Category: खास ख़बरें

  • सीतामढ़ी:9 वर्षीय लड़की का रेप के बाद कत्ल 15 दिन बीतने के बाद भी पुलिस मुजरिम को पकड़ने में नाकाम

    तमन्ने नाम का एक लड़का मुजरिम है जिस पर अपहरण और कत्ल का केस दर्ज कर लिया गया है वह घर से फरार है इसलिए पोस्टर जारी करके 1 महीने का मौका दिया गया है अगर मुजरिम 1 महीने में खुद हाजिर नहीं होता है तो फिर उसकी कुर्की जब्ती होगी

    एम कैसर सिद्दीक़ी,सीतामढ़ी:नाबालिक लड़की के साथ बलात्कार का एक और शर्मनाक मामला अब बिहार के सीतामढ़ी जिला में सामने आया है जहां एक 9 वर्षीय लड़की के साथ पहले बलात्कार की गई उसके बाद निर्मम हत्या करके जंगल में फेंक दिया गया लगभग 15 दिन गुजर जाने के बावजूद अब तक मुजरिम के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं हो सकी है मिल्लत टाइम्स को प्राप्त जानकारी के मुताबिक बिहार के सीतामढ़ी जिला में रीगा थाना से करीब 1 गांव भगवानपुर पिपराही है वहां 55 वर्षीय बुजुर्ग मोहम्मद की चाय की दुकान है 4 जनवरी को सुबह 7:30 बजे उनकी 9 वर्षीय लड़की (सजरीना खातून) दूसरे मोहल्ले में दूध लाने गई थी जिसके बाद वह दोबारा आई ही नहीं बहुत समय गुजर जाने के बाद जब लड़की घर नहीं आई तो लोगों ने खोजना शुरू कर दिया

    दूधवाले ने कहा कि लड़की आपकी दूध लेकर यहां से निकल गई थी रास्ते में एक स्कूल के पास दूध का डब्बा मिला और गन्ने के खेत में लड़की का चप्पल भी परा हुआ था इसी दिन पुलिस को भी मामले की जानकारी दी गई पुलिस आई और इसने भी ढुंढा लेकिन कोई सुराग नहीं मिला 6 दिनों बाद 9 जनवरी को लड़की की लाश बगल के कंवारी गांव के एक खेत में पड़ी हुई मिली जिस पर बलात्कार और कत्ल के निशान थे पीड़िता के भाई ने बताया कि लड़की के साथ बलात्कार करने के अलावा इसके साथ बेहूदा हरकत भी की गई थी और इसकी गुप्त अंग में कपड़ा भी डाल दिया गया था 4 जनवरी के बाद ही पुलिस में लापता की रिपोर्ट दर्ज करा दी गई थी लेकिन कोई ध्यान नहीं दी गई लाश मिलने के बाद पुलिस ने एफ आई आर दर्ज कर लिया है लेकिन अब तक कोई गिरफ्तार नहीं हो सका है

    वहां के मुखिया शम्स आलम ने बताया के बगल के गांव बनवा मोहल्ले का एक तमन्ने नाम का एक लड़का यहां चाय पीने आता था उससे पहले भी वह लड़की को परेशान किया था इस पर शक है f.i.r. में भी उसका नाम दर्ज है और उस मामले के बाद वह पूरे परिवार के साथ यहां से फरार हैं पुलिस कोशिश कर रही है लेकिन मुजरिम हाथ नहीं लग रहा है

    रीगा थाना के एसएचओ ललन कुमार ने मिल्लत टाइम्स से बात करते हुए कहा कि तमन्ने नाम का एक लड़का मुजरिम है जिस पर अपहरण और कत्ल का केस दर्ज कर लिया गया है वह घर से फरार है इसलिए पोस्टर जारी करके एक महीना का समय दिया गया है अगर मुजरिम 1 महीने में खुद हाजिर नहीं होता है तो फिर उसकी कुर्की जब्ती होगी एस एच ओ ने यह भी कहा कि लड़की के साथ बलात्कार भी हुई थी लेकिन अभी पोस्टमार्टम की रिपोर्ट नहीं आई है इसलिए यह एक्ट नहीं लगाई गई है रिपोर्ट आने के बाद रेप का मुकदमा भी दर्ज किया जाएगा

  • कुंभ मेला:आजतक के महिला पत्रकार के सवाल पर साधू ने दिखा दिया प्राइवेट पार्ट

    मिल्लत टाइम्स::आजतक की एक महिला रिपोर्टर को प्रयागराज के कुंभ में उस समय शर्मिंदा होना पड़ा जब एक साधू ने पत्रकार के सवाल पर ऐसा किया जिससे पत्रकार भी सन्न रही गयी और उई माँ कहते हुए भागती नजर आई वही आस पास खड़ी भीड़ हंसती रही है
    ये है मामला-आजतक की महिला पत्रकार एक नागा साधू का इंटरव्यू ले रही थी अचानक पत्रकार ने नागा साधू के गमछा पहनने पर सवालिया लहजे में कहाकि नागा बाबा तो कुछ पहनते नही फिर आप ने (गमछे की तरफ इशारा करते).अब ये सुनकर नागा साधू ने ना आव देखा ना ताव और अपना गमछा उतार फेंका.

    साधू के इस कृत्य को देखकर महिला पत्रकार शर्मिंदा हो गयी और मुहं फेरते हुए कहा.’इसे ना उतारे,इसे ना उतरिये’कहती हुई भागती दिखी वही आस पास खड़े लोग इस दृश्य पर हँसते दिखे.लेकिन पत्रकार को क्या पता था जब ये सब हो रहा था तभी कुछ लोग घटना का विडियो बना लिए और विडियो सोशल मीडिया पर वायरल कर दिया.

    दरअसल नागा साधू अपने बारह साल के संकल्प के बारे में बता रहा था वही महिला रिपोर्टर ने इस पर कहाकि आपने तो गमछा पहन रखा है.ये सुनते ही साधू ने अपना प्राइ-वेट पार्ट भी दिखा दिया जिसे देखकर पत्रकार भागती दिखी और लोग हंसते रहे.

    इस घटना पर बहुत से पत्रकार ने अपनी टिप्पड़ी दी है जिसका संकलन भड़ास फॉर मीडिया नाम के पोर्टल ने किया हैउसके अंश नीचे दिए है.इलाहाबाद के पत्रकार सुरेश पांडेय ने लिखा-टिवटर पर साझा किया गया एक वीडियो देखा… एक मोहतरमा रिपोर्टर नागा संन्यासी के साथ माइक लिए चल रही थीं। सवाल किया –आपने तो 12 साल का व्रत लिया है फिर शरीर पर कपड़े क्यों… बाबा जी ने झट कपड़ा उतार दिया –दिगंबर हो गए.

    यही आज के मीडिया का सच है.यह सच नहीं देखना चाहता.सच है कि सच के पास जाना जोखिम होता है,इसलिए हम सच नहीं कहते.सच नहीं बोलते.स्वांग करते हैं सच बोलने का.मेरे जैसे लोग जिन पर परिवार -घर की जिम्मेदारी होती है,इसीलिए लाट डाट डपट सब सहते हैं
    रात में मर जाएं घर से दफ्तर जाते समय, किसी को कोई परवाह नहीं.आखिर नौकरी की है ना… जिसमें पहला कायदा यह है कि ना नहीं कहना है.हां यह बात सच है कि नहीं करने वाले भी हैं मीडिया में.नवभारत में मेरे संपादक रहे श्याम बेताल जी कहते थे कि जो करता है क्यों नहीं करेगा और जो नहीं करता है वह क्यों करेगा…सही बात है सर… आपने सच कहा था.

    उन्होंने आगे लिखा कि मैं अपना सच नहीं कह सकता आज.दूसरे का सच नहीं सुन सकता और हां दिगंबर भी नहीं हो सकता.इसे मेरी कायरता समझ लें.वैसे कहूंगा जरूर एक दिन, शायद छह साल बाद पूर्ण कुंभ में.तब तक जिंदगी रूपी कुंभ में विषपान करता रहूंगा.अपयश रूपी.

    इस घटना के बाद एक बार फिर जहाँ पत्रकार के उल फिलुल सवालों पर लोग सवालिया निशान लगा रहे है वही सोशल मीडिया पर कई लोगो ने लिखा आखिर नागा बाबा को बिना कपडे की रहने की क्यों छुट है क्या मोदी इस पर कोई सामाजिक सुधार करेंगे.(इनपुट जनता की आवाज)

  • जानिए वह महान व्यक्ति कौन हैं,शेख़ दीन मोहम्मद जिसका गूगल ने बनाया है डूडल

    मिल्लत टाइम्स:पटना में पैदा हुए शेख़ दीन मोहम्मद ने ब्रिटेन में बड़ा नाम कमाया. गूगल ने उनकी याद में डूडल बनाया है. पर कौन थे शेख़ दीन मोहम्मद?

    पटना में 1759 में पैदा हुए शेख़ दीन मोहम्मद ने 1810 में हिंदुस्तानी कॉफ़ी हाउस नाम का रेस्तरां मध्य लंदन में खोला था.

    इसके अलावा शेख़ दीन मोहम्मद को ब्रिटेन को शैंपू शब्द से परिचित कराने का भी श्रेय दिया जाता है.इतना ही नहीं, वे इंग्लैंड में अंग्रेज़ी में छपने वाले पहले भारतीय लेखक भी रहे हैं.

    गुरूवार को उनकी उपलब्धियों का बखान करने वाली हरे रंग की एक तख़्ती का अनावरण किया गया. ‘ग्रीन प्लाक’ कही जाने वाली यह तख़्ती सामाजिक जीवन में अहम योगदान के लिए दिया जाने वाला विशिष्ट सम्मान है.

    ग्यारह साल की उम्र में दीन मोहम्मद फौज में भर्ती हो गए और कैप्टन के पद तक जा पहुंचे.

    वे 1782 तक सेना में रहे और कई लड़ाइयों में हिस्सा लिया, सेना से इस्तीफ़ा देने के बाद वे ब्रिटेन में बस गए.

    आयरलैंड में रहते हुए उन्होंने एक किताब ‘द ट्रेवल्स ऑफ़ दीन मोहम्मद’ लिखी थी जो किसी भी भारतीय की अंग्रेजी में प्रकाशित पहली कृति है.

    वे कुछ समय इंग्लैंड के पर्यटन स्थल ब्राइटन में रहने के बाद लंदन आ गए जहां उन्होंने नौकरी की.

    कुछ समय तक भाप स्नान और मालिश के पार्लर में काम करने के बाद उन्होंने अपना रेस्तरां खोला.

    ‘शैम्पू’ को ब्रिटेन में किया पॉपुलर

    भाप स्नान में नौकरी करने के दौरान ही दीन मोहम्मद ने भारतीय उपचार के रूप में चंपी की शुरूआत की. इस ‘चंपी’ का नाम इतना फैला कि दीन मोहम्मद की पहुंच राजदरबार तक हो गई.

    इसी ‘चंपी’ का अंग्रेज़ी रूप बन गया शैम्पू, दीन मोहम्मद को ‘रॉयल शैंपूइंग सर्जन’ कहा जाने लगा.

    वे जिस मसाज पार्लर में काम करते थे उसकी तो लंदन में धूम मच गई.

    उन्होंने 1810 में हिंदुस्तानी कॉफ़ी हाउस की शुरूआत की जिसमें भारतीय खाने के अलावा, भारतीय हुक्का भी पेश किया जाता था.

    उनका रेस्तरां कुछ समय चलने के बाद बंद हो गया लेकिन उसके बाद ब्रिटेन में भारतीय रेस्तरांओं की भरमार हो गई. जिस जगह उनका रेस्तरां था वहां अब कार्लटन हाउस नाम की इमारत है.

    दीन मोहम्मद रेस्तरां खोलने के दो साल के भीतर ही दीवालिया हो गए लेकिन कुछ वर्ष बाद ही उन्होंने दोबारा मसाज पार्लर का कारोबार ब्राइटन में शुरू कर दिया.

    उनकी मौत 1851 में हुई और वे ब्राइटन में ही दफ़न हैं, उनके परिवार के सदस्य ब्रिटेन में ही रहते हैं.(इनपुट बीबीसी)

  • एक खान अफसर ने लिखा दर्द कहा मुस्लिम होने के कारण मुझे 17 साल की नौकरी मे,10 जिले और 19 ट्रांसफर किया गया

    मिल्लत टाइम्स,नई दिल्ली:नियाज अहमद खान पीएचई विभाग के उप सचिव है. 17 साल की नौकरी में उनका 19 बार तबादला हो चुका है. वे 5 उपन्यास लिख चुके हैं. नियाज का अंडरवर्ल्ड डॉन अबू सलेम और मोनिका बेदी की लव स्टोरी पर आधारित उपन्यास काफी चर्चा में रहा.

    मध्य प्रदेश के प्रशासनिक गलियारों में एक अधिकारी के सोशल मीडिया पोस्ट से हड़कंप मच गया है. पीएचई विभाग के डिप्टी सेक्रेट्री नियाज अहमद खान ने अपने ही विभाग के प्रमुख सचिव विवेक अग्रवाल द्वारा बैठक से बाहर निकाले जाने पर प्रताड़ित करने का आरोप लगया है. नियाज अहमद ने इस सिलसिले में मुख्य सचिव से लिखित में शिकायत भी की है.

    नियाज अहमद ने कहा है कि खान सरनेम की वजह से उनके साथ भेदभाव किया जाता है. उनका कहना है कि 17 साल की नौकरी में उनका 10 जिलों में 19 बार ट्रांसफर किया जा चुका है. अहमद ने आरोप लगाया कि उन्हें एक विशेष धर्म में आस्था रखने की वजह से भेदभाव का शिकार होना पड़ा. उनके खिलाफ कोई जांच नहीं है, इसके बावजूद उन्हें अवसरों से महरूम किया जा रहा है.

    नियाज ने कहा कि जैसे ही आपके नाम के साथ खान जुड़ जाता है तो आप कई मौकों के लिए डिसक्वालिफाई कर दिए जाते हैं.

    नियाज अहमद का ट्वीट

    नियाज अहमद पीएचई विभाग के उप सचिव हैं. उनका 17 साल की नौकरी में 10 जिलों में 19 बार तबादला हो चुका है. नियाज अहमद खान अब तक 5 उपन्यास लिख चुके हैं. नियाज का अंडरवर्ल्ड डॉन अबू सलेम और मोनिका बेदी की लव स्टोरी पर आधारित उपन्यास काफी चर्चा में रहा.

    इसके अलावा वे तीन तलाक पर भी पुस्तक लिख चुके हैं, जिसका उन्हें विरोध भी झेलना पड़ा. नियाज ने गुना में अपर कलेक्टर रहने के दौरान ओडीएफ घोटाला उजागर किया था.

  • इस्लाम धर्म से ज्यादा दुसरे धर्मों मे छोड़ी गई है महिलाएं,तो फिर इस्लाम धर्म पर हि कानून क्यों?

    मिल्लत टाइम्स,नई दिल्ली: मुस्लिम महिला से ज्यादा दुसरे धर्मों की महिलाओं की स्थिति ज्यादा दयनीय है जिन्हें उनके पतियों ने एकतरफा तरीके से छोड़ दिया है। ये महिलाएं बेहद मुश्किल हालातों के बीच अपना जीवन बसर कर रही हैं। पिछली जनगणना के मुताबिक छोड़ी गई महिलाओं की संख्या 23 लाख थी। जो मुस्लिम कि तुलना मे कहीं ज्यादा है।

    रोजमर्रा के जीवन में ऐसी ही कई महिलाओं को आप भी देखते होंगे। जो पढ़ी लिखी होती हैं, वह खुद को संभाल भी लें। लेकिन जो महिलाएं अशिक्षित होती हैं, वह ऐसे में बेसहारा हो जाती हैं। पति द्वारा छोड़े जाने पर कुछ अपने माता-पिता के घर चली जाती हैं। लेकिन जिन्हें वहां भी सहायता नहीं मिलती वह खुद को लाचार समझने लगती हैं। महिलाओं को केवल आर्थिक तौर पर ही समस्याएं नहीं झेलनी पड़ती बल्कि उन्हें सामाजिक समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है।

    उन्हें समाज के लोगों से सुनना पड़ता है कि उन्हें उनके पति ने क्यों छोड़ा? क्या गलती की थी उन्होंने जो उनके साथ ऐसा हुआ? अब आगे क्या करेंगी और कहां जाएंगी? समाज के इन तीखे सवालों का सामना करने वाली इन महिलाओं की दशा बखूबी समझी जा सकती है।

    हैरान करने वाले हैं आंकड़े

    2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 13.2 लाख तलाक हुए हैं। तलाकशुदा लोगों में महिलाओं की संख्या 9.09 लाख है। जो कुल तलाकशुदा लोगों की आबादी का 68 फीसदी हिस्सा है।

    भारत में प्रति एक हजार शादियों में 2.3 फीसदी तलाक होते हैं। जिसमें तलाकशुदा पुरुषों की संख्या 1.58 फीसदी और महिलाओं की संख्या 3.10 फीसदी है। ऐसे में साबित होता है पुरुष महिलाओं की तुलना में तेजी से दूसरी शादी कर लेते हैं।

    अगर केवल महिलाओं की संख्या पर गौर करें तो सबसे अधिक तलाकशुदा महिलाएं बौध धर्म में हैं। (प्रति 1,000 विवाहों पर 6.73 फीसदी), इसाईयों में ये आंकड़ा (5.67 फीसदी), मुस्लिमों में (5.63 फीसदी) है। वहीं अन्य समुदायों में ये संख्या (4.91 फीसदी), जैन (3.04 फीसदी), हिंदू में (2.60 फीसदी) और सिख में (2.56 फीसदी) है।

    एक राष्ट्रवादी मुस्लिम महिला संघ ने जून, 2016 में देश के सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को संहिताबद्ध करने के लिए दायर की गई इस याचिका में महिलाओं की दशा की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित किया गया। बता दें ये महिला संघ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से संबद्ध रखती है।

    इस याचिका का मकसद तीन तलाक, को समाप्त कर इस्लाम धर्म मे हस्तक्षेप करना था । इस मुद्दे पर कोर्ट ने अक्तूबर माह में सरकार से विचारों की मांग की।

    सरकार ने कोर्ट को दिए जवाब में कहा कि बीते 65 सालों से मुस्लिम समुदाय में कोई सुधार नहीं हुआ है। जिसके चलते मुस्लिम औरतें सामाजिक और आर्थिक तौर पर बेहद नाजुक स्थिति में खड़ी हैं। सरकार ने तीन तलाक प्रथा की आलोचना की। ये भी कहा गया कि धर्म और संप्रदाय के नाम पर महिलाओं के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए।

    ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इस मामले पर कहा कि सरकार ने इस बिल पर किसी भी पक्ष से बात नहीं की है। जो लोग विरोध कर रहे हैं उनकी तो छोड़िए, जिनके लिए बिल लाया जा रहा है उनसे तक बात नहीं की गई है। आपने (सरकार) समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया और तीन तलाक को आपराधिक करार दे दिया है। क्योंकि यह हमारे खिलाफ इस्तेमाल होगा। लैंगिक अल्पसंख्यकों को धारा 377 में अपनी पसंद की छूट दी गई, तब धार्मिक अल्पसंख्यकों को क्यों नहीं?

    समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता आजम खां का कहना है कि हमें कुरान के अलावा कोई भी कानून मान्य नहीं है। उन्होंने कहा इससे मुसलमानों का कोई लेना-देना नहीं है, जो लोग मुसलमान हैं जो कुरान को मानते हैं, हदीस को मानते हैं वह जानते हैं कि तलाक का पूरा प्रोसीजर कुरान में दिया हुआ है।

    आजम ने कहा कि हमारे लिए कुरान के उस प्रोसीजर के अलावा कोई भी कानून मान्य नहीं है जो कुरान कहता है अगर उसके तहत कोई तलाक नहीं देता, खुला नहीं देता तो ना वो तलाक है ना खुला है। लिहाजा यह बहस की बात नहीं है सिर्फ कुरान का कानून और कोई कानून नहीं हिंदुस्तान ही नहीं पूरी दुनिया के मुसलमानों को कोई कानून मान्य नहीं है सिर्फ कुरान है। कैसे शादी करेगा, कैसे इबादत करेगा, कैसे तलाक देगा सब कुरान में है। इसकी पूरी डिटेल है हमारे मजहबी मामलात हैं। उन्होंने लोकसभा में होने वाली बहस में कहा पहले लोग उन औरतों को न्याय दें जिन्हें शौहरों ने स्वीकारा नहीं है, जो सड़कों पर फिर रही हैं। शौहरों का घर ढूंढती फिर रही हैं उन औरतों को तो न्याय दें।

    बता दें इस्लाम में दो तरह के तलाक की बात कही गई है। एक ‘खुला’, जिसकी पहल पत्नी कर सकती है और दूसरा ‘तलाक’ जिसकी पहल पति कर सकता है। तलाक देने वाले पति को तलाक के बाद पत्नी को मेहर चुकानी पड़ती है। वहीं अगर तलाक की पहल यानी खुला पत्नी की ओर से होती है तो मेहर नहीं दी जाती।

  • मशहूर लेखिका डाॅ कमला दास ने किया इस्लाम कुबूल,कहा इस्लाम शांति और मुहब्बत का प्रतीक है

    मिल्लत टाइम्स,नई दिल्ली:“मुझे हर अच्छे मुसलमान की तरह इस्लाम की एक-एक शिक्षा से गहरी मुहब्बत है। मैंने इसे दैनिक जीवन में व्यावहारिक रूप से अपना लिया है और धर्म के मुक़ाबले में दौलत मेरे नज़दीक बेमानी चीज़ है।” इस्लाम जो मुहब्बत, अमन और शान्ति का दीन है. – डॉक्टर कमला सुरैया

    इस्लाम जो सम्पूर्ण जीवन-व्यवस्था है, और मैंने यह फै़सला भावुकता या सामयिक आधारों पर नहीं किया है, इसके लिए मैंने एक अवधि तक बड़ी गंभीरता और ध्यानपूर्वक गहन अध्ययन किया है और मैं अंत में इस नतीजे पर पहुंची हूं कि अन्य असंख्य ख़ूबियों के अतिरिक्त इस्लाम औरत को सुरक्षा का एहसास प्रदान करता है और मैं इसकी बड़ी ही ज़रूरत महसूस करती थी.

    फ़ोटो क्रेडिट: Ummate Nabi
    इसका एक अत्यंत उज्ज्वल पक्ष यह भी है कि अब मुझे अनगिनत ख़ुदाओं के बजाय एक और केवल एक ख़ुदा की उपासना करनी होगी. रमज़ान का महीना मुसलमानों का अत्यंत पवित्र महीना और मैं ख़ुश हूं कि इस अत्यंत पवित्र महीने में अपनी आस्थाओं में क्रान्तिकारी परिवर्तन कर रही हूं.

    तथा समझ-बूझ और होश के साथ एलान करती हूं कि अल्लाह के अलावा कोई पूज्य नहीं और मुहम्मद (सल्ल॰) अल्लाह के रसूल (दूत) हैं। अतीत में मेरा कोई अक़ीदा नहीं था। मूर्ति पूजा से बददिल होकर मैंने नास्तिकता अपना ली थी, लेकिन अब मैं एलान करती हूं कि मैं एक अल्लाह की उपासक बनकर रहूंगी और धर्म और समुदाय के भेदभाव के बग़ैर उसके सभी बन्दों से मुहब्बत करती रहूंगी.

    ‘‘मैंने किसी दबाव में आकर इस्लाम क़बूल नहीं किया है, यह मेरा स्वतंत्र फै़सला है और मैं इस पर किसी आलोचना की कोई परवाह नहीं करती। मैंने फ़ौरी तौर पर घर से बुतों और मूर्तियों को हटा दिया है और ऐसा महसूस करती हूं जैसे मुझे नया जन्म मिला है।’’

    इस्लामी शिक्षाओं में बुरके़ ने मुझे बहुत प्रभावित किया अर्थात वह लिबास जो मुसलमान औरतें आमतौर पर पहनती हैं। हक़ीक़त यह है कि बुरक़ा बड़ा ही ज़बरदस्त लिबास और असाधारण चीज़ है। यह औरत को मर्द की चुभती हुई नज़रों से सुरक्षित रखता है और एक ख़ास क़िस्म की सुरक्षा की भावना प्रदान करता है। आपको मेरी यह बात बड़ी अजीब लगेगी कि मैं नाम-निहाद आज़ादी से तंग आ गयी हूं।

    कमला सुरय्या पूर्व नाम कमला दास अँग्रेजी और मलयालम भाषा की भारतीय लेखिका थीं। वे मलयालम भाषा में माधवी कुटटी के नाम से लिखती थीं। उन्हें उनकी आत्मकथा ‘माई स्टोरी’ से अत्यधिक प्रसिद्धि मिली। कमला की बहुत ही कम उम्र में शादी हो गई थी। उस वक्त उनकी उम्र मात्र 15 साल की थी।

    उनका जन्म आज़ादी से तेरह साल पहले 1934 में केरल के साहित्यिक परिवार में हुआ था. छह वर्ष की आयु में ही उन्होंने कविताएं लिखना शुरू कर दिया था. अपनी आत्मकथा ‘माई स्टोरी’ में कमला दास लिखती हैं, “एक बार गवर्नर की पत्नी मैविस कैसी हमारे स्कूल आईं.

    मैंने इस मौके पर एक कविता लिखी लेकिन हमारी प्रिंसिपल ने वो कविता एक अंग्रेज़ लड़की शर्ली से पढ़वाई. इसके बाद गवर्नर की पत्नी ने शर्ली को अपनी गोद में बैठा कर कहा कि तुम कितना अच्छा लिखती हो! मैं दरवाज़े के पीछे खड़ी वो सब सुन रही थी.”

    “इतना ही नहीं गवर्नर की पत्नी ने शर्ली के दोनों गालों पर चुंबन लिए और उनकी देखादेखी हमारी प्रिंसिपल ने भी मेरी आखों के सामने उसको चूमा. पिछले साल मैंने लंदन के रॉयल फ़ेस्टिवल हॉल में अपनी कविताओं का पाठ किया. आठ बजे से ग्यारह बजे तक मैं मंच पर थी.

    जब मैं स्टेज से नीचे उतरी तो कई अंग्रेज़ों ने आगे बढ़ कर मेरे गालों को चूम लिया. मेरे मन में आया कि शर्ली, मैंने तुमसे अपना बदला ले लिया.” उनके छोटे बेटे जयसूर्या दास, जो इस समय पुणे में रहते हैं, बताते हैं, “मेरी मां एक सामान्य इंसान थीं.

    अक्सर साड़ी पहनती थीं. कभी कभी वो लुंगी भी पहना करती थीं. उनको आभूषण पहनने का बहुत शौक था. वो अपने हाथ में 36 चूडियाँ पहनती थीं-18 दाहिने हाथ में 18 बाएं हाथ में. काफी भावनाप्रधान महिला थीं. दिन में दो बार नहाती थीं और परफ़्यूम की जगह अपनी पानी की बाल्टी में इत्र डालती थीं.”

  • क्वालिटी शिक्षा का प्रचार प्रसार मौलाना असरारुल हक़ क़ासमी को असल श्र्द्धांजलि

    कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में देवबंद ओल्ड बॉयज़ और वतन समाचार द्वारा आयोजित शोक सभा के दौरान, दिग विजय सिंह, तारिक अनवर, केसी त्यागी, ईटी बशीर, इलायास आज़मी, एमजे खान, मुफ़्ती एजाज़ अरशद, खालिद अनवर समेत कई उलेमा और नेताओं की शिरकत

    आमिर जफर कासमी/मिल्लत टाइम्स,नई दिल्ली: 4 जनवरी: देवबंद ओल्ड ब्वॉयज एसोसिएशन और वतन समाचार द्वारा दिल्ली के कॉन्स्टिट्यूशन क्लब में सांसद मौलाना असरारुल हक़ क़ासमी को श्र्द्धांजलि देने के लिए एक शोक सभा का आयोजन किया गया, जिस में दिग्गज नेता दिग विजय सिंह, तारिक अनवर, ईटी बशीर, केसी त्यागी, इलायस आज़मी, अली अनवर अंसारी, साबिर अली, मुफ़्ती अता उल रहमान, पप्पू यादव, मनोज चौधरी, खालिद अनवर एमएलसी, साजिद चौधरी, हकीम अयाज़ हाश्मी, हाजी इमरान अंसारी, बिलाल अहमद, इमरान क़िदवई, एम् जे खान, डॉ तसलीम रहमानी, इंजीनियर मुहम्मद असलम अलीग, कारी असद जुबैर, मौलाना क़ासमी नूरी, गौतम विग, यासीन जहाज़ी और अज़ीमुल्लाह सिद्दीक़ी क़ासमी व् आरिफ क़ासमी समेत कई धार्मिक, राजनीतिक और सामाजिक नेताओं ने अपने प्रिय नेता मौलाना इसरारुल हक कासिमी की प्रशंसा करते हुए उन्हें श्र्द्धांजलि अर्पित की।

    इस अवसर पर वक्ताओं ने कहा कि मौलाना एक जीवित वली थे। मौलाना ने संसद के सदस्य के रूप में अपनी शक्ति का इज़हार कभी नहीं किया। उस समय जब किशन गंज को जलाने का प्रयास किया गया था, मौलाना ने खुद की परवाह नहीं की। वे लोगों के बीच में चले गए, भले ही उनकी दाढ़ी को नोच कर उन को अपमानित किया गया, लेकिन उन्होंने कभी किसी से बदला नहीं लिया और कहते रहे की ये नादान लोग हैं, क्यों की यह चीज़ उन को दारुल ओलूम देवबंद से मिली थी।

    वक्ताओं का कहना था कि मौलाना ने हमेशा उच्च और क्वालिटी की शिक्षा के लिए काम किया । उनके साथ तारिक अनवर सहित अन्य नेता भी थे, जिन्होंने किशन गंज में एएमयू सेंटर के गठन के लिए बलिदान दिया, जो इतिहास का एक महत्वपूर्ण अध्याय है। उन्होंने कहा कि मौलाना ने जमीयत उलेमा, मिल्ली काउन्सिल और मिल्ली फाउंडेशन के बैनर तले सेवा की है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक बड़ा एसेट है। वक्ताओं ने कहा कि हमें मौलाना असरार-उल-हक अकादमी बनाकर, उनके कार्यों को जीवित रखने की आवश्यकता है।
    उन्होंने कहा कि मौलाना एक ऐसे इंसान थे जिन से शायद ही किसी को कोई तकलीफ पहुंनही हो, उन्हें दिखावा बिल्कुल पसंद नहीं था। उन्होंने खुद को कभी नहीं आगे किया बल्कि क़ौम और समाज को हमेशा आगे किया और उस के लिए काम करते करते हमारे बीच से चले गए। उन्होंने कहा कि मौलाना ने उलेमा के लिए एक उदाहरण पेश किया है कि कैसे सरल जीवन शैली में रहना चाहिए और उनका काम क्या होना चाहिए।

    उलेमा ने कहा कि हमारा प्रयास होना चाहिए कि मौलाना ने शिक्षा के क्षेत्र में जो काम किया है उस को देश के कोने कोने में मानक शिक्षा के साथ मदरसों का जाल बिछाया जाये ताकि कोई भी शिखा से वंचित ना रह जाये। और यह हम सब की ज़िम्मेदारी कि कोई भी व्यक्ति शिक्षा के से वंचित न रहे। कार्यक्रम का संचालन मुफ़्ती एजाज़ अरशद कासमी ने किया, जबकि वतन समाचार के एडिटर मोहम्मद अहमद ने धन्यवाद ज्ञापन किया और प्रमुख अंतर्राष्ट्रीय विद्वान शेख सलाउद्दीन मक़बूल की दुआ के साथ शोक सभा समाप्त हुयी।

  • तलाक पर मुस्लिम महिला को हक दिलाने वाले मोदी हिंदू महिला को हक क्यों नहीं दिला रहे है?

    मिल्लत टाइम्स,नई दिल्ली:’हमारी मुस्लिम महिलाएं, बहनें, उनको मैं आज लाल किले से विश्वास दिलाना चाहता हूं. तीन तलाक़ की कुरीति ने हमारे देश की मुस्लिम बेटियों की ज़िंदगी को तबाह करके रखा हुआ है और जिन्हें तलाक़ नहीं मिला है वो भी इस दबाव में गुजारा कर रही हैं. मेरे देश की इन पीड़ित माताओं-बहनों को, मेरी मुस्लिम बेटियों को मैं विश्वास दिलाता हूं कि मैं उनके न्याय के लिए, उनके हक़ के लिए काम करने में कोई कमी नहीं रखूंगा और मैं आपकी आशाओं, आकांक्षाओं को पूर्ण करके रहूंगा.”
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ये बातें 15 अगस्त, 2018 को लाल किले से दिए अपने भाषण में कही थीं.लेकिन अपने भाषणों और बयानों में बार-बार ‘मुस्लिम बहनों’, ‘मुस्लिम माताओं’ और ‘मुस्लिम बेटियों’ के हक़ और इंसाफ़ की बात करने वाले वही पीएम मोदी सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे पर बिल्कुल अलग रुख अख़्तियार करते दिखे.

    समाचार एजेंसी एएनआई की संपादक स्मिता प्रकाश ने जब तीन तलाक़ और सबरीमला मुद्दे पर प्रधानमंत्री की राय जानने चाही तो उन्होंने कहा:
    दुनिया में बहुत से ऐसे देश हैं जहां तीन तलाक़ पर पाबंदी है. इसलिए ये आस्था का मसला नहीं है. इसका मतलब ये है कि तीन तलाक़ जेंडर इक्वलिटी (लैंगिक समानता) का मसला बनता है, सामाजिक न्याय का मसला बनता है, न कि धार्मिक आस्था का. इसलिए इन दोनों को अलग कीजिए. दूसरी बात,भारत स्वभाव से इस मत का है कि सभी को समान हक़ मिलना चाहिए. हिंदुस्तान में बहुत से मंदिर ऐसे भी हैं जहां पुरुष नहीं जा सकते और पुरुष वहां नहीं जाते. मंदिर की अपनी मान्यताएं हैं, एक छोटे से दायरे में. इसमें सुप्रीम कोर्ट की महिला जज (इंदु मल्होत्रा) का जो जजमेंट है, उसको बारीकी से पढ़ने की ज़रूरत है. इसमें किसी राजनीतिक दल के दख़ल की ज़रूरत नहीं है. उन्होंने एक महिला के नाते भी इसे समझकर अपने सुझाव दिए हैं. मेरा ख़्याल है उस पर भी चर्चा होनी चाहिए.
    महिलाओं से ही जुड़े दो अलग मुद्दों पर प्रधानमंत्री के एक-दूसरे से एकदम उलट रवैये को कैसे देखा जाए?

    धर्मस्थलों में महिलाओं को प्रवेश दिलाने के आंदोलन से जुड़ी कार्यकर्ता तृप्ति देसाई कहती हैं, “प्रधानमंत्री को ऐसी बात बिल्कुल नहीं कहनी चाहिए थी. जैसे तीन तलाक़ में महिलाओं के साथ अन्याय होता है वैसे ही सबरीमला मामले में भी महिलाओं के साथ अन्याय होता आया है. उनके हक़ छीने जाते रहे हैं. वहां अगर 10-50 साल के पुरुष जा सकते हैं तो महिलाएं क्यों नहीं? ये हमारे संविधान में दिए गए समानता के अधिकार का अपमान है, महिलाओं का अपमान है.”


    सबरीमला महिलाएं फोटो

    आस्था के सवाल पर तृप्ति कहती हैं, “क्या महिलाओं की आस्था नहीं होती? उन्हें मंदिर में जाने से रोके जाने पर क्या आस्था से खिलवाड़ नहीं होता? वैसे, मुझे लगता है कि ये आस्था का नहीं बल्कि समानता का विषय है.”
    न्यूज़ वेबसाइट ‘द वायर’ की वरिष्ठ संपादक आरफ़ा ख़ानुम शेरवानी का मानना है कि चाहे सबरीमला का मुद्दा हो या तीन तलाक़ का, दोनों ही पितृसत्ता को चुनौती देते हैं.
    उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, “हम अपने राजनीतिक नेतृत्व से कम से कम इतनी उम्मीद रखते हैं कि वो महिलाओं और लैंगिक न्याय से जुड़े मामलों पर निष्पक्ष होकर फ़ैसले लेंगे. लेकिन असल में होता ये है कि राजनीतिक पार्टियां अपनी वोट बैंक पॉलिटिक्स से अलग नहीं हो पातीं और इन दोनों मुद्दों में भी यही हुआ है.”
    आरफ़ा कहती हैं, “सबरीमला और तीन तलाक़ के मसलों में देखा जाए तो सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों का भी राजनीतीकरण हो रहा है. उन्हें भी अपनी सुविधा के हिसाब से स्वीकार या अस्वीकार किया जा रहा है. चूंकि तीन तलाक़ को अपराध ठहराया जाना बीजेपी की पॉलिटिक्स के अनुकूल है, वो इसे स्वीकार कर रही है. वहीं, सबरीमला में महिलाओं के महिलाओं को प्रवेश दिलाना उनके हिंदुत्व के अजेंडे के ख़िलाफ़ है इसलिए इसे ख़ारिज किया जा रहा है.”
    आरफ़ा मानती हैं कि प्रधानमंत्री मोदी का ये कहना कि सबरीमला आस्था का विषय है लैंगिक समानता का नहीं, एक समाज और लोकतंत्र के तौर हमें पिछली सदी में धकेलने की कोशिश जैसा जैसा है.

    ‘आंदोलन करने वाली महिलाएं अयप्पा की भक्त नहीं’
    वहीं, सामाजिक कार्यकर्ता और वरिष्ठ पत्रकार मधु किश्वर की राय तृत्पि देसाई और आरफ़ा ख़ानुम शेरवानी से अलग है.
    उन्होंने कहा की, “सबसे पहली बात तो ये कि तीन तलाक़ को ग़ैर-क़ानूनी घोषित करवाने के लिए ख़ुद मुसलमान महिलाएं आगे आई थीं. उन्होंने ख़ुद सुप्रीम कोर्ट का रुख़ किया. वहीं, सबरीमला मंदिर में जाने के लिए के जिन महिलाओं ने आंदोलन किया वो आस्थावान थी ही नहीं. उनमें से कोई मुसलमान थी, कोई ईसाई और कोई नास्तिक. आंदोलन करने वालों में से कोई महिला भगवान अयप्पा की भक्त या श्रद्धालु नहीं थी.”
    मधु किश्वर का तर्क है कि अगर देश के सभी मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी होती तब ये लैंगिक भेदभाव और असमानता का मुद्दा होगा. अगर हज़ारों मंदिरों में से एक-दो मंदिरों में ऐसी प्रथा है तो इसे भेदभाव नहीं कहा जा सकता.
    पत्रकार और फ़िल्ममेकर दीपिका नारायण भारद्वाज भी मधु किश्वर के मत से सहमति जताती हैं.
    वो कहती हैं, “हर मामले को लैंगिक भेदभाव से जोड़कर देखा जाना उचित नहीं है. सबरीमला मसले को भी संपूर्ण संदर्भ में देखा जाना चाहिए. ऐसा नहीं है कि हमारी धार्मिक मान्यताएं भेदभावपूर्ण नहीं है लेकिन अगर बात सिर्फ़ सबरीमला मंदिर में महिलाओं को प्रवेश न मिलने की है तो मुझे नहीं लगता कि ये अन्याय या भेदभाव है. मुझे नहीं लगता कि ये कोई मुद्दा होना भी चाहिए.”
    दीपिका कहती हैं, “अगर कुछ महिलाएं सबरीमला मंदिर या निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह में चली भी जाती हैं तो इससे पितृसत्ता ख़त्म नहीं हो जाएगी.”

    महिलाओं के हक़ के नाम पर राजनीति
    इस पूरे मामले और विवाद पर तृप्ति देसाई कहती हैं कि किसी पार्टी को महिलाओं के हक़ या आस्था से कोई लेना-देना नहीं है.
    उन्होंने कहा, “जब हम शनि-शिंगणापुर मंदिर में जाने की कोशिश कर रहे थे तब बीजेपी ने हमारा इस तरह विरोध नहीं किया. जब हमने हाजी अली की दरगाह में औरतों के प्रवेश के लिए आंदोलन किया तब भी बीजेपी ने विरोध नहीं किया. लेकिन जब हम केरल के सबरीमला मंदिर में जाना चाहते हैं तो बीजेपी हमारे ख़िलाफ़ खड़ी हो जाती है.”
    तृप्ति के मुताबिक, “इन विरोधाभासी फ़ैसलों का मतलब साफ़ है. केरल में बीजेपी सत्ता में नहीं है. ज़ाहिर है वो वहां हिंदू मतदाताओं को नाराज़ नहीं करना चाहती.”
    आरफ़ा ख़ानुम कहती हैं, “ये बात ठीक है कि एक मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से पितृसत्ता तुरंत ख़त्म नहीं होगी. महिलाओं को कुछ ख़ास धर्मस्थलों पर न जाने दिया जाना एक छोटा मुद्दा लग सकता है लेकिन असल में ये एक प्रतीक है जो दिखाता है कि समाज में पितृसत्ता की जड़ें कितनी गहरी हैं. इन प्रतीकों को ख़त्म किया जाना ज़रूरी है.


    सबरीमला, महिलाएं फोटो
    आरफ़ा मानती हैं कि तीन तलाक़ मसले पर बीजेपी अपने आक्रामक रैवये से बहुसंख्यक वर्ग में ये संदेश पहुंचाना चाहती है कि वो मुसलमानों को ‘अनुशासित’ कर रही है. वहीं, सबरीमला मसले पर नर्म रवैया अपनाकर हिंदू समाज को ये दिखाना चाहती है कि वो उनकी धार्मिक आस्था के प्रति कितनी गंभीर है.
    आरफ़ा कहती हैं, “महिलाओं के हक़ के संदर्भ में देखें तो भारतीय राजनीति ‘माचो पॉलिटिक्स’ के स्वरूप में ढली हुई है. यानी ऐसी राजनीति जहां मर्द अपनी ज़रूरत के हिसाब से महिला मुद्दों का इस्तेमाल करते हैं, जबकि असल में उन्हें इससे कोई वास्ता नहीं होता.”
    क्या है सबरीमला विवाद?
    कुछ महीने पहले तक केरल के सबरीमला मंदिर में 10-50 साल की उम्र की महिलाओं को प्रवेश की इजाज़त नहीं थी. धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक ये भगवान अयप्पा का मंदिर है, जो ब्रह्मचारी हैं. चूंकि 10-50 साल के बीच की उम्र की महिलाएं मासिक धर्म से गुजरती हैं इसलिए मंदिर में इस आयु वर्ग के महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी थी.
    बाद में कई महिलाओं और संगठनों के हस्तक्षेप और विरोध के बाद सितंबर महीने में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा था कि ये परंपरा भारतीय संविधान के अनुच्छेद-14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करती है.
    अदालत की संवैधानिक बेंच ने मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटा दी थी और कहा था कि हर किसी को बिना किसी भेदभाव के मंदिर में पूजा करने की अनुमति मिलनी चाहिए.


    जस्टिस इंदु मल्होत्रा

    जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने क्या कहा था?
    इस मामले में पांच जजों वाली संवैधानिक पीठ की इकलौती महिला जज जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने बाकी जजों से अलग राय जताई थी, जिसका ज़िक्र पीएम मोदी अपने इंटरव्यू में कर रहे थे.
    उन्होंने कहा कि कोर्ट को धार्मिक मान्यताओं में दख़ल नहीं देना चाहिए क्योंकि इसका दूसरे धार्मिक स्थलों पर भी असर पड़ेगा.
    जस्टिस इंदु ने कहा था, “देश के जो गहरे धार्मिक मुद्दे हैं, उन्हें कोर्ट को नहीं छेड़ना चाहिए ताकि देश में धर्मनिरपेक्ष माहौल बना रहे. अगर बात ‘सती प्रथा’ जैसी सामाजिक बुराइयों की हो तो कोर्ट को दख़ल देना चाहिए. लेकिन धार्मिक परंपराएं कैसे निभाई जाएं, इस पर कोर्ट को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए. मेरी राय में तर्कसंगतता के विचारों को धर्म के मामलों में नहीं लाया जा सकता है.”
    जस्टिस इंदु ने ये भी कहा था कि भारतीय संविधात में वर्णित समानता का सिद्धांत, अनुच्छेद-25 के तहत मिलने वाले पूजा करने के मौलिक अधिकार की अवहेलना नहीं कर सकता.

    हालांकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश और भारी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद कई दक्षिणपंथी संगठनों ने महिलाओं को मंदिर में नहीं जाने दिया. यहां तक कि मंदिर में जाने की कोशिश करने वाली कुछ महिलाओं और पत्रकारों को हिंसा का सामना भी करना पड़ा.
    हालांकि मंगलवार सुबह 10-50 साल की उम्र के बीच की दो महिलाओं ने पुलिस की सुरक्षा में मंदिर के अंदर जाने में क़ामयाब रहीं.
    इस पूरे में मसले में बीजेपी और इसके समर्थन वाले संगठन सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ खड़े दिखाए दिए. ख़ुद बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कहा था कि अदालत को ऐसे फ़ैसले सुनाने चाहिए जो व्यावहारिक हों.(बीबीसी न्यूज़ के इनपुट के साथ)

  • जानिए क्या होती है सेलेक्ट कमेटी ?

    तस्वीर का प्रयोग सांकेतिक रूप मे किया गया है

    मिल्लत टाइम्स: संसद के अंदर अलग-अलग मंत्रालयों की स्थायी समिति होती है, जिसे स्टैंडिंग कमेटी कहते हैं. इससे अलग जब कुछ मुद्दों पर अलग से कमेटी बनाने की ज़रूरत होती है तो उसे सेलेक्ट कमेटी कहते हैं.

    इसका गठन स्पीकर या सदन के चेयरपर्सन करते हैं. इस कमेटी में हर पार्टी के लोग शामिल होते हैं और कोई मंत्री इसका सदस्य नहीं होता है. काम पूरा होने के बाद इस कमेटी को भंग कर दिया जाता है.

    अगर सरकार बिल को सेलेक्ट कमेटी के पास नहीं भेजती है तो बिल का भविष्य क्या होगा?

    इस सवाल के जवाब में नीरजा चौधरी कहती हैं, “किसी भी पार्टी को इस बिल के भविष्य की चिंता नहीं है. और बीजेपी दिखाना चाहती है कि हमने कोशिश की. बीजेपी ये भी चाहती है कि विपक्षी पार्टियां अल्पसंख्यकों के साथ खड़ी दिखें, ताकि उनको एंटी हिंदू क़रार दे दिया जाए. दरअसल बीजेपी इस तीन तलाक़ बिल के ज़रिए अपनी आज़माई हुई ध्रुवीकरण की राजनीति कर रही है.”

    नीरजा कहती हैं कि इस बिल को आपराधिक नहीं बनाया जाना चाहिए, ये एक सिविल अपराध है.

    “और जब सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक़ को अवैध क़रार दे दिया था तो इस बिल की क्या ज़रूरत है. मुझे लगता है कि ज़रूरत पड़ने पर दोनों पार्टियां अपने स्टैंड को चुनाव में भी भुनाएंगी.”

  • दारुल उलूम देवबंद ने कहा:तलाक बिल शरीयत में हस्तक्षेप और संविधान के खिलाफ है

    मिल्लत टाइम्स,देवबंद: हिंदुस्तान में सभी धर्म को अपने धर्म का पालन करने की संविधान आजादी देता है और तलाक तथा निकाह धर्म का मामला है इसमें किसी भी सरकार कि हस्तक्षेप हमें कबूल नहीं है और सरकार का यह कदम संविधान के खिलाफ है

    दारुल उलूम देवबंद ने तलाक बिल को शरीयत में हस्तक्षेप और संविधान के खिलाफ बताया है क्षेत्रीय पत्रकार से बात करते हुए दारुल उलूम देवबंद के कुलपति मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी ने केंद्र सरकार के जरिए तलाक से संबंधित पास किया गया बिल पर अफसोस का इजहार किया और इस बिल को धर्म में हस्तक्षेप करने का मामला बताया और इसकी निंदा की

    मुफ्ती अबुल कासिम नोमानी ने कहा कि हिंदुस्तान की संविधान हमें धर्म की आजादी देता है और तलाक धार्मिक मामला है इसमें किसी भी सरकार का हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं करेंगे हम सरकार के इस फैसले को हिंदुस्तानी की संविधान के खिलाफ मानते हैं

    वजह रह के गत दिन 27 दिसंबर को दूसरी बार बिल में संशोधन कर फिर से लोकसभा में पास किया गया बिल के समर्थन में 245 वोट पड़े थे कांग्रेस समेत अन्य पार्टियां ने संसद से वाकआउट किया था और भाजपा के भी सभी सदस्य ने भाग नहीं लिया था