहलोत अब सदन मे बहुमत सिद्ध करने के साथ बगावत कर चुके विधायकों के सामने दुविधा की स्थिति खड़ी करना चाहते है ताकि उनके प्रस्ताव के समर्थन मे पायलट समर्थक विधायक मतदान करके सदस्यता बचाये या फिर खिलाफ मतदान करने पर सदस्यता खत्म करवाये।

    हालांकि राजनीतिक पण्डित मुख्यमंत्री गहलोत के पास 102 विधायको का समर्थन मानकर चल रहे। जिनमे अस्पताल मे गम्भीर रुप से बीमार भर्ती मंत्री भंवरलाल मेघवाल व विधानसभा अध्यक्ष सीपी जौशी को भी गिनती मे शामिल करके चल रहे है। इसके अलावा दुसरी तरफ भाजपा व रालोपा के 75, कांग्रेस के बागी 19 व 3 निर्दलीय विधायकों को मिलाकर कुल 97-विधायक की गिनती बैठती है। माकपा का दूसरा विधायक गिरधारी महिया तटस्थ रह सकता है। पर वो गहलोत खेमे के साथ अभी तक जाता नजर नही आ रहा है। विधानसभा अध्यक्ष भी तभी मतदान कर पायेगा जब दोनो तरफ बराबर बराबर वोट आये। इसी तरह गहलोत खेमे के पक्ष मे विधानसभा अध्यक्ष व मंत्री भंवर लाल मेघवाल का मत पड़ना मुश्किल होगा। इन दो मतो को हटा देते है तो गहलोत के पास सो मत की तादाद बचती है। दुसरी तरफ 97 विधायक बचते है। यानि फर्क केवल तीन मत का रहेगा। अगर दो मत गहलोत खेमे से अलग ह़ो कर पायलट खेमे की तरफ आते ही सरकार गिर सकती है। तब गिरधारी महिया तटस्थ रहे।

    जयपुर की होटल मे बैठे मुख्यमंत्री गहलोत खेमे के विधायको मे एक दर्जन के करीब विधायक ऐसे है जो एक दम चुपचाप बैठकर सबकुछ देख रहे है। कुछ विधायक तो ऐसे भी है जो अपने पिताओ की राजनीतिक हत्या का आरोपी अशोक गहलोत को मानते रहे है। उन विधायकों के पिता विधानसभा से बाहर रहकर बदलते सभी हालात पर नजर लगाये हुये है। जो अंतिम समय पर फैसला लेकर अपने पूत्र-पूत्री विधायको को खास हिदायत दे सकते है। इसके विपरीत माकपा के दोनो विधायक का एक तरफ मतदान होना कतई नही होगा। हो सकता है कि माकपा को दोनो मत एक दूसरे मत का प्रभाव बराबर कर दे।

    गहलोत-पायलट के मध्य चल रहे राजनीतिक घटनाटक्रम मे किसी ना किसी रुप मे भाजपा भी शामिल होती नजर आ रही है। SOG व ACB अपने यहां दर्ज शिकायतो के बाद जानच करने के रुप मे शामिल है। वही चिहे पर्दे के पिछे से सही आयकर विभाग ने भी गहलोत समर्थकों के यहां रेड डाल चुका है। वही टेलीफोन टेपिंग मामले को लेकर CBI के भी आने की सम्भावन नजर आने लगी है। कांग्रेस ने SOG व ACB विभिन्न रपट दर्ज करवाई है। दुसरी तरफ भाजपा ने भी कांग्रेस नेताओं के खिलाफ पुलिस मे शिकायत दर्ज करवाई है। वही बसपा अध्यक्ष ने घटे राजनीतिक घटनाटक्रम पर बोलते हुये राष्ट्रपति शासन लगाने की मांग की है। उक्त सब घटनाटक्रम से लगता है कि राष्ट्रपति शासन की सिफारिश होने के लिये भूमिका तैयार की जा रही बताते है।

    विधानसभा अध्यक्ष द्वारा महेश जौशी की शिकायत पर जिन 19 कांग्रेस विधायकों को नोटिस देकर जवाब मांगा था। उसके खिलाफ उन विधायकों के कोर्ट चले जाने पर उनकी 20-जुलाई (सोमवार) को सुनवाई होनी है। सुनवाई मुकम्मल होकर कल जजमेंट आता है या फिर आगे डेट मिलती है। यह सबकुछ कल ही पता चल पायेगा। सुनवाई के दो-तीन दिन बाद मुख्यमंत्री सदन का सत्र बुलाकर बहुमत सिद्ध करने की कोशिश कर सकते है। लेकिन बहुत सिद्ध होना जीतना आसान मानकर चल रहे है। उतना आसान कतई नही है। कुछ विधायकों के सीने मे उस बात की आग सुलग रही है जिनके पिताओ की राजनीतिक हत्या अशोक गहलोत के हाथो हुई बताते है।

    कुल मिलाकर यह है कि गहलोत खेमे के होटल मे ठहरे अधिकांश विधायक गाने गाकर, खेल खेलकर, फिल्में देखकर व इटालियन खाना बनाने की विधि सीखकर कोराना काल मे भी जीवन का आनंद ले रहे है। वही कुछ विधायक फोटो व वीडियो से दूर मनोरंजन करने से पुरी तरह दूर रहते हुये होटल मे ठहरे हुये है। जो आखिर समय पर अपने मत का उपयोग मिले आदेश अनुसार कर सकते है जिस मत से निकले परिणाम को सालो साल याद किया जाये। इसके विपरीत सचिन पायलट खेमा बीना किसी नुकसान होने की परवाह किये हर हाल मे गहलोत सरकार गिराना चाहेगे। फिर सरकार गिरने के बाद नये विकल्प पर विचार कर सकते है। मत विभाजन की स्थिति मे पायलट के साथ भाजपा खडी मिलने की पक्की सम्भावना जताई जा रही है। विधायक खरीद फरोख्त कोशिश करने के तीन आरोपी विधायक अगर गहलोत के पक्ष मे मतदान करे तब ही सरकार बच सकती है।वरना सदन मे मत विभाजन अगर होता है तो परिणाम कुछ भी आ सकता है।

  • कोरोना योद्धाओं के रूप में लोहिया वाहिनी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विनीत कुशवाहा ने पत्रकारों को किया सम्मानित

    मुजफ्फरुल इस्लाम,अमिला(मऊ)। स्थानीय नगर में रविवार को समाजवादीपार्टी के लोहिया वाहिनीं के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विनीत कुशवाहा द्वारा एक सम्मान समारोह के तहत लगभग दो दर्जन से अधिक पत्रकारों को कोरोना वारियर्स के रूप के सम्मानित किया गया। राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विनीत कुशवाहा ने सम्मानित करते हुए कहा कि कोरोना जैसे वैश्विक महामारी में जहाँ देश मे मरीजों की संख्या में लगातार इजाफा हो रहा है।ऐसे में आप सभी पत्रकार बंधुओं द्वारा अपने जान की बाजी लगा प्रत्येक खबरों को लोगों के सामने प्रस्तुत करने का काम कर रहे है तो ऐसे में हमसभी का कर्तव्य एवं दायित्व है कि आप का उत्साहवर्धन कर समय समय पर सम्मान किया जाय। देश और प्रदेश में यदि चौथा स्तम्भ सुरक्षित रहेगा तभी भय भूख भरस्टाचार दूर होगा लोग सुरक्षित रहेंगे और समय समय पर सरकार , शासन ,प्रशासन के नुमाइंदो को भी आईना दिखाते हुए सुधार लाने में अहम भूमिका रहेगी।इस अवसर पर सीतराम कुशवाहा, मु कादिर , विक्की , आकिब सिद्दिकी, सुदर्शन कुमार, अशोक श्रीवास्तव, गुंजन राय, मुज़फ्फरुल इस्लाम, अज़हान आलम, रहमान चिश्ती,सहित दो दर्जन से अधिक पत्रकार मौजूद रहे।

  • मुख्यमंत्री गहलोत को प्रदेश स्तरीय राजनीतिक व सवैधानिक पदो पर मनोनयन का सिलसिला शूरु करने पर विचार करना चाहिए।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    राजस्थान के गुज्जर नेता कर्नल किरोड़ीसिंह बैसला ने एक दफा कहा था कि अशोक गहलोत कुछ देते तो है, लेकिन जब देते है तब तक वो बासी हो जाती है। यह कथन राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के अलावा मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ पर भी स्टीक साबित हो चुका है। कमलनाथ ने मुख्यमंत्री रहते राजनीतिक नियुक्ति व संवेधानिक पदो पर मनोनयन करना बार बार टालते रहे ओर अंत मे उनकी सरकार को भाजपा ने सिंधिया की मदद से सत्ता से बाहर करके स्वयं भाजपा ने सरकार बना ली है। कमलनाथ तो राजनीतिक व संवैधानिक पदो पर नियुक्ति कर नही पाये ओर अब मध्यप्रदेश मे भाजपा सरकार धड़ाधड़ नियुक्तिया कर रही है। कमलनाथ की तरह ही राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत भी प्रदेश मे कांग्रेस सरकार के ढेड साल से अधिक समय गुजरने के बावजूद अभी तक राजनीतिक व संवैधानिक पदो पर नियुक्ति करने का सिलसिला शूरु तक नही किया है। जिसके चलते आम कांग्रेस वर्कर को सत्ता मे हिस्सेदारी नही मिलने से वो लगातार धीरे धीरे उदासीन होता जा रहा हैँ।

    गहलोत सरकार वर्तमान संकट मे हो सकता है कि एक दफा सदन मे बहुमत सिद्ध करके उभर जाये। लेकिन वर्तमान राजनीतिक हालात मे बनते बिगड़ते समीकरणों को देखकर सरकार का लम्बा चलना मुश्किल माना जा रहा है। बाड़ेबंदी मे कैद विधायक ज्योही बाहर खुली हवा मे आयेगे त्योही मावव स्वभाव के चलते फिर से सत्ता मे भागीदारी की बात करते हुये गुणा-भाग करने लगेंगे। भागीदारी सभी विधायकों को मिलना मुश्किल होगा। ऐसे हालात मे निराशा के भाव मे आये कांग्रेस व गहलोत सरकार समर्थक विधायकों से फिर अन्य लोग सम्पर्क कर अपनी तरफ आकर्षित करने की कोशिश कर सकते है।उस स्थिति मे धीरे धीरे गहलोत समर्थक विधायकों की संख्या कम होती जायेगी ओर सरकार का रहना मुश्किल होता जायेगा।

    वर्तमान समय मे राजस्थान मे रोजाना बदलते राजनीतिक घटनाक्रमों पर नजर दोड़ाये तो अनिश्चितता कायम होना देखा जा रहा है। गहलोत सरकार के बचने व गिरने के अलग अलग कयास लगाये जा रहे है। गहलोत-पायलट खेमे मे बंटा कांग्रेस विधायक दल के मध्य जारी शह व मात के खेल मे अब भाजपा भी कुदती नजर आने लगी है। प्रदेश मे अनिश्चितता की बनी उक्त स्थिति पर राज्यपाल की भी पूरी नजर है। आगे आगे देखना होगा कि प्रदेश की सियासत किस तरफ पलटी खाती है।

    राजनीतिक नियुक्ति व संवैधानिक पदो पर एक प्रक्रिया के तहत मनोनयन मे कमलनाथ व गहलोत एक दुसरे से अधिक फिसड्डी साबित हुये व हो रहे है। लेकिन इसके विपरीत मध्यप्रदेश मे सरकार गिरने व राजस्थान मे बदले राजनीतिक घटनाक्रमों के मध्य छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार के मुखिया भूपेश भगेल ने सरकार मे संसदीय सचिव, राजनीतिक नियुक्तिया व संवैधानिक पदो पर धड़धड़ मनोनयन करके एक अलग तरह का माहोल बना दिया है। जिसके बाद वहां का आम कार्यकर्ता भी सत्ता मे अपनी हिस्सेदारी मानकर उत्साहित होकर पार्टी हित मे सक्रिय हो चला है। अगर प्रदेश की सरकार किसी वजह से गिर भी जाये तो संवेधानिक पदो पर नियुक्त उन लोगो को त्याग पत्र देने की आवश्यकता नही होती। वो अपना कार्यकाल चाहे तो पुरा कर सकते है।

    कुल मिलाकर यह है कि छत्तीसगढ़ की कांग्रेस सरकार ने राजस्थान की राजनीति मे आये भूचाल के मध्य ही पिछले एक सप्ताह मे संसदीय सचिव, राजनीतिक व संवेधानिक पदो पर नियुक्ति करने की झड़ी लगा दी है। मुख्यमंत्री अशोक गहलोत को मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ के रास्ते को अपनाने की बजाय छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री भूपेश बघेल के रास्ते को अपना कर प्रदेश मे खाली चल रही नियुक्तिया जल्द कर देनी चाहिए वरना बाद मे पछतावा हो सकता है जब चिड़िया खेत चूग जाये। अगर ऐसा हुवा तो आम कांग्रेस कार्यकर्ता उन्हें कभी माफ नही करेगा। उस स्थिति मे उदासीन हुवा कार्यकर्ता पार्टी हित मे उतना काम नही कर पायेगा जितना काम 2018 के चुनाव मे वसुंधरा राजे सरकार को हटाने मे किया था।

  • भारत में 15 सितंबर तक चरम पर होगा संक्रमण,गांवों में इस बीमारी को फैलने से रोकना होगा

    नई दिल्ली; भारत में कोरोनावायरस 15 सितंबर के आसपास चरम पर हो सकता है। लोगों को कोरोनावायरस को काबू करने के लिए बहुत ही जिम्मेदार रवैया अपनाना होगा। सबसे बड़ा काम इसे गांवों तक पहुंचने से रोकना है, क्योंकि यहां देश की दो तिहाई आबादी रहती है। पब्लिक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के प्रेसिडेंट प्रोफेसर के श्रीनाथ रेड्‌डी ने शनिवार को ये बाते कहीं। उन्होंने कहा कि यह वायरस नई ताकत से बढ़ रहा है।

    राज्यों में अलग-अलग समय पर चरम पर पहुंचेगा कोरोना
    प्रोफेसर रेड्‌डी ने कहा- अलग-अलग जगहों (राज्यों) में अलग-अलग समय में कोरोना संक्रमण अपने चरम पर पहुंचेगा। डॉ. रेड्डी ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंस में कार्डियोलॉजी डिपार्टमेंट के हेड भी रह चुके हैं। वे मौजूदा समय में हार्वर्ड में स्टडी के काम से जुड़े हैं। उन्होंने कहा कि इस समय हमारा मुख्य काम इस वायरस को छोटे शहरों और गांवों में पहुंचने से रोकना है। अगर हम इसे रोक लें तो अभी भी बड़ा नुकसान टाल सकते हैं।

    कई जगहों पर हुईं गलतियां

    प्रोफेसर रेड्डी ने कहा कि लॉकडाउन के दूसरे चरण तक कोरोना को फैलने से रोकने के लिए बहुत सख्ती से लॉकडाउन किया गया, लेकिन 3 मई के बाद लॉकडाउन में ढील मिली तो हमें जोरदार तरीके से घर-घर जाकर सर्वे, टेस्टिंग, आईसोलेशन करना चाहिए था, जो हमने नहीं किया।
    लॉकडाउन में ढील मिलते ही कोई एहतियात का पालन नहीं किया गया। ऐसा लगा जैसे सब आजाद हो गए हैं। जैसे- स्कूल में एग्जाम के बाद छात्र रिजल्ट आने से पहले ही खुशी मनाने लगे हों।

    हमने बहुत ज्यादा समय अस्पलात और बेड कैपेसिटी को लेकर बिताया। हालांकि, यह भी जरूरी था, लेकिन ट्रेसिंग का पूरा जिम्मा केवल पुलिस को सौंप दिया गया। जबकि, इसे पब्लिक हेल्थ फंक्शन के रूप में देखना चाहिए था।(इनपुट भास्कर)

  • राजस्थान मे चल रहे ताजा राजनीतिक घटनाक्रम मे राज्य ऐजेन्सी एसओजी-ऐसीबी के बाद अब केन्द्रीय ऐजेन्सी सीबीआई की भी इंट्री हो सकती है।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    राजस्थान कांग्रेस विधायक दल के गहलोत-पायलट मे विभाजित हो चुके कांग्रेस विधायकों के बाद मचे राजनीतिक घमासान मे राज्य ऐजेन्सी ऐसीबी व एसओजी मे दर्ज शिकायतो के बाद उक्त दोनो ऐजेन्सी की इन्ट्री के बाद भाजपा प्रवक्ता ने दिल्ली मे प्रैस कांफ्रेंस करके गहलोत सरकार पर फोन टेपिंग करने का आरोप लगाते हुये पुरे मामलो की केन्द्रीय ऐजेन्सी सीबीआई से जांच कराने की मांग करने के बाद जनता मे जहन मे सवाल उठने लगा है कि राजस्थान के वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम मे राज्य जांच ऐजेन्सीज के बाद क्या अब केन्द्रीय जांच ऐजेन्सी सीबीआई की भी इंट्री होगी? इसके विपरीत इसी राजनीतिक घटनाक्रम के मध्य आयकर विभाग ने दो कांग्रेस नेताओं के अनेक ठिकानो पर रेड कर चुका हैँ।

    केन्द्रीय जांच ऐजेन्सी सीबीआई से स्टेट के किसी मामले मे जांच कराना स्टेट की मर्जी पर निर्भर करता है। लेकिन किसी मुद्दे पर न्यायालय अगर आदेश जारी कर देता है तो उस आदेश की पालना मे केन्द्रीय जांच ऐजेन्सी से जाचं की जा सकती बताते है।

    राजस्थान के वर्तमान राजनीतिक घटनाक्रम को लेकर मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के 109 विधायको के समर्थन होने के दावे को सीरीयस नही लिया जा सकता। भाजपा के 72 व रालोपा के 3 विधायको के साथ आरोपितो 3 निर्दलीय विधायको को मिलाकर कुल 78 विधायक बनते है। स्पीकर की तरफ से नोटिस मिलने वालो 19 कांग्रेस विधायकों को मिलाकर कुल 97 विधायक तो यही बन जाते है। एक विधायक भंवरलाल मेघवाल अस्पताल मे भर्ती होने पर कुल 98 विधायक तो यही हो जाते है। बचे 102 विधायक। उनमे माकपा का एक विधायक बलवान पूनीया गहलोत खेमे को समर्थन देने का ऐहलान कर चुके है। वही दूसरे माकपा विधायक गिरधारी दहिया अब तक पत्ते ना खोलते हुये अपने आपको अपने क्षेत्र मे होने की कह रहे है। बीटीपी के दो विधायक रामदयाल व राजकुमार कभी तटस्थ तो कभी गहलोत खेमे का साथ देने को कह चुके है। इसके अलावा दस निर्दलीय विधायक अभी तक तो गहलोत खेमे की बाड़ेबंदी मे बताते है। पर बाड़ेबंदी से बाहर आने पर वो किधर रुख कर ले यह कहना मुश्किल है। क्योंकि सदन मे वो चाहे जिधर मतदान करे उनकी सदस्यता जाने का खतरा उनको नही है। पार्टी विधायकों के मतदान करने पर उनकी सदस्यता पर प्रभाव जरूर डालता है। इसके विपरीत चाहे भाजपा उक्त घटनाक्रम को कांग्रेस के दो नेताओं का झगड़ा बताये लेकिन चाहे सामने ना सही पर राजनीति के जानकार किसी ना किसी रुप मे उनकी भूमिका होने की बात मान कर चल रहे है।

    कुल मिलाकर यह है कि राजनीति के जानकार मान कर चल रहे है कि बहुमत मिलने की पुख्ता होने पर मुख्यमंत्री सदन मे बहुमत सिद्ध करने की कोशिश करेगे ताकि उसके खिलाफ मतदान करने वाले कांग्रेस विधायको को अपनी विधानसभा सदस्यता से हाथ धोना पड़े ओर फिर खाली जगह पर उपचुनाव हो सके। वही पायलट खेमा जैसे तैसे करके कांग्रेस से कम से कम 36 विधायक अपने साथ लेकर अलग गूट बनाकर फिर सेफ गेम खेलने की कोशिश मे बताते है। भाजपा यह चाहेगी कि गहलोत सरकार पहले गिर जाये फिर वो सरकार बनाये। अन्यथा एक दफा राष्ट्रपति शासन जरुर लग जाये। ज्यो ज्यो समय गुजरेगा त्यो त्यो गहलोत खेमे की लगाम कमजोर व भाजपा की लगाम मजबूत होती जायेगी। पर अभी घटनाक्रमों मे अनेक बदलाव पल पल आते नजर आना तय है।