Category: संपादकीय

  • टीवी शो में मोदी सरकार के तीन बड़े काम नहीं गिना पाए बीजेपी सांसद

    सबनवाज अहमद/मिल्लत टाइम्स,नई दिल्ली:कार्यक्रम में एंकर ने जब उनसे मोदी सरकार की तीन बड़े कामों के बारे में पूछा तो वह एक भी नहीं बता पाए। उन्होंने कहा कि सभी क्षेत्रों में मोदी सरकार ने विकास का काम किया है।
    लोकसभा चुनाव को देखते हुए पीएम नरेंद्र मोदी और उनके तमाम मंत्री पांच साल के दौरान हुए कामों का जमकर बखान कर रहे हैं। पिछले दिनों ही दिल्ली स्थित रामलीला मैदान में पार्टी की कार्यकारिणी की बैठक में मोदी सरकार की उलब्धियों को गिनाया गया। लेकिन, बीजेपी के राज्यसभा सासंद सीपी ठाकुर एक न्यूज चैनल के कार्यक्रम में मोदी सरकार की तीन बड़ी उपलब्थियां नहीं बता सके।

    एबीपी न्यूज के ‘शिखर सम्मेलन बिहार’ कार्यक्रम में सीपी ठाकुर शिरकत करने पहुंचे थे। कार्यक्रम में एंकर ने जब उनसे मोदी सरकार की तीन बड़े कामों के बारे में पूछा तो वह एक भी नहीं बता पाए। उन्होंने कहा कि सभी क्षेत्रों में मोदी सरकार ने विकास का काम किया है। हालांकि, एंकर ने दोबारा उनसे दोबारा तीन उपलब्धियों को बताने के लिए कहा, लेकिन ठाकुर अपनी पुरानी बात ही दोहराते रहे।

    कार्यक्रम में सीपी ठाकुर के अलावा आरजेडी के पूर्व सांसद रघुवंश प्रसाद सिंह भी मौजूद थे। इस दौरान रघुवंश ने मोदी सरकार की नीतियों को कटघरे में खड़ा किया और नोटबंदी का हवाला देते हुए मोदी सरकार पर जमकर हमले किए। उन्होंने अगड़ी जातियों में आर्थिक रूप से पिछड़े लोगों को 10 फीसदी आरक्षण देने के फैसले की भी आलोचना की। रघुवंश ने कहा कि केंद्र सरकार अगर 8 लाख रुपये प्रति वर्ष आय वाले व्यक्ति को गरीब मानती है तो फिर इतनी ही रकम पर टैक्स में भी छूट मुहैया कराए। वहीं, बीजेपी सांसद सीपी ठाकुर ने भी माना कि 10 फीसदी आरक्षण के लिए 8 लाख रुपये सलाना का आर्थिक मानक कुछ ज्यादा है इसे कम होना चाहिए।

    सीपी ठाकुर ने इससे पहले अक्टूबर, 2018 में अपनी ही सरकार के खिलाफ मोर्चा खोल दिया था। उन्होंने उस दौरान बिहार में सवर्णों पर अत्याचार का मुद्दा उठाया था और अपनी ही पार्टी के सहयोग से चलने वाली बिहार सरकार को आरोपी ठहराया था। सीपी ठाकुर ने गया के गांधी मैदान में इसके लिए धरना भी दिया था।

  • लड़की ने प्रपोजल ठुकराया तो लड़के ने कर दिया केस,कमिश्नर तक पहुंचा मामला

    मिल्लत टाइम्स:शायद अभी तक आपने ऐसा केस नहीं देखा होगा के किसी लड़की द्वारा प्रपोजल ठुकराने पर किसी लड़का ने उस पर केस कर दिया हो आइए हम बताते हैं आपको जी हां ऐसी ही अजीबोगरीब कहानी नागपुर की

    जब नागपुर में कॉलेज स्टूडेंट की यह शिकायत सुनकर पुलिस वाले भी हैरान रह गए

    यूं तो पुलिस थाने में कई अजीबो गरीब मामले दर्ज होते हैं लेकिन नागपुर में एक ऐसा मामला सामने आया है जिसने पुलिस वालों के भी होश उड़ा दिए दरअसल एक कॉलेज स्टूडेंट ने लड़की पर दिल चुराने का आरोप लगाकर उसके खिलाफ केस दर्ज करने की मांग की है
    उसने कहा कि जिस लड़की से वह प्यार करता है उसने उसका दिल चुरा लिया है लेकिन लड़की उसकी तरफ देखती भी नहीं है इसलिए उसका चुराया हुआ दिल आप उससे वापस ला कर दीजिए

  • इस्लाम धर्म से ज्यादा दुसरे धर्मों मे छोड़ी गई है महिलाएं,तो फिर इस्लाम धर्म पर हि कानून क्यों?

    मिल्लत टाइम्स,नई दिल्ली: मुस्लिम महिला से ज्यादा दुसरे धर्मों की महिलाओं की स्थिति ज्यादा दयनीय है जिन्हें उनके पतियों ने एकतरफा तरीके से छोड़ दिया है। ये महिलाएं बेहद मुश्किल हालातों के बीच अपना जीवन बसर कर रही हैं। पिछली जनगणना के मुताबिक छोड़ी गई महिलाओं की संख्या 23 लाख थी। जो मुस्लिम कि तुलना मे कहीं ज्यादा है।

    रोजमर्रा के जीवन में ऐसी ही कई महिलाओं को आप भी देखते होंगे। जो पढ़ी लिखी होती हैं, वह खुद को संभाल भी लें। लेकिन जो महिलाएं अशिक्षित होती हैं, वह ऐसे में बेसहारा हो जाती हैं। पति द्वारा छोड़े जाने पर कुछ अपने माता-पिता के घर चली जाती हैं। लेकिन जिन्हें वहां भी सहायता नहीं मिलती वह खुद को लाचार समझने लगती हैं। महिलाओं को केवल आर्थिक तौर पर ही समस्याएं नहीं झेलनी पड़ती बल्कि उन्हें सामाजिक समस्याओं का सामना भी करना पड़ता है।

    उन्हें समाज के लोगों से सुनना पड़ता है कि उन्हें उनके पति ने क्यों छोड़ा? क्या गलती की थी उन्होंने जो उनके साथ ऐसा हुआ? अब आगे क्या करेंगी और कहां जाएंगी? समाज के इन तीखे सवालों का सामना करने वाली इन महिलाओं की दशा बखूबी समझी जा सकती है।

    हैरान करने वाले हैं आंकड़े

    2011 की जनगणना के अनुसार भारत में 13.2 लाख तलाक हुए हैं। तलाकशुदा लोगों में महिलाओं की संख्या 9.09 लाख है। जो कुल तलाकशुदा लोगों की आबादी का 68 फीसदी हिस्सा है।

    भारत में प्रति एक हजार शादियों में 2.3 फीसदी तलाक होते हैं। जिसमें तलाकशुदा पुरुषों की संख्या 1.58 फीसदी और महिलाओं की संख्या 3.10 फीसदी है। ऐसे में साबित होता है पुरुष महिलाओं की तुलना में तेजी से दूसरी शादी कर लेते हैं।

    अगर केवल महिलाओं की संख्या पर गौर करें तो सबसे अधिक तलाकशुदा महिलाएं बौध धर्म में हैं। (प्रति 1,000 विवाहों पर 6.73 फीसदी), इसाईयों में ये आंकड़ा (5.67 फीसदी), मुस्लिमों में (5.63 फीसदी) है। वहीं अन्य समुदायों में ये संख्या (4.91 फीसदी), जैन (3.04 फीसदी), हिंदू में (2.60 फीसदी) और सिख में (2.56 फीसदी) है।

    एक राष्ट्रवादी मुस्लिम महिला संघ ने जून, 2016 में देश के सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की। मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड को संहिताबद्ध करने के लिए दायर की गई इस याचिका में महिलाओं की दशा की ओर सरकार का ध्यान आकर्षित किया गया। बता दें ये महिला संघ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) से संबद्ध रखती है।

    इस याचिका का मकसद तीन तलाक, को समाप्त कर इस्लाम धर्म मे हस्तक्षेप करना था । इस मुद्दे पर कोर्ट ने अक्तूबर माह में सरकार से विचारों की मांग की।

    सरकार ने कोर्ट को दिए जवाब में कहा कि बीते 65 सालों से मुस्लिम समुदाय में कोई सुधार नहीं हुआ है। जिसके चलते मुस्लिम औरतें सामाजिक और आर्थिक तौर पर बेहद नाजुक स्थिति में खड़ी हैं। सरकार ने तीन तलाक प्रथा की आलोचना की। ये भी कहा गया कि धर्म और संप्रदाय के नाम पर महिलाओं के साथ अन्याय नहीं होना चाहिए।

    ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल मुस्लिमीन (एआईएमआईएम) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी ने इस मामले पर कहा कि सरकार ने इस बिल पर किसी भी पक्ष से बात नहीं की है। जो लोग विरोध कर रहे हैं उनकी तो छोड़िए, जिनके लिए बिल लाया जा रहा है उनसे तक बात नहीं की गई है। आपने (सरकार) समलैंगिकता को अपराध की श्रेणी से बाहर कर दिया और तीन तलाक को आपराधिक करार दे दिया है। क्योंकि यह हमारे खिलाफ इस्तेमाल होगा। लैंगिक अल्पसंख्यकों को धारा 377 में अपनी पसंद की छूट दी गई, तब धार्मिक अल्पसंख्यकों को क्यों नहीं?

    समाजवादी पार्टी के कद्दावर नेता आजम खां का कहना है कि हमें कुरान के अलावा कोई भी कानून मान्य नहीं है। उन्होंने कहा इससे मुसलमानों का कोई लेना-देना नहीं है, जो लोग मुसलमान हैं जो कुरान को मानते हैं, हदीस को मानते हैं वह जानते हैं कि तलाक का पूरा प्रोसीजर कुरान में दिया हुआ है।

    आजम ने कहा कि हमारे लिए कुरान के उस प्रोसीजर के अलावा कोई भी कानून मान्य नहीं है जो कुरान कहता है अगर उसके तहत कोई तलाक नहीं देता, खुला नहीं देता तो ना वो तलाक है ना खुला है। लिहाजा यह बहस की बात नहीं है सिर्फ कुरान का कानून और कोई कानून नहीं हिंदुस्तान ही नहीं पूरी दुनिया के मुसलमानों को कोई कानून मान्य नहीं है सिर्फ कुरान है। कैसे शादी करेगा, कैसे इबादत करेगा, कैसे तलाक देगा सब कुरान में है। इसकी पूरी डिटेल है हमारे मजहबी मामलात हैं। उन्होंने लोकसभा में होने वाली बहस में कहा पहले लोग उन औरतों को न्याय दें जिन्हें शौहरों ने स्वीकारा नहीं है, जो सड़कों पर फिर रही हैं। शौहरों का घर ढूंढती फिर रही हैं उन औरतों को तो न्याय दें।

    बता दें इस्लाम में दो तरह के तलाक की बात कही गई है। एक ‘खुला’, जिसकी पहल पत्नी कर सकती है और दूसरा ‘तलाक’ जिसकी पहल पति कर सकता है। तलाक देने वाले पति को तलाक के बाद पत्नी को मेहर चुकानी पड़ती है। वहीं अगर तलाक की पहल यानी खुला पत्नी की ओर से होती है तो मेहर नहीं दी जाती।

  • तलाक पर मुस्लिम महिला को हक दिलाने वाले मोदी हिंदू महिला को हक क्यों नहीं दिला रहे है?

    मिल्लत टाइम्स,नई दिल्ली:’हमारी मुस्लिम महिलाएं, बहनें, उनको मैं आज लाल किले से विश्वास दिलाना चाहता हूं. तीन तलाक़ की कुरीति ने हमारे देश की मुस्लिम बेटियों की ज़िंदगी को तबाह करके रखा हुआ है और जिन्हें तलाक़ नहीं मिला है वो भी इस दबाव में गुजारा कर रही हैं. मेरे देश की इन पीड़ित माताओं-बहनों को, मेरी मुस्लिम बेटियों को मैं विश्वास दिलाता हूं कि मैं उनके न्याय के लिए, उनके हक़ के लिए काम करने में कोई कमी नहीं रखूंगा और मैं आपकी आशाओं, आकांक्षाओं को पूर्ण करके रहूंगा.”
    प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ये बातें 15 अगस्त, 2018 को लाल किले से दिए अपने भाषण में कही थीं.लेकिन अपने भाषणों और बयानों में बार-बार ‘मुस्लिम बहनों’, ‘मुस्लिम माताओं’ और ‘मुस्लिम बेटियों’ के हक़ और इंसाफ़ की बात करने वाले वही पीएम मोदी सबरीमला मंदिर में महिलाओं के प्रवेश के मुद्दे पर बिल्कुल अलग रुख अख़्तियार करते दिखे.

    समाचार एजेंसी एएनआई की संपादक स्मिता प्रकाश ने जब तीन तलाक़ और सबरीमला मुद्दे पर प्रधानमंत्री की राय जानने चाही तो उन्होंने कहा:
    दुनिया में बहुत से ऐसे देश हैं जहां तीन तलाक़ पर पाबंदी है. इसलिए ये आस्था का मसला नहीं है. इसका मतलब ये है कि तीन तलाक़ जेंडर इक्वलिटी (लैंगिक समानता) का मसला बनता है, सामाजिक न्याय का मसला बनता है, न कि धार्मिक आस्था का. इसलिए इन दोनों को अलग कीजिए. दूसरी बात,भारत स्वभाव से इस मत का है कि सभी को समान हक़ मिलना चाहिए. हिंदुस्तान में बहुत से मंदिर ऐसे भी हैं जहां पुरुष नहीं जा सकते और पुरुष वहां नहीं जाते. मंदिर की अपनी मान्यताएं हैं, एक छोटे से दायरे में. इसमें सुप्रीम कोर्ट की महिला जज (इंदु मल्होत्रा) का जो जजमेंट है, उसको बारीकी से पढ़ने की ज़रूरत है. इसमें किसी राजनीतिक दल के दख़ल की ज़रूरत नहीं है. उन्होंने एक महिला के नाते भी इसे समझकर अपने सुझाव दिए हैं. मेरा ख़्याल है उस पर भी चर्चा होनी चाहिए.
    महिलाओं से ही जुड़े दो अलग मुद्दों पर प्रधानमंत्री के एक-दूसरे से एकदम उलट रवैये को कैसे देखा जाए?

    धर्मस्थलों में महिलाओं को प्रवेश दिलाने के आंदोलन से जुड़ी कार्यकर्ता तृप्ति देसाई कहती हैं, “प्रधानमंत्री को ऐसी बात बिल्कुल नहीं कहनी चाहिए थी. जैसे तीन तलाक़ में महिलाओं के साथ अन्याय होता है वैसे ही सबरीमला मामले में भी महिलाओं के साथ अन्याय होता आया है. उनके हक़ छीने जाते रहे हैं. वहां अगर 10-50 साल के पुरुष जा सकते हैं तो महिलाएं क्यों नहीं? ये हमारे संविधान में दिए गए समानता के अधिकार का अपमान है, महिलाओं का अपमान है.”


    सबरीमला महिलाएं फोटो

    आस्था के सवाल पर तृप्ति कहती हैं, “क्या महिलाओं की आस्था नहीं होती? उन्हें मंदिर में जाने से रोके जाने पर क्या आस्था से खिलवाड़ नहीं होता? वैसे, मुझे लगता है कि ये आस्था का नहीं बल्कि समानता का विषय है.”
    न्यूज़ वेबसाइट ‘द वायर’ की वरिष्ठ संपादक आरफ़ा ख़ानुम शेरवानी का मानना है कि चाहे सबरीमला का मुद्दा हो या तीन तलाक़ का, दोनों ही पितृसत्ता को चुनौती देते हैं.
    उन्होंने बीबीसी से बातचीत में कहा, “हम अपने राजनीतिक नेतृत्व से कम से कम इतनी उम्मीद रखते हैं कि वो महिलाओं और लैंगिक न्याय से जुड़े मामलों पर निष्पक्ष होकर फ़ैसले लेंगे. लेकिन असल में होता ये है कि राजनीतिक पार्टियां अपनी वोट बैंक पॉलिटिक्स से अलग नहीं हो पातीं और इन दोनों मुद्दों में भी यही हुआ है.”
    आरफ़ा कहती हैं, “सबरीमला और तीन तलाक़ के मसलों में देखा जाए तो सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों का भी राजनीतीकरण हो रहा है. उन्हें भी अपनी सुविधा के हिसाब से स्वीकार या अस्वीकार किया जा रहा है. चूंकि तीन तलाक़ को अपराध ठहराया जाना बीजेपी की पॉलिटिक्स के अनुकूल है, वो इसे स्वीकार कर रही है. वहीं, सबरीमला में महिलाओं के महिलाओं को प्रवेश दिलाना उनके हिंदुत्व के अजेंडे के ख़िलाफ़ है इसलिए इसे ख़ारिज किया जा रहा है.”
    आरफ़ा मानती हैं कि प्रधानमंत्री मोदी का ये कहना कि सबरीमला आस्था का विषय है लैंगिक समानता का नहीं, एक समाज और लोकतंत्र के तौर हमें पिछली सदी में धकेलने की कोशिश जैसा जैसा है.

    ‘आंदोलन करने वाली महिलाएं अयप्पा की भक्त नहीं’
    वहीं, सामाजिक कार्यकर्ता और वरिष्ठ पत्रकार मधु किश्वर की राय तृत्पि देसाई और आरफ़ा ख़ानुम शेरवानी से अलग है.
    उन्होंने कहा की, “सबसे पहली बात तो ये कि तीन तलाक़ को ग़ैर-क़ानूनी घोषित करवाने के लिए ख़ुद मुसलमान महिलाएं आगे आई थीं. उन्होंने ख़ुद सुप्रीम कोर्ट का रुख़ किया. वहीं, सबरीमला मंदिर में जाने के लिए के जिन महिलाओं ने आंदोलन किया वो आस्थावान थी ही नहीं. उनमें से कोई मुसलमान थी, कोई ईसाई और कोई नास्तिक. आंदोलन करने वालों में से कोई महिला भगवान अयप्पा की भक्त या श्रद्धालु नहीं थी.”
    मधु किश्वर का तर्क है कि अगर देश के सभी मंदिरों में महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी होती तब ये लैंगिक भेदभाव और असमानता का मुद्दा होगा. अगर हज़ारों मंदिरों में से एक-दो मंदिरों में ऐसी प्रथा है तो इसे भेदभाव नहीं कहा जा सकता.
    पत्रकार और फ़िल्ममेकर दीपिका नारायण भारद्वाज भी मधु किश्वर के मत से सहमति जताती हैं.
    वो कहती हैं, “हर मामले को लैंगिक भेदभाव से जोड़कर देखा जाना उचित नहीं है. सबरीमला मसले को भी संपूर्ण संदर्भ में देखा जाना चाहिए. ऐसा नहीं है कि हमारी धार्मिक मान्यताएं भेदभावपूर्ण नहीं है लेकिन अगर बात सिर्फ़ सबरीमला मंदिर में महिलाओं को प्रवेश न मिलने की है तो मुझे नहीं लगता कि ये अन्याय या भेदभाव है. मुझे नहीं लगता कि ये कोई मुद्दा होना भी चाहिए.”
    दीपिका कहती हैं, “अगर कुछ महिलाएं सबरीमला मंदिर या निज़ामुद्दीन औलिया की दरगाह में चली भी जाती हैं तो इससे पितृसत्ता ख़त्म नहीं हो जाएगी.”

    महिलाओं के हक़ के नाम पर राजनीति
    इस पूरे मामले और विवाद पर तृप्ति देसाई कहती हैं कि किसी पार्टी को महिलाओं के हक़ या आस्था से कोई लेना-देना नहीं है.
    उन्होंने कहा, “जब हम शनि-शिंगणापुर मंदिर में जाने की कोशिश कर रहे थे तब बीजेपी ने हमारा इस तरह विरोध नहीं किया. जब हमने हाजी अली की दरगाह में औरतों के प्रवेश के लिए आंदोलन किया तब भी बीजेपी ने विरोध नहीं किया. लेकिन जब हम केरल के सबरीमला मंदिर में जाना चाहते हैं तो बीजेपी हमारे ख़िलाफ़ खड़ी हो जाती है.”
    तृप्ति के मुताबिक, “इन विरोधाभासी फ़ैसलों का मतलब साफ़ है. केरल में बीजेपी सत्ता में नहीं है. ज़ाहिर है वो वहां हिंदू मतदाताओं को नाराज़ नहीं करना चाहती.”
    आरफ़ा ख़ानुम कहती हैं, “ये बात ठीक है कि एक मंदिर में महिलाओं के प्रवेश से पितृसत्ता तुरंत ख़त्म नहीं होगी. महिलाओं को कुछ ख़ास धर्मस्थलों पर न जाने दिया जाना एक छोटा मुद्दा लग सकता है लेकिन असल में ये एक प्रतीक है जो दिखाता है कि समाज में पितृसत्ता की जड़ें कितनी गहरी हैं. इन प्रतीकों को ख़त्म किया जाना ज़रूरी है.


    सबरीमला, महिलाएं फोटो
    आरफ़ा मानती हैं कि तीन तलाक़ मसले पर बीजेपी अपने आक्रामक रैवये से बहुसंख्यक वर्ग में ये संदेश पहुंचाना चाहती है कि वो मुसलमानों को ‘अनुशासित’ कर रही है. वहीं, सबरीमला मसले पर नर्म रवैया अपनाकर हिंदू समाज को ये दिखाना चाहती है कि वो उनकी धार्मिक आस्था के प्रति कितनी गंभीर है.
    आरफ़ा कहती हैं, “महिलाओं के हक़ के संदर्भ में देखें तो भारतीय राजनीति ‘माचो पॉलिटिक्स’ के स्वरूप में ढली हुई है. यानी ऐसी राजनीति जहां मर्द अपनी ज़रूरत के हिसाब से महिला मुद्दों का इस्तेमाल करते हैं, जबकि असल में उन्हें इससे कोई वास्ता नहीं होता.”
    क्या है सबरीमला विवाद?
    कुछ महीने पहले तक केरल के सबरीमला मंदिर में 10-50 साल की उम्र की महिलाओं को प्रवेश की इजाज़त नहीं थी. धार्मिक मान्यताओं के मुताबिक ये भगवान अयप्पा का मंदिर है, जो ब्रह्मचारी हैं. चूंकि 10-50 साल के बीच की उम्र की महिलाएं मासिक धर्म से गुजरती हैं इसलिए मंदिर में इस आयु वर्ग के महिलाओं के प्रवेश पर पाबंदी थी.
    बाद में कई महिलाओं और संगठनों के हस्तक्षेप और विरोध के बाद सितंबर महीने में सुप्रीम कोर्ट ने अपने फ़ैसले में कहा था कि ये परंपरा भारतीय संविधान के अनुच्छेद-14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करती है.
    अदालत की संवैधानिक बेंच ने मंदिर में महिलाओं के प्रवेश पर लगी रोक हटा दी थी और कहा था कि हर किसी को बिना किसी भेदभाव के मंदिर में पूजा करने की अनुमति मिलनी चाहिए.


    जस्टिस इंदु मल्होत्रा

    जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने क्या कहा था?
    इस मामले में पांच जजों वाली संवैधानिक पीठ की इकलौती महिला जज जस्टिस इंदु मल्होत्रा ने बाकी जजों से अलग राय जताई थी, जिसका ज़िक्र पीएम मोदी अपने इंटरव्यू में कर रहे थे.
    उन्होंने कहा कि कोर्ट को धार्मिक मान्यताओं में दख़ल नहीं देना चाहिए क्योंकि इसका दूसरे धार्मिक स्थलों पर भी असर पड़ेगा.
    जस्टिस इंदु ने कहा था, “देश के जो गहरे धार्मिक मुद्दे हैं, उन्हें कोर्ट को नहीं छेड़ना चाहिए ताकि देश में धर्मनिरपेक्ष माहौल बना रहे. अगर बात ‘सती प्रथा’ जैसी सामाजिक बुराइयों की हो तो कोर्ट को दख़ल देना चाहिए. लेकिन धार्मिक परंपराएं कैसे निभाई जाएं, इस पर कोर्ट को हस्तक्षेप नहीं करना चाहिए. मेरी राय में तर्कसंगतता के विचारों को धर्म के मामलों में नहीं लाया जा सकता है.”
    जस्टिस इंदु ने ये भी कहा था कि भारतीय संविधात में वर्णित समानता का सिद्धांत, अनुच्छेद-25 के तहत मिलने वाले पूजा करने के मौलिक अधिकार की अवहेलना नहीं कर सकता.

    हालांकि सुप्रीम कोर्ट के आदेश और भारी सुरक्षा व्यवस्था के बावजूद कई दक्षिणपंथी संगठनों ने महिलाओं को मंदिर में नहीं जाने दिया. यहां तक कि मंदिर में जाने की कोशिश करने वाली कुछ महिलाओं और पत्रकारों को हिंसा का सामना भी करना पड़ा.
    हालांकि मंगलवार सुबह 10-50 साल की उम्र के बीच की दो महिलाओं ने पुलिस की सुरक्षा में मंदिर के अंदर जाने में क़ामयाब रहीं.
    इस पूरे में मसले में बीजेपी और इसके समर्थन वाले संगठन सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसले के ख़िलाफ़ खड़े दिखाए दिए. ख़ुद बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने कहा था कि अदालत को ऐसे फ़ैसले सुनाने चाहिए जो व्यावहारिक हों.(बीबीसी न्यूज़ के इनपुट के साथ)

  • जानिए क्या होती है सेलेक्ट कमेटी ?

    तस्वीर का प्रयोग सांकेतिक रूप मे किया गया है

    मिल्लत टाइम्स: संसद के अंदर अलग-अलग मंत्रालयों की स्थायी समिति होती है, जिसे स्टैंडिंग कमेटी कहते हैं. इससे अलग जब कुछ मुद्दों पर अलग से कमेटी बनाने की ज़रूरत होती है तो उसे सेलेक्ट कमेटी कहते हैं.

    इसका गठन स्पीकर या सदन के चेयरपर्सन करते हैं. इस कमेटी में हर पार्टी के लोग शामिल होते हैं और कोई मंत्री इसका सदस्य नहीं होता है. काम पूरा होने के बाद इस कमेटी को भंग कर दिया जाता है.

    अगर सरकार बिल को सेलेक्ट कमेटी के पास नहीं भेजती है तो बिल का भविष्य क्या होगा?

    इस सवाल के जवाब में नीरजा चौधरी कहती हैं, “किसी भी पार्टी को इस बिल के भविष्य की चिंता नहीं है. और बीजेपी दिखाना चाहती है कि हमने कोशिश की. बीजेपी ये भी चाहती है कि विपक्षी पार्टियां अल्पसंख्यकों के साथ खड़ी दिखें, ताकि उनको एंटी हिंदू क़रार दे दिया जाए. दरअसल बीजेपी इस तीन तलाक़ बिल के ज़रिए अपनी आज़माई हुई ध्रुवीकरण की राजनीति कर रही है.”

    नीरजा कहती हैं कि इस बिल को आपराधिक नहीं बनाया जाना चाहिए, ये एक सिविल अपराध है.

    “और जब सुप्रीम कोर्ट ने तीन तलाक़ को अवैध क़रार दे दिया था तो इस बिल की क्या ज़रूरत है. मुझे लगता है कि ज़रूरत पड़ने पर दोनों पार्टियां अपने स्टैंड को चुनाव में भी भुनाएंगी.”

  • सुप्रिया ने संसद मे कहा:मुस्लिम औरतों ने मुझसे कहा हम अपने पति को कभी जेल नहीं भेजेंगे,क्योंकि वह हमारे बच्चों के पिता है

    मिल्लत टाइम्स,डेस्क: लोकसभा में तलाक बिल पर बहस के दौरान सांसद सुप्रिया सुले नेता के मुस्लिम औरतें भी इस बिल के खिलाफ है इन्होंने अपना भाषण देते हुए कहा कि मुस्लिम औरतें से मुलाकात हुई उन्होंने कहा कि हम अपने शहर को कभी भी जेल नहीं भेजना चाहेंगे क्योंकि वह हमारे बच्चों के पिता है

    शोले ने कहा कि मुस्लिम औरतें अपनी शरीयत के साथ खुश हैं और इस बिल के जरिए सियासत हो रही है इन्होंने बहस के दौरान भाजपा संसद पर महिलाओं के साथ बदसलूकी और नुकसान पहुंचाने का इल्जाम लगाया

  • संसद मे सल्फी के खिलाफ बोलने पर,मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने पत्र जारी कर मांगा माफी

    मौलाना बदरुद्दीन अजमल जैसे ही लोकसभा में तलाक बिल पर बहस के लिए खड़े हुए उन्होंने अपने भाषण करने के बजाय बीजेपी सांसद मीनाक्षी लेखी के किसी बात का जवाब देने लगे जिस पर सलफी मसलक का बात आ गया

    मिल्लत टाइम्स,नई दिल्ली: आसाम से सांसद और एयूडीएफ के अध्यक्ष मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने अपनी इस बात से माफी मांग लिया है जो इन्होंने 27 दिसंबर को तलाक बिल पर बहस के दौरान कहा था और संसद को भी पत्र लिखकर इन्होंने अपशब्द को हटाने के लिए आगरा क्या है

    मौलाना बदरुद्दीन अजमल ने अपने लेटर हेड पर एक पत्र जारी किया जिसमें उन्होंने लिखा है कि मैं कहना कुछ और चाह रहा था कि लेकिन जवान कुछ और कुछ और निकल गया सल्फी भाई के ताल्लुक से हर गुजर मेरा ऐसा कोई सोच नहीं है

    मौलाना द्वारा लिखा गया माफीनामा पत्र

    मौलाना ने अपने पत्र में लिखा है कि कल (27 दिसंबर 2018 को) संसद में तलाक से संबंधित दिल पर बस में हिस्सा लेते हुए मैंने सभी भाइयों से संबंधित एक गलत और दे तू की बात कह दी थी जिसका मुझे बेहद अफसोस है मेरी नियत बिल्कुल ठीक बनी थी जो बहुत गलती से जवान से जवान पर आ गई मेरा सेल्फी भाई से संबंधित ऐसा बिल्कुल भी नहीं है जो दहशत गर्दी की हिमायत करते हैं जो दहशत गर्दी में पाए जाते हैं इसलिए मैं अपनी गलती का एहसास करते हुए संसद में दिए गए भाषण से माफी चाहता हूं अल्लाह से दुआ करता हूं कि वह हमारी कमियों को दूर करे,, में अपनी भाषण को संसद के रिकॉर्ड से हटाने की भी अनुरोध दे दी है जिसके बाद इंशाल्लाह वहां से हट जाएगा

    वजह रहेगी मौलाना बदरुद्दीन अजमल जैसे ही संसद में तलाक बिल पर बहस के लिए खड़े हुए उन्होंने अपने भाषण करने की बजाय भाजपा सांसद मीनाक्षी लेखी के किसी बात का जवाब देने लगे जिस पर चलती मतलब का टच कर आ गया और और उसकी वजह से मौलाना की जवान से दहशत गर्दी की बात निकल गई इसका मौलाना को तुरंत ही एहसास हुआ और संसद से बाहर निकलते हुए उन्होंने इस पूरे मामले पर सफाई दी देर रात इन के दफ्तर से लेटर हेड पर एक पत्र भी जारी किया गया जिसमें 9 बगैर किसी झिझक के अपने अपनी बातों को बताते हुए सेल्फी मसलक के लोगों से माफी मांग ली है

  • सीतामढ़ी:दंगाइयों और जैनुल के हत्यारों को पकड़ने में नाकाम रहे एसपी विकास वर्मन का तबादला,नए एसपी होंगे सुजीत कुमार

    मो० तौफीक/मिल्लत टाइम्स: सीतामढ़ी में हुए दंगे तथा मोब लिंचिंग में एक 80 वर्षीय वृद्ध जैनुल अंसारी की निर्मम हत्या कर आग मे जला दिया गया था इस बड़ी घटना पर विकास बर्मन के द्वारा मुजरिम पर कोई कार्रवाई ना करने पर सीतामढ़ी के लोगों में काफी गुस्सा बना हुआ था

    लोगों ने इनकी ट्रांसफर की मांग कर रहे थे बिहार अल्पसंख्यक मंत्री खुर्शीद आलम बिहार सीतामढ़ी जिला में आए थे एक प्रोग्राम में भाग लेने तो लोगों ने उन पर भी अपना गुस्सा दिखाया था और लोगों ने दंगाइयों पर तुरंत कार्रवाई करने का करने की मांग की थी

    क्या है पूरा मामला
    20 अक्टूबर को दुर्गा पूजा के टाइम में दंगा हो गया था दो समुदायों के बीच काफी जान माल का नुकसान हुआ था लेकिन दंगाइयों पर अभी तक कोई कार्रवाई नहीं हुई थी वहीं बेकसुरो को अरेस्ट कर लिया गया

    आपको बता दें कि उसी दिन एक 80 वर्षीय जैनुल जैनुल अंसारी की भीड़ द्वारा निर्मम हत्या कर जिंदा जला दिया गया था हद तो यह हो गई कि सीतामढ़ी के एसपी विकास वर्मन ने अभी तक जैनुल अंसारी की हत्या का fire तक दर्ज नहीं की है तभी से वहां के लोगों का गुस्सा लगातार देखने को मिल रहा था और लोग बिहार सरकार से एसपी के ट्रांसफर की मांग कर रहे थे और मुजरिम के ऊपर कार्रवाई की मांग कर रहे थे

    आपको बता दें कि जैनुल अंसारी की मोब लिंचिंग के मामले पर सबसे पहली रिपोर्टिंग मिल्ल्त टाइम्स ने 12 मिनट की वीडियो बनाकर की थी जिस पर पटना क्राइम ब्रांच ने नोटिस भेज दिया था, उस नोटिस मे उन्होंने मुतालबा क्या था कि आप इस वीडियो को हटा दें

  • भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की वकालत करने वाले जज को तुरंत इस्तीफ़ा देना चाहिए

    भारत को हिंदू राष्ट्र बनाने की वकालत करने वाले जज को तुरंत इस्तीफ़ा देना चाहिए

    जज जस्टिस सुदीप रंजन सेन

    मेघालय हाई कोर्ट के जज जस्टिस सुदीप रंजन सेन ने सफाई दी है कि भारत का संविधान धर्म निरपेक्षता की बात करता है और देश का बंटवारा धर्म, जाति, नस्ल, समुदाय या भाषा के आधार पर नहीं होना चाहिए.

    मिल्लत टाइम्स,नई दिल्ली: जस्टिस सेन ने 14 तारीख को अपने आदेश से जुड़ी सफाई जारी की जिसमें उन्होंने लिखा, “धर्मनिरपेक्षता भारतीय संविधान के मूल स्तंभों में है और मेरे आदेश को किसी राजनीतिक पार्टी से जुड़ा या उसके संदर्भ में नहीं समझा जाना चाहिए.”

    इससे पहले 10 दिसंबर को नागरिकता सर्टिफिकेट जारी करने से जुड़े एक मामले की सुनवाई के बाद उन्होंने जो आदेश दिया उसमें उन्होंने लिखा था कि भारत को हिंदू राष्ट्र होना चाहिए था.

    आदेश में लिखा था, “आज़ादी के बाद भारत और पाकिस्तान का बंटवारा धर्म के आधार पर हुआ था. पाकिस्तान ने स्वयं को इस्लामिक देश घोषित किया और इसी तरह भारत को भी हिंदू राष्ट्र घोषित किया जाना चाहिए था, लेकिन ये एक धर्मनिरपेक्ष देश बना रहा.”

    जस्टिस सेन के आदेश को लेकर विवाद छिड़ा और कई हलकों में इसकी आलोचना हुई. भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) ने कहा कि ये संविधान की अवधारणा के विपरीत है.

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    दलित नेता जिन्नेश मेवाणी और वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने भी इसकी आलोचना की.
    जिन्नेश मेवाणी ने कहा कि इससे साफ संदेश मिल रहा है कि सिर्फ़ एक तबके के लोगों के लिए ही न्याय है. प्रशांत भूषण ने कहा कि इस तरह के बयानों से न्यायपलिका पर लोगों का भरोसा कम होगा.

    ऑल इंडिया मजलिसे इत्तेहादुल मुसलमीन के अध्यक्ष असदुद्दीन ओवैसी ने सोशल मीडिया पर लिखा कि भारत विभिन्न संप्रदायों के लोगों से मिलकर बना एक देश है जो कभी इस्लामिक राष्ट्र नहीं बनेगा.

    इस मुद्दे पर संविधान विशेषज्ञ एजी नूरानी का कहना है कि जस्टिस सेन का आदेश भारत के संविधान का उल्लंघन है. पढ़िए, उनका नज़रिया –
    जस्टिस सेन ने 10 दिसंबर को दिए अपने आदेश में भारत के हिंदू राष्ट्र होने का समर्थन किया था. इसके बाद उन्होंने इस पर अपनी सफाई भी दी है लेकिन उनका आदेश दो तरीके से भारतीय संविधान का उल्लंघन है.

    पहला तो ये कि संविधान की प्रस्तावना में ही ये घोषणा की गई है कि भारत एक धर्म निरपेक्ष राष्ट्र है. जस्टिस सेन के सामने हमेशा ही ये रास्ता खुला है कि वो अपने पद से इस्तीफ़ा दें और उसके बाद भारत के हिंदू राष्ट्र होने का समर्थन करें.

    एक महत्वपूर्ण पद पर आसीन होकर (एक बेंच का हिस्सा होते हुए) वो इस तरह की बात नहीं कर सकते क्योंकि अगर वो न्यायपालिका में किसी भी पद पर काम करना स्वीकार करते हैं तो वो पहले ये शपथ लेते हैं कि वो संविधान का पालन करेंगे.

    दूसरा ये कि उनका शपथ लेकर अपने पद पर काम करना उन्हें इस बात कि बाध्य करता है लोगों में भेदभाव ना करें और सभी से समान व्यवहार करें.

    जज की परिभाषा के आधार पर देखें तो अगर एक जज हिंदू राष्ट्र के हिमायती हैं तो वो पक्षपात कर रहे हैं.
    क्या ग़लत किया जज ने
    वो इस तथ्य से कतई अनजान नहीं हो सकते कि ये एक ऐसा मुद्दा है जिस पर राजनीतिक पार्टी बीजेपी और अन्य पार्टियों में मतभेद हैं. एक तरफ जहां बीजेपी हिंदुत्व की समर्थक है अन्य पार्टियां इसके विरुद्ध खड़ी हैं.

    अपने बयान के कारण वो आज उसी जगह पर हैं जिसके बारे में एक बार ब्रितानी जज जस्टिस लॉर्ड डैनिंग ने कहा था कि “मैदान में उतरे भी और फिर विवाद की वजह से उड़ रही धूल से अंधे भी हो गए.”

    उनके ख़िलाफ़ महाभियोग का प्रस्ताव लाया जाना चाहिए या नहीं ये और बात है लेकिन इसमें दोराय नहीं कि उन्होंने उन लोगों का भरोसा खो दिया है जो संविधान पर भरोसा करते हैं. हालांकि ये उम्मीद की जानी चाहिए कि उनके ख़िलाफ महाभियोग लाया जाएगा.

    मैं आपको एक उदाहरण देना चाहता हूं. 1981 में कोलंबिया की सुप्रीम कोर्ट में जस्टिस टॉमस बर्गर को उनके पद से हटा दिया गया था. देश के वरिष्ठ 27 जजों वाली कनाडाई ज्यूडिशियल काउंसिल ने फ़ैसला सुनाया, “राजनीतिक मसलों से संबंधित ऐसे मामलों पर जस्टिस बर्गर का अपनी राय रखना अविवोकपूर्ण था जिन पर पहले ही विवाद है.”

    इस मामले का जिक्र कई बार अदालतों में किया जाता है.
    हिंदू राष्ट्र पर जस्टिस सेन का हालिया बयान इसी वाकये की श्रेणी में सटीक बैठता है. ख़ास कर इस बात को ध्यान में रखते हुए कि जस्टिस सेन ने ना तो इसके लिए सांकेतिक भाषा का इस्तेमाल क्या ना ही छिपे शब्दों में ऐसा कुछ कहा. उन्होंने साफ तौर पर अपने शब्दों में हिंदू राष्ट्र की हिमायत की.

    ‘राष्ट्र सर्वोच्च है और राष्ट्र का नाम हिंदू राष्ट्र है’
    क्या सनातन संस्था ‘उग्र हिंदुत्व’ की वर्कशॉप है?
    कनाडा के चीफ़ जस्टिस से जस्टिस टॉमस बर्गर के ख़िलाफ़ शिकायत कनाडा फेडेलर कोर्ट के एक दूसरे जज ने थी. ये जज कनाडाई ज्यूडिशियल कमिटी के चेयरमैन थे.

    जस्टिस सेन के बयान से नाराज़गी इस उदाहरण के मद्देनज़र समझी जा सकती है.
    न्यायपालिका से संबंधित क़ानून (जजेस एक्ट) के तहत कनाडाई ज्यूडिशियल काउंसिल का गठन किया गया था. ये दुर्भाग्य की बात है कि भारत में जजों के लिए इस तरह की कोई अनुशासनात्मक समिति नहीं है.

    और रह बात भारतीय जजों की तो वो अपनी ताकत, अथॉरिटी और सम्मान को ले कर कभी-कभी संवेदनशील हो जाते हैं.
    जस्टिस बर्गर ने खुद के बचाव की कोशिश की थी. उनका कहना था, “जो मैंने किया वो अपारंपरिक था लेकिन ये किसी भी मायने में राजनीति की तरफ इशारा नहीं था.”

    उनकी इस दलील को बेतुकी माना गया था और सभी ने से खारिज कर दिया था. उन्होंने कई मामलों का ज़िक्र करकते हुए इस पर लंबी दलील दी थी लेकिन उसे माना नहीं गया.

    ज्यूडिशियल काउंसिल ने इस मामले में जांच करने के लिए जीन जजों की एक समिति बनाई. इस समिति की रिपोर्ट मे कहा गया, “कानून के इतिहास से जो सिद्धांत उभरता है वो ये है कि राजनीतिक और क़ानूनी दायरे अलग हैं और इन्हें स्पष्ट रूप से अलग ही रहना चाहिए और संसदीय लोकतंत्र का इस मौलिक आधार का उल्लंघन नहीं किया जाना चाहिए.”

    क्या ये दलील भारतीय जज पर भी लागू नहीं की जानी चाहिए?
    सफ़ाई स्वीकार्य नहीं
    समिति का कहना था, “न्यायपालिका की स्वतंत्रता और शक्तियों को अलग करने के लिए किए गए लंबे संघर्ष का इतिहास ये बताता है कि न्यायाधीशों को राजनीतिक हस्तक्षेप से स्वतंत्र होना चाहिए. साथ ही राजनेताओं को न्यायिक हस्तक्षेप से स्वतंत्र होना चाहिए.”

    “इसके साथ ही ये महत्वपूर्ण है कि न्यायाधीशों की निष्पक्षता पर लोगों का विश्वास कायम रहे.”

    जस्टिस बर्गर के केस में रिपोर्ट में कहा गया कि उन्होंने राजनीतिक रूप से संवेदनशील विषय पर अपने विचार व्यक्त करने के लिए अपने कार्यालय को इस्तेमाल किया.

    सार ये है कि इस ऐतिहासिक मामले का हर शब्द टिप्पणी करने वाले हाई कोर्ट के जज पर भी लागू होता है.
    रिपोर्ट में कहा गया, “जज का यह तर्क या बहाना स्वीकार्य नहीं है कि उसने अंतरात्मा के आधार पर कोई बात कही. हर राजनीतिक विषय पर जजों के अपने निजी विचार हो सकते हैं. अगर जस्टिस बर्गर के विचारों का स्वीकार किया जाए तो हो सकता है बाक़ी जज ऐसे बयान देने लगेंगे जो एक-दूसरे से अलग होंगे.”

    अगर जज एक-दूसरे से सार्वजनिक तौर पर बहस करने लगेंगे तो जनता के मन में उनके प्रति सम्मान पर क्या असर होगा?
    ऊपर से राजनेता और मीडिया ख़ामोश नहीं रहेंगे. वे भी अखाड़े में कूद पड़ेंगे जज को अपने बयान की सफ़ाई में इस तरह से उतरना पड़ेगा मानो वह ख़ुद उस विवादित विषय में एक पक्ष हों.

    ऐसे में इस मामले (मेघालय हाई कोर्ट के जज वाले) में अगर कुछ नहीं होता है तो न्यायिक स्वतंत्रता और मर्यादा को नुक़सान पहुंचेगा. ऐसा होने से रोकना है तो किसी को सुप्रीम कोर्ट जाना होगा और मांग करनी होगी कि ग़लती करने वाले इस जज के संबंध में उचित क़दम उठाए जाएं.

    सभी को करनी चाहिए आलोचना
    साथ ही बार एसोसिएशन ऑफ़ इंडिया को बोलना चाहिए. अफ़सोस है कि मीडिया इस विषय पर ख़ामोश है. मीडिया, बार और बेंच को इसकी निंदा करनी चाहिए.

    अगर कोई जज किसी महत्वपूर्ण विषय पर अपनी अंतरात्मा की आवाज़ को अनसुना नहीं कर पा रहा है और उसे लगता है कि उसे इस विषय में बोनला चाहिए तो उसे जज के तौर पर बात नहीं करनी चाहिए.

    अगर वह चाहता है कि किसी तरह का विवाद खड़ा न हो तो उसे इस्तीफ़ा देना चाहिए और फिर अखाड़े में उतरना चाहिए ताकि बाद में न्यायपालिका के बजाय बात उसी पर आए.

    ऐसे में इन जज को शालीनता से पद छोड़ देना चाहिए. जो कुछ उन्होंने कहा है, उनके शब्दों ने उन्हें हाई कोर्ट बेंच में बने रहने लायक नहीं छोड़ा है.

    उन्होंने 14 दिसंबर को अपने बचाव में जो बातें कहीं, उनका भी कोई मतलब नहीं है. हिंदू राष्ट्र की वकालत करने का मतलब यह कहना है कि संविधान ग़लत है.

    ऐसा ही आरएसएस कहता है कि ये संविधान तो अंग्रेज़ी है और हमारा अपना स्वदेशी संविधान होना चाहिए.

    इस विषय में डॉक्टर बीआर आंबेडकर की वह बात याद आती है जो उन्होंने ‘पाकिस्तान ऑर पार्टिशन ऑफ़ इंडिया में लिखी थी- “हिंदू राष्ट्र बनना भारत के लिए विनाशकारी होगा.”

  • असम:बदरुद्दीन अजमल की पार्टी AIUDF को हराने में नाकाम रही थी भाजपा

    लोकसभा चुनाव की सीरीज़ में हम आज बात करने जा रहे हैं असं की लोकसभा सीट करीमगंज के बारे में. ये सीट अनुसूचित जाति के लिए आरक्षित है. इस सीट से फिलहाल आल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट(AIUDF) के राधेश्याम बिस्वास सांसद हैं.आपकी जानकारी के लिए बता दें कि आल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट मौलाना बदरुद्दीन अजमल की पार्टी है. ये असम में काफ़ी प्रभावी पार्टी है.

    2014 में हुए लोकसभा चुनाव में जहाँ भाजपा के पक्ष में “मोदी लहर” चली वहीँ असम की इस सीट पर किसी लहर का कोई स्कोप ना रहा. आल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट के उमीदवार ने यहाँ भाजपा के कृष्णा दाल को 102,094 वोटों से हराया. इससे पहले यहाँ से कांग्रेस के ललित मोहन शुक्लावैद्य सांसद थे जो इस बार के चुनाव में तीसरे स्थान पर खिसक गए. 2014 के चुनाव को छोड़ दें तो यहाँ से कांग्रेस के ही सांसद अक्सर जीत के आये हैं, बस 2 बार भाजपा और एक बार कांग्रेस (सोशलिस्ट) यहाँ से चुनाव जीती है.

    क्या है अभी की स्थिति?
    मौजूदा स्थिति की बात करें तो करीमगंज लोकसभा सीट में कुल 8 विधानसभा सीटें हैं. 2016 में असम में जहाँ भाजपा सरकार बनी वहीँ यहाँ की 8 में से महज़ 2 ही वो जीत सकी और दो सीटें कांग्रेस के हाथ लगीं लेकिन AIUDF के 4 विधायक यहाँ से चुन कर आये हैं. पिछले एक-डेढ़ साल में बदरुद्दीन अजमल की पार्टी ने अपनी स्थिति में और सुधार किया है. क्षेत्रीय जानकार भी मानते हैं कि असम में जनता भाजपा के काम से बहुत ख़ुश नहीं है, ऐसे में इसका फ़ायदा भी AIUDF को मिल सकता है