Category: लेख, विचार

  • अंतिम चरण तक यह कोशिश जारी रहे

    (नजरिया:डॉक्टर मोहम्मद मंजूर आलम)
    आम चुनाव लगभग पूर्ण होने वाला है छ: चरणों के चुनाव हो चुके हैं अंतिम चरण की पोलिंग 19 मई को बाकी रह गई है इसके बाद 23 मई को परिणाम हमारे सामने होगा परिणाम कैसा होगा किसकी हार और किसकी जीत होगी हिंदुस्तान को एक नई सरकार मिलेगी या पुराने लोग ही सत्ता में बरकरार रहेंगे इस हवाले से 23 मई को सब कुछ साफ हो जाएगा तजुर्बे और सर्वे लगातार आ रहे हैं अपने अपने एतबार से सभी बता रहे हैं कि 23 मई को क्या होगा?
    देश को तहसील सरकार मिलेगी सरकार की गठन में किन लोगों का रोल होगा ? उन सबके बीच अभी आखिरी चरणों का चुनाव बाकी है जिस पर ध्यान केंद्र करने की जरूरत है और एक बार फिर जा जा जा लेना और जानना जरूरी है कि 5 साल कैसा रहा क्या 5 साल हिंदुस्तान समेत दुनिया भर में मुद्दा बहस बना रहा इन 5 सालों में ऐसा क्या हुआ कि देश समेत पूरे दुनिया में हिंदुस्तान की चिंताएं बढ़ गई है

    पिछले 5 सालों के दौरान पूरे देश में खौफ,दहशत और नफरत का माहौल हावी रहा ऐसे माहौल की सरकार सरबराहों की तरफ से हौसला अफजाई की गई नफरत पसंद और दहशतगर्दी की हौसला अफजाई की गई सरकारी सतह पर सिद्दत पसंद अनासिर की पस्त पनाही हुई देश में लॉ एंड ऑर्डर का मजाक रहा जिसकी लाठी उसकी भैंस वाली सरकार देखने को मिली

    मुसलमानों,दलितों ,आदिवासियों और कमजोरों का सरेआम कत्ल किया गया इन्हें मारा गया कभी किसी चीज का बहाना बनाकर और कभी बगैर किसी बहाना के भीड़ ने कत्ल कर दिया क्राइम की खुद ही वीडियो बनाई और उसे सोशल मीडिया पर अपलोड कर के सबूत पेश किया कि हमने ऐसा किया है लेकिन इसके बावजूद अफसर और सरकार के कानों पर जूं तक नहीं रेंगी और इसके रोकथाम के लिए कोई ध्यान नहीं दि गई

    देश ने किसानों पर हमला हुआ उनके मामले हल करने पर कोई ध्यान नहीं दी गई कुछ खास मालदारों, व्यवसायियों, और कारपोरेट घराने के लिए खजाना की पूरी तिजोरी खोल दिए गई उनकी बिजनेस को अधिक फायदा देने के लिए सरकार ने अनुबंध परिवर्तन कर दिया नोटबंदी जीएसटी समेत कई महत्वपूर्ण फैसला लिया लेकिन गरीब किसानों की भलाई बेहतरी और कामयाबी के लिए ऐसा कोई कदम नहीं उठाया मजबूर होकर जब देशभर के किसानों ने विरोध शुरू किया अपना हक लेने के लिए धरना दिया तो सरकार ने उन पर लाठियां बरसाई इन्हें खौफजदा करके देख बेबसी और मजबूरी के आलम में रहने पर ही मजबूर कर दिया

    हिंदुस्तान के इतिहास का यह पहला मौका है जब संवैधानिक संस्थान गंभीर संकट से दो-चार हुए है सुप्रीम कोर्ट और न्यायालय के अन्य संस्थान की आजादी खतरे में है सुप्रीम कोर्ट इसका इजहार कर चुका है न्यालय पर दबाव की कई शिकायतें भी सामने आ चुकी है सरकार न्यायालय की आजादी छीन कर रही है इसे अपनी मर्जी के मुताबिक फैसला करने पर मजबूर कर रही है सीबीआई वर्सेस सीबीआई की लड़ाई का मंजर भी हिंदुस्तान ने इन 5 सालों में देख लिया सीबीआई के नंबर वन और नंबर 2 डायरेक्टर ने एक दूसरे पर रिश्वतखोरी का इल्जाम लगाया और फिर सरकार ने सब खून मारकर एक ईमानदार अफसर को हटा करके अपनी मर्जी का फैसला लागू कर दिया आरबीआई की आजादी छीनने की कोशिश हुई और इसके निजाम में मोदी सरकार ने पूर्ण हस्तक्षेप की इलेक्शन कमिशन एक आजाद संस्था है लेकिन यहां भी मामला साफ नहीं है सरकारी दबाव उन पर डाला जा रहा है ऐसा लग रहा है कि इलेक्शन कमिशन बीजेपी की बी टीम बन कर उसे फायदा पहुंचाने का काम कर रही है चुनाव की तारीखों का जिस तरह ऐलान हुआ उसने वजह कर दिया कि किसी पार्टी का दबाव है या फिर उसे फायदा पहुंचाने की कोशिश है फर्ज का इस्तेमाल भी मोदी सरकार ने अपने सियासी फायदा के लिए करके दुनिया भर में हिंदुस्तान का सर झुका दिया है सभी देश की एक आर्मी होती है ढोढर की हिफाजत सुरक्षा और विदेशी हमलों से यही फौज हमें बचाती है इसे अपने कर्तव्य और जिम्मेदारियों का बखूबी इल्म होता है हिंदुस्तान की फौज सभी दिन से अपना कर्तव्य बखूबी निभा रही है और देश की तरफ उठने वाली हर एक गंदी आंख का हमारे नौजवान ने सख्त जवाब दिया है लेकिन 2019 में नरेंद्र मोदी साहब फौज की बहादुरी कोडी अपनी कामयाबी गिनाते हुए कहने लगे कि हमारी वजह से हुआ या फौज और उनके अधिकार की तोहीन है कर्तव्य पर सवालिया निशान लगाने के बराबर है पिछले 5 सालों में ऐसे मामलों की लंबी सूची है जिसमें सरकार ने देश के संवैधानिक और निजी संस्थानों पर हमला किया है

    इन्हें संविधान में प्राप्त सभी अधिकार और हक के मुताबिक काम करने से रोका गया है आर्थिक एतबार से देश कंगाल हो गया है जीडीपी की स्तर में कमी आ चुकी है रोजगार का अधिक संकट है शिक्षा बजट कम हो चुका है महंगाई आसमान छूने लगी है रेलवे का किराया जरूर बड़ा है लेकिन सहूलियत नहीं है महिलाएं सुरक्षित है महिलाएं और बच्चों के साथ क्राइम के मामले में वृद्धि हुई है कतली कथा गुंडागिरी बड़ी है और हिंदुस्तान की दुनिया के सामने या तस्वीर बन गई है कि हिंदुस्तान महिलाओं के लिए एक असुरक्षित देश है अल्पसंख्यकों को यहां बुनियादी हक हासिल नहीं है मुसलमानों दलितों आदिवासियों और ईसाइयों और अन्य अल्पसंख्यकों के साथ बुरा बर्ताव किया जाता है इन्हें तरह-तरह से परेशान किया जाता है संविधान और कानून नाम की कोई चीज नहीं पाई जाती है लॉ एंड ऑर्डर नहीं है ऐसे हालात देश में पहली बार पैदा हुए और इसी कारण से देश के लोगों में बीजेपी की वर्तमान सरकार के खिलाफ गम तथा गुस्सा और नाराजगी है

    बीजेपी की सरकार इससे पहले भी हिंदुस्तान में रह चुकी है अटल बिहारी वाजपेई प्रधानमंत्री के पद पर रह चुके हैं लेकिन दोनों में जमीन आसमान का फर्क है बीजेपी सरकार में जो अटल बिहारी वाजपेई प्रधानमंत्री थे तो लोगों ने संविधान के तय बेचैनी नहीं थी देश के दस्तूर और संविधान पर लोगों का भरोसा बरकरार था उन्हें इस बात का भरोसा था कि न्यायालय आजाद है इलेक्शन कमिशन किसी का तरफदार नहीं है सीबीआई और इस तरह के अन्य एजेंसियां सरकारी दबाव से सुरक्षित है देश में कानून का राज है लॉ एंड ऑर्डर बरकरार है इन दोनों खौफ और दहशत का मामला भी नहीं था हर तरह के खौफ और जुल्म ज्यादती से आजाद होकर लोग अपने
    जीवन जी रहे थे वाजपेई के जमाने में जो लोग सरकार चला रहे थे उन्हें भी देश के दस्तूर पर भरोसा था वह बाबा अंबेडकर के नेतृत्व में गठन पाने वाले संविधान के मुताबिक ही सरकार चलाना चाहते थे लेकिन बीजेपी की वर्तमान सरकार में इस तरह की कोई खूबी अब नहीं पाई जाती है यहां दस्तूर पर बिल्कुल भरोसा नहीं है संवैधानिक संस्थानों की खुद महतारी पर हमला प्रथम एजेंडा है मुसलमानों दलितों आदिवासियों और अन्य अल्पसंख्यकों को बुनियादी हक से महरूम करना और मनुस्मृति को लागू करना बुनियादी मकसद बना हुआ है जिससे लोगों मे अधिक बेचैनी है बेकरारी है और चिंताजनक है

    देश की यह शमा की सूरत हाल है जिसकी तब्दीली जरूरी है संविधान तीन नियम और दस्तूर पर भरोसा करने वालों के हाथों में देश देश की सत्ता स्थानांतरित होना देश की विकास और सुरक्षा का साक्षी है अब तक व्रत चुनाव से जो परिणाम सामने आ रहे हैं इससे यही मालूम हो रहा है कि लोगों ने बहुत सोच-समझकर वोटिंग की है चुनाव के दौरान एक एहसास और अच्छे नागरिक होने का सबूत पेश किया है अपने हक के लिए मतदान किया है अब अंतिम चयन बाकी रह गया है जिसमें 59 सीटों पर पोलिंग है उम्मीद नहीं है कि अन्य छह चरणों की तरह इस अंतिम चरण में भी लोग संवेदनशीलता का सबूत पेश करेंगे 6 चरणों की प्राइस और अंतिम चरण में भी पिछले 5 सालों में पेश आने वाले मामला यह अनुवाद दिमाग में तरोताजा रहेंगे सोच समझ कर मजबूत सुरक्षित और विकसित हिंदुस्तान के लिए अपने मतदान का प्रयोग करेंगे

    पहली बार मतदान का प्रयोग करने वाले इस अवसर पर ज्यादा से ज्यादा फायदा उठाएं अच्छा भविष्य सफल जिंदगी और विकसित देश का सपना हच करने के लिए वोट दें क्योंकि लोकतंत्र में वोट से ही देश समाज और हालात की तस्वीर बदलती है वोट ही समाज की कामयाबी की राहें हम वार करता है उसे चरणो में जिस तरह बहुत सोच समझकर आप अपना वोट दिया है इसी होशियारी जिम्मेदारी बेदारी और पूरी संवेदनशीलता के साथ अंतिम चरणों के चुनाव में भी अपना वोट दें लोकतान्त्रिक सेकुलरिज्म और संविधान का पालन करने वाले को सत्ता तक पहुंचाएं उन लोगों को सबक सिखाएं जिन्होंने संविधान की धज्जियां उड़ाई है दस्तूर की धज्जियां उड़ाई है देश के अमन चैन को नुकसान पहुंचाया है बेगुनाहों मासूम गरीबों कमजोर और महिलाओं पर जुल्म सितम किया है अंतिम चरण के चुनाव में कुछ असामाजिक तत्व हिंसा भड़काने के कोशिश में है देश के अमन को नुकसान पहुंचा करवा एक तरह का राजनीतिक फायदा हासिल करना चाहते हैं लेकिन आप होशियार रहें हिंसा और संप्रदायिकता से बचे ऐसी राजनीति करने वालों से अपना संबंध खत्म करें अमन बच्चन की बहाली में अपना किरदार अदा करें सेकुलर पार्टियों के जीत हासिल करने वाले उम्मीदवारों को कामयाब बनाएं सेक्युलर और हमदर्द सरकार के चुनाव के लिए 11 अप्रैल से जो सिलसिला शुरू हुआ है 19 मई को इसका शानदार अंत करें, हकदार,अमन पसंद, हमदर्द और सक्रिय नेता को अपना वोट देकर पार्लियामेंट पहुंचाएं

    (लेखक:प्रसिद्ध स्कॉलर और ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल के जनरल सेक्रेटरी हैं)

  • रमज़ान और आत्मनिरिक्षण रूह

    डॉक्टर मोहम्मद मंजूर आलम

    रमजान उल मुबारक रहमतों मगफिरतों और आतिश जहन्नम से निजात हासिल करने का महीना है-यह गम गसारी हमदर्दी,जान निसारी और खर्च करने का महीना है इस माह मुबारक मे हमें एक दूसरे का गम और दुख बांट लेना चाहिए माह रमजान में हमें अपने आमाल का आत्मनिरीक्षण करना चाहिए और गौर करना चाहिए कि दुनिया ए इस्लाम की मौजूदा बेबसी और जिल्लत का सबब क्या है हमें अपने उन मुसलमान भाइयों की जरूरियात का भी ख्याल रखना चाहिए जो तंग दस्ती का शिकार है
    रमजान उल मुबारक की खुसूसियत इस की फजीलत और अजमत की एक लंबी सूची है लेकिन इसमें महत्वपूर्ण स्वंय आत्म निरीक्षण है माह मुबारक मुसलमानों को अपने आमाल की आत्मनिरीक्षण की हिदायत करता है क्योंकि आत्मनिरीक्षण खुद इबादत के लिए मेहनत ज्यादा से ज्यादा नेकियों की प्राप्ति अल्लाह ताला की तौफीक से की जाने वाली नेकियों पर स्थायीकरण अमल की तौफीक और नेकियों को बर्बाद करने वाले आमाल से बचे दुनिया तथा आखिरत मे वही सआदत मंदी और कामयाबी की रौशन अलामत है फरमान बारी ताला है अनुवाद:

    और जो व्यक्ति अपने रब के सामने खड़ा होने से डर गया और जो खुद को इच्छाओं से रोका [ 40] तो बेशक जन्नत ही उसका ठिकाना होगा [सुरह अल नाजआत:40:41]

    ऐसे ही अल्लाह ताला ने जन्नत के बारे में फरमाया और वह आपस में एक दूसरे की तरफ आकर्षित होकर सवाल करते हुए [25] कहेंगे: इससे पहले हम अपने घर वालों ने दहक कर रहा करते थे [ 26] फिर अल्लाह ने हम पर एहसान किया और हमें तपती लू के अजाब से बचा लिया [ सुरह अल तूर :25-27 ]

    एक जगह और अल्लाह ताला का फरमान है और हर व्यक्ति को यह देखना चाहिए कि उसने कल के लिए क्या पेश किया है [ अल हशर:18 ]

    इमाम इब्ने कसीर इसकी तफसीर में कहते हैं तुम खुद अपना आत्म निरीक्षण कर लो इससे पहले के तुम्हारा आत्मनिरिक्षण किया जाए यह देख लो के तुमने अपने लिए कितने नेक अमल किए हैं जो रोज कयामत तुम्हारे लिए फायदेमंद हो और तुम इन्हें अपने रब के सामने पेश कर सको

    रसूल अल्लाह सल्लल्लाहो वसल्लम का फरमान है ( अकल मंदी वह है जो अपना आत्म निरीक्षण करें और मौत के बाद के लिए तैयारी करें और वह व्यक्ति परेशान है जो चले तो स्वभाविक इच्छाओं के पीछे लेकिन उम्मीद अल्लाह से लगाए) यह हदीस हसन है

    एक मुसलमान चाहे मर्द हो या औरत जब तक अपना बेलाग एहतसाब नहीं करता है उनके अनुकूलन के अवसर सामने नहीं आते कमी कहां है? खता क्या है? गुनाह क्या है? और इनमें हमारा आत्म निरीक्षण कितना आलूदा है? यह सब लोगों की नजरों से ओझल रहता है सगीरह , कबीरह,जाहरी,बातनी,जाने आन , जाने किए गए गुनाहों की माफी मांग तो लेते है लेकिन इस जुमले की रूह से नाबल्द होते है – कोई नदामत का जज्बा इस जुमले के साथ नहीं होता , हवाई बातें और जबान की वर्जिश के सिवा कुछ नहीं होता ना दिल की दुनिया में शर्मिंदगी का ज्वार भाटा उठता है और न आंखों से जवाब दही की खौफ की बरखा तो क्या बरसनी नमी तक नहीं आती इसकी वजह यह है कि अपनी खताओं पर नजर ही नहीं होती आत्मनिरीक्षण तसल्ली देता है कि हमने ना कोई कत्ल किया है ना डाका डाला है ना बलात्कार किया है और ना ही देश व कौम से गद्दारी की है हम एक अल्लाह को मानते हैं इसके महबूब नबी करीम सल्लल्लाहू अलेही वसल्लम को आखिरी नबी मानते हैं कुरान की तिलावत करते हैं रमजान अल मुबारक के महीने में रोजा रखते हैं हज उमराह करते हैं जकात अदा करते हैं बिनावर यह सब आमाल करने के बावजूद हम माफी भी मांगते है

    निश्चित यह सब एक मुसलमान की सफात है और जन्नत ऐसे मुसलमान के लिए वाजिब है मगर क्या हम हुकूक अल्लाह,हुकूक अलअबाद की अदायगी में गुणवत्ता का भी ख्याल रखते हैं कहीं ऐसा तो नहीं कि नेकी के मामले में कमतर गुनणवत्ता पर राजी होने की आदत में मुब्तिला है और दुनिया की इच्छाओं के लिए गुणवत्ता आला तरीन है क्या यह याद रहता है कि अल्लाह बंदा से यह सवाल करेगा कि तुझे हर मुमकिन वसायुक्त या रात चलाते और मोहलत दिए गए थे इसके हिसाब से क्या करके आए हो जो कमा के लाए हो वह अलग बात है यह देखा जाएगा कि क्या कुछ कर सकते थे वह क्यों नहीं किया

    नी जान इसीलिए रखी जाएगी के दुनिया की चाहत के तलवे में वजन ज्यादा है या फिर आंखों की चाहत में वजन ज्यादा है दिल की सच्ची और 3 चाहत पर ही आमाल की दरगाह बंदी की जाएगी चुनांचे अल्लाह ताला ने मोमिनो को तलकीन की:
    ए मोमिनो अल्लाह का तक्वा अपनाओ और हर आप निरीक्षण यह जायजा लेते रहे कि वह अपने कल आखिरत के लिए क्या जमा कर रहा है बेशक अल्लाह तुम्हारे हर अमरीकी खबर रखता है (कि वह अम्ल कितना गुणवत्ता पूर्ण है)”(अल हशर 18)

    और अगर मॉर्निंग इस गुणवत्ता का जायजा लेने से लाभ होता है तो तू जतन या मामला सामने आता है और शासित और मॉर्निंग अभी बराबर नहीं हो सकते जैसे आप जन्नत और जहन्नम बराबर नहीं हो सकते (अल हशर) जन्नत में शामिल होने के लिए आज और अभी अपना ऐहतसाब करना होगा और अपने कल के लिए गुणवत्तापूर्ण नेकियां करनी होगी

    आत्म निरीक्षण बेहतरीन से बेहतरीन का सफर बे टारगेट मंजिल या नसब अल ऐन को पूरा करने के लिए कोशिश करते हुए जो कमी कोताही हो जाए इसका हर समय तदारक करना जरूरी है जो गलती हो जाए उसको आगे बढ़ने से पहले सही कर लेना है बाकी जब मालिक के सामने काम की रिपोर्ट पेश करने हाजिर हो तो मालिक खुश हो जाए और इसको कुरानी जबान में तकवा अपनाना कहते हैं यहां तो मालिक रब कायनात है और इसकी हजूर पेसी कसी लम्हे भी अनुमान है और उसकी निगाहों से किसी समय भी हम और हमारे आमाल ओझल नहीं हो सकते उस रब की अजमत का एहसास इसकी जात की पहचान रब की रहमत का इरफान जिस कदर दिल में जाग जाएगा उसी कदर मोमिन का ईमान ताजा और मजबूत होगा

    भूत वर्तमान और भविष्य के बारे में आत्म निरीक्षण खुद इस तरह होगा तो इंसान हर प्रकार के गुनाहों से तौबा कर ले नेकियों को बर्बाद करने वाले आमाल से बचे और ज्यादा से ज्यादा खैर व भलाई का काम करें जबकि बदबख्त जिल्लत और रुसवाई और हराम कामों के अरतकाब मैं है ऐसे ही नेकियां तर्क करने या नेकियों को तबाह करने वाले आमाल भी जिल्लत व रुसवाई का कारण बनते हैं नुकसान के लिए इंसान को इतना ही काफी है कि नेकियों का शवाब कम करने वाली हरकत कर बैठे

    मुसलमान अपने अंदर ईमान कामिल पैदा करें सिर्क आमेच से सुरक्षित रहें अकीदा सही रखे हजूर अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की सीरत तैबा को मशअल बनाए सुन्नत रसूल को जिंदगी का हिस्सा बनाएं और इस्लाम पर मजबूती के साथ कायम रहे इबादत के साथ सियासत समाजवाद शिक्षा और अन्य सामाजिकता कामों में भी अपनी कुताहियों कमियों का जाएजा ले और बेहतर की तलाश करें

    रमजान मुबारक की एक विशेषता यह भी है कि इस मुबारक मे कुरान करीम नाजिल हुआ यह उम्मत मुसलमा के लिए हिदायत व रहमत वाली और हर आदमी के लिए विशेष नेमत है यह नेमत खुशहाल जिंदगी की भी जामन है रोजों के महीने में कुरान करीम का नाजिल खैर व बरकत और सआदत मंद जिंदगी का नुक्ता आगाज और आखिरत में बुलंद दर्जा पाकर कामयाबी हासिल करने का राज है कुरआन करीम से रोशनी मिलती है और अंधेरे छूट जाते हैं कुरान करीम अज्ञान और गुमराही का खात्मा करता है अल्लाह ताला का फरमान है

    और इसी तरह हमने हुक्म से आपकी तरह वहीं की इससे पहले आप यह नहीं जानते थे कि किताब क्या चीज है और इमान क्या होता है लेकिन हमने इस रूह को एक रोशनी बना दिया हम अपने बंदे में से जिसे चाहे उसे रोशनी से राह दिखा देते हैं और आप सीधी राह एक तरफ रहनुमाई कर रहे हैं -[ अल शूर ?:52]

    चुनांचे इस उम्मत के पहले या बाद मे आने वाले लोगों में से जो भी कुरान मजीद पर ईमान लाया तो उसने कुरान करीम की लगभग और पूर्ण नेमत का शुक्रिया भी अदा कर दिया नीज व्यक्तिगत तौर पर मिलने वाली नेमत का भी शुक्र अदा कर दिया है जबकि कुरान पर ईमान ना लाने वाला तमाम नेमतों की नि शुक्री करता है और जहन्नम में भी हमेशा रहेगा अल्लाह ताला का फरमान है इस दुनिया में से कोई भी उसका इंकार करेगा तो आग उस का ठिकाना है-[ सुरह हूद 17 ]

    स्पष्टीकरण कलाम यह के रमजान में अपने ,आमाल किरदार ,अखलाक और समग्र सूरत हाल का आत्मनिरीक्षण जरूरी है यह महीना इबादत सब गुजारी, तिलावत कुरान, जिक्र वजकार और अल्लाह की रजा हासिल करने वाले आमाल के साथ आत्म निरीक्षण के लिए बेहतरीन अवसर है अल्लाह ताला हम सबको अपने आमाल का आत्म निरीक्षण करने और माह मुबारक में ज्यादा से ज्यादा नेक अमल करने की तौफीक अता फरमाए!

    (लेखक:ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल के जनरल सेक्रेटरी हैं)

  • शिवसेना के‘बुर्क़ा बयान’का बुर्क़ा से कोई लेना-देना नहीं है!

    शीबा असलम फ़हमी
    बुर्का पर प्रतिबंध लगाने के शिवसेना के हालिया बयान का आतंकवाद या सुरक्षा से कोई लेना-देना नहीं है। यह सिर्फ़ उनके दक्षिणपंथी निर्वाचन क्षेत्र को बनाए रखने के लिए है और उसे विश्वास दिलाने के लिए है कि एनडीए मुसलमानों को प्रभावी ढंग से विचलित कर रहा है।
    चूंकि उनके 5 साल के कार्यकाल के रिपोर्ट कार्ड में लोगों के सामने रखने के लिए कुछ भी सकारात्मक नहीं है, इसलिए इस चुनाव में नफ़रत और डर फैलाना उनकी एकमात्र बैसाखी है।

    यहां यह ध्यान दिया जाना चाहिए कि बुर्का पहने महिलाओं को सुरक्षा जांच से मुक्त नहीं किया गया है, बुर्क़ा पहने महिलाओं को किसी भी अन्य व्यक्ति की तरह शारीरिक जाँच होती है और ये भी की भारत में किसी भी आतंकवादी घटना में बुर्क़ा का इस्तेमाल कभी नहीं किया गया है।
    जहाँ तक आतंकवाद का सवाल है तो अगर शिवसेना वास्तव में गम्भीर है इसको लेकर तो फिर एनडीए द्वारा आतंकवादआरोपी को क्यों मैदान में उतारा गया है?
    ये भी ध्यान में रखा जाए की कृषि संकट के तहत महाराष्ट्र के मराठी मानुस ख़ुद अपनी ईहलीला समाप्त कर रहे हैं और आत्महत्या में मरनेवाले किसानो की संख्या आतंकवाद में मरनेवालों से कहीं ज़्यादा है महाराष्ट्र में।

    जनता के बीच सुशासन और विकास का कोई कारनामा ना हो तो वातावरण का ध्रुवीकरण शिवसेना का एक मात्र सहारा है। हालत ये है की मोदी सरकार के समर्थक भी आर्थिक बदहाली से त्रस्त हैं, उनको रिझाने के लिए ये नफ़रत और भय का माहौल बनाया जा रहा है।

    बुर्क़ा पर शिवसेना के साथ नहीं आने वाली भाजपा नूरा कुश्ती कर रही है, इन दोनो सहयोगियों की कोशिश ये है की फ़र्ज़ी मुद्दों से मीडिया का समय बर्बाद किया जाए ताकि असली सवाल जैसे नोटेबंदी, कालधान, रोज़गार, पुलवामा में चूक, रफ़ाल का विराट भ्रष्टाचार और भगोड़े मोदी-मित्रों पर देश बात ना करे। कोरपोरेट मीडिया के लिए भी यही सुविधाजनक है की वो अपने मालिकों के भ्रष्टाचार पर पर्दा डाल सके और नक़ली मुद्दों को जनता के सामने परोसती रहे। लोगों के सहज और वास्तविक सवाल पूछने से भारतीय मीडिया पिछले पाँच साल से बच रही है।

    -शीबा असलम फ़हमी

  • हमारी_ज़िंदगी_हमारी_नहीं??

    मोहम्मद वाशीक़:पापुलर फ़्रन्ट दिल्ली

    कारण,तर्क और विज्ञान के साथ उन लोगों को एक जवाब जो कहते हैं “मेरी ज़िंदगी, मेरे तरीके”

    आजकल हम देखते हैं कि अकसर लोग अपनी ज़िंदगी अपने-अपने तरीके से गुज़ार रहे हैं | उन्हें जो अच्छा लगता है वही करते हैं और जो अच्छा नहीं लगता वो नहीं करते | अपनी पसंद-नापसंद, अपनी सोच के अनुसार ही उन्होंने अपने उसूल भी बना लिए हैं | और इसी का नतीजा है कि हमें ऐसा भी देखने को मिलता है कि जो चीज़ कुछ लोगों को नापसंद है या उनकी नज़र में ग़लत है, वही चीज़ कुछ और लोगों के आगे पसंदीदा और जायज़ चीज़ है | जैसे- कुछ लोगों को लगता है सिगरेट, शराब, ड्रग्स वग़ैरह ग़लत है, वहीं कुछ लोग मानते हैं कि सिगरेट ठीक है, शराब और ड्रग्स ग़लत है, वहीं कुछ लोग सिगरेट और शराब को सही मानते हैं मगर ड्रग्स को ग़लत, तो वहीं कुछ लोग कहते हैं कि सब सही है जो दिल करे वो करो |

    पर क्या सच में ज़िंदगी के उसूल ऐसे ही होने चाहिए कि जिसको जो अच्छा लगता हो वो करे?

    अगर ऐसा हुआ तो आपस में तकरार की संभावना बहुत बढ़ जाती है | इसीलिए ज़िंदगी के उसूलों को निश्चित (तय) करना बहुत ज़रूरी है | अब सवाल ये है कि सारे इंसानों के ज़िंदगी के उसूल कौन तय करेगा?

    अगर हम आपस में मिलकर आपसी सहमति से कुछ उसूलों को तय करते हैं और परिभाषित करते हैं कि ऐसा करना सही माना जाएगा और ऐसा करना ग़लत, तो भी आपस में तकरार की कुछ संभावना रहेगी, क्योंकि सभी की सोच के मुताबिक एक उसूल तय करना मुमकिन नहीं | इसका साफ़ उदाहरण हमारे सामने मौजूद है अलग-अलग देशों के अलग-अलग संविधान, लोकतांत्रिक और धर्म-निरपेक्ष उसूल | मगर हमें मालूम है कि वक्त वक्त पर हमें इन उसूलों में भी तबदीली करती रहनी पड़ती है | इसके बावजूद इनमें कमियां रहती हैं | जैसे एक वक्त था जब लोग पॉर्न देखने को नापसंद करते थे, मगर आज समाज का कुछ वर्ग कहता है कि पॉर्न देखना ग़लत नहीं है, ये हमारी सोच पर निर्भर करता है | इसी लिए कानूनी तौर पर भी इसको जायज़ या नाजायज़ ठहराया जाता रहा है | इसी तरह से समलैंगिकता एक वक़्त में ग़लत और अपराध माना जाता था, मगर आज कुछ लोगों का मानना है कि ये आपसी सहमति पर निर्भर है और सही है | इसीलिए इसको भी कानून में तबदीली कर के जायज़ कर दिया गया |

    यही वजह है कि कुछ चीज़ें जो एक देश में जायज़ है और लोग उसको सही मानते हैं वहीं दूसरे देश में वो नाजायज़ और बैन है | इससे साफ़ ज़ाहिर होता है कि जो हम अपनी समझ और बुद्धि से सोचते हैं जो हमें पसंद और ना पसंद होता है ज़रूरी नहीं कि वो सच में सही हो और पूरी इंसानियत के लिए पसंद और नापसंद हो |
    तो अब सवाल ये है कि हमारी ज़िंदगी के उसूल कौन तय करेगा?

    जवाब देने के लिए एक दूसरा सवाल- किसी मशीन के बारे में कौन बता सकता है कि इस मशीन के लिए क्या अच्छा है क्या नुकसानदेह, कैसे ऑप्रेट करने से ये मशीन सही चलेगी और कैसे इसमें ख़राबी आ सकती है | जवाब है – उस मशीन का अविष्कारक या मैनुफ़ैक्चरर | यानि उसको बनाने वाला | ठीक यही बात इंसानों पर भी लागू होती है | इंसान भी एक मशीन है ये बात विज्ञान भी मानता है कि इंसान सबसे उम्दा मशीन है | इसीलिए इंसानों के लिए क्या अच्छा होगा और क्या बुरा ये इंसानों को बनाने वाले से बेहतर कोई और नहीं बता सकता, और उसी बनाने वाले को हम कहते हैं ईश्वर, भगवान, गौड या अल्लाह | अगर हम चाहते हैं कि हमारे बीच समस्याएँ कम से कम हों, या सभी इंसान शांति पूर्वक ज़िंदगी गुज़ारे और सभी को जो भी उसका हक़ है वो मिले तो हमें अपनी ज़िंदगी अपने बनाए हुए उसूलों के नहीं बल्कि ईश्वर के बनाए हुए उसूलों के मुताबिक गुज़ारनी होगी |

    #हमारी_ज़िंदगी_हमारी_नहीं –

    क्या कोई अपनी मर्ज़ी से जन्म ले सकता है? अगर कोई ये कहे कि मैं अपनी मर्ज़ी से पैदा हुआ हूँ या मैं जब चाहूँ पैदा हो सकता हूँ तो लोग उसे पागल या सिरफ़िरा ही कहेंगे | जो लोग भ्रूणविज्ञान (Embryology) के सिंद्धांत को जानते हैं वो अच्छी तरह समझते हैं कि किसी भी बच्चे का उसकी माँ के पेट में वजूद में आने की संभावना कितनी कम होती है और ये ख़ुद मर्द और औरत के भी नियंत्रण से बाहर होता है | तो फिर ये संभव ही नहीं कोई इंसान ख़ुद अपनी मर्ज़ी से जन्म ले |

    क्या कोई इंसान चाहे तो वो हमेशा ज़िंदा रह सकता है? नहीं | ये एक कभी ना झुठलाने वाला सच है कि जो इंसान पैदा हुआ है उसको मरना भी है | और मौत भी इंसान के नियंत्रण से बाहर है |

    इन दोनों तर्कों से ये पता चलता है कि जन्म और मृत्यु इंसान के नियंत्रण में नहीं है, कोई और ही है जो इसको नियंत्रित करता है | वही वो ईश्वर है | तो हमारी ज़िंदगी हमारी कैसे हुई जबकि हमें जन्म देने वाला कोई और है और हमें मारने वाला कोई और |

    जब हमारी ज़िंदगी हमारी नहीं तो फ़िर हम इसको अपनी मर्ज़ी से कैसे गुज़ार सकते हैं | हमें पैदा करने के पीछे भी ईश्वर का कोई मक़सद होगा |

    हमारी ज़िंदगी के पीछे भी एक मक़सद है, हमें यूँही नहीं जन्म दिया गया है | यही समझाने के लिए ईश्वर वक़्त-वक़्त पर अपने संदेशवाहक (पैगंबरों) को भेजता रहा है और उनके ज़रिया अपनी किताबें भी भेजता रहा है | अगर हम सभी धर्मों के किताबों का अध्ययन करें तो हमें हमारे जीवन के मक़सद का पता चलता है |

    हमारी ज़िंदगी एक परीक्षा है | जिसमें हमें कुछ ज़िम्मदारियाँ दी गई हैं | जैसे-
    – एक ईश्वर को मानना और सिर्फ उसी की इबादत करना
    – उस ईश्वर की जगह किसी और को न देना
    – उस ईश्वर के संदेशवाहक (पैगंबर) के बताए तरीके अनुसार अपनी पूरी ज़िन्दगी गुज़ारना
    -ईश्वर के पैग़ाम को उन लोगों तक पहुंचाना जो या तो इसके बारे में नहीं जानते या इस पर अमल नहीं करते
    – ज़ुल्म को रोकना और हर जगह इंसाफ़ कायम करना

    ये कुछ ज़िम्मेदारियाँ ईश्वर ने सभी इंसानों को दी है | अगर हम इसी के अनुसार ज़िंदगी गुज़ारेंगे तो इस दुनिया में भी सभी लोग सुख शांति से रह सकते हैं और इस जन्म के बाद जब ईश्वर हमसे सवाल करेगा तो इसके बदले हमें स्वर्ग, जन्नत (Heaven) में जगह देगा और हम वहाँ हमेशा रहेंगे| और अगर हम इस तरीके से ज़िंदगी नहीं गुज़ारेंगे और अपनी मनमानी करेंगे तो इस दुनिया में सभी इंसानों का सुख-शांति से रहना मुमकिन नहीं और इस जन्म के बाद ईश्वर हमें नरक, जहन्नम (Hell) में डाल देगा जहाँ हमें हमेशा रहना होगा |

    आशा करता हूँ कि अल्लाह हमें हमारी ज़िंदगी के असल मक़सद को समझने की तौफ़ीक़ अता करे और उस पर अमल करने की तौफ़ीक़ अता करे |
    आमीन ||

  • *पवित्र रमजान महीना शीघ्र आने वाला है*

    (फजलुर्रहमान क़ासमी इलाहाबादी)
    इस्लामी शरिया के अनुसार सबसे पवित्र रमजान शीघ्र आने वाला है ,इस्लाम में इस महीने को काफी महत्तव है ,इस्लाम धर्म के अनुसार सबसे पवित्र ग्रंथ क़ुरान इसी महीने में अवतरित की गयी ,क़ुरान के अलावा दोसरी आसमानी ग्रन्थ भी इसी महीने में उतारे गये ,इस्लाम धर्म के संस्थापक मोहम्मद साहब इस महीने में बहुत ज़्यादा इबादत करते थे ,इस महीने के आने से पहले ही साहब इकराम को इस महीने की फ़ज़ीलत से आगाह करदेते थे ताकि इस महीने में किसी भी तरह से गफलत न बरतें बल्कि अपना अधिकांश समय इबादत में लगाएं ,

    *शैतान को क़ैद कर दिया जाता है,*

    रमजान का महीना इस क़दर पवित्र है जन्नत के दरवाज़ो को खूल दिया जाता है ,और शैतान को ज़ंज़ीर में जकड़ दिया जाता है ताकि इस पवित्र महीने में लोग इबादतों में मशगूल रहें ,और इस माहींने में रिज़्क़ बढ़ा दिया जाता है ,

    *नेकी 70 गुना बढ़ा दी जाती है*

    हदीस में है इस महीने में नेकियों के सवाब को बढ़ा दिया जाता है ,एक नेकी करने पर 70 नेकियों का सवाब मिलता है ,रमजान में कोई एक नमाज़ पढता है तो उसको 70फ़र्ज़ नमाज़ों का सवाब मिलता है ,ऐसे ही कोई भी फ़र्ज़ ऐदा करे उसे 70 गुना सवाब मिलता है ,इससे पता चला क़ि रमजान में एक फ़र्ज़ नमाज़ पढ़ना रमजान के अलावा महीने में 70 फ़र्ज़ नमाज़ पढ़ने पर जो सवाब मिलता है रमजान में अल्लाहताला एक पढ़ने परवह सवाब देदेता है ,ऐसे ही नफ्ल पर फ़र्ज़ पढ़ने के बराबर सवाब मिलता है ,अल्लाह की तरफ से यह इज़ाफ़ा रमजान की बरकत की वजह से होता है ,

    *तरावीह की नमाज़ सुन्नते मुअक़्क़दा*

    रमजान में एक विशेष नमाज़ अदा की जाती है जिसे तरावीह कहा जाता है ,यह नमाज़ इस्लाम के संस्थापक मोहम्मद साहब ने केवल तीन दिन पढ़ा था इस डर से कहीं यह नमाज़ फ़र्ज़ ना हो जाये नही पढ़ा ,नबी के ज़माने में और आपकी देहांत हो जाने के बाद इस्लाम के पहले खलीफा हज़रत अबूबकर सिद्दीक़ राज़िअल्लाहुणहु के ज़माने में भी लोग तनहा तनहा तरावीह की नमाज़ अदा करते रहे ,सन 15 हिजरी में इस्लाम के दोसरे खलीफा हज़रत उमर फारूक राज़िअल्लाहुणहु ने तरावीह की नमाज़ एक इमाम के पीछे शुरू करायी ,और उबैइब्ने काब राज़िअल्लाहुणहु को तरावीह का पहला इमाम मुक़र्रर किया ,और उन्होंने 20 रकात तरावीह की नमाज़ अदा करायी ,तबसे आजतक मस्जिदे हराम मक्का और मस्जिदे नबवी मदीना ने 20 नमाज़ तरावीह की नमाज़ अदा की जा रही है ,

    *तरावीह की नमाज़ छोड़ना गुनाह*

    तरावीह की नमाज़ में पूरा क़ुरान पढ़ा जाता है ,मुस्लिम समुदाय के लोग इस नमाज़ को काफी शौक़ से पढ़ते हैं ,इस नमाज़ के प्रति उनमे काफी उत्साह दिखाई देता है ,अगर बात की जाये इस्लामी शरिया की तो तरावीह की नमाज़ सुन्नत मुअक़्क़दा है इसका मतलब यह है कि बगैर किसी परेशानी के इस नमाज़ को छोड़ना गुनाह है और इस नमाज़ को पढ़ने पर बहुत ज़्यादा सवाब मिलता है ,

    *रमजान का रोज़ा फ़र्ज़*

    इस्लामी शरिया में रमजान के रोज़ों का काफी ज़ियादा महत्व है ,रमजान के पूरे महीने का रोज़ा फ़र्ज़ है यानि जो मुसलमान बालिग हैं जिनकी आयु 15 वर्ष की है उस पर रमजान का रोज़ा फ़र्ज़ है ,अथवा अगर कोई मुसाफिर हो यानि 76 किलोमीटर सफर करना चाहता है तो उसे शरीयत में रुखसत दी है कि अगर वह चाहे तो रोज़ों की बाद में क़ज़ा करे ,ऐसे कोई ऐसा मरीज़ हो ,अगर रोज़ा रखता है तो उसकी जान जाने का खतरा हो या उसके मर्ज़ के बढ़ जाने का खतरा हो तो वह फ़िलहाल रोज़ा न रखे बल्कि जब स्वथ हो जाये तो रोज़ों की क़ज़ा करे ,

    *रमजान का रोज़ा छोड़ना बहुत बड़ा गुनाह*

    रमजान के रोज़े पर अल्लाहताला बहुत ज़ियादा सवाब देता है ,रोज़े पर कितना सवाब मिलता है ,यह सिर्फ अल्लाह को मालूम है ,हदीस में है मेरे बन्दे ने मेरे लिए खाने पीने को छोड़ा लिहाज़ा मैं उसका बदला खुद ही दूँगा ,दोसरी इबादतों का बदला अल्लाहताला फरिश्तों के जरिए से दिलवाता है,एक दोसरी हदीस में है रोज़ा जहन्नम से ढाल है मतलब यह है दुनिया में रोज़ा रखने वाला जहन्नम में नही जायेगा ,जबकि रोज़ा का छोड़ना जिसको कोई उज़्र ना हो बहुत बड़ा गुनाह है ,ऐसा मुस्लमान अल्लाह और उसके रसूल का नाफ़रमान है ,
    *रमजान में इबादत का एहतिमाम करें*

    प्यारे नबी ने रमजान के महीने को उम्मत का महीना क़रार दिया ,रमजान का महीना अल्लाह को राज़ी करने का महीना है रमजान के महीने ही सच्ची तौबा करनी चाहिए और रमजान में खूब इबादत करना चाहिए रमजान की हर रात में गुनाहगारों की मगफिरत होती है लिहाज़ा अल्लाह के सामने रूना चाहिए ,और अपनी मगफिरत की भीख मांगनी चाहिए ,और जहन्नम से पनाह मांगना चाहिए ,

    *रमजान में जो महरूम वह सबसे बड़ा बदनसीब*

    रमजान के महीने में अल्लाह की रहमत आम होती है ,हर तरफ रहमत बरसती रहती है ,रोज़ाना यह ऐलान होता है अल्लाह की तरफ से कि कोई गुनाह से माफ़ी मांगने वाला कि उसे माफ़ किया जाये ,रमजान के आखिरी रात में बहुत ज़्यादा लोगों की मगफिरत होती है ,अल्लाह के नबी ने उस मुस्लमान के बारे में बद्दुआ दी है जो रमजान के महीने को पाये और नेक अमल करके अपनी मगफिरत ना करा सके ,जिबरील अलैहिस्सलाम ने यह बद्दुआ दी थी और हमारे प्यारे नबी ने उस पर आमीन कहा ,लिहाज़ा उस शख्स की बर्बादी के बारे में कोई शक नही जो रमजान को पाये और अपनी मगफिरत ना करा सके यानि रमजान में भी गुनाह में पड़ा रहे और नेक अमल ना करे

    *रमजान में गरीबों का रखें खास ख्याल*

    एक हदीस में है रमजान का महीना एक दोसरे के साथ घमखारी का महीना है मतलब अपने पकवान और रिज़्क़ में अपने दोसरे भाईयों को भी शामिल करें खासतौर से गरीबों और पड़ोसियों का खास ख्याल रखे ,उनका हर तरह से सहयोग करे ,उसे बहुत ज़्यादा सवाब मिलेगा ,इसलिए समस्त मुस्लिम भाईओं से निवेदन है कि इस पवित्र महीने के आने से पहले ही अल्लाह के दरबार में सच्ची तौबा करे ,और यह इरादा करे की रमजान में नेक अमल करके अपने अल्लाह को राज़ी करना है ,क्यंकि किया अगले साल हम रमजान में जीवित रहें या नही ,क्यंकि हमारे बहुत से भाई पिछले साल रमजान में थे लेकिन इस बार मौजूद नही ,क्या पता अगले साल हम भी ना रहें इसलिए समय को गनीमत जाने और पवित्र रमजान में नमाज़ की पाबंदी करें और क़ुरान की खूब तिलावत करें,अल्लाह से दुआ है कि हम सबको रमजान की कदरदानी करने वाला बनाये,अमीन

  • हम कन्हैया कुमार को क्यों जीतना देखना चाहते हैं?

    लोगों के बहुत सारे सवाल हैं।।
    हमारे बहुत सारे दोस्तों ने वामपंथ की आरएसएस से तुलना की और दलील यह दी के दोनों के स्थापना का वक़्त एक है और दोनों के संस्थापक सदस्य भी ऊंच कोटि के लोग यानी ब्राह्मण वाद के लोग थे
    1 और फिर कहा वामपंथियों ने बंगाल में मुसलमानों का बुरा हाल कर दिया और वहां के लोग अपने वजूद के लिये लड़ रहे हैं
    लेकिन वह एक बात और लिखना भूल गए के
    केरल मात्र एक ऐसा प्रदेश है जहाँ मुसलमानों की सब से अच्छी हालत है
    अगर NCERT कि किताब 6 कक्षा की देखें तो उससे यह पता चलता है कि औरतों की साक्षरता दूसरे लोगों के समान है

    लेकिन यहां पर हमारा तर्क वामपंथ को किसी तरीके का पक्षधर बनने का नहीं
    बल्कि यह बताने का है कि हर राजनीतिक पार्टी का अवाम के लिये कोई अच्छा स्टैंड नहीं बल्कि सब की अपनी महत्त्वाकांक्षाएं हैं

    1 रही बात बेगूसराय में कन्हैया कुमार का समर्थन करने का तो सब से बड़ी वजह यह है कि गरीब वह छात्र के लिये मिसाल बन सकते हैं

    क्योंकि जब कोई गरीब छात्र राजनीति में भाग्य आज़माने के लिए सोंचता है तो घर वाले सब से पहले कहते हैं के बेटा राजनीति हमारे लिए नहीं वह पैसों वालों के लिए है
    लेकिन जब कन्हैया जीत जाता है तो गरीब छात्र की उम्मीदें बर लाएंगी और देश को संघर्षिल नेता मिलेगा जो देश हित के लिए काम करेगा
    2 दूसरी बात सब यह कह कर कन्हैया को खिलाफ दुष्ट प्रचार कर रहे हैं के वह मुस्लिम लीडर शिप खा रहा
    लेकिन असल बात यह है के
    कन्हैया कुमार के खिलाफ RJD ने तनवीर हसन को उतार कर मुस्लिम लीडर शिप बचाई नहीं
    बल्कि बाप कि विरासत बचाने के प्रयास की है
    नहीं तो मधुबनी पर फातमी भी उम्मीदवार थे
    3
    अगर तेजस्वी मुस्लिम के इतने खैरख्वा थे तो सिवान से हिना शहाब के खिलाफ उनका गठबंधन अमरनाथ यादव को क्यों खड़ा किया

    3 अली अशरफ फ़ातमी भी अलीगढ़ से तालीम याफ़्ता हैं
    फ़ातमी को टिकट न मिलने पर क्या अलीग बरादरी राजद का विरोध करेगी??

    दोस्तों यह सब गोल माल है क्योंकि
    हम जज़्बती कौम्ं है आये दिन कोई ना कोई अपने फायदे के लिये हमारे जज्बातो से खेलता है और आज भी खेला जा रहा है वरना सोचो अली अनवर साहब जो संसद रह चुके है उनको चुनाव नही लड़ाया और बेगुसराय मे मुसलिम representation को लेकर जंग छेड़ रखी है जबकी तनवीर संसद कभी नही रहे है ।

    बल्कि मामला कुछ है तेजस्वी को यह डर सताने लगा है कि कहीं कन्हैया कुमार उसके बराबर में न खड़ा हो जाये और उसके सोने की चम्मच उससे से छिन जाए

    Md Absharuddin.
    MANUU NUH 8564032934

  • उत्तर प्रदेश:चुनावी बयार-57 लोकसभा कैसरगंज

    साल बदले,प्रत्याशी बदले,प्रत्याशियों ने भी अपने पाले बदले,जनता ने अपना इरादा बदला,चुनाव आयोग ने भी इस लोकसभा का परिसीमन बदला यह सबकुछ बदलता रहा लेकिन नहीं बदली क्षेत्र की बदहाली की तस्वीर।

    आज बात करते हैं उत्तर प्रदेश के 57 लोकसभा कैसरगंज की जो अब भी विकास की उम्मीद लगाए हुए एक टकटकी सी नज़र देख रहा है दिल्ली के उन हुक्मरानो की तरफ जो चुनावी घटा में आते हैं ,छा जाते हैं ! थोडी बहुत बारिश करते हैं और फिर उड़ जाते हैं “लगान” फिल्म के बादल की तरह जो शायद फिर दोबारा 5 साल बाद चुनावी ऋतु में ही लौटेगा।

    5 विधानसभा में फैले हुए इस लोकसभा में 2 विधानसभा (कैसरगंज ,पयागपुर ) बहराइच जनपद की और बाकी की 3 विधानसभा ( कटरा बाजार ,कर्नलगंज,तरबगंज ) गोंडा जनपद की शामिल की गयी हैं। आज समझते है इस लोकसभा का पूरा गणित , चुनावी बयार और वो सबकुछ जो आप समझना चाहते है

    क्या रहा है इतिहास !

    स्वतंत्र भारत के इतिहास में सबसे पहली बार इस लोकसभा के चुनाव के लिए तारीख़ मुक़र्रर की गयी 25 फरवरी 1957 की। चुनाव हुआ और वोट पड़े कुल 40 फ़ीसदी से भी कम । इस सीट से पहली बार कांग्रेस के उम्मीदवार भगवान् दींन ने निर्दलीय मोहम्मद शाद को पटखनी देकर मैदान मार लिया।उसके बाद चुनाव हुए 1962 में लेकिन तब बसंत कुंवारी ने ये सीट कांग्रेस से छीन ली। ठीक 5 साल बाद यानी 1967 में हुए आम चुनावों की जब गिनती खत्म हुई तो इस लोकसभा से भारतीय जनसंघ के टिकट से चुनी गयी संसद का नाम था शकुंतला नय्यर जो उसके बाद हुए 1971 का चुनाव भी जीत गयीं । देश 1977 में एक बार फिर आम चुनाव की दहलीज पर खड़ा था और चनावी आंकड़े जो इस बार आये तो संसद में पहुँचने का अधिकार भारतीय लोकदल के प्रत्याशी रुद्रसेन को मिला। 1980 की चुनावी सफलता रामवीर सिंह के हाथ लगी जो INCI के टिकट से चुनाव लड़े थे । 1984 के चुनाव में कांग्रेस प्रत्याशी रामवीर सिंह ने लोकदल के निशान पर पहली बार चुनाव में उतरे बेनी प्रसाद वर्मा को हराकर दोबारा जीत का स्वाद चखा । 1989 में एक बार फिर कांग्रेस गयी और भाजपा आयी उसके 2 साल बाद 1991 में भाजपा का डंका फिर बजा और वो जीत गयी। 1996 ,1998 ,1999 और 2004 में हर बार बेनी प्रसाद वर्मा इस सीट से चुने गए !आगे उसका ज़िक्र है।

    बेनी प्रसाद वर्मा

    कैसरगंज की ये सीट बेनी प्रसाद वर्मा और सपा का दुर्ग कही जानी लगी जिसे भेदने में लोहे के चने चबाने जैसी हालत हो जाती थी। बेनी प्रसाद 4 बार लगातार इसी सीट से दिल्ली के दरबार में हाजिरी लगते रहे और पूर्वांचल के एक बहुत बड़े नेता के रूप में उभरे। चुनाव आया सन 2009 का सपा में अंदरूनी कलह और बेनी का पार्टी के बाहर हो जाना फिर अपनी अलग पार्टी समाजवादी क्रांति दल बनाना और उसकी नाकामयाबी के बाद सीट और पार्टी दोनों बदल कर गोंडा पहुँच जाना। बेनी बाबू के इस सीट को छोड़ने की एक प्रमुख वजह ये बताई जाती है की चुनाव आयोग ने इस सीट का परिसीमन बदल दिया था तो उस वजह से बेनी प्रसाद का अपना वोट बैंक जो पहले बाराबंकी की कुछ विधानसभा में था वो फिसलता दिखाई दिया और उन्होंने अपने लिए कैसरगंज छोड़कर गोंडा को चुन लिया। इन सबके बीच बेनी प्रसाद ने समजवादी क्रांति दाल नामक एक पार्टी का गठन भी किया जिसे वो परवान नहीं चढ़ा सके और स्थिति को भांपते हुए उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम लिया। 2014 का चुनाव हारने के बाद बेनी प्रसाद राजनीति से बिलकुल अद्र्श्य हो गए। फिलहाल उनके दोबारा समाजवादी पार्टी में शामिल होने की अटकलें चल रही हैं।

    ब्रज भूषण शरण सिंह

    बेनी प्रसाद के मोहभंग के बाद 2009 में इंट्री होती है सपा के टिकट पर बाहुबली बृजभूषण शरण सिंह की जो भाजपा छोड़कर समाजवादी पार्टी का दामन थाम लेते हैं।नेताजी का आशीर्वाद उन्हें मिलता हैं और वो समाजवादी पार्टी की तरफ से परचा भरते हैं। 2009 के चुनाव में बृजभूषण और सपा दोनों अपनी अपनी सीट पर कब्ज़ा बरक़रार रखते हैं। चुनावी साल आता है 2014 का और चुनावी दंगल के अखाड़े में नेता अपनी कुश्ती के लिए फिर ज़ोर आज़माइश करते हैं। नए राजनितिक समीकरण को देखते हुए एक बार फिर भाजपा का ये खिलाडी समाजवादी हेलमेट उतार कर भाजपा के पाले में जाकर चुनावी रणभूमि में उतरने का फैसला कर लेता है।नरेंद्र मोदी की बहराइच में आयोजित रैली के मंच से ही स्थति साफ़ हो जाती है की अब भाजपा के टिकट से ब्रजभूषण को उतारा जायेगा। हालांकि उससे पहले ही समाजवादी पार्टी ने कैसरगंज की सीट से ब्रजभूषण शरण सिंह को अपना उम्मीदवार बनाने की आधिकारिक घोषण कर दी थी। सपा के लिए 2014 के चुनाव में इस सीट को बचाए रख पाना मुश्किल हो रहा था। वहीँ दूसरी तरफ पूरे देश में मोदी लहर चल रही थी। इस स्थिति में सपा ने गोंडा से अपने सिटिंग विधायक और तब के मंत्री विनोद कुमार उर्फ़ पंडित सिंह को इस सीट से ज़ोर आज़माइश के लिए उतार दिया। हालाँकि जब चुनावी मतगणना से पर्दा हटा तो मिलेजुले समीकरण के भरोसे एक बार फिर बृजभूषण शरण सिंह अपने निकटतम प्रतिद्विंद्वि समाजवादी के पंडित सिंह को धूल चटा कर दिल्ली के दरबार पहुँचने में सफल हो जाते हैं ।

    लोकल मुद्दे और समस्या
    जनाब मुद्द्दे तो यहाँ हर पान और चाय की दूकान के अलग ही होते हैं लेकिन फिर भी अगर निचोड़ा जाये तो कुल मिलकर 3 -4 समस्याओं का मिश्रित रस निकलेगा लेकिन जब चुनाव आता है तो काले बादलों के सामने इंद्रधनुष खड़ा कर दिया जाता है ,वोटरों को हरियाली और विकास का चश्मा पहनाया जाता है भले ही सावन आने में बड़ा टाइम बाकी हो। लोकल मुद्दे हावी रहते हैं लेकिन इंटरनेट और जियो के जमाने में सब कुछ अंतर्राष्ट्रीय बन चुका है मियां। लोकसभा में एक भी इतना बढ़िया कॉलेज नहीं है जो बाहर से आने वाले छात्रों को तो छोड़िये सिर्फ अपने ही जिले के बच्चो को बढ़िया शिक्षा दे सकें। अस्पताल के नाम पर लखनऊ की तरफ ही मुंह ताकना पड़ता है ,जिला अस्पताल में वही सरकारी हाल और वही सरकारी तंत्र। यातायात के मामले में शहरी और क़स्बाई इलाक़ा छोड़कर कभी कोई जाम वाम की दिक्कत ही नहीं होती है सब कुछ बिलकुल अपने फ्लो में चलता है और चलता ही रहेगा। कारोबार के मामलो में तो लखनऊ, दिल्ली ,मुंबई और गुजरात है न ! अब ज़्यादा पैसा कमाना है तो घर छोड़ना ही पड़ेगा न भाई, तो बस इस मन्त्र के साथ बेरोजगार लोग पलायन करते हैं वृद्ध व्यक्ति कृषि के भरोसे रहते है और जिनको बहुत ज्यादा पैसा कमाने की जिज्ञासा रहती है तो खाड़ी देश में झंडा बुलंद ही करते हैं भारतवर्ष का।

    सबसे चौंकाने वाली बात ये है की उद्योग बिलकुल न के बराबर होने के बावजूद भी दुनिया के टॉप गंदे शहरो में शामिल हो चूका है ये क्षेत्र हालांकि उसके बाद बहुत सारी तैयारियां की गयी हैं लेकिन अभी उनको परवान चढ़ने में समय ही लगना है। कुछ इलाक़ा बाढ़ प्रभावित होता है हर साल बारिश आती है और लोगो के घर का पता बदल कर चली जाती है। ये समस्या भी कोई नयी नहीं है लेकिन जैसे जैसे बाढ़ का पानी घटता है वैसे वैसे अखबार की मुख्य पृष्ठ की ख़बरें अंदर के पन्नो के छोटे से कॉलम्स में सिमट जाती हैं और मामला अगले साल के लिए मुल्तवी ,फिर नया साल , फिर बाढ़ ,फिर तकरार , फिर सुर्खियां कुछ सरकारी एलान और मामला ठप्प।

    2 साल पहले के चुनाव में क्या हुआ था !!
    यहाँ भी बिकुल वही हुआ था जहाँ पनाह जो पूरे प्रदेश में हुआ था फिर भी जानना चाहते हो तो सुनो ! अखिलेश दे दनादन उद्घाटन कर रहे थे लखनऊ में बैठकर और उधर योगी जी धुंवा धार प्रचार कर रहे थे। अखिलेश राहुल ने हाथ मिलाया लेकन भाजपा के रथ रोक नहीं सके हालत ये हो गयी की इस लोकसभा की पांचों विधानसभ में एक भी सीट किसी दुसरे को नहीं मिली और सब गर्दे में उड़ गए भाजपा के। कहते हैं की अखिलेश से जनता इतना नाराज़ नहीं थी लेकिन भाजपा को भी एक और मौक़ा जनता देना ही चाहती थी विधानसभा में। तो आइये फटाफट जान लेते हैं इस लोकसभा की 5 सीटों का 2017 में पूरा चुनावी लेखाजोखा।

    २८८ कैसरगंज विधायक -मुकुट बिहारी

    विधानसभा विजेता निकटतम प्रतिद्विंद्वी

    287 पयागपुर भाजपा 102254 सपा 60713

    288 कैसरगंज भाजपा 85723 बसपा 57792

    297 कटरा भाजपा 91949 सपा 61028

    298 कर्नलगंज भाजपा 82664 सपा 54244

    299 तरबगंज भाजपा 100057 सपा 61629

    2 साल पहले हुए विधानसभा के चुनाव जिसे 2019 का सेमीफाइनल माना जा रहा था उसमे भाजपा ने इस लोकसभा की सभी विधानसभा जीत ली और समाजवादी पार्टी को चारो खाने चित कर दिया। अखिलेश ने वैसे तो नोटबंदी को लेकर सरकार पर निशाना साधा और उसे केंद्र की विफलता के रूप में को भुनाने की पूरी कोशश की लेकिन वो खुद इसे साबित करने में विफल हो गए।
    कैसरगंज विधानसभा के विधायक को योगी की कैबिनेट में जगह मिली और पूर्वांचल को प्रतनधित्व भी। वर्तमान में मुकुट बिहारी वर्मा प्रदेश सरकार में सहकारिता मंत्रालय संभाल रहे हैं । हाल ही में उन्हें अम्बेडकर नगर लोकसभा क्षेत्र से पार्टी ने प्रत्याशी बनाय है। आगे की तस्वीर 23 मई के बाद ही साफ़ हो सकेगी।

    पिछले लोकसभा का पूरा हाल
    पूरे भारत में तो मोदी लहार चल रही थी 2014 में लेकिन उत्तर प्रदेश में मोदी की सुनामी आयी थी यहाँ तक की भाजपा के बड़े नेता भी इसी असमंजस में थे की कितनी सीट निकलेगी और कितनी नहीं। बहरहाल मोदी आये ,बहराइच के मैदान में धुंवाधार रैली की और उसी रैली में सारी आशंकाओं पर विराम लगाते हुए तब के सपा सांसद ब्रजभूषण शरण सिंह ने दोबारा भाजपा पार्टी ज्वाइन कर ली और टिकट लेकर ही लौटे। उस रैली में ये कहा जाता रहा कि भाजपा ने अखिलेश के उसी लैपटॉप का इस्तेमाल अपनी रैली और प्रचार में किया जो लैपटॉप अखिलेश ने मेधावियों को मुफ्त में बांटे थे । खूब डिजिटल प्रचार हुआ आईटी सेल्स बने हर चैराहे पर चाय पर चर्चा होने लगी और साथ में ब्रजभूषण शरण सिंह का अनुभव भी खूब काम आया।

    2014 के चुनाव में सपा ने गोंडा से अपने सिटिंग मंत्री विनोद कुमार उर्फ़ पंडित सिंह को कैसरगंज बुलाया और मैदान में उतार दिया। कांग्रेस ने पयागपुर के तब के विधायक और कांग्रेस नेता मुकेश श्रीवास्तव पर दांव खेला वहीँ दूसी तरफ बसपा ने अपने टिकट पर केके ओझा को लड़ाया हालांकि टक्कर सिर्फ सपा का प्रत्याशी ही दे पाया। आखिरकार .जब चुनाव परिणाम आये तो इस सीट का हाल कुछ ये रहा ।
    चुनाव परिणाम 2014 –57 लोकसभा कैसरगंज

    फोटो साभार -यूटूयब

    विधानसभा भाजपा सपा बसपा कांग्रेस
    287पयागपुर 75422 44713 35518 21867
    288 कैसरगंज 80002 78665 23611 8307
    297 कटरा 75144 69829 27496 13742
    298कर्नलगंज 64936 46450 32607 6109
    299 तरबगंज 84880 63434 59339 7358
    टोटल —–380384 303091 125341 57383 आखिरकार सपा का लगातार पांचवीं बार इस सीट से जीतने के बाद छठी बार तिलिस्म टूट गया और ब्रजभूषण लगातार छठी बार संसद के दरवाज़े पर दस्तक देने के लिए चुन लिए गए। भाजपा ने बहुत लम्बे अंतराल के बाद सपा के ही खिलाड़ी को अपने पाले में खींचकर ये सीट अपनी झोली में डाली ली। आखिरकार सपा का लगातार पांचवी बार इस सीट से जीतने वाला विजयी रथ रुक गया गया और ब्रजभूषण लगातार छठी बार संसद के दरवाज़े पर भाजपा के कमल निशान पर चुन लिए गए । सपा के हरे हुए प्रत्याशी को वापस गोंडा भेज दिया गया जहाँ से वो 2017 का विधानसभा चुनाव नहीं हार गए। तीसरे प्रत्याशी कांग्रेस के मुकेश श्रीवास्तव का अपनी सीट से कुछ मोहभंग हो गया और वो 2017 का विधानसभ चुनाव सपा के टिकट पर लाडे। बसपा प्रत्याशी केके ओझा फिलहाल राजनितिक रूप से सक्रिय नहीं हैं।

    कैसा रहा विकास और अच्छे दिन का जादू —–
    हुजूर-ए -आली विकास यहाँ हुआ लेकिन उतना नहीं जितना होना चाहिए था बस मान के चलिए उतनी मात्रा में विकास हुआ जितना की पान में कत्था। कई नेशनल हाइवे बनाये गए लेकिन क्रेडिट कभी अखिलेश लेते हैं तो कभी भाजपा सरकार। विद्यालय के नाम पर जगह जगह महाविद्यालय खोले गए हैं सांसद महोदय की तरफ से जिसमे अभी उच्च स्तरीय शिक्षा और आधुनिक शिक्षा देने में समय लगेगा ,स्मरण रहे की इस क्षेत्र में साक्षरता दर औसत से कम ही है । रोजगार के नाम पर बस वही हाल है जो बरसों से रहा था और आगे भी वही होने की उम्मीद है। स्वास्थ्य सेवाओं में ज़रूर पहले से हालात में काफी सुधार हुआ है और आगे भी उम्मीद की जा सकती है। देश में सबसे पिछडे शहर में नाम आने के बाद काफी तेजी दिखाई गयी है और इस दाग को मिटाने की कोशिश के लिए कई योजनाओ का एलान किया गया है हालांकि ये कब तक सफल होगी इस बारे में कहना थोड़ा मुश्किल लग रहा है।बाढ़ की समस्या के लिए कोई नया तटबंध नहीं बनाया हालांकि सरयू नहर परियोजना काफी दिनों से चर्चा में हैं। कुल मिलकर जनता एक बार फिर मैदान में है और लगान फिल्म वाला वही बादल दोबारा चुनावी बयार के साथ फलक पर छा गया है। जनता को उम्मीद है की इस बार ये काली घटायें ज़रूर इस धरती को अपने अमृत से तृप्त करेंगी लेकिन प्रत्याशी के मन में क्या है ये तो प्रभु ही जाने। एक बार फिर रेतीले और संकरे रास्तों , गलियों ,चौराहों और गाँव की पगडंडियों पर सभी प्रत्याशियों का काफिला निकल चुका है और जनता को सम्मोहित करनेकी पूरी कोशिश दिन रात की जा रही है। इस लोकसभा की जनता आपने मतों का प्रयोग पांचवें चरण में 6 मई को करेगी और अपना फैसला सुनाएगी।

    प्रत्याशी और जातीय समीकरण

    2019 का चुनावी बिगुल फूंक दिया गया है और सभी पार्टियों ने अपने अपने तरीके से चुनावी बिसात पर खिलाडियों को उतारना शुरू कर दिया है।

    भाजपा ने अपने पुराने प्रत्यशी और मौजूदा सांसद 6 बार से अजेय रहे ब्रजभूषण शरण सिंह को दोबारा मैदान में उतार दिया है वहीँ महागठबंधन की तरफ से ये सीट बसपा के खाते में आयी है और उसने इस सीट से अलीगढ से बुलाकर पूर्व मंत्री चंद्र देव राम यादव उर्फ़ करैली यादव को टिकट दे दिया है। इसके अलावा उत्तर प्रदेश में दोबारा उभरने की कोशिश में लगी कांग्रेस पार्टी ने अपना प्रत्याशी २००९ में बलरामपुर सीट से सांसद रहे विनय कुमार पांडेय को बनाया है।

    इस लोकसभा में सबसे अधिक ब्राहण मतदाता लगभग 4.5 लाख , मुस्लिम मतदाता 4 लाख, दलित मतदाता 3 .8 लाख ,2 .५ लाख दलित तथा बाकी अन्य हैं।
    ये भविष्य के गर्भ में छुपा है और आने वाली 23 मई के बाद इस बात की तस्वीर साफ़ हो सक्केगी की 57 लोकसभा कैसरगंज से 2019 में संसद की सीट के लिए जनता ने किसे उपयुक्त माना है । क्षेत्र में अटकले लग रही है और समर्थक अपने अपने प्रत्याशियों के पक्ष में कैम्पेन कर रहे हैं और पूरे भारत की तरह ही यहाँ भी चुनावी तपिश और लोगों के एहसासों की गर्मी से जनमानस को प्रभावित करने और अपनी तरफ समर्थक जुटाने की भरपुर कोशिश की जा रही है।

    अंत में मतदाताओं से अपील ! कि अपने वोट का भरपूर इस्तेमाल करें अपने बुद्धि ,विवेक से बिना किसी डर और दबाव के स्वेच्छा से इस चुनाव में अपने मत का प्रयोग करके एक स्वस्थ लोकतंत्र को संजीवनी देने के काम में अपना योगदान अवश्य दें।

    WRITER -MOHD SAIF ALIAS SAIFI UROOZ

    डिस्क्लेमर —चुनाव् परिणाम के सभी आंकड़े उत्तर प्रदेश चुनाव आयोग की आधिकारिक वेबसाइट्स से ली गयी हैं और सभी राजनेताओं की तस्वीर उनके सोशल मिडिया एकाउंट से ली गयी हैं।

  • बदज़बान सियासतदान और मुंह देखता हिन्दुस्तान

    ‘सदाए दिल’डॉ.यामीन अंसारी
    देश में जब भी चुनाव का मौसम आता है, राजनीतिज्ञों की ज़बान बेकाबू हो जाती है। संवैधानिक पदों पर बैठे राजनीतिज्ञ से लेकर छोटे से छोटे उम्मीदवार की ज़बान और उसके बयान किसी सड़क छाप व्यक्ति की तरह हो जाते हैं। ऐसा नहीं है कि केवल 2019 के आम चुनाव में ऐसा हो रहा है, बल्कि चुनावों के दौरान नैतिकता को दरकिनार कर देने की परंपरा बहुत पुरानी है। खास बात यह भी है कि कोई एक राजनीतिक दल इस परंपरा को आगे नहीं बढ़ा रहा है, बल्कि अधिकतर पार्टियों के प्रतिनिधि बदज़बानी और बदकिरदारी की इस प्रतियोगिता में एक दूसरे से आगे निकलने की होड़ लगी रहता है। राजनीतिज्ञों को आसानी यह है कि वह इस तरह की बयानबाजी से जनता को अनावश्यक मुद्दों में उलझा देते हैं। इसके बाद जनता इन नेताओं से अपनी प्राथमिक और आवश्यक समस्याओं पर सवाल-जवाब ही नहीं कर पाते हैं। जाहिर सी बात है कि जिस देश की राजनीति में बदज़बानी केवल स्वीकार्य ही नहीं, बल्कि अनिवार्य घटक बन गई हो। जहां राजनेता न केवल एक दूसरे के खिलाफ जाने अनजाने में ग़लत भाषा का उपयोग करने में कोई शर्म महसूस नहीं करते हों, जहां राजनीतिज्ञ भरी सभाओं और बैठकों में जाति और सांप्रदायिकता को हवा देते हों, जिस देश का प्रधानमंत्री देश की सेना की उपलब्धियों को अपनी राजनीतिक उपलब्धि के रूप में बयान करता हो, जिस देश की सेना को कोई ‘मोदी की सेना’ बताता हो, वहाँ जनता को कब और क्या फुर्सत मिलेगी कि वह नेताओं के प्रदर्शन पर सवाल कर सकें।

    दरअसल नेताओं को जब यह महसूस होने लगे कि वह अपनी हरकतों और करतूतों से किसी को कोई नुकसान पहुंचा दें, उनका कुछ नहीं बिगड़ेगा, तो उन पर लगाम लगाना मुश्किल हो जाता है। खासकर सत्ताधारी वर्ग सरकारी और संवैधानिक संस्थाओं को अपनी मुट्ठी में समझने लगता है। यही कारण है कि हमने देखा है कि 2019 के चुनावी अभियान के दौरान सत्तारूढ़ दल के नेता बदज़बानी में सबसे आगे हैं। यहाँ तक कि खुद प्रधानमंत्री मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी इसी सूची में शामिल हैं। बल्कि भाजपा द्वारा बनाए गए राज्यपाल भी खुद को अभी भी किसी संवैधानिक पद पर नहीं समझते, बल्कि वह पार्टी के कार्यकर्ता की तरह काम करते हैं। इसका ताजा उदाहरण कल्याण सिंह और त्रिपुरा के गवर्रनर तथागत राय के वह बयान हैं, जिनके बाद उनके पास राज्यपाल के संवैधानिक पद पर रहने का कोई अधिकार नहीं रह जाता। जाहिर सी बात है कि जिस व्यक्ति ने उन्हें इस प्रतिष्ठित पद पर बैठाया है, जब वह खुद उसी तरह की मानसिकता रखता हो और ऐसी ही भाषा का प्रयोग करता हो तो बेहतरी की उम्मीद कैसे की जाए। चुनाव आयोग की चेतावनी के बाद भी नरेंद्र मोदी जनसभाओं में सैनिकों की शहादत और उनके बलिदान को अपनी उपलब्धि के रूप में बता रहे हैं। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह भी अपनी छवि के अनुसार लगातार आपत्तिजनक और सांप्रदायिकता को हवा देने वाले बयान दे रहे हैं। चुनाव आचार संहिता का खुला उल्लंघन किया जा रहा है। इसके बावजूद चुनाव आयोग सुप्रीम कोर्ट में जाकर अपनी बेबसी बयान करता है और कहता है कि उसके पास कार्रवाई के सीमित विकल्प हैं। लेकिन जब सुप्रीम कोर्ट चुनाव आयोग उसकी ताक़त का एहसास कराता है तो वह तुरंत हरकत में आ जाता है। देखते ही देखते चार बड़े नेताओं के चुनावी अभियान पर रोक लगा देता है। जो काम वह पहले कर सकता था, सुप्रीम कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद करता है। यानी या तो उसके ऊपर कोई दबाव था या फिर वह शासक वर्ग पर कार्रवाई से बचने के बहाने तलाश रहा था। जिन बड़े नेताओं पर कार्रवाई की गई उनमें बसपा सुप्रीमो मायावती, सपा के वरिष्ठ नेता आजम खां, यूपी के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ और केंद्रीय मंत्री व वरिष्ठ भाजपा नेता मेनका गांधी शामिल हैं। वैसे तो यह सूची बहुत लंबी हो सकती है और इसमें उनसे भी बड़े नेताओं और बड़े पदों पर बैठे लोग शामिल हो सकते हैं। क्योंकि उनके अलावा हिमाचल प्रदेश भाजपा के अध्यक्ष सतपाल सिंह सती और बसपा नेता गुड्डू पंडित, कांग्रेस के नवजोत सिंह सिद्दू के वीडियो वायरल रहे हैं। ख़ुद नरेंद्र मोदी और अमित शाह भी इसी श्रेणी में आते हैं। यह इस देश की राजनीति की बड़ी त्रासदी और चिंता का विषय है। बात केवल बदज़बानी तक ही सीमित नहीं है, बल्कि इन नेताओं की भाषा माँ बहन की गालियों और सड़क छाप गुंडों की हरकतों जैसी हो गई है। यहां तक कि यह राजनीतिज्ञ जनसभाओं में जो कुछ बोल रहे हैं, वह यहाँ लिखा नहीं जा सकता। इसी लिए चुनाव अभियान के दौरान लोकतांत्रिक मूल्यों के खुले उल्लंघन को देखते हुए चुनाव आयोग के लिए यह आवश्यक हो गया था कि वह सख्ती का संदेश दे। मुसलमानों के वोट विभाजित होने न देने की खुली अपील करने वाली बसपा सुप्रीमो मायावती और उनके जवाब देने की कोशिश में ‘अली’ और ‘बजरंग बली’ की बात करने वाले योगी आदित्यनाथ के चुनाव अभियान पर क्रमश: दो और तीन दिन के प्रतिबंध का चुनाव आयोग का फैसला अन्य नेताओं के लिए सबक़ होना चाहिए जो बेलगाम होते जा रहे हैं। इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता कि जहां मायावती, योगी आदित्यनाथ और मेनका गांधी जैसे नेता केवल आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन करते पाए गए, वहीं कुछ नैतिकता को ताक पर रख कर राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ ऐसी अभद्र बातें करते पाए गए, जिनका उल्लेख भी नहीं किया जा सकता। रामपुर से समाजवादी पार्टी और बसपा गठबंधन के उम्मीदवार आज़म खान ने भाजपा उम्मीदवार जयाप्रदा के खिलाफ इशारों इशारों में जिस प्रकार की टिप्पणी की वह सभ्य समाज को शर्मिंदा करने वाली थी।

    राजनेताओं की अपमानजनक भाषा केवल चुनाव आचार संहिता का उल्लंघन नहीं, बल्कि राजनीति में नैतिक गिरावट को दर्शाता है। इससे यह भी पता चलता है कि राजनेताओं के नज़दीक न तो किसी का कोई सम्मान और इज़्ज़त है और न ही उन्हें कानून का कोई डर है। दर अस्ल नेताओं द्वारा इस प्रकार की बयानबाजी जाने या अनजाने में नहीं की जाती, बल्कि सोच-समझकर विवादास्पद बयान दिए जाते हैं। इसके पीछे उनकी रणनीति काम कर रही होती है। उन्हें पता है कि मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने और उन्हें आवश्यक मुद्दों से दूर करने के लिए इससे बेहतर और कोई साधन नहीं हो सकता। साथ ही मीडिया का ध्यान भी अपनी ओर करने में सफल हो जाते हैं। बड़े अफ़सोस की बात है कि ऐसे लोग न केवल पहले से लोकतंत्र के मंदिर कहे जाने वाली संसद में मौजूद हैं, बल्कि आगे भी कानून बनाने में अपना रोल अदा करने वाले हैं। कोई किसी को माँ गाली दे रहा है, कोई किसी को जूते मारने की घोषणा कर रहा है, तो कोई वोट न देने पर देख लेने की धमकी दे रहा है। कहीं कोई नेता संप्रदाय विशेष की पहचान के लिए उनके कपड़े उतारने की बात करता है तो कोई किसी महिला नेता को घूंघट में रहने की सलाह देता है। आख़िर उनसे कैसे उम्मीद की जा सकती है कि यह देश में शांति, एकता और भाईचारे को बढ़ावा देने के लिए काम करेंगे। कैसे यकीन किया जाए कि जब यह लोग सत्ता संभालेंगे तो देश विकास और समृद्धि के पथ पर अग्रसर होगा। भारतीय राजनीति के लिए यह समय विचार विमर्श करने का है। भारत के राजनीतिक मूल्यों में वैसे भी गिरावट आ रही है। अगर हमारे नेताओं की सोच यही रहेगी तो यह देश किस दिशा में जाएगा। यहाँ केवल भाजपा और कांग्रेस का सवाल नहीं है, बल्कि पूरी राजनीतिक प्रणाली और राजनेताओं की भूमिका का सवाल है। जब हमारा संविधान हमें वोट की शक्ति का विकल्प देता है तो क्यों न हम इन बदज़बान नेताओं का मुंह देखने के बजाय इस शक्ति का प्रयोग करें और उन्हें इस योग्य ही न छोड़ें कि यह देश की संस्क्रति, परंपराओं और कानून का खुला उल्लंघन कर सकें। चुनावों का मौसम है, हमारे पास मौका है, तो क्यों न इसी समय इस नेक काम को अंजाम दे दिया जाए।
    (लेखक इंक़लाब उर्दू दिल्ली के स्थानीय संपादक हैं)

  • कन्हैया की रैली में मैं क्यों गई?—नजीब की मां फ़ातिमा नफ़ीस

    पिछले कई सालों से में अपने बेटे की खोज में दर दर घूम रही हूँ। क्या सही है क्या गलत है अभी सीख ही रही हूँ। धरना, प्रदर्शन, नेताओ से अपील, कोर्ट, कचेहरी, सीबीआई, जेएनयू , जो जब जिसने बताया, वो किया।सिर्फ एक उम्मीद से के शायद कोई कोशिश कामयाब हो जाए। जब जहाँ जिसने बुलाया, जिस पार्टी ने,जिस भी नेता ने हम चले गए और सिर्फ एक ही उम्मीद थी शायद कोई मदद मिल जाए नजीब को ढूंढने में। बस। सच्चाई ये है मेरे बच्चों कि, मैं न कोई नेता हूँ, न इतना राजनीति समझती हूँ। लोगों को अगर मेरी ज़ात से कोई फायदा पहुँचता है तो उसमें कोई अल्लाह की मर्ज़ी होगी।मुझ से चंद लोग, फेसबुक पर लगातार एक सवाल पूछ रहे है और में ज़हनी तौर पर उस से परेषान भी हूँ- कन्हैया की रैली में मैं क्यों गई ? मेरे नज़दीक वो भी मेरे बेटे जैसा है और मेरी लड़ाई में बराबर का शरीक रहा है।

    यह पार्टी या विचारधारा या वोट का सवाल नहीं है। यह उस व्यक्ति की मदद करने के बारे में है जिसने उसके मुश्किल दिनों में मदद की | लेकिन ये मैंने नहीं सोचा था के इन धरनो में आने वाले कुछ बेटे, एक साथ, मेरे से हिसाब मांगने लगेंगे तो में क्या करुँगी ? मुझे नहीं पता। मैं डर गई हूँ अब कहीं और जाने में जबकि मुसलसल लोग बुला रहे है।कुछ लोगों ने अब मुझे इंसानो से पहले उनकी पार्टी देखने के लिए मजबूर करा है।मैं नहीं जानती के कौन बड़ा नेता कहीं दूर बैठ कर मेरी आवाज़ उठा रहा था, उसके लिए माफ़ी , मैं सिर्फ उन चेहरों पहचानती हूँ जो मेरे शाना-बा-शाना खड़े थे, बसों में धक्के खा रहे थे, कोर्ट कचेहरी मेरे साथ में थे।अगर उन लोगो में से कोई भी जो पुलिस हेडक्वार्टर के बाहर या सीबीआई दफ्तर के बाहर, कचहरी में, या दिल्ली की सडकों पर मेरे साथ थे कही मेरी ज़रुरत महसूस करेंगे तो मेरा फ़र्ज़ बनता है कि मैं भी उनके पास जाऊँ।

    कौन कम था, कौन ज़्यादा कैसे तय होगा ? इस लिहाज़ से JNU, AMU, JMI, DU, HCU, आजमगढ़, दिल्ली, लखनऊ, मेवात, मुंबई, केरल, अलीगढ़, SIO, MEEM TEAM, UAH, आम जनता ( सब यूनिवर्सिटीज़ – शहर और संघठन के नाम नहीं गिना सकती उसके लिए माफ़ी चाहती हूँ ) से ज़्यादा शायद ही किसी ने मेरे लिए कुछ किया हो। मुझे इन बच्चों और लोगो को राजनीतिक चश्में से देखने के लिया मजबूर न करे।आपकी आपसी बहस आप लोग आपस में हल करे, मैं उसका क्या ही जवाब दूंगी। मुझे आप सब मेरे बच्चें नजीब की तरह प्यारे है।आपका सवाल पूछना जाइज़ है पर जब आपके पास मेरा और मेरे बेटे का नंबर मौजूद है, तो आपको इस तरह पोस्ट डालने से पहले एक बार मुझसे पूछना तो चाहिए था। मुझे आपकी पोस्ट पढ़कर बहुत दुःख हुआ क्यूकि आपने मुझे यह सोचने पर मजबूर कर दिया कि जितने लोग आज तक नजीब के लिए आवाज़ उठाए है या अपने मंच से मेरी आवाज़ ज़्यादा से ज़्यादा लोगों तक पहुंचाई मैं उन सब का एहसान कैसे उतारूंगी | बाकी अल्लाह बेहतर जानने वाला है ।

    (फातिमा नफ़ीस के फेसबुक पोस्ट से ली गयी है)

  • मतदान लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी

    नज़रिया:डॉ मोहम्मद मंजूर आलम

    लोकतंत्र की सबसे बड़ी खूबी और विशेषता मतदान है जिसे चुनाव कहा जाता है हमारे देश के दस्तूर के मुताबिक हर 5 साल पर जनता को अपना प्रतिनिधि चुनने का हक मिलता है हमें अपनी पसंद और नापसंद के लीडर को चुनने का मौका मिलता है हमारा लीडर कैसा होना चाहिए इसका फैसला हम जनता खुद करते हैं यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी खास बात और इसका सही इस्तेमाल मौके के मुनासिब से फायदा उठाना जनता की पहली और बुनियादी जिम्मेदारी है

    बीजेपी की 5 साल सरकार हमारे सामने हैं हमने बहुत करीब से इस सरकार को देखा है और‌ विश्लेषण किया है कि देश विकास की रफ्तार से कितना हट गया है
    विनाश और तबाही के किस मोड़ पर पहुंच गई है रोजगार के मौके कितने कम हो गए हैं किसानों की परेशानियों में कितना बढ़ोतरी हुआ है अल्पसंख्यक मुसलमान, दलितों और कमजोड़ों को किस तरह की परेशानियों का सामना है यूनिवर्सिटी और शिक्षण संस्थानों का स्तर कितना कम हो गया है विद्यार्थी और शिक्षक किस तरह की दिक्कतों से परेशान हैं अदालत आरबीआई,सीबीआई ,समेत अन्य लोकतंत्रिक संस्थान किस तरह से दो चार हुए हैं नफरत, हिंसा और उग्रवाद को कितना बढ़ावा मिला है करप्शन और रिश्वत कितनी बढी है नोटबंदी से कितनी मुसीबत झेलनी पड़ी है बेगुनाहों बेकसूरों और मासूमों के कत्ल का मामला कितना बढ़ा है गरीबी कितनी बढ़ी है सुरक्षा और इंसाफ से महरूम हमलोगों ने खुद इसे महसूस किया है इसलिए वोट देते समय हमारे सामने उन सब चीजों का होना जरूरी है ताकि आगे के लिए हम एक ऐसी सरकार का चुनाव कर सके जिसमें इस तरह की परेशानियों का सामना करना ना पड़े देश की तरक्की की रफ्तार पर ब्रेक ना लगे और पिछले 5 सालों में देश का जितना नुकसान हुआ है उसकी भरपाई हो सके यही कारण है कि वोटिंग को खुफिया रखा गया है तन्हाई में एक व्यक्ति को वोट देने का हक दिया गया है कोई अफसर भी वोटर्स के पास नहीं होता है कि वह कुछ देख सके किसी पर नजर रखें लोकतंत्र में वोटरों को इतनी आजादी देने और इसे खुफिया रखने का एक मकसद सिर्फ यह है कि आप सोच समझ कर बेख़ौफ़ और आजाद होकर अपना वोट दें देश के हक में बेहतर और सही प्रतिनिधि का आप चयन कर सके और किसी की तरफ से खौफ और दहशत ना हो

    भारत का लोकतंत्र बहुत लचकदार और सभी धर्म क्षेत्र और समुदाय को इसमें मुकम्मल प्रतिनिधित्व दी गई है हर एक को उसके धर्म कल्चर पर अमल करने की पूरी इजाजत है कहीं भी किसी तरह का टकराव नहीं है लेकिन पिछले 5 सालों के दौरान सरकार ने सबसे ज्यादा इसी संविधान पर हमला करने की कोशिश की है संविधान के अंदर हस्तक्षेप करने की मंसूबा बंदी है और इसकी एक वजह है कि भीमराव अंबेडकर के नेतृत्व में हमारे महापुरुषों ने जिस लोकतंत्र का निर्माण किया था उसमें इंसाफ,मसावत आजादी और सुरक्षा का हकदार सभी को हर एक भारतीय नागरिक को बनाया गया है और इसको यह नजरिया पसंद नहीं है संघ परिवार का एजेंडा मनुवादी सिस्टम और मनुस्मृति का नशा है हिंदुस्तान की जनता पर ब्राह्मण की पॉलिसी थोपना आर एस एस ,बी जे पी का बुनियादी एजेंडा एजेंडा है जिसमें इंसानों के बीच आजादी और इंसाफ का कोई तस्वीर नहीं है ब्राह्मणों और अन्य बड़ी जात के लिए हर एक को गुलाम बनाने का एजेंडा है भारत के संविधान में आर एस एस के मनुवादी नजरिया का निर्माण नहीं हो पाता है इसलिए पूरी कोशिश और जद्दोजहद हो रही है कि किसी तरह‌ संविधान से छेड़छाड़ किया जाए लोगों को प्राप्त आजादी और इंसाफ को खत्म करके इसे कुछ लोगों के लिए खास कर दिया जाए बीजेपी के सत्ता में आने के बाद आर एस एस की यही पहली कोशिश हो गई और पिछले 5 सालों के दौरान इस पर संघ परिवार ने बहुत कुछ कामयाबी हासिल कर ली है संविधान में तब्दीली का पूरा खाका तैयार कर लिया है 2019 में अगर दोबारा बीजेपी सत्ता में आएगी तो वह इस प्रक्रिया को पूर्ण अमलीजामा पहनाएगी देश मे जिससे अल्पसंख्यक ,दलित, आदिवासियों समेत लगभग सभी समुदाय की आजादी खत्म हो जाएगी इंसाफ और सुरक्षा के से महरूम कर दिए जाएंगे इसलिए देश के मतदाता की जिम्मेदारी है कि वोट को सिर्फ वोट समझ कर ना दें बल्कि संविधान की सुरक्षा तथा देश की सुरक्षा के लिए मतदान का प्रयोग करें

    ऐसी पार्टियों के हाथ में अपना वोट दें जिन्हें देश के संविधान पर पूरी तरह भरोसा है और वह इसमे कभी छेड़छाड़ नहीं करेंगे क्योंकि देश का संविधान मुकम्मल और हमारी आजादी का आलमबरदार है 5 सालों में संवैधानिक संस्थान बर्बाद कर दिया गया सुप्रीम कोर्ट के चार जज कको सामने आकर यह कहना पड़ा कि सरकार अदालत में हस्तक्षेप कर रही है लोकतंत्र खतरे में है सीबीआई जैसी देश की सबसे बड़ी एजेंसी सरकारी हस्तक्षेप के कारण रणभूमि का शिकार हुई है और जनता का भरोसा उठ गया आरबीआई‌ के निजी आजादी पर हमला किया गया इलेक्शन कमिशन के साथ छेड़छाड़ करने की कोशिश हुई और अब फौज का इस्तेमाल किया जा रहा है फौजी की बहादुरी और देश के लिए दी गई कुर्बानीयों को अपनी कामयाबी बता कर जनता के जज्बात को भरका रहे हैं चुनाव में यह सब हमारे सामने होना जरूरी है संवैधानिक संस्थान की सुरक्षा और उसकी अस्तित्व देश की सलामत तरक्की और कामयाबी के लिए पहली शर्त है

    नफरत,हिंसा और उग्रवाद हिंदुस्तान की पिछले 5 सालों में पहचान बन गई है मॉब लिंचिंग बलात्कार क्राइम और बेगुनाहों के कत्ल की वजह से हिंदुस्तान असुरक्षित देश बन गया है पिछले 5 सालों के दौरान मोहम्मद अखलाक,पहलू खान, हाफिज जुनैद, रोहित वेमुला और इस जैसे दसियों मामला देश की सुरक्षा लॉ एंड ऑर्डर पर सवाल खड़ा कर दिया है इससे भी बड़ा मामला यह है कि मोब लिंचिंग और दहशत गर्दी के मामला में शामिल मुजरिम खुलेआम घूम रहे हैं राजनीति में हिस्सा ले रहे हैं बीजेपी की रैलियों में नारे लगा रहे हैं यह सूरत हाल अमन व सुरक्षा के लिए ना सिर्फ खतरनाक है बल्कि देश को रणभूमि का शिकार बनाने की साजिश है हिंसावादी और उग्रवादी को शाबाशी और हिम्मत देने से देश की सुरक्षा प्रभावित होती है तथा हिंसा का माहौल पैदा हो जाता है एक खास समुदाय के खिलाफ उसका समर्थन करते समय यह लगता है कि किसी मकसद का समापन हो गया है लेकिन आगे चलकर यही ग्रुप देश के लिए खतरनाक बन जाता है और एक आतंकवाददी ग्रुप का रूप ले लेता है देश की सुरक्षा को खतरे में डाल देता है इसलिए ऐसे उग्रवादी और आतंकवादी लोगों का समर्थन करने वाली सरकार को यह सोच लेना चाहिए कि कल होकर यह ग्रुप इसी के लिए खतरा बनेगा और देश को बरबादी की तरफ ले जाएगा चुनाव हमारे सामने हैं 11 अप्रैल से वोटिंग की शुरुआत हो रही है इसलिए हम जनता यह बात याद रखेंगे कि ऐसी पार्टियों को वोट ना दें जिसका उग्रवादी ग्रुपों को समर्थन हासिल है मॉब लिंचिंग और भीड़ तंत्र जिन को समर्थन प्राप्त है क्योंकि यह लोग मुसलमानों और अल्पसंख्यकों के नहीं बल्कि देश की सुरक्षा विकास और संविधान के दुश्मन हैं

    लोकतंत्र में चुनाव का विकल्प कुछ और नहीं होता है हर 5 साल पर सरकार चुनने का अधिकार मिलता है एक बार भी गलती के लिए 5 सालों तक इंतजार करना पड़ता है इसलिए गौर करें सोचें और निश्चय करें कि 2019 में कोई गलती नहीं करनी है गलत फैसला नहीं लेना है अपने वोट का इस्तेमाल करके उन लोगों को सत्ता तक पहुंचाना है जिसे देश के संविधान और दस्तूर पर भरोसा है जो देश के लोकतांत्रिक सत्ता को बरकरार रखेंगे जो सबको साथ लेकर चलेंगे नफरत हिंसा वादी और उग्रवादी का खात्मा करके देश में अमन व सुरक्षा का बढ़ावा निश्चित बनाएंगे 5 साल का हालात हमारे सामने हैं सभी परेशानियां हमारे दिमाग में ताजा है इसलिए बहुत सोच समझकर बटन दबाएं अपने दोस्तों पड़ोसियों रिश्तेदारों और सभी संबंधियों के बीच जागरूकता पैदा करें और इस बात को यकीनी बनाएं के एक भी वोट का गलत इस्तेमाल ना हो गलत व्यक्ति को कोई भी वोट ना पड़े क्योंकि लोकतंत्र में हम जनता को सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी सही प्रतिनिधि के लिए वोट वोट का इस्तेमाल और सही लीडर की पहचान है
    यह अच्छी बात है कि जनता मे‌ जागरूकता है इसे हालात का एहसास है और वह सही फैसला लेंगे तथा इवीएम पर शक अभी तक बरकरार है मतदाता को ऐसा लगता है कि ईवीएम के जरिए उनके मत का गला घोटा जा सकता

    (लेखक प्रसिद्ध बुद्धिजीवी और ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल के जनरल सेक्रेटरी है)