Category: खास ख़बरें

  • काफी संघर्ष के बाद जेल से रिहा हुई बहन सफ़ूरा ज़रगर को मुबारकबाद

    अफ्फान नोमानी

    जम्मू में जन्मी और दिल्ली में पली-बढ़ी ,जामिया मिलिया से सोशियोलॉजी में एमफिल कर रही व साथ ही जामिया कोऑर्डिनेशन कमेटी (जेसीसी) की मीडिया संयोजक सफ़ूरा ज़रगर, जामिया से जेल तक संघर्ष भरी दास्तां सब याद रखा जायेगा. सलाम तेरे साहस व हिम्मत को जिसने निरंकुश सत्ता की आँखों मे आँखें डालकर हमेशा लोकतंत्र व संविधान की आत्मा को जिंदा रखा. गर्भवती के बावजूद स्वतंत्र आवाज को बुलंद रखा. हक़ व इंसाफ के लिए अडिग रही व जुल्म व अन्याय के ख़िलाफ़ संघर्ष करना संघर्षशील साथियों के लिए मिसाल है.

    हमें याद है सीएए आंदोलन का संघर्ष भरा वो लम्हा जब जामिया से जेएनयू, जेएनयू से एएमयू व आईआईटी तक हर तरफ संविधान की रक्षा के लिए ,अपनी पहचान के लिए निरंकुश सत्ता के खिलाफ बिगुल बच चूका था. निरकुंश पुलिस की लाठी का स्वंतत्र आवाज पर प्रहार से पुरे मुल्क में कोहराम मच गया. सफ़ूरा जामिया कोऑर्डिनेशन कमेटी की मीडिया प्रभारी पद पर होते हुवे जाबांज नौजवानों को एक साथ लेकर मुहीम में जो परवान चढ़ा वो मुल्क के हर कोने में गूंज उठा. जो संगठन निरकुंश सत्ता के खिलाफ बोलने से घबराते थे उनका भी धीरे-धीरे स्वर तेज होने लगा. सत्ता में बैठी भाजपा सरकार ने घबराकर आनन-फानन में सीएए विरोधी कार्यकर्ता को गिरप्तार करना शुरू कर दिया. देश के विभिन्न भाजपा शासित राज्यों में खासकर सीएए विरोधी कार्यकर्ता को गिरप्तार किया गया. कई राज्यों में बहुत से सीएए विरोधी कार्यकर्ता पुलिस की अंधाधुन लाठी चार्ज से शहीद हो गए. वो जामिया ही है जहाँ की छात्रों द्वारा सीएए विरोधी मुहीम ने शाहीनबाग आंदोलन को जन्म दिया और एक शाहीनबाग की बुनियाद पर देश के विभिन्न जगहों पर शाहीनबाग का जन्म हुआ. नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) के विरोध आंदोलन ने देश भर में इस कदर तूल पकड़ा की गैर भाजपा शासित राज्यों में सीएए के विरोध में बिल पास किया गया. केंद्र में बैठी भाजपा सरकार बैकफुट पर आ गयी थी लेकिन इसी बीच गहरी साजिश के तहत दिल्ली में दंगा हुआ. सैकड़ो निर्दोष लोग मारे गए. कई कंपनी, दुकान और घरों में आग जनी हुई और लोग अपने घरों से बेघर हो गए. लेकिन सरकार ने दिल्ली दंगा का निष्पक्ष जाँच कराने के बजाय दंगाई को खुली छूट मिली और दंगा पीड़ितों को मदद करने वाले एक विशेष समुदाय के लोगो को निशाना बनाया गया.

    मालूम हो कि इससे पहले केंद्रीय गृह मंत्रालय ने दिल्ली पुलिस से यह सुनिश्चित करने को कहा था कि कोरोना और लॉकडाउन के चलते दिल्ली दंगा मामले की जांच धीमी नहीं पड़नी चाहिए, जिसके बाद हिंसा मामले में पुलिस 13 अप्रैल तक 800 से अधिक लोगों को गिरप्तारी हुई जिसमें 85% से ज्यादा एक विशेष समुदाय वर्ग के नौजवानों, व्यवसाय व शिक्षण संस्थानो से जुड़े लोगों को गिरप्तार किया गया. उसी कड़ी में जामिया के शोधार्थी छात्र सफ़ूरा ज़रगर, मीरान हैदर, आसिफ इकबाल तन्हा और एल्युमनी एसोसिएशन ऑफ जामिया मिलिया इस्लामिया के अध्यक्ष शिफाउर्ररहमान खान को गिरफ्तार किया गया.

    इन छात्रों पर राजद्रोह, हत्या, हत्या के प्रयास, धर्म के आधार पर विभिन्न समूहों के बीच नफरत को बढ़ावा देने और दंगा करने के अपराध के लिए भी मामला दर्ज किया गया . बड़ी तादाद में जेएनयू , एएमयू , बीएचयू व उस्मानिया यूनिवर्सिटी सहित अन्य यूनिवर्सिटी छात्र छात्रों को भी गिरप्तार किया गया.

    गिरफ्तार सीएए विरोधी कार्यकर्ताओं में सफ़ूरा ज़रगर का नाम ज्यादा सुर्ख़ियों में रही. 27 वर्षीय सफ़ूरा ज़रगर अपनी पहली गर्भावस्था के दूसरे तिमाही में 10 अप्रैल 2020 को गिरफ्तार किया गया था. सफ़ूरा ज़रगर की गिरफ्तारी उस समय सामने आई है जब कोरोना वायरस को फैलने से रोकने के लिए मोदी सरकार ने देशव्यापी लॉकडाउन कर रखा था. जो अपना रमजान के पहले दिन तिहाड़ जेल में बिताया. गर्भावस्था में सफुरा जर्गर की रमजान में गिरप्तारी की खबर ने एक विशेष समुदाय वर्गो के दिलों को झकझोर कर रख दिया. विभिन्न संगठनों के जिम्मेदार ,समाजिक कार्यकर्ता व वरिष्ठ पत्रकारों ने सफ़ूरा ज़रगर की रमजान में गिरप्तारी को अमानवीय करार देते हुवे दुःख प्रकट किया. सफ़ूरा ज़रगर निरंकुश सत्ताधारी पार्टी के आँखों की किरकरी की अहम वजह यह रही की जामिया कोऑर्डिनेशन कमेटी की मीडिया प्रभारी पद पर होते हुवे सभी जाबांज युवाओं को एकजुट किया और सत्ताधारी पार्टी के ख़िलाफ नागरिकता संशोधन कानून (सीएए) विरोधी आंदोलन को तेज करने की कोशिश की और बहुत ही मुखर होकर नागरिक संशोधन कानून (सीएए) को देश के 180 मिलियन मुस्लिम अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव करता है और देश के धर्मनिरपेक्ष संविधान के ख़िलाफ बताया. राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय मीडिया में प्रकाशित होने के बाद केंद्र की सत्ता में बैठी सरकार को यह बात हजम नहीं हुई.

    अंतत: 10 अप्रेल 2020 को दिल्ली पुलिस ने गिरप्तार किया और बाद में अदालत में दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल ने कड़े आतंकवाद विरोधी कानून गैरकानूनी गतिविधि रोकथाम अधिनियम 2019 ( UAPA ) के तहत कार्रवाई की. मामला गिरप्तारी से करवाई तक ही नहीं रुकता है बल्कि गिरप्तारी के बाद सोशल मीडिया पर गंदी मानसिकता व नफरती दक्षिणपंथी गिरोह ने उनकी शादी और गर्भावस्था को लेकर अश्लीलता, फूहड़ता ,सेक्सिस्ट ट्रोलिंग जो हो सकता था सफुरा के खिलाफ हर तरह के प्रोपेगैंडा का इस्तेमाल किया गया. घटिया मीम्स और सफूरा की तस्वीरों से छेड़छाड़ कर छवि खराब करने की कोशिश हुई. उनके गर्भ में पल रहे बच्चे के पिता की पहचान को लेकर आला दर्जे के झूठ गढ़े गए. जबकि सच्चाई यही है की सफुरा एक नेक और प्रतिष्ठित संस्थान में पढ़ाई करने वाली वर्त्तमान में शादीशुदा गर्भवती महिला है. काबिलेतारीफ बात यह है की हर तरह के प्रोपेगैंडा के बावजूद सफ़ूरा ज़रगर अडिग रही और मजबूती से क़ानूनी लड़ाई लड़ती रही.

    अंतत: लंबी क़ानूनी प्रक्रिया व संघर्ष भरी जिंदगी बिताने के 73 दिनों बाद आज दिनांक 23 जून 2020 गत मंगलवार को सफ़ूरा ज़रगर को दिल्ली हाईकोर्ट ने मानवीय आधार पर जमानत दे दी.

    काफी संघर्ष के बाद जेल से रिहा हुई बहन सफ़ूरा ज़रगर को मुबारकबाद. जिंदगी रहे सलामत ये दुआ है हमारी.

    लेखक अफ्फान नोमानी रिसर्च स्कॉलर व लेक्चरर है. इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं.

  • आरएमएल हॉस्पिटल के स्टाफ ने बेड पता करने गये फोरम4 के संपादक से की मारपीट

    देश की राजधानी दिल्ली में आज फिर एक पत्रकार के साथ मारपीट और बदसलूकी का मामला सामने आया है। आर एम एल हॉस्पिटल के स्टाफ और वहां के कुछ गार्ड्स ने फ़ोरम4 के मुख्य संपादक और पत्रकार प्रभात के साथ मारपीट की। यह घटना उस समय घटी जब पत्रकार प्रभात अपने एक साथी के इलाज़ के सिलसिले में रोगी के बेड से जुड़ी पूछताछ के लिए आर एम एल हॉस्पिटल पहुंचे।

    आज कल कोविड-19 के दौरान हॉस्पिटल्स में रोगियों के उपचार में काफ़ी दिक्कतें आ रही हैं। रोगियों का उपचार और भर्ती प्रक्रिया के संबंध में लगातार शिकायतें भी आ रही हैं। इसी बीच हाल ही में मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने हॉस्पिटल सख़्त कदम उठाते हुए डॉक्टर और हॉस्पिटल के लिए कुछ नए निर्देश भी जारी किए जिसमें रोगियों के उपचार में कुछ सहूलियतों के बरतने का भी ज़िक्र किया गया था पत्रकार प्रभात ने आर एम एल हॉस्पिटल के रिसेप्शन पर जाकर पूछा कि नए एमरजेंसी मरीजों के उपचार के लिए बेड उपलब्ध हैं या नहीं, जवाब था “नहीं”। रिसेप्शन पर मौजूद व्यक्ति ने कहा “यहां बेड नहीं है कुछ भी ; हम नए मरीज नहीं लेंगे ।” हॉस्पिटल स्टाफ का ये झूठ और रोगियों के साथ बरती जा रही लापरवाही मोबाइल कैमरे में रिकॉर्ड हो चुकी थी।

    अब क्या था आर एम एल हॉस्पिटल के स्टाफ ने झड़प शुरू कर दी और वह पत्रकार के पीछे पीछे आने लगा और पत्रकार प्रभात से मोबाइल फोन छीन लिया और मौके पर लाठी डंडे समेत आए गार्ड्स ने मारपीट भी शुरू कर दी। ऐसे में प्रभात को काफ़ी चोटें भी आयीं।

    गंभीर त्रासदी और संकट से जूझ रहे देश में पत्रकार भी सच न दिखा सकें तो देश के लिए इससे बुरा दिन और कोई नहीं होगा। सरकारों के दावों की पड़ताल भी नहीं होगी तो क्या होगा? अगर इसी तरह पत्रकारों को सच दिखाने से रोका गया तो बुरे अंजाम सामने आएंगे। सरकारी विभागों में लापरवाही, भ्रष्टाचार, कालाबाजारी की अनगिनत घटनाएं घटित होगी और लोकतंत्र के चौथे स्तंभ में शामिल पत्रकार की ज़बान बंद होने पर देश को सबसे बड़े खतरे से गुजरना होगा और आम जनता बेबसी का शिकार बन जाएगी।

  • जानिए क्या है माहे रमजान का महत्व? सुरक्षित प्रक्रिया कैसे अपनाएं कोरोना वायरस संकट के समय

    खुर्रम मालिक

    जैसा के हम सब को पता है के इस समय पूरी दुनिया कोरोना नामक महामारी से पीड़ित है और इस से बचाव के लिए हर वह उपाय किये जा रहे हैं जो इस बीमारी से मनुष्य को बचा सके. पूरी दुनिया में लाक डाउन हैऔर लोगों को अपने अपने घरों में रहने के लिये कहा गया है.जिस का पालन सभी लोग कर रहे हैं. और इसी बीच कल इस्लामिक पवित्र महीना रमज़ान का चांद पूरे देश में देखा गया और आज से रोज़ा शुरु हो गया. और इसी के साथ पूरी दुनिया के मुसलमानों ने रोज़ा रख कर इस पवित्र महीना का आरंभ किया. सब से पहले बात करते हैं के यह महीना है किया?इसकी महत्ता किया है और इसे इतना पवित्र कियु कहा गया है?

    ○इस्लामिक कैलेंडर का 9वां महीना रमजा़न है। इस महीने में मुसलमान रोजा़ रखते हैं। रोजे़ के दौरान सूर्योदय(सूरज निकलने)से लेकर सूर्यास्त(सुरज डूबने)तक कुछ भी नहीं खाते-पीते। इसके साथ ही रमजा़न में बुरी आदतों से दूर रहने के लिए भी कहा गया है। रमजा़न में मुसलमान लोग अल्लाह को उनकी नेमत के लिए शुक्रिया अदा करते हैं। महीने भर रोजे़ के बाद शव्वाल की पहली तारीख़ को ईद उल फि़तर मनाया जाता है। इन सबके बीच क्या आप जानते हैं कि रमजान क्यों मनाया जाता है? और इसका इतिहास क्या है? आज हम आपको इस बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं।

    ○रमज़ान या रमदान (उर्दू – अरबी – फ़ारसी : رمضان) इस्लामी कैलेण्डर का नवां महीना होता है. मुस्लिम समुदाय इस महीने को परम पवित्र मानते हैं . रमजान शब्द अरब से निकला है. अर्थात यह एक अरबिक शब्द है जिसका अर्थ है कि “चिलचिलाती गर्मी तथा सूखापन”

    ○ऐसा माना जाता है कि मोहम्मद साहब को साल 610 में लेयलत उल-क़द्र के मौके़ पर पवित्र कु़रान शरीफ़ का ज्ञान प्राप्त हुआ था। उसी समय से रमजा़न को इस्लाम धर्म के पवित्र महीने के तौर पर मानाया जाने लगा। इस पवित्र महीने में मुसलमान लोगों को कुछ खास सावधानियां बरतने की सलाह दी गई है।

    ○रमज़ान या रमदान (उर्दू – अरबी – फ़ारसी : رمضان) इस्लामी कैलेण्डर का नवां महीना होता है. मुस्लिम समुदाय इस महीने को परम पवित्र मानते हैं . रमजान शब्द अरब से निकला है. अर्थात यह एक अरबिक शब्द है जिसका अर्थ है कि “चिलचिलाती गर्मी तथा सूखापन”.
    ○इस पवित्र महीने का महत्व यह भी है के उसी पवित्र महीने में चारों आसमानी किताबें उतारी गई, जिस में तौरैत, ज़बूर(दाऊद अ) , इन्जील, और पाक किताब क़ुरान ए पाक हज़रत मुहम्मद सo पर. इस महीने की महत्ता का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि अल्लाह ने कहा के यह महीना मेरा महीना है और मैं इस महीने का बदला लोगों को उन के कर्मो के अनुरूप दूँगा. इस का सीधा अर्थ यह है के यह महीना अल्लाह के नज़्दीक बहुत महत्व वाला है.
    ○इस पवित्र महीने में इब्लीस (शैतान) को बंदी बना कर क़ैद कर लिया जाता है. इस पवित्र महीने में कुछ चीज़ें हैं जिन को करना अत्यंत महत्वपूर्ण है. ○1- रोज़ा- इस पवित्र महीने में सारे मुसलमानों को रोज़ा अर्थात उप्वास रखने का आदेश दिया गया है जो सुर्युदय से ले करसुर्यास्त तक होता है.अर्थात सुबह की अज़ान जिसे इस्लाम में फ़ज्र कहा गया है उस समय से ले कर शाम को सुरज डूबने तक सभी मुसलमानों को बिना दाना पानी खाए भूखा रहना होता है. लेकिन इस्लाम ने ऐसे लोगों के लिए छूट भी दी है जो बीमार हैं या जिन्हें डाक्टर ने भूखा रहने को मना किया है. तो ऐसे लोगों के लिये इस्लाम ने यह आदेश दिया है के वह रमज़ान के रोज़े ना रखे और जब वह स्वस्थ हो जाए तो बाद में वह रोज़े रख ले. कियु के इस्लाम में कहीं कोई ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं है. जैसा लोग समझ्ते है.

    ○2- तरावीह -यह एक नमाज़ है जिसे तरावीह की नमाज़ कहा जाता है. इस का पढ़ना सुननत ए मो’अक्कदा है अर्थात जिस के पढ़ने पर पुनय मिलता है. जो के 20 रकात पढी़ जाती है. इस नमाज़ में क़ुरान को एक हाफ़िज़ साहब (क़ुरान को याद किया हुआ इंसान) पढ़ते हैं और पीछे लोग उसे सुनते हैं.

    ○3-इफ़्तार -यह सुर्युदय के बाद अर्थात मग़रिब की अज़ान होने पर किया जाता है.जिस में सब से पहले खजूर खाने को कहा गया है या अगर यह नहीं है तो किसी मीठी चीज़ से अपना रोज़ा(उप्वास) खोले.

    ○4-सेहरी- यह सुबह के समय के खाने को कहा जाता है अर्थात ठीक सुर्युदय से पहले कुछ भी भोजन गर्हण कर लेना होता है. और इस की महत्ता के बारे में खु़द मुहम्मद साहब ने कहा है के

    قال رسول الله ص: تسحروا فان في السحور بركة..(بخاری شریف)

    क़ाला रसूलुल्लाह सo..
    तसह्हरु फ़’इनना फ़िस-सुहूरी बर’कतन (बुखा़रीशरीफ़)

    रोज़ा रखने के लिए सेहरी मस्नून है,हदीस में इस अमल को बरकत क़रार दिया गया है इस लिए सेहरी का ख़ास एहतेमाम करना चाहिए.

    5-ज़कात – ज़कात या ( अरबी : زكاة ) इस्लाम के पाँच स्तंभों में से एक है, जिसका शाब्दिक अर्थ है शुद्ध या पोषण करना। इसका मुख्य उद्देश्य ग़रीबों की मदद करना, सामाजिक कल्याण में अमीरों को शामिल करना और योग्य लोगों के लिए निर्वाह के साधन उपलब्ध कराना है।
    इस्लाम में जिस तरह नमाज़ पढ़ने पर ज़ोर दिया गया है ठीक इसी तरह ज़कात निकलने पर भी सख़्त आदेश दिये गए हैं. कियु के नमाज़ के बाद इस पर सब से ज़ियादा बात की गई है. वह इस लिये के इस के निकलने से ग़रीबों की मदद हो जाती है और इस का हुक्म मुहम्मद साहब के समय ही हुआ था जिस का पालन अब तक किया जा रहा है .
    इस की व्याख्या अगर सरल शब्दों में की जाए तो इस का अर्थ यह निकलता है के वैसे मुसलमान जो माल्दार हैं, पैसे से सम्पन्न हैं और पूरे साल में जो कमाता है और उस के बाद अगर उस के पास पैसे बच जाते हैं तो वह उस का ढाई अर्थात 2.5 पर्तिशत निकाल कर ग़रीबों, मोह्ताजों को देना होता है. इस्लाम ने इसे इस लिये लागू किया था के इस से समाज में गरीब लोगों का भी उद्धार हो और वह भी एक बेहतर जीवन व्यतीत कर सकें.

    6-ऐतेकाफ़- रमज़ान के पवित्र महीने के आखि़री के दस दिनों में मुसलमानों को अपने अपने मोहल्ले की मस्जिद में पूरे दस दिनों के लिए अल्लाह की इबादत के लिए बैठना होता है. एक मोहल्ले से अगर एक भी आदमी बैठ गया तो सब की तरफ़ से अदा हो जाता है. लेकिन अगर एक भी आदमी नहीं बैठा तो पूरी मोहल्ले को गुनाह मिलता है. और इस दौरान वह व्यक्ति मस्जिद से बाहर नहीं जा सकता है,.आप यह कह सकते हैं के मनुष्य का पूरी तरह से इश्वर की साधना में लीन हो जाना ही ऐतेकाफ़ है. और इस का अल्लह के क़रीब बहुत सवाब (पुण्य) है. और यह ईद का चांद देखने के बाद समाप्त हो जाता है और मो’तकिफ़ (मस्जिद में इबादत के लिए बैठने वाला) अपने घर चला जाता है.
    इस्लाम में कहा गया है के अगर कोई मुसलमान पूरी निष्ठा और श्रद्धा से रमज़ान के इन आखि़री के दस दिनों में मस्जिद में अल्लाह की इबादत के लिये बैठता है तो उस पर अल्लाह की खा़स रहमत होती है. और जब वह मस्जिद से निकलता है तो ऐसे होता है जैसे एक पैदा हुआ बच्चा.अर्थात जैसे एक बच्चा गुनाह से पाक होता है वैसे ही वह इंसान भी हो जाता है. इस पवित्र महीने में अल्लाह ने मुसलमानों को झूट,लड़ाई झगड़े से बचने को कहा है. आपस में भेद भाव मिटाने को कहा गया है. ग़रीब और बे सहारा लोगों की मदद करने का आदेश दिया गया है. अर्थात झूट की जगह सच, बुराई की जगह अच्छाई,बद की जगह नेक को दर्शाने के लिए कहा गया है.

    इसी के साथ मौजूदा रमज़ान कुछ अलग तरह का हो गया है. कोरोना की वजह कर लोग सरकारी आदेश का पालन कर रहे हैं. इस लिये मस्जिद में तरावीह नहीं हो रही है, और लोग अपने अपने घरों में ही नमाज़, तरावीह पढ़ रहे हैं जो के मुसलमानों के लिये अत्यंत दुख का कारण है. किन्तु महामारी के चलते सभी मुसलमान बाहर भी नहीं जा सकते हैं. कियु के हदीस के अनुसार अगर कहीं भी कोई वबा (महामारी) फैलती है तो ऐसे में नमाज़ घरों में पढ़ने का हुक्म दिया गया है. इस साल के रमज़ान में मुसलमान मस्जिद में तरावीह को याद कर के अफ़्सोस का इज़्हार तो कर रहा है है लेकिन दूसरी और वह इस महामारी के विक्राल रूप को भी देख रहा है और इस्लाम में अपनी और अपने परीवार की रक्षा करने को भी कहा गया है.साथ ही मुसलमानों के बड़े उलेमा ने भी घर में ही रह कर इबादात करने का आदेश दिया है और मुसलमान इस का पूरी तरह पालन भी कर रहे हैं. कुल मिला कर यह कहा जा सकता है के इस साल का रमज़ान इतिहास में ऐसा पहला रमज़ान है जिस में मुसलमान मस्जिद में ना जा कर घर में ही इबादात कर रहा है और अपने अल्लाह के हुक्म को मानने के साथ ही अपने देश की सरकार और प्रशासन का पूरी तरह से सहयोग कर रहा है जो के सराहनिय है.
    इस लिये हम भी दुआ करते हैं के यह पवित्र महीना रमज़ान हम तमाम इंसानियत के लिये बेहतर साबित हो और इस मुबारक महीने की बरकत से हमारे देश और पूरी दुनिया से कोरोना नामक बीमारी को अल्लाह ख़त्म कर दे और तमाम इंसानियत की हिफ़ाज़त फ़रमाए. और देश में अमन शान्ती और भाई चारे को बनाए रखे. आमीन

    खुर्रम मालिक इस्लामिक स्कॉलर और पत्रकार है। ये लेखक के निजी और व्यक्तिगत विचार हैं

  • मंडल का वह सैलाब जो कई दलों के तम्बूओं को बहा ले गया: बी पी मंडल की पुण्यतिथि विशेष

    1977 में जनता पार्टी की सरकार बनते ही मोरारजी देसाई ने अपने घोषणापत्र में किये वादे के अनुरूप पिछड़े वर्ग के लिए उत्थान के लिए आयोग गठन के लिए कदम उठाया और पुराने पड़ चुके काका कालेलकर आयोग की जगह बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री स्व बी पी मंडल की अध्यक्षता में नए आयोग की घोषणा की जिसे मंडल आयोग के नाम से आम लोगों के बीच जाना गया। स्व मंडल ने अपनी टीम के साथ काम करना शुरू किया और इससे पहले कि वे अपनी रिपोर्ट तैयार कर पाते , जनता पार्टी की सरकार अपने ही बोझ और पदलोलुप सहयोगियों के कुचक्र से धराशायी हो गयी। फिर से चुनाव हुए और जनता पार्टी की पिछली भारी -भरकम जीत को देख कई राजनीतिक पंडितों के द्वारा कांग्रेस और इंदिरा गाँधी जबरदस्त तरीके से कमबैक की। सिर्फ दो साल पहले हुए चुनाव में जिस जनता पार्टी और अलायन्स ने 345 सीटें हासिल कर कांग्रेस को महज 154 सीटों पर धकेल दिया , वही 1979 में हुए चुनाव में कांग्रेस ने 354 सीटें बटोर ली और पदलोलुपों की पार्टी जनता पार्टी महज 31 सीट ही हासिल कर सकी। खैर , यह इस पोस्ट का विषय नहीं है।

    14 जनवरी 1980 को इंदिरा गाँधी पुनः प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और तब तक बी पी मंडल अपनी रिपोर्ट भी लगभग तैयार कर चुके थे। 31 दिसंबर 1980 को मंडल कमिशन ने अपनी रिपोर्ट इंदिरा गाँधी को सौंप दिया। इंदिरा गाँधी को मंडल कमिशन की सिफारिशों को नहीं लागू करना था , सो उन्होंने नहीं किया और उस पर कुंडली मार कर बैठ गयी। इंदिरा गाँधी ने इसे क्यों नहीं लागू किया , राजनीति के छात्रों को इसे समझ पाना बहुत मुश्किल नहीं है। कांग्रेस का आधार वोट जो भी रहा हो लेकिन शीर्ष नेतृत्व समूह अगड़ी जातियों का ही समूह था। इक्के -दुक्के दलित और पिछड़ा चेहरा यदि था भी तो वह सिर्फ चेहरा चमकाने के लिए था , डिसिशन मेकिंग में ये लोग कोई तवज्जो नहीं पाते थे। इनके आधार वोट्स में मुस्लिम के अलावा सवर्ण जातियों का बहुत बड़ा समूह था जिसे नाराज कर मंडल आयोग की अनुशंसाओं को लागू कर पाना इंदिरा के लिए इतना सहज नहीं था। मँझोली जातियाँ और दलितों के वोट्स कांग्रेस को नहीं मिलते थे , ऐसा नहीं है लेकिन ऐसे वोट्स किसी एक जगह न जाकर समाजवादी खेमों , वामपंथी खेमों में बँटे हुए थे। खैर , इंदिरा बिना कुछ कहे -सुने इस आयोग की रिपोर्ट को अनंत काल के लिए दबाने के मकसद से ठंढे बस्ते में डाल दिया।
    इंदिरा ने भले इस रिपोर्ट को दबा दिया लेकिन वह वर्षों पुरानी माँगों को लेकर उठ रही आवाजों को कैसे दबा पाती ? मंडल कमिशन की अनुशंसाओं को लागू करने की माँग समाजवादी खेमों (तत्कालीन जनता पार्टी ) द्वारा होती रही और छोटे -बड़े आंदोलन होते रहे। गौरतलब है कि इस दौरान वामपंथी दलों का इस रिपोर्ट पर क्या रुख रहा होगा ? उस समय की घटनाओं का यदि गौर से अवलोकन किया जाय तो पता चलता है कि वामपंथी दलों का भी लगभग वही रवैया था कि जबतक पानी गर्दन से ऊपर न बहने लगे , मौन धारण ही श्रेयस्कर है। यह मौन इस रिपोर्ट से सहमति नहीं , असहमति के लक्षण थे।

    इधर जनता पार्टी में क्या चल रहा था ? भारी -भरकम हार के बाद क्या पार्टी नीतिगत स्तर पर किसी मंथन या सुधार के दौर से गुजर रही थी ? अब इसे जो भी कहें , लेकिन हार का ठीकरा एक -दूसरे पर फोड़ने के चक्कर में जनता पार्टी के नेता सरफुट्टौवल के अलावा कुछ नहीं कर रहे थे। हार के बाद जनता पार्टी के जनसंघ वाले खेमे जिनमें वाजपेयी , आडवाणी प्रमुख थे , की दोहरी सदस्य्ता पर सवाल उठाये जाने लगे। यह माँग जोर पकड़ने लगी कि पार्टी का सदस्य रहते हुए कोई आरएसएस की भी सदस्य्ता कैसे रख सकता है और संघ की कार्यशालाओं में हिस्सा कैसे ले सकता है। यह विवाद इतना बढ़ा कि जनता पार्टी टूट गयी और जनता पार्टी का जनसंघ वाला खेमा 1980 में ही उस पार्टी से अलग होकर नए दल का निर्माण किया और भारतीय जनता पार्टी का जन्म हुआ जिसके अध्यक्ष बने अटल बिहारी वाजपेयी। शुरू में दिखावे के लिए ही सही इस पार्टी ने अपने लिए गांधीयन समाजवाद का रास्ता चुना , हालाँकि इस पर जनसंघ और आरएसएस की विचारों का ही प्रभाव था। लेकिन फिर भी आरएसएस का इस नयी बनी पार्टी पर वह नियंत्रण नहीं था जो आज नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भारतीय जनता पार्टी पर है। कुछ सालों तक यह दल गाँधी और समाजवाद के इर्दगिर्द ही अपने संघर्ष का तानाबाना बुनता रहा लेकिन 1984 के आमचुनावों में मात्र 2 सीटे हासिल कर पाने की भारी असफलता ने इस दल के कलेवर और विचार , दिशा और दशा सब बदल कर रख दिया। हालाँकि यदि इस चुनाव से ठीक पहले इंदिरा गाँधी की हत्या नहीं हुई होती तब क्या गुणा -गणित होता , यह कहना मुश्किल है। इस दल ने गाँधी और समाजवाद के चोले को उतार फेंक उग्र हिंदुत्व की राह पकड़ ली और यही वह समय था जब आडवाणी के नेतृत्व में राममंदिर आंदोलन ने जोड़ पकड़ना शुरू किया।

    उधर बाकी की जनता पार्टी क्या कर रही थी ? 1979 की हार ने इस पार्टी में कोहराम ही मचा दिया था। जैसे यह दल कुनबा – कुनबा जोड़कर बना था , वैसे ही यह बिखड़ता गया , एक दिल के टुकड़े हजार हुए कोई यहाँ गिरा कोई वहाँ गिरा। उधर जनसंघ वाला खेमा भारतीय जनता पार्टी बना तो भारतीय लोक दल जिनका नेतृत्व चौधरी चरण सिंह के हाथों था , 1980 में ही अलग होकर पुनः लोकदल के नाम से नया दल बना बैठे। जनता पार्टी खत्म तो नहीं हुई लेकिन ख़त्म जैसी ही हो गयी। एक जनता पार्टी चंद्रशेखर चलाते रहे और एक तो सुब्रमण्यम स्वामी 2013 तक चलाते रहे जिसका विलय अंतत उन्होंने भारतीय जनता पार्टी में कर लिया। जनता पार्टी हालत यह हो गयी कि 1984 के आम चुनाव में इंदिरा की मौत के बाद जिसमें राजीव गाँधी को 414 सीट मिले वहीँ जनता पार्टी 10 सीट , चौधरी चरण सिंह का दल लोक दल महज 3 सीट और भारतीय जनता पार्टी मात्र 2 सीटों पर सिमट कर रह गयी। जनता पार्टी की आहुति 11 अक्टूबर 1988 को तब दे दी गयी जब कांग्रेस पर बोफोर्स तोप के सौदे में सीधा राजीव गाँधी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए तत्कालीन रक्षा मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह अलग हुए और जनता दल नामक नए दल का गठन हुआ। जनता पार्टी का विलय इस जनता दल में हो गया और विश्वनाथ प्रताप सिंह इसके अध्यक्ष बने।

    1989 के आम चुनाव में जनता दल के नेतृत्व में कई अन्य छोटी -छोटी पार्टियाँ एकत्रित हुई जिसे राष्ट्रीय मोर्चा का नाम दिया गया। जनता दल ने अपने चुनावी घोषणापत्र में कई वादे किये जिसमें एक प्रमुख वादा था मंडल कमिशन की सिफारिशों को लागू करना। जनता दल को भारतीय जनता ने पसंद किया और बोफोर्स के हल्ले ने कांग्रेस को काफी नुकसान पहुँचाया। कांग्रेस 414 के टैली से धड़ाम होकर 197 पर आ गिरी। नए बने जनता दल को पहली ही बार में 143 सीट मिले। उग्र हिंदुत्व और राममंदिर के आंदोलन की नाव पर सवार होकर भारतीय जनता पार्टी को अप्रत्याशित बढ़त मिली और उसका आंकड़े पिछले चुनाव के मुकाबले 2 सीट से 85 सीट पर जा पहुँचा। चुनाव उपरांत राष्ट्रीय मोर्चा ने वाम मोर्चा की सहायता से और भारतीय जनता पार्टी के बाहरी समर्थन से वी पी सिंह के नेतृत्व में सरकार बनायीं। 10 दिसंबर 1989 को वी पी सिंह प्रधानमंत्री बने।

    सरकार बनते ही समाजवादी खेमों ने जिनमें शरद यादव , लालू प्रसाद यादव , राम बिलास पासवान जैसे प्रमुख लोग थे , वी पी सिंह पर मंडल आयोग की रिपोर्ट की अनुशंसाओं को लागू करने का दबाव बनाने लगे। उधर जनता दल के ही लहर में कई राज्यों में विधानसभा के चुनाव हुए जिसमें बिहार समेत अन्य राज्यों में जनता दल का जबरदस्त प्रदर्शन हुआ। बिहार, कर्नाटक , हरियाणा , उत्तरप्रदेश , ओडिसा आदि राज्यों में जनता दल की सरकार बनी। यह किन परिस्थितियों में हुआ , किसने दबाव बनाये , परदे के पीछे क्या -क्या खेल चल रहा था , इसके विस्तार में जाना भी इस पोस्ट का मकसद नहीं है। 7 अगस्त 1990 को जनता दल सरकार ने अपनी मंशा इस आयोग की रिपोर्ट को लेकर जता दी और इसके ठीक 6 दिन बाद 13 अगस्त को गवर्नमेंट आर्डर के जरिये इसके कुछ हिस्सों को लागू करने की घोषणा कर दी गयी और अगले दो दिनों बाद 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री वी पी सिंह ने अपने भाषण में लाल किले की प्राचीर से भी इस बात का जिक्र किया।

    इसकी घोषणा होते ही असली खेल शुरू हो गए। कांग्रेस की त्योरियाँ तो चढ़ी ही , सरकार को समर्थन दे रही भारतीय जनता पार्टी ने भी इसका प्रत्यक्ष -अप्रत्यक्ष विरोध किया। दोनों के वजूद दाँव पर लगने वाले थे। सड़कों पर आरक्षण विरोधी और आरक्षण समर्थकों के प्रदर्शन होने लगे। पूरे हिन्दुस्तान में खासकर उतर भारतीय बेल्ट में जमकर तोड़-फोड़ और हिंसा हुई। सैकड़ों लोग मारे गए। पिछड़ी -दलित जातियाँ जो अब तक कांग्रेस , कम्युनिस्ट के झंडे ढो रही थीं , जनता दल के पीछे लामबंद होती दिखने लगी। जगह -जगह मशाल जुलूस , रैलियाँ आम बात थीं। मुझे याद है मेरे गाँव से भी एक बहुत बड़ा मशाल जुलूस निकलकर 4 किलोमीटर तक गया जिसमें वी पी सिंह जिंदाबाद , लालू यादव जिंदाबाद जैसे नारों से आसमान गूँज रहा था। भारतीय जनता पार्टी यह सब देख घबरा गयी। बड़े जतन से हिंदुत्व की लहर पर सवार होकर वह 2 से 85 पर पहुँची थी और उसे अपने लिए बेहतर भविष्य दीख रहा था। लेकिन मण्डल कमिशन की सिफारिश को लागू करने की घोषणा के साथ ही उसे यह उम्मीद क्षीण नजर आने लगी। इसकी काट के लिए आडवाणी ने रथयात्रा का प्रपंच रचा। उधर कांग्रेस से नाउम्मीद सवर्ण जातियों को भी भारतीय जनता पार्टी में एक उम्मीद की किरण दिखने लगी थी। इधर आडवाणी ने रथयात्रा की घोषणा की उधर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने सरकार के इस घोषणा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर इस पर रोक की माँग कर दी।

    आडवाणी की रथ यात्रा का बिहार में क्या हश्र हुआ , यह मालूम है. हालाँकि वी पी सिंह नहीं चाहते थे कि आडवाणी को गिरफ्तार किया जाय। क्यों नहीं चाहते थे , इसका अलग -अलग लोग अपने तरीके से जवाब देते हैं लेकिन मैं साफ़ -साफ़ कहने का आदी हूँ। वी पी सिंह को पता था कि आडवाणी उधर गिरफ्तार हुए और इधर सरकार गिरेगी। भाजपा चाहती भी थी कि उसे कोई ठोस बहाना मिले ताकि वी पी सिंह से समर्थन वापस लेकर सरकार गिरा दी जाय और मंडल आयोग की अनुशंसा जो एक गवर्नमेंट आर्डर के जरिये लागू की गयी थी , ठोस संवैधानिक अमलीजामा पहने बगैर फिर से ठंढे बस्ते में चला जाय। यदि ऐसा करने में भाजपा सफल होती है तो उसे कांग्रेस से उन सवर्ण समर्थकों को झटकने में कामयाबी मिलती जिसे अब तक लगता था कि सवर्णों का हित कांग्रेस के ही हाथ में सुरक्षित है। भाजपा को बहुत हद तक कामयाबी मिली भी। इधर लालू यादव ने आडवाणी को दबोचा , उधर वी पी सिंह की सरकार गिरी। तिस पर सुप्रीम कोर्ट ने गवर्नमेंट आर्डर पर अंतिम सुनवाई तक स्टे लगा दिया।

    वी पी सिंह की सरकार तो गिर गयी लेकिन राज्यों में जनतादल के क्षत्रप मजबूत होकर उभरे। एक तरफ मंडल कमिशन के उफान ने पिछड़ों -दलितों वामपंथियों के चंगुल से निकलकर को लालू , मुलायम जैसे नेताओं के पीछे गोलबंद कर दिया वहीँ सवर्ण जाति के लोग कांग्रेस के इतर भाजपा को अपना सच्चा प्रतिनिधि महसूस करने लगे। एक और वर्ग था मुसलमान। जो मुसलमान अब तक कांग्रेस के पीछे लामबंद थे , भाजपा के चढाव के बीच कांग्रेस की आक्रामकता में कमी देखकर उसका भी कांग्रेस से मोहभंग होने लगा था। शाहबानो का मामला मुस्लिमों का कांग्रेस से विश्वास दरकने में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा था तो अब भाजपा के उग्र हिंदुत्व के बीच लालू यादव और मुलायम सिंह यादव का आडवाणी और राममंदिर आंदोलन के करता-धर्ता से सीधा टकराना , मुस्लिम समुदाय के मन में इन क्षेत्रीय नेताओं के लिए एक सम्मान और समर्थन का भाव बटोर रहा था। रही -सही कसर 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस में नरसिम्हा राव की संदिग्ध भूमिका को लेकर पूरी हो गयी जिसमें कम से कम राज्यों के चुनाव में उत्तर भारत के मुस्लिम कांग्रेस को पूरी तरह छोड़ चुके थे और अपना समर्थन इन क्षेत्रीय क्षत्रपों को दे चुके थे। कांग्रेस का तम्बू बिहार , उत्तरप्रदेश , हरियाणा , झारखण्ड और अन्य राज्यों से उखड चुका था। वहीँ वामपंथी पार्टियाँ जो अब तक दलितों , पिछड़ों के लिए संघर्ष के नाम पर वोट पाकर सवर्ण चेहरों को सदन में भेजने का जो कारनामा अब तक कर रही थी , उसकी भी दुकानें बंद होने के कगार पर पहुँच गयी। मंडल के बाद उभरे राजनीतिक परिदृश्य में वामपंथी पार्टी के वैसे समर्थक जो सवर्ण वर्ग से थे , भाजपा का दामन थम चुके थे। दलित ,पिछड़े, मुस्लिम समर्थक लालू। मुलायम जैसों का हाथ थाम चुके थे। वामपंथी दलों का भी तम्बू मंडल की सुनामी में बह गया और बहकर इतनी दूर चला गया कि लाख चाहने के बाद भी नया आशियाना बसाया न जा सका।

    Lal Babu Lalit, लेखक सुप्रीम कोर्ट के वकील है.  ये लेखक के निजी और व्यक्तिगत विचार हैं अतः इसे पढते समय पाठक जन अपने विवेक का प्रयोग करें, और इस लेख को पढने के बाद अपनी प्रतिक्रिया जरूर देवें।

  • चीन में खत्म हुआ लाॅकडाऊन:उमड़ पड़ी भीड़;चीन में पहली बार 24 घंटे में किसी कोरोना मरीज की मौत नहीं

    बीजिंग. जिस चीन से कोरोनावायरस की शुरुआत हुई, वहां पर संक्रमण लगभग खत्म हो गया। 24 घंटे में संक्रमण की वजह से कोई मौत नहीं हुई। यहां जनवरी से संक्रमण फैलना शुरू हुआ था। तब से यह पहला मौका है, जब एक दिन में किसी संक्रमित की मौत नहीं हुई। इसके साथ ही वुहान में भी लॉकडाउन हटा दिया गया है। चीन में सिर्फ वुहान ही बचा है जहां लॉकडाउन जारी था। लॉकडाउन हटने के बाद यहां बड़ी तादात में भीड़ उमड़ पड़ी। वुहान में पिछले 14 दिन में संक्रमण के कुल दो मामले ही सामने आए। यहां 23 जनवरी से लॉकडाउन है।

    दूसरे देशों से आने वाले संक्रमित

    मंगलवार को चीन के नेशनल हेल्थ कमीशन ने कहा- सोमवार को कुल 32 नए मामले सामने आए। ये सभी वो लोग हैं जो दूसरे देशों से यहां आए। चीन में जनवरी से कोरोनावायरस का प्रकोप शुरू हुआ था। फरवरी में यह चरम पर था। मार्च की शुरुआत से कमी आने लगी। अप्रैल में यह करीब-करीब खत्म होता जा रहा है। हालांकि, दूसरे देशों से चीन पहुंचे लोगों की वजह से खतरा बढ़ भी सकता है। क्योंकि, हेल्थ मिनिस्ट्री कई दिनों से यह दावा कर रही है कि नए मामलों में 99 फीसदी बाहरी लोगों के देश लौटने से सामने आ रहे हैं। हालांकि, इनमेें भी चीन के नागरिक ही ज्यादा हैं।

    एसिम्टोमैटिक मरीजों पर रख रहे नजर
    कोरोनावायरस के संदर्भ में बात करें तो एसिम्टोमैटिक पेशेंट वो हैं जो कोरोना पॉजिटिव तो हैं, लेकिन उनमें इस बीमारी के लक्षण नजर नहीं आते। अब इन्हीं पर नजर ज्यादा रखी जा रही है। सोमवार को ऐसे 30 मामले सामने आए। कुल 1,033 ऐसे मामले सामने आ चुके हैं। यह दुनिया के कुल एसिम्टोमैटिक मामलों का एक तिहाई है। बाहर से आने वाले सभी नागरिकों का वायरस टेस्ट किया जा रहा है। चीन में अब तक संक्रमण के 81,740 मामले सामने आए। 3 हजार 331 लोगों की मौत हुई।(इनपुट भास्कर)

  • तब्लीग़ी जमाअत केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक आंदोलन है

    Tarique Anwar Champarni

    कोरोना के बहाने तब्लीग़ी जमाअत के ऊपर जो हमला किया जा रहा है यह बहुत लम्बी रणनीति का हिस्सा है। इसको समझने के लिए थोड़ा इतिहास में जाना चाहिये। जमाअत की शुरुआत मेवात के इलाके से हुई थी। वर्तमान में मेवात का यह क्षेत्र हरियाणा, राजस्थान और उत्तरप्रदेश में बंटा हुआ है। इनमें मेव मुसलमानों की बड़ी आबादी है। कई इतिहासकार मेव को मीणा ट्राइब से जोड़कर देखतें है जब्कि कुछ लोग राजपूतों से जोड़कर देखते है। मुझें ट्राइब वाली बात सच्चाई के ज़्यादा नज़दीक लगती है। लगभग मेव की बड़ी आबादी, अनुमानित 400 गाँव, ने इस्लाम क़ुबूल किया था। इस्लाम क़ुबूल करने के बावजूद बहुत से ऐसे रिवाज़ थे जो मेव प्रैक्टिस करते थे बल्कि आज भी प्रैक्टिस करते है। उस समय नस्लीय एवं जातीय विभेद और छूत-अछूत वाली प्रैक्टिस सर चढ़कर बोल रहा था। बल्कि गौत्र-पाल आज भी प्रैक्टिस किया जा रहा है। मेव समुदाय के कई बुद्धिजीवियों का मानना है कि उस समय मेव में ‘घर वापसी’ भी शुरू हो चुकी थी।

    मौलाना इलियास साहब कांधलवी बंग्ला वाली मस्ज़िद, निज़ामुद्दीन, में एक मदरसा चलाते थे। उस मस्ज़िद के मोअज्जिन, अज़ान देने वाला, मेव मुसलमान थे। उसी मोअज्जिन के जरिये मौलाना इलियास साहब को मेव की स्थिति के बारे में जानकारी हासिल हुई थी। उसके बाद मौलाना साहब मेवात की यात्रा पर निकले और कई गाँवों का दौरा किया। अनेक लोगों से मुलाक़ात किये लोग उनकी बातों को समझने से इंकार कर दिये। लेकिन मियाँ जी मूसा, जो कि नूंह के बग़ल में एक गाँव है घासेड़ा के रहने वाले थे, उनको मौलाना की बात समझ मे आगयी। मियाँ जी मूसा के पुत्र मौलाना क़ासिम साहब भरतपुर में मिलखेड़ा मदरसा के संस्थापक है। मियाँ जी मूसा घासेड़ा गाँव के रहने वाले जरूर थे मग़र तब्लीग़ का पहला जत्था फ़िरोज़पुर नमक से सोहना कस्बा के लिए निकला था। जिसका मक़सद मुसलमानों को इस्लाम की बेसिक शिक्षा देना था। चूँकि हिन्दू धर्म को मानने वालों की तरह छूत -अछूत वाली प्रैक्टिस हो रही थी इसलिए इसको ख़त्म करने के लिए एक थाली में पांच-सात लोगों के खाने का रिवाज़ को बढ़ावा दिया गया।

    आज भी भारत में ऐसे हजारों गाँव है जहाँ दो-चार घर ही मुसलमान है। इन गाँवों में लोग हिन्दू रीति-रिवाज को फॉलो करने के लिए विवश है। यह लोग बेहद ग़रीब और दरिद्र है जिनको बहुत आसानी से घर वापसी का शिकार बनाया जा सकता है। मग़र तब्लीगी जमाअत एक ऐसी जमाअत है जिनकी पहुँच ऐसी आबादी में भी है और इस्लाम की बेसिक शिक्षा रोज़ा और नमाज़ से लोगों को जोड़ रखा है। इसलिए हिंदुत्व के एजेंडा पर काम करने वाले संघ को परिशानी है। मैं भी किसी जमाने में तब्लीग़ी जमाअत का बड़ा आलोचक हुआ करता था। बल्कि कुछ विषयों पर आज भी मतभेद है। मेरी पुरानी फेसबुक आईडी पर एक फेसबुक मित्र नरेन्द्र सिसोदिया हुआ करता था उसने 2012 में संघ के मुखपत्र पांचजन्य में इस सम्बंध में एक लेख लिखा था जिसे पढ़ने के बाद जमाअत को लेकर मेरी सोच बदल गयी। हमलोग भले ही तब्लीग़ी जमाअत को एक मसलकी तंज़ीम के तौर पर देखें मग़र आरएसएस के लोग इस तंज़ीम को एक कल्चरल और आइडेंटिटी थ्रेट के तौर पर देखतें है।

    मेरे लिए तब्लीग़ी जमाअत केवल धार्मिक नहीं बल्कि एक कल्चरल मूवमेंट है। अगर तब्लीगियों ने भारत के बाद सबसे अधिक काम कही किया है तब अफ़्रीका के देश है। भारत और अफ़्रीका के इतिहास को उठाकर देखने की ज़रूरत है। भारत में जातीय भेदभाव एवं अछूत जैसा घिनौना ब्राह्मणवादी कल्चर था जब्कि अफ़्रीका में रँग एवं नस्ल के आधार पर ग़ुलाम बनाकर भेदभाव करने जैसा क्रूर कृत्य होता था। मुसलमानों के नट, रँगरेज, पंवरिया, हलालखोर, भाँट, कुंजड़ा, धोबी, हजाम, मल्लाह, जोगी, फ़क़ीर इत्यादि ऐसी जातियाँ है जिनको तथाकथित अभिजात वर्ग के लोग पास भी नहीं बैठाते है, उनके बीच तब्लीग़ी जमाअत के लोग जाकर एक बर्तन में खाना ख़ाकर उस मिथक को तोड़कर सामाजिक समरसता बनाने का प्रयास कर रहे है। अभी इस क्षेत्र में और अधिक काम होना बाकी है। ब्राह्मणवादी सर्किल को मेन्टेन करने वाले उर्दू नामधारी लिबरल और नास्तिक लोगों को यह बात समझ नहीं आसकती है। आपने अफ़्रीका के ग़ुलामी के इतिहास को जरूर पढ़ा और समझा होगा। अगर नहीं पढ़े और समझें है तब अमेरिकन ब्लैक लेखक एलेक्स हैली द्वारा लिखित विश्व की बेस्ट सेलिंग बुक ‘His Search For Roots’ जरूर पढ़ियेगा। साथ ही ‘कुंटा किंते’ पर आधारित Roots Series नामक एक सीरीज जरूर देखें। आपको समझ आयेगा की किस तरह से अंग्रेज़ और अमेरिकन मूल के लोग अफ़्रीकन मुसलमानों को ग़ुलाम बनाया था और धीरे-धीरे अगला पुरा नस्ल अपने कल्चर को भूल गया था। ऐसे परिस्थितियों में जाकर तब्लीगियों ने अफ़्रीका के ब्लैक मुसलमानों के भीतर उनको इंसान होने का एहसास दिलाया है। उर्दू नामधारी लिबरल लोग उतना ही पढ़ें है जितना The Hindu और Ndtv ने लिख दिया है। हाँ, वही The Hindu, जो स्वयं को लिबरल तो कहते है मग़र नाम से ही हिन्दू संस्कृति का आभास होता है, ने संघियों से भी पहले कोरोना वायरस को कुर्ता-पजामा पहनाकर मुसलमान बना दिया था। हम जानते है कि हम अल्पसंख्यक है और हमको अपनी आइडेंटिटी बहुत प्यारी है। हम बैलेंस नहीं बना सकते है। हमनें भी देश की पॉलिटिकल हिस्ट्री पढ़ रखी है और हम जानते है कि किस तरह से छोटी गलतियों को भी बड़ा पेश करके मुस्लिम आइडेंटिटी के नाम पर हमको दबाया गया है। यह जानते हुए भी की मेलकॉम-एक्स की तरह हमें ख़त्म किया जा सकता है फ़िर भी हम आइडेंटिटी के नाम पर बैलेंस बनाकर नहीं लिख सकते है। क्योंकि इस देश मे भी लिबरल होने का एडवांटेज उन्हें ही मिलता है जो अपना नाम The Hindu रखता है।

    लेखक: Tarique Anwar Champarni, एक सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक है ये लेखक के निजी और व्यक्तिगत विचार हैं.

  • तब्लीग़ी जमाअत केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक आंदोलन है

    Tarique Anwar Champarni

    कोरोना के बहाने तब्लीग़ी जमाअत के ऊपर जो हमला किया जा रहा है यह बहुत लम्बी रणनीति का हिस्सा है। इसको समझने के लिए थोड़ा इतिहास में जाना चाहिये। जमाअत की शुरुआत मेवात के इलाके से हुई थी। वर्तमान में मेवात का यह क्षेत्र हरियाणा, राजस्थान और उत्तरप्रदेश में बंटा हुआ है। इनमें मेव मुसलमानों की बड़ी आबादी है। कई इतिहासकार मेव को मीणा ट्राइब से जोड़कर देखतें है जब्कि कुछ लोग राजपूतों से जोड़कर देखते है। मुझें ट्राइब वाली बात सच्चाई के ज़्यादा नज़दीक लगती है। लगभग मेव की बड़ी आबादी, अनुमानित 400 गाँव, ने इस्लाम क़ुबूल किया था। इस्लाम क़ुबूल करने के बावजूद बहुत से ऐसे रिवाज़ थे जो मेव प्रैक्टिस करते थे बल्कि आज भी प्रैक्टिस करते है। उस समय नस्लीय एवं जातीय विभेद और छूत-अछूत वाली प्रैक्टिस सर चढ़कर बोल रहा था। बल्कि गौत्र-पाल आज भी प्रैक्टिस किया जा रहा है। मेव समुदाय के कई बुद्धिजीवियों का मानना है कि उस समय मेव में ‘घर वापसी’ भी शुरू हो चुकी थी।

    मौलाना इलियास साहब कांधलवी बंग्ला वाली मस्ज़िद, निज़ामुद्दीन, में एक मदरसा चलाते थे। उस मस्ज़िद के मोअज्जिन, अज़ान देने वाला, मेव मुसलमान थे। उसी मोअज्जिन के जरिये मौलाना इलियास साहब को मेव की स्थिति के बारे में जानकारी हासिल हुई थी। उसके बाद मौलाना साहब मेवात की यात्रा पर निकले और कई गाँवों का दौरा किया। अनेक लोगों से मुलाक़ात किये लोग उनकी बातों को समझने से इंकार कर दिये। लेकिन मियाँ जी मूसा, जो कि नूंह के बग़ल में एक गाँव है घासेड़ा के रहने वाले थे, उनको मौलाना की बात समझ मे आगयी। मियाँ जी मूसा के पुत्र मौलाना क़ासिम साहब भरतपुर में मिलखेड़ा मदरसा के संस्थापक है। मियाँ जी मूसा घासेड़ा गाँव के रहने वाले जरूर थे मग़र तब्लीग़ का पहला जत्था फ़िरोज़पुर नमक से सोहना कस्बा के लिए निकला था। जिसका मक़सद मुसलमानों को इस्लाम की बेसिक शिक्षा देना था। चूँकि हिन्दू धर्म को मानने वालों की तरह छूत -अछूत वाली प्रैक्टिस हो रही थी इसलिए इसको ख़त्म करने के लिए एक थाली में पांच-सात लोगों के खाने का रिवाज़ को बढ़ावा दिया गया।

    आज भी भारत में ऐसे हजारों गाँव है जहाँ दो-चार घर ही मुसलमान है। इन गाँवों में लोग हिन्दू रीति-रिवाज को फॉलो करने के लिए विवश है। यह लोग बेहद ग़रीब और दरिद्र है जिनको बहुत आसानी से घर वापसी का शिकार बनाया जा सकता है। मग़र तब्लीगी जमाअत एक ऐसी जमाअत है जिनकी पहुँच ऐसी आबादी में भी है और इस्लाम की बेसिक शिक्षा रोज़ा और नमाज़ से लोगों को जोड़ रखा है। इसलिए हिंदुत्व के एजेंडा पर काम करने वाले संघ को परिशानी है। मैं भी किसी जमाने में तब्लीग़ी जमाअत का बड़ा आलोचक हुआ करता था। बल्कि कुछ विषयों पर आज भी मतभेद है। मेरी पुरानी फेसबुक आईडी पर एक फेसबुक मित्र नरेन्द्र सिसोदिया हुआ करता था उसने 2012 में संघ के मुखपत्र पांचजन्य में इस सम्बंध में एक लेख लिखा था जिसे पढ़ने के बाद जमाअत को लेकर मेरी सोच बदल गयी। हमलोग भले ही तब्लीग़ी जमाअत को एक मसलकी तंज़ीम के तौर पर देखें मग़र आरएसएस के लोग इस तंज़ीम को एक कल्चरल और आइडेंटिटी थ्रेट के तौर पर देखतें है।

    मेरे लिए तब्लीग़ी जमाअत केवल धार्मिक नहीं बल्कि एक कल्चरल मूवमेंट है। अगर तब्लीगियों ने भारत के बाद सबसे अधिक काम कही किया है तब अफ़्रीका के देश है। भारत और अफ़्रीका के इतिहास को उठाकर देखने की ज़रूरत है। भारत में जातीय भेदभाव एवं अछूत जैसा घिनौना ब्राह्मणवादी कल्चर था जब्कि अफ़्रीका में रँग एवं नस्ल के आधार पर ग़ुलाम बनाकर भेदभाव करने जैसा क्रूर कृत्य होता था। मुसलमानों के नट, रँगरेज, पंवरिया, हलालखोर, भाँट, कुंजड़ा, धोबी, हजाम, मल्लाह, जोगी, फ़क़ीर इत्यादि ऐसी जातियाँ है जिनको तथाकथित अभिजात वर्ग के लोग पास भी नहीं बैठाते है, उनके बीच तब्लीग़ी जमाअत के लोग जाकर एक बर्तन में खाना ख़ाकर उस मिथक को तोड़कर सामाजिक समरसता बनाने का प्रयास कर रहे है। अभी इस क्षेत्र में और अधिक काम होना बाकी है। ब्राह्मणवादी सर्किल को मेन्टेन करने वाले उर्दू नामधारी लिबरल और नास्तिक लोगों को यह बात समझ नहीं आसकती है। आपने अफ़्रीका के ग़ुलामी के इतिहास को जरूर पढ़ा और समझा होगा। अगर नहीं पढ़े और समझें है तब अमेरिकन ब्लैक लेखक एलेक्स हैली द्वारा लिखित विश्व की बेस्ट सेलिंग बुक ‘His Search For Roots’ जरूर पढ़ियेगा। साथ ही ‘कुंटा किंते’ पर आधारित Roots Series नामक एक सीरीज जरूर देखें। आपको समझ आयेगा की किस तरह से अंग्रेज़ और अमेरिकन मूल के लोग अफ़्रीकन मुसलमानों को ग़ुलाम बनाया था और धीरे-धीरे अगला पुरा नस्ल अपने कल्चर को भूल गया था। ऐसे परिस्थितियों में जाकर तब्लीगियों ने अफ़्रीका के ब्लैक मुसलमानों के भीतर उनको इंसान होने का एहसास दिलाया है। उर्दू नामधारी लिबरल लोग उतना ही पढ़ें है जितना The Hindu और Ndtv ने लिख दिया है। हाँ, वही The Hindu, जो स्वयं को लिबरल तो कहते है मग़र नाम से ही हिन्दू संस्कृति का आभास होता है, ने संघियों से भी पहले कोरोना वायरस को कुर्ता-पजामा पहनाकर मुसलमान बना दिया था। हम जानते है कि हम अल्पसंख्यक है और हमको अपनी आइडेंटिटी बहुत प्यारी है। हम बैलेंस नहीं बना सकते है। हमनें भी देश की पॉलिटिकल हिस्ट्री पढ़ रखी है और हम जानते है कि किस तरह से छोटी गलतियों को भी बड़ा पेश करके मुस्लिम आइडेंटिटी के नाम पर हमको दबाया गया है। यह जानते हुए भी की मेलकॉम-एक्स की तरह हमें ख़त्म किया जा सकता है फ़िर भी हम आइडेंटिटी के नाम पर बैलेंस बनाकर नहीं लिख सकते है। क्योंकि इस देश मे भी लिबरल होने का एडवांटेज उन्हें ही मिलता है जो अपना नाम The Hindu रखता है।

    लेखक: Tarique Anwar Champarni, एक सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक है ये लेखक के निजी और व्यक्तिगत विचार हैं.

  • पूर्व विधायक नंद किशोर महरिया ने सरकार से भय का माहोल खत्म व कोराना से किसी भी रुप से प्रभावित लोगो की मदद की अपील की।

    अशफाक कायमखानी।सीकर/फतेहपुर।
    फतेहपुर के पूर्व विधायक नंद किशोर महरिया ने सरकार से अपील की है कि अपने घर से दूर देश के अलग अलग हिस्सों में फँसे मज़दूरों को उनके घरों तक पहुँचाने की व्यवस्था करे या यह सुनिश्चित करे कि वो जहाँ भी है वहाँ उनके साथ कोई बुरा बर्ताव ना हो उन्हें स्वास्थ्य व भोजन सुविधा और बुनियादी ज़रूरत की चीज़ें स्थानीय प्रशासन व जनसहयोग से मिलती रहना सुनिश्चित करते हुये उनमे विश्वास पैदा करे।

    महरिया ने आगे कहा कि देश की रीढ़ माने जाने वाले मजदूरों को आज जिस तरह से मजबूरन इकट्ठा होना व भय के माहोल मे रहना या भागना पड़ रहा है। इनके जाने के लिये कभी बसे लगायी जा रही है तो कभी बसे बंद की जा रही हैं इन सबको देखते हुए लग रहा है कि स्थिति सरकार के कंट्रोल से भारत भर मे बाहर होती जा रही है। और जनता को ख़ास तौर से मज़दूर व गरीब वर्ग को जो इस कोरोना के दलदल मैं फँसता जा रहा है और उसको इससे बाहर निकालना बड़ा मुश्किल नज़र आ रहा है ऐसे में सरकार को चाहिए कि जितना जल्द हो सके कंट्रोल पेरा मिलट्री फोर्सेज या सीधे तोर पर आर्मी के हाथ में दे दे या उनकी मदद ले। जिससे आने वाले भविष्य में स्थितियां पूरी तरह क़ाबू में रहे। महरिया ने कहा कि अब बन रहे हालात को देखते हुये यह काम सरकार को करना तो पड़ेगा पर जितना जल्दी से करेगी उतना ही देश को नुक़सान कम होगा। महरिया ने प्रधानमंत्री को तीन मार्च को ही ट्विटर व पत्र के मार्फत अवगत कराते हुये लिखा था कि भारत मे जो कोराना वायरस आया है वो विदेश के आया है एवं आगे भी विदेशी या विदेश से आने वाले भारतीयों के मार्फत ही आयेगा। ऐसे समय मे तभी विदेश से आने वालो की ऐयरपोर्ट पर पूरी तरह चिकित्सा जांच व उन्हे कम से कम एक पंखवाड़ा आयसोलेशन मे रख लेने की बात सरकार मान लेती तो आज जो हालात बन चुके है। वो हालात बन नही पाते।

    महरिया ने प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्रियों से अपील की है कि भारत के मंदिर-मस्जिद-गिरजाघर-मठ-व दरगाहों सहित सभी धर्मो के अन्य धार्मिक स्थल जिनकी कमेटियों के खजाने मे काफी धन जमा है उसको दैश के मुश्किल हालात मे प्रधानमंत्री व मुख्यमंत्री राहत कोष मे जमा करके संकट मे उलझे लोगो को संकट से निकालने मे उपयोग मे लेना चाहिये। वही धार्मिक स्थलों के जिम्मेदारो , सक्षम लोगो व उधोगपतियों को भी स्वयं आगे आकर राहत कोष मे अधिका अधिक धन देना चाहिए। स्वय नंद किशोर महरिया ने अपने चार माह की पेंशन भी मुख्यमंत्री राहत कोष मे जमा करने को कहा है।

  • ट्रस्ट के नाम पर चला रहे हाॅस्पिटल के मालिक ने मिथिला लाइव 24 के पत्रकार पर किया जानलेवा हमला, कैमरा और माइक भी तोड़ा

    500 फीस की जगह 1500 लेने की पुष्टि करने के समय पत्रकारों को हाॅस्पिटल के अन्दर बनाया बंधक.

    दरभंगा- पूरी दुनिया में इस‌ समय कोरोना वायरस को लेकर महामारी फैली हुई है। भारत में भी 14 अप्रैल तक इस महामारी से निपटने के लिए सरकार ने लाॅकडाउन कर रखा है। सरकार के साथ साथ बड़ी संख्या में जिला प्रशासन, पुलिस प्रशासन, डाक्टरस, नर्स, हाॅस्पिटल, सामाजिक कार्यकर्ता, नेता और पार्टी के कार्यकर्ताओं ने इस बिमारी से निपटने के लिए अपनी जान जोखिम में डाल लोगों की मदद कर रहे हैं लेकिन इस हालात में भी कुछ भेड़िए लोगों की मजबूरियों का फायदा उठाने और गरीब मरीजों का इलाज के बहाने मोटी राशि ऐंठ खून चूसने का काम कर रहे हैं। जी हां ये मामला दरभंगा के एक निजी हाॅस्पीटल का है जो ट्रस्ट के नाम पर चलता है और फीस की तीन गुनी राशि ऐंठ रहा है। जिला प्रशासन और सिविल सर्जन के निकटतम छेत्र में यह माफिया आम गरीब मरीजों का खून चूसने का काम रंगबाजी अंदाज में अंजाम दे रहा है।

    इस हाॅस्पिटल का नाम है जोगिंदर मेमोरियल ट्रस्ट हॉस्पिटल। इसके मालिक का नाम है रितेश कमल।जोकि हॉस्पिटल रोड पर उपस्थित है और कल तक इस हॉस्पिटल का चार्ज ₹500 था और इस विपदा की घड़ी में आज इस हाॅस्पिटल ने अपना चार्ज 1500 रुपए कर दिया है। इस की एक विडियो वायरल होने के बाद *Mithila Live 24* के पत्रकार और कैमरामैन हाॅस्पिटल पहुंच कर हाॅस्पिटल मालिक से पक्ष जानने की कोशिश की। इसी दौरान हाॅस्पिटल मालिक रितेश कमल पत्रकार और कैमरामैन पर खुद और अपने स्टाफ के साथ मिलकर हमलावर हो गए। इतना पर ही नहीं रुका मामला पत्रकार का माइक तोड़ दिया साथ ही कैमरा को भी फेंक दिया उसके बाद सभी को हाॅस्पिटल के अंदर ही बंधक बना लिया। मामला जैसे ही लोगों तक पहुंचा हाॅस्पिटल मालिक रितेश ने धमकाना बंद नहीं किया बल्कि उसने कहा कि हम किसी पुलिस प्रशासन को नहीं मानते अपना फैसला डायरेक्ट करते हैं। उक्त बातें ऑल इंडिया मुस्लिम बेदारी कारवां के सचिव ई0 फखरूद्दीन ने कही। श्री फखरूद्दीन ने कहा कि दरभंगा मेडिकल मामले में पहले से भी बदनाम रहा है। यही कारण है के यहां के बेश्तर निजी हाॅस्पीटल के मालिक मरीजों के इलाज के नाम पर मोटी राशि ऐंठ गरीब मरीजों का खून चूसने का काम सिविल सर्जन, जिला प्रशासन, दलाल और मेडिकल माफियाओं के संरक्षण में खुलेआम अंजाम दे रहा है। हम जिला प्रशासन और सिविल सर्जन से मांग करते हैं कि 24 घंटे के अंदर जांच कर ट्रस्ट के नाम चल रहे जोगिंदर मेमोरियल ट्रस्ट हाॅस्पिटल को सील करे साथ ही देश के चौथे स्तंभ मिडिया बंधुओं पर किए गए जानलेवा हमले के आरोपी रितेश पर कानूनी कार्रवाई करे।

  • CAA और NRC के खिलाफ विधानसभा से प्रस्ताव पारित करने की मांग को लेकर दरभंगा में पैदल मार्च निकाला गया

    एनआरसी-सीएए-एनपीआर के खिलाफ विधानसभा से प्रस्ताव पारित करने की मांग को लेकर आज संविधान बचाओ संघर्ष मोर्चा लालबाग सत्याग्रह कमिटी द्वारा लालबाग से कमिश्नरी तक पैदल मार्च निकाला गया.

    मार्च की अध्यक्षता ऑल इंडिया मुस्लिम बेदारी कारवां के अध्यक्ष नजरे आलम, शकील अहमद सलफी, नेतृत्व सबा प्रवीण, नाजिया हसन, मोतिउर रहमान, ई0 फखरूद्दीन कमर, बदरूलहोदा खान, राजा खान, हीरा नेजामी, शाहिद अतहर, मो0 मुन्ना, सोनू मिकरानी, जीशान अख्तर, मो0 तालिब, शाहनवाज, अब्दुल्लाह, मो0 बशर, बदिउज्जमां आदी ने किया।

    वहीं पोलो मैदान में सभा की संचालन इंजीनियर फखरूद्दीन ने किया। सभा को संबोधित करते हुए सबा प्रवीन ने कहा कि आज धरना के 35वां दिन लालबाग सत्याग्रह कमेटी के द्वारा नीतीश कुमार के 23 फरवरी के दरभंगा आगमन पर पैदल मार्च निकालकर उनको यह बतलाने का काम किया है कि नीतीश कुमार पहले आप बिहार विधानसभा से एनआरसी- सीएए-एनपीआर के खिलाफ प्रस्ताव पारित करें उसके बाद अपनी यात्रा को शुरू करें नहीं तो दरभंगा की जनता आपका विरोध करेगी।

    वहीं ऑल इंडिया मुस्लिम केदारी कारवां के राष्ट्रीय अध्यक्ष नजरे आलम ने कहा कि नीतीश कुमार दरभंगा आगमन से पहले सीएए- एनआरसी – एनपीआर के खिलाफ विधानसभा के अंदर प्रस्ताव पारित करें अन्यथा 23 फरवरी को पूरे दरभंगा में उनका जगह-जगह विरोध किया जाएगा।

    श्री आलम ने कहा कि बिहार के मुखिया मुस्लिमों का वोट लेकर अब मोदी-अमित शाह की भाषा बोल रहे है, और अपने नेता से भी बोलवा रहे है। जनता इसे बर्दाश्त नहीं करेगा।

    उन्होंने स्थानीय मुस्लिम नेताओं पर कटाक्ष करते हुए कहा कि आज जो मुस्लिम हितैषी की बात कर रहे हैं उन्होंने 35 साल तक मुस्लिम का वोट लेकर मुस्लिम के साथ गद्दारी करने का काम किया है। पहले नीतीश कुमार ऐसे गद्दार को अपनी पार्टी से निकाले, और वोट बैंक की राजनीति करना बंद करें नहीं तो आने वाले चुनाव में जनता वैसे-वैसे नेता को समाज से बाहर निकाल देगी।

    श्री आलम ने कहा कि नीतीश कुमार आज तक मुसलमानों के लिए कुछ नहीं किया सिर्फ मुसलमानों का वोट लेकर मुसलमानों के साथ दगाबाजी करने का काम किया है। अब यह नहीं चलेगा जनता जागरूक हो चुकी है।

    श्री आलम ने कहां के मुस्लिम योजनाओं के नाम पर लाखों लाख की लूट हो रही है। और जो नेता को उसका कमीशन मिलता है वही नेता मुस्लिम के योजनाओं का गुण गाते हैं।

    श्री अलाम ने कहा कि बाप-बेटा दोनों को मुस्लिम समाज मुसलमान मानकर उनको जिताने का काम किया लेकिन इन दोनों बाप बेटा ने मुसलमान समाज का अपमान कर आरएसएस-भाजपा की गोद में जाकर बैठ गया है। और उसकी भाषा बोल रहा है। ऐसे दगाबाज नेता को दरभंगा की आम-आवाम में सबक सिखाने का काम किया।

    वहीं भाकपा(माले) जिला सचिव बैद्यनाथ यादव, सीपीआई जिला सचिव नारायण जी झा, आइसा जिला अध्यक्ष प्रिंस राज, मयंक , एनएसयूआई नेता त्रिभुवन कुमार ने भी सभा में आकर अपनी एकजुटता जाहिर किया। और लड़ाई को मजबूत करने का आवाहन किया।

    मार्च में भोला‌ भाई, काजी अरशद रहमानी, सोना खान, लईक मंजर वाजदी समेत हजारों की संख्या में महिलाएं एवं पुरुषों ने हिस्सा लिया।