Category: लेख, विचार

  • बाडमेर राजस्थान के मासूम बच्चो की एक नेक पहल,जिससे वहां के DM हुए प्रेरित।:शौकत नोमान

    शौकत नोमान: इन मासूम बच्चो के काम को देखिए। अच्छे से देखिए. इसके बारे में मैं आपको जो बताऊंगा उसे जान कर आप दंग रह जाएंगे, उसके काम देख कर आप का दिल बाग़ बाग़ हो जायेगा।

    “”ये है बाडमेर राजस्थान जहाँ पर कुछ बच्चे मिट्टी का घर बना कर खेल रहे है तभी वहां के DM गुजरते है और उन बच्चों को खेलते देख अपनी गाडी रूकवा लेते है और देखते है बच्चों ने जो घर बनाये हैं उनके लिए पक्की सड़क भी बनाई है जिस से वो बहुत ही प्रभावित होते है और बच्चों को *500* *रूपये* उपहार स्वरूप तथा पूरे बाडमेर में पक्की सड़क बनबाने का वचन देते है””

    एेसी सोच के लिए मै इन्हे धन्यवाद् देता हूँ

    यह तो हुई कहानी,
    लेकिन इस मासूम बच्चो की यह नेक पहल हमारे सामने बहुत सारे सवाल खड़ी करती है। ये भी कह सकते हैं कि यह बच्चा हमारे समाज को आईना दिखाने का काम रहा हैं !
    क्या हम लोग भी ऐसा कुछ नहीं कर सकते?
    जिससे हमारे *राज* *नेता*, *डिस्ट्रिक्ट* *मजिस्ट्रेट* , *सरकारी* *अधिकारी* प्रेरित हो कर हमारी जरूरतो को पूरा करने पर मजबूर हो जाये.
    बस जरुरत है कोई अच्छा काम का एक छोटा सा नीव रखना,
    जब तक हम जागरूक नहीं होंगे तब तक कोई भी हमारे लिए अच्छा नहीं सोच सकता, वो कभी हमारा रहनुमा नहीं बन सकता , जब तक हम अपने अँधेरी काल कोठरी में नींद से सोते रहेंगे तब तक हमारी मदद को कोई नहीं आएगा।

    उठो, जागो और तब तक मत रुको जब तक मंजिल हासिल न हो जाए’
    जो इंसान खुद की मदद नहीं करता तब तक, ख़ुदा भी उसकी मदद नहीं करता।

  • क्या प्रधानमंत्री मोदी तलाक बिल पर अपोजिशन की बात को महत्व देंगे?:डॉ मोहम्मद मंजूर आलम

    नई दिल्ली,18 जून 2019 (प्रेस रिलीज)
    प्रधानमंत्री मोदी का या बयान बहुत महत्व है कि लोकतंत्र की मजबूती के लिए मजबूत अपोजिशन का होना जरूरी है यही सच्चाई है और हकीकत भी यही है की अपोजीशन की मजबूती से लोकतंत्र उर्जावान और सक्रिय रहती है लोगों के मसले उजागर होते हैं और राजनीति में लोगों की रुचि भी रहती है अतः सवाल यह है क्या प्रधानमंत्री मोदी साहब अपने उन जुमलों को व्यवहार में लाएंगे और वास्तविक में वह 17वें लोकसभा के पहले सत्र में अपने दिए गए बयान पर कायम रहेंगे जिसमें उनका यह भी कहना था कि अपोजिशन के लोग नंबर की फिक्र छोड़ दें देश के लोगों ने इन्हें जो नंबर दिया है वह दिया है लेकिन हमारे लिए उनका हर शब्द मूल्यवान है उनका हर जज्बा महत्व रखता है उस विचार को ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल के जनरल सेक्रेटरी डॉ मोहम्मद मंजूर आलम ने व्यक्त किया।

    इन्होंने अपने बयान में आगे कहा के तलाक बिल पर बीजेपी लगातार अड़े हैं और अब इस सत्र में इसे पेश किया जाएगा जबकि मुस्लिम लोग इस बिल के बिल्कुल खिलाफ हैं अपोजिशन पार्टियों ने भी इसका विरोध करते हुए इसमें कई प्रकार के संशोधन का मांग कर रखा है एनडीए में शामिल कई पार्टियां इस पर बीजेपी का साथ नहीं दे रही है तो क्या नरेंद्र मोदी इस मामले में अब अपोजीशन की संशोधन अनुरोध को महत्व देंगे उनके जरूरी और महत्त्व मांग को अपनाएंगे या फिर बहुमत होने के कारण अपोजिशन की बात को महत्व दिए बगैर बिल पास करेंगे जिससे कोई भी संतुष्ट और खुश नहीं है खासतौर पर मुसलमान इसे अपने मुस्लिम पर्सनल ला में हस्तक्षेप मान रहे हैं और अपोजिशन का भी यही भावना है कि यह बिल मुस्लिम औरतों के खिलाफ और मुस्लिम पर्सनल ला में हस्तक्षेप पर आधारित है

    जो कुछ भी है इस मामले में हिंदुस्तानी लोगों और दुनिया के सामने एक बार फिर यह हकीकत सामने आ जाएगी कि नरेंद्र मोदी वास्तव मे अपोजिशन को महत्त्व देना चाहते हैं और अपने बयान पर इस बयान पर वह अटल है या यहां भी इन्होंने सिर्फ जुमला बाजी की है इनके बयान और अमल में कोई फर्क नहीं है और अपोजिशन कि इनके यहां कोई महत्व नहीं है


    (डॉक्टर मोहम्मद मंजूर आलम )
    जनरल सेक्रेटरी आल इंडिया मिल्ली काउंसिल

  • भारत में बढ़ती बेरो़गारी दर 45 साल के ऊचे स्तर पर पहुंची:शौकत नोमान

    भारत में बेरोज़गारी एक प्रमुख सामाजिक मुद्दा रहा है, सितंबर 2018 तक भारत में 31 मिलीयन बेरोजगार है।
    बेरो़गारी दर 45 साल के ऊचे स्तर पर पहुंच गई। इसे भारत सरकर द्वारा आधिकारिक तौर पर स्वीकार कर लिया गया है। कुछ महीने पहले लिक हुए एक रिपोर्ट में बताया गया था के भारत में बेरोजगारी की स्तर 45 साल के ऊंचे स्तर पर है।

    इस रिपोर्ट को लिक होते ही मोदी सरकार ने मानने से इंकार कर दिया था, मगर वहीं मोदी सरकार को इस खारिज ना कर सका, 31/05/19 को स्वीकार करने पर मजबूर होना पड़ा।
    पूरे देश में जूलाई 2017 से लेकर जून 2018 तक 1 साल में बेरोजगारी सचमुच 6.1% के दर से बढ़ा। वहीं, केन्द्रीय सांख्यिकी मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 6 साल में ग्रामीण इलाकों के युवाओं में बढ़ती बेरोजगारी बढ़ कर तीन गुना से ज्यादा हो गई।

    भारत की राजधानी दिल्ली में जितनी कोचिंग संस्थान हैं उतनी तो नौकरी भी नहीं मेरे अनुसार,
    खुद पर भरोसा रखें, इन गैर कानूनी कोचिंग संस्थान की बहकावे में ना आये, दृढ़ संकल्प और कड़ी मेहनत करे।

    एक मित्र आरती शर्मा अपने फेसबुक वाल पर लिखती है-:
    13 साल के बच्चे प्यार कर रहे है,
    65 साल के लोग शादी कर रहे हैं,
    और जिनकी उम्र ये सब करने की वो कॉम्पिटिशन की तैयारी कर रहे हैं।

    मेरे दूसरे मित्र Arshad Anwar लिखते हैं।-:
    जरूरी नहीं है कि बर्बाद होने के लिए जुआ, शराब और इश्क़ ही किया जाएं,
    आप सरकारी नौकरी की तैयारी भी कर सकते है….।

    हर शक्श दौडता है भीड़ की तरफ, फिर यही चाहता है उसे भी मिल जांए रास्ता, वो रास्ते पर होता तो है लेकिन वो रास्ता तो भ्रष्टाचारियों से बंद हुआ मालूम पड़ता है।

    (लेखक सौकत नोमान)

  • गरीबों की मदद का खास ख्याल रखें,मुफ़्ती फजलुर्रहमान क़ासमी इलाहाबादी

    1जून 2019 ,मऊआइमा ,प्रयागराज ,

    ईद का पर्व क़रीब है ,हमारी यह जिम्मेदारी है कि पास पड़ोस में गरीब परिवार के लोगों की हर मुमकिन मदद करें ताकि वह लोग भी अच्छे से ईद का पर्व मना सकें उक्त बातें युवा आलिम मुफ़्ती फजलुर्रहमान क़ासमी इलाहाबादी ने
    मऊआइमा क़स्बा स्थित मोहल्ला अबुहालीम पट्टी में मस्जिद चूड़ी हार वाली में तरावीह में क़ुरान के एक दौर मुकम्मल होने पर कहीँ ,उन्होंने कहा इस पवित्र महीने रमज़ान में गरीबों की मदद करने का बहुत ज़्यादा सवाब है ,मुफ़्ती फजलुर्रहमान ने कहा अल्लाह ने मालदारों पर ज़कात को फ़र्ज़ किया है ,मालदारों से लेकर गरीबों को दिया जाता है ताकि गरीब परिवार के लोग भी खुशहाल रहें ,उन्होंने कहा ज़कात का निसाब साढ़े बावन तोला चाँदी या साढ़े सात तोला सोना या उसकी कीमत का मालिक हो और उस पर एक साल गुजर जाये तो ज़कात वाजिब होगी ,मुफ़्ती फजलुर्रहमान ने कहा फ़िलहाल साढ़े 52 तोला चाँदी की कीमत साढ़े 24 हज़ार है जिसके पास साढ़े 24 हज़ार हो और उस मॉल पर साल गुजर गया हो तो ज़कात वाजिब होगी

    ,उन्होंने कहा ज़कात की रकम क़रीबी रिश्तेदार जैसे भाई बहन इन रिस्तेदारों को देना ज़्यादा सवाब है ,उन्होंने कहा उसूल यानि माँ बाप दादा दादी ऊपर तक ऐसे ही फुरू व यानि बेटा बेटी पोता पोती को ज़कात की रकम नही दे दी जा सकती ,उन्होंने पास पड़ोस के परिवार के लोगों की मदद का अगिरह किया ,मुफ़्ती फजलुर्रहमान ने कहा जो लोग ईद के दिन निसाब के मालिक हों यानि जिनके पास साढ़े 24 हज़ार हो तो उसके लिए खुद अपनी तरफ से और अपने छोटे छोटे बच्चों की तरफ से फ़ित्रा निकालना वाजिब है

    ,उन्होंने कहा पौने 2 किलो गेहूं की कीमत 30 रुपया है इसलिए मऊआइमा और आस पास के इलाक़ों के लोग 30 रूपया प्रति नफर फ़ित्रा अदा करें,हाफिज अख़लाक़ ने तिलावत किया ,मोहम्मद अफ़ज़ल ने नात पढ़ी ,इस अवसर पर हाफिज मोहम्मद शादाब ,हाफिज ज़ुबैर ,सैय्यद सुज़ैन ,मास्टर तारिक़ महमूद ,अब्दुर्रहमान ,हाफिज मोहम्मद आलम ,और भारी संख्या में लोग मौजूद रहे ,मुल्क की खुशहाली तरक़्क़ी ,आपसी चारा ,के लिए खास तौर से दुआएं की गयी

  • शून्य से बाहर निकलिए,मुस्लिम पॉलिटिक्‍स और नुमाइंदगी के बीच का फ़र्क समझिए!

    सत्रहवीं लोकसभा के चुनाव में भाजपा प्रचंड बहुमत से सरकार बना चुकी है। सत्ताधारी पार्टी भाजपा और गठबंधन में जहां उत्साह है वहीं विपक्ष इसको अप्रत्याशित जीत मान कर हताश है। समाजवादी, गांधीवादी, वामपंथी और आम्बेडकरवादी लगभग शून्य की स्थिति में हैं। जमीन, जंगल, पहाड़ और पानी बचाने की लड़ाई लड़ने वाले भाजपा की जीत से अवाक हैं।

    क्या यह जीत वाक़ई अप्रत्याशित है? क्या इस प्रचंड जीत में ईवीएम की भी कोई भूमिका है? क्या विपक्षी पार्टियां वाक़ई जनता के बीच अपना आधार खो चुकी हैं? क्या विपक्षी दल इस हार की सही समीक्षा करने में कोई रुचि भी रखते हैं या वे फिर अगले पांच वर्ष बैठकर अपनी बारी का इन्तज़ार करेंगे? आखिर इतनी बड़ी जीत के क्या कारण हैं? ऐसे बहुत सारे सवालों के बीच आम सेक्युलर विचारधारा के राजनीतिक और सामाजिक कार्यकर्ता फंसे हुए हैं।

    यह बात तो तय है कि यह ईवीएम की जीत नहीं है, न ही कोई अप्रत्याशित घटना है। ईवीएम एक मशीन है जिसमें गड़बड़ी की आशंकाओं को नकारा नहीं जा सकता लेकिन ये जीत दरअसल आरएसएस, भाजपा, हिन्दू महासभा, विश्व हिंदू परिषद और उनके हज़ारों संगठनों व विचारों की लगभाग एक सदी की मेहनत का परिणाम है। आज़ादी के समय कांग्रेस ने हिंदुत्ववादी विचारों के कई नेताओं को अपने में समाहित किया। गांधी की हत्या के बाद दशकों तक हिंदुत्ववादी संगठन राजनीतिक रूप से कमज़ोर तो बने रहे लेकिन न ही इन्होंने अपनी हार मानी न हिन्दू राष्ट्र बनाने का अपने एजेंडे का का संकल्प छोड़ा। इंदिरा गांधी की नीतियों के विरोध में जेपी आंदोलन ने इनके लिए मृत संजीवनी का काम किया और देश की राजनीति में उसके बाद से ये स्थापित होते चले गए। कभी मंदिर-मस्जिद, कभी आतंकवाद, कभी भ्रष्टाचार तो कभी राष्ट्रवाद को मुद्दा बनाकर वे अपने को हमेशा आगे बढ़ाते रहे।

    मंडल के बाद से किस प्रकार समाजवादियों का नैरेटिव जातिगत गोलबंदी और परिवारवाद में उलझ कर रह गया, यह सर्वविदित है। कांग्रेस की अल्पसंख्यक दमनकारी नीतियां और आतंकवाद जैसे अतिसंवेदनशील मुद्दे पर मुस्लिम नौजवानों की फर्जी गिरफ्तारी, साम्प्रदायिक दंगों पर दोहरे मापदंड ने जहां देश के दो बड़े राज्यों उत्तर प्रदेश और बिहार में कांग्रेस की जड़ें खोद दीं। वहीं दूसरी ओर समाजवाद और सामाजिक न्याय के नाम पर परिवारवाद और जातिवाद आधारित राजनीति के उदय और इनके द्वारा सवर्णों के प्रति बनाये जा रहे नफ़रत के माहौल, गैर-यादव/गैर-जाटव मतदाताओं की उपेक्षा ने भारतीय राजनीति में भाजपा के लिए एक जगह बनाई।

    अस्‍सी के दशक के बाद वाली सवर्णों की पीढ़ी ने अपने प्रति नफ़रत देखी, कुछ जातियों को छोड़कर बाक़ी पिछड़ी जातियों ने अपनी उपेक्षा देखी और आम हिन्दू नौजवानों ने राम मंदिर का सपना देखा। इन नौजवानों को भारत की एक बड़ी आबादी अल्पसंख्यक समाज को आतंकवाद से जोड़कर दिखाया गया। शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार की लड़ाई मंदिर-मस्जिद की लड़ाई में बदल दी गयी। जो जातियां उपेक्षित थीं उनके मन में मुस्लिम तुष्टीकरण की बात डाली गई। भाजपा के लिए ये सब राजनीतिक हथियार साबित हो रहे थे और हिन्दू समाज की नई पीढ़ी की एक बड़ी संख्या इसी भ्रम, उकसावे और नफ़रत के साथ परवरिश पा रही थी।

    सपा, राजद और बसपा जैसी पार्टियां जहां जातिगत गोलबंदी का खेल खेल रही थीं वहीं कांग्रेस मात्र सत्ता पाने की जुगत में लगी रही। इन सभी पार्टियों के पास भीड़ थी, संगठन नहीं था। संगठन सिर्फ और सिर्फ भाजपा के पास था। उनके पास किसान के बेटे का अध्यक्ष और चाय बेचनेवाले के बेटे का प्रधानसेवक के पद तक पहुंचने का उदाहरण था। आरएसएस और उसके हज़ारों साथी संगठन थे, लाखों की उन्मादी भीड़ थी, लाखों प्रशिक्षित और समर्पित कार्यकर्ता के साथ-साथ धनकुबेरों का समर्थन था। व्‍यवस्‍था में हर जगह बैठे अधिकारी और कर्मचारी थे। देश के बड़े हिस्से पर राज्यस्तरीय सत्ता थी। फिर क्यों न जीतती भाजपा?

    यह जीत अप्रत्याशित नहीं है। इस जीत की पृष्ठभूमि के पीछे जहां भाजपा की वर्षों की रणनीति है वहीं लालू-मुलायम-माया-ममता सरीखे नेताओं का सत्ता और परिवार से मोह है। समाजवादियों, गांधीवादियों और आम्बेडकरवादियों का समाज की नई पीढ़ी से अलगाव है। नई पीढ़ी को नारा लगाने वाली भीड़ मात्र समझने वाली इन पार्टियों ने जो बोया अब वह काटने के समय है।

    नरेंद्र मोदी के उदय, लालू और मुलायम के पुत्र-परिवार मोह, लगातार साम्प्रदायिक दंगों से हो रहे मुसलमानों के जानमाल के नुकसान, मुस्लिम नौजवानों पर आतंकवाद के लगाए जा रहे फर्जी मुकदमे, शैक्षणिक और आर्थिक रूप से पिछड़े बनाये जाने से आक्रोशित मुस्लिम नौजवानों के अंदर भी बड़ी तेजी के साथ मिल्ली क़यादत का जीवाणु घुसा है। आम मुसलमानों में ये बात फैलाई गई कि सेक्युलरिज़्म बचाने का ठेका क्या हमने ही लिया है? हमें हमारा प्रतिनिधि चाहिए। इन तर्कों के साथ वो इन सभी पार्टियों को खारिज करने की बात करते हैं। उन्हें मुस्लिम नाम वाली पार्टी में अपनी क़यादत दिखने लगी है।

    मुसलमानों को मुस्लिम राजनीति और मुस्लिम प्रतिनिधित्व का फ़र्क़ ही नहीं मालूम। उन्हें जब पूछा जाता है कि आपको सेक्युलिज़्म अगर नहीं चाहिए तो हिंदुओं को हिन्दू राष्ट्र से क्यों परहेज़ होना चाहिए? इसका जवाब उनके पास नहीं होता। सेक्युलरिज़्म पर मुसलमानों के बीच भ्रामक स्थिति पैदा की जा रही है। दक्षिण भारत में बेबाक और गैर-जिम्मेदार बयान देने वाले मुस्लिम बंधुओं की एक जोड़ी से पूछिए कि पिछले एक दशक में क्या हुआ? सेक्युलरिज़्म का ठेका क्या मुसलमानों ने लिया है? मुसलमानों का ये हाल कांग्रेस ने ही किया है? कांग्रेस खत्म हो जानी चाहिए, वगैरह वगैरह, जैसे सवाल मुसलमानों के अंदर इन्‍होंने खड़े किए। मतलब भाजपा को यहां से भी ऑक्सीजन मिलना शुरू हो चुका था।

    मुस्लिम युवाओं को जनमुद्दो से कोई सरोकार नहीं, बस इन्हें भी मुस्लिम नाम के रूप में अपना लीडर चाहिए। आज अगर देश में जनमुद्दों पर सबसे कम किसी समाज की भागीदारी है तो वह मुस्लिम समाज की है। यहां तक कि खुद मुसलमानों के शिक्षा, स्वास्थ्य और रोज़गार जैसे बुनियादी सवालों पर मुस्लिम समाज की भागीदारी नाममात्र है। सवाल है कि मात्र मुस्लिम नाम वाले प्रतिनिधि सदन पहुंच जाने भर से क्या मुसलमानों की सभी समस्याएं दूर हो जाएगी! क्या नेल्‍ली नरसंहार, भागलपुर, हाशिमपुरा और मुज़फ्फरनगर जैसे दंगों के समय मुस्लिम प्रतिनिधि सदन में नहीं थे?

    मुसलमानों को आम जनमुद्दों की राजनीति में ही अपना प्रतिनिधित्व और अधिकार ढूंढना होगा। एक बात देश के मुसलमानों को साफ-साफ समझ लेनी चाहिए कि ‘मुस्लिम पॉलिटिक्स’ के लिए इस भारत में कोई स्थान नहीं है। इसका प्रयास भी भाजपा के हिस्सा के रूप में ही देखा जाएगा।

    देश के सामने 18-25 साल के नौजवानों की एक बहुत बड़ी भीड़ है जिसके पास न तो अपने भविष्य की कोई रूपरेखा है, न आशा है और न ही कोई मार्गदर्शन। वो राजनीतिक चारा मात्र बनाकर रख दिये गए हैं। इन्हें आवश्यकतानुसार कभी सामाजिक न्याय के नाम पर, कभी भ्रष्‍टाचार के नाम पर तो कभी राष्ट्रवाद के नाम पर इस्तेमाल किया जा रहा है। ये कभी रामनवमी, कभी ताज़िया, कभी बारह रबी अव्वल की भीड़ तो कभी राष्ट्रवाद और मिल्ली क़यादत के सोशल मीडिया योद्धा हैं। यही नए भारत का भविष्य हैं।

    कुछ लोगों का मानना है यह चुनाव परिणाम जातिवाद और परिवारवाद की राजनीति की समाप्ति है, तो कुछ पूछते हैं कि फिर तमिलनाडु में स्टालिन और ओडिशा में नवीन पटनायक कैसे जीत गए। वे यह नहीं बताते कि ओडिशा और तमिलनाडु की राजनीति मंदिर-मस्जिद, जाति के खेल और राष्ट्रवाद की आड़ में नफ़रत से प्रभावित न होकर विकास की राजनीति पर टिकी है। अगर ऐसे लोग ये समझते हैं कि बिना अपनी हार की सही समीक्षा और अवलोकन के वापस उसी राजनीति को दुहरायेंगे तो भारत को रसातल में ले जाने का इतिहास ऐसे लोगों के सिर ही जायेगा।

    अब तय है कि जो पिछड़े, दलित और सवर्ण भाजपा में जा चुके हैं वे इन तथाकथित सेक्युलर और सामाजिक न्याय की पार्टियों पर इतनी आसानी से भरोसा नहीं करने वाले। दूसरी ओर इस देश का अल्पसंख्यक भाजपा और आरएसएस के दिन भर चलने वाली फिल्मी डायलॉगनुमा धमकियों से भी इनके झांसे में नहीं आने वाला है क्योंकि अल्पसंख्यक समाज में मुलायम, मायावती और तेजस्वी के बारे में खुली चर्चा है ये भाजपा से साठगांठ करते रहे हैं और आगे भी करेंगे। ऐसी स्थिति में इनका दोबारा भरोसा जितना काफी मुश्किल दिखता है।

    देश काफी कठिन दौर से गुज़र रहा है। पिछले पांच वर्षों में लगभग सभी विश्वसनीय संस्थान धराशायी किये जा चुके हैं। अगले पांच वर्ष भी इससे अलग होने की उम्मीद नहीं की जा सकती। अब उम्मीद मात्र देश की आम जनता खुद है। उनके बीच से कुछ निकले तभी कुछ हो सकता है। भाजपा छोड़कर बाक़ी सभी पार्टियां देश की नब्ज़ न समझने की ऐतिहासिक भूल कर चुकी हैं। इस पाप का प्रायश्चित करने का नैतिक बल भी उनके भीतर नहीं बचा है। भारत की राजनीति और उसकी आत्मा को नए सिरे से समझने का समय है। उसके लिए वापस भारत के अंदर जाना होगा। विचारों की एक सीधी और साफ रेखा खींचकर संघर्ष करना होगा। इतने विशाल देश की आत्मा की रक्षा के लिए कौन अपनी क़ुरबानी देने के लिए आगे बढ़ेगा, ये किसी को नहीं पता। फिलहाल तो कुल मिलाकर एक शून्य है। इसको तोड़िये। शून्य से बाहर निकलिए।


    (तनवीर आलम)
    लेखक:अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी एलुमनाई एसोसिएशन ऑफ महाराष्ट्र के अध्‍यक्ष हैं

  • कांग्रेस नेता कार्यकर्ताओं की ताकत पर सत्ता की मलाई खाने के चहते बनने के कारण कांग्रेस रसातल मे पहुंची!

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    2006 मे महामंत्री व 2013 मे कांग्रेस के उपाध्यक्ष बनने के बाद पीछले ढेढ साल पहले अध्यक्ष बनने वाले गांधी परिवार के सदस्य राहुल गांधी के कांग्रेस मे अनेक तरह के बदलाव करके खोई ताकत वापिस लाने की भरपूर कोशिश करने के बावजूद कांग्रेस के दिग्गज नेताओं के एक कोकस ने राहुल की उजली तस्वीर उभरने देने मे हमेशा कोताही ही बरती।

    कांग्रेस के अधीकांश नेताओं के जनता के मध्य रहकर संघर्ष करने के बजाय कार्यकर्ताओं को जलती संघर्ष की आग मे झोंककर फिर सत्ता आने पर कार्यकर्ताओं को दरकिनार करके स्वयं के मलाई खाने की आदत की भावना से ओतप्रोत होने के कारण आज ऐसे नेताओं के कारण नये तौर पर कांग्रेस कार्यकर्ता बनने का सीलसीला खत्म सा हो चला है। राहुल गांधी के यूथ कांग्रेस व एनएसयूसीआई के संगठन चुनाव के लिये जो प्रक्रिया अपनाई उससे मोका परस्त व विचारधारा से मैल नही खाने वाले कार्यकर्ताओं का जमावड़ा होने लगने से आज वो संगठन असरकारक साबित नही हो रहे है।

    राजस्थान मे 1998 मे कांग्रेस सरकार आने के बाद मुख्यमंत्री गहलोत द्वारा अपने खिलाफ किसी तरह के विरोध स्वर ना उठने के बचाव के लिये विधायक या विधानसभा चुनाव मे हारे उम्मीदवार को उसके क्षेत्र का पूरी तरह एक तरह से थानेदार घोषित करने के बाद धीरे धीरे कांग्रेस रसातल मे जाने लगी एवं कार्यकर्ताओं की उत्पत्ति पर विराम सा लग गया। 1998 मे अशोक गहलोत के मुख्यमंत्री बनने के बाद अपने खिलाफ किसी तरह के विरोधी स्वर ना उठने देने के लिये उन्होंने एक तरह से विधायकों व विधानसभा चुनाव मे उम्मीदवार रहने वालो को उनके क्षेत्र का थानेदार बनाकर गलत परम्परा की नीवं डाली। जिसके बाद कांग्रेस मे कार्यकर्ताओं का टोटा व क्षेत्र मे विधायकों की मनमर्जी के खिलाफ जनता मे विरोध पनपने लगा। जिसका परिणाम आज सबके सामने है।

    अशोक गहलोत ने 1998 मे मुख्यमंत्री बनने के बाद विधायकों को उसके क्षेत्र का थानेदार बनाकर नये रुप से परिपाटी डाली कि मेरीट के आधार की बजाय प्रत्येक तबादले पर स्थानीय विधायक की मोहर डिजायर के रुप मे आवश्यक हो गया। विकास का काम हो या फिर ईष्या के तहत किसी की खाट खड़ी करने के लिए स्थानीय विधायक को परोक्ष रुप से पूरी तरह छूट मिल गई। संगठन मे ब्लाक कमेटी, डीसीसी व पीसीसी सदस्य भी उसी स्थानीय विधायक की मंशा के मुताबिक मनोनीत होने लगे। स्थानीय निकाय व पंचायत चुनाव मे उम्मीदवार चयन के लिये शत प्रतिशत अधिकार उसी विधायक को मिलने से लगा कि विधानसभा क्षेत्र मे जो विधायक माने वोही कांग्रेस कार्यकर्ता बाकी सब कूड़ेदान का सामान। इससे कार्यकर्ताओं की नई खेप आना बंद होने से आज बूथ पर लड़ने व संघर्ष करने वाले कार्यकर्ताओं का कांग्रेस मे टोटा होने से कांग्रेस बूरे दौर से गूजरने लगी है। 1998 मे156 विधायको के साथ कांग्रेस की सरकार बनने के बाद कांग्रेस ने दो ओर दफा सरकार तो बनाई है लेकिन उसके बाद बहुमत के लिये जरूरी 101 विधायकों का आंकड़ा कांग्रेस आज तक छू नही पाई है। हमेशा जोड़ तोड़ से सरकार बनाई व चलाई है।

    कुल मिलाकर यह है कि कांग्रेस को अपने सिस्टम मे चैंज लाकर विधायक के अलावा संगठन व कार्यकर्ताओं को भी कम ज्यादा तवोजह देने का सीलसीला बनाना होगा। उसके अलावा बूथ मेनेजमेंट मजबूत करने पर ध्यान देना होगा। वरना कांग्रेस ओर अधिक रसातल मे धंसती चली जायेगी।

  • राजनीति मे नेताओं की हार भी कभी बडी जीत का कारण बनकर आती है।

    राजनीति मे नेताओं की हार भी कभी बडी जीत का कारण बनकर आती है।
    राजस्थान मे महादेव सिह व कैलाश चोधरी के साथ ऐसा ही हुवा।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    कहते है कि हर एक नफे नूकसान मे ऊपर वाले मालिक की कुछ रजा छुपी होती है। राजनीति मे भी नेताओं की कभी कभार होने वाली हार मे कुछ अच्छाई छूपी होने के प्रमाण हमे भी कभी कभार देखने को मिलने के साथ लगता है कि महादेव सिंह व कैलाश चोधरी की विधानसभा चुनाव की हार के पीछे बडी जीत छूपी हुई थी।

    2008 के राजस्थान विधानसभा चुनाव मे सीकर जिले की खण्डेला विधानसभा क्षेत्र से कांग्रेस उम्मीदवार को तोर पर महादेव सिह खण्डेला चुनाव लड़े ओर वो चुनाव हार गये। लेकिन विधानसभा चुनाव हारने के बाद 2009 के लोकसभा चुनाव मे विधानसभा चुनाव हारे हुये महादेव सिंह को कांग्रेस ने सीकर लोकसभा क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया तो वो चुनाव जीतकर सांसद बने गये। केंद्र मे कांग्रेस की मनमोहन सिंह के नेतृत्व मे सरकार बनी तो महादेव सिंह खण्डेला को उस सरकार मे मंत्री बना दिया गया।

    महादेव सिह खण्डेला की ही तरह राजस्थान के बाडमेर जिले की बायतू विधानसभा क्षेत्र से भाजपा उम्मीदवार कैलाश चोधरी 2018 का चुनाव हार गये। एवं चार महिने बाद हुये 2019 के लोकसभा चुनाव मे भाजपा ने कैलाश चोधरी को बाडमेर लोकसभा क्षेत्र से उम्मीदवार बनाने पर वो चुनाव जीतकर सांसद बन गये। ओर आज नरेन्द्र मोदी मंत्रीमंडल मे सांसद कैलाश चोधरी को मंत्री बनाया जा रहा है।

    अजीब संयोग है कि महादेव सिंह व कैलाश चोधरी दोनो जाट बीरादरी से तालूक रखने के साथ साथ दोनो मे से महादेव सिंह कांग्रेस से व कैलाश चोधरी भाजपा की तरफ से पहली दफा सांसद बनते ही केंद्र मे मंत्री बनने का दोनो को अवसर मिला। दोनो विधायक रहे ओर दोनो के विधायक रहते चुनाव हारने के बाद उन्हें लोकसभा का टिकट मिलते ही पहले झटके मे सांसद व मंत्री बन गये। जबकि दोनो ही राजस्थान के किसी भी मंत्रिमंडल के सदस्य अभी तक नही रह पाये है।

  • हाफिज क़ुरान को क़यामत के दिन सूरज से भी ज़ियादा रौशन ताज पहनाया जायेगा,मुफ़्ती फजलुर्रहमान इलाहाबादी

    मऊआइमा के मोहल्ला बैरहना के मस्जिद बेलाल में क़ुरान के मुकम्मल होने पर मजलिस का आयोजन

    29मई ,2019,मऊआइमा प्रयागराज ,
    क़ुरान अत्यन्त पवित्र किताब है ,जिसको अल्लाह ने अपने नबी मोहम्मद साहब पर 23 साल के लंबे समय में अवतारित किया ,उक्त बातें युवा आलिम मुफ़्ती फजलुर्रहमान क़ासमी इलाहाबादी ने मऊआइमा क़स्बा स्थित मोहल्ला बैरहना के मस्जिद बेलाल में तरावीह में क़ुरान के एक दौर मुकम्मल होने पर कहीँ ,उन्होंने कहा क़ुरान को याद करने वाले हाफिज का इस्लाम में काफी महत्व है ,उन्होंने कहा नबी का फरमान है क़यामत के दिन हाफिज क़ुरान के माँ बाप को सूरज से ज़्यादा रौशन ताज पहनाया जायेगा ,उनको सम्मान से नवाजा जायेगा ,उन्होंने कहा जब माँ बाप के साथ इस तरह से सम्मान से नवाजा जायेगा ,तो खुद हाफिज का किया मक़ाम होगा आसानी के साथ अंदाज़ा लगाया जा सकता है ,

    मुफ़्ती फजलुर्रहमान ने मुस्लिम समाज के लोगों से आग्रह किया कि वह खुद भी क़ुरान को सही अंदाज़ में पढ़ने की कोशिश करें और अपने बच्चों को भी क़ुरान की तालीम देने की फ़िक्र करें ,उन्होंने कहा रमज़ान की जो दिन बचें हुए हैं उनमें ज़्यादा से ज़्यादा अल्लाह की इबादत करें ,और गरीबों की मदद करने में बढ़ चढ़कर हिस्सा लें ताकि गरीब परिवार के लोग भी ईदुउल्फित्र का पर्व अच्छे से मना सकें ,उन्होंने कहा कि इस्लाम में गरीबों को दान करने उनकी मदद करने का बहुत ज़्यादा सवाब है ,मुफ़्ती फजलुर्रहमान ने कहा ईद की नमाज़ के लिए निकलने से पहले फ़ित्रा की रकम गरीबों को देदें ,उन्होंने कहा सद का की रकम इसलिए दी जाती है ताकि रोज़े में रह गयी कमी कोताही को दूर किया जा सके ,ईद के दिन जिसके पास साढ़े 24 हज़ार की रकम का मालिक है उस पर अपनी तरफ से और अपने परिवार वालों की तरफ से फ़ित्रा की निकालना वाजिब है ,

    मुफ़्ती फजलुर्रहमान ने कहा इस बार मऊआइमा और आस पास इलाक़ो के लिए फ़ित्रा की रकम 30 रुपया प्रति आदमी है ,इसलिए ईदगाह निकलने से पहले ही इसी हिसाब से फ़ित्रा की रकम निकालें ,हाफिज अख़लाक़ की तिलावत समजलिस का आगाज़ हुवा मोहम्मद अफ़ज़ल ने नात पढ़ी ,इस अवसर पर हाफिज मोहम्मद शादाब ,हाफिज मोहम्मद ज़ुबैर ,हाफिज मोहम्मद रफ़ीक़,मोहम्मद कैफ ,बेलाल हसनैन ,अब्दुर्रहमान ,सैफ अंसारी ,और भारी संख्या में मुस्लिम समाज के लोग उपस्तथित थे ,मुल्क की खुशहाली तरक़्क़ी आपसी भाई चारा के लिए खास तौर से दुआ येन की गयी

  • बीजेपी की वापसी,उम्मीदें और अंदेशे:नज़रिया:डॉ मोहम्मद मंजूर आलम

    लोकतंत्र में चुनाव सबसे महत्वपूर्ण होता है लोगों को अपनी मर्जी और अपनी पसंद की सरकार चुनने का मौका मिलता है समय पर चुनाव का आयोजन लोकतंत्र की रूह संविधान की पासदारी और दस्तूर सुरक्षा की अलामत है हिंदुस्तान भी दुनिया के उन देशों में शामिल है जहां संविधान निर्माण के बाद चुनाव का सिलसिला जारी है एक बार गतिरोध कभी भी चुनाव का सिलसिला बंद नहीं हुआ है 2014 में बीजेपी के पूर्ण बहुमत से जीत के बाद अंदेशा था के संविधान मे बदलाव किए जाएंगे दस्तूर के साथ छेड़छाड़ किया जाएगा संभव है सरकार इमरजेंसी लागू करके चुनाव भी समय पर ना कराएं इसे कुछ दिनों के लिए टाल दे लेकिन फिलहाल ऐसा नहीं हुआ है 5 साल पूरे होते ही चुनाव का आयोजन हुआ 11 अप्रैल से शुरू होने वाला चुनाव 19 मई को 7 चरणों में पूरा हुआ और अब पिछले 23 मई को परिणाम भी आ गया है जिसके मुताबिक हिंदुस्तान में दोबारा बीजेपी के नेतृत्व में एनडीए की सरकार बनने जा रही है

    वर्तमान इलेक्शन साफ-सुथरा नहीं रहा है हिंदुस्तान की इतिहास मैं पहला चुनाव है जिसमें सबसे ज्यादा इलेक्शन कमीशन के रवैया पर सवाल उठे हैं ईवीएम के ऊपर भी लोगों का शक बरकरार है लोगों का अंदाजा है के हमारे मतदान के साथ छेड़छाड़ किया गया है परिणाम हमारे मतदान के खिलाफ एक मंसूबा बंद तरीका से लाया गया है परिणाम आने के बाद लोगों का यह शक और बढ गया है
    बहुत अफसोस की बात यह है कि इलेक्शन कमिशन ने लोगों के बीच पाई जाने वाली इस बेचैनी को खत्म करने की कोशिश नहीं की गई कोई भी ऐसा कदम नहीं उठाया जिससे लोगों का शक दूर हो सके और इन्हें लगे की सच में यह चुनाव साफ-सुथरे माहौल में हुआ है ईवीएम हैक नहीं की गई है,मशीनें बदली नहीं गई है, परिणाम वही है जो लोगों का था थोड़ा सा भी इसमें तब्दीली नहीं हुआ है
    बहरे हाल परिणाम आ चुका है इसमें तब्दीली मुमकिन नहीं है लेकिन कमीशन ने अपना वकार खोया है एक संवैधानिक और स्वायत्त संस्थान होने का फर्ज निभाने मैं कमी रहा जो लोकतंत्र में बेहतर नहीं है यह सरकार लोगों के लिए नई नहीं है 2014 से सत्ता में है 2019 के आम चुनाव के दौरान तब्दीली की आस दिख रही थी लेकिन परिणाम ने इसे गलत बताया लोगों का फैसला सामने आया कि नरेंद्र मोदी को एक बार और मौका मिलना चाहिए बीजेपी की सरकार बरकरार रहनी चाहिए शायद लोगों का ख्याल है कि 5 साल किसी सरकार के कामकाज करने और उसे रखने के लिए काफी नहीं है इसलिए लोगों ने जिस कांग्रेस को 10 सालों का मौका दिया था 2004 और 2009 दोनों में यूपीए की सरकार बनी थी मनमोहन सिंह 10 सालों तक प्रधानमंत्री रहे इसी तरह बीजेपी को भी 10 सालों का मौका दिया है अब एक बार फिर नरेंद्र मोदी ही प्रधानमंत्री रहेंगे

    लोगों का फैसला और चुनावी परिणाम के बाद बीजेपी की जिम्मेदारियां बढ़ गई है पिछले 5 सालों में जिस तरह की राजनीति हुई है हिंदुस्तान का जो माहौल बना हुआ था इसे भी बदलना पहली प्राथमिकता और जिम्मेदारी है 2014 में बीजेपी की हुकूमत बनने के बाद हिंदुस्तान में नफरत परवान चढ़ी मोहब्बत की जगह नफरत की सियासत का गरबा हुआ भाईचारे का खात्मा हुआ सहिष्णुता धैर्य और बर्दाश्त लोगों के बीच नाम के बराबर भी बाकी नहीं रहा हिंदू मुस्लिम की सियासत हुई अल्पसंख्यकों को खौफजदा किया गया कई धर्म के पर्सनल लॉ के साथ छेड़छाड़ करने की कोशिश हुई लॉ एंड ऑर्डर बरकरार रखने में सरकार नाकाम नजर आई चरमपंथियों और आतंकवादियों पर लगाम कसने में सरकार ने दिलचस्पी नहीं दिखाई किसानों के साथ जुल्म व ज्यादती हुई महिलाओं के खिलाफ रेप और क्राइम के मामले में लगातार बढ़ोतरी होता रहा गरीबी की दर पहले के मुकाबले में पड़ गई राष्ट्रवाद को मुद्दा बनाया गया बुनियादी एजेंडे पर सरकार ने ध्यान नहीं दिया चुनाव के दौरान भी लोगों के बुनियादी मामले पर बहस से गरेज किया गया अपने मेनिफेस्टो के मुताबिक सरकार ने ज्यादातर वादों को चुनावी मनसूर का ही हिस्सा रहने दिया जमीनी सतह पर कोई भी काम नहीं हुआ तमाम सच्चाई के बावजूद लोगों ने भी बीजेपी पर दोबारा भरोसा किया है इन्हें सत्ता सौंपा है तो अब इसे भी अपनी पॉलिसी और तरीका कार में तब्दीली लानी चाहिए

    लोग अब सरकार से रचनात्मक काम चाहते हैं इन्हें रोजगार की जरूरत है देश में नफरत की सियासत इसे पसंद नहीं है भाईचारा और सहिष्णुता जरूरी है देश की तरक्की कामयाबी और बेहतरी के लिए गुड गवर्नेंस ही एक हल है और अब यह बीजेपी को अगले 5 सालों में साबित करना होगा

    संविधान और दस्तूर की बहाली सबसे महत्वपूर्ण है बीजेपी पिछले 5 सालों के दौरान संविधान में तब्दील करने और दस्तूर के साथ छेड़छाड़ करने का इल्जाम लगता रहा है 5 साल का रिकॉर्ड भी यही बताता है कि पिछले 5 सालों में संविधान की धज्जियां उड़ाई गई दस्तूर की बहाली के नाम पर बीजेपी सरकार ने दस्तूर के खिलाफ काम किया सुप्रीम कोर्ट के फैसला की का विरोध किया संवैधानिक संस्थानों में हस्तक्षेप किया सीबीआई आरबीआई न्यालय आर्मी समेत कई संस्थानों की छवि बिगाड़ी गई,लोगों का भरोसा कमजोर हुआ उन सब के बावजूद नरेंद्र मोदी और बीजेपी पर लोगों ने दोबारा भरोसा किया है बीजेपी हुकूमत की जिम्मेदारी है कि इंसानियत की वर्चस्व को बरकरार रखें संविधान और दस्तूर की सरकार को यकीनी बनाएं इंसाफ आजादी और सुरक्षा को प्राथमिकता दें प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीजेपी और आरएसएस में अपनी हैसियत मनवाने में कामयाबी हासिल की है अब इनकी पार्टी और संगठन भी एक हैसियत है लोगों ने भी इनकी लीडरशिप पर भरोसा करके इतना बड़ा मैंडेट दिया है इन्हें प्रधानमंत्री बनाया है इसलिए इनसे उम्मीदें और ज्यादा हो गई है आर्थिक सामाजिक शिक्षा के अवसर पर देश को कामयाब विकसित मजबूत सुरक्षित शांतिपूर्ण बनाना जरूरी हो गया है अगर वह पिछले 5 सालों की तरह इस बार भी नाकाम साबित हो जाते हैं लोगों के उम्मीदों पर खरे नहीं उतरते हैं सबका साथ सबका विकास पर अमल नहीं करते हैं किसी भी तरह की भेदभाव करते हैं तो लोगों का भरोसा टूट जाएगा भरोसा खत्म हो जाएगा और फिर दोबारा कभी बहाल नहीं हो पाएगा किसी भी लीडर पर लोगों का यकीन करना मुश्किल हो जाएगा
    (लेखक ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल के जनरल सेक्रेटरी हैं)

  • भाजपा की कड़ी मेहनत से अन्य विपक्षी राजनीतिक दलो को सबक लेना चाहिये।

    अशफाक कायमखानी।जयपुर।
    किसी भी राजनीतिक दल से सहमति व असहमति अपनी जगह होते हुये यह मानना होगा कि 2014 की मोदी लहर के मुकाबले 2019 के लोकसभा चुनाव मे भारत मे मोदी लहर का विस्तार होकर एनडीए की करीब तीनसो पचास सीटे जीतकर जो दो सीटों वाली पार्टी को बहुमत वाली पार्टी बनाने मे भाजपा नेताओं के अलावा संघ के स्वयं सेवको ने कड़ी मेहनत की है। उस मेहनत व उससे पाई उपलब्धि की तारीफ तो करनी ही होगी। भाजपा की इस राजनीतिक उपलब्धि से विपक्षी राजनीतिक दलो को कुछ सीख जरुर लेनी चाहिये।

    भाजपा मे मोजूदा समय मे चाहे प्रधानमंत्री मोदी व अमीतशाह की तूती बोलती होगी लेकिन उस पर किसी ना किसी रुप मे राष्ट्रीय स्वयं सेवक का चाबूक भी पीछे लगा रहता है। भाजपा के अलावा भारत मे जितने भी अन्य राजनीतिक दल है। उनमे से अधीकांश दलो का नेतृत्व एक व्यक्ति या एक परिवार के पास होने के कारण उस दल की कोई खास आईडीयोलोजी ना होने एवं निजी स्वार्थ की भावना के कारण नेताओं द्वारा संगठन चलाते दिखने के कारण आम मतदाताओं का मन उनसे विचलित होने लगा है।

    भाजपा के विपक्ष मे गठबंधन बनाकर चुनाव लड़ने वाली सपा, बसपा व रालोद मे मुलायम-अखिलेश यादव, मायावती व अजीतसिंह का विधान व परिवार का नेतृत्व ही सर्वोपरि है। इन तीनो के सत्ता मे रहते जनता इनको देख व अजमा चुकी है। जबकि कांग्रेस के साथ एनसीपी, राजद व जनता दल सेक्यूलर के गठबंधन की स्थिति भी इसी तरह की है। गांधी, शरद पंवार, लालू यादव व देवेगौड़ा का परिवार का विधान पर चलने वाले चारो दलो को भी सत्ता मे रहते आम मतदाता देख व अजमा चुका है। ममता, शेखर राव, चद्रबाबू नायडू, मांजी सहित अन्य दलो की भी यही स्थिति आम मतदाताओं के जेहन मे बनी हुई है। कांग्रेस के अलावा अन्य उक्त सभी दलो की राष्ट्रीय नेतृत्व देनी की छवि अभी तक नही बन पाई है। जबकि चाहे कुछ भी माने लेकिन भारत की जनता राहुल गांधी का नेतृत्व कबूल करने को अभी भी तैयार नजर नही आ रही है। भाजपा ने अपने सहयोगी दलो की तादाद मे इजाफा करके जरा दबकर उनसे चुनाव मे सीट बंटवारे का समझौता किया। इसके विपरीत कांग्रेस ने साथी दलो की तादाद मे कमी करते हुये भाजपा से अलग अलग प्रदेशो मे मुकाबला कर रहे क्षेत्रीय दलो के उम्मीदवारो के सामने अपने वोट काटू उम्मीदवारो को खड़ा करके क्षेत्रीय दलो को कमजोर करने के चक्कर मे भाजपा व भाजपा के साथी दलो के उम्मीदवारो को मजबूत करने मे सहायक की भूमिका निभाने का काम किया है। भाजपा खासतौर पर 18-35 साल के युवाओं पर फोकस करती दिखाई दी तो कांग्रेस उनही पुराने व उम्रदराज लोगो के भरोसे पर विश्वास जताती रही।

    2019 के लोकसभा चुनाव मे प्रधानमंत्री की छवि एक अलग व मजबूत नेता की बनाकर भाजपा कार्यकर्ताओं ने घर घर उस छवि को पहुंचा कर समर्थन जुटाने मे कामयाब रहे। वही राहुल गांधी की कुछ सालो मे बनी कमजोर नेता की छवि को बदलने मे कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने कोई खास काम नही किया। चाहे भाजपा पर हिन्दुत्ववादी होने के आरोप लगते रहे हो, पर यह मानना होगा कि मतदाताओं के मत देकर जीताने के कारण ही भाजपा फिर सरकार बना रही है। भाजपा सरकार अपने आगामी कार्यकाल मे पहले की तरह अपनी पोलिसी को भारत मे लागू करने की भरपूर कोशिश करती नजर आने का अनुमान लगाया जा रहा हैः