Category: खास ख़बरें

  • जामिया यूनिवर्सिटी के साथ इतनी बर्बरता और जुल्म मत करो दिल्ली पुलिस

    जामिया यूनिवर्सिटी के साथ इतनी बर्बरता मत करो

    दिल्ली पुलिस

    जामिया मिल्लिया के साथ ऐसा मत कीजिए। अंतरात्मा भी कोई चीज़ होती है। आदेश ही सब नहीं होता है। छात्रों की तरफ़ से जो वीडियो आए हैं उसमें आपकी क्रूरता झलकती है। प्लीज़ ऐसा मत कीजिए। एक बस की आग का सहारा लेकर ऐसा नहीं करना था। आपके होते आग कैसे लगी ? तब वो भीड़ बेक़ाबू थी तब तो ऐसा नहीं किया। शाम का फ़ायदा उठाकर अब आप आप लोग हास्टल और कैंपस में घुसकर मार रहे हैं यह बर्बरता है। ऐसा मत कीजिए।

    छात्रों से अपील है कि शांति बनाए रखें। वो एक ऐसे दौर में है जब पुलिस से भी बर्बर मीडिया हो गया है। लेकिन पूरी कोशिश कीजिए कि कोई भी तत्व हिंसा न करे। कौन बाहरी है उस पर खुद नज़र रखें। हो सके तो शाम के वक्त आंदोलन न करें। अंधेरे का फ़ायदा हमेशा ताकतवर को मिलता है।

    सभी पक्षों अपील है कि हिंसा का लाभ इस वक्त किसे होगा आप समझते हैं। इसलिए खुद नज़र रखें। हिंसा न होने दें। कोई भी फ़ार्मेशन ऐसा बनाएं जिसमें कोई अनजान पास भी न आ सके। अगर ऐसा नहीं कर सकते हैं तो प्रदर्शन न करें। छात्रों से अपील है कि शांति और अहिंसा का इम्तहान उन्हें देना है। पुलिस और मीडिया को नहीं। यह कैसे करना है उन्हें सोचना होगा।

    नागरिकों से अपील है कि वे तटस्थ होकर देखें कि किस तरह जामिया के छात्रों के साथ नाइंसाफ़ी हुई है। ऐसा मत कीजिए। ये ज़ुल्म आने वाले समय में भारत के लोकतंत्र के ख़ात्मे की कहानी लिख रहा है। आप इस कहानी को मत लिखने दें। बाद में कोई अफ़सोस लायक़ भी नहीं बचेगा। हिंसा की कहानी से किसे फ़ायदा होता है आप जानते हैं ।

    इस तरह से यूनिवर्सिटी पर हमला करना आपकी अकेली और समूह की आवाज़ को कुचलना है। सौ बार कह चुका है कि इस वक्त आप जिन अख़बारों और टीवी चैनलों को अपने पैसे से ज़हर पीला रहे हैं और वो आपको पीला रहे हैं उनसे दूर रहें। ज़िम्मेदारी निभाइये। जामिया से भी सख़्त सवाल करें और पुलिस से भी। वीसी की इजाज़त के बग़ैर कैंपस में पुलिस कैसे आ गई? ये सवाल वीसी से भी करें।

    शांति शांति शांति

    शुक्रिया।

    रवीश

  • मौलाना सैयद अरशद मदनी ने कहा- साक्ष्यों के आधार पर SC का फैसला मान्य होगा..

    अयोध्या मामले (Ayodhya Case) के राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद पर आने वाले फैसले से पहले जमीयत उलेमा हिन्द के अध्यक्ष मौलाना सैयद अरशद मदनी ( Maulana Sayyed Arshad Madani ) ने कहा है कि ‘वर्तमान में देश आंतरिक और बाहरी दोनों स्तरों पर चुनौतियों से गुजर रहा है और हालात चिंताजनक हैं. मदनी ने कहा कि मुसलमानों का दृष्टिकोण पूर्णतः ऐतिहासिक तथ्यों, सबूतों और साक्ष्यों के आधार पर है. बाबरी मस्जिद का निर्माण किसी मंदिर को तोड़कर या किसी मंदिर की जगह पर नहीं किया गया था. हमें पूर्ण विश्वास है कि कोर्ट का फैसला आस्था की बुनियाद पर ना होकर कानूनी दायरे में होगा और कोर्ट के फैसले को जमीयत उलेमा-ए-हिंद ससम्मान स्वीकार करेगी.’

    मदनी ने कहा कि ‘आज कश्मीर से कन्याकुमारी तक मौजूदा परिस्थितियों से लोग डरे सहमे हैं और एक अविश्वास की भावना आई है. मदनी ने NRC का जिक्र करते हुए कहा कि इस मुद्दे पर गृहमंत्री अमित शाह का बयान जिसमें उन्होंने “गैर मुस्लिम सभी धर्मों को भारतीय नागरिकता देने” की बात कही, शर्मनाक है. अमित शाह के बयान से स्पष्ट है कि उनके निशाने पर सिर्फ मुस्लिम हैं और गृहमंत्री की सोच संविधान की धारा 14-15 के विरुद्ध हैं जिसमें सभी धर्मों को उनके धार्मिक भाषा, खान-पान, रहन-सहन के नाम पर किसी नागरिक के साथ भेदभाव नहीं करने की बात की है.’

    मौलाना मदनी ने कहा कि ‘हमारे मतभेद किसी भी राजनीतिक दल या संगठन से नहीं हैं बल्कि हमारा विरोध हमेशा से ही उस

    विचारधारा से है जो देश की गंगा-जमुनी तहजीब और धर्मनिरपेक्ष मूल्यों को खत्म करने की होती है. आज जिस तरह से गाय

    के नाम पर तो कभी जय श्री राम के नाम पर धार्मिक जुनून पैदा करके देश की हिन्दू-मुस्लिम बुनियाद हिलाने की कोशिश हो रही है, वो शर्मनाक है.’ Input;(ndtv)

  • सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र से पूछा सवाल: जम्मू-कश्मीर में आखिर कब तक इंटरनेट सेवाएं बंद रखी जाएंगी

    सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू-कश्मीर में मौजूदा हालात को लेकर केंद्र और राज्य प्रशासन से जवाब मांगा है. कोर्ट ने एक मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार और राज्य प्रशासन से पूछा कि आखिर आप कब तक जम्मू-कश्मीर में प्रतिबंद लगाए रखेंगे. और आम लोगों के लिए कब तक इंटरनेट सेवाएं बंद रखी जाएंगी. कोर्ट ने केंद्र सरकार और राज्य प्रशासन से पांच नवंबर तक जवाब दाखिल करने को कहा है. कोर्ट के कड़े रुख के बीच केंद्र सरकार ने कहा कि जम्मू-कश्मीर के हालात पर रोजाना नजर रखी जा रही है. अभी तक राज्य से 99 फीसदी प्रतिबंध उठाए जा चुके हैं. धीरे-धीरे ही सही लेकिन हालात सामान्य हो रहे हैं.

    कोर्ट में सरकार ने कहा कि राज्य में अभी इंटरनेट को इसलिए बंद रखा गया है ताकि सीमापार से होने वाली हरकतों को रोका जा सके. सरकार के इस जवाब पर वी रमना ने कहा कि बेंच के एक जज निजी कारणों से छुट्टी लेना चाहते थे लेकिन मैनें आने को कहा नहीं तो लोग कहते कि हम मामले को सुनना नहीं चाहते. उन्होंने कहा कि हमारी कोई निजी जिंदगी नहीं है. बता दें कि सुप्रीम कोर्ट कश्मीरी व्यवसायी मुबीन की याचिका पर सुनवाई कर रही था. कोर्ट ने केंद्र सरकार और राज्य प्रशासन से चार हफ्तों में जवाब मांगा है.

    कुछ दिन पहले ही सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधान हटाए जाने को चुनौती देने वाली सभी याचिकाएं पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास भेजीं थी .अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधान हटाए जाने को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर केन्द्र और जम्मू कश्मीर प्रशासन को नोटिस जारी किया था. साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि वह अनुच्छेद 370 हटाए जाने की संवैधानिक वैधता की समीक्षा करेगा. अनुच्छेद 370 के खिलाफ याचिकाओं पर सुनवाई पांच जजों की बेंच करेगी. इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट को केंद्र सरकार ने बताया है कि जम्मू-कश्मीर हालात सामान्य हैं.

    सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधान हटाए जाने के राष्ट्रपति आदेश को चुनौती देने वाली याचिकाओं के संबंध में केन्द्र सरकार और जम्मू-कश्मीर प्रशासन को नोटिस भी जारी किया था. प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई के नेतृत्व वाली पीठ केन्द्र की उस दलील से सहमत नहीं दिखी कि अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल और सॉलिसिटर जनरल के अदालत में मौजूद होने के कारण नोटिस जारी करने की जरूरत नहीं है.

    पीठ ने नोटिस को लेकर ‘सीमा पार प्रतिक्रिया’ होने की दलील को ठुकराते हुए कहा, ‘हम इस मामले को पांच न्यायाधीशों की संविधान पीठ के पास भेजते हैं.’ अटॉर्नी जनरल ने कहा कि इस अदालत द्वारा कही हर बात को संयुक्त राष्ट्र के समक्ष पेश किया जाता है. दोनों पक्ष के वकीलों के वाद-विवाद में उलझने पर पीठ ने कहा, ‘हमें पता है कि क्या करना है, हमने आदेश पारित कर दिया है और हम इसे बदलने नहीं वाले.’

    अनुच्छेद 370 रद्द करने के फैसले के खिलाफ याचिका अधिवक्ता एमएल शर्मा ने दायर की है, जबकि नेशनल कांफ्रेंस सांसद मोहम्मद अकबर लोन और न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) हसनैन मसूदी ने जम्मू कश्मीर के संवैधानिक दर्जे में केंद्र द्वारा किये गए बदलावों को चुनौती दी है. पूर्व आईएएस अधिकारी शाह फैसल, जेएनयू की पूर्व छात्रा शेहला रशीद और राधा कुमार जैसे प्रख्यात हस्तियों सहित अन्य भी इसमें शामिल हैं..INPUT(NDTV)

  • तीन तलाक में सजा के प्रावधान के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट पहुंचा ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड

    तीन तलाक (Triple Talaq) में सजा के प्रावधान के खिलाफ ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड (All India Muslim Personal Law Board) सुप्रीम कोर्ट (Supreme Court) पहुंचा है. ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने याचिका दाखिल कर तीन तलाक में सजा के प्रावधान को चुनौती दी है.

    ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने कहा है कि तलाक-ए-बिद्दत को अपराध बनाना असंवैधानिक है. इससे पहले अन्य याचिकाओं पर सुनवाई करते हुए 23 अगस्त को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को राहत देते हुए तीन तलाक कानून पर रोक लगाने से इनकार कर दिया था.

    आपको बता दें कि तीन तलाक को कैबिनेट से मंजूरी मिलने के बाद से ये गैर-जमानती अपराध की श्रेणी में शामिल हो गया है. ऐसे में आरोपी को सिर्फ मजिस्ट्रेट ही जमानत दे सकता है. इतना ही नहीं पीड़ित महिला के ब्लड रिलेटिव्स भी तीन तलाक के मामले में एफआईआर दर्ज करा सकेंगे. इसी प्रावधान को लेकर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है.

  • अयोध्या विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने मुस्लिम पक्षकारों के इस बयान को रिकॉर्ड पर लाने की इजाज़त दी..

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार को उप्र सुन्नी वक्फ बोर्ड (Sunni Waqf Board) सहित मुस्लिम पक्षकारों को राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद भूमि विवाद (Ram Janmbhoomi-Babri Masjid Land Dispute) में अपने लिखित नोट दाखिल करने की अनुमति दे दी. मुस्लिम पक्षकारों ने इसमें कहा है कि शीर्ष अदालत का निर्णय देश की भावी राज्य व्यवस्था पर असर डालेगा.

    प्रधान न्यायाधीश रंजन गोगोई (CJI Ranjan Gogoi), न्यायमूर्ति एसए बोबडे और न्यायमूर्ति एस अब्दुल नजीर की पीठ के समक्ष मुस्लिम पक्षकारों के एक वकील ने कहा कि उन्हें राहत में बदलाव के बारे में लिखित नोट रिकॉर्ड पर लाने की अनुमति दी जाए ताकि इस मामले की सुनवाई करने वाली संविधान पीठ इस पर विचार कर सके.

    6 अगस्त से 40 दिन तक चली सुनवाई
    प्रधान न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली संविधान पीठ ने छह अगस्त से इस मामले में 40 दिन सुनवाई करने के बाद 16 अक्टूबर को कहा था कि इस पर फैसला बाद में सुनाया जाएगा. इस वकील ने यह भी कहा कि विभिन्न पक्षकार और शीर्ष अदालत की रजिस्ट्री ने लिखित नोट सीलबंद लिफाफे में दाखिल करने पर आपत्ति जताई है.

    मुस्लिम पक्षकारों के वकील ने कहा, ‘‘हमने अब रविवार को सभी पक्षकारों को अपने लिखित नोट भेज दिए हैं.’’ साथ ही उन्होंने अनुरोध किया कि रजिस्ट्री को उनके रिकॉर्ड में रखने का निर्देश दिया जाए.

    हालांकि, पीठ ने इस लिखित नोट के विवरण के बारे में कहा कि सीलबंद लिफाफे में दाखिल यह नोट पहले मीडिया के एक वर्ग में खबर बन चुका है.

    भविष्य पर पड़ेगा कोर्ट के फैसले का असर

    संविधान पीठ के समक्ष लिखित नोट दाखिल करने वाले मुस्लिम पक्षकारों ने बाद में आम जनता के लिए एक बयान जारी किया था. मुस्लिम पक्षकारों की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता राजीव धवन द्वारा तैयार किये गए इस नोट में कहा गया है, ‘‘इस मामले में न्यायालय के समक्ष पक्षकार मुस्लिम पक्ष यह कहना चाहता है कि इस न्यायालय का निर्णय चाहे जो भी हो, उसका भावी

    पीढ़ी पर असर होगा. इसका देश की राज्य व्यवस्था पर असर पड़ेगा.’’

    इसमें कहा गया है कि न्यायालय का फैसला इस देश के उन करोड़ों नागरिकों और 26 जनवरी, 1950 को भारत को लोकतंत्रिक राष्ट्र घोषित किये जाने के बाद इसके संवैधानिक मूल्यों को अपनाने और उसमें विश्वास रखने वालों के दिमाग पर असर डाल सकता है..input (news 18)

  • अलवर लिंचिंगः राजस्थान सरकार ने निचली अदालत के फैसले के खिलाफ हाईकोर्ट में अपील दायर की

    राजस्थान सरकार ने अलवर में मॉब लिंचिंग का शिकार हुए पहलू खान के मामले में दोषियों को सजा दिलाने के लिए हाईकोर्ट का रुख किया है.

    इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य की कांग्रेस सरकार ने पहलू खान की हत्या के छह आरोपियों को बरी करने के अलवर की अदालत के फैसले को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट में अपील दाखिल की है.

    मालूम हो कि अलवर की अदालत ने बीते अगस्त महीने में इस मामले में सभी छह आरोपियों को संदेह का लाभ देते हुए बरी कर दिया था.

    इस फैसले के बाद राजस्थान सरकार ने मामले की जांच के लिए एसआईटी का गठन किया था, जिसने सितंबर में अपनी रिपोर्ट सौंपी थी.

    एडिशनल एडवोकेट जनरल मेजर आरपी सिंह ने बताया, ‘पहलू खान मामले में निचली अदालत के फैसले के खिलाफ सोमवार को राजस्थान हाईकोर्ट में अर्जी दाखिल की गई है. यह अपील राज्य सरकार की तरफ से गठित एसआईटी की जांच रिपोर्ट सौंपने के एक महीने बाद की गई है. रिपोर्ट में मामले की जांच के विभिन्न स्तरों पर प्रकाश डाला गया है.’

    रिपोर्ट में कहा गया है कि लिंचिंग के वीडियो को सबूत के तौर पर प्रभावी रूप से निचली अदालत में पेश नहीं किया गया.

    इसके अलावा कानूनी प्रक्रियाओं का भी सही तरीके से पालन नहीं किया गया. इस मामले की जांच पिछली भाजपा सरकार के कार्यकाल में हुई थी. उस समय वसुंधरा राजे प्रदेश की मुख्यमंत्री थीं.

    गौरतलब है कि एक अप्रैल, 2017 को राजस्थान के बहरोड़ थाना क्षेत्र में पहलू खान और उनके बेटे गायों को लेकर जा रहे थे, तभी भीड़ ने गो तस्करी के शक में उन्हें रोका और खान और उनके दो बेटों की भीड़ ने कथित तौर पर पिटाई की. इसके बाद तीन अप्रैल को इलाज के दौरान अस्पताल में खान की मौत हो गई.

    इससे पहले 14 अगस्त को अलवर में अतिरिक्त जिला जज ने अपना फैसला सुनाते हुए सभी छह आरोपियों को संदेह के आधार का लाभ देते हुए बरी कर दिया था.

    निचली अदालत ने पूरे मामले में राजस्थान पुलिस की तरफ से जांच में कमियों का भी उल्लेख किया था. इस फैसले के बाद राजस्थान के मुख्यमंत्री अशोक गहलोत ने कहा था कि उनकी सरकार निचली अदालत के इस फैसले के खिलाफ अपील कर सकती है.

    गहलोत का कहना था कि उनकी सरकार का रुख साफ है कि प्रदेश में किसी भी तरह की लिंचिंग नहीं होनी चाहिए.. INPUT:(THE WIRE)

  • Ayodhya Case : ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की अहम बैठक कल, फैसले से पहले मंथन

    अयोध्या मुद्दे पर ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड की एग्ज़िक्युटिव की मीटिंग कल लखनऊ में होगी. अयोध्या मसले (Ayodhya Case) पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पहले यह बोर्ड की आखिरी मीटिंग होगी. पर्सनल लॉ बोर्ड ही बाबरी मस्जिद के ज़्यादातर पक्षकारों को केस लड़ने में मदद करता है. मीटिंग में सुप्रीम कोर्ट में अभी तक हुई बहसों का विश्लेषण पेश किया जाएगा ताकि बोर्ड कुछ राय कायम कर सके कि मुकदमे का रुख क्या लगता है. गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या केस की सुनवाई चल रही है. सुनवाई 17 अक्टूबर तक होगी और नवंबर में इस मामले में फैसला आएगा. अब 14 अक्टूबर से सिर्फ चार दिन की सुनवाई और होगी.

    बोर्ड दो अहम मुद्दों पर अपनी रणनीति बनाएगा. पहली यह कि अगर मस्जिद के पक्षकार केस जीत जाते हैं तो उस हालत में उनका रुख क्या हो. अभी गुरुवार को ही लखनऊ में मुस्लिम बुद्धिजीवियों के एक सम्मेलन में यह प्रस्ताव पास हुआ है कि विवादित जमीन सुलह करके हिंदुओं को भगवान राम का मंदिर बनाने के लिए दे दी जाए. और अगर किसी वजह से समझौता न हो पाए या अगर मुसलमान मुक़दमा जीत भी जाएं तो भी वो उस जमीन को हिंदुओं को गिफ्ट कर दें.

    अब मुसलमान यह समझने लगे हैं कि अगर वे मुकदमा जीत भी जाएं तो भी अब वहां से रामलला की मूर्तियां हटाकर मस्जिद बनाना मुमकिन नहीं है. बैठक में ऐसे हालात के लिए बोर्ड अपना रुख तय करेगा.

    दूसरा मसला यह है कि अगर मंदिर पक्ष मुकदमा जीत जाता है तो उसके बाद देश भर में जिस तरह के विजय जुलूस और जश्न होंगे उसके नतीजे में हिंसा का अंदेशा है. इन हालात से कैसे निपटा जाए, बोर्ड इस पर भी अपनी राय कायम करेगा.

    एक ऐसे वक्त में जब मुसलमानों का एक बड़ा तबका चाहता है कि आपसी भाईचारे के लिए विवादित जमीन भगवान राम का मंदिर बनाने के लिए हिंदुओं को दे दी जाए, बोर्ड पर इसका भी दबाव जरूर होगा..input:(NDTV)

  • मॉब लिंचिंग पर मोदी को पत्र लिखने वाले लोगों के समर्थन में उतरीं 185 हस्तियां

    इन लोगों ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखने वाले 49 हस्तियों को प्रताड़ित किए जाने की निंदा करते हुए पत्र के हरेक शब्द का समर्थन करते हुए अपने कथन वाले नए पत्र को साझा किया है.

    इन्होंने कहा, ‘इसलिए हम एक बार फिर उस पत्र को यहां साझा कर रहे हैं और सांस्कृतिक, अकादमिक और कानूनी समुदायों से भी ऐसा करने की अपील कर रहे हैं. हममें से अधिकतर लोग रोजाना मॉब लिंचिंग, लोगों की आवाज को चुप कराने और नागरिकों को प्रताड़ित करने के लिए अदालतों के दुरुपयोग के बारे में बोलेंगे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुला पत्र लिखने वाली 49 हस्तियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज होने पर सांस्कृतिक और साहित्यिक क्षेत्र से जुड़ी हुईं 180 से अधिक हस्तियों ने इन आरोपों की निंदा कर उनका समर्थन किया है.

    न्यूजक्लिक की रिपोर्ट के मुताबिक, इस पत्र पर हस्ताक्षर करने वालों में अभिनेता नसीरुद्दीन शाह, लेखक नयनतारा सहगल, नृत्यांगना मल्लिका साराभाई, इतिहासकार रोमिला थापर, लेखक आनंद तेलतुम्बड़े, गायक टीएम  कृष्णा और कलाकार विवान सुंदरम शामिल हैं.

    इस बयान में उन्होंने कहा, ‘हममें से अधिकतर लोग हर दिन मॉब लिंचिंग, लोगों की आवाज को चुप कराने और नागरिकों को प्रताड़ित करने के लिए अदालतों के दुरुपयोग के खिलाफ बोलेंगे.’

    मालूम हो कि बीते तीन अक्टूबर को बिहार की एक अदालत के आदेश पर फिल्म निर्देशक श्याम बेनेगल, निर्देशक अडूर गोपालकृष्णन, मणिरत्नम, इतिहासकार रामचंद्र गुहा, गायिका शुभा मुद्गल, अभिनेत्री और निर्देशक अपर्णा सेन सहित 49 हस्तियों के ख़िलाफ़ एफआईआर दर्ज की गई थी. इन हस्तियों ने मॉब लिंचिंग की बढ़ रही घटनाओं को लेकर जुलाई में चिंता जताते हुए प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखा था.

    एफआईआर राजद्रोह सहित भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की कई धाराओं के तहत दर्ज की गई. वह भी तब, जब सुप्रीम कोर्ट के जज जस्टिस दीपक गुप्ता ने हाल ही में एक कार्यक्रम में कहा कि सरकार की आलोचना करने पर राजद्रोह के आरोप नहीं लगाए जा सकते

    इन 185 हस्तियों की ओर से जारी बयान में कहा गया है कि 49 सहयोगियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई क्योंकि इन्होंने समाज के सम्मानित सदस्य के रूप में अपने कर्तव्यों का निर्वहन किया था.

    इन्होंने कहा, ‘इन्होंने (49 हस्तियों) ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखकर देश में मॉब लिंचिंग के बारे में चिंता जताई थी. क्या इसे राजद्रोह कहा जा सकता है? और क्या अदालतों का दुरुपयोग करके नागरिकों की आवाज को चुप कराना प्रताड़ना नहीं है

    इन लोगों ने प्रधानमंत्री मोदी को पत्र लिखने वाले 49 हस्तियों को प्रताड़ित किए जाने की निंदा करते हुए पत्र के हरेक शब्द का समर्थन करते हुए अपने कथन वाले नए पत्र को साझा किया है.

    इन्होंने कहा, ‘इसलिए हम एक बार फिर उस पत्र को यहां साझा कर रहे हैं और सांस्कृतिक, अकादमिक और कानूनी समुदायों से भी ऐसा करने की अपील कर रहे हैं. हममें से अधिकतर लोग रोजाना मॉब लिंचिंग, लोगों की आवाज को चुप कराने और नागरिकों को प्रताड़ित करने के लिए अदालतों के दुरुपयोग के बारे में बोलेंगे..INPUT:(THE WIRE)

  • Ayodhya Case : निर्मोही अखाड़े ने कहा- अब सुनवाई ‘टी-20’ जैसी हो गई, सुप्रीम कोर्ट ने लगाई लताड़

    अयोध्या केस (Ayodhya Case) में सुप्रीम कोर्ट में राम जन्मभूमि-बाबरी मस्जिद जमीन विवाद पर गुरुवार को 36वें दिन सुनवाई हुई. कोर्ट में निर्मोही अखाड़े की ओर से सुशील जैन ने कहा कि अब यह सुनवाई 20-20 जैसी हो गई है. इस पर कोर्ट ने नाराजगी जताते हुए कहा कि आपको हमने साढ़े चार दिन दिए. यहां आपको जवाब देना है तो अब आप इसे 20-20 कह रहे हैं? तो क्या आपकी पिछली बहस टेस्ट मैच थी? सुशील जैन ने कहा कि हमारा दावा आंतरिक अहाते को लेकर है, क्योंकि बाहर तो हमारा अधिकार और कब्ज़ा था ही. हमने बाहर के पजेशन के लिए अर्ज़ी नहीं लगाई है क्योंकि वह तो पहले से ही हमारे पास था..

    अखाड़े के जवाब शुरू होने से पहले ही मुस्लिम पक्ष के वकील राजीव धवन ने कहा कि जवाब में मेरा नाम गलत लिखा हुआ है. सुशील जैन ने कहा कि मेरी दलीलें और जवाब थोड़े पेचीदा हैं. इस पर जस्टिस नज़ीर ने हंसते हुए कहा कि आप चिंता ना करें आप हारते भी हैं तो आप जीतने वालों की तरफ ही होंगे. यानी कोर्ट का आशय था कि हिन्दू अखाड़ा और सेवायत होने की वजह से आपको भी लाभ मिल सकता है.

    हिन्दू पक्षकार श्री राम जन्मस्थान पुनरुत्थान समिति के पीए मिश्रा ने जवाब देते हुए भूमि की शास्त्रीय व्याख्या की. उन्होंने कहा कि इमारत भी भूमि की श्रेणी में आती है. लेकिन स्थान का मतलब देवता का भवन या धाम भी होता है. राजीव धवन ने कहा कि इस दलील का कोई मतलब नहीं क्योंकि भूमि की हिन्दू व्याख्या और शब्दकोश अलग है और मुस्लिम डिक्शनरी अलग.

    भूमि के देवता होने की सात मौलिक शर्तों और व्याख्या पर मिश्रा के ताजा दस्तावेज कोर्ट ने खारिज कर दिए. कोर्ट ने कहा कि ये सब पहले क्यों नहीं बताया, जो अब कोर्ट के सामने लाए हैं. इस चरण में हम इसे स्वीकार नहीं कर सकते. जस्टिस चंद्रचूड़ ने कहा कि आप देवता की मूर्ति की पूजा करते हैं न कि अमूर्त चीजों की!  चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि आप यहां क्या संवैधानिक मसला बताना चाहते हैं. हम पांच जज बैठे हैं तो इसका मतलब ये नहीं कि ये संविधान पीठ है, ये सिर्फ पांच जजों की बेंच है. आम तौर पर ऐसे मुद्दों की सुनवाई दो जजों की बेंच करती है, लेकिन पांच जजों की बेंच इस मुद्दे की संवेदनशीलता और अहमियत को देखते हुए सुनवाई कर रही है.

    सीजेआई ने कहा कि यह पहली अपील है. हम यहां सिर्फ टाइटल सूट को सुनने बैठे हैं. अब नई-नई चीजें बताने का समय नहीं है. कोर्ट ने मिश्रा को बैठने को कहा और निर्मोही अखाड़े के सुशील जैन से अपना जवाब देने को कहा.

    इससे पहले हिंदू पक्षकार की ओर से नरसिंहन ने स्कन्दपुराण के अयोध्या महात्यम के श्लोक ‘तस्मात स्थानेषाणे रामजन्म प्रवर्तते. जन्मस्थाम इदं प्रोक्तं मोक्षादि फलसाधनम..’ उदधृत करते हुए कहा कि अयोध्या में राम जन्म स्थान की यात्रा मोक्षदाई है. मोक्ष हिन्दू दर्शन के चार पुरुषार्थों में से आखिरी है. नरसिंहन मने कहा कि यह अकेली जगह नहीं जहां मंदिर के साथ मस्जिद बनाई गई है. उनका मकसद रहा कि हम राम के अपनी श्रद्धा भूल जाएं. इतना होने के बावजूद हिंदुओं की आस्था यहां लगातार बनी हुई है..INPUT(NDTV)

  • मोदी-शी बैठक: चीनी राष्ट्रपति के स्वागत के लिए बैनर लगाने की मिली अनुमति, बॉलीवुड एक्टर ने किया यह ट्वीट

    मद्रास हाईकोर्ट ने अगले सप्ताह चेन्नई में पीएम नरेंद्र मोदी एवं चीनी राष्ट्रपति शी चिनफिंग के बीच होने वाली अनौपचारिक बैठक के लिये तमिलनाडु और केंद्र सरकार को दोनों नेताओं के स्वागत में बैनर लगाने की बृहस्पतिवार को अनुमति दे दी. अदालत ने कहा कि दोनों गणमान्य एक महिला इंजीनियर की मौत के बाद सड़क किनारे बैनर लगाने पर प्रतिबंध लगाया था और उसके आदेशों को प्रभावी तरीके से लागू नहीं करने पर सरकार की खिंचाई की थी. न्यायमूर्ति व्यक्तियों के स्वागत में बैनर लगाये जाने पर उसे कोई आपत्ति नहीं है. अदालत ने इससे पहले एम सत्यनारायणन और न्यायमूर्ति एन सेशासयी की खंडपीठ ने हालांकि यह स्पष्ट किया कि ऐसे बैनरों को लगाने के संदर्भ में राज्य को मौजूदा सभी नियमों का पालन करना होगा. पीठ ने यह भी कहा कि किसी भी राजनीतिक दल को इस तरह के बैनर लगाने की इजाजत नहीं होगी.

    राज्य सरकार ने मल्लपुरम में होने वाली मोदी और शी चिनफिंग की मुलाकात से पहले बैनर लगाने के लिये मंगलवार को अदालत से इस संबंध में अनुमति देने का अनुरोध किया था. मल्लपुरम यहां से 50 किलोमीटर दूर है जहां मोदी एवं चिनफिंग की 11-13 अक्टूबर को अनौपचारिक बैठक होने वाली है. दोनों नेताओं के बीच यह ऐसी दूसरी अनौपचारिक बैठक होगी. नगर निगम प्रशासन के आयुक्त और अधिकारियों की ओर से दायर याचिका पर हालांकि अदालत ने समूचे राज्य में ऐसे ढांचे लगाने की अनुमति नहीं दी. याचिकाकर्ता ने बताया था कि मोदी और चिनफिंग पर्यटन शहर में द्विपक्षीय वार्ता करेंगे. याचिकाकर्ता ने कहा कि आगंतुक गणमान्य व्यक्तियों के स्वागत में बैनर लगाना विदेश मंत्रालय की परंपरा रही है. उसने बताया कि राज्य एवं केंद्र सरकारों ने शीर्ष गणमान्य अतिथियों के स्वागत में निश्चित स्थानों पर बैनर लगाने का प्रस्ताव दिया था, जिस पर याचिकाकर्ता ने अदालत से इस प्रस्ताव पर उपयुक्त आदेश देने का अनुरोध किया था.

    मक्कल निधि मैयम के संस्थापक कमल हासन ने सरकार के इस कदम पर बुधवार को प्रतिक्रिया देते हुए मोदी एवं शी चिनफिंग के स्वागत में बैनर लगाने के लिये अदालत से मंजूरी का अनुरोध करने से संबंधित इस कदम की आलोचना की थी. अभिनेता से नेता बने हासन ने मोदी से ‘‘एक अगुवा के तौर पर कार्य करने” और ‘‘बैनर संस्कृति” को खत्म करने की अपील की. इससे पहले अदालत ने 23 वर्षीय इंजीनियर सुभाश्री की मौत के बाद अवैध होर्डिंग को लगाने के खिलाफ एक याचिका पर सुनवाई करते हुए राज्य सरकार को फटकार लगायी थी. अवैध होर्डिंग के खिलाफ सख्त रुख दिखाते हुए अदालत ने हैरानी जतायी, ‘‘राज्य सरकार को सड़कों को खून से रंगने के लिये और कितने लीटर खून की जरूरत है

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    27 सितंबर को हुई घटना के सिलसिले में पुलिस ने सत्तारूढ़ अन्नाद्रमुक के स्थानीय स्तर के एक पदाधिकारी जयगोपाल को पकड़ा था और उसके खिलाफ गैर इरादतन हत्या का मामला दर्ज किया गया. वह करीब दो हफ्ते से गिरफ्तारी से बच रहा था. अन्नाद्रमुक के पदाधिकारी द्वारा लगायी गयी अवैध होर्डिंग के नीचे से गुजर रही लड़की पर यह होर्डिंग गिर गयी थी जिससे वह सड़क पर गिर गयी, तभी एक लॉरी ने उसे कुचल दिया जिससे उसकी मौत हो गयी. यह होर्डिंग जयगोपाल.. INPUT:(NDTV)