Category: खास ख़बरें

  • JNU नारेबाजी कांड से मिली सुर्खियों ने कन्हैया को बेगूसराय से दिलवा दिया टिकट,जानिए दिलचस्प सफरनामा

    मिल्लत टाइम्स:जेएनयू के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष एक बार फिर चर्चा में हैं। उन्हें सीपीआई ने बिहार के बेगूसराय से टिकट दिया है। इसके साथ ही कन्हैया की राजनीति में सीधी एंट्री हो गई है। कन्हैया बेगूसराय से भाजपा के बड़े नेता गिरिराज सिंह को टक्कर दे सकते हैं जिन्हें यहां से टिकट दिए जाने की चर्चा है। आइए जानते हैं कौन है कन्हैया कुमार।

    कैसे मिली चर्चा?

    9 फरवरी 2016 को जेएनयू में अफजल गुरु की बरसी पर आयोजित हुए एक कार्यक्रम के दौरान कथित रूप से लगे देशद्रोही नारों के मामले ने कन्हैया कुमार को चर्चा में ला दिया था। इस मामले में पुलिस ने जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार, उमर खालिद समेत कई लोगों को आरोपी बनाया था। तीन साल पहले इस मामले की गूंज पूरे देश में हुई थी। इसी घटना से कन्हैया कुमार को पूरे देश में पहचान मिली और अब बेगूसराय से सीपीआई ने टिकट दिया है।

    कन्हैया कुमार का जन्म बिहार के बेगूसराय जिले के एक गांव में हुआ था। उनका गांव तेघरा विधानसभा क्षेत्र में आता है, जहां सीपीआई का प्रभाव है। उनका परिवार जिले के बरौनी प्रखंड के बीहट में रहता है। कन्हैया की पढ़ाई बरौनी के आरकेसी हाई स्कूल में हुई।

    कन्हैया ने 2002 में पटना के कॉलेज ऑफ कॉमर्स में दाखिला लिया था। यहीं से राजनीति की शुरुआत की। पटना में पढ़ाई करते हुए ही कन्हैया अखिल भारतीय छात्र फेडरेशन के सदस्य बने।

    पटना में परास्नातक कोर्स खत्म करने के बाद दिल्ली के जेएनयू में अफ्रीकन स्टडीज के लिए पीएचडी में दाखिला लिया। यहां वह 2015 में छात्रसंघ का अध्यक्ष चुने गए। कन्हैया एक बेहतरीन वक्ता हैं। जेएनयू छात्रसंघ चुनाव से एक दिन पहले दी गई उनकी स्पीच को ही उसकी जीत का कारण माना जाता है।

    कन्हैया कुमार को जेएनूय में संसद हमले के दोषी अफजल गुरु की बरसी पर हुए एक कार्यक्रम के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था। आरोप है कि इस कार्यक्रम में भारत विरोधी और पाकिस्तान समर्थक नारे लगे। इसे लेकर दिल्ली पुलिस ने अपनी चार्जशीट भी तैयार की है जिसे केजरीवाल सरकार की मंजूरी का इंतजार है।

  • मिलिए देश के सबसे बुजुर्ग मतदाता से जिन्‍होंने देश के पहले लोकसभा चुनाव से लेकर अब तक हर बार डाला है वोट

    मिल्लत टाइम्स,शिमला: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ‘मन की बात’ कार्यक्रम को सुनने का एक भी मौका नहीं गंवाने वाले 102 वर्षीय श्याम सरन नेगी एक बार फिर से वोट डालने के लिए तैयार हैं. लोकतंत्र में दृढ़ विश्वास रखने वाले श्याम चाहते हैं कि अन्य भारतीय भी मतदान का मौका न गंवाएं. हिमाचल प्रदेश राज्य निर्वाचन आयोग ने अपने एसवीईईवी (व्यवस्थित मतदाता शिक्षा और चुनावी भागीदारी) अभियान के लिए नेगी को ब्रांड एंबेसडर नियुक्त किया है. मुख्य चुनाव अधिकारी गोपाल चंद ने बताया कि 19 मई को होने वाले लोकसभा चुनाव में मतदान करने हेतु उनकी ओर से लोगों के लिए एक अपील जल्द ही जारी की जाएगी. नेगी, राज्य की राजधानी से कुछ 275 किलोमीटर दूर किन्नौर जिले के कल्पा गांव में अपने सबसे छोटे बेटे चंद्र प्रकाश के साथ रहते हैं. 80 की उम्र में वर्ष 2014 में अपनी पत्नी को खो चुके नेगी ने कहा कि मतदान करना बहुत जरूरी है.
    नेगी ने अपने बेटे प्रकाश के माध्यम से बताया, “मैं सभी मतदाताओं विशेषकर युवा पीढ़ी से अपील करता हूं कि वे समय दें और एक ईमानदार व्यक्ति का चुनाव करें, जो हमारे देश को नई ऊंचाइयों पर ले जा सके.” नेगी एक जुलाई को 103 साल के हो जाएंगे. उन्हें इस उम्र में थोड़ा कम सुनाई देता है. लेकिन उन्हें रेडियो सुनना पसंद है. चुनाव अधिकारियों की एक टीम पिछले सप्ताह उनका हाल-चाल जानने के लिए उनसे मिली थी.

    1975 में एक सरकारी स्कूल से कनिष्ठ शिक्षक के रूप में सेवानिवृत्त हुए नेगी स्वतंत्र भारत की पहली लोकसभा में वोट देने वाले नागरिकों में शामिल हैं. उन्होंने 1951 में चिनि निर्वाचन क्षेत्र में मतदान किया था, जिसका बाद में किन्नौर नाम रख दिया गया. नेगी ने 1951 के बाद से प्रत्येक आम चुनाव, विधानसभा चुनाव और पंचायत चुनाव में मतदान किया है.

    उन्होंने 2019 लोकसभा चुनाव में भी वोट करने का संकल्प लिया है. नेगी ने कहा, “हां, मैं वोट करने वालों में सबसे आगे रहूंगा.” चुनाव विभाग के पास 2007, 2012 व 2017 विधानसभा और 2009 व 2014 संसदीय चुनावों का एक वीडियो है, जिसमें नेगी अपना वोट डालते हुए दिखाई दे रहे हैं.(इनपुट एनडीटीवी के शुक्रिया के साथ)

  • पुण्य प्रसून के’सूर्या’से रुखसत होने की खबर से हैरान नहीं हूं:अजीत अंजुम

    वरिष्ठ टीवी पत्रकार पुण्य प्रसून बाजपेयी के दो महीने के ्अंदर ही सूर्या समाचार से रुखसत होने की खबर जहां आज मीडिया गलियारों में चर्चा का विषय बनी हुई है, ऐसे में वरिष्ठ टीवी पत्रकार ्अजीत अंजुम ने फेसबुक पर एक पोस्ट से जरिेए बताया है कि सूर्या समााचार का मालिकान किस तरह का है और उन्हें क्यों प्रसून की रुखसत वाली खबर पर हैरानी नहीं हुआ।

    पढ़ें अजीत अंजम का पोस्ट
    मुझे हैरत तो उस दिन हुई थी, जिस दिन प्रसून बाजपेयी ने सूर्या समाचार जॉइन किया था। आज बिल्कुल हैरान नहीं ,जब जाना कि प्रसून पूरी टीम के साथ वहां से रुखसत हो रहे हैं।
    जिस आदमी से 20 मिनट की मुलाकात बाद ही मैं चाय तक छोड़कर उठ गया था कि आपके साथ न मैं चाय पी सकता हूँ न ही एक दिन भी काम कर सकता, उस आदमी की कंपनी में प्रसून चले कैसे गए? हैरानी इस बात पर हुई थी।
    मेरी मुलाकात डेढ़ साल पहले हुई थी। नहीं चाहते हुए भी किसी के बहुत अनुरोध पर मिलने गया था। पहले मिनट में ही मैंने तय कर लिया कि यहां तो काम किसी सूरत में नहीं करना है। 15 मिनट बाद ‘लाला जी’ जी की चाय आई। चाय सामने रखते हुए उन्होंने कहा- ‘देखो जी, हम तो हर रोज की चाय का भी हिसाब रखते हैं। मुझे पता होता है कि आज कितनी चाय बनी ‘।
    तभी मैं ये कहते हुए उठ खड़ा हुआ कि आप किसी वक्त के मारे को खोजिए, जो आपके साथ काम कर सके। आप चाय का हिसाब रखिए और बिस्किट के साइज पर रिसर्च करते रहिए। मेरे जैसा आदमी एक घंटा आपके साथ काम नहीं कर सकता।
    लाला जी को हक्का बक्का छोड़ मैं तेजी से बाहर निकल गया।
    बाद में सुना कि कई संपादक आए और गए।. हैरान उस दिन हुआ जब प्रसून गए।
    ये बात अगस्त 2017 की है। मैंने एक सुबह ताव में आकर इंडिया टीवी से इस्तीफ़ा दे दिया था और कुछ दिन ब्रेक पर रहने का मन बना चुका था। तीसरे ही दिन एक आदमी का फ़ोन आया कि आपसे आज ही मिलना है। देर रात को वो मेरे घर आए। प्रिया गोल्ड बिस्किट के मालिक का महिमा मंडन करने के बाद मेरे सामने उनका गर्भस्थ चैनल को लाँच करने का ऑफ़र रखा। मैंने साफ़ मना कर दिया तो कहने लगे कि एक बार कल ही आप चैयरमैन साहब से मिल लीजिए। फिर जो फ़ैसला करना हो करिए। मैंने उनके ऑफ़िस जाने से इनकार किया। तब मेरी बताई जगह पर मीटिंग तय हुई।
    लाला जी मिलते ही कहने लगे मेरे ऑफ़िस ही चलिए। आराम से बात करेंगे। शिष्टाचार में मैं उनके साथ चला गया, लेकिन बातों से ही पता चल गया कि उनकी मंशा क्या है। मैं चाहता तो लाखों की मोटी और मुंहमांगी रक़म लेकर दो-चार -छह महीने गुज़ार देता, जैसे कुछ बड़े पत्रकार-संपादक करते हैं, लेकिन मेरा ताव मुझे ऐसा करने नहीं देता है।
    बाद में लाला जी से इस एनकाउंटर के बारे में मैंने कई दोस्तों को बताया। कुछ ने ये भी कहा कि आपको इतना ब्लंट नहीं होना चाहिए था। मैंने हमेशा यही कहा कि वो आदमी ऐसा ही ब्लंट जवाब डिजर्व करता था।

  • बिहार:100 रुपए के 10 नोट को 3 बार में भी नहीं गिन सका दूल्हा,दुल्हन ने बारात लौटा दी

    मिल्लत टाइम्स,बिहार:मधुबनी जिले के पंडौल गांव में एक दुल्हन ने दूल्हे के अशिक्षित होने पर शादी करने से इनकार कर दिया। उसने यह फैसला वरमाला होने के बाद लिया। लड़की के इस फैसले का गांव वालों ने स्वागत किया। वहीं, शादी में मौजूद एक व्यक्ति ने उसकी हिम्मत की तारीफ कर अपने पढ़े-लिखे बेटे से शादी का प्रस्ताव रखा, जिसे लड़की ने मान लिया।

    यह पूरा मामला 13 मार्च का है। पंडौल प्रखंड के ब्रह्मोत्तरा गांव के लड़के की शादी रहिका प्रखंड के मोमीनपुर गांव की लड़की के साथ तय हुई थी। शादी के दिन तय कार्यक्रम के मुताबिक बारात पहुंची। इसके बाद वरमाला हुई। फिर मंडप में रस्म के दौरान दुल्हन की सहेलियां दूल्हे से बात कर रही थीं। तभी उन्हें दूल्हे के शिक्षित होने पर शक हुआ। सहेलियों ने उनसे कई सवाल पूछे। दूल्हा एक भी सवाल का जवाब सही नहीं दे पाया।

    सौ-सौ के नोट गिनने को दिए
    दुल्हन की सहेलियों ने दूल्हे को सौ-सौ के दस नोट गिनने को दिए, जिसे वह सही तरीके से गिन नहीं पाया। इस दौरान उसने तीन कोशिशें कीं।सभी में गिनती गलत की।इसके बाद उससे उसकानाम और गांव का नाम पूछा गया। फिर जिले का नाम पूछा गया तो उसने जवाब में पंडौल कहा। इन सारे सवालों के जवाब के बाद यह पता चला कि वह पढ़ा लिखा नहीं है। इसके बाद लड़की ने हिम्मत दिखाई और उसने शादी से इनकार कर दिया।

    फिर पढ़े-लिखे लड़के से शादी की
    दुल्हन के इस फैसले से सभी प्रभावित थे। बारात में मौजूद एक व्यक्ति ने भी तारीफ की और अपने बेटे से शादी करने का प्रस्ताव रखा। उसने कहा कि मेरा बेटा पढ़ा-लिखा है क्या आप उससे शादी करेंगी? लड़की वालों ने इस प्रस्ताव पर हामी भर दी।(इनपुट भास्कर)

  • नज़रिया – मुस्लिम प्रतिनिधित्व को कुचलने के लिए बेक़रार कन्हैया कुमार

    मौसम के रूख के साथ राजनीति का रूख भी बदलना शुरू हुआ है। जैसे-जैसे सर्दी से बसंत की तरफ बढ़ रहे है तापमान भी बढ़ता जा रहा है। सर्दी तो छंट चुकी है और गर्मी के मौसम मे क़दम रख चुके है। मौसम के साथ-साथ चुनाव की तारीखों की घोषणा के बाद राजनीति का तापमान भी बढ़ना शुरू हुआ है। टिकट एवं सीट बँटवारे को लेकर बैठक पर बैठक हो रहे है। गठबंधन को लेकर भी उधेड़-बुन शुरू है। सभी जाति-विशेष के नेता एवं मतदाता अपनी प्रतिनिधित्व को लेकर बेचैन है। छोटी-छोटी पार्टियां दांवा ठोककर मजबूती के साथ अपना प्रतिनिधित्व माँग रही है। लेकिन बिहार मे लगभग 20 प्रतिशत की आबादी वाले मुसलमानों के प्रतिनिधित्व को समाप्त करने की लगातार कोशिश हो रही है।

    सबसे मज़ेदार बात बेगूसराय को लेकर है। बेगूसराय लेनिनग्राद के नाम से मशहूर है। बेगूसराय क्षेत्र कम्यूनिस्ट पार्टी का गढ़ समझा जाता है। लेकिन यह एक भ्रम से अधिक कुछ भी नहीं है। अभी भी उसी भ्रम को आधार मानकर कम्यूनिस्ट पार्टी बेगूसराय पर अपनी दावेदारी पेश करती है। आज भी महागठबंधन मे कम्यूनिस्ट पार्टी हिस्सेदार बनना चाहती है और बेगूसराय की सीट पर दावा ठोक रही है। जबकि बेगूसराय सीट मुसलमान समुदाय के हिस्से की सीट समझी जाती रही है। पूर्व मे भी जदयु से डॉ मोनजीर हसन सांसद निर्वाचित हुए है। जबकि 2014 के लोकसभा चुनाव मे राजद की टिकट पर पूर्व विधानपरिषद डॉ तनवीर हसन मोदी लहर मे भी मजबूत लड़ाई लड़े थे। अभी महागठबंधन होने की स्थिति मे कम्यूनिस्ट पार्टी की टिकट पर जेएनयू के पूर्व छात्रनेता कन्हैया कुमार की नज़र बेगुसराय सीट पर है।

    अभी तक यह भ्रम फैलाया जाता रहा है की बेगूसराय कम्यूनिस्ट पार्टी का गढ़ रहा है और इसलिए ही बेगूसराय को लेनिनग्राद के नाम से जानते है। मैं जब कम्यूनिस्ट पार्टी की बात कर रहा हूँ तब सामूहिक रूप से सभी कम्यूनिस्ट पार्टी की बात कर रहा हूँ। लेकिन स्वतन्त्रता से लेकर आजतक केवल 1967 के लोकसभा चुनाव मे ही बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र से कम्यूनिस्ट पार्टी के योगेन्द्र शर्मा चुनाव जीतने मे सफल रहे थे। जबकि 1962 के लोकसभा चुनाव मे मुस्लिम समुदाय से आने वाले अख़्तर हाशमी, 1971 के लोकसभा चुनाव मे योगेन्द्र शर्मा और 2009 के लोकसभा चुनाव मे शत्रुघ्न प्रसाद सिंह कम्यूनिस्ट पार्टी की टिकट से दूसरे स्थान पर रहे थे। 1977 के चुनाव मे कम्यूनिस्ट पार्टी के इन्द्र्दीप सिंह 72096 मत, 1998 मे रमेन्द्र कुमार 144540, 1999 के चुनाव मे सीपीआई(एमएएल) के शिवसागर सिंह 9317 और 2014 के लोकसभा चुनाव मे कम्यूनिस्ट पार्टी के राजेन्द्र प्रसाद सिंह जदयु गठबंधन से 192639 मत प्राप्त करके तीसरे स्थान पर रहे थे। जब्कि 1980, 1984, 1989, 1991, 1996, 2004 के लोकसभा चुनावों मे कम्यूनिस्ट पार्टी बेगूसराय से अपना उम्मीदवार तक नहीं उतार सकी थी। फिर सवाल है की बेगूसराय कम्यूनिस्ट पार्टी का गढ़ कैसे हो गया?

    बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत चेरिया बरियारपुर, साहिबपुर कमाल, बेगूसराय, मठियानी, तेघरा, बखरी और बछवाड़ा विधानसभा का क्षेत्र आता है। चेरिया बरियारपुर से केवल एकबार 1980 के विधानसभा चुनाव मे कम्यूनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया के सुखदेव महतो विधायक चुने गये थे। साहिबपुर कमाल विधानसभा क्षेत्र से अभी तक एक बार भी कम्यूनिस्ट पार्टी चुनाव जीतने मे सफल नहीं रही है। बेगूसराय विधानसभा क्षेत्र से आज़ादी के बाद से अबतक केवल तीन बार ही कम्यूनिस्ट पार्टी चुनाव जीतने मे सफल रही है और आखिरी बार कम्यूनिस्ट पार्टी के राजेन्द्र सिंह 1995 का विधानसभा चुनाव जीते थे। मठियानी विधानसभा क्षेत्र से कम्यूनिस्ट पार्टी तीन बार चुनाव जीतने मे सफल रही है लेकिन सन 2000 मे हुए विधानसभा चुनाव के बाद आजतक कम्यूनिस्ट पार्टी यहाँ से चुनाव नहीं जीत सकी है। तेघरा विधानसभा क्षेत्र मे कम्यूनिस्ट पार्टी लगातार 2010 से ही विधानसभा का चुनाव हार रही है।

    कम्यूनिस्ट पार्टी का पूर्ण रूप से दबदबा केवल दो विधानसभा क्षेत्रों क्रमशः बखरी और बछवाड़ा पर रहा है। लेकिन बखरी सुरक्षित विधानसभा क्षेत्र से कम्यूनिस्ट पार्टी आखिरी बार 2005 मे चुनाव जीतने मे सफल रही थी। जब्कि बछवाड़ा विधानसभा क्षेत्र से कम्यूनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार चार बार विधायक चुने गये है और आखिरी बार 2010 का विधानसभा चुनाव जीतने मे सफल रहे थे। सबसे हास्यास्पद बात तो यह है की वर्तमान विधानसभा मे बिहार मे कम्यूनिस्ट पार्टी के मात्र तीन विधायक है और तीनों मे से एक भी बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र से जीतकर नहीं आते है। यानि 2015 के बिहार विधानसभा चुनाव मे बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाले सात विधानसभा क्षेत्रों मे से एक भी क्षेत्र से कम्यूनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार चुनाव जीतने मे सफल नहीं रहे थे। प्रश्न फिर वही है की जिस लोकसभा क्षेत्र मे एक भी विधायक नहीं है वह कम्यूनिस्ट पार्टी का गढ़ कैसे हो गया?
    2014 के लोकसभा चुनाव मे बेगूसराय से राष्ट्रीय जनता दल के उम्मीदवार डॉ तनवीर हसन को कुल 369892 मत प्राप्त हुए थे। जब्कि जदयु समर्थित कम्यूनिस्ट पार्टी के उम्मीदवार राजेंद्र प्रसाद सिंह को 192639 मत प्राप्त हुआ था। वही 2009 के लोकसभा चुनाव मे कम्यूनिस्ट पार्टी के शत्रुघ्न प्रसाद सिंह को 164843 मत प्राप्त हुआ था। यदि कम्यूनिस्ट पार्टी द्वारा 2009 और 2014 मे प्राप्त किए गये कूल मतों को एकसाथ जोड़ भी देते है फिर भी डॉ तनवीर हसन साहब द्वारा 2014 के मोदी लहर मे प्राप्त किए गये मतों से भी कम है।

    उपरोक्त आँकड़े यह बताने के लिए काफी है की बेगूसराय कभी भी कम्यूनिस्ट पार्टी का मजबूत क़िला नहीं रहा है। बल्कि पूर्वी चम्पारण(मोतीहारी), नालंदा, नवादा, मधुबनी, जहानाबाद इत्यादि ऐसे लोकसभा क्षेत्र है जहाँ से दो या दो बार से अधिक कम्यूनिस्ट पार्टी के सांसद निर्वाचित हुए है। जब्कि बेगूसराय लोकसभा क्षेत्र से मात्र एकबार ही कम्यूनिस्ट पार्टी को सफलता प्राप्त हो सकी है। लेकिन प्रश्न यह है की आख़िर कम्यूनिस्ट पार्टी क्यों बेगूसराय की सीट ही लेना चाहती है? जब कम्यूनिस्ट पार्टी सामाजिक न्याय और समानुपातिक प्रतिनिधित्व को लेकर इतना चिंतित रहती है तब फिर क्यों बेगूसराय मे मुसलमानों के प्रतिनिधित्व को कुचलने का अथक प्रयास कर रही है?

    एक तर्क है की कन्हैया कुमार राष्ट्रीय स्तर के नेता है इसलिए बेगूसराय की सीट कम्यूनिस्ट के खाते से कन्हैया को मिलनी चाहिये। यह बात सही है की कन्हैया कुमार राष्ट्रीय स्तर के नेता है और कम्यूनिस्ट विचारधारा के ऊर्जावान पथिक है। वह जब राष्ट्रीय स्तर के नेता है तब भारत के किसी भी क्षेत्र से चुनाव लड़ सकते थे। मोतीहारी, नवादा, नालंदा, मधुबनी, जहानाबाद तो कम्यूनिस्ट का गढ़ रहा है और पहले से भी पार्टी के सांसद निर्वाचित होते रहे है फिर बेगूसराय पर ही नज़र क्यों है? अरविंद केजरीवाल दिल्ली से चलकर प्रधानमंत्री मोदी के विरुद्ध बनारस चुनाव लड़ने आये थे। दलित नेता चंद्रशेखर आज़ाद पश्चिमी उत्तरप्रदेश से चलकर मोदी के विरुद्ध बनारस लड़ने का एलान कर चुके है। हार्दिक पटेल ने भी कुछ ऐसा ही मंशा जाहीर किया है। फिर राष्ट्रीय स्तर के नेता कन्हैया कुमार मुसलमान समुदाय के हिस्से मे जाने वाली सीट से ही चुनावी मैदान मे उतरने के लिए क्यों उतावले है? क्या सिर्फ इसलिए की मुसलमानों का समर्थन प्राप्त करके खुद की जीत सुनिश्चित कर सके? यानि की मुसलमानों के गर्दन पर चाकू चलाकर कन्हैया को सुरक्षित किया जा रहा है।

    लेखक़- तारिक अनवर चंपारणी, टाटा सामाजिक विज्ञान संस्था (TISS), मुम्बई से मास्टर डिग्री है और वर्तमान मे बिहार के किसानों के साथ काम कर रहे है

  • चीन को लेकर अभी-अभी देखा गया एक सपना, सपने में सुना मोदी का भाषण

    रवीश कुमार

    भाइयों बहनों, हम चीन को पिचकारी मार-मार कर रंग देंगे। चीन ने आतंकी का साथ दिया है। उसकी सज़ा भुगतनी होगी। हमने पाकिस्तान को घुस कर मारा। अब चीन को पिचकारी से मार देंगे। होली के पहले जितनी भी पिचकारियां आई हैं, मैं हर देशभक्त से अपील करूंगा कि वह सिर्फ तीन चीज़ें लेकर सीमा पर पहुंचे। एक बाल्टी पानी, रंग और चीन की पिचकारी। इसके बार हम सब पिचकारी से ही चीन की सेना को ज़ुकाम करा देंगे। छींकते छींकते चीन की बोलती बंद हो जाएगी।

    भाइयो बहनों, मैंने सारे एंकरों को ट्वीट किया है कि वे भी स्टुडियो में पिचकारी लेकर एंकरिंग करें। अब हर भारतीय के लिए कांग्रेसी चीन के समर्थक बन गए हैं। कांग्रेस के नेताओं ने पाकिस्तान का समर्थन किया है। चीन ने पाकिस्तान का समर्थन किया है। एंकरों से अपील है कि वे कांग्रेस के प्रवक्ता आलोक और राजीव त्यागी को रंग रंग कर रंग दें। हम बदला लेंगे। हर हर मोदी, घर घर होली।

    प्रधानमंत्री का यह भाषण सुनकर मैं तैयार हो कर व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी के लिए निकल पड़ा। इनबाक्स के बस्ते में पड़ी किताबों को पलटने लगा। वामपंथी प्रोफेसर ने उस चैप्टर को गायब कर दिया था जिसमें चीन की पिचकारी के विरोध का इतिहास लिखा था। सुबह से एक भी मेसेज नहीं आया कि आज चीन की पिचकारी का बहिष्कार होगा। जो भारतीय चीन की पिचकारी बेचेगा वो मसूद अज़हर का दामाद होगा। अपना व्हाट्स एप स्टेटस तैयार करने के बाद मैंने उसे अबकी बार पिचकारी सरकार वाले ग्रुप में भेज दिया। वहां से वायरल हो गया।

    चीन हमेशा आतंक का साथी रहा है। हमें चीन का साथ नहीं देना है। जो लोग चीन से सामान लाकर भारत का पैसा बीजिंग भेजते हैं, हम उन्हें दार्लीजिंग भेज देंगे। वहां उन्हें भारतीय मोमो बनाने की विधि की ट्रेनिंग दी जाएगी। हमने चीन को झूला झुलाया मगर चीन ने हमें झुला दिया है। हमारा काम हो गया है। सरदार पटेल की मूर्ति हमने बनवा ली है। चीन के इंजीनियर जा चुके हैं। भारतीय कारीगर बिना पगार के भी सरदार पटेल की रक्षा कर सकते हैं।

    मगर हम चीन की यह धमकी बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं। तभी टीवी पर प्रधानमंत्री का एक और भाषण आ गया। वे जनता से पूछ रहे थे। चीन को घर में घुस कर मारना चाहिए कि नहीं। एक एंकर ने एलान कर दिया है। चीन से युद्ध के सर्वे होने लगे हैं। सीमा पर प्रधानमंत्री के समर्थक पिचकारी भर कर जाते हुए दिख रहे हैं।

    आख़िर कब तक हम चीन को लेकर चुप होते रहेंगे। नेहरू चुप हो गए लेकिन नरेंद्र चुप नहीं रहेंगे। जो नेहरू नहीं कर पाए, वही तो नरेंद्र करते हैं। वे झूला झुलाते हैं तो चीन को झुलसा भी देंगे। मार पिचकारी, मार पिचकारी रंग देंगे। चीन का चेहरा बदल देंगे। मसूद अज़हर का जो साथी है, वो चीन हमारा दुश्मन है।

    तभी व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी में एक मेसेज आता है। चीन को लेकर विरोध पिचकारी और फुलझड़ी तक ही सीमित रखना है। न्यूज़ एंकरों को चीन के साथ शांति की बात करनी है। यह नहीं कहना है कि चीन ने मसूद अज़हर का साथ देकर पुलवामा के शहीदों का अपमान किया है। चीन को लेकर चुप्पी जैसे ब्रेकिंग न्यूज़ नहीं चलाने हैं। चीन डर गया भारत से या भारत डर गया चीन से इस तरह के नारे चैनलों पर नहीं लिखे होंगे। एक बंदा था जो न्यूज़ रूम में जा- जाकर सबको डांट रहा था। एडिटर मुर्गा बने बैठे थे। एडिटरों के मालिक अमित शाह से ब्रीफकेस में निर्देश ले रहे थे। विज्ञापन का नया नाम निर्देश है।

    फिर अचानक कोई ज़ोर से चिल्लाता है। प्रधानमंत्री मोदी का लाइव चैनलों पर आने लगता है। वो कहते हैं भाइयों और बहनों, शहीदों का अपमान कांग्रेस ने किया है। उसे हराना है। चीन अपने आप हार जाएगा। हमारी विदेश नीति इटावा से लेकर बेगुसराय तक हिट है। हम जीत रहे हैं। हमने पाकिस्तान को घुस कर मारा है। आप उसी में यह समझ लो कि हमने उसके दोस्त चीन को भी मारा है। हम वन प्लस वन नहीं करते, हम वन टू का फोर करते हैं। वन टू का फोर।

    मैं सपने से बाहर आ रहा था। नींद हल्की होने लगी। खिड़की पर बैठा बारिश की बूंदे गिन रहा था। मतदान केंद्रों पर वोट पड़ रहे थे। लोग अपने झूठ से हार रहे थे। गांव गांव में लोग कह रहे थे कि विदेश नीति में मोदी जीत गए हैं। चीन की पिचकारी से चीन को हरा दिया है।

    एंकर ने एलान किया। 70 सालों में ऐसा कभी नहीं हुआ। आज पहली बार झूठ जीत गया है। मैं जाग गया था। व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी के इनबाक्स में मेसेज चेक करने लगा था। अभी तक चीन की पिचकारी के बहिष्कार की कोई अपील नहीं आई है। क्या आपके पास ऐसे मेसेज आने लगे हैं?

    यह लेख फेसबुक पेज @RavishKaPage से लिया गया है।

  • किशनगंज लोकसभा सीट पर कांग्रेस का सस्पेंशन बरकरार, इन चार नामों में से किसी एक पर लग सकती है मुहर

    मिल्लत टाइम्स,नई दिल्ली:किशनगंज का शुमार हिंदुस्तान के खाश लोकसभा क्षेत्र में होता है कारण यह एक मुस्लिम बहुल क्षेत्र है 68% यहां मुस्लिम वोटर्स हैं 31% हिंदू है बाकी अन्य धर्म के वोटर्स है शुरू से इस सीट पर मुसलमानों को जीत मिलती रही है एमजे अकबर, सैयद शहाबुद्दीन, सैयद मोहम्मद शाहनवाज ,अलहाज मौलाना मोहम्मद तस्लीम उद्दीन, और मौलाना असरारुल हक कासमी, यहां के एमपी रह चुके हैं कांग्रेस की यह खास सीट भी मानी जाती है मौलाना असरारुल हक कासमी के बाद इस सीट के उम्मीदवार का अब तक कोई फैसला नहीं हो सका है स्वर्गिय मौलाना असरारुल हक कासमी की मौत के बाद यह सीट खाली है और दसियों लोग कांग्रेस से टिकट लेने की कोशिश में मशरूफ है कांग्रेस की राज्य कमान से लेकर आलाकमान तक 10 लोग कांग्रेस का टिकट लेने की कोशिश में रोज एक चक्कर लगाते हैं लेकिन अब तक किसी के भी बारे में कोई इशारा नहीं मिल सका है कि किस को यहां से टिकट मिलेगा इलाके के गणमान्य लीडरों और कांग्रेसी कार्यकर्ता के अलावा कई बड़े चेहरे भी कांग्रेस से टिकट लेने के लिए कोशिश कर रहे हैं

    किशनगंज से टिकट लेने की कोशिश इसलिए भी ज्यादा होती है कि एक तरह से यह मुसलमानों की रिजर्व सीट मानी जाती है माना जा रहा है कि यह सीट कांग्रेस के लिए बहुत अहम है हालिया चुनाव में वहां के लीडर अख्तरुल इमान भी मजलिस इत्तेहादुल मुस्लिमीन के टिकट पर लोकसभा का इलेक्शन लड़ रहे हैं इसकी वजह से मुकाबला बहुत सख्त माना जा रहा है इसलिए इस सीट से किशनगंज के उम्मीदवार का फैसला हाईकमान से ही होगा कांग्रेसी हाईकमान में जिन नामों पर गुफ्तगू हो रही है इनमें डॉक्टर शकील अहमद ,अब्दुल्लाह खान आजमी, परवीन अमानुल्लाह और मुफ्ती एजाज अरशद कासमी के नाम शामिल है

    सूत्र के मुताबिक इन्हीं चारों में से किसी एक को टिकट मिल सकता है ज्यादा चर्चित खबर यही आ रही है कि मुफ्ती एजाज अरशद कासमी को कांग्रेस यहां से अपना उम्मीदवार बनाए क्योंकि मुफ्ती एजाज अरशद कासमी नामवर इस्लामिक स्कॉलर दारुल देवबंद के फाजिल और ऑल इंडिया मुस्लिम पर्सनल ला बोर्ड के सदस्य हैं, पूर्व प्रधानमंत्री डॉ मनमोहन सिंह के ऑफिस में भी कुछ दिनों तक मशीर का काम कर चुके हैं समाज और समाजिक मामलों पर उनकी गहरी नजर रहती है और उनका संबंध बिहार से भी है ऐसे में वह किशनगंज से लोकसभा टिकट के मजबूत दावेदार माने जा रहे हैं क्योंकि कांग्रेस की भी पहली कोशिश यही है कि वह कोई आलिम ए दीन चुनाव लड़े

    डॉक्टर शकील अहमद भी मजबूत उम्मीदवार हैं और कहा जा रहा है कि दरभंगा और मधुबनी लोकसभा क्षेत्र आरजेडी के पास जाने की वजह से डॉक्टर शकील अहमद को किशनगंज लोकसभा सीट पर इलेक्शन लड़ने के लिए भेजा जा सकता है लेकिन इसके आसार कम ही दिख रहे हैं

    परवीन अमानुल्लाह मजबूत उमीदवार हैं और हाईकमान में उनके नाम को लेकर बहस भी हो रही है लेकिन क्षेत्र में कोई खिदमत ना होने के कारण लोग उनके खिलाफ है और ऐसे उम्मीदवार को कांग्रेस टिकट देने से परहेज करेगी

    मौलाना ओबैदुल्लाह खान आज़मी के बारे में भी अब कहा जा रहा है कि वह कांग्रेस से टिकट हासिल करने की कोशिश कर रहे हैं अगर इन्हे टिकट मिल जाएगा तो वह वहां से मैदान में उतरेंगे लेकिन मौलाना ओबैदुल्लाह खान आज़मी के विदेशी राज्य से संबंध रखने की बुनियाद पर मुमकिन है कि जनता का साथ ना मिल सके

    वजह रह के पिछले 10 सालों तक मौलाना असरारुल हक कासमी के वहां एमपी रहने के बाद वहां की जनता एक आलिम ए दिन और इस्लामी स्कॉलर को ही अपना एमपी देखना चाहती है इसी वजह से कांग्रेस भी लगातार कशमकश की शिकार है और उम्मीदवार तय करने में फैसला नहीं कर पा रही है इस मामले पर मिल्लत टाइम्स से बात करते हुए किशनगंज में ठाकुरगंज के मुन्ना आलम ने बताया कि मुफ्ती एजाज अरशद कासमी का नाम आने के बाद हम लोगों को तसल्ली मिली है और कांग्रेस से मुतालबा करते हैं कि वह मुफ्ती एजाज अरशद कासमी को यहां से उम्मीदवार बनाए किशनगंज के ही रहने वाले अफजल इमाम ने बताया कि अगर किसी आलिम ए दिन और बिहार से संबंध रखने वाले को यहां से उम्मीदवार बनाया जाता है तो ज्यादा बेहतर होगा

  • पांच मुद्दों पर पांच साल सियासत:नोटबंदी,राफेल,तीन तलाक,जीएसटी और किसान पर रहा घमासान

    मिल्लत टाइम्स,नई दिल्ली:नोटबंदी, जीएसटी, राफेल सौदा, तीन तलाक और किसान यह वे पांच मुद्दे हैं जिनके इर्द-गिर्द देश की सियासत पिछले पांच सालों से घूमती रही, लेकिन पुलवामा हमले के बाद आम चुनावों से ठीक पहले एयर स्ट्राइक ने सियासी मुद्दों में नया रंग भर दिया है। हर चुनाव की तरह राम मंदिर सियासी दलों के एजेंडे में शामिल रहा।

    असहिष्णुता-भीड़ हिंसा-बेरोजगारी भी मुद्दा बना रहा। वहीं आखिरी साल में आरक्षण और एससी-एसटी एक्ट में संशोधन बिल जैसे मुद्दे भी अहम रहे। पिछले पांच सालों तक छाए रहे ये मुद्दे आगामी चुनावों में भी प्रचार युद्ध के मुख्य हथियार बनेंगे।
    नोटबंदी
    करीब ढाई साल पूर्व 16 नवंबर 2016 को आधी रात से 500 और 1000 के नोट बंद करने की पीएम नरेंद्र मोदी की घोषणा ने देश ही नहीं पूरी दुनिया में हलचल मचाया। तब पीएम ने इस फैसले से कालाधन, आतंकवाद सहित कई समस्याओं से निजात मिलने का दावा किया। तीन महीने तक लोग नकद हासिल करने केलिए पसीना बहाते रहे। विपक्ष ने इसे बड़ा सियासी मुद्दा भी बनाया। मगर इसके ठीक बाद हुए उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भाजपा ने तीन चौथाई बहुमत हासिल कर जनता के इस फैसले के साथ होने का दावा किया। हालांकि बाद में इस कारण अर्थव्यवस्था की रफ्तार पर पड़े असर के कारण बढ़ी बेरोजगारी से भाजपा को परेशानी भी उठानी पड़ी।

    तीन तलाक कानून
    इस सरकार के कार्यकाल में तीन तलाक को दंडनीय अपराध बनाने पर भी सियासी महाभारत हुआ। सरकार ने तीन बार इसे संसद में कानूनी जामा पहनाने की कोशिश की, मगर राज्यसभा में संख्याबल के अभाव में नाकाम रहने पर सरकार ने इस पर तीन बार अध्यादेश का सहारा लिया। विपक्ष ने इसे जहां सरकार की सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की कोशिशों से जोड़ा, वहीं सरकार ने इसे महिला के सम्मान और स्वाभिमान से जोड़ा।

    राफेल सौदे पर सियासी महाभारत
    साल 2016 में फ्रांस से राफेल विमान सौदे पर मुहर लगते ही शुरू हुआ सियासी विवाद सुप्रीम कोर्ट के फैसले और सीएजी की रिपोर्ट के बाद भी जारी है। विपक्ष इस मुद्दे पर कारोबारी अनिल अंबानी को ऑफसेट पार्टनर बनाने पर सीधे पीएम पर हमला बोल रहा है तो सरकार बार-बार कह रही है कि यह सौदा यूपीए सरकार के कार्यकाल से सस्ता है। सुप्रीम कोर्ट और सीएजी की ओर से सौदे को मिली क्लीन चिट के बाद भी इस पर विवाद जारी है।

    जीएसटी
    एक देश एक कर के लिए लाए गए वस्तु एवं सेवा कर (जीएसटी) पर भी मोदी सरकार के कार्यकाल में जम कर विवाद हुआ। विपक्ष ने इसके कई प्रावधानों पर सवाल उठाए और इसके कारण व्यापारी वर्ग को हो रही परेशानियों पर सरकार को घेरा। सरकार ने भी परेशानी दूर करने के लिए इसमें कई बार संशोधन किए। विपक्ष अब भी जीएसटी के कारण बेरोजगारी बढ़ने का आरोप लगा रहा है, जबकि सरकार इसके कारण पारदर्शिता आने के दावे कर रही है।

    किसान
    लोकसभा चुनाव के बाद विधानसभा चुनावों में लगातार हार के बाद किसानों के मुद्दे ने कांग्रेस को संजीवनी दी। कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी की ऋण माफी की घोषणा और कर्नाटक में ऐसा कर दिखाने के बाद यह मुद्दा केंद्र में आ गया। इसी बीच भाजपा के तीन राज्य मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़ और राजस्थान गंवाने और इन राज्यों में कांग्रेस सरकरों की कर्ज माफी को अमल में लाने के बाद मोदी सरकार चेती। बीते आम बजट में सरकार ने किसान सम्मान योजना लाने की घोषणा की और इसके तहत किसानों को एक साल में तीन किस्तों के जरिए छह हजार रुपये नकद देने की घोषणा की।

    असहिष्णुता-मॉब लिंचिंग-बरोजगारी भी बना मुद्दा
    गोरक्षा के नाम पर अल्पसंख्यक समुदाय के कुछ लोगों की पीट पीट कर हत्या और बढ़ती असहिष्णुता भी एक समय बड़ा मुद्दा बना। इसके विरोध में लेखक-कलाकरों और विभिन्न क्षेत्रों की नामचीन हस्तियों ने अवार्ड वापसी अभियान शुरू कर सरकार की परेशानी बढ़ाई। इसके अलावा देश में बेरोजगारी दर के 45 साल पुराना रिकार्ड तोड़ने के मामले में भी सियासी विवाद हुआ।
    राम मंदिर निर्माण
    कभी ज्यादा तो कभी कम राम मंदिर निर्माण की गरमाहट पांच सालों तक बनी ही रही। फिलहाल सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में मध्यस्थता की राह सुझाई है और मध्यस्थों के नाम भी तय कर दिए गए हैं। मंदिर निर्माण को लेकर पिछले तीन महीनों से सरगर्मी ज्यादा है।

    हिंदू संगठनों और संतों ने सरकार पर तारीख घोषित करने और अध्यादेश जैसे मुद्दे लाने के लिए सरकार पर लगातार दबाव बनाया। धर्म संसद जैसे कार्यक्रम हुए। संघ ने इस मुद्दे पर अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। विश्व हिंदू परिषद ने राम मंदिर निर्माण के लिए फिर से कारसेवा की धमकी दी जिससे सियासत गरम हुई।
    और अंत में एयर स्ट्राइक
    14 फरवरी को पुलवामा में हुए आतंकी हमले के बाद 26 फरवरी को पाकिस्तान में घुसकर वायुसेना ने एयर स्ट्राइक कर आतंकी ठिकानें ध्वस्त किए थे। इसके बाद सियासी परिदृश्य भी बदल गया। देश में जहां सरकार की वाहवाही के रूप में माहौल बनने लगा वहीं विपक्षी इसकी काट खोजने में जुट गया।(इनपुट अमर उजाला)

  • बाबरी मामला:सुप्रीम कोर्ट ने मध्यस्थों के पास भेजा,प्रक्रिया 4 हफ्ते में शुरू और 8 हफ्ते में खत्म होगी

    मिल्लत टाइम्स,नई दिल्ली: अयोध्या विवाद का मामला सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को मध्यस्थों को सौंप दिया। मध्यस्थता की बातचीत फैजाबाद में होगी।जस्‍टिस फकीर मुहम्मदखलीफुल्‍ला मध्‍यस्‍थता पैनल की अध्‍यक्षता करेंगे। इस पैनल में श्री श्री रविशंकर और वकील श्रीराम पंचू भी होंगे।सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि पैनल 4 हफ्ते में मध्यस्थता के जरिए विवाद निपटाने की प्रक्रिया शुरू करे। 8 हफ्ते में यह प्रक्रिया खत्म हो जानी चाहिए।

    ‘पूरी प्रक्रिया गोपनीय होगी’

    चीफ जस्टिस रंजन गोगोई ने कहा कि मध्यस्थता प्रक्रिया कोर्ट की निगरानी में होगी और इसे गोपनीय रखा जाएगा। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जरूरत पड़े तो मध्यस्थ और लोगों को पैनल में शामिल कर सकते हैं। वे कानूनी सहायता भी ले सकते हैं। मध्यस्थों को उत्तरप्रदेश सरकार फैजाबाद में सारी सुविधाएं मुहैया कराएगी।
    मध्यस्थता के माहिर रहे हैं पंचू

    जस्टिस खलीफुल्ला : मूल रूप से तमिलनाडु के शिवगंगा जिले में कराईकुडी के रहने वाले हैं। उनका जन्म 23 जुलाई 1951 को हुआ था। 1975 में उन्होंने वकालत शुरू की थी। वे मद्रास हाईकोर्ट में न्यायाधीश और इसके बाद जम्मू-कश्मीर हाईकोर्ट में मुख्य न्यायाधीश रहे। उन्हें 2000 में सुप्रीम कोर्ट में न्यायाधीश के तौर नियुक्त किया गया। 2011 में उन्हें कार्यवाहक मुख्य न्यायाधीश बनाया गया।

    श्रीराम पंचू : वरिष्ठ वकील श्रीराम पंचू मध्यस्थता से केस सुलझाने में माहिर माने जाते हैं। कोर्ट से बाहर केस सुलझाने के लिए उन्होंने ‘द मीडिएशन चैंबर’ नाम की संस्था भी बनाई है। वे एसोसिएशन ऑफ इंडियन मीडिएटर्स के अध्यक्ष हैं। वे बोर्ड ऑफ इंटरनेशनल मीडिएशन इंस्टीट्यूट के बोर्ड में भी शामिल रहे हैं। असम और नागालैंड के बीच 500 किलोमीटर भूभाग का मामला सुलझाने के लिए उन्हें मध्यस्थ नियुक्त किया गया था।

    श्रीश्री रविशंकर : आध्यात्मिक गुरु हैं। वे अयोध्या मामले में मध्यस्थता की निजी तौर पर कोशिश करते रहे हैं। इस संबंध में उन्होंने पक्षकारों से मुलाकात की थी। उन्होंने मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मिलकर इस मसले को सुलझाने का एक फॉर्मूला भी पेश किया था।

    ‘लक्ष्य की ओर चलना है’

    श्रीश्री रविशंकर ने ट्वीट किया, “सबका सम्मान करना, सपनों को साकार करना, सदियों के संघर्ष का सुखांत करना और समाज में समरसता बनाए रखना – इस लक्ष्य की ओर सबको चलना है।”

    14 अपीलों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
    सुप्रीम कोर्ट में इलाहाबाद हाईकोर्ट के सितंबर 2010 के फैसले के खिलाफ दायर 14 अपीलों पर हो रही है। अदालत ने सुनवाई में केंद्र की उस याचिका को भी शामिल किया है, जिसमें सरकार ने गैर विवादित जमीन को उनके मालिकों को लौटाने की मांग की है।

    चार प्रधानमंत्रियों के कार्यकाल में विवाद का हल निकालने की कोशिशें हुईं
    1986: प्रधानमंत्री राजीव गांधी के वक्त तब के कांची कामकोटि पीठ के शंकराचार्य और मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड के प्रेसिडेंट अली मियां नादवी के बीच बातचीत शुरू हुई थी, लेकिन नाकाम रही।
    1990: तत्कालीन प्रधानमंत्री चंद्रशेखर राव ने दोनों समुदायों के बीच गतिरोध तोड़ने की कोशिश की। उन्होंने उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री मुलायम सिंह यादव, महाराष्ट्र के तत्कालीन मुख्यमंत्री शरद पवार और राजस्थान के मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत की मध्यस्थता में बात कराई, लेकिन कोई बात नहीं बनी।
    1992: तत्कालीन प्रधानमंत्रीनरसिम्हा राव ने भी इस विवाद को बातचीत से सुलझाने की कोशिश की। बाबरी मस्जिद का ढांचा गिराने के बाद उन्होंने जस्टिस लिब्रहान की अध्यक्षता में एक जांच कमीशन भी बनाया, जिसने 2009 में अपनी रिपोर्ट दी।
    2002: अटल बिहारी वाजपेयी ने अपनी सरकार में हिंदू-मुस्लिम नेताओं से इस मसले पर बात करने के लिए पार्टी के वरिष्ठ पदाधिकारी शत्रुघ्न सिन्हा की अध्यक्षता में अयोध्या सेल बनाया, लेकिन ये कोशिश भी नाकाम रही।

    2003 से 2017 के बीच भी हुई कोशिशें
    2003: कांची पीठ के शंकराचार्य जयेंद्र सरस्वती ने अयोध्या विवाद को सुलझाने के लिए मध्यस्थता की बात कही।
    2010: इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच के तत्कालीन चीफ जस्टिस धर्मवीर शर्मा ने इस मसले को बातचीत से सुलझाने का सुझाव दिया।
    2016: ऑल इंडिया हिंदू महासभा के अध्यक्ष स्वामी चक्रपाणी और मुस्लिम पक्ष की तरफ से दायर याचिकाओं की अगुआई करने वाले मोहम्मद हाशिम अंसारी के बीच मुलाकात हुई। अंसारी ने हनुमान गढ़ी मंदिर के महंत ज्ञान दास से भी बातचीत शुरू की। बातचीत में योजना बनाई कि विवादित 70 एकड़ पर मंदिर और मस्जिद का निर्माण कियाजाए और दोनों के बीच 100 फीट की दीवार रहे।
    2016: मई में ऑल इंडिया अखाड़ा परिषद के अध्यक्ष महंत नरेंद्र गिरी ने भी अंसारी से मुलाकात की, लेकिन बातचीत आगे बढ़ती, इससे पहले ही अंसारी का निधन हो गया। इसके बाद इसी साल रिटायर्ड जज जस्टिस पलक बसु ने भी कोर्ट के बाहर समझौते से इस मसले को सुलझाने का सुझाव दिया।

    2017: मार्च में सुप्रीम कोर्ट में अयोध्या विवाद पर सुनवाई के दौरान एक बार फिर मध्यस्थता की पेशकश की। तत्कालीन चीफ जस्टिस जेएस खेहर ने सुझाव दिया किअगर दोनों पक्ष कोर्ट के बाहर इस मसले को सुलझाने के लिए राजी हैं, तो कोर्ट मध्यस्थता करने को तैयार है।
    2017: नवंबर में आध्यात्मिक गुरु श्रीश्री रविशंकर ने भी इस मामले को बातचीत से सुलझाने की कोशिश की। उन्होंने दूसरे पक्ष से कई मुलाकात भी कीं, लेकिन इस बातचीत का कोई हल नहीं निकला।(इनपुट भास्कर)

  • प्रेम विवाह कर घर वालों के साथ पति ने पत्नी को जिंदा जलाया,श्री राम के घर को मुस्लिम बहू नहीं थी पसंद

    फोटो का प्रयोग संकेतिक रुप मे किया गया है

    फजलुल मोबीन,मोतिहारी:मोतिहारी के ढाका प्रखंड के चन्दनबारा गाँव मे एक बच्चे की माँ को ससुराल वालो द्वारा जिन्दा जलाने से ग्रामीणो मे भारी आक्रोश है। चन्दनबारा निवासी श्रीराम ने अपने परिवार के सहयोग से बुधवार की रात्रि अपनी पत्नी गुडिया के उपर मिट्टी का तेल डालकर आग लगा दी, गुडिया को बृहस्पतिवार की सुबह मोतिहारी हस्पताल लाया गया जहा उसकी मृत्यु हो गई। पूलिस इस मामले मे गुड़िया के पति श्री राम और उसकी सास को गिरफ्तार कर मामले की जांच कर रही है। इस घटना के बाद चन्दनबारा के लोगो मे आक्रोश पाया जा रहा है

    लोगो ने घन्टो चन्दनबारा मदनी चौक पर ढाका बैरगनीया पथ को जाम रखा। मौके पर पहुंच कर सर्किल इंस्पेक्टर अमरेन्द्र कुमार और ढाका थानाध्यक्ष अजय कुमार ने लोगो को बताया कि गुड़िया के पति और सास को गिरफ्तार कर लिया गया है तब जाकर लोगो ने जाम हटाया। विद्वित हो कि गुड़िया हरदीया गाँव निवासी मुस्लिम समुदाय के वहाब आलम की पुत्री है जिसे वरगला कर चन्दनबारा निवासी भदई के पुत्र श्रीराम ने शादी की और लडक़ी को लेकर मुम्बई चला गया लडक़ी ने एक बच्चे को जन्म दिया। श्री राम गुडिया और बच्चे को लेकर चन्दनबारा आया। श्री राम के घर वाले इसे बर्दाश्त न कर सके और श्री राम के घर वालो ने गुडिया को जिन्दा जला दिया। लोगो का कहना है कि गुड़िया को न्याय मिले। बतौर डीएसपी मौके पर पहुंचे सर्किल इंस्पेक्टर अमरेन्द्र कुमार ने बताया कि गुड़िया को न्याय मिलेगा।