Category: लेख, विचार

  • मिथलांचल में बाढ़ की तबाही

    पिछले कुछ दिनों से हुए मोसला-धार वर्षा और नेपाल द्वारा छोड़े गए पानी के कारण बिहार समेत पूरा मिथलांचल बाढ़ की तबाही से जूझ रहा है, ऐसे में जितने भी सियासी एवं सामाजिक कार्यकर्ता हैं उनकी ज़िम्मेवारी बढ़ जाती है कि वह बाढ़ पीड़ितों की – इस कठिन स्थिति में – सहायता करे। परंतु कुछ कठोर दिल नेता इस स्थिति में भी सियासी रोटी सेंकने से बाज़ नहीं आ रहे हैं और *जल स्थल* पे जाकर पीड़ितों के ज़ख्म पर मरहम – पट्टी करने बजाय फोटो खिंचवाकर और ऐसे ही खाली हाथ वापस हो कर पीड़ितों के ज़ख्म पर नमक छिड़कने का काम कर रहे हैं

    , यदि इनमें कुछ ऐसे भी नर्म – दिल नेता और समाजी कार्यकर्ता हैं जो अपने मान- सम्मान सबको भूला कर पीड़ितों के मासीेहा बन रहे हैं और घर घर जाकर उनका दुख – दर्द बाँट रहे हैं। ऐसी ही एक अद्भुत मिसाल सीतामढ़ी के अति – पिछड़े परखंड परिहार के परसा गाँव में नज़र आई। वहां के एक विपक्षी नेता (ग्रामीण क्षेत्र के यानी मुख्या पद के ) श्री आशिक जी ने मानवता की बेहतरीन मिसाल क़ायम करते हुए लगातार एक सप्ताह तक पीड़ितों और नदी में गांव के बचाव के लिए बांधे जा रहे बाँध में खटने वाले मज़दूरों के लिए अपनी तरफ़ से भोजन का इंतज़ाम किया और मज़े की बात ये है कि अपने हाथों से लोगों को भोजन कराया ,यही नहीं बल्कि इस गाँव के पूरे हिंदू – मुस्लिम समुदाय के लोग एकता की एक शक्तिशाली मिसाल बन कर बाढ़ से बचने का उपाय भी कर रहे हैं। इसकी जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है।

    अंत में बिहार सरकार से निवेदन है कि इस पूरे छेत्र का(मिथलांचल का ) दोबारा निरक्षण करे और भारी संख्या में हुई तबाही को ध्यान में रखते हुए पीड़ितों को मिलने वाली राशि—- (50,000(जिनका घर तबाह हुआ है) और 6,000(थोड़ी बहुत तबाही की जद में आने वाले) —-में बढोतरी करे , और केंद्रीय सरकार से भी अनुरोध है कि केंद्रीय मंत्रालय का एक डेलिगेशन भेज कर जल्द से जल्द सड़क – वाहन ठीक कर, travel बहाल कराए, और सीता मैया के जन्म स्थल सीतामढ़ी के लिए खुसूसी पैकेज का ऐलान भी करे, ताकि पीड़ितों का दर्द कुछ हल्का हो।

    ह.श.फाइज़
    hsfaaiz9@gmail.com

  • मॉब लिंचिंग: मानवता और सभ्य समाज को शर्मसार कर देने वाली घटना हैं।

    ज़ैन शाहब उस्मानी

    झारखंड के सरायकेला खरसावां जिले में भीड़ ने तबरेज अंसारी को चोरी के संदेह में कथित रूप से पीट पीट कर मार डाला था. तबरेज अंसारी की 17 जून को पिटाई की गई और 22 जून को उसने दम तोड़ दिया.

    17 जुलाई को सोनभद्र के उम्भा गांव में ट्रैक्टर ट्रॉलियों पर सवार होकर सैकड़ों की संख्या में लोग जमीन पर कब्जा करने पहुंचे थे और विरोध करने पर 10 लोगों को बेरहमी के साथ हत्या कर डाला था .

    बिहार के छपरा ज़िले में 19 जुलाई शुक्रवार को भीड़ ने मवेशी चोरी के कथित आरोप में तीन लोगों की पीट-पीटकर हत्या कर दी. मामले की जानकारी मिलने पर पुलिस मौके पर पहुंची लेकिन तब तक तीनों की मौत हो चुकी थी.

    21 जुलाई को झारखंड में एक बार फिर सुनियोजित तरीके से मॉब लिंचिंग कर मानवता का खून किया गया है। यहां डायन के संदेह में चार लोगों को पहले बुरी तरह पीटा गया और फिर गला काटकर निर्मम हत्या कर दी गयी है। गुमला जिले के सिसई प्रखंड मुख्यालय से 25 किलोमीटर की दूरी पर सिसकारी गांव में हुए इस नरसंहार में रविवार तड़के 3 बजे 10 से 12 अपराधियों ने घर में से खींचकर चार लोगों को बाहर निकाला और फिर उनकी गला काटकर हत्या कर दी। नरसंहार को अंजाम देने से पहले गांव में हत्यारों ने पंचायत लगाई थी। चारों लोगों पर ओझा गुनी और टोना-टोटका का आरोप लगाकर उनकी हत्‍या कर दी गई।

    ख़बर के ये मुताबिक़ ये सारी घटनाएं सुनियोजित तरिके से भिड़ तंत्र के द्वारा अंजाम दिया गया है, जो कि बहुत ही दुखद और निंदनीय है। और मानवता को शर्मसार कर देने वाली है।
    अब ऐसा मालूम होता है कि जैसे कुछ लोगों के अंदर क़ानून का डर समाप्त हो चुका है और वह लोग लगातार क़ानून को अपने हांथों में लेकर धर्म और जाती के नाम पर अमानवीय घटना को अंजाम दे रहे हैं। इस प्रकार की घटना से मैं बहुत आहत हूँ और केन्द्र सरकार और सभी राज्य सरकारों से विनम्रता के साथ निवेदन करता हूँ कि तत्काल मामले को गंभीरता से लेते हुए संसद और सभी राज्यों के विधानसभा में एक मोब लीचिंग के विरुद्ध एक मज़बूत कानून बनाया जाए।

  • पूना पैक्ट की कमजोर और गूंगी संतानें हैं लोकसभा के दलित सांसद

    दिलीप मंडल

    डॉक्टर भीमराव आंबेडकर ने 1932 में ही ये होता देख लिया था. और इसी वजह से उन्होंने अपनी पूरी ताकत के साथ इसका विरोध किया था. बात हो रही है पूना पैक्ट की. गांधी के आमरण अनशन के दबाव के जरिए दलितों से उनका सेपरेट इलेक्टोरेट यानी पृथक निर्वाचक मंडल छीन लिया गया और उन्हें रिजर्व सीटें थमा दी गईं. इसके बुरे असर का असर आंबेडकर को उसी समय हो चुका था. अब जो हो रहा है, वह बस उनकी उस समय की आशंकाओं का विस्तार है.

    अब से चंद दिनों में 17वीं लोकसभा गठित हो जाएगी. हर लोकसभा में कुछ नयापन होता है. कुछ चौंकाने वाली बातें होती हैं. सदस्यों की संरचना से लेकर शिक्षा, पेशे से लेकर संपत्ति तक का अध्ययन करके रिसर्चर कुछ नई बातें ले कर आते हैं.

    लेकिन इस नई लोकसभा की एक बात चुनाव खत्म होने से पहले ही तय हो चुकी है. अगली लोकसभा में, देश की 16.6 फीसदी यानी 20 करोड़ दलित आबादी की कोई मुखर और जानी-पहचानी आवाज नहीं होगी. इसमें एक अपवाद प्रकाश आंबेडकर हो सकते हैं, जो महाराष्ट्र के शोलापुर से चुनाव लड़ रहे हैं. हालांकि वे वहां कड़े तिकोने मुकाबले में फंसे हैं.

    बीएसपी अध्यक्ष मायावती लोकसभा चुनाव नहीं लड़ रही हैं. उन्होंने 2004 के बाद कोई लोकसभा चुनाव नहीं लड़ा. लोक जनशक्ति पार्टी के रामविलास पासवान भी चुनाव मैदान में नहीं हैं. नौ बार लोकसभा चुनाव जीत चुके पासवान इस बार राज्य सभा से संसद में आने की तैयारी कर रहे हैं. अगर बीजेपी ने अपना वादा निभाया तो वे इसी साल जून में मनमोहन सिंह के रिटायर होने के बाद असम से राज्य सभा में आ जाएंगे.

    आरपीआई के चीफ और कभी दलित पैंथर रहे रामदास अठावले बीजेपी की वजह से राज्यसभा में हैं और उनकी पार्टी लोकसभा चुनाव नहीं लड़ रही है. बीएसपी से कांग्रेस में गए दलित नेता पीएल पूनिया भी राज्य सभा में हैं. बीजेपी ने अपने दलित नेता उदित राज को आखिरी मौके पर टिकट नहीं दिया और वे चुनाव नहीं लड़ रहे हैं. दलित समुदाय की आवाज उठाने वाले और ऐसी क्षमता रखने वाले कुछ अन्य नेता जैसे सीपीआई के डी राजा, प्रो. बीएल मुंगेकर, नरेंद्र जाधव भी राज्य सभा में हैं. कांग्रेस नेता मल्लिकार्जुन खड़गे दलित तो हैं, लेकिन उनकी छवि दलितों के लिए बोलने वाले की नहीं है.

    सीटें रिजर्व हैं, लेकिन चुनकर कौन आ रहा है?
    ऐसा नहीं है कि दलित नेता लोकसभा चुनाव नहीं लड़ रहे हैं. संविधान में प्रावधान है कि लोकसभा और विधानसभा की सीटों में अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए आबादी के अनुपात में सीटें रिजर्व रहेंगी. इसलिए इस बार भी लोकसभा में 84 सीटें दलित उम्मीदवारों के लिए और 47 सीटें अनुसूचित जनजाति के उम्मीदवारों के लिए आरक्षित हैं. यानी हर हाल में लोक सभा में इतनी संख्या में दलित और आदिवासी सांसद तो होंगे ही. इसके अलावा, दलित और आदिवासी उम्मीदवारों के लिए अनरिजर्व सीटों पर लड़ने का भी विकल्प है.

    क्या ये 84 दलित सांसद दलितों की आवाज उठाने में सक्षम नहीं होंगे?
    शायद नहीं. अगर हम पिछली लोकसभा की कार्यवाही को याद करें तो ऐसे दलित सांसद कम ही हैं, जिन्होंने दलितों के मुद्दों को उठाया. मिसाल के तौर पर जब सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले से एससी-एसटी एक्ट कमजोर पड़ गया तो इसके खिलाफ आम तौर पर लोकसभा में इनकी तरफ से चुप्पी रही. लोकसभा सांसदों में इसका विरोध सिर्फ रामविलास पासवान और बाद में उदित राज ने किया. गौरतलब है कि दलितों की पार्टी जानी जाने वाली बीएसपी का पिछली लोकसभा में एक भी सदस्य नहीं था.

    दलित सांसदों की छिटपुट आवाजें तब आईं, जब दलितों का गुस्सा सड़क पर फूट पड़ा और उन्होंने 2 अप्रैल, 2018 को भारत बंद कर दिया. इसकी वजह से सरकार को कानून बनाकर एससी-एसटी एक्ट को पुराने स्वरूप में बहाल करना पड़ा. इसमें पूरा योगदान सड़क पर आंदोलन करने वाले दलित संगठनों का रहा.

    इसी तरह जब इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक फैसले के बाद यूनिवर्सिटी ग्रांट्स कमीशन ने आनन-फानन में 13 पॉइंट रोस्टर लागू करके रिजर्वेशन को विभागवार बना दिया, जिससे रिजर्वेशन लगभग समाप्त हो गया, तो दलित सांसद चुप रहे. जब इसके खिलाफ कैंपस और सड़कों पर आंदोलन शुरू हुआ और 5 मार्च, 2019 को भारत बंद हुआ, तब जाकर सरकार ने अध्यादेश लाकर 13 पॉइंट रोस्टर वापस लिया. दलित उत्पीड़न के मामलों, जैसे रोहित वेमुला की घटना हो या ऊना में दलितों की पिटाई का मसला, लोकसभा में दलित सांसदों की आवाज कम ही सुनाई देती है.

    कुल मिलाकर हम एक ऐसी स्थिति में हैं, जिसमें लोकसभा में दलित सांसद खामोश हैं और सड़कों से लेकर कैंपस में दलित बेहद मुखर और आंदोलित हैं.

    यहां सवाल उठता है कि दलितों की आवाज उठाने के लिए दलित सांसद ही क्यों चाहिए? दूसरी जातियों के सांसद भी तो ये काम कर सकते हैं? होने को ये हो तो सकता है. लेकिन अगर देश की इतनी विशाल आबादी की आवाज उठाने का सारा काम दूसरे समुदायों के सांसदों को करना पड़े, तो ये दुखद है. और फिर लोकतंत्र का मतलब ही प्रतिनिधित्व और हिस्सेदारी है. जिस शासन प्रणाली में खास समूह के तथाकथित विद्वान या प्रभावशाली लोग ही फैसले करते हैं, उसे लोकतंत्र नहीं प्लूटोक्रेसी या अभिजनवाद कहते हैं.

    दलित सांसद बोलते क्यों नहीं?

    इसकी एक संभावित व्याख्या के लिए हमें 1932 और उसके आसपास चली गांधी-आंबेडकर डिबेट को देखना चाहिए. ये वो समय था जब सेकेंड राउंड टेबल कांन्फ्रेंस (1931) हुई थी और फिर पूना पैक्ट (1932) पर दस्तखत किए गए थे. आंबेडकर चाहते थे और ब्रिटिश सरकार उनसे सहमत थी कि दलित (उस समय के अछूत, या डिप्रेस्ड क्लासेस) हिंदुओं से अलग हैं और उन्हें अपना प्रतिनिधि चुनने का अधिकार मिलना चाहिए. इसे सेपरेट इलेक्टोरेट या पृथक निर्वाचक मंडल कहा गया जहां दलित अपने प्रतिनिधि चुनते लेकिन गांधी की मान्यता थी कि इससे हिंदू बंट जाएंगे, इसलिए उन्होंने सुझाव दिया कि सेपरेट इलेक्टोरेट की जगह कुछ मतदान क्षेत्र दलितों के लिए आरक्षित कर दिए जाएं, जहां सभी लोग वोट डालें.

    इस बात पर गांधी अड़ गए और तर्क की जगह आमरण अनशन का जबर्दस्ती वाला रास्ता चुन लिया. जब उनकी तबीयत खराब हो गई तो भारी दबाव में और बेहद मजबूरी में आंबेडकर को गांधी की जिद के आगे झुकना पड़ा और आरक्षित सीटों की बात माननी पड़ी. यही पूना पैक्ट है.

    इस तरह अपना प्रतिनिधि खुद चुनने की दलितों की इच्छा पर पानी फिर गया. यही व्यवस्था आजादी के बाद भी जारी रही.

    रिजर्व सीटों की यह व्यवस्था मूक सांसद क्यों पैदा करती है?
    देश में एक भी लोकसभा की सीट ऐसी नहीं है जहां दलितों की आबादी 50 प्रतिशत से ज्यादा हो. यानी रिजर्व सीटों पर आधी से ज्यादा आबादी हर हाल में गैर दलितों की होती है. इसका मतलब है कि हमेशा गैर-दलित मतदाता ही रिजर्व सीटों पर निर्णायक होते हैं. यानी रिजर्व सीटों पर वही उम्मीदवार जीतेगा, जो गैर-दलितों को पसंद हो. दलित समुदाय के लिए लड़ने वाले, आवाज उठाने वाले दलित उम्मीदवार के जीतने की संभावना ऐसी सीटों पर काफी कम होती है. इन सीटों से जीतने वाले उम्मीदवार पर हमेशा ये दबाव होता है कि वह गैर-दलितों को नाराज न करे, वरना वो दोबारा नहीं जीत सकता. इसके लिए वह तमाम समझौते करता है. संसद में चुप रहना उनमें से एक है.

    भारत में दलित हितों की सबसे मुखर आवाज बाबा साहेब आंबेडकर, जिन्हें राष्ट्र निर्माताओं में गिना जाता है, कभी कोई लोकसभा चुनाव नहीं जीत पाए. पहली बार वे बॉम्बे उत्तर मध्य सीट से 1952 में हारे और उनकी दूसरी हार भंडारा सीट से 1954 के लोकसभा उपचुनाव में हुई. 1956 में उनका महापरिनिर्वाण हो गया.

    बीएसपी के संस्थापक कांशीराम ने इस गतिरोध को तोड़ने के लिए दलितों-पिछड़ों और अल्पसंख्यकों का गठबंधन बनाने की कोशिश की, लेकिन उन्हें भी सीमित सफलता ही मिल पाई. आज स्थिति यह है कि दलितों का एक बड़ा हिस्सा बेशक बीजेपी को दलित विरोधी मानता हो लेकिन लोकसभा में सबसे ज्यादा 40 दलित सांसद बीजेपी के हैं.

    लोकसभा में मुखर दलित नेताओं के होने और न होने का मतलब
    भारत की संवैधानिक व्यवस्था के मुताबिक देश की सत्ता का स्रोत लोकसभा है. यहां जिस पार्टी का बहुमत होता है, उसकी ही सरकार चलती है. इस सदन का विश्वास हासिल होने तक ही कोई प्रधानमंत्री अपने पद पर रह सकता है. इसके अलावा भारत के राजकोष, संचित निधि और बजट के बारे में फैसला करने का निर्णायक अधिकार लोकसभा का है. इसके लिए तीन संसदीय समितियां काम करती हैं- प्राक्कलन या एस्टिमेट कमेटी, लोक लेखा समिति और सार्वजनिक उपक्रमों से संबंधित समिति. लंदन यूनिवर्सिटी के पीएचडी स्कॉलर अरविंद कुमार का अध्ययन है कि इन समितियों में दलित सांसद नाम मात्र के होते हैं और यहां की कार्यवाहियों में उनकी हिस्सेदारी बेहद कम होती है.

    यानी देश कैसे चलेगा, सरकारी धन का इस्तेमाल कैसे होगा, इसे तय करने में देश के 20 करोड़ दलितों के प्रतिनिधियों की नाम मात्र की हिस्सेदारी है. ये लोकतंत्र के लिए अच्छी स्थिति नहीं है. इसे देखते हुए क्या दलितों को उनका सेपरेट इलेक्टोरेट यानी पृथक निर्वाचक मंडल मिलना चाहिए? राष्ट्र को इस बारे में विचार करना चाहिए.

    (लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं )

  • विश्व जनसंख्या दिवस:भारत की आबादी(एक विश्लेषण):मनु गौड़,अध्यक्ष टैक्सैब

    *भारत की आबादी(एक विश्लेषण):मनु गौड़,अध्यक्ष टेक्सपेयर्स एसोसिएशन ऑफ भारत (टैक्सैब)*

    वैज्ञानिकों का कहना है कि मानव सभ्यता की उत्पत्ति को लगभग 1 लाख 30 हजार साल से 1 लाख 60 हजार साल हो चुके हैं और हमें डेढ़ लाख साल लगे दुनिया की जनसंख्या को 100 करोड़ पहुंचाने में। सन् 1804 में दुनिया की आबादी ने पहली बार 100 करोड़ के आंकड़े को छुआ। अगले 123 साल में मतलब सन् 1927 में दुनिया की आबादी बढ़कर 200 करोड़ को गई। फिर भी इन्सान को समझ नहीं आया कि वो किस दिशा में बढ़ रहा है। 1960 में 33 वर्ष बीतने के बाद इन्सान ने अपनी आबदी को 300 करोड़ तक पहुंचा दिया। तब तक अनेकों वैश्विक संगठन बन चुके थे और कुछ लोगों को एहसास होना शुरू हो चुका था कि अधिक जनसंख्या ही मानव सभ्यता के पतन का कारण बन सकती है। तभी 1952 में आजादी के एकदम बाद भारत ने दुनिया में सबसे पहले परिवार नियोजन योजना शुरू की। उस समय भारत की आबादी थी लगभग 36 करोड़। लेकिन उससे भी आबादी पर कोई फर्क नहीं पड़ा। 11 जुलाई 1987 को दुनिया में 500 करोड़वें बच्चे ने जन्म लिया। तब यूनाईटिड नेशन्स को भी चिंता का एहसास हुआ और 36 सदस्यों वाले एक संगठन यूनाईटिड नेशन्स पाॅपुलेशन फंड – यू.एन.एफ.पी.ए. का गठन किया गया जिसे दुनिया में जनसंख्या के विषय में काम करना था। क्योंकि 11 जुलाई 1987 को दुनिया की आबादी 500 करोड़ पहुंची थी, इसीलिए 1989 से 11 जुलाई को विश्व जनसंख्या दिवस के रूप में मनाया जाने लगा। फिर भी आबादी का कारवां रूकने का नाम ही नहीं ले रहा था और 1960 के 300 करोड़ के आंकड़े को हमने अगले 39 वर्षों में 1999 में बदलकर 600 करोड़ कर दिया। 1999 के बाद अभी सिर्फ 19 वर्ष ही बीते हैं लेकिन दुनिया की आबादी लगभग 800 करोड़ के आसपास पहुंच चुकी है।

    जिस आबादी को लगभग डेढ़ लाख साल लगे 100 करोड़ पहुंचने में उसे हमने मात्र 214 सालों में ही 800 करोड़ के आसपास पहुंचा दिया है और अगर हम इसी गति से बढ़ते रहे तो 2050 में 1000 करोड़ के पार होंगे और प्रसिद्ध वैज्ञानिक स्वर्गीय प्रोफेसर स्टीफन हाॅकिंस की माने तो अगले 100 वर्षों में इन्सान को रहने के लिए दूसरे गृह की आवश्यकता होगी। आबादी के बढ़ते स्तर को देखें तो इसमें भारत का बहुत बड़ा योगदान है। जिस देश ने दुनिया में सबसे पहले परिवार नियोजन योजना प्रारम्भ की आज वो सरकारी आंकड़ों के अनुसार दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश बनने के कगार पर है। दुनिया की 2.4 प्रतिशत भूमि पर भारत में दुनिया की लगभग 18 प्रतिशत आबादी रहती है और भारत के पास अपनी इस आबादी को पिलाने के लिए सिर्फ दुनिया का 4 प्रतिशत पानी ही है। आजादी के बाद से हम लगभग 100 करोड़ बढ़ चुके हैं। कितनी विचित्र बात है कि आजादी से भारत में तीन गुना आबादी बढ़ चुकी है और 1947 की तुलना में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 5177 क्युबिक ली0 से लगभग तीन गुना ही घटकर 1545 क्यूबिक ली0 हो गई है। जिस देश में कभी दूध की नदियां बहती थीं आज वा पानी की नदियों को भी तरस रहा है। बढ़ती आबादी के लिए भोजन की चिंता के कारण हमारे देश में ग्रीन रिवोल्यूशन, आपरेशन फूड जैसी अनेकों योजनायें चलायी गईं, जिससे आजादी के बाद से रासायनिक खादों का प्रयोग लगभग 80 गुना बढ़ गया और अनाज उत्पादन बढ़ा लगभग 5 गुना और साथ में बढ़ी हैं बीमारियां। जिस देश में विश्व के पहले दो विश्वविद्यालयों की स्थापना हुई आज दुनिया के उच्चतम 250 विश्वविद्यालयों में उस देश का एक भी विश्वविद्यालय नहीं है। टैक्सपेयर्स के जिस पैसे को देश की प्रगति में लगना था अभी उस पैसे से हम शौचालय और गैस के कनैक्शन देने में ही लगे हैं। जबकि आज से लगभग 38 वर्ष पहले भारत और चीन की प्रतिव्यक्ति आय और अर्थव्यवस्था लगभग बराबर थी लेकिन चीन ने अपनी बढ़ती आबादी को रोककर अपने पैसों को रिसर्च, टैक्नोलोजी, रक्षा, रोजगार सृजन आदि के क्षेत्रों में लगाया और आज हम चीन की अर्थव्यवस्था के सामने कहीं पर भी नहीं ठहरते हैं। 1961 में हुए पहले बी.पी.एल. सर्वे के अनुसार भारत में 19 करोड़ लोग गरीबी की रेखा के नीचे जीवन यापन कर रहे थे जोकि 2011 के सर्वे में बढ़कर 36 करोड़ हो गये। यूनाईटिड नेशन्स के अनुसार भारत में 50 करोड़ से भी अधिक लोग गरीबी की रेखा से नीचे जीवन यापन करते हैं। अगले 35 वर्षों में युवा जनसंख्या अधिक होने के कारण भारत की आबादी लगभग 200 करोड़ होगी। जब दुनिया दूसरे गृहों की खोज में लगी होगी तब हम अपनी बढ़ी हुई आबादी के लिए शौचालय और घर बनवा रहे होंगे।

    आज ऐसा समय आ गया है जब प्रदूषण के कारण स्कूलों की छुट्टी की जा रही है। नीति आयोग के अनुसार देश के बड़े 20 शहरों में 2020 तक पानी समाप्त हो जायेगा। जंगलों को हम काटते जा रहे हैं और इसीलिए जंगली जानवरों ने आबादी में आना शुरू कर दिया है और अब हम उन्हें मार रहे हैं। जानवरों की आबादी को कम करने के लिए हमने बिहार में नील गायों को मारा, कहीं जंगली सूअर को मारा तो कहीं पर बन्दरों को मारा जा रहा है लेकिन इन्सान जो कि अपनी आबादी बढ़ाकर जंगलों को विकास के नाम पर काटने पर लगा है, उसे मारने का आदेश कौन देगा ? सन् 1974 से आज तक टैक्सपेयर्स के लगभग 2.25 लाख करोड़ रूपये परिवार नियोजन योजनाओं पर खर्च किये जा चुके हैं लेकिन यदि इस रकम का आंकलन हम आज के हिसाब से करेंगे तो यह 20 लाख करोड़ से भी अधिक बैठेगी। शायद टैक्सपेयर्स के पैसों का इससे बड़ा दुरूपयोग आज तक नहीं हुआ है। इतनी बड़ी रकम खर्च करके हमने क्या पाया है ? शायद 100 करोड़ की जनसंख्या वृद्धि और फिर भी उस पर तर्क करने के लिए अनेकों लोग तैयार हो जाते हैं।

    सन् 2000 में भारत में 100 करोड़वें बच्चे ने जन्म लिया और आज वो बच्ची बालिग हो चुकी है। जिस देश में हर साल सरकारी आंकड़ों के अनुसार लगभग 1.5 करोड़ आबादी बढ़ती है पिछले 18 वर्षों में उसी देश में 36 करोड़ आबादी बढ़ चुकी है अर्थात् 2 करोड़ प्रतिवर्ष। अब कौन सही है, सरकारी आंकड़े या वास्तविकता समझ नहीं आता। इसपर हम कहते हैं कि देश में फर्टिलिटी रेट अब कम आ चुका है। सरकार के इस तथ्य को शायद देश को समझने की जरूरत है।

    भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण की वैबसाईट के अनुसार अभी तक हमारे देश में 121,70,94,786 आधार कार्ड बन चुके हैं और लगभग 11 प्रतिशत आधार कार्ड बनने अभी बाकी हैं। जिसमें 30 जून 2018 तक 0 से 5 साल के बच्चों के 6,19,29,514 आधार कार्ड और 5 से 18 साल के बच्चों के 28,58,98,862 आधार कार्ड बन चुके हैं। प्राधिकरण के अनुसार 0 से 18 वर्ष के अभी 14,34,55,413 आधार कार्ड बनने बाकी हैं। वहीं प्राधिकरण के अनुसार 18 वर्ष से अधिक आयु के कुल 84,43,26,760 आधार कार्ड बनने हैं। यदि अब तक कुल बने आधार कार्ड में से हम 0 से 18 वर्ष की आयु के बने आधार कार्ड को घटायेंगें तो पायेंगें कि 18 वर्ष से अधिक आयु के 86,92,66,410 आधार कार्ड बन चुके हैं। प्राधिकरण के अनुसार 18 वर्ष से अधिक आयु के कुल 84,43,26,760 आधार कार्ड बनने हैं लेकिन अब तक 86,92,66,410 आधार कार्ड बन चुके हैं और अभी 11 प्रतिशत और बनने बाकी भी हैं। इससे देश समझ सकता है कि जनसंख्या को लेकर सरकारों के द्वारा हमारे देश में कितना झूठ बोला जाता है। कुछ माह पूर्व आयी चीन की एक रिपोर्ट के अनुसार चीन ने दावा किया है कि दुनिया का सबसे अधिक आबादी वाला देश चीन नहीं अब भारत है और भारतीय विशिष्ट पहचान प्राधिकरण की वैबसाईट भी चीन के इसी दावे को और पुष्ट करती है। भारत जनसंख्या विस्फोट के कगार पर है और हमारे देश की सरकारों को कोई चिंता ही नहीं है।

    अब भारत को जनसंख्या नियंत्रण के नये मार्गों के विषय में सोचना होगा अन्यथा की दृष्टि में भारत विश्व की गरीबों और मजदूरों की राजधानी बनकर रह जायेगा। अब यह इस देश के आम नागरिकों को सोचना है कि वो अपने बच्चों को क्या बनाना चाहते हैं ? गरीब – मजदूर या कुछ और। समझ नहीं आता कि अब हम किसको महान कहें ? भारतीय इतिहास को या आने वाले भविष्य को …….!!!!

  • मुस्लिम बहुल इलाकों से चुन कर आए हुए लोकसभा सदस्यों से एक आम मुस्लिम का सवाल

    मुस्लिम बहुल इलाकों से चुन कर आए हुए माननीय लोकसभा सदस्य,
    अस्सलामो अलैकुम !
    आपको हमने इसलिए चुना है कि आप हमारी आवाज़ बनेंगे और हमारी समस्याओं के प्रति सरकार को सजग कराते रहेंगे। निरंतर और प्रभावशाली प्रयास करेंगे । परंतु हम कई दशकों से देखते आ रहे हैं कि तमाम मुस्लिम नेता चुनाव के समय जोशीला और भावनात्मक भाषण देकर हमारा वोट तो हासिल कर लेते हैं लेकिन जीतने के बाद हमारे गंभीर मुद्दों पर चुप्पी साध लेते हैं। लेकिन हर चीज़ की एक सीमा होती है। हम मुकदर्शक बने नहीं रह सकते। बीजेपी और संघ के डर से आपको बहुत लंबे समय तक वोट नहीं दे सकते। अब आपको अपनी जिम्मेदारी निर्वहन करना ही होगा। और आप अपनी जिम्मेदारियों का कितना निर्वहन कर रहे हैं निम्नलिखित सवालों के जवाब से हमें बताने का कष्ट करें!

    1. आप लिंचिग के विरोध में कौन कौन सा कदम अभी तक उठाए हैं या उठा रहे हैं या उठाने वाले हैं?
    2. क्या आप लिंचिंग के विरोध में किसी तरह का कोई धरना प्रदर्शन या भूख हड़ताल किए हैं ? क्या आप लिंचिंग के विरोध में सड़कों पर कभी उतरे हैं?
    3.क्या आपने लिंचिंग को रोकने के लिए एक सख्त कानून व्यवस्था लाने की सरकार से मांग किए हैं? या क्या आप इस मांग के लिए अनिश्चित काल के लिए भूख हड़ताल पर कभी बैठे हैं?आपकी यह मांग सरकार मान ले इसके लिए आप कौन सा प्रभावशाली कदम उठाएं हैं या उठाने वाले हैं?

    4. क्या हम ऐसे ही बीजेपी के डर से आपको वोट देते रहें ताकि आप पांच साल एसी कमरों में बिरयानी और कोरमा तोड़े ? या आप लोगों की नपुंसकता को देखते हुए हम लोग भी अब बीजेपी को ही विकल्प बना लें?
    5.जब हमें ही सड़कों पर उतरना है और हमें स्वयं ही अपनी लड़ाई लड़नी है तो हम आपकी जगह बीजेपी को ही वोट क्यूँ न दें? हो सकता है बीजेपी के दिल में ही हमारे लिए ममता जाग जाए? हम आप जैसे नपुंसक नेताओं की जगह दुश्मन को ही दोस्त क्यूं नहीं बना लें?
    6. क्या कांग्रेस, सपा, बसपा ,राजद जैसी तथाकथित सेकुलर दल हमारे हितों की रक्षा करती है या हमारे लिए आवाज़ बन सकती है? यदि ऐसा नहीं है तो फिर आप इन दलों को क्यूँ नहीं छोड़ देते? क्या यह सच नहीं है कि आप अपनी निजी स्वार्थों के लिए इन तथाकथित सेकुलर दलों का गुणगान करते हैं?
    7.क्या आप यह मानते हैं कि तथाकथित सेकुलर दलों में आप

    मात्र एक मुखौटा भर हैं फिर आप किस मुंह से हमसे वोट मांगते हैं ? और फिर हम वोट देने वालों में और मोदी भक्त में क्या फर्क रह जाता है? मोदी भक्त भी बिना कारण वोट दे रहे हैं और हम भी आपको बिना किसी काम के।
    8.मुस्लिम बहुल इलाकों से मुस्लिम विधायक और सांसद चुने जाने के बावजूद आंकडे़ बताते हैं कि मुस्लिम बहुल इलाकों में स्कूल से लेकर अस्पतालों का भारी अकाल है । तो क्या यह सच नहीं है कि आप तथाकथित सेकुलर दलों के एजेंट के तौर पर सदियों से काम करते आ रहे हैं और आज भी उनके ही एजेंडों को ढो रहे हैं? यानी आपको हमारे विकास से कोई सरोकार नहीं है क्योंकि आप यह जानते हैं कि हम आपको बीजेपी के डर से वोट दे ही देते हैं।
    9.हज कमेटी से लेकर वक्फ बोर्ड , उर्दू एकादमी,मदरसा बोर्ड आदि में सौ फीसदी आप मुस्लिम नेताओं को ही नेतृत्व रहा है फिर भी यह सभी विभाग भ्रष्टाचार का अड्डा बना हुआ है। आप इनके खिलाफ कौन सा कदम उठाएं हैं और इन विभागों को भ्रष्टाचार मुक्त करने के लिए क्या कर रहे हैं?

    10.क्या आप यह मानते हैं कि देश में वोटों का पोलराईजेशन हो गया है और अब तथाकथित सेकुलर दलों का कोई भविष्य नहीं है? और ऐसी परिस्थिति में क्या हमें अपना नेतृत्व खड़ा करना चाहिए?


    धन्यवाद
    मुहम्मद वजहुल कमर
    एक आम नागरिक

  • भीड़ तंत्र और तबरेज

    सोनू झारखंड के एक ग्राम में पैदा हुआ था. उस का पूरा परिवार ही खेतिहर मजदूर था. खेती के सहारे अपनाऔर अपने परिवार का पालन पोषण करने के लिये गांव के सभी लोग उसी गाँव के ज़मींदारों के खेतों में खेती करते थे ।
    सोनू जब छोटा था तो उसकी माँ का देहांत हो गया था तो उसके पिता अपने साथ ही उसे खेतों पर ले जाया करते थे ।

    अभी सोनू कुछ बड़ा ही हुआ था की उसके बाप का भी स्वर्ग वास हो गया।
    अब सोनू घर में अकेला हो गया । वह खेतिहर मज़दूरी छोड़ कर काम के तलाश में पुणे चला गया और वहीं एक निजी कम्पनी में कार्य करने लगा ।
    जहां उसी में उसके पाँच साल बीत गये
    अब उसके अंदर गांव जाने की इच्छा हुई तो वह पुणे से गांव वापस आगया.

    गाँव वालो ने सोनू को घर बसाने का मशवरा दिया तो उसने हाँमी भर दी तो उन लोगों ने पास के गांव में ही एक यतीम लड़की से उसकी शादी रचा दी।
    अब फ़िर से सोनू की ज़िन्दगी में खुशियां लौट रही थी
    लेकिन एक दिन सोनू अपने ससुराल जा रहा था उसे लेट हो गया । बीवी ने कॉल करके पूछा तो उसने कहा दस मिनट में पहुंच रहा हूँ यही कह कर अभी उसने फ़ोन रखा ही था के कुछ लोग अचानक से चोर चोर चिल्लाने लगा और सोनू को पकड़ लिया

    और उससे नाम पूछ तो उसने अपना नाम सोनू बताया ,तब फ़िर भीड़ ने कहा पूरा नाम बताऊ तो उसने सोनू अंसारी बताया अंसारी शब्द सुनते ही भीड़ बिगड़ गई
    औसोनू को खंबे में बांध कर जय श्री राम का नारा लगा कर खूब पीटा और उससे भी जबरदस्ती जय श्री राम और जय हनुमान का नारा लगवाया उसी हालत में सोनू बेहोश हो गया । और जब पुलिस को इसकी सुचना मिली तो तो उसको हॉस्पिटल ले जाने के बजाए उसको थाना ले गई और लॉकअप में बंद करके पुलिस ने भी खूब पीटा जब उसके गाँव के लोग पुलिस से इलाज के लिए शिफारिश की तो पुलिस ने उसे ही जेल में बंद करने की धमकी दे दी ।
    लेकिन उसको पुलिस हॉस्पिटल नहीं ले गई यहां तक के चार दिन बीत गये।
    जब पुलिस को इस बात का एहसास हो गया के वह मरगया तो हॉस्पिटल ले गया जहाँ डॉक्टर ने सोनू को मुर्दा घोषित कर दिया

    लेकिन जब उसको मारने वाली वीडियो वायरल हो गया तो फिर हर तरह की राजनीति गर्मा गई
    (मोहम्मद अबशारूद्दीन)

  • मॅाब लिंचिंग का क्या कोई हल नहीं है??

    पिछले पांच साल में मॅाब लिंचिंग की सैकड़ों घटनाएं हो चुकी हैं। जिनमें लगभग 300 लोग मौत के मुंह में जा चुके हैं। दो चार को छोड़कर बाक़ी में मुसलमान ही उसका शिकार हुए हैं। एक घटना होती है, कुछ शोर सुनाई देता है, फिर खामाशी छा जाती है, फिर दूसरी घटना हो जाती है। यह घटनाएं गाय के नाम पर शुरू हुई थीं। आज चोरी के इलज़ाम तक पहुच गई हैं। इसका मतलब यह है कि अब देश में अदालतें और पुलिस सज़ाएं नहीं देंगी बल्कि खुद अवाम सज़ा देगी और वह भी सज़ाए मौत। अब किसी को भी अकेला पाकर उस पर कोई भी इलज़ाम लगाकर लोग मारने लगेंगे और इतना मारेंगे कि वह मर जाएगा। ज़रा सोचिए, अगर यही सिलसिला चल निकला और इसे रोका ना गया तो देश का क्या होगा? यह ज़रूरी तो नहीं कि हर जगह मुसलमान अल्पसंख्या में हों। हमारें यहां बहुत से गांव और शहरों में हिन्दू और मुसलमानमें की मिलीजुली आबादियां हैं। कहीं आबादी का प्रतिशत कम ज्यादा है। शहरों में तो नहीं मगर देहात में कहीं केवल हिन्दू है और कहीं मुसलमान। यह तो अच्छा है कि अभी मुसलमान धैर्य और संयम से काम ले रहा है। लेकिन जब ज़ुल्म हद से बढ़ जाता है तो फिर धैर्य का बंध टूट जाता हैं और किसी का बदला किसी से लेना शुरू कर दिया जाता है।
    मॅाब लिंचिंग को अंजाम देने वाले नासमझ, बेवकूफ़ और जाहिल नहीं हैं] बल्कि वह समझदार हैं। उनका संबंध बी.जे.पी, शिवसेना और बजरंग दल से है। उनके गले में “गेरूआ गमछा” इसका प्रतीक है। इसका मतलब है यह घटनाएं कोई हादसा नहीं हैं कि अचानक और अनजाने में हो जाते हों। बल्कि यह सिलसिला आर.एस.एस की उस पॅालीसी का हिस्सा है जिसके अंतर्गत मुसलमानों को भयभीत करके घुटने टेकने, घर वापसी करने और गुलामी स्वीकार करने पर मजबूर किया जा सके और इस तरह हिन्दू राष्ट्र का सपना साकार किया जा सके। उन गुण्डों की कमर पे उनके धर्म गुरूओं का हाथ है और उनको इनके सियासी आक़ओं की पनाह हासिल है।

    मॅाब लिंचिंग की यह घटनाएं अभी केवल आम आदमी तक सीमित हैं। अभी इसका शिकार अधिकतर मज़दूर और आर्थिक स्तर पर कमज़ोर लोग हैं। लेकिन वह दिन दूर नहीं जब धार्मिक नेता और सियासी नेता भी इसका शिकार होने लगेंगे। इसलिए कि जब तक नेतृत्व भयभीत नहीं होगा तब तक अवाम को ख़ौफ़जदा करके दुश्मन सियासी फा़यदा नहीं उठा सकता है।
    मिल्लत की तरफ़ से मॅाब लिंचिंग की इन घटनाओं पर अभी तक कोई काबिले ज़िक्र प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है। बहुत से मुसलमान लीडर्स ज़ुबान पर ताला लगाए बैठे हैं, कुछ लोगों ने प्रेस रिलीज़ और बयानात देकर फ़र्ज़ अदा कर दिया है। कुछ संगठनों ने परिवार से मिलकर शोक व्यक्त किया है। कुछ संस्थाओं ने प्रभावित परिवार की कुछ आर्थिक मदद कर दी है। तबरेज़ अंसारी के बाद देश में कुछ धरना प्रदर्शन देखने को मिले हैं। यह सब काम अपनी जगह ठीक हैं मगर इनसे काम नहीं चलने वाला। मौजूदा सरकार ना मुसलमानों के वोट से बनी है न उसे मुसलमानों का वोट चाहिए, वह तो मुसलमानों के वजूद से ही नफ़रत करती है, वह पचीस करोड़ इंसानों को नदी में बहा तो नहीं सकती, ना घुसपैठिया बताकर किसी और देश खदेड़ सकती है, हां वह भयभीत करके उन्हें गूंगा और बहरा बना सकती है। आज जब कि मुल्क की बड़ी बड़ी सेक्यूलर पार्टियां ज़मीन पर आ गई हैं, बड़ बड़े लीडरों ने घुटने टेक दिए हैं। मुसलमानों की मसीहाई का दम भरने वाले मुसलमानों का नाम लेने से भी घबरा रहे हैं। इन हालात में आम मुसलमान क्या कर सकता है?
    मॅाब लिंचिंग एक प्रकार की जंग है। मॅाब लिंचिंग करने वालों और कराने वालों ने मानो जंग का ऐलान कर दिया है। उनका सियासी नेतृत्व खुलेआम स्टेज से मुसलमानों को मारने का आदेश दे रहा है। हम जानते हैं जंग बिना नेतृत्व के ना लड़ी जा सकती है और ना ही जीती जा सकती है। यह तो हो सकता है कि जनशक्ति कम हो, जंग के सामान कम हों लेकिन नेतृत्व के बग़ैर किसी जंग का ख़्याल भी नहीं किया जा सकता। दुश्मन अपने नेता के अधीन जंग कर रहा है और हमारा कोई क़ाइद ही नहीं है। इसलिए मेरी राय है इस संबंध में मिल्ली, सियासी और समाजी संगठनों का एक संयुक्त सम्मेलन होना चाहिए और उसमें इस समस्‍या से निपटने की कार्यविधि बननी चाहिए। अलग अलग अपने झण्डे और बैनर के साथ प्रतिक्रिया, प्रदर्शन से कोई नतीजा नहीं निकलने वाला।

    समस्या यह नहीं है कि मुसलमानों में कोई क़ाइद नहीं है बल्कि मसला यह है कि मुसलमानों में नेताओं की भरमार है। आप मुस्लिम पर्सनल लॅा बोर्ड के मेंबर्स की लिस्ट पर नज़र डालिए तो आप देखेंगे कि हर मेंबर किसी अंजुमन, किसी ट्रस्ट, किसी जमाअत, किसी मसलक और किसी बड़े मदरसे का क़ाइद है। मुस्लिम मजलिसे मशावरत जिसकी स्थापना ही मुसलमानों के समाजी और सियासी इश्यूज़ के लिए की गई थी, दर्जनों जमातों का संगठन है। हमारी समस्या क़ाइद का ना होना नहीं बल्कि किसी एक व्यक्ति की क़यादत पर सहमति ना करने का है। कहीं फ़िक़ह और मसलक के इख्तिलाफ़ात, कहीं सियासी मतभेद और कहीं वैयक्तिक अहंकार हमें किसी को क़ाइद मानने की राह में रूकावट पैदा करता है। हिन्दुस्तान का मुसलमान सौ प्रतिशत धार्मिक है। वह अपने धार्मिक नेतृत्व से अक़ीदत और मुहब्बत रखता है। उनकी इताअत करने में सवाब समझता है। इसलिए जब तक धार्मिक नेतृत्व अपने मतभेद सौहार्द पूर्वक ख़्त्म करके एक दूसरे को गले नहीं लगाएगा तब तक अवाम एकजुट नहीं होगी। सबसे पहले धार्मिक नेतृत्व को खुले दिल से एक दूसरे को गले लगाना होगा, सबको अपनी ही तरह निश्छल मुसलमान मानना होगा। एक मुसलमान के दूसरे मुसलमान पर जो दायित्व हैं उन्हें अदा करना होगा। केवल मुस्लिम पर्सनल लॉ बोर्ड में एक स्टेज पर बैठ जाना और तथाकथित एकजुटता का प्रदर्शन करना काफ़ी नहीं है। जब तक मदरसों के सिलैबस में गुमराह फ़िरक़ों की लिस्ट में अपने अलावा सारे फ़िर्के़ शामिल रखे जायेंगे उस समय तक मॉब लिंचिंग होती रहेगी।

    यह कहना कि अवाम एकजुट नहीं है और किसी की बात सुनने को तैयार नहीं है, बिल्कुल ग़लत है। अवाम अपने क़ाइद के हुक्म पर हाज़िर होती है। तब्लीग़ी जमाअत के इज्तिमा में लाखों लाख का जमा होना इसका सबूत है। जमीअत उलेमा की कांफ्रेंस उसकी दलील है, जिस मसलक की जितनी संख्या है उसके अनुसार उसकी कांफ्रेंसों और इज्तिमाओं में लोग पहुंचते हैं। असदुद्दीन ओवैसी की एक झलक देखने को लाखों नौजवान सड़कों पर घण्टों इंतेज़ार करते हैं। मौलाना अरशद मदनी साहब, मौलाना महमूद मदनी साहब के पास लाखों छात्र और हज़ारों अध्यापकों की टीम मौजूद है। वह जब चाहें और जहां चाहें रोड जाम करके पूरे मुल्क के ट्रेफ़िक को जाम कर सकते हैं।
    मौजूदा हालात में मेरी राय है कि मुसलमान वकीलों को ज़िला स्तर पर लीगल सेल बनाना चाहिये और इस तरह की घटनाओं की क़ानूनी पैरवी करनी चाहिह। अभी इस देश में अगर कोई संस्था बची है तो केवल और केवल अदालत है। जब तक देश का संविधान नहीं बदलता, वर्तमान संविधान के अनुसार फ़ैसले होते रहेंगे और वर्तमान संविधान देश के नागरिकों के बीच इंसाफ़ के मामले में पक्षपाती नहीं है। इसलिए क़ानूनी कार्यवाही माना कि देर से होने वाली प्रक्रिया है लेकिन उसके परिणाम बेहतर साबित होंगे।
    जहां तक धरना प्रदर्शन का काम है, छोटे छोटे प्रदर्शन करने के बजाए एक ही दिन और एक ही समय पर ट्रेफिक जाम कर देना चाहिए। पूरे देश के हाईवे जब दस बारह घण्टे बंद रहेंगे तो दुनिया भर में आवाज़ गूंजेगी। छोटे प्रदर्शन में समय और पैसा भी बर्बाद होता है और कुछ लोगों की संख्या से कोई प्रभावित भी नहीं होता।

    कोशिश की जानी चाहिए कि हिन्दुओं का वह नेतृत्व जो स्वयं ब्रह्मणवाद के ख़िलाफ़ है और जिस पर ब्रह्मणों ने हज़ारों साल से ज़ुल्म किया है उस नेतृत्व को साथ मिलाया जाए, जैसा कि असदुद्दीन ओवैसी साहब ने महाराष्ट्र में प्रकाश अंबेडकर को मिलाया है। दलित और पिछड़े वर्ग को यह बताया जाए कि हिन्दू राष्ट्र में उनकी वही हालत हो जाएगी जो हिन्दुस्तान में मुसलमानों के आने से पहले थी। उनकी नौजवान नस्ल को हिन्दू धर्मग्रन्थों से निकालकर वह बातें बताई जाए जिनमें शूद्रों और दलितों के संबंध में नियम लिखे हैं। प्रिंट मीडिया, सोशल मीडिया और इलैक्ट्रानिक मीडिया पर वेद, गीता और मनुस्मृति के नियमों पर वार्ता की जाए; ताकि दलित और पिछड़ा वर्ग आर.एस.एस की घिनावनी साज़िश में उसका साथ ना दें।

    आज़दी के बाद कांग्रेस का राज रहा और मुसलमान आंखें बन्द करके कांग्रेस को वोट करते रहे। बाबरी मस्जिद का ताला खुलने और मंदिर का शिलान्यास करने के बाद विभिन्न सेक्यूलर पाट्रियों ने जन्म लिया और मुसलमानों की मसीहाई का दावा किया। मुसलमानों की मिल्ली क़यादत कभी किसी को, कभी किसी को वोट दिलवाती रही। मुसलमानों को हर कोई यह नसीहत करता रहा कि बु़िद्ध और विवेक से वोट डालना वरना फ़ाशिज्‍म आ जाएगा। मुसलमान अपने विवेक से वोट करके मुलायम, माया, लालू और ममता को कुर्सी पर बैठाता रहा लेकिन नतीजा क्या निकला? आज सारा देश भगवा रंग में है। मुसलमान और सरकार में मानो दुश्मनी का रिश्ता है। इसके बजाए अगर आजादी के बाद अपनी सियासी क़यादत बनाई गई होती तो कम से कम मिल्लत के आंसू पोंछने वाला तो रहता। अभी भी समय है कि केरला में मुस्लिम लीग, आसाम में ए.आई.यू.डी.एफ और तेलंगाना में ए.आई.एम.आई.एम को मज़बूत किया जाए। उसी के साथ दूसरे राज्यों में भी अपनी क़यादत पैदा की जाए। मॅाब लिंचिंग का एक हल यह भी है।

    हम यह भी जानते हैं कि मॅाब लिंचिंग की यह घटनाएं इस्लाम और मुस्लिम दुश्मनी का प्रतीक हैं। संघ परिवार ने अपनी पाठशालाओं, अपने लिट्रेचर, अपने प्रचारकों और अपने समाचार पत्रों के माध्यम से भारत का जो इतिहास अपने लोगों तक पहुंचाया है उसमें मुस्लिम दुश्मनी का ज़हर घोला गया है। यही वह ज़हर है जो आज सियासी सत्ता हासिल हो जाने के बाद उगला जा रहा है। इसका मुकाबला केवल इसी तरह किया जा सकता है कि अपने अमल, अपने अख़लाक और अपने संचार माध्यमों के द्वारा सही इस्लाम लोगों तक पहुंचाया जाए। ऐसा लिट्रेचर प्रकाशित किया जाए, अपने स्कूलों के सिलैबस में ऐसी किताबें शामिल की जाएं और ऐसी फ़िल्में बनाई जाएं जिनमें हिन्दू मुस्लिम भाईचारे और वतन के लिए मुसलमानों की कुर्बानियों का वर्णन हो। अगर यह काम पहले ही बड़े पैमाने पर किया गया होता तो शायद यह नौबत ही ना आती। लेकिन अब भी शुरू कर दिया जाए तो बड़ी तबाही से बचा जा सकता है।
    संक्षिप्त तौर पर यह कि मॅाब लिंचिंग सोची समझी, योजनाबद्ध और आर.एस.एस के नेतरत्व में एक जंग है। जिसका मुकाबला करने के लिए मिल्लत को भी किसी की क़यादत में कार्यविधि बनाकर काम करना होगा। कार्यविधि के अंतर्गत प्रभावी धरना प्रदर्शन, अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय संस्थाओं को मेमोरेण्डम, कानूनी पैरवी के लिए जिला स्तरीय मुस्लिम इंसाफ पसंद वकीलों का लीगल सेल, हिंदू धर्म में दलित और पिछड़े वर्ग पर आधारित साहित्य का प्रकाशन, राष्ट्रीय एकता और भाईचारे के स्थायित्व पर आधारित फिल्में और किताबों की तैयारी, अपने जुबान और अमल से इस्लाम की शिक्षाओं की तब्लीग़ को शामिल किया जा सकता है। हालात से मायूस होने की नहीं बल्कि हालात को समझने और मर्दों की तरह मुका़बला करने की ज़रूरत है।

    कलीमुल हफीज
    कंवीनर, इंडियन मुस्लिम इंटेलेक्चुअल्स फोरम
    नई दिल्ली-25

  • भ्रष्टाचार जैसी गन्दी बीमारी से अपने राष्ट्र की रक्षा कैसे करे? आज हमारे लिए ये गहन चिंता का विषय है:शौकत नोमान

    भारत का भ्रष्टाचार एक बीमारी कि तरह है, आज हमारा ऐसा कोई भी विभाग नहीं, जहां भ्रष्टचारी लोग नहीं बस्ते हो।
    ये हमारे महान भारत को दिन पर दिन खोखला करता जा रहा है।

    शौकत नोमान
    अगर हम सभी इससे सही वक़्त पर रोकने की कोशिश नहीं करते है, तो आने आने वाले समय में हम सब इसके शिकार होने वाले है। आए दिन टीवी चैनलों और सोशल मीडिया पर इस प्रकार के न्यूज दर्शाए जाते हैं, आज हमारे भारत देश में ज्यादा तर लोग भर्ष्ट है, भ्रष्टाचार से जुड़े वो हर लोग जो अपने स्वार्थ के लिए अपने देश का नाम बदनाम करने में जड़ा भी नहीं चूकते। इन्हे, इस से कोई फर्क नहीं पड़ता, ये वो लोग है जो कभी London का रुख कर सकते है।
    इन्हीं के कारण आज हमारा महान भारत भ्रष्टाचार के गंदे मामलों में आज 94वे स्थान पर आ गया है।
    आज ये हमारे लिए बहुत जरूरी हो गया है, ऐसे लोगो सामने लाने की, आज हमें ये सोचना चाहिए के हम अपने राज्य और राष्ट की रक्षा कैसे करे?
    इन्हे भ्रष्टाचार मुक्त राष्ट कैसे बनाए?
    आज ये हमारे लिए बहुत ही चिंतित का विषय बनता जा रहा है।
    हमारे सरकार को भी इस भ्रष्टाचार की गन्दी बीमारी को रोकने के लिए कठोर दंड-व्यवस्था की जानी चाहिए, एक सख्त कदम उठानी चाहिए।
    जिससे इन हैवानों के दिल में दहशत पैदा हो सके।

    आप अमेरिका ,जापान से को ही देख लीजिए,
    इन्हे छोरे, UAE को ही देखे, 30 साल पहले जिस का कोई वजूद तक नहीं था सिर्फ रेत ही रेत हुआ करता था। वो आज जो भी काम करते है, वो दुनिया का “The only one” या “The number one” कहलाता है।
    साथ ही साथ दुनिया का सबसे बड़ा भ्रष्टाचार मुक्त देश भी है।
    यहां की पुलिस स्टेशन के बारे आप कितना कुछ जानते है। चलिए, हम आपको बताते है।
    दुबई में आज स्मार्ट पुलिस स्टेशन चल रहे है, जोकि पूरी तरह पोलिसिंग विथाउट पुलिस पर आधारित है, जहां पुलिस की जरूरत ही नहीं पड़ती, पूरी सिस्टम को ऑटोमैटिक कर दिया,

    भ्रष्टाचार का कोई जुगर ही नहीं।
    अगर आप को कभी दुबई जाने मौका मिले तो वहां के “Smart Police Station” पर जरूर जाएं, वहां आपको कोई पुलिस कर्मी नहीं दिखेगा, वहां आप खुद से किसी का क्रिमिनल रिकॉर्ड देख सकते है, किसी भी प्रकार का कंपलेंट, ऐक्सिडेंट या लोस्ट एंड फाउंड हो, आप खुद से ही इसे ऑपरेट करके सारे काम कर सकते है, इसका ऑपरेटिंग सिस्टम बड़ा ही आसान होता है।
    अगर ये हमारे भारत में आता है तो
    इसके फायदे:- मानव हस्तक्षेप होने बंद हो जाएंगे,
    अगर ऐसा होता है तो भ्रष्टाचार को कुछ हद्द तक रोकने में हम कामयाब हो सकते है।

    इस तरह से हर विभाग में किया जा सकता है, जिससे ज्यादा से ज्यादा भ्रष्टाचार को रोका जा सके।
    आज हमारे वजीरे-ए-आजम को इस विषय पर कोई बिल पास कर इस काम को बढ़ावा देने की जरूरत है,
    आज से हम सब मिलकर ये अहद करते है, की ना तो रिश्वत लेंगे और नहीं रिश्वत देंगे।

    मेरा विश्वास हैं की भ्रष्टाचार का उनमूल करने के लिए सभी जुडी मुद्दे,
    जैसे- ,नागरिक, सरकारी संस्थानों, पुलिस तथा निजी क्षेत्र के अच्छे लोग के साथ मिल कार्य करना चाहिए और भ्रष्ट लोगो को जेल के सलाखों के पीछे भेजने में वो हर नामोमकिन कोशिश करनी चाहिए जहां तक आप सक्षम हो, जरा भी संकोच नहीं करना चाहिए, अगर ऐसा सभी करने लगे तो , डर और भय की नामोनिशान तक मिट जाएगा।

    मेरा मानना हैं की हर नागरिक को चौकना होना चाहिए तथा उसे हमेशा ईमानदारी तथा सतयनिष्ठा के ऊँचे मानो के तहत पक्का होना चाहिए तथा उसे भ्रष्टाचार के खिलाफ आवाज उठाने में सच का साथ देना चाहिए।
    शुक्रिया।।।

  • मुसाफिर हैं यारों…न घर है न ठिकाना

    आज सुबह मैं थोड़ा विलंब से जगा. ठंड काफी तेज थी. मुझे अनुभूति हुई क्योंकि रजाई के अंदर तक सरद हवायें घुस कर
    मुझे ठंड का अहसास करा रही थी. इच्छा न हो रही थी कि रजाई से बाहर निकलूं और इच्छा होना भी लाज़मी था क्योंकि आज रविवार है. नींद से तो मैं जाग चुका था मगर रजाई और बिस्तर को छोड़कर नहीं जगा. हर दिन की तरह जल्दबाजी में सुबह में उठना उठकर नित्य क्रिया से निर्वित होकर कोचिंग के लिए जाने जैसा नहीं था . ठंड के दिनों में बाइक चलाना कितना मुश्किल है वो तो आप लोग भली-भांति वाकिफ़ हैं .हाथ एकदम सुना पड़ जाता है ठंड हवायें जैकेट को चीड़कर सीधे सीने में प्रवेश करने की जद्दोजहद में रहती है लेकिन क्या करे जाना पड़ता है. मगर आज वो सब नहीं होना था. लेकिन एक बात मेरे मन में आज भी कौंध रही थी .जो हर दिन मुझे कोचिंग जाने के दरमियाँ रास्ते में कुछ लोगों को देखने पर होती है.जब मैं बाइक से कोचिंग के लिए निकलता हूं तो रास्ते में मुझे कूड़े-कचड़े के ढ़ेर पर दो-चार लोग दिखते हैं.

    कूड़े के पास फटे-पुराने कपड़े पहने उस कचड़े में से कुछ चुनकर खाते भी है और उसमें से कुछ कचड़े को फूंक कर अपने शरीर को गर्म करने की कोशिश करते हैं.मैं हर रोज देखता हूँ और देखकर उद्विग्न मन से आगे बढ़ जाता हूं. लेकिन वो दृश्य आज फिर मेरे आंखों के सामने से गुजरी है.मैं सोचता हूँ कि आज मैं इस मोटी रजाई को ओढ़ने के बावजूद ठंड से परेशान हूं तो उन बेघरों का इस ठंड में क्या हालत होगी. दिल्ली जैसे शहर में इस तरह की हालात हैं तो आप गांव के बारे में अंदाजा लगा सकते.फिर भी आज हम विकास का ढ़िंढ़ोरा पीट रहे है.आज आजादी के 70 वर्षों बाद भी लोगों को बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध नहीं हो पा रही है और हम खुद को विकासशील देशों में अपने को सुमार कर रहें हैं.
    आजादी के सत्तर साल बाद भी देश में कम से कम साढ़े चार लाख परिवार बेघर हैं. बेघर परिवारों में से प्रत्येक का औसत तकरीबन चार( 3.9 व्यक्ति) व्यक्तियों का है.
    जनगणना के नये आंकड़ों(2011) से पता चलता है बीते एक दशक(2001-2011) के बीच बेघर लोगों की संख्या 8 प्रतिशत घटी है तो भी देश में अभी कुल 17.7 लाख लोग बिल्कुल बेठिकाना हैं। हालांकि देश की कुल आबादी में बेघर लोगों की संख्या महज 0.15 प्रतिशत है तो भी इनकी कुल संख्या(तकरीबन 17 लाख) की अनदेखी नहीं की जा सकती.

    नई जनगणना में बेघर परिवार की बड़ी स्पष्ट परिभाषा नियत की गई है।.जनगणना में उन परिवारों को बेघर माना जाता है जो किसी इमारत, जनगणना के क्रम में दर्ज मकान में नहीं रहते बल्कि खुले में, सड़क के किनारे, फुटपाथ, फ्लाईओवर या फिर सीढियों के नीचे रहने-सोने को बाध्य होते हैं अथवा जो लोग पूजास्थल, रेलवे प्लेटफार्म अथवा मंडप आदि में रहते हैं.जनगणना में ऐसे लोगों की गिनती 28 फरवरी 2011 को हुई थी.

    विशेषज्ञों का मानना है कि बेघर लोगों की संख्या ठीक-ठीक बता पाना मुश्किल है क्योंकि ऐसे लोगों का कोई स्थायी वास-स्थान, पता-ठिकाना नहीं होता और ऐसे में बेघर लोगों को खोज पाना ही अपने आप में बड़ी मुश्किल का काम है. जिन मकानों की हालत अत्यंत जर्जर है, जो घरों बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं या फिर जिन घरों में एक छोटे से छत के नीचे बड़ी तादाद में लोग रहते हैं उन्हें भी बेघर में गिना जाय- ऐसा कई विशेषज्ञों का सुझाव है.
    जनगणना के आंकड़ों से पता चलता है कि साल 2001 से 2011 के बीच शहरी क्षेत्रों में बेघर लोगों की संख्या 20.5 प्रतिशत बढ़ी है जबकि ग्रामीण इलाकों में 28.4 प्रतिशत घटी है। बेघर आबादी में बच्चों की संख्या साल 2001 में 17.8 प्रतिशत थी जो साल 2011 में घटकर 15.3 प्रतिशत हो गई है.

    बेघर परिवारों की संख्या के मामले में शीर्ष के पाँच राज्य: उत्तरप्रदेश (3.3 लाख), महाराष्ट्र (2.1 लाख), राजस्थान (1.8 लाख), मध्यप्रदेश (1.46 लाख) और आंध्रप्रदेश (1.45 लाख). हैं. गुजरात (1.4 लाख) का स्थान इस क्रम में छठा है. बहरहाल अगर कुल आबादी में बेघर लोगों के अनुपात के लिहाज से देखें तो शीर्ष के पाँच राज्यों में राजस्थान (0.3%), गुजरात (0.24%), हरियाणा (0.2%),मध्यप्रदेश (0.2%) तथा महाराष्ट्र (0.19%) का नाम आएगा.

    इन आंकड़ों को देखने के बाद आप समझ सकते हैं कि भारत में लोगों की क्या स्थिति है। इस पर सरकार को जल्द ही पहल करने की जरूरत है । कम से कम लोग खुद के अपने घर में छत के नीचे रह सकें. उसे मुसाफिर की तरह इधर-उधर न भटकना पड़े.
    बात यहीं पर समाप्त नहीं होती इसके साथ ही लोगों को उनकी क्षमता के अनुसार रोजगार दिया जाये जिससे वो अपना जीवन निर्वाह उचित ढ़ंग से कर सके.
    और भी बहुत बातें हैं जो इसके अगली कड़ी में आपलोगों के सामने लेकर आऊंगा तब तक के लिए धन्यवाद.
    (आदित्य रहब़र:पूर्व छात्र लंगट सिंह कॉलेज,मुज़फ़्फ़रपुर बिहार)

  • हिंदुस्तान में तलाक़ और जुल्म की सबसे ज्यादा शिकार हिंदू महिलाएं:एम कैसर सिद्दीक़ी

    बीजेपी अपना हर काम हिंदुत्वा के नाम पर करती है हिंदु समाज की तरक्की उसका विकास बिजेपी का सवसे बड़ा ऐजेंडा माना जाता है बिजेपी के कुछ लीड़र और स्पोक पर्सन हर जगह कहते हैं कि हिंदु धर्म और हिंदु समाज खतरे में है उसकी फ्रिक हम नही करेंगे तो कौन करेगा लेकिन यह बिजेपी हिंदु औरतों पर बिल्कुल तबज्जो नही दे रही है हिंदुस्तान में सबसे ज्यादा हिंदु औरते जुल्म और नाइंसाफी की शिकार है इन्हे मंदिरो में पूजा करने की इजाजत नही दि पिछले साल सुप्रीम कोर्ट ने हिंदु औरतों को इंसाफ देते हुए सबरी माला मंदिर में जाने का हक दिया तो बिजेपी ने उसकी भी मुखालफत शुरु कर दी सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ तहरिक चलाई और हिंदु औरतों को मंदिर जाने से रोका और अभी भी वो इसी ऐजेंडे पर काम कर रही हैं

    हिंदुस्तान में इस वक्त तलाक का मसला मौजो बहस बन चुका है और बिजेपी का कहना है कि तलाक के नाम पर मुसलमान मर्द अपनी औरतों पर जुल्म करते हैं इसको रोकने के लिए बिजेपी कानून बना रही है पिछले पांच सालों में बिजेपा ने यही काम किया और अब नई हकूमत बनते ही बिजेपी सबसे पहला काम यही करने जा रही है लोकसभा में उसने तलाक बिल पेश भी कर दिया है और उम्मीद है यह बिल बहुत जल्दी पास भी हो जाएगा क्योकी बिजेपी की लोक सभा में अकसरियत है लेकिन राज्य सभा में बिल पास नही हो पाएगा क्योकि उसके पास अभी मेज्यूरिटी नही है जहां तक बात है तलाक के नाम पर जुल्म करने की तो इस मामले में इस हिंदुस्तान में सबसे ज्यादा जुल्म हिंदु औरतों पर ही होता है मुस्लमान औरतों पर नही हम यह बात यूं ही नही कह रहे है बल्की हमारे पास सबूत भी है एक रिपोर्ट के मुताअविक हिंदुस्तान में 68 फिसद तलाक शुदा औरत हिंदु ही है तो दूसरी तरफ मुस्मानों में तलाक शुदा औरते सिर्फ 23 फिसदी ही है

    यह रिपोर्ट साफ बता रही है कि हिंदुस्तान में सबसे ज्यादा तलाक शुदा औरतें हिंदु ही हैं और मुस्लमानों में तलाक के वाक्यात बहुत कम है इस लिए यह जरुरी है कि हिंदु औरतों को तलाक से बचाया जाए और हिंदु औरतों पर उनके शौहर जो जुल्म कर रहे है उससे उनको निजात दिलाई जाए लेकिन बिजेपी इस मामले में भी हिंदु औरतो की कोई फ्रिर नही कर रही हैऔर मुस्लिम औरतों के साथ महरवानी के नाम पर कानून बना रही है
    माहेरिन और तज्जिया निगारो का मानना है कि बिजेपी का तीन तलाक बिल मुस्लिम औरतों के खिलाफ है इससे उनकी फैमली तवाह होगी और मुस्लिम समाज की औरतें बिल्कुल भी इस बिल से खुश नही है पिछले साल हिंदुस्तान की 5 करोड़ मुस्लिम महिला ने अपने सिगनेचर के साथ लॉ कमिशन को यह बताया था कि हम इस्लाम के निजाम और शरियत के कानून से खुश है और बिजेपी का 3 तलाक बिल और कॉमन सिविल कोर्ट का ऐजेंडा हमें मंजूर नही है

    हिंदुस्तान के तमाम मुस्लमान मर्द और औरत इस 3 तलाक बिल के खिलाफ है और उनका मानना है कि इस बिल से उनकी परेशानी बडेगी जहां तक बात है मुस्लमान औरतों को बराबरी का दरजा देने और उनके साथ इंसाफ करने की तो यह बात जानना जरुरी है इस्लाम दुनिया का अकेला धर्म है जिसमें औरतों के साथ इंसाफ किया है उनको उनका हक दिया है और तलाक भी मुस्लिम औरतो के लिए एक रहमत है परेशानि
    शौहर और वीवी का जब एक साथ रहना मुशकिल हो जाता है तो तलाक और खुला के जरीए…मर्द और औरत दोनों को हक मिलता है कि वो शादी कर लें और जिंदगी गुजारे

    बिजेपी को अगर औरतों की फ्रिक ही है तो पहले वो हिंदु औरतों की फ्रिक करे और उनके साथ होने वाले जुल्म से उनको बचाए मुस्लिम औरतों के लिए उनका कुरान ही काफी है

    (लेखक:मिल्लत टाइम्स के एडिटर है)