Category: संपादकीय

  • क्या आपको शर्म आ रही है कि आप एक जिन्दा लाश बन चुके हैं ?

    क्या आप सभी को शर्म आ रही है कि जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय के छात्रों पर लाठियाँ बरसाईं गईं ?

    क्या आपको शर्म आ रही है कि एक नेत्रहीन छात्र पर लाठियाँ बरसाई गईं ?

    क्या आपको शर्म आ रही है कि ग़रीब छात्रों को उच्च शिक्षा मिलने के हक़ को कुचला जा रहा है?

    क्या आपको शर्म आ रही है कि चैनलों के ज़रिए एक यूनिवर्सिटी के ख़िलाफ़ अभियान चलाया जा रहा है?

    क्या आपको शर्म आ रही है कि जिन वकीलों से पिट कर जो महिला आई पी एस अपना केस तक दर्ज नहीं करा सकीं?

    क्या आपको शर्म आ रही है कि पिटने वाले जवानों का साथ पुलिस के अफ़सरों ने नहीं दिया ?

    क्या आपको शर्म आ रही है कि उन जवानों ने ही छात्रों को पीटा?

    क्या आपको शर्म आ रही है कि सीएजी की रिपोर्ट के अनुसार शिक्षा के नाम पर वसूला गया दो लाख करोड़ पूरी तरह ट्रांसफ़र नहीं किया गया है?

    क्या आपको शर्म आ रही है कि सीएजी की इस रिपोर्ट के बारे में पता नहीं था जिसकी खबर फ़रवरी 19 में मनीकंट्रोल डॉट कॉम पर छपी थी ?

    क्या आपको शर्म आ रही है कि 2007 से प्राथमिक और माध्यमिक शिक्षा के नाम पर वसूला गया 94000 करोड़ अभी तक शिक्षा कोष में नहीं दिया गया है ?

    क्या आपको शर्म आ रही है कि यह पैसा ख़र्च होता तो गाँव से लेकर शहर के ग़रीबों को टॉप क्लास शिक्षा मिलती ?

    क्या आपको शर्म आ रही है कि आप दंगाई, माफिया नेताओं के समर्थन में खड़े होते हैं और छात्रों के समर्थन में नहीं ?

    क्या आपको शर्म आ रही है कि आप संसाधनों को लूटने वाले उद्योगपतियों के समर्थन में चुप रहते हैं लेकिन छात्रों के ख़िलाफ़ बोलते हैं ?

    क्या आपको शर्म आ रही है कि आई टी सेल एक पोस्ट लिख देता है, गाली देता है तो आप चुप हो जाते हैं ?

    क्या आपको शर्म आ रही है कि आप एक लाश बन चुके हैं ?

    क्या आपको लाशों का लोकतंत्र नज़र आ रहा है ?

    Courtesy: यह पोस्ट रवीश कुमार जी के फेसबुक वाल से लिया गया है।

  • विकास की एक बूंद को तरस रहा है सीतामढ़ी का रायपुर गांव,नेताओं का सौतेला रवैया क्यूं

    एम कैसर सिद्दीक़ी/मिल्लत टाइम्स,सीतामढ़ी:सीतामढ़ी जिला के नानपुर प्रखंड के अंतर्गत रायपुर गांव की हालात आजादी के 71 सालों बाद भी वही है जो आजादी से पहले थी बड़े-बड़े नेता आए और आकर चले गए एक से बढ़कर एक वादा किए हैं और चले गए भाषणों में तो बहुत कुछ हुआ लेकिन अगर कुछ नहीं हुआ तो रायपुर गांव का विकास

    अभी तक न जाने कितने सांसद और कितने विधायक सीतामढ़ी की धरती पर आए और अपना कार्यकाल पूरा करके चले गए कई बार नेताओं ने गांव का भ्रमण भी किया और कई बार नेता यहां आते जाते रहे हैं परंतु उसे यहां की बदहाली शायद नजर नहीं आई

    क्षेत्रीय नेता को छोरीये बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री लालू प्रसाद यादव कई बार चुनाव प्रचार करने के लिए रायपुर की धरती पर आए और अपना चुनाव प्रचार करके चले गए वर्तमान मुख्यमंत्री नीतीश कुमार जी रायपुर की धरती पर अपना चुनाव प्रचार करने 2014 में आए और फिर वही हुआ अपना चुनाव प्रचार करके पूरे बिहार का विकास गिना करके चले गए लेकिन वह जहां पर चुनाव प्रचार कर रहे थे वहां की बदहाली शायद उसे नहीं दिखाई दी या फिर उसके क्षेत्रीय नेताओं ने उन्हें रायपुर की बदहाली के बारे में नहीं बताया या फिर संसद भवन रायपुर की बदहाली को नहीं बताया शायद यही कारण है कि आज भी रायपुर के लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है

    (क्या कहती हैं रून्नीसैदपुर से आरजेडी विधायक मंगीता देवी)
    मिल्लत टाइम्स के एडिटर M Qaisar Siddiqui से बात करते हुए रुन्नीसैदपुर विधानसभा क्षेत्र की विधायक मंगीता देवी ने कहा की हमने रायपुर के समस्याओं पर विधानसभा में क्वेश्चन किया है और जल्द ही हम वहां की समस्याओं को दूर करेंगे आपको बता दें की विधायक मंगीता देवी 2 साल पहले भी यहां का भ्रमण कर चुके हैं और उस समय भी उन्होंने यही आश्वासन दिया था पर अभी तक यहां पर कोई काम शुरू नहीं किया गया है

    (RJD से रून्नीसैदपुर की विधायक मंगीता देवी से,मिल्लत टाइम्स के एडिटर एम कैसर सिद्दीकी बात करते हुए)

    इस समस्याओं को लेकर अब्दुल मजीद और मोहम्मद डबलू जी के नेतृत्व मे कौड़ियां रायपुर पंचायत के लोगों ने माननीय विधायक रून्नीसैदपुर और तथा बाजपट्टी दोनों को आवेदन भी दिया गया पर किसी नेता ने कोई काम नहीं किया बस मिला तो सिर्फ आश्वासन ही

    (अब्दुल मजीद द्वारा विधायक को दिया गया आवेदन)

    वैसे तो सभी स्तरों से रायपुर का विकास पिछड़ा हुआ है लेकिन जिस में कुछ मुख्य है
    रायपुर कि वह सरके जो एक जिला से दूसरे जिला को जोड़ती है उस सड़क का यह हाल है तो लोग पांव पैदल नहीं चल पा रहे हैं दो-दो फीट के गड्ढे और उसके ऊपर पानी के साथ साथ कीचड़ भी कुछ कम नहीं है और ना ही सड़क के किनारे नाली है जिसके कारण एक घंटे की बारिश मे सड़क तालाब मे तब्दील हो जाता है, यह वह मुख्य सर के हैं जो मोहनी से रायपुर होते हुए नया नया टोल को जोड़ती है वहीं नया टैल है जहां पुर्व सांसद सीताराम यादव का घर है रायपुर की मुख्य सड़कें कहलाती है और इस सड़कों पर सबसे अधिक यात्री यातायात करते हैं

    (1980 से लेकर 2019 तक देखिए कितने सांसद जीत कर आए पर रायपुर गांव विकास को तरसते रह गए)

    वहीं अगर हम बात करें रायपुर की मूलभूत सुविधाओं के बारे में तो अभी तक रायपुर के साथ सौतेला रवैया अपनाया गया है चाहे हो सड़क के मामले में हो या फिर बिजली के बारे में हो या फिर नल जल योजना के बारे में हो या फिर गरीबों के प्रधानमंत्री आवास योजना के बारे में हो या पेंशन के बारे में इन सब के मामले में सीतामढ़ी जिला का रायपुर गांव अत्यंत पिछड़ा हुआ है पर किसी भी नेता का इस पर ध्यान नहीं जा रहा है और ना कोई इसकी विकास के लिए दिलचस्पी दिखा रहे हैं सिर्फ इलेक्शन तक ही नेताओं की लंबी लंबी भाषण और बड़े बड़े सपने देखने को मिलता है एक से एक सपने दिखाते हैं लेकिन चुनाव जीतने के बाद सब लापता हो जाते हैं

  • सोशल मीडिया का समाज पर प्रभाव कुछ तल्ख हक़ीक़त

    शाहनवाज नाजमी
    सोशल मीडिया एक ऐसा मीडिया है जो बाकी सारी मीडिया जैसे प्रिंट मीडिया, एलेक्ट्रोनिक मीडिया, डिजिटल मीडिया, स्ट्रीम मीडिया से अलग है।
    ये नेट दुआरा उपयोग किया जाता है ।गोया की यह एक वर्चवल वर्ल्ड है। आज के दौर में यह एक दूसरे तक पहुंच बनाने में अहम भूमिका अदा कर रहा है चाहे वो फेस बुक के जरिए हो या ट्विटर ,व्हाट्सएप या इंस्टाग्राम के ज़रिए , हर कोई इसे यूज़ कर रहा है । यह पूरी दुनिया को एक साथ जोड़ कर एक प्लेटफार्म पर जमा कर दिया है ।

    लोग इसे अपनी पब्लिसिटी के लिय या किसी उत्पाद की प्रसिद्ध करने के लिए इस का उपयोग कर रहे हैं।चाहे वह फिल्मी कलाकार हों या TV पर दिखने वाले न्यूज़ ऐंकर, हर कोई सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर के खुद की पहचान बनाने में लगा हुआ है।आज के समय में तो सोशल मीडिया पर ही फ़िल्म का प्रमोशन भी हो जाता है ।

    मतलब यह है कि सोशल मीडिया आज की अहम जरूरत है लेकिन इस मैं छुपी कुछ सकारात्मक और नकारात्मक बातें भी जिस पर प्रकाश डालना बेहद ज़रूरी है

    सब से पहले हम सकारात्मक पहलु पर नज़र करते हैं तो पाते हैं कि सोशल मीडिया के माध्यम से बहुत ही तीव्र गति से सूचना का आदान प्रदान हो जाता है लोगों तक सही जानकारी पहुंच जाती है ।देश में चल रहे भरस्टाचार पर लगाम कसने के लिये सोशल मीडिया का बहुत ज़ियादा उपयोग हो रहा है जिससे हमारे लोकतंत्र को और मजबूती मिल रही है । या किसी मज़लूम की आवाज़ को सरकार दबाना चाहती है तो सोशल मीडिया उस का हथियार बन कर सामने खड़ा हो जाता है ।ऐसी बहुत सी उद्धरण है जिस में सोशल मीडिया ने अहम भूमिका निभाई है ।

    उद्धरण के तौर पर हाल ही में सुप्रीम कोर्ट द्वारा दिये गये कठुआ गैंग रेप के 3 मुख्य आरोपी को उम्र कैद और 3 को 5-5 साल कैद की सज़ा उस की ज़िंदा मिसाल है ये सोशल मीडिया का ही नतीजा था कि एक मासूम को इनासफ़ दिलाने के लिये समूचा देश खड़ा होगया था ।इसी तरह एक अदना पत्रकार प्रशांत कनोजिया को भी सोशल मीडिया ही के माध्यम से इनासफ़ मिला कि सुप्रीम कोर्ट योगी सरकार को फटकार लगते हुए उसे रिहा कर ने का आदेश दिया और वह रिहा भी होगये ।

    तो वहीं सोशल मिडिया का राजनीति दलों ने भी जम कर फायदा उठाया राजनीतिक पार्टियों ने सोशल मीडिया के ज़रिये खूब प्रचार प्रसार किया जिसे से लोगों में जागरूकता आई और वोट डालने का उमंग पैदा हुआ ।जिस के कारण हालिया लोकसभा चुनाव में वोटों की प्रतिशत में विर्द्धि हुई। इस के और भी बहुत से फायदे है लेकिन अब हम इस के नकारात्मक पहलू पर एक सरसरी निगाह डालने की कोशी करते है।

    जहाँ हमें इस से लाभ मिलता है तो वहीं इस के नुकसान भी हैं आज के समय में कुछ लोग आपतजनक खबरों को साझा कर के देश में नफरत की बीज बोने की कोशिश इस सोशल मीडिया के माध्यम से कर रहे हैं। जिसे लेकर कई दफा सरकार को सख्त रुख अपनाने पर मजबूर होना पड़ता है उद्धरण के तौर पर मध्यप्रदेश की किसान की जन सैलाब रैली में सरकार ने इंटरनेट सुविधा को आस्थगित कर दिया था ताकि कोई बड़ी घटना पेश न आजाये ।इसी तरह कुछ लोग अपने फ्लावर्स में बढ़ोतरी के लिये किसी प्रसिद्ध वयक्ति के साथ वह बात जोड़ देते हैं जो उस ने अपने खाब व ख्याल में नहीं सोचा था ।लेकिन वह पोस्ट वायरल हो जाता है और आम जनता के पास गलत संदेश पहुंच जाता है । तो वही इस के ज़ियाद उपयोग से हमारी शारीरिक जीवन पर बड़ा प्रभाव पड़ता है ।जैसे आँख का खराब होना ।सेहत का डाउन हो जाना वैगेरह वैगेराह,

    इस के सब से बड़ा नुकसान का अंदाज़ तो इस बात से लगाया जा सकता है कि एक फेसबुक पोस्ट के चलते श्रीलंका में जो सांप्रदायिकता की आग लगी वह इतिहास के पन्ने पर खून की सियाही से लिखा जाएगा ।
    तो अब हम कह सकते हैं कि जिस तरह सिक्के के दो रुख होते हैं ठीक इसी सोशल मीडिया के भी दो रुख हैं अब हमारे ऊपर है कि हम उस का किस प्रकार उपयोग करते हैं।

  • इस्लाम विरोधी विचारधारा और जेएनयू के वामदल

    जेएनयू का उदारवादी वाम मुस्लिम नौजवानों की आस्था का मजाक उड़ाता है और उन्हें शर्मिंदा करता है

    14 अक्टूबर 2016 को बायोटेक्नोलॉजी के प्रथम वर्ष के छात्र नजीब अहमद को माही मांडवी हॉस्टल में एक तथाकथित झड़प के बाद पीटा गया और अगले दिन नजीब रहस्यमय ढंग से गायब हो गया. ऐसा पहली बार हुआ है कि किसी केंद्रीय विश्वविद्यालय का कोई छात्र लापता हो गया हो और कोई सुराग तक ना मिला हो. स्टूडेंट इस्लामिक ऑर्गनाइजेशन, वाईएफडीए और शेहला राशिद आदि कई वामपंथी नेताओं ने बयान दिए कि भीड़ ने नजीब को मुसलमान होने के कारण पीटा और परिसर में इस्लाम विरोधी माहौल व्याप्त है. इस दलील से कई महत्वपूर्ण प्रश्न उठ खड़े होते हैं क्योंकि जेएनयू मुख्यधारा की वामपंथी छात्र राजनीति, मसलन सीपीआई, सीपीएम, सीपीआई (एमएल)और इनके अतिरिक्त कुछ नासमझ किंतु अधिक रेडिकल वाम संगठनों का गढ़ रहा है.

    नजीब के गायब होने का जिम्मेदारी कौन?

    वामदलों के प्रभुत्व वाले और स्वघोषित निरपेक्षता के लिए विख्यात एक विश्वविद्यालय के आवासीय परिसर में इस्लाम विरोधी भीड़ अगर इस प्रकार के बर्बर हमले को अंजाम दे सकती है, तो इसका जिम्मेदार कौन है? ऐसे में नजीब के गायब होने की जिम्मेदारी किसकी है? वाम दलों के नेताओं के पास इन प्रश्नों का रटा-रटाया उत्तर यह है की परिसर में एबीवीपी की ताकत बढ़ गई है और इसी कारण मुसलमान असुरक्षित महसूस कर रहे हैं. लेकिन गौर से देखने पर यह जवाब संतोषजनक नहीं लगता क्योंकि परिसर में स्वयं को निरपेक्ष कहने वाली वाम विचारधारा का समर्थकों की संख्या और अकादमिक सम्मान दोनों में ही प्रभुत्व एवं एकाधिकार है.

    और गहराई से पड़ताल करने पर हम यह पाते हैं कि वामदलों की बयानबाजी भी स्वभावत:मुस्लिम विरोधी ही है जिसमें अक्सर मुसलमानों के खिलाफ द्वेषपूर्ण भाषण और इस्लाम का बचकाना चित्रण पाया जा सकता है.

    इस्लाम के भीतर भी बहस है

    यहां पर हम इस्लाम में महिलाओं की स्थिति या स्वतंत्रता, ट्रिपल तलाक या मुसलमानों में जाति प्रथा से संबंधित परिचर्चा की बात नहीं कर रहे हैं. इन विषयों पर इस्लाम के धर्मशास्त्र के अंदर ही व्यापक बहस पहले से चल रही है और इस्लाम के असंख्य विद्वान भी इन मुद्दों पर आपस में मोर्चा खोले हुए हैं. यहां हम उन बयानों और विचारों की बात कर रहे हैं जो उन मुद्दों से संबंधित हैं जोकि इस्लाम की आस्था से बहुत मौलिक रुप से संबंधित है और जिनके बारे में अपरिपक्व व्यवहार और बयानबाजी से पहले से ही त्रस्त मुस्लिम युवा और अधिक अलगाव महसूस करने लगते हैं.

    उदाहरण के लिए, नजीब एक धार्मिक रुझान वाला युवक था और बरेलवी सूफी मत की एक धारा से प्रभावित था जैसा कि महान सूफी गौस-ए-आज़म के बारे में उसकी कई फेसबुक पोस्टों से पता चलता है.

    आइए इस प्रकार की बयानबाजी के कुछ नमूने देखते हैं:

    वामपंथी छात्र संगठन आइसा के सदस्य और भूतपूर्व पदाधिकारी हर्ष वर्धन इस फेसबुक पोस्ट में दावा करते हैं कि कुछ मुसलमानों के आतंकवादी बनने का कारण कम से कम आंशिक तौर पर इस्लाम धर्म ही है और उनकी पवित्र पुस्तक कुरान में स्पष्टत: ऐसी खामियां है जिनकी वजह से वे हिंसक गतिविधियों के लिए प्रेरित होते हैं.

    इन महानुभाव ने आतंकवादी गतिविधियों और वैश्विक राजनीतिक परिस्थितियों के बीच के संबंध को उजागर करने वाले किसी विद्वत्तापूर्ण ग्रंथ को पढ़ा या समझा तक नहीं है, आतंकवाद की एक अस्पष्ट अवधारणा की आलोचना करना तो शायद इनके लिए बहुत दूर की बात है.

    फिर भी कुरान के बारे में कम से कम एक बुनियादी ऐतिहासिक समझ की उम्मीद तो इनसे की ही जा सकती थी. कई सदियों और कई महाद्वीपों की मुस्लिम जनता में कुरान की स्वीकार्यता इसके प्रमाण के रूप में प्रस्तुत किया जा सकता था.

    लेकिन उनका यह बयान एक सामान्यीकरण है जो कि यह दावा करता है कि कुरान पढ़ने से आप आतंकवादी बन सकते हैं. यह एक पूरी कौम या समुदाय को एक रंग में रंगने वाली घटिया सोच और एक इस्लाम-विरोधी बयान है.

    अभिव्यक्ति की आजादी के नाम पर इस्लाम का विरोध कितना सही है?

    फिर भी आइसा के कई कार्यकर्ता इस पोस्ट का तर्कसंगत वाद-विवाद और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के एक उदाहरण के रूप में समर्थन और बचाव करते रहे. अपनी एक पोस्ट में शहला रशीद द्वेषपूर्ण भाषण या भड़काऊ बयानबाजी क्या होती है यह समझाने का जिम्मा उठा लेती हैं. वे एक उदाहरण देती हैं जिसमें मुहम्मद के लिए एक अपमानसूचक शब्द का प्रयोग किया जाता है और दावा करती हैं कि यह कथन द्वेषपूर्ण भाषण का उदाहरण नहीं है.

    इस पूरी समस्या की एक वजह यह भी है कि इन चिंतकों का तर्क से दूर का भी कोई नाता नहीं है. अगर कोई इस्लाम के बारे में थोड़ी भी जानकारी रखता है तो उसे यह पता होगा की इस्लामी आस्था में मुहम्मद को एक सर्वोपरि मानवीय आदर्श माना जाता है. अतः इस पोस्ट में जहां मुहम्मद के बारे में एक अापराधिक श्रेणी की बात की जा रही है, इसका अर्थ यह भी निकलता है कि मुहम्मद के अनुयायी अर्थात सभी मुस्लिम उसी आपराधिक श्रेणी में रखे जाने चाहिए.

    अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी के छात्र संघ ने इस पर प्रतिक्रिया दी और कैबिनेट मेंबर गजाला अहमद ने शहला के खिलाफ द्वेषपूर्ण भाषण की एफआईआर दर्ज करायी. जेएनयू छात्रसंघ और वाम बुद्धिजीवी शहला के बचाव में कूद पड़े और अचानक अलीगढ़ मुस्लिम विश्विद्यालय को एक दकियानूसी विश्वविद्यालय का खिताब देने लगे. यहां तक कि गजाला को पितृसत्तात्मक अलीगढ़ मुस्लिमविश्विद्यालय छात्र संघ के हाथों में एक कठपुतली भी कहा जाने लगा.

    नारीवाद के नाम पर इस्लाम पर हमला कितना सही?

    एक और बचकानी पोस्ट जो इन दायरों में इस्लाम विरोधी सोच के लक्षणों को दर्शाती है, उसमें इस्लामी नारीवाद पर प्रहार किया गया.
    आधुनिक इतिहास के छात्र और आइसा के एक कार्यकर्ता से यह उम्मीद नहीं की जा सकती थी क्योंकि धार्मिक और गैर-धार्मिक मुद्दों पर पिछली पूरी सदी में मुस्लिम महिलाओं के प्रतिरोध के बारे में मुसलमानों और गैर मुसलमानों द्वारा लिखी हुई अकादमिक पुस्तकों की कोई कमी नहीं है.

    इस्लामी-नारीवाद शब्द-युग्म का प्रयोग एक खास संदर्भ में किया जाता है जिसमें की मुस्लिम विदुषियों ने महिलाओं के नजरिए से इस्लामी ज्ञान की एक विभिन्न और पूरक प्रकृति को सामने लाया है, जिसमें कि कभी-कभी परिवार की विक्टोरियन अवधारणा को भी पीछे छोड़ देना पड़ता है.

    दूसरी आपत्तिजनक बात इस पोस्ट में यह की मोहम्मद को सिजोफ्रेनिया की बीमारी का शिकार बताया गया है. यह मुस्लिम पहचान और आस्था पर सीधा हमला है.

    कोई इतिहासकार बिना प्रामाणिक और मूल स्रोतों के कैसे एक बीमारी का पता लगा सकता है, ये हमारी समझ के बाहर है.आश्चर्य की बात यह है कि कुछ वामपंथी विद्वानों ने इस पोस्ट का समर्थन तार्किक सोच के नाम पर किया.

    फतवे का सच और जेएनयू के वामपंथी

    आखिरी उदाहरण सबसे ज्यादा चिंताजनक है. यह श्रेणी है फेक न्यूजज अर्थात झूठी खबरों की. तथाकथित फतवों के बारे में आने वाली लगभग सभी खबरें इसी श्रेणी में आती हैं.

    यहां यह साफ करते चलें कि फतवा दरअसल एक पंजीकृत मुफ्ती द्वारा किसी के पूछने पर इस्लामी आस्था के नैतिक मूल्यों के बारे में दी गई एक कानूनी राय होती है जो कि किसी भी रुप में बाध्य नहीं है.

    यह बताना इसलिए भी जरूरी था कि आजकल के अखबारों के किसी आम पाठक को यह भी गलतफहमी हो सकती है कि कोई भी दाढ़ी वाला मुसलमान अगर किसी हिंसात्मक गतिविधि के लिए उकसाने वाला कोई बयान देता है तो उसे फतवा कहा जाता है.

    आम जनमानस में फतवे कि यही धारणा बना दी गई है. जेएनयू शिक्षक संघ की अध्यक्ष आयशा किदवई ने अपनी टाइमलाइन पर यह शेयर किया.

    यह झूठी खबर दरअसल 2 साल पुरानी है लेकिन उन्होंने पिछले रविवार को इसे शेयर किया. हफिंगटन पोस्ट, द गार्जियन जैसे समाचार प्रतिष्ठान 2 सालों से बता रहे हैं कि यह खबर झूठी है.

    मुफ्ती-ए-अाज़म ने भी खुद ये साफ किया है कि उन्होंने ऐसा कोई फतवा नहीं दिया. यहां सवाल यह नहीं कि हम मुफ्ती-ए-अाज़म की इस्लाम के बारे में अवधारणा से सहमत हैं या नहीं क्योंकि यह तो अलग-अलग प्रकार की आस्थाओं वाले मुसलमानों के बीच एक व्यापक बहस का मुद्दा है.

    यहां ध्यान देने की बात यह है कि इन बुद्धिजीवियों ने चुन-चुन कर ऐसे समाचारों का प्रचार किया जो मुसलमानों को नीचा दिखाते हैं

    यहां हमारा उद्देश्य इन व्यक्तियों की निंदा करना नहीं है ना ही हम बात को कुछएक खराब व्यक्तियों के होने या ना होने की दिशा में ले जाना चाहते हैं.

    हमारा मानना यह है कि इन पोस्टों से वाम दलों के भीतर मौजूद मुस्लिम विरोधी पूर्वाग्रह का पता चलता है. यही वजह है कि पिछड़े इलाकों से आने वाले कई मुस्लिम छात्रों को यह गलतफहमी हो जाती है कि उनकी मुस्लिम पहचान,आस्था और व्यक्तिगत आचरण और विश्वविद्यालय में प्रतिष्ठित वामदलों के सुनने में बहुत ऊंचे लगने वाले आदर्शों में 36 का आंकड़ा है.

    इस द्वेषपूर्ण बयानबाजी और साथियों के दबाव के द्वारा यहां का उदारवादी वाम मुस्लिम नौजवानों की आस्था का मजाक उड़ाता है और उन्हें शर्मिंदा करता है. इस प्रकार वे विद्यार्थियों पर विचार और व्यवहार की एक खास पद्धति थोपना चाहते हैं.साथ ही साथ यह उनके इस्लाम विरोधी जनाधार का तुष्टीकरण भी करता है.

    लेखक: Sharjeel Imam and Saqib Salim
    (दोनों ही लेखक जेएनयू से इतिहास के शोधकर्ता हैं) साभार: फर्स्टपोस्ट

  • जानिए- बीएसएनएल को मोदी सरकार ने किस तरह बर्बाद किया

    यह बात सभी को पता है कि किस तरह से 4जी स्पेक्ट्रम बीएसएनएल को न देकर बाकी सब कंपनियों दिया गया….. मोदी सरकार की मंशा जियो को प्रमोट करने की थी और उसी को आगे बढाने के लिए बीएसएनएल को धीमा ज़हर दिया गया। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि रिलायंस को सिर्फ डेटा सर्विस के लिए लाइसेंस दिया गया था, लेकिन बाद में 40 हजार करोड़ रुपये की फीस की बजाय 1,600 करोड़ रुपये में ही वॉयस सर्विस का लाइसेंस दे दिया गया।

    लेकिन जियो के पास इंफ्रास्ट्रक्चर का अभाव था। इसलिए मोदी सरकार ने बीएसएनएल के इंफ्रास्ट्रक्चर को धीरे धीरे जिओ को देना शुरू किया। 2014 में सत्ता में आते ही मोदी सरकार ने एक टॉवर पॉलिसी की घोषणा की ओर दबाव डालकर रिलायंस जिओ इंफोकॉम लिमिटेड से भारत संचार निगम लिमिटेड के साथ मास्‍टर शेयरिंग समझौता करवा दिया। इस समझौते के तहत रिलायंस जिओ बीएसएनएल के देशभर में मौजूद 62,000 टॉवर्स का उपयोग कर सकती थी। इनमें से 50,000 में ऑप्टिकल फाइबर कनेक्टिविटी उपलब्ध थी ।

    यह जिओ के लिए संजीवनी मिलने जैसा था क्योंकि वह चाहे कितना भी पैसा खर्च कर लेती, इतना बड़ा इंफ्रास्ट्रक्चर नही खड़ा कर सकती थी। लेकिन उसके सामने एक मुश्किल यह ओर थी कि बीएसएनएल भी उसके कड़े प्रतिद्वंद्वियों में से एक था, जिन्हें इन टॉवर से सिग्नल्स मिलते थे।

    इसलिए मोदी सरकार ने ग़जब का खेल खेला, उसने जिओ को इन टावर का निरंतर फायदा मिलते रहे इसके लिए इन टावर्स को एक अलग कम्पनी बना कर उसमे डाल दिया।

    मोबाइल टॉवर किसी भी टेलीकॉम ऑपरेटर के लिए सबसे महत्वपूर्ण संपत्ति होते हैं, इस कदम का परिणाम यह हुआ कि अब बीएसएनएल को भी इन टावरों का इस्तेमाल करने के लिए किराया चुकाना पड़ रहा था। 2017 में मोदीं सरकार ने यह फ़ैसला लिया था, जिससे बीएसएनएल ख़ुद अपने ही टॉवरों की किराएदार बन गया।

    नतीजतन जो कम्पनी 2014-15 में 672.57 करोड़ रुपए के फायदे में आ गई थी, इस निर्णय के बाद हजारों करोड़ रुपए का घाटा दर्शाने लगी।

    कुछ समझे आप मोदी सरकार ने बीएसएसएल को 4जी स्पेक्ट्रम अलॉट भी नही किया और उसे बीएसएनएल के टावर भी दिलवा दिए और बीएसएनएल को ख़ुद अपनी ही संपत्ति का किराएदार भी बना दिया।

    लेकिन मोदी सरकार यही नही रुकी उसने उन राज्यों में जहाँ उसकी सरकार थी, वहां ऐसी पॉलिसी बनाई जिससे जिओ को फायदा पुहंचे ओर बीएसएनएल को कोई मौका नहीं मिले।

    छत्तीसगढ़ की रमन सिंह सरकार ने एक योजना शुरू की जिसे संचार क्रांति योजना कहा गया। 2011 में छत्तीसगढ़ में मोबाईल की पहुंच 29 प्रतिशत थी। छत्तीसगढ़ की विषम भौगोलिक परिस्थितियों एवं कम जनसंख्या घनत्व के कारण दूरसंचार सेवा प्रदाता कंपनियां राज्य में नेटवर्क का विस्तार नहीं कर पा रही थी।

    संचार क्रांति योजना के तहत इन क्षेत्रों में टेलीकॉम प्रदाता कंपनी द्वारा नेटवर्क कनेक्टिविटी प्रदाय किए जाने हेतु अधोसंरचना (इन्फ़्रास्ट्रक्चर) तैयार की जानी थी और 1500 से अधिक नए मोबाईल टॉवर लगाये जाने थे 600 करोड़ रुपये मोबाइल टावरों की स्थापना पर खर्च किये जाने थे, यानी सारा काम सरकारी खर्च पर किया जाना था। यह ठेका बीएसएनएल के बजाए जियो को दिया गया।

    इस तरह से मोदी राज में BSNL को पूरी तरह से बर्बाद करने की दास्तान लिखी गई।

    (गिरीश मालवीय स्वतंत्र पत्रकार हैं।)

  • 1857 का प्रथम स्वतंत्रता संग्राम का नेतृत्वकार कौन था?

    Ashraf Hussain

    योगी आदित्यनाथ ने कहा कि 1857 कि जंग का नेतृत्व मंगल पांडे कर रहे थे लेकिन इतिहास कुछ और ही बता रहा है, बहादुर शाह ज़फ़र (1775-1862) भारत में मुग़ल साम्राज्य के आखिरी शहंशाह थे और उर्दू भाषा के माने हुए शायर थे। उन्होंने 1857 का प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में भारतीय सिपाहियों का नेतृत्व किया। युद्ध में हार के बाद अंग्रेजों ने उन्हें बर्मा (अब म्यांमार) भेज दिया जहाँ उनकी मृत्यु हुई।

    1857 का भारतीय विद्रोह, जिसे प्रथम भारतीय स्वतंत्रता संग्राम, सिपाही विद्रोह और भारतीय विद्रोह के नाम से भी जाना जाता है ब्रितानी शासन के विरुद्ध एक सशस्त्र विद्रोह था। यह विद्रोह दो वर्षों तक भारत के विभिन्न क्षेत्रों में चला।

    इस विद्रोह का आरंभ छावनी क्षेत्रों में छोटी झड़पों तथा आगजनी से हुआ था परन्तु जनवरी मास तक इसने एक बड़ा रुप ले लिया। विद्रोह का अन्त भारत में ईस्ट इंडिया कम्पनी के शासन की समाप्ति के साथ हुआ और पूरे भारत पर ब्रितानी ताज का प्रत्यक्ष शासन आरंभ हो गया जो अगले ९० वर्षों तक चला।

    1857 यानी पहली जंगे आजादी के महान स्वतंत्र सेनानी अल्लामा फजले हक खैराबादी ने दिल्ली की जामा मस्जिद से सबसे पहले अंग्रेजों के खिलाफ जेहाद का फतवा दिया था ! इस फतवे के बाद आपने बहादुर शाह ज़फर के साथ मिलकर अंग्रेजों के खिलाफ मोर्चा खोला और अज़ीम जंगे आजादी लड़ी !

    अँगरेज़ इतिहासकार लिखते हैं की इसके बाद हजारों उलेमाए किराम को फांसी ,सैकड़ों को तोप से उड़ा कर शहीद कर दिया गया था और बहुतसों को काला पानी की सजा दी गयी थी! अल्लामा फजले हक खैराबादी को रंगून में काला पानी में शहादत हासिल हुई !

    यह स्वतंत्रता का प्रथम युद्ध था जिसे ब्रिटिश साम्राज्यवादियों ने 1857 का सिपाही विद्रोह कहा।
    सिपाही विद्रोह के परिणामस्वरूप अंग्रेजों द्वारा ज्यादातर ऊपरी वर्ग के मुस्लिम लक्षित थे क्योंकि वहां और दिल्ली के आसपास इन्हें के नेतृत्व में युद्ध किया गया था। हजारों की संख्या में मित्रों और सगे संबंधियों को दिल्ली के लाल किले पर गोली मार दी गई या फांसी पर लटका दिया गया जिसे वर्तमान में खूनी दरवाजा (ब्लडी गेट) कहा जाता है।

    प्रसिद्ध उर्दू कवि मिर्जा गालिब (1797-1869) ने अपने पत्रों में इस प्रकार के ज्वलंत नरसंहार से संबंधित कई विवरण दिए हैं जिसे वर्तमान में ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय प्रेस द्वारा ‘गालिब हिज लाइफ एंड लेटर्स’ के नाम के प्रकाशित किया है और राल्फ रसेल और खुर्शिदुल इस्लाम द्वारा संकलित और अनुवाद किया गया है (1994).

    इतिहास कि कई किताबों में ये भी जिक्र आया है कि 1857 के जंग ए आज़ादी के दौरान डोक्टर विलियम ब्रीडन अंग्रेजों को मशवरा देते हुए कहता है की अगर तुम हिंदुस्तान पर हमेशा अपना कब्जा जमाये रखना चाहते हो तो तिन काम करो,
    – कुरान को खत्म कर दो,
    – ओल्माओ को खत्म कर दो,
    – और मदारिसों को मिटा दो,
    लिहाजा अंग्रेजों ने 1861 तक लाखों कुरान जला दिए, 1864 तक 14 हजार से जादा ओल्माओ को मौत के घाट उतार दिया और हजारो मदरसों को नेस्तो नाबुत कर दिया था।

  • चिपको आंदोलन को पूरी दुनिया मे”पर्यावरणीय आंदोलन”के रूप में जाना जाता है”

    45 साल पहले 25 मार्च के दिन गढ़वाल हिमालय के एक सीमान्त गाँव की महिलाओं ने मैदानी ठेकेदारों के हमले से अपने जंगलों को बचाने के लिए पेढों को घेर खड़ी हो गयीं थीं. आने वाले वर्षों में यह आन्दोलन देश और विदेश में चिपको आन्दोलन के नाम से मशहूर हुआ. गौरा देवी नामक एक ग्रामीण महिला के नेतृत्व में जन्मे इस आन्दोलन ने हमें कई ऐसी बातें सिखायीं जो शायद हम आज भूल गए हैं. आइये कुछ बातें आज याद कर लेते हैं:

    जिस आन्दोलन को दुनिया भर में एक ‘पर्यावरणीय’ आन्दोलन का रूप दिया गया वह दरअसल आजीविका को सुरक्षित करने के लिए संघर्ष था जो आज भी हमारे देश में जारी है. वनों का संरक्षण, आजीविका और पहाड़ी जीवन की सुरक्षा के साथ अटूट रूप से जुडा है और जो समुदाय वनों के साथ रहते हैं, जब तक वनों पर जीवन व्यापन के लिए निर्भर हैं तब तक संरक्षण के लिए भी तत्पर रहेंगे.

    पहाड़ी समाज में महिलाओं का जंगल से और भी गहरा रिश्ता रहा है. आज भी तीखी धारों में घास काटने पहुंची होती हैं औरतें और जंगलों से घर को लौटती, लकड़ी के बोझे ढोती हुई नज़र आती हैं.

    चिपको, वन आधारित समुदायों का न पहला संघर्ष था और न आखरी, वनों का व्यापार जो अंग्रेजों के काल में शुरू हुआ था, आज भी जारी है. अंग्रेजों ने वन आधारित समाज को वनों से बेदखल करने का जो सिलसिला शुरू किया था वो आज और तेज़ी से चल रहा है. उनके कानून और उनका बनाया तंत्र आज भी खडा है.

    वन अधिकार कानून 2006 एक पहला ऐसा कानून है जो वन भूमि पर आधारित लोगों की पहचान को मान्यता देता है – उनको वनों के संरक्षण और वनों से आजीविका कमाने का अधिकार देता है और इस प्रक्रिया में महिलाओं की भागीदारी भी सुनिश्चित करता है. ये अलग बात है की इस कानून को धरातल पर लाने से शासन कतरा रहा है. पहाड़ों में तो सरकारें इस कानून की ज़रुरत को ही नहीं मानने को तैयार.

    अब पहाड़ी समुदायों के सामने चुनौती है – क्या हम चिपको आन्दोलन जैसे संघर्षों को व्यर्थ जाने देंगे या इन्हें अंजाम तक पहुंचा पायेंगे?

  • JNU नारेबाजी कांड से मिली सुर्खियों ने कन्हैया को बेगूसराय से दिलवा दिया टिकट,जानिए दिलचस्प सफरनामा

    मिल्लत टाइम्स:जेएनयू के पूर्व छात्र संघ अध्यक्ष एक बार फिर चर्चा में हैं। उन्हें सीपीआई ने बिहार के बेगूसराय से टिकट दिया है। इसके साथ ही कन्हैया की राजनीति में सीधी एंट्री हो गई है। कन्हैया बेगूसराय से भाजपा के बड़े नेता गिरिराज सिंह को टक्कर दे सकते हैं जिन्हें यहां से टिकट दिए जाने की चर्चा है। आइए जानते हैं कौन है कन्हैया कुमार।

    कैसे मिली चर्चा?

    9 फरवरी 2016 को जेएनयू में अफजल गुरु की बरसी पर आयोजित हुए एक कार्यक्रम के दौरान कथित रूप से लगे देशद्रोही नारों के मामले ने कन्हैया कुमार को चर्चा में ला दिया था। इस मामले में पुलिस ने जेएनयू छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष कन्हैया कुमार, उमर खालिद समेत कई लोगों को आरोपी बनाया था। तीन साल पहले इस मामले की गूंज पूरे देश में हुई थी। इसी घटना से कन्हैया कुमार को पूरे देश में पहचान मिली और अब बेगूसराय से सीपीआई ने टिकट दिया है।

    कन्हैया कुमार का जन्म बिहार के बेगूसराय जिले के एक गांव में हुआ था। उनका गांव तेघरा विधानसभा क्षेत्र में आता है, जहां सीपीआई का प्रभाव है। उनका परिवार जिले के बरौनी प्रखंड के बीहट में रहता है। कन्हैया की पढ़ाई बरौनी के आरकेसी हाई स्कूल में हुई।

    कन्हैया ने 2002 में पटना के कॉलेज ऑफ कॉमर्स में दाखिला लिया था। यहीं से राजनीति की शुरुआत की। पटना में पढ़ाई करते हुए ही कन्हैया अखिल भारतीय छात्र फेडरेशन के सदस्य बने।

    पटना में परास्नातक कोर्स खत्म करने के बाद दिल्ली के जेएनयू में अफ्रीकन स्टडीज के लिए पीएचडी में दाखिला लिया। यहां वह 2015 में छात्रसंघ का अध्यक्ष चुने गए। कन्हैया एक बेहतरीन वक्ता हैं। जेएनयू छात्रसंघ चुनाव से एक दिन पहले दी गई उनकी स्पीच को ही उसकी जीत का कारण माना जाता है।

    कन्हैया कुमार को जेएनूय में संसद हमले के दोषी अफजल गुरु की बरसी पर हुए एक कार्यक्रम के सिलसिले में गिरफ्तार किया गया था। आरोप है कि इस कार्यक्रम में भारत विरोधी और पाकिस्तान समर्थक नारे लगे। इसे लेकर दिल्ली पुलिस ने अपनी चार्जशीट भी तैयार की है जिसे केजरीवाल सरकार की मंजूरी का इंतजार है।

  • काले स्कार्फ़ में शोक मनातीं न्यूजीलैंड की प्रधानमंत्री खुद में एक ऐतिहासिक औरत हैं

    क्या हम कभी 37 साल की एक बिन-ब्याही मां को अपनी PM चुन सकते?

    15 मार्च. दुनिया का दूसरा सबसे शांतिपूर्ण देश न्यूजीलैंड. यहां एक जगह है क्राइस्टचर्च नाम की. जुम्मे का दिन था. लोग मस्जिदों में नमाज़ अदा करने गए हुए थे. तभी अंधाधुंध गोलियां चलने लगती हैं. हर तरफ अफ़रा-तफ़री मच जाती है. हमले में 50 लोग मार दिए जाते हैं. 50 और घायल हो जाते हैं.

    कुछ घंटों में देश की प्रधानमंत्री काली कमीज़ पहने, सर पर काला दुपट्टा लपेटे घटनास्थल पर पहुंचती हैं. मृत लोगों के परिवार वालों के पास जाती है. एक छोटे बच्चे के साथ खड़ी महिला, जिसने किसी अपने को खो दिया है, को गले लगाती है. महिला रोती है. प्रधानमंत्री महिला को और कसकर भींच लेती है. कई सेकंड महिला को कलेजे से लगाकर रखती है.

    उसके बाद प्रेस कॉन्फ्रेस में कहती है:

    “उन्होंने (मुसलमान समुदाय) इस मुल्क को अपना मुल्क चुना है. इसलिए ये उनका मुल्क है.”

    हमला ब्रेंटन टैरंट नाम के एक आदमी ने किया था. ऑस्ट्रेलिया का रहने वाला था. प्रधानमंत्री जेसिंडा आर्डर्न ने इसे आतंकवादी हमला करार कर दिया. ये कहना बड़ी बात थी. क्योंकि दुनियाभर के मीडिया के साथ कई लोग भी इसे ‘हेट क्राइम’ कह रहे हैं. पर ये ‘हेट क्राइम’ नहीं था. ये एक आतंकी हमला था. जो कि बहुत तफ़सील से प्लान किया गया था. और जिसमें 50 लोगों ने अपनी जान गंवाई.

    प्रधानमंत्री ने कहा, “ब्रेंटन टैरंट के विचारों के लिए न इस देश में. और न ही दुनिया में कोई जगह है.” साथ ही जेसिंडा ने ये भी ऐलान किया है कि मारे गए लोगों के परिवार वालों को उनके जनाज़े का ख़र्चा नहीं उठाना होगा. ये काम न्यूजीलैंड की सरकार करेगी.

    कौन हैं जेसिंडा आर्डर्न

    जिस प्रधानमंत्री की हम बात कर रहे हैं. वो 38 साल की, किसी भी धर्म को न मानने वाली, एक बिन-ब्याही मां है. जिसे हम इंडिया में देश की पॉलिटिक्स तो दूर, अपने घर में घुसने लायक भी न समझें.

    1. जेसिंडा न्यूजीलैंड की 40वीं प्राइम मिनिस्टर हैं. अपने करियर की शुरुआत उन्होंने बतौर रिसर्चर की थी. वो 2001 के समय अपॉइंट हुई PM हेलेन क्लार्क के ऑफिस में काम करती थीं. लेबर पार्टी की लीडर बनाए जाने के बाद 2017 में उन्होंने अपनी सरकार बनाई.

    2. 21 जून 2018 में जेसिंडा ने एक बेटी को जन्म दिया. वो दुनिया में दूसरी ऐसी लीडर हैं जो प्राइम मिनिस्टर या प्रेसिडेंट का रोल निभाने के दौरान मां बनीं. प्रेगनेंट होते ही लोगों ने पूछा कि क्या वो मैटरनिटी लीव लेंगी. लेंगी तो देश का क्या होगा. जेसिंडा ने एक रेडियो प्रोग्राम में कहा, “मैं लीव लूं या न लूं, ये मेरी चॉइस होगी. हर औरत का अधिकार होता है ये चुनना कि वो कितना और कब तक काम करना चाहती है.”

    जेसिंडा ने बच्ची को जन्म दिया. फिर डेढ़ महीने की मैटरनिटी लीव पर गईं. ऐसा करने वाली वो दुनिया की पहली प्रधानमंत्री थीं.

    3. जेसिंडा की मां एक स्कूल में कैटरिंग का काम करती थीं. और उनके पिता पुलिस अफसर थे. स्कूल खत्म करने के बाद जेसिंडा ने पॉलिटिक्स और पब्लिक रिलेशन्स की पढ़ाई की. ग्रेजुएशन के बाद जेसिंडा की आंटी उन्हें पॉलिटिक्स में ले आईं. वो ख़ुद काफ़ी समय से लेबर पार्टी की मेम्बर थीं. 2008 में जेसिंडा बतौर सांसद चुनी गईं. फिर वहां से शुरू हुआ उनका राजनीतिक सफ़र.

    4. जेसिंडा के परिवार वाले काफ़ी धार्मिक थे. उनको बतौर मॉरमॉन पाला गया. ये क्रिश्चियनिटी की ही एक शाखा है. पर जेसिंडा को अपने धर्म में सिखाई जा रही कुछ चीज़ों से दिक्कत थी. वो गे समुदाय के हक़ के लिए बोलती थीं. उनका धर्म इसकी इजाज़त नहीं देता था, इसलिए उन्होंने अपना धर्म छोड़ने का फ़ैसला लिया.

    6. 2012 में जेसिंडा क्लार्क गेफ़ोर्ड से मिलीं. वो एक टीवी एंकर हैं. दोनों की मुलाकात उनके एक कॉमन दोस्त ने करवाई थी. पहली मुलाकात के बाद दोनों काफ़ी समय तक नहीं मिले. एक दिन किसी काम के सिलसिले में क्लार्क ने जेसिंडा को कॉल किया. फिर क्या था. दोनों एक दूसरे को पसंद करने लगे. उन्होंने शादी नहीं की. वो साथ में रहते हैं और अपना परिवार चलाते हैं.

    7. दोनों ने एक बिल्ली पाली जो वर्ड फ़ेमस हो गई. क्योंकि उसका ख़ुद का ट्विटर पर एक अकाउंट था. 2017 में उसकी एक एक्सीडेंट में मौत हो गई.

    जेसिंडा 2017 में प्रधानमंत्री बनी थीं. उनकी छवि एक सॉफ्ट व्यक्ति के तौर पर रही थी. जो धाकड़ और दबंग से ज्यादा, कोमल और धैर्यवान लगती थीं. उनके आलोचकों ने कहा, यही रवैया रहा तो सरकार नहीं चलेगी. जवाब में जेसिंडा ने कहा, “दूसरों के दर्द को समझना और एक शांत हृदय रखना ही असल बहादुरी है. मुझे गर्व है कि मेरी पॉलिटिक्स में करुणा का भाव है.”

    जेसिंडा लगातार युद्ध और न्यूक्लियर हथियारों के विरोध में बोलती देखी जाती हैं. क्राइस्टचर्च आतंकी हमले के बाद भी उन्होंने मुसलमान समुदाय से ये वादा किया कि वो वहां के ‘गन-लॉ’ बदल देंगी. यानी लोगों को जो आसानी से बंदूक रख पाने की सुविधा मिली है, उसमें बदलाव करेंगी

    जेसिंडा वही कर रही हैं जो किसी भी प्रधानमंत्री को करना चाहिए. हमारे राजनेताओं को इनसे सबक लेना चाहिए. जो घड़ी-घड़ी युद्ध के लिए न सिर्फ तैयार रहते हैं. बल्कि उसके आधार पर वोट भी ले आते हैं.

    लेखक: सरवत फातिमा

  • चीन को लेकर अभी-अभी देखा गया एक सपना, सपने में सुना मोदी का भाषण

    रवीश कुमार

    भाइयों बहनों, हम चीन को पिचकारी मार-मार कर रंग देंगे। चीन ने आतंकी का साथ दिया है। उसकी सज़ा भुगतनी होगी। हमने पाकिस्तान को घुस कर मारा। अब चीन को पिचकारी से मार देंगे। होली के पहले जितनी भी पिचकारियां आई हैं, मैं हर देशभक्त से अपील करूंगा कि वह सिर्फ तीन चीज़ें लेकर सीमा पर पहुंचे। एक बाल्टी पानी, रंग और चीन की पिचकारी। इसके बार हम सब पिचकारी से ही चीन की सेना को ज़ुकाम करा देंगे। छींकते छींकते चीन की बोलती बंद हो जाएगी।

    भाइयो बहनों, मैंने सारे एंकरों को ट्वीट किया है कि वे भी स्टुडियो में पिचकारी लेकर एंकरिंग करें। अब हर भारतीय के लिए कांग्रेसी चीन के समर्थक बन गए हैं। कांग्रेस के नेताओं ने पाकिस्तान का समर्थन किया है। चीन ने पाकिस्तान का समर्थन किया है। एंकरों से अपील है कि वे कांग्रेस के प्रवक्ता आलोक और राजीव त्यागी को रंग रंग कर रंग दें। हम बदला लेंगे। हर हर मोदी, घर घर होली।

    प्रधानमंत्री का यह भाषण सुनकर मैं तैयार हो कर व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी के लिए निकल पड़ा। इनबाक्स के बस्ते में पड़ी किताबों को पलटने लगा। वामपंथी प्रोफेसर ने उस चैप्टर को गायब कर दिया था जिसमें चीन की पिचकारी के विरोध का इतिहास लिखा था। सुबह से एक भी मेसेज नहीं आया कि आज चीन की पिचकारी का बहिष्कार होगा। जो भारतीय चीन की पिचकारी बेचेगा वो मसूद अज़हर का दामाद होगा। अपना व्हाट्स एप स्टेटस तैयार करने के बाद मैंने उसे अबकी बार पिचकारी सरकार वाले ग्रुप में भेज दिया। वहां से वायरल हो गया।

    चीन हमेशा आतंक का साथी रहा है। हमें चीन का साथ नहीं देना है। जो लोग चीन से सामान लाकर भारत का पैसा बीजिंग भेजते हैं, हम उन्हें दार्लीजिंग भेज देंगे। वहां उन्हें भारतीय मोमो बनाने की विधि की ट्रेनिंग दी जाएगी। हमने चीन को झूला झुलाया मगर चीन ने हमें झुला दिया है। हमारा काम हो गया है। सरदार पटेल की मूर्ति हमने बनवा ली है। चीन के इंजीनियर जा चुके हैं। भारतीय कारीगर बिना पगार के भी सरदार पटेल की रक्षा कर सकते हैं।

    मगर हम चीन की यह धमकी बर्दाश्त नहीं कर सकते हैं। तभी टीवी पर प्रधानमंत्री का एक और भाषण आ गया। वे जनता से पूछ रहे थे। चीन को घर में घुस कर मारना चाहिए कि नहीं। एक एंकर ने एलान कर दिया है। चीन से युद्ध के सर्वे होने लगे हैं। सीमा पर प्रधानमंत्री के समर्थक पिचकारी भर कर जाते हुए दिख रहे हैं।

    आख़िर कब तक हम चीन को लेकर चुप होते रहेंगे। नेहरू चुप हो गए लेकिन नरेंद्र चुप नहीं रहेंगे। जो नेहरू नहीं कर पाए, वही तो नरेंद्र करते हैं। वे झूला झुलाते हैं तो चीन को झुलसा भी देंगे। मार पिचकारी, मार पिचकारी रंग देंगे। चीन का चेहरा बदल देंगे। मसूद अज़हर का जो साथी है, वो चीन हमारा दुश्मन है।

    तभी व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी में एक मेसेज आता है। चीन को लेकर विरोध पिचकारी और फुलझड़ी तक ही सीमित रखना है। न्यूज़ एंकरों को चीन के साथ शांति की बात करनी है। यह नहीं कहना है कि चीन ने मसूद अज़हर का साथ देकर पुलवामा के शहीदों का अपमान किया है। चीन को लेकर चुप्पी जैसे ब्रेकिंग न्यूज़ नहीं चलाने हैं। चीन डर गया भारत से या भारत डर गया चीन से इस तरह के नारे चैनलों पर नहीं लिखे होंगे। एक बंदा था जो न्यूज़ रूम में जा- जाकर सबको डांट रहा था। एडिटर मुर्गा बने बैठे थे। एडिटरों के मालिक अमित शाह से ब्रीफकेस में निर्देश ले रहे थे। विज्ञापन का नया नाम निर्देश है।

    फिर अचानक कोई ज़ोर से चिल्लाता है। प्रधानमंत्री मोदी का लाइव चैनलों पर आने लगता है। वो कहते हैं भाइयों और बहनों, शहीदों का अपमान कांग्रेस ने किया है। उसे हराना है। चीन अपने आप हार जाएगा। हमारी विदेश नीति इटावा से लेकर बेगुसराय तक हिट है। हम जीत रहे हैं। हमने पाकिस्तान को घुस कर मारा है। आप उसी में यह समझ लो कि हमने उसके दोस्त चीन को भी मारा है। हम वन प्लस वन नहीं करते, हम वन टू का फोर करते हैं। वन टू का फोर।

    मैं सपने से बाहर आ रहा था। नींद हल्की होने लगी। खिड़की पर बैठा बारिश की बूंदे गिन रहा था। मतदान केंद्रों पर वोट पड़ रहे थे। लोग अपने झूठ से हार रहे थे। गांव गांव में लोग कह रहे थे कि विदेश नीति में मोदी जीत गए हैं। चीन की पिचकारी से चीन को हरा दिया है।

    एंकर ने एलान किया। 70 सालों में ऐसा कभी नहीं हुआ। आज पहली बार झूठ जीत गया है। मैं जाग गया था। व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी के इनबाक्स में मेसेज चेक करने लगा था। अभी तक चीन की पिचकारी के बहिष्कार की कोई अपील नहीं आई है। क्या आपके पास ऐसे मेसेज आने लगे हैं?

    यह लेख फेसबुक पेज @RavishKaPage से लिया गया है।