Category: शिक्षा

  • CAA का विरोध करते हुए जाधवपुर विश्वविद्यालय की छात्रा ने बीच स्टेज पर CAA के बिल को फाड़ दिया कहा अब यही तरीका है

    नई दिल्ली, पश्चिम बंगाल की जाधवपुर विश्वविद्यालय के दीक्षांत समारोह में मंगलवार को एमए की डिग्री लेने के बाद सीएए के विरोध में उसकी प्रति फाड़ दी। इंटरनेशनल रिलेशन की छात्रा देबोस्मिता चौधरी ने कहा कि यह मेरा विरोध करने का तरीका है। छात्रा का कहना है कि उसने ऐसा इसलिए किया क्योंकि सीएए देश के सच्चे नागरिक को अपनी नागरिकता साबित करने के लिए बाध्य करता है। सीएए की प्रति फाड़ने के दौरान कुलपति, उपकुलपति और रजिस्ट्रार भी मौजूद थे। छात्रा ने कहा कि हम कागज नहीं दिखाएंगे। इंकलाब जिंदाबाद। उन्होंने कहा कि सीएए की प्रति फाड़कर मैं विश्वविद्यालय का अनादर नहीं कर रही हूं। अपनी पसंदीदा संस्थान से डिग्री लेकर मैं बेहद सम्मानित महसूस कर रही हूं।

    मैंने सीएए के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराने के लिए ऐसा किया
    छात्रा ने कहा कि मैंने सीएए के खिलाफ अपना विरोध दर्ज कराने के लिए ऐसा किया है। एक छात्र ए दास ने बताया कि उनके बैच के करीब 25 छात्र अपनी डिग्री लेने के लिए मंच पर नहीं गए। इससे पहले मंगलवार को जाधवपुर विश्वविद्यालय में पश्चिम बंगला के राज्यपाल जगदीप धनखड़ के काफिले का घेराव किया गया और उन्हें काले झंडे दिखाए गए। धनखड़ मंगलवार सुबह दीक्षांत समारोह में शामिल होने के लिए विश्वविद्यालय पहुंचे थे। लेकिन छात्रों ने उन्हें जाने नहीं दिया।

    छात्रों ने राज्यपाल के खिलाफ जमकर नारेबाजी की और काले झंडे दिखाए। छात्रों ने आरोप लगाया कि धनखड़ भाजपा नेताओं की तरह सीएए का समर्थन कर रहे हैं। राजभवन राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का कार्यालय बन चुका है। वे (छात्र) नहीं चाहते हैं कि राज्यपाल जाधवपुर विश्वविद्यालय के पदेन कुलपति रहे।

  • फीस बढ़ोत्तरी का विरोध कर रहे पतंजलि के छात्रों को बालाकृष्णन ने धमकाया,पिटवाया, वीडियो वायरल

    हरिद्वार। उत्तराखंड के पतंजलि आयुर्वेद कॉलेज में सोमवार 25 नवंबर को बीएएमएस के छात्रों ने फीस बढ़ोत्तरी के खिलाफ प्रदर्शन किया। इस दौरान छात्र जब पतंजलि योगपीठ के सीईओ आचार्य बालकृष्ण से मिलने जा रहे तो सुरक्षाकर्मियों ने उनके साथ मारपीट की। इस घटना को जिन मोबाइल फोन के कैमरों में कैद किया गया तो उन्हें डिलीट करवा दिया गया। हालांकि पुलिस इस घटना से अपना पल्ला झाड़ती हुई नजर आ रही है। बहादराबाद पुलिस स्टेशन में तैनात एसआई अशोक रावत कहते हैं कि इस तरह की कोई घटना नहीं हुई है।

    बता दें कि फीस बढ़ोत्तरी के खिलाफ दिल्ली के जेएनयू से प्रदर्शन शुरु हुए थे लेकिन अब देश के कई विश्वविद्यालयों में फीस वृद्धि के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं। इसी कड़ी में हरिद्वार स्थित पतंजलि आयुर्वेद कॉलेज में भी प्रदर्शन हुआ।

    पतंजलि आयुर्वेद कॉलेज में बीएएमएस के छात्रों ने बढ़ी हुई फीस वापस लेने की मांग कर रहे थे। छात्र इसी कारण पतंजलि योगपीठ के सीईओ आचार्य बालकृष्ण से मिलना चाह रहे थे लेकिन वहां पर मौजूद सुरक्षाकर्मियों ने छात्रों की पिटाई शुरु कर दी। इस घटना के कई वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे हैं।

    इसके बाद सुरक्षार्मियों में से किसी ने बहादराबाद पुलिस को मौके पर खबर कर दी, फिर बहादराबाद के एसआई अशोक रावत 4.30 बजे पहुंच गये और छात्रों को शांत कराने की कोशिश करने लगे लेकिन लगातार नारेबाजी करते हुये छात्र बालकृष्ण से मिलने की बात कर रहे थे।

    हालांकि छात्रों के गुस्से को बढ़ता देख आचार्य बालकृष्ण ने छात्रों को बातचीत के लिए अपने कार्यालय में बुलाया लेकिन अंदर जाते समय सभी छात्रों से मोबाइल फोन सुरक्षाकर्मियों ने जब्त कर लिए गए। फिर भी कुछ छात्र चोरी छिपे फोन अंदर ले जाने में कामयाब हो गए। बालकृष्ण से बातचीत के समय वीडियो बनाने लगे। छात्रों का आरोप है कि सुरक्षाकर्मियों ने उनका फोन लेकर वीडियो को डिलीट कर दिया। वहां पर उनके साथ धक्का मुक्की की गई।

    पतंजलि आयुर्वेद कॉलेज की पूरी घटना को एसआई अशोक रावत ने जनज्वार से बातचीत में कहा, ‘आचार्य बालकृष्ण जी से मिलने के लिये छात्र प्रर्दशन कर रहे थे, लेकिन धीरे-धीरे हंगामा बढ़ता गया। हंगामे को बढ़ते देख किसी अपरचीत व्यक्ति ने मुझे 4.20 के आसपास फोन किया। मैं 4.30 बजे तक पहुंच गया, फिर छात्रों को समझा बुझाकर शांत कराने की कोशिश की, लेकिन उस समय छात्र-छात्राएं जिद्द पर अड़ गये कि उन्हें आचार्य बालकृष्ण जी से मिलना ही है।’

    एसएआई अशोक रावत ने बताया, ‘छात्राओं को आचार्य बालकृष्ण से 8 बजे के आस-पास मिलाया गया। अंदर जाते समय लड़कियों को पहले भेजा गया। आचार्य बालकृष्ण जी की सुरक्षा को ध्यान में रखकर सुरक्षाकर्मियों ने सभी छात्र-छात्राओं के मोबाइल फोन जमा करा लिए। उन्हें डर था कहीं छात्र कुछ और लोगों को ना बुला लें जिससे हंगामा और भी बढ़ सकता था लेकिन मना करने के बाद भी कुछ छात्र चोरी चुपे फोन को अंदर ले कर गये। आचार्य बालकृष्ण के सुरक्षाकर्मियों ने फोन को जमा करा लिया। करीब 9.30 मामला शांत हुआ तो सभी छात्राओं को उनका फोन दे दिया गया।

    उन्होंने आगे कहा, जहां तक बात रही मारपीट की तो थोड़ी बहुत धक्का-मुक्की हुई है लेकिन किसी को मारा- पीटा नहीं गया है। भला उन्हें मारा कोई क्यों मारेगा-पीटेगा। हालांकि सोशल मीडिया पर कई वीडियो वायरल हो रहे हैं। वायरल वीडियो में छात्र कह रहे हैं कि आचार्य बालकृष्ण ने खुद हमारे साथ मारपीट की है।

    एक वीडियो में छात्र कहते हुए सुनाई दे रहे हैं, ’22 नवंबर को राज्य सरकार की ओर से एक शासनादेश आया था, उसी शासनादेश लेकर हम आचार्य बालकृष्ण के पास आए थे कि क्या यह मान्य है या नहीं है। हाईकोर्ट का भी आदेश और राज्य सरकार का भी आदेश है, इसी को लेकर बातचीत चल रही थी। आचार्य जी बातचीत में ही गुस्सा हो गए और एक बच्चे को स्वयं आचार्य जी ने खुद मारा है।’

    एक वायरल वीडियो में फीस बढ़ोत्तरी के खिलाफ प्रदर्शन के बाद आचार्य बालकृष्ण छात्रों को डांटते हुए नजर आ रहे हैं। वीडियो में बालकृष्ण छात्रों को धमकाते हुए कह रहे हैं, ‘ये दोस्ती जिंदगीभर नहीं चलेगी। तुम्हारे मां-बाप ने यहां नेतागिरी करने के लिए नहीं भेजा है। मैं सबके मां-बाप को कॉल करने वाला हूं, सबको घर भेज दूंगा और नाम काट दूंगा कॉलेज से सबके.. फिर तुम्हारा जो होगा तुम जानो फिर उसके लिए संघर्ष करना कि हमारे नाम काट दिए हैं और घर भेज दिया है। ये मैं बता दे रहा हूं।’

    वीडियो में आगे वह कहते हुए सुनाई दे रहे हैं, ‘मेरे तो बहुत सारे स्कूल चल रहे हैं। भई, किस चीज की डिमांड है..तुमसे मैने कुछ खाया..तुम हमारे कर्जदार हो…तुमने नमक खा रखा है पतंजलि का..तुम्हारे ऊपर मेरा अभी करीबन-करीबन एक लाख रुपए अतिरिक्त खर्चा है एक एक बच्चे पर, इतने कर्जदार हो तुम..नमक हराम बने फिर रहे हो…तुमको तो कृतज्ञ होना चाहिए कि तुमको पतंजलि में मौका मिला..पतंजलि अपने पॉकेट से पैसा लगाकर तुमको पढ़ाता है..अपनी बापू की संपत्ति से नहीं पढ़ रहे हो तुम..शर्म नहीं आती बेशर्म कहीं के…’

    बालकृष्ण आगे कहते हुए सुनाई दे रहे हैं, ‘यदि आपको कोर्ट में जाना है, कोर्ट का निर्णय कोर्ट से होगा..हम फाइट करेगा..हमको कतई परेशानी नहीं है..तो भी चुपचाप पढ़ाई करनी है पढ़ाई करो.. आप अपना इतिहास खराब करना चाहते हो तो करो.. मैं तो उल्टा केस करने वाला हूं, मेरा तो सवा तीन लाख रुपए खर्च आ रहा है प्रत्येक छात्र पर..तो तुम क्या सोचते हो कि तुम्हारी विजय होने वाली है..मैं सवा तीन लाख रुपये की फीस तुमसे लेने वाला हूं..ये मैं तुम्हारी जानकारी में बता रहा हूं..तुम राजी मत होना कि कोर्ट ने ये लिख कर दे दिया वहां से ये ऑर्डर हो गया..तुमसे मैं सवा तीन लाख रुपये लेने वाला हूं वो भी कोर्ट के थ्रू..और तुम दोगे.. नहीं दोगे तो तुमको डिग्री नहीं मिलेगी..’

    जबकि एक अन्य वीडियो में छात्र कहते हुए सुनाई दे रहे हैं कि 22 नवंबर को राज्य सरकार की ओर से एक शासनादेश आया था, उसी शासनादेश लेकर हम आचार्य बालकृष्ण के पास आए थे कि क्या यह मान्य है या नहीं है। हाईकोर्ट का भी आदेश और राज्य सरकार का भी आदेश है, इसी को लेकर बातचीत चल रही थी। आचार्य जी बातचीत में ही गुस्सा हो गए और एक बच्चे को स्वयं आचार्य जी ने खुद मारा है।

  • प्रौद्योगिकियों का विस्तार दूरस्थ शिक्षा के लिए अत्यधिक लाभदायक:प्रोफेसर अहरार हुसैन

    जामिया मिल्लिया इस्लामिया के अर्जुन सिंह दूरस्थ व मुक्त अध्यन केंद्र का बहुत जल्द शुरू होगा वेबपोर्टल I
    नई दिल्ली(25 नवम्बर/ प्रेस विज्ञप्ति)
    वर्तमान समय मे विश्वविध्यालय एवं कॉलेज को कई अलग अलग प्रकार की चुनोतियों का सामना है I विशेष रूप से शिक्षा सुधार के (दबाव) प्रेशर समेत फीस मे बढ़ोतरी जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दे हैं I एसे मे टेक्नोलोजी का शामिल होना बहुत लाभदायक है I यह बातें अर्जुन सिंह दूरस्थ व मुक्त अध्यन केंद्र के निर्देशक (शैक्षणिक) प्रोफेसर अहरार हुसैन ने कही I उन्होने कहा की टेक्नोलोजी का तेज़ी से बढ़ना दूरस्थ शिक्षा के लिए अतिलाभदायक है!

    प्रोफेसर अहरार हुसैन ने कहा कि जामिया मिल्लिया इस्लामिया का अर्जुन सिंह दूरस्थ एवं मुक्त अध्यन केंद्र का बहुत जल्द वेबपोर्टल शुरू किया जाएगा I जामिया कि कुलपति प्रोफेसर नजमा अख्तर जी भी मुक्त अध्यन केंद्र मे टेक्नॉलॉजी को प्रभावी बनाने कि ओर अग्रसर हैं I इनकी (हिदायत) दिशा निर्देश पर अर्जुन सिंह दूरस्थ एवं मुक्त अध्यन केंद्र बेहतर कार्य करने कि ओर अग्रसर है I

    जामिया मिल्लिया इस्लामिया के अर्जुन सिंह दूरस्थ एवं मुक्त अध्यन केंद्र की ओर से (इमरजिंग टेक्नॉलॉजी इन हायर एडुकेशन) के ऊपर कार्यक्रम का आयोजन किया गया I जिस पर प्रोफेसर हुसैन ने विस्तार से अपने विचार व्यक्त किए इस अवसर पर सयुंक्त निर्देशक, सह निर्देशक, एवं सभी सहायक निर्देशक सहित अन्य उपस्थित रहे I

    मोहम्मद एहतेशामुल हसन,
    सहायक निर्देशक
    दूरस्थ व मुक्त अध्ययन केंद्र, जामिया,
    मोबाइल:9873651628

  • ग़रीब छात्रों के सपनों को पंख लगाता है JNU,अब ग़रीबी के ख़िलाफ ग़रीब छात्र नहीं बोलेंगे तो कौन बोलेगा?उदय चे

    जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी, दिल्ली (JNU) के छात्रों की मुक्तिगामी आवाज और तानाशाही सत्ता का दमनजवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी के छात्र एक बार फिर दिल्ली की सड़कों पर अपना खून दब्बे-कुचले आवाम की शिक्षा के लिए बहा रहे है। एक बार फिर से भारतीय तानाशाही सत्ता को ललकारते हुए गीत गा रहे है…..
    सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है,
    देखना है जोर कितना बाजु-ऐ-कातिल में है।

    जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी जो पिछले कई दशकों से हिंदुस्तान में ही नही पूरे विश्व मे साम्राज्यवादी सत्ताओ और उनकी अंधी श्रम और प्राकृतिक संसाधनों की लूट के खिलाफ विपक्ष की भूमिका निभाती आ रही है। इसी विपक्ष को खत्म करने के लिए विश्व की साम्राज्यवादी सत्ता व उनकी सहयोगी भारत की सत्ता और दलाल नोकरशाही JNU को मिटाने के लिए सारे साम-दाम-दण्ड-भेद सभी हथकंडे अपनाए हुए है।
    इसी लिए सत्ता के चौतरफे हमले JNU पर जारी है। JNU को बदनाम करने के लिए हिंदुत्त्ववादी खेमा दिन-रात झूठा प्रचार जारी रखे हुए है। BJP विधायक द्वारा JNU में हजारों कंडोम मिलने की झूठी खबर हो या JNU को देशद्रोही, आतंकवादीयों का अड्डा साबित करने के लिए शोशल मीडिया से लेकर मेन स्ट्रीम का मीडिया दिन रात झूठे प्रचार में लगे रहते है। JNU छात्रों के खिलाफ झूठे वीडियो रोजाना फासीवादी संघठनो द्वारा जारी उनके IT सेल से जारी किए जाते है। JNU छात्रों के अंदर डर बैठाने के लिए नजीब को इसी नजरिये से फासीवादी खेमे ने गायब किया गया जिसका आज तक भारतीय प्रशाशन ने नही ढूंढा। JNU छात्रों पर झूठे मुकदमे भी सत्ता द्वारा प्रायोजित था।

    जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी अपने आप में एक अदभुत जगह है। इस कैम्पस में विश्व मे पाने वाली सभी विचारधाराएं मानने वाले छात्र आपको मिल जायेंगे। उन सभी छात्रों को अपनी बात कहने का पूरा अधिकार ईमानदारी से ये कैम्पस उपलब्ध करवाता है। सबको समानता का अधिकार कही देखने को मिलता है तो सिर्फ JNU में ही मिल सकता है। भारत की लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों में यहां के छात्र प्रमुख भूमिका निभाते मिल जायेंगे इसके साथ ही नोकरशाही में देश-विदेश में JNU के छात्र एक खाश भूमिका निभा रहे है। JNU ही है जिसमे एक गरीब मजदूर-किसान, आदिवासी, दलित, मुस्लिम का बच्चा पढ़ सकता है और बिना किसी जातीय, धार्मिक, इलाकाई भेदभाव को झेलते हुए अपनी शिक्षा पूरी कर सकता है। JNU ही है जो शिक्षा के साथ-साथ छात्रों को जनतांत्रिक, मानवीय मुद्दों पर परिपक्व बनाती है। छात्र चुनाव जितना जनतांत्रिक तरीके से होता है वो देश के किसी भी यूनिवर्सिटी में नही होता है। JNU कैम्पस में महिला, दलित, आदिवासी, पहाड़ी, पूर्वोत्तर, समलैंगिक, गे, थर्ड जेंडर सबको एक इंसान की तरह देखने व उनके साथ इंसान जैसा व्यवहार करने के कारण ही JNU समाज के हासिये पर रहे आवाम के लिए जन्नत है। इसके विपरीत आमानवीय फासीवादियों ताकतों की आंख की किरकीरी बनी हुई है।

    इसलिए भारत की वर्तमान फासीवादी सत्ता हो या इससे पहले की कॉग्रेसी सत्ता हो, क्यो जवाहरलाल नेहरू यूनिवर्सिटी को खत्म करना चाहती है। क्यो लम्बे समय से JNU के खिलाफ एक सुनियोजित झूठा प्रचार किया जा रहा है।
    इसको जानने के लिए JNU को जानना, JNU की हाबो-हवा को जानना व JNU की उस क्रांतिकारी विरासत को जानना जरूरी है जिसका आधार ही अन्याय के खिलाफ, न्याय के लिए एक लोक युद्ध है। देश के अंदर हजारो सालो से अन्याय के खिलाफ मेहनतकश आवाम मजबूती से संघर्ष करता आ रहा है। इस संघर्ष को अलग-अलग समय पर अलग-अलग प्रगतिशील शिक्षण संस्थान के अध्यापक और छात्र एक सही दिशा देते रहे है। इन शिक्षण संस्थानों के छात्रों ने मेहनतकश आवाम के संघर्षो को नेतृत्व प्रदान किया है। आजादी के आंदोलन में लाहौर का नैशनल कॉलेज जिसके छात्र-अध्यापक आजादी की लड़ाई को एक नई दिशा और नेतृव दे रहे थे। इस कॉलेज के माहौल में ही भगत सिंह, सुखदेव व उनके साथी क्रांतिकारी बने।

    जिन्होंने भारत की आजादी ही नही विश्व के मेहनतकश आवाम की आजादी का नक्शा आवाम के सामने पेश किया। ऐसे ही जवाहर लाल नेहरू यूनिवर्सिटी जिसने आजादी के बाद विश्व की साम्राज्यवादी ताकतों व उनकी दलाल भारतीय नोकरशाही और भारतीय सत्ता के खिलाफ हर मौके पर आवाज बुलन्द की, साम्राज्यवादी अमेरिका और उसके सांझेदार मुल्कों द्वारा चाहे वियतनाम युद्ध हो या उसके बाद के एशिया महाद्वीप के खाड़ी देशों पर तेल पर कब्जे के लिए अफगानिस्तान, इराक, ईरान, लीबिया, सीरिया, फलीस्तीन को उजाडने के लिए धौंपे गए युद्ध हो या अमेरिकी ओर अफ्रीकी महाद्विप के देश हो जहाँ अमेरिका अपनी लूट जारी रखने के लिए दमनकारी कार्यवाहियों को अंजाम दे रहा था। JNU ने आगे बढ़कर कर सभी मजबूती से विरोध किया।

    देश की सत्ता ने जब भी देश के किसानों पर अत्याचार किया तो किसानों के पक्ष में JNU से आवाज आई, देश की सत्ता ने जब भी मजदूरों पर गोलियां चलवाई JNU से विरोध की लहर उठी, सामन्तो ने जब भी जातीय आधार पर दलितों को मारा चाहे वो बिहार हो, उतर प्रदेश, मध्यप्रदेश, हिमाचल हो या चाहे हरियाणा हो।

  • बिहार मैं फिर ड्रामेबाजी,एक लाख शिक्षकों की भर्ती में फिर फंसा पेंच,अब मार्च तक करना होगा इंतजार

    बिहार के प्रारंभिक विद्यालयों (Primary Schools) में एक लाख शिक्षकों की रिक्तियों के विरुद्ध नियोजन शिड्यूल को चौथी बार बदला गया है। इसके बारे में शिक्षा विभाग (Education Department) का तर्क है कि कई जिलों में रोस्टर क्लियर होने में देरी की वजह से शिड्यूल में संशोधन किया गया है।

    अब शिक्षक नियोजन प्रक्रिया जनवरी की जगह मार्च में खत्म होगी और इसके बाद ही प्राथमिक विद्यालयों में टीईटी और सी-टेट अभ्यर्थी शिक्षक पद पर ज्वाइन कर पाएंगे। आपको बता दें कि राज्य में प्राथमिकक विद्यालयों में शिक्षकों के खाली पदों को भरे जाने के लिए शिक्षक नियोजन प्रक्रिया चल रही है।

    शुक्रवार को शिक्षा विभाग की ओर से शिक्षक नियोजन के संशोधित शिड्यूल की अधिसूचना जारी कर दी गई। अधिसूचना के मुताबिक सभी शिक्षक नियोजन इकाईयों में अभ्यर्थियों के आवेदन पत्र जमा करने का अंतिम दिन शनिवार (23 नवम्बर) तक है।
    नियोजन की अन्य प्रक्रिया की तिथियों में बदलाव किया गया है। चयनित अभ्यर्थियों को अब नियुक्ति पत्र 31 मार्च तक दिया जाएगा। जबकि पहले शिड्यूल के तहत 16 से 20 जनवरी तक चयनित अभ्यर्थियों को नियोजन पत्र दिया जाना था।

    शिक्षा विभाग की अधिसूचना के अनुसार सभी नियोजन इकाई को 5 तक मेधा सूची की तैयारी सुनिश्चित करने को कहा गया है। जबकि 11 दिसम्बर तक मेधा सूची का नियोजन इकाई द्वारा अनुमोदन और 16 दिसम्बर तक मेधा सूची का प्रकाशन किया जाएगा।

    2 से 17 जनवरी तक मेधा सूची पर आपत्ति ली जाएगी, जबकि 21 जनवरी तक आपत्तियों का निराकरण किया जाएगा। सभी नियोजन इकाई द्वारा 25 जनवरी तक मेधा सूची का अंतिम प्रकाशन करना अनिवार्य है। 24 फरवरी तक जिला द्वारा पंचायत एवं प्रखंड की मेधा सूची का अनुमोदन होगा।

    इसके बाद 29 फरवरी तक नियोजन इकाई द्वारा मेधा सूची का सार्वजनीकरण किया जाएगा। 5 मार्च तक अनुमोदित मेधा सूची एवं आरक्षण रोस्टर पंजी के अनुरूप उपलब्ध रिक्ति के तहत चयन सूची को तैयार किया जाएगा। 31 मार्च तक चयनित अभ्यर्थियों के बीच नियुक्ति पत्र बांटा जाएगा।

  • पिछले 14 दिनों से जेएनयू में बढ़ी फ़ीस को ले कर देश के विभिन्न हिस्सों में प्रोटेस्ट मार्च का आयोजन

    पिछले 14 दिनों से जेएनयू में बढ़ी फ़ीस को ले कर देश के विभिन्न हिस्सों में प्रोटेस्ट मार्च का आयोजन किया जा रहा है,जिस में देश के अलग अलग कॉलेज, यूनिवरसिटीज़ के छात्रों ने हिस्सा लिया है और सरकार की गलत नीति पर कड़ा परहार किया है। बढ़ती फ़ीस पर ना सिर्फ़ छात्रों बल्कि देश के विभिन्न वर्ग के बुद्धिजवियों ने भी जेएनयू प्रकरण में छात्रों का समर्थन किया है और सरकार के इस रुख़ पर कड़ी प्रतिक्रिया दी है, ज्ञात रहे के भारत सरकार ने अचानक से जेएनयू में मौजूदा फ़ीस को बढ़ा कर छात्रों को सकते में डाल दिया है। कियू के मौजूदा बढ़ी हुई फ़ीस अगर लागू हो जाती है तो कई छात्रों को विश्वविद्यालय को छोड़ना होगा कियू के फिर वह बढ़ी फ़ीस देने में सक्षम नहीं हैं।

    इसी लिए जेएनयू में छात्रों का प्रदर्शन जारी है,इसी क्रम में आज बिहार की राजधानी पटना में जेएनयूएसयू की तरफ़ फ़ीस हाईक पर एक शांति मार्च का आयोजन किया गया जो पटना के रेडियो स्टेशन से निकल कर बुद्धा स्मृति पार्क पर जा कर समाप्त हुआ। जिस में कई जानी मानी हस्तियों ने शिरकत की,जिस में महत्वपूर्ण रूप से कांग्रेस के कदवा से विधायक शकील ख़ान साहब, सीपीआई के विधायक महबूब आलम,समाज सेवी निवेदिता शकील , इबरार रज़ा प्रमुख रूप से मौजूद थे, इस शांति मार्च का समर्थन करते हुए आजमी बिहार (AAJMI BIHAR) ने भी इस में हिस्सा लिया जिस में सफ़दर अली और ख़ुररम‌ मलिक विशेष रूप से मौजूद रहे,इस के साथ ही विभिन्न छात्र संगठन के छात्रों ने भी इसका समर्थन किया। सभी वक्ताओं ने अपनी बात रखते हुए सरकार से अनुरोध किया के बढ़ी हुई फ़ीस को ख़तम किया जाए ,और सस्ती शिक्षा को आम किया जाए,

    आप को बता दें के
    नए शुल्क में कमरे के किराए में कई गुना बढ़ोतरी शामिल है – रूम किराया जो पहले प्रति माह 10/20 रुपये था अब से 300 रुपये प्रति माह हो जाएगा।
    इसी तरह 1,700 रुपये प्रति माह का नया सेवा शुल्क भी जोड़ा गया है – मासिक हॉस्टल शुल्क 2,000-2,300 रुपये तक अन्य शुल्क, जैसे कि स्टेब्लिशमेंट (2,200 रुपये प्रति वर्ष), मेस (3,000 रुपये प्रति माह) और वार्षिक शुल्क (300 रुपये) फ़िलहाल समान हैं।
    अगर यह सारी फ़ीस बढ़ जाती है तो जवाहर लाल नेहरू विशवविद्यालय देश के सबसे महंगी यूनिवरसिटी में शुमार किया जाएगा, ज्ञात रहे के दिल्ली यूनिवर्सिटी की भी सालाना फ़ीस 40,000 से 55,000 के बीच ही है जिस में खाना और एकोमोडेशन शामिल है।

    इस तरह हम कह सकते हैं सरकार के इस फ़ैसले से वैसे गरीब छात्रों की शिक्षा प्राप्त करने के मंसूबे पर पानी फिर सकता है जो मेधावी तो हैं लेकिन ज़्यादा फ़ीस होने की वजह कर शिक्षा हासिल करने में ख़ुद को असहाय महसूस करते हैं।
    इस लिए सरकार अपने इस फ़ैसले पर पुनर्विचार करे।और बढ़ी हुई फ़ीस को वापस ले,
    लेखक:खुर्रम मालिक

  • मऊ:बाल दिवस पर उस्मानिया स्कूल के बच्चों ने बनाई रंग बिरंगी रंगोली सहित तरह तरह के प्रोजेक्ट

    *घोसी(मऊ) । स्थानीय नगर के काजीपुरा मुहल्ला स्थित उस्मानिया हाईस्कूल में बाल दिवस के अवसर पर रंगोली प्रतियोगिता आयोजित हुई। जिसमें विद्यालय की बच्चियों ने एक से एक सुन्दर रंगोली बनाई । जिन्हें प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय स्थान पाने वाली बच्चियों को ट्राफी प्रदान की गई।

    इस अवसर पर अपने उदबोधन में विद्यालय के निदेशक काज़ी मोशफ्फे जमाल ऊर्फ़ चंदू ने कहा कि आज का दिन देश के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू के जन्म का दिन है। नेहरू जी का बच्चों के प्रति अपार स्नेह था, उनका मानना था कि बच्चे भारत के राष्ट्र निर्माता हैं, इसलिये उनके अधिकारों के प्रति सभी को जागरूक रहना चाहिए। बच्चों के प्रति उनके अपार स्नेह के कारण ही उनके जन्मदिन को बाल दिवस के रूप में मनाते हैं।

    इस अवसर पर आसिफ हुसैन, योगेश कुमार, ताबिश इफ़्तेख़ार, मनोज कुमार,हाफ़िज़ मुज़फ्फरूल इस्लाम, ज़ुबैर अहमद, तबस्सुम, हबीबा, फरहीन, रिंकी मौर्य आदि अध्यापकगण मौजूद रहे।
    कार्यक्रम का संचालन एस० वी० रहमान और धन्यवाद ज्ञापन प्रबंधक काज़ी फैज़ुल्लाह ने किया।

  • जामिया मिल्लिया इस्लामिया-मानवता,देश प्रेम और सहिष्णुता का अदुभूत धरोहर।

    मुर्शीद कमाल

    देश के सभी शैक्षिक संस्थानों में जामिया मिल्लिया इस्लामिया का अस्थान अद्वितीय है। अद्वितीय इस लिये क्योंकि जामिया की स्थापना सिर्फ़ शिक्षा प्राप्त करने के लिये नहीं की गयी थी, और ना ही जामिया की शिक्षा मात्र रोज़गार प्राप्त करने के लिये थी बल्कि जामिया की स्थापना शिक्षा बराये जीवन के उद्देश से हुई थी, और यह अद्वितीय इस लिये भी है क्योंकि देश के दूसरे शैक्षिक संस्थानों की तरह जामिया का संस्थापक कोई एक व्यक्ति विशेष नहीं है। असहयोग आंदोलन और खिलाफ़त अांदोलन के कोख से जन्मे इस अदभुत शैक्षिक संस्थान के वैचारिक स्थापक महात्मा गांधी थे तो उनके सपनों में हकीक़त का रंग भरने के लिये कुदरत ने मौलाना मोहम्मद अली जौहर, हकीम अजमल ख़ां, डॉक्टर मुख़्तार अहमद अंसारी और अबदुल मजीद ख़्वाजा जैसे नामवर लोगों का चयन कर लिया था, और फिर जब जामिया पर सख़्त वक़्त अा पड़ा और असहयोग अांदोलन की समाप्ति पर कुछ तबकों द्वारा इसके अस्तित्व को ही बेमकसद बता कर जामिया को बंद करने की वकालत शुरू की गयी तो डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन, डॉक्टर अाबिद हुसैन और प्रोफेसर मोहम्मद मुजीब साहब की बहूमूल्य सेवाओं ने जामिया को सहारा दिया।

    ये 20 अक्तूबर 1920 की तारीख़ थी। असहयोग आंदोलन पर समर्थन हासिल करने और उस पर अमल करवाने के लिये अलीगढ़ विश्वविद्दालय के छात्रों के अनुरोध पर महात्मा गांधी और मौलाना मोहम्मद अली जौहर अलीगढ़ आये और यूनियन हॉल में छात्रों से ब्रिटिश साम्राज्य के संरक्षण और आर्थिक मदद से चलने वाले शैक्षिक संस्थानों के बायकॉट की अपील की। ये नेता ये चाहते थे कि अलीगढ़ सरकारी संरक्षणा से बरी होने का एेलान कर दे। अलीगढ़ के छात्रों और अध्यापकों का इस सिलसिले में रवैय्या संतोषजनक था, लेकिन सरकार समर्थक तबके ने इसका विरोध शुरू कर दिया।यही नहीं बल्कि महात्मा गांधी और दूसरे देश भक्तों का मज़ाक उड़ाना शूरू कर दिया और एक बिल पास कर के इस अांदोलन के विरोध की घोषणा कर दी। ज़ाकिर साहब जो उन दिनों अर्थ शास्त्र में एम.ए करने के बाद नये नये लेक्चरर के ओहदे पर नियुक्त हुए थे उस दिन अपने चिकित्सकीय परीक्षण के लिये दिल्ली गये हुये थे। दूसरे दिन जब वो अलीगढ़ वापिस आये तो उन्हें गांधी जी के साथ हुये बरताव पर बड़ा दुख हुआ। दूसरे दिन छात्रों ने यूनियन हॉल में फिर सभा की। ज़ाकिर साहब ने इस सभा में शिरकत की। अली बंधुओं ने इस में बहूत ही मार्मिक भाषण दिये। भाषण का असर ये हुआ कि छात्रों की भीड़ बेक़ाबू हो गयी। जाकिर साहब फूट फूट कर रोने लगे। जाकिर साहब के पूराने साथी रशीद अहमद सिद्दीक़ी बताते हैं कि भीड़ बेकाबू हो गयी थी, उन्हें (जाकिर साहब) खींच कर भीड़ से बाहर लाया।पूछा जाकिर साहब ये क्या हुआ? कहने लगे रशीद साहब अलविदा! जिंदगी का आरम्भ अच्छा हुआ अब समापन के अच्छे होने की प्रार्थना करियेगा। मेरे पास मेरा जो कुछ है उसे यूसुफ और महमूद के हवाले कर दीजियेगा! कालेज के कागजात उन्हें वापिस भेज दीजियेगा। मैंने कहा मुर्शीद! इस अांदोलन के बारे में बहूत बार बातचीत हुई लेकिन आप कभी इसके समर्थक नहीं थे,अब आखिर क्या हुआ? कहने लगे “आंदोलन सही हो या ग़लत उसके बारे में यकीन के साथ कुछ कहना ना मुमकिन भी है और वक्त से पहले भी! मुझे जिस सोच ने मजबूर किया वो ये थी कि कहने वाले ये ना कहने लगें कि अलीगढ़ वालों ने उस आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया जिसमें मुसीबतों का सामना करना पड़ता! मुझे तो ये बतलाना है कि अलीगढ़ के सपूत बज़्म और रज़म (सुख और दुख) दोनों की जिम्मेदारी उठा सकते हैं, आप मुझे ना रोकें, पाँसा फेंका जा चुका है, अब तो अंजाम जो भी हो अच्छा खुदा हाफिज़!”

    अब जबकि छात्रों की एक अच्छी संख्या ने अपनी अलग पहचान कायम करते हुये अलीगढ़ से ताल्लुक़ तोड़ लिया तो फिर उनके लिये एक दूसरे संस्थान की ज़रूरत महसूस की गयी।

    29 अक्तूबर को जुमा की नमाज़ के बाद मोहम्मडन एंगलो ओरियंटल कॉलेज की मस्जिद में एक अारंभिक सभा में शेखुल हिंद मौलाना महमूद हसन के हाथों जामिया मिल्लिया इस्लामिया की बुनियाद रखी गयी। समारोह में अलीगढ़ कॉलेज को हमेशा के लिये अलविदा कह कर एक नये भविष्य की तलाश में आए करीब 300 छात्र एवं अध्यापकों ने शिरकत की। बुनियाद भी महज औपचारिक और प्रतीकात्मक थी, ना किसी भवन का शिलान्यास, ना किसी संस्था का उदघाटन, ना किसी आर्थिक सहायता की उम्मीद,ना कोई उपकरण ना ही कोई सामानـ लेकिन प्रतिबद्धता,त्याग और कुरबानी का एैसा जुनून कि कुदरत भी हैरान। खुलासा ये कि जामिया के स्थापना की पूरी योजना पहली दृष्टि में आसमान में कायम काल्पनिक योजना लगती थी। लेकिन जो पवित्र हस्तियां इस इंकिलाबी मनसूबे को वैवहारिक आकार देने के लिये इकठ्ठा हुई थीं वो कोई साधारण हस्तियाँ नहीं थीं, उनके महत्वकांक्षा के पीछे एैसी खु़दाई ताक़त के होने का इहसास होता था जिसके बल पर पहाड़ों को अपनी जगह से खिसकने पर मजबूर किया जा सकता था। बोरियों पर बैठने वाले ये लोग दुनिया के आराम के मुकाबले में दुनिया की आजमाईशों को प्राथमिकता देते थे।

    जामिया के स्थापकों के लेख और भाषणों ने जामिया की स्थापना के उद्देश्यों को स्पष्ट कर दिया था। वो जामिया को एक एैसा शैक्षिक संस्थान बल्कि प्रयोगशाला बनाना चाहते थे जहां विचारों की आजादी हो, इंसानी मन गुलामी और शत्रुता से आजाद हो, जहां इस्लामी सभ्यता की सुखद हवाएं देश भक्ति और राष्ट्रीयता का पैगाम सुनाती हों, जहां की हवाओं में इंसानी भाईचारगी,सहिष्णुता और देशभक्ति रच बस गयी हो और जहां इस्लामी अक़ीदे और विचार संयुक्त भारतीय राष्ट्रीयता से संगत हों।

    करीब 4 सालों तक जामिया मिल्लिया अलीगढ़ में किराये की कोठियों और अस्थायी तम्बुओं से राष्ट्रीयता, मानवता, सहिष्णुता और आजादी के जज़्बे का पाठ देती रही और फिर कुछ आर्थिक व प्रशासनिक कारणों से 1925 में दिल्ली स्थानांतरित कर दी गयी। आर्थिक तंगी स्थापना के पहले दिन से ही जामिया के मुक़द्दर में रही। कुदरत ने भी जामिया के स्थापकों की परीक्षा लेने में कभी गुरेज नहीं किया। लेकिन जामिया की खुश किस्मती ये रही कि इतिहास के हर नाजुक मोड़ पर जामिया को एैसे सब्र व शुक्र करने वालों की टीम मिलती रही जिनकी कलंदरी और बोरिया नशीनी देख कर कुदरत को भी प्यार आता था। वो जितनी ज़्यादा मुसीबतों का शिकार होते उतना ही ज्यादा मेहनत और हिम्मत के साथ अपने काम में लग जाते।

    अलीगढ़ से दिल्ली स्थानांतरण भी जामिया को मुशकिलों से नजात ना दिला पाई। अभी जामिया अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश में लगी थी कि 1928 में हकीम अजमल खान का देहांत हो गया। हकीम साहब का देहांत जामिया के लिये किसी बड़ी त्रासदी से कम ना था। आर्थिक मुशकिलों का पहाड़ था जो टूट पड़ा था। हकीम साहब जामिया के औपचारिक कूलपति मात्र नहीं थे, बल्कि जामिया उनकी जिंदगी का मकसद थी जिसे सालों उन्होंने अपने जिगर के खून से सींचा था। जब आर्थिक तंगी का शिकार जामिया बंद होने के कगार पर पहुंच जाता तब हकीम साहब एक बेल आऊट पैकेज के साथ सामने आ जाते। वह ना सिर्फ़ अपने निजी पैसों से जामिया की मदद करते बल्कि देश के विभिन्न दूरदराज़ क्षेत्रों का दौरा करके जामिया के लिये फंड इकठ्ठा करते। कुदरत एक बार फिर जामिया के चाहने वालों की परीक्षा ले रही थी, लेकिन ये महान हस्तियां कब झुकने और डगमगाने वाली थीं सो इस परीक्षा में भी खरी उतरीं। डाक्टर जाकिर हुसैन, डाक्टर आबिद हुसैन और प्रोफ़ेसर मोहम्मद मुजीब साहब उन दिनों जर्मनी से अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद भारत वापिस आ चुके थे। जामिया की जिम्मेदारी अब इन्हीं तीन लोगों के कांधों पर आ पड़ी। एक एतिहासिक फैसला ले लिया गया। “अंजुमन तालीम ए मिल्ली” की स्थापना की गयी और उससे जुड़े लोगों ने ये प्रण लिया कि जामिया को बंद नहीं होने देंगें, 20 सालों तक जामिया नहीं छोड़ेंगें और 150 रूपये मासिक से ज़्यादा तनख्वाह नहीं लेंगें। इन तमाम मोड़ पर जामिया के जिम्मेदारों को गांधी जी की रहनुमाई और संरक्षण हासिल रही। गांधी जी किसी भी कीमत पर जामिया को बंद करने के हक़ में नहीं थे। जामिया गांधी जी के सपनों की ताबीर थी और उन्होंने जामिया से बहूत सारी उम्मीदें जोड़ रखी थीं। वो ना सिर्फ़ इस शैक्षिक संस्थान के वैचारिक स्थापक थे बल्कि सारी उम्र जामिया की जरूरतों का इहसास करते रहे।

    इतिहास के काँटेदार पथ से गुज़रती हुई जामिया आज एक भव्य राष्ट्रीय विश्वविद्धालय का रूप धारण कर चुकी है। तंगी और संसाधनों की क़िल्लत की वो यादें अब सिर्फ़ इतिहास की किताबों में महफूज हैं। बेरंग शेरवानियों और पेवंद लगे पायजामों की जगह अब बेहतरीन वस्त्रों और बरानडेड जूतों ने ले ली है। जामिया के अध्यापक और स्टाफ़ अब देश के किसी भी शैक्षिक संस्थान से बढ़कर या बराबर तनख्वाह पाते हैं। लेकिन देखना ये होगा कि इस परिवर्तन ने जामिया को कहीं उसके वजूद के मकसद से भटका तो नहीं दिया है? क्या हम अपने बच्चों के चरित्र निर्माण करके और उन्हें मानसिक प्रशिक्षण दे कर देश व कौम की वही सेवा अंजाम दे रहे हैं जो जामिया के स्थापकों का सपना था? इंसानी मूल्यों का वही उच्च गुणवत्ता आज भी कायम है जो जामिया की विशेषता थी? त्याग व बलिदान की वही मिसालें आज भी दी जाती हैं जो कभी जामिया का सरमाया हुआ करता था? फूलों की भीनी भीनी खुशबुओं से उठते हुए हवा के ख़ुशगवार झोंके क्या आज भी एक नयी सुबह का संदेश देते हैं? या फिर जामिया का शानदार अतीत इसके हाल को मूंह चिढ़ा रहा है? जामिया के कूलपति, छात्रों और सभी जिम्मेदारों को इन सवालों के जवाब ढूंढना इस स्थापना दिवस पर जामिया के अस्थापकों को बड़ी श्रद्धांजलि होगी।
    (लेखक जामिया मिल्लिया इस्लामिया छात्र संघ के पूर्व उपाध्यक्ष और इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर, नई दिल्ली की मिडल ईस्ट शाखा के संयोजक हैं.)

    मुर्शीद कमाल लेखक।

  • गुटों में बंट कर नहीं संगठित होकर शिक्षा के क्षेत्र में कार्य करें – शकील मोइन , मोतिहारी में सर सैयद डे का आयोजन ,

    ए०एम०यू० ओल्ड बॉयज एसोसिएशन, पूर्वी चंपारण के तत्वावधान में  सर सैयद दिवस समारोह का आयोजन ,

    अलीगढ़ का तराना पढ़ती छात्राएं , साथ में ओल्ड बॉयज एसुशियेशन के सदस्य

    मोतिहारी ( फजलुल मोबीन )

    ए०एम०यू०ओल्ड बॉयज एसोसिएशन, पूर्वी चंपारण के तत्वावधान में मदरसा अंजुमन इस्लामिया,मोतिहारी में सर सैयद दिवस समारोह का आयोजन किया गया जिसकी अध्यक्षता एसोसिएशन के अध्यक्ष हॄदय रोग विशेषज्ञ डॉ०तबरेज आलम और संचालन सैयद साजिद हुसैन ने किया।

     

    समारोह की शुरुआत कलाम पाक की तिलावत से हुई। जबकि मुहिब्बुल हक खान के पुत्र द्वारा नात शरीफ सुना गया ।

    संबोधन करते मुहीब्बुल हक खान

    समारोह में बतौर मुख्य अतिथि वरीय अलीग अपर जिला एवं सत्र न्यायाधीश,बेतिया सगीर आलम ने अपने उद्बोधन में कहा कि आज का समय शिक्षा के महत्व पर विचार करने का नहीं है।आज दुनिया चांद और मंगल के नये अभियान पर है ।ऐसे में अगर हम शिक्षा के महत्व पर पारंपरिक रूप में भाषण कर के समय बर्बाद करेंगे तो फिर शिक्षा कब हासिल करेंगे।उन्होंने कहा कि दुनिया में कोई चीज स्थायी नहीं है स्थायी सिर्फ परिवर्तन है।इसलिए समय की मांग के अनुसार हमें परिवर्तनकामी होना पड़ेगा।
    बतौर विशिष्ट अतिथि प्रख्यात मंच संचालक और शायर डॉ०शकील अहमद मोईन ने कहा कि आज का समय फिरकों और गिरोहों में बंटने का नहीं है बल्कि संगठित हो कर अच्छा कुछ बनाने का है।सर सैयद अहमद खान ने अपना लक्ष्य तय किया और आलोचनाओं की परवाह किये बिना सब को साथ लेकर चलने के जज्बे के साथ तालीम की जो तहरीक शुरू की उसे मंजिल की गोद में ला कर डाल दिया।हम फिरकों में बंटे हैं और हमारी नस्ल सड़क के किनारे पैंकचर बना रही है,सड़क के किनारे टोपी पहने कर मुर्गे काट रही है,होटलों में बर्तन साफ कर रही है।

     

    प्रोग्राम के अध्यक्ष , हृदय रोग विशेषज्ञ डॉ मोहम्मद तबरेज आलम संबोधन करते हुए ।

    पूर्व विभागाध्यक्ष,उर्दू विभाग बिहार विश्वविद्यालय, मुजफ्फरपुर फारूक अहमद सिद्दीकी ने कहा कि 2 सौ साल के लंम्बे समय में सर सैयद अहमद खान जैसा कौम का कायद पैदा नहीं हुआ।सर सैयद एक विद्वान,एक महान शिक्षाविद,एक फिलॉस्फर और कौम के सच्चे दर्दमंद थे।

    अतिथियों का स्वागत करते गुलरेज शहजाद

    वहीं भोजपूरी एवं हिन्दी जगत के सुप्रसिद्ध कवि गुलरेज शहजाद ने कहा कि : सर सैयद के शहजादे सिर्फ चर्बज़बानी से अपना काम चला रहे हैं।मैदाने अमल में उनकी कारकर्दगी सिफर है।ज़रूरत इस बात की है कि अलीग बिरादरी के लोग जहां हैं वहीं मैदाने अमल में उतर कर सर सैयद का कर्ज अदा करें।
    उक्त अवसर पर विभागाध्यक्ष प्रोफेसर एकबाल हुसैन अंग्रेजी विभाग,मुंशी सिंह महाविद्यालय मोतिहारी ने आए अतिथियों का अभिनंदन किया और स्वागत भाषण भी किया ।

    प्रोफेसर एकबाल हुसैन आए अतिथियों का आभार व्यक्त करते हुए

    जबकि सर सैयद वेलफेयर सोसायटी के अध्यक्ष मोहिब्बुल हक खान ने भी अपने विचार व्यक्त किये।
    सर सैयद दिवस समारोह के अवसर पर स्कूली बच्चे-बच्चियों के बीच सर सैयद अहमद खान के व्यक्तित्व और कृतित्व पर भाषण प्रतियोगिता का भी आयोजन किया गया। जिसमें प्रथम स्थान प्राप्त करने वाले हंजला फरीदी को सर्टिफिकेट और मेडल देकर सम्मानित किया गया ।
    सर सैयद दिवस समारोह का समापन प्रसिद्ध अलीगढ़ तराना से हुआ।जिसे अलहम्द पब्लिक स्कूल की छात्राओं ने तैयार किया था।

     

    प्रोग्राम में उमड़ी भीड़

    उक्त अवसर पर कैप्टन अब्दुल हमीद , वसील अहमद खान , पत्रकार ओजैर अंजुम, पत्रकार इंतज़ार उल हक, डॉ जमाल अख्तर, डॉ सीताब हसन, डॉ। फिरोज आलम, तारिक अनवर चंपारानी, ​​सबा अख्तर शोख , नासिर वसीम कौसर, डॉ कासिम अंसारी, माउंट सेना अकेडमी के निदेशक अनिसुर रहमान  कारी अरशद, उजैर सालिम, अनवर कमाल सहित ए०एम०यू०ओल्ड बॉयज एसोसिएशन, पूर्वी चंपारण के सदस्यों के अतिरिक्त शहर के बुद्धिजीवी और आम लोग बड़ी संख्या में उपस्थित थे।

  • दिल्ली:ओखला में एक संगठन किया गया स्थापित,ये गरीब और वंचित तबके के बच्चो को नि:शुल्क शिक्षा प्रदान करती है:शौकत नोमान

    यहां हर कोई अपनी ज़िंदगी के भाग दौड़ में खुद को आगे भगाने में लगा है।
    ऐसे कुछ ही व्यक्ति है जो गरीब और निचले तबके के बच्चो की शिक्षा या उसकी ज़िदंगी के लिए सोचता हो। आज भी हमारे भारत देश की एक बड़ी आबादी शिक्षा से वंचित है। कंप्यूटर के ज्ञान से लेकर अंग्रेजी तक उन्हें कुछ नहीं पता होता है।
    वहीं पेशे से वकील एच आर खान ने गरीब बच्चो को शिक्षा प्रदान कराने का जिम्मा उठाया है। वो इन बच्चो के लिए जो कुछ भी सम्भव हो वो करते है। वो एक अच्छे समाज सेवी के रूप में जाने जाते है।

    वो समाज सेवा करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ते।
    ओखला जमिया नगर के शाहीन बाग़ में एक नॉन प्रॉफिट तंजीम “एजुकेशन_फॉर_यूथ” ये जरूरतमंद और निचले तबके के बच्चो के लिए नि:शुल्क शिक्षा प्रदान करता है।
    खान का कहना है इस दौर मै शिक्षा की अहमियत उन इक्छुक बच्चो से जानना चाहिए जो तालीम हासिल करना चाहते है लेकिन पैसों के अभाव में महरूम रह जाते है।
    उनके संगठन “एजुकेशन_फॉर_यूथ” इस बात से काफ़ी प्रतिबद्ध है के गरीब बच्चो की शिक्षा और उन्हें सही मार्ग दिखाना ही हमारा फर्ज है, इन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देनी है।
    इसकी शुरुआत 2016 में हुई थी और ये संस्था अलग अलग कई इलाक़ो में काम कर रही है, अब फरवरी 2019 से शाहीन बाग़ में काम शुरू किया है।

    इसकी शुरुआत एच आर खान और उनकी टीम ने की है।
    उन्होंने बताया, शुरुवाती वक़्त कुछ दिकते आईं, अब धीरे धीरे सब ठीक होता चला गया।
    इस काम के लिए उन्हें पैसों की भी जरूरत पड़ी।
    वो और उनके साथी आपसी कॉन्ट्रिब्यूशन से ये सब काम करते हैं, अब अगर आप चाहें तो इनकी मदद कर सकते हैं।

    इस संस्था में बच्चो को मुफ्त बेसिक कंप्यूटर क्लास तथा इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स कराई जा रही है,
    अगर आपकी नजर में भी ऐसे कोई बच्चा हो तो आप यहां भेजें।

    साथ ही “एजुकेशन_फॉर_यूथ” की तरफ से लाइब्रेरी भी शुरू किया जाएगा जिसकी तैयारी चल रही है, अगर आप फ़्री लाइब्रेरी ज्वाइन करना चाहे तो कर सकते है।
    लाइब्रेरी की ओपनिंग तिथि जल्दी ही साझा किया जाएगा।

    अगर आप इस मुहिम हिस्सा बना चाहते है तो संपर्क कर सकते है।
    मो.-7065630009
    वेब लिंक-http://educationforyouth.in