Category: लेख, विचार

  • पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब:दया,स्नेह,प्रेम और करुणा के प्रतीक,संसार के सबसे महान हस्ती!

    खुर्रम मलिक
    कुछ महीने पहले न्यूज़ीलैंड के शहर क्राइस्टचर्च में एक गोरे रेसिस्ट ने वहां दो मस्जिदों में अंधाधुंध फायरिंग कर के कम से कम 50 लोगों की हत्या कर दी थी,लेकिन कई समाचार पत्रों ने उस सनकी आदमी को आतंवादी नहीं कहा,उसे सनकी,शूटर,गनमैन,के अलग अलग नाम दिए गए,लेकिन किया तब भी तस्वीर ऐसी ही होती जब इस ईसाई की जगह कोई मुस्लिम होता,शायद नहीं, आख़िर पूरी दुनिया में आतंकवाद को इस्लाम से ही जोड़ कर क्यों देखा जाता है?
    और कल हमारे देश भारत में कुछ मनुवादी विचारधारा के लोगों ने इस्लाम धर्म के पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद मुसतफ़ा सल्लाल्लहू अलैहि वसल्लम की शान में आपत्तिजनक शब्द कहें और उस ट्विटर पर ट्रेंड करवाने लगे, लेकिन तब भी इस्लाम के अनुयायियों ने किसी भी हिन्दू धर्म के देवी देवताओं के लिए एक वाक्य भी आपत्तिजनक नहीं कहे, और अपनी बात बड़ी शालीनता से रख दी, लेकिन सवाल यह है के ऐसे मानसिक रोगियों के ज़ेहन में ऐसी बात ही कियू आती है के उन्हें इस्लाम और पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद स. आ.व के प्रति घृणा या नफ़रत का भाव प्रकट हो जाता है
    किया सच में इस्लाम इस तरह के जघन्य अपराध की इजाज़त देता है, आज मैं इसी पर बात करूंगा के आख़िर इस्लाम किया कहता है?

    इस्लाम शून्यकाल से ही प्रेम, शांति,दया, सोहार्द का संदेश देता आया है
    कियुं के इस्लाम की शिक्षा के अनुसार तब तक कोई मनुष्य मोमिन(इस्लाम धर्म को मानने वाला)नहीं हो सकता जब तक के उसके हाथ और ज़ुबान से उसका पड़ोसी सुरक्षित ना हो,
    तो अगर कोई मुसलमान यदी किसी वयक्ति को गाली देता है,मारता है,परेशान करता है तो उसमें इस्लाम धर्म का कोई दोष नहीं है,
    परंतु वह व्यक्ति दोषी है,
    आज जो वतावरण समूचे विश्व में इस्लाम के विरुद्ध बनाया जा रहा है,वह तस्वीर का एक अलग पहलु है जिसपे ना तो प्रिंट मीडिया और ना ही इलेक्ट्रॉनिक मीडिया प्रकाश डालती है,विश्व में कहीं भी अगर कोई धमाका होता है तो यही मीडिया बिना जांच पड़ताल किए ही सबसे पहले उसे इस्लाम से जोड़ देती है और अपना फ़ैसला सुना देती है के यह देखिये यह है वह चेहरा जिसे ऊपर से तो इस्लामिक वस्त्र में लपेटा गया है परंतु अंदर से यह इतनी भयावह है के देखते ही मनुष्य की मिर्त्यु हो जाए,
    जब के मामला इसके उलट है,इस्लाम की उतपत्ति ही संसार की भलाई हेतु हुई है,इस संसार में मनुष्य ही नहीं जानवर आदि भी रहते हैं,और इस्लाम जानवरों से भी प्रेम का संदेश होता है,

    इसको आप ऐसे समझें के एक औरत जो वेशया थी जो दिन रात बुरे कर्म ही करती थी ,एक बार रास्ते में उसे एक कुत्ता मिला जो पियास से तड़प रहा था,यह देख उस औरत को उस कुत्ते पे दया आ गया और उसने अपनी जुराब और ओढ़नी को मिला कर बाल्टी का रूप दिया और फिर उस कुत्ते को पानी पिलाया, ओस औरत की यह दया अल्लाह को इतनी पसंद आई के उसने उसके सारे गुनाहों को माफ़ कर दिया,जब के उसके दिनचर्या कुकर्मों में ही व्यतीत होते थे,तो इस से साफ़ पता चलता है के इस्लाम धर्म में दया का एक महत्वपूर्ण स्थान है,
    क़ुरान में साफ़ लिखा है के जिसने एक मनुष्य को मारा समझो उसने सारे संसार को मार दिया,इस्लाम धर्म के आख़री नबी मुहम्मद स.अ.व. को संसार के लिये दया का देवता बना कर भेजा गया था, आप ने सदैव शांति और प्रेम का ही संदेश दिया, यही कारण था के जब पूरे संसार में लोग एक दुसरे के ख़ून के पियासे थे, लोग अपनी बेटियों को जनम लेते ही मार देते थे, स्त्रियों का हक़ उनको नहीं दिया जाता था,तब ईश्वर ने आपको भेजा, के जाईये और बताईये के इस्लाम अच्छे कर्मों की आज्ञा देता है,आपसे भाई चारे और सोहार्द का संदेश देता है,एक दुसरे की मदद के लिये कहता है,लोगों का एक मिथक यह बन गया है के इस्लाम तलवार के बल पर सारे संसार में फैला, जो के बिल्कुल झूट है,अगर ऐसा होता तो जब मक्का की लड़ाई में जब शत्रुओं को पराजित कर इस्लाम का झंडा ऊंचा किया गया तब मुहम्मद साहब ने सबको यह कहा के आज सब सुरक्षित हैं,किसी को डरने की आवश्यकता नहीं है,औरतों,बच्चों,बूढ़ों को किसी तरह की कोई कठिनाई नहीं होगी,हाँ जो लोग जवान हैं उन्हें टेक्स देना होगा,ऐसी ना जाने कितनी मिसालें इतिहास की किताबों में भरी पड़ी हैं

    जब इस्लाम ने अपने शत्रुओं के साथ बल का प्रयोग ना कर के उनके साथ दया किया, जब के वह उस वक़्त चाहते तो उनसे बदला ले सकते थे, लेकिन हर ऐसे समय में इस्लाम का वह पाठ उन्हें याद आ जाता जिसे उनके नबी मुहम्मद साहब ने पढ़ाया और बताया था,ऐसी ही एक कहानी बहुत प्रसिद्ध है के एक बुढ़िया मुहम्मद साहब पर प्रतिदिन कूड़ा फ़ेंक दिया करती थी, आप बिना कुछ काहे आगे बढ़ जाते थे,और यह सिलसिला कई दिनों तक चला,जब भी मुहम्मद साहब उस रास्ते से गुज़रते वह बुढ़िया आप के बदन पर कूड़ा फ़ेंक दिया करती थी,ऐसे ही एक दिन जब आप जा रहे थे तो आपके बदन पे कूड़ा नहीं फेंका गया तो आप विचार करने लगे के आख़िर किया बात है के बूढ़ी औरत ने कूड़ा नहीं फेंका,यह सोचते हुए आप उस औरत के घर गए,देखा तो वह बीमार थी,आपने उसका हाल चाल पुछा के माँ जी आज आपने मुझ पर कूड़ा नहीं फेंका तो मुझे शंका हुई तो इसी लिये मैं आपके पास चला आया,आप ठीक तो हैं ना, इतना सुनना था के बुढ़िया रोनी लगी और बोली के हाँ मैं दिल से मानती हूँ के तुम ही मुहम्मद हो,तुम ही सच्चे हो,तुम ही ईमानदार हो,मैं तुम पर ईमान लाती हूँ,और इस तरह वह बुढ़िया मुसलमान हो गई,

    मेरे दोस्तों इस से यही बात निकल के सामने आती है के इस्लाम ने सदैव दया और प्रेम का संदेश दिया है,इस्लाम ने सभी को अच्छे व्यवहार के लिये कहा है, मुहम्मद साहब का कहना है के सच्चा मुसलमान तो वही है जिसका व्यवहार(अख़लाक़) तुम में सबसे अच्छा है,
    एक समय था जब मुसलमान को सब में सबसे सच्चा समझा जाता था,लेकिन आज के समय में उसी मुसलमान को सबसे घटिया समझा जाता है,
    इस्लाम ने तो वज़ू के लिए भी ज़्यादा पानी इस्तेमाल करने पर मना किया है,तो फिर इस्लाम ख़ून बहाने की इजाज़त कैसे दे सकता है?
    बात अगर पैग़म्बर मुहम्मद साहब की जीवनी की करें तो पूरी दुनिया में वह एकमात्र ऐसी हस्ती है जिन के बारे में दुनिया के महानतम लोगों ने अपने अपने विचार रखे हैं, सबसे पहले बात भारत के राष्ट्रपिता कहे जाने वाले महात्मा गांधी की करें तो उन्हों ने अपने विचार कुछ इस तरह रखे है

    “मैं पहले से कहीं ज्यादा आश्वस्त हूं कि यह उन दिनों में इस्लाम के लिए एक जगह नहीं थी। यह कठोर सादगी, हुसैन की पूरी आत्म-प्रतिष्ठा, प्रतिज्ञाओं के प्रति निष्ठुर संबंध, अपने मित्रों और अनुयायियों के प्रति उनकी गहन भक्ति और उनकी असहिष्णुता, उनकी निडरता, ईश्वर में और उनके अपने मिशन में पूर्ण विश्वास था। न कि तलवार ने उनके सामने सब कुछ किया और हर बाधा को पार किया। ”
    उन्होंने साथ ही यह भी कहा के:
    “मैं लाखों मनुष्यों के दिलों पर एक निर्विवाद बोलबाला रखने वाले व्यक्ति के जीवन का सर्वश्रेष्ठ जानना चाहता था … मैं पहले से कहीं अधिक आश्वस्त हो गया कि यह तलवार नहीं थी जो इस योजना में उन दिनों में इस्लाम के लिए इस्तेमाल होती थी। बल्कि यह कठोर सादगी थी, पैगंबर के प्रति पूर्ण आत्म-सम्मान की प्रतिज्ञा, उनके मित्रों और अनुयायियों के प्रति उनकी गहन भक्ति, उनकी असहिष्णुता, उनकी निडरता, ईश्वर में उनका पूर्ण विश्वास और उनकी खुद की मिसियो …
    तो कहने का तात्पर्य यह है की इस्लाम सिर्फ़ और सिर्फ़ अमन,चैन, भलाई, और नेकी का हुक्म देता है,और झूट, बेईमानी, लड़ाई झगड़े से मना करता है, अब यह लोगों पर है के वह किया चुनते हैं?
    इस के साथ अगर हम मशहूर रशियन लेखक लियो टॉलस्टॉय
    की राय की बात करें तो उनका कहना था के “पैग़म्बर मुहम्मद साहब हमेशा ईसाई धर्म से ऊंचे रहे हैं। वह GOD को एक इंसान नहीं मानते हैं और कभी भी खुद को GOD के बराबर नहीं बनाते हैं। मुसलमान GOD को छोड़कर कुछ भी नहीं करते हैं और मुहम्मद उनके दूत हैं। इसमें कोई रहस्य और गोपनीय नहीं है। ”

    इन महान हस्तियों के पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब पर दिए गए विचारों से यह बात साफ़ हो जाती है के वह शांति के दूत थे।उन का जन्म ही विश्व में शांति, अमन चैन स्थापित करने के लिए हुआ था।कियू के उन्हें रहमत उल लिल आलमीन कहा जाता है ,अर्थात दोनों जहान के लिए दया और करुणा वाला व्यक्ति।जो पूरे संसार के सभी मानव जाती के लिए अपने दिल में दया और स्नेह का भाव रखता हो और सब से दया करने का आदेश देता हो। वह कैसे दया और स्नेह के पात्र थे इसे एक मिसाल से समझा जा सकता है।

    पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब के लोगों पर जब विरोधियों के अत्याचार बढ़ने लगे तो उन हों ने सबको धैर्य रखने का आदेश दिया,लेकिन विरोधियों ने उन के धैर्य का ग़लत मतलब निकाला और उन पर और अधिक अत्याचार करने लगे तब अल्लाह का हुक्म हुआ के अब इन से लड़ाई करो।और तब दोनों तरफ़ से एक दूसरे पर आक्रमण होने लगा और आख़िर में पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब की जीत हुई जिसे “फ़तह मक्का”के नाम से जाना जाता है और इस जंग में औरतें,बच्चे,बूढ़े लोग अधिक संख्या में पकड़े गए।और तब विरोधियों का डर से बुरा हाल था के पता नहीं अब मुहम्मद साहब हमारे साथ कैसा व्यवहार करेंगे? पता नहीं अब जान भी बचेगी के नहीं? लेकिन तब एक चमत्कार संसार ने भी देखा और इतिहास ने भी लिखा के एक व्यक्ति किया इतना भी दया और स्नेह का प्रतीक हो सकता है के सामने उसके शत्रु हों और वह उन से बदला ना ले कर उसे कहे के “जाओ मैं ने सभी को माफ़ किया” आज किसी को सज़ा नहीं मिलेगी,और फिर उस समय उनके शत्रु भी मुहम्मद साहब का यह व्यवहार देख कर हैरान हो गए के किया कोई ऐसा भी कर सकता है किया? हम ने इन के लोगों पर ना जाने कैसे कैसे अत्याचार किये और आज जब इन्हें मौका मिला था के अपने सभी अत्याचारों का बदला लें तो इन्होंने एक झटके में ही हम सभी लोगों को माफ़ कर दिया और हमें आज़ाद कर दिया।और पैग़म्बर हज़रत मुहम्मद साहब का यह व्यवहार इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया और रहती दुनिया को एक पाठ दे गया के हज़रत मुहम्मद साहब की जीवनी दया,स्नेह,करुणा और प्रेम का प्रतीक है। ना के कटुता, क्रूरता, डर,भय का प्रतीक है। इस लिए अगर कोई मनुवादी विचारधारा का व्यक्ति हज़रत मुहम्मद साहब पर कोई विवादित टिप्पणी करता है तो उसे चाहिए के वह हज़रत मुहम्मद साहब की जीवनी को पढ़े।मुझे पूरी आशा है के हज़रत मुहम्मद साहब के प्रति उसका नज़रिया बदल जाएगा और वह भी लोगों से प्रेम और स्नेह से मिलेगा।

    करो मेहरबानी तुम अहल ए ज़मीं पर
    ख़ुदा मेहरबां होगा अरश ए बरीं पर

  • मोदी जी इसरो प्रमुख को गले लगाता देख मन भावुक हो गया,काश कश्मीरियों को भी इसी तरह गले लगाते

    मोदी साहब, आपको इसरो प्रमुख के गले लगता देख मन भावुक हो गया,अच्छा लगा के हमारे देश का प्रधानमंत्री देश की इस दुख की घड़ी में देश के साथ है,और देश के वैज्ञानकों के प्रमुख को रोता देख उसे गले से लगा कर उसकी पीठ थपथपा रहा है, लगा के हां प्रधानमंत्री ऐसा ही होना चाहिए,जो देश में अाई किसी भी दुख की घड़ी में देश के साथ खड़ा हो, और ज़रूरत पड़ने पर ख़ुद देश की जनता बन कर जनता के साथ जनता के लिए काम करने लगे,तब देश का सर गर्व से ऊंचा हो जाता है, और फिर दुनिया ऐसे देश को और देश के मुखिया को सलाम करती है,

    लेकिन साहब आप को पता है के इसी देश में एक जगह ऐसी है जो इसी देश का अभिन्न अंग तो है, लेकिन जहां पिछले एक महीने से इंसानों का इंसानों से संपर्क नहीं हो रहा,और उस संपर्क टूटने से वहां भी लोग रो रहे हैं,तड़प रहे हैं,बच्चे,बूढ़े,बिलक रहे हैं,किया आप उनको भी ऐसे ही गले लगा कर उनके दुख दर्द में शामिल होंगे? उम्मीद है के आप को उनकी तड़प का भी एहसास होगा,और आप उनके बच्चों को सीने से लगा कर, उनकी पीठ थपथपाते हुए उन्हें हौसला देंगे,और यह कहेंगे के बेटा हम तुम्हारे इस दुख में बराबर के शरीक हैं,किया कभी उन पैलेट लगी गोलियों से छलनी हुई आंखों से बहते आंसुओं को अपनी उंगलियों के पोरों से साफ़ करते हुए आप की भी पलकें भीगेंगी? किया आप को उन मासूमों की तकलीफों का एहसास होगा जिसने मां की कोख से जन्म तो लिया लेकिन उसकी छाती से लग कर उसकी ममता को महसूस किए बिना ही इस दुनिया को अलविदा कह गया,किया आप को उन मांओं की बेचैनी का अंदाज़ा हुआ जिनके जिगर के टुकड़े को देखने के लिए और उसकी आवाज़ सुनने के लिए उसकी बूढ़ी आंखें पिछले एक महीने से राह तक रही हैं,और कान हर आहट पर खड़े हो जाया करते हैं, क़दमों की हर चाप पर वह चौंक जाया करती हैं,और भाग कर दरवाज़े को खोलती हैं और फिर मायूसियों से भरे मन से वह फिर इंतज़ार की सूली पर लटक जाती हैं। किया कभी आप ने उस इंतज़ार को महसूस किया है? बहुत भयावह स्थिति में हैं वहां के लोग साहब, एक इंसान द्वारा बनाई गई चीज़ के संपर्क टूट जाने पर पूरा देश दुखी है,हमें भी बहुत दुख है के हमारे वैज्ञानिकों की मेहनत कहीं बेकार ना चली जाए।हम दुआ भी कर रहे हैं के जल्द संपर्क हो जाए।

    लेकिन इसी जगह एक सवाल यह भी उठता है के जिस देश इंसानों द्वारा निर्मित वस्तुओं के संपर्क टूटने पर पूरा देश और देश का प्रधानमंत्री शोक व्यक्त करता हो उसी देश में इंसानों का इंसानों से संपर्क टूट जाने पर वही प्रधानमंत्री कोई शोक व्यक्त क्यूं नहीं करता? किया इंसानों की कोई कीमत नहीं? जब इतिहास लिखा जाएगा तो उसमें सफ़ेद पन्ने पर चंद्रयान का और इसरो के वैज्ञानिकों की मेहनत और उनके अथक प्रयासों का ज़िक्र ज़रूर होगा और यह हमारे देश के लिए गौरव की बात होगी लेकिन उसी इतिहास के एक अध्याय में काले पन्ने पर कश्मीर और कश्मीरियों की सिसकती बिलखती और बेबस ज़िन्दगी का भी ज़िक्र होगा जो देश के लिए शर्म की बात होगी। आप सरकार हैं,आप माई बाप हैं,आप देश के मुखिया हैं,आप सत्ता में हैं,तो एक सत्ताधारी दल के नेता बन कर नहीं बल्कि एक देश का प्रधानमंत्री बन कर सोचिये के किया इस तरह से लोगों का अपनों से संपर्क काट देना देशहित में है? किया इस तरह से आप अपने उस नारे (सबका साथ,सबका विकास और सबका विश्वास)पर परश्नचिन्ह नहीं लगा रहे हैं? तो मेरी आप से विनम्र निवेदन है के आप अपने इस नारे को अमली जामा पहना पाएंगे या फिर यह भी बस एक नारा भर ही रहेगा? उम्मीद है के आप को इसी देश के एक आम नागरिक की इस बात से सहमत होंगे और प्रधानमंत्री पद की गरिमा को बनाए रखने के लिए सफ़ल परयास करेंगे।


    लेखक खुर्रम मलिक

  • दिल्ली:ओखला में एक संगठन किया गया स्थापित,ये गरीब और वंचित तबके के बच्चो को नि:शुल्क शिक्षा प्रदान करती है:शौकत नोमान

    यहां हर कोई अपनी ज़िंदगी के भाग दौड़ में खुद को आगे भगाने में लगा है।
    ऐसे कुछ ही व्यक्ति है जो गरीब और निचले तबके के बच्चो की शिक्षा या उसकी ज़िदंगी के लिए सोचता हो। आज भी हमारे भारत देश की एक बड़ी आबादी शिक्षा से वंचित है। कंप्यूटर के ज्ञान से लेकर अंग्रेजी तक उन्हें कुछ नहीं पता होता है।
    वहीं पेशे से वकील एच आर खान ने गरीब बच्चो को शिक्षा प्रदान कराने का जिम्मा उठाया है। वो इन बच्चो के लिए जो कुछ भी सम्भव हो वो करते है। वो एक अच्छे समाज सेवी के रूप में जाने जाते है।

    वो समाज सेवा करने का कोई भी मौका नहीं छोड़ते।
    ओखला जमिया नगर के शाहीन बाग़ में एक नॉन प्रॉफिट तंजीम “एजुकेशन_फॉर_यूथ” ये जरूरतमंद और निचले तबके के बच्चो के लिए नि:शुल्क शिक्षा प्रदान करता है।
    खान का कहना है इस दौर मै शिक्षा की अहमियत उन इक्छुक बच्चो से जानना चाहिए जो तालीम हासिल करना चाहते है लेकिन पैसों के अभाव में महरूम रह जाते है।
    उनके संगठन “एजुकेशन_फॉर_यूथ” इस बात से काफ़ी प्रतिबद्ध है के गरीब बच्चो की शिक्षा और उन्हें सही मार्ग दिखाना ही हमारा फर्ज है, इन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देनी है।
    इसकी शुरुआत 2016 में हुई थी और ये संस्था अलग अलग कई इलाक़ो में काम कर रही है, अब फरवरी 2019 से शाहीन बाग़ में काम शुरू किया है।

    इसकी शुरुआत एच आर खान और उनकी टीम ने की है।
    उन्होंने बताया, शुरुवाती वक़्त कुछ दिकते आईं, अब धीरे धीरे सब ठीक होता चला गया।
    इस काम के लिए उन्हें पैसों की भी जरूरत पड़ी।
    वो और उनके साथी आपसी कॉन्ट्रिब्यूशन से ये सब काम करते हैं, अब अगर आप चाहें तो इनकी मदद कर सकते हैं।

    इस संस्था में बच्चो को मुफ्त बेसिक कंप्यूटर क्लास तथा इंग्लिश स्पीकिंग कोर्स कराई जा रही है,
    अगर आपकी नजर में भी ऐसे कोई बच्चा हो तो आप यहां भेजें।

    साथ ही “एजुकेशन_फॉर_यूथ” की तरफ से लाइब्रेरी भी शुरू किया जाएगा जिसकी तैयारी चल रही है, अगर आप फ़्री लाइब्रेरी ज्वाइन करना चाहे तो कर सकते है।
    लाइब्रेरी की ओपनिंग तिथि जल्दी ही साझा किया जाएगा।

    अगर आप इस मुहिम हिस्सा बना चाहते है तो संपर्क कर सकते है।
    मो.-7065630009
    वेब लिंक-http://educationforyouth.in

  • और जब हम विरोध पर अड़ गए तो राज खोल कर रख दिये:मुस्तकीम सिद्दीकी

    राज्यसभा या लोकसभा का ख्याल रखकर एक एम एल सी की सीट पर अंदरखाने समझौता किया गया था, समझौता के नाम पर दीन बचाओ- देश बचाओ का कार्यक्रम कराया गया था, अलग अलग खबरों के अनुसार 5 से 10 लाख मुसलमान बिहार के गांधी मैदान में 15 अप्रैल 2018 को जमा हुआ था। मेरे जैसा मूर्ख तीन महीने इसका प्रचार प्रसार अपने खर्च पर किया था। तीन बसें अपने खर्च पर ले गया था। प्रोग्राम खत्म होने से पहले पर्दा हट गया था।

    घर पहुंच कर दूसरे दिन हमने इमारत ए शरिया फोन किया, इमारत शरिया के नाजिम मौलाना अनीसुर्रहमान कासमी ने कहा के तुम जैसे लाखों लोगों के सवाल का जवाब देने के लिए इमारत ए शरिया नही बनाया गया है। मेरा जवाब था की अगर पर्दे के पीछे डील का कारण नही बताया गया तो उन लाखों में से मैं सिर्फ उतने को ही जानता हूँ जिसे अपने खर्च पर लेकर गया था। मैं लाख तो नही लेकिन एक हजार से ज्यादा की भीड़ इकट्ठा करने की ताकत रखता हूँ, अगले हफ्ता इमारत ए शरिया का गेट इस एक हजार की भीड़ से जाम होगा, आप पुलिस को बुलाकर भीड़ खदेड़ने की तैयारी करें और हम मीडिया के साथ अगले सप्ताह आपके गेट के सामने आ रहे हैं। जवाब दें या मीडिया में खबर हम बनाएंगे।

    उन्होंने कहा की आधे घँटे बाद फोन करो, मैंने आधे घँटे बाद फोन किया, उनका कहना था क्या माँग है, मैंने कहा दीन बचाओ-देश बचाओ के नाम पर धोखा क्युँ हुआ, ईमानदारी से जवाब चाहिए, फेसवुक लाइव पर आइये। डेट फिक्स हुआ, हम पटना गये, पटना से अपने मित्र
    Khurram Malick को साथ लिया, वहां सब कुछ राज खुल गया, सब कुछ सिर्फ एक एम एल सी बनाने के लिए 10 लाख की भीड़ मुसलमानो के चन्दे के पैसों से जमा किया गया था। नाजिम साहब ने गलती मानी, फेसबुक पर लाइव भी आये, फेसबुक पर गोलमोल जवाब दिया लेकिन अंदर से बहुत टूटे लग रहे थे, वापस आकर हमने सच बताने का शुक्रिया अदा किया तो उन्होंने पूछा की अब आप लोग मुतमईन तो हैं, अब तो कोई धरना प्रदर्शन तो नही करोगे। यह है आज की सच्चाई।

    उलमा का मतलब यह नही है की जज्बातों का सौदागर बने। राजनीति करनी है तो खुल कर करें, राजनीति के नाम पर सौदगिरी बन्द करें।
    (Mustaqim Siddiqui)

  • आर बी आई:रघुराम राजन से शक्ति कान्त दास तक का संकट:डॉ सलीम खान

    (डॉ सलीम खान)
    रिज़र्व बैंक ऑफ इंडिया। के भूतपूर्व गवर्नर रघुराम राजन और वर्तमान गवर्नर शक्ति कान्त दास के बीच वैसा ही फर्क है जैसा भूतपूर्व प्रधान मंत्री मनमोहन सिंह और वर्तमान प्रधान मंत्री नरेंद्र मोदी।
    एक अर्थशास्त्र का राजा भोज तो दूसरा गंगू तेली।

    मनमोहन सिंह दुनिया के प्रमुख अर्थशास्त्रियों में से होते हैं। २०१३ में रिजर्व बैंक का गवर्नर नियुक्त किए जाने से पहले उन्होंने बहुत सोच-समझकर रघु राम राजन को तीन साल के लिए बुलाया लिया था।

    मनमोहन सिंह ने राजन को २०१२ में आर्थिक सलाहकार बनाया ताकि वह केंद्रीय बैंक को संभालने की तैयारी कर सकें। 9 मई को नरेंद्र मोदी के सत्ता में आने के साथ, रघु राम राजन के दिन भर गए थे और उनका इशारा समझ के किनारे हो गए थे। नोबेल विजेता अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन ने त्रासदी पर टिप्पणी की और कहा कि यह देश के लिए अफ़सोस की बात है। क्योंकि राजन एक उत्कृष्ट अर्थशास्त्री हैं और उन्होंने भारतीय रिजर्व बैंक और भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए शानदार काम किया है। मोदी जी ने पहले राजन के बाद उर्जित पटेल को गवर्नर बनाया, लेकिन जब उन्होंने पल्ला झाड़ा, तो शक्ति कांत दास सहमत हो गए।

    मोदी सरकार को रघु राम राजन जैसे प्रतिभाशाली गवर्नर के जाने का ज़रा भी अफसोस नहीं था। लेकिन खुशी थी कि कांटा नकल गया। राजन के बाद सरकार जिन नामों पे गौर कर रही थी उसमें सबसे ऊपर अरविंद सुब्रमण्यम,कौशिक बसु, अरुंधती भट्टाचार्य शामिल थे लेकिन अचानक आरबीआई के डिप्टी गवर्नर उर्जित पटेल के नाम की घोषणा की गई जो मोदी की अपनी पसंद थी। जैसे ही उर्जित पटेल का नाम सामने आया, लोगों को लगा कि प्रधानमंत्री अपने प्रांत के किसी व्यक्ति को यहां भी लेकर आए हैं। उनके पास ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी से एम.फिल और येल विश्वविद्यालय से पीएचडी की डिग्री है। रिजर्व बैंक में डिप्टी गवर्नर के रूप में, वह वित्तीय नीति विशेषज्ञों की समिति के प्रमुख हैं। वे ब्रिक्स देशों के साथ सरकारी अनुबंधों और अंतर्राष्ट्रीय संयुक्त बैंक की स्थापना में महत्वपूर्ण भूमिका निभा चुके है। उर्जित पटेल ने १९९८ से २००१ तक वित्त मंत्रालय में आर्थिक मामलों के सलाहकार के रूप में भी काम किया था।

    और उन्हें वित्त, ऊर्जा और अधिकृत संरचना क्षेत्र में 17 से अधिक वर्षों का अनुभव है। यह एक स्वागत योग्य बात थी, लेकिन दुख की बात यह है कि उर्जित पटेल ने रघुराम राजन की तरह अपने कार्यकाल के पूरा होने का इंतजार नहीं किया और निजी कारणों का बहाना बना के बीच में चले गए। हाल ही में, RBI के पूर्व डिप्टी गवर्नर चंद्र मोहन ने NDTV को बताया कि पटेल के जाने का असली कारण निजी नहीं था, लेकिन यह कि वह रिज़र्व बैंक के कामकाज में सरकारी हस्तक्षेप के प्रति प्रतिरक्षित नहीं थे। वे भारतीय रिजर्व बैंक को राष्ट्रीय हित के खिलाफ सरकार को धन हस्तांतरित करने पर विचार करते थे और इसे सरकार को सौंपना नहीं चाहते थे। सरकार लगातार उनके विवेक के साथ सौदेबाजी करने के बजाय उन पर ऐसा करने के लिए लगातार दबाव बना रही थी। उन्होंने अपने जमीर का सौदा करने की बजाए इज्जत के साथ किनारा करलिया इस तरह देश ने एक और अर्थशास्त्री को खो दिया। उर्जित पटेल के ६ महीने के बाद रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया के डिप्टी गवरनर वेराल आचार्य ने कार्यकाल पूरा करने से पहले ही इस्तीफा दे दिया।

    वेराल आचार्य ने आई आई टी मुंबई से कंप्यूटर विज्ञान बी टेक स्नातक प्राप्त करने के बाद न्यूयॉर्क विश्वविद्यालय से पीएचडी की। उन्होंने लंदन बिज़नेस स्कूल में सात साल बिताए, अर्थशास्त्र के क्षेत्र में काम किया और फिर बैंक ऑफ इंग्लैंड में काम किया। मोदी इस गलत धारणा के तहत कि हार्वर्ड जैसी प्रसिद्ध बुद्धिजीवियों में मेहनत नहीं की जाती है, लेकिन संघ की शाखाओं में ही मेहनत की जाती है। राजन, पटेल और आचार्य की सराहना कैसे कर सकते थे?

    इस प्रकार, एक-एक करके, जो राष्ट्र के हित के लिए प्रिय थे और जो अपने स्वयं के सम्मान के लिए सरकार की आज्ञा का पालन करने के लिए तैयार नहीं थे, उन्हें एक एक करके खारिज कर दिया गया। इस स्थिति में, सूखाग्रस्त संघ परिवार को एम ए शक्तिकांत दास को गवर्नर बनाने के लिए मजबूर होना पड़ा। पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली के करीबी माने जाने वाले 61 वर्षीय नौकरशाह भारतीय अर्थव्यवस्था के लिए अच्छे शगुन नहीं थे। नोटबंदी के दौरान सरकार के मूर्खतापूर्ण निर्णय का बचाव करने के लिए उन्हें पुरस्कार के बदले में पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उनके अवसरवाद और चापलूसी का जवाब इस बात से दिया जा सकता है कि जब उनसे पूछा गया कि राज्यपाल उर्जित पटेल नोट बंदी के मुद्दे पर चुप क्यों हैं, तो उन्होंने कहा, “इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि कौन बोल रहा है। मैं सरकार की ओर से बोल रहा हूं। मैं निजी विकल्पों को संबोधित नहीं कर रहा हूँ। इरादा सरकार से संवाद करने का है”। तमिलनाडु में जब वह सचिव (उद्योग) थे, उन पर अपुष्ट भाजपा नेता सुब्रमण्यम स्वामी का आरोप था। यह और बात है कि जेटली ने निजी और मंत्रालय के ट्विटर हैंडल से स्वामी के आरोपों का तेजी से खंडन किया। दास पे एक ग्रोस नाम की वेबसाइट ने भी आरोप लगाया, कि उसने 100 एकड़ सरकारी जमीन अमेरिकी कंपनी को सस्ते दामों में बेच दी। दास के भ्रष्टाचार के आरोपों को देखते हुए, मूसरई भाई की कहावत को याद किया जाता है।

    लगभग दो साल पहले, यह दावा किया गया था कि शक्ति कांत दास जी 20 बुलेटिन में भगोड़े आर्थिक अपराधियों पर विजय माल्या या नीरव मोदी जैसे लोगों से बाहर निकलने में एक पैराग्राफ लगाने में सफल रहे, लेकिन कागज के लाभ। कोई व्यावहारिक लाभ नहीं देखा गया। न तो इन लोगों को गिरफ्तार किया गया और उनकी सभी संपत्ति को सरकारी हिरासत में नहीं लिया जा सका। दास ने पद ग्रहण करने के बाद राजनीतिक आकाओं की प्रशंसा करते हुए कहा, “अर्थव्यवस्था में कम समय में किए गए भारी परिवर्तनों के कारण विकास में गिरावट अस्थायी है।” इस बयान के डेढ़ साल बीत चुके हैं, लेकिन देश की आर्थिक स्थिति खराब हो गई है। इन परिस्थितियों में, ऐसा नहीं लगता है कि जिस विपत्ति को वे दूर करने की कोशिश कर रहे थे वह अस्थायी थी। इस बात की प्रबल संभावना है कि इनकी और सरकार की मूर्खता से ये स्तरता की गिरावट लंबी ना हो जाए। शक्ति कांत दास की बोली वित्तीय कम और राजनीतिक ज़्यादा लगती है।

    उदाहरण के लिए, ऑनलाइन ई-कॉमर्स के क्षेत्र में, दुनिया के सबसे बड़े निगम, अमेज़ॅन के लिए उन्होंने कहा, “अमेज़ॅन अपनी सीमाओं में रहे, और भारतीय प्रतीक और महान व्यक्तित्व के रास्ते में गंदा काम करने से बाज रहे। इस मामले में असंवेदनशीलता आपके लिए खतरनाक होगी” इस तरह का बयान आर्थिक जगत में आश्चर्यजनक था, लेकिन मोदी भक्त खुश थे। शक्ति कांत दास शुरू से ही रिजर्व बैंक के अतिरिक्त लाभांश को सरकार को सौंपने के लिए प्रोत्साहित करते रहे हैं, इसलिए इसके तुरंत बाद आशंका जताई गई थी कि वह आरबीआई कि आपातकालीन निधि को सरकार की तंगी में सहायता के लिए इस्तेमाल करेंगे। जब भी मोदी सरकार मुश्किल में पड़ती है, वे एक आज्ञाकारी दास के रूप में अपना कर्तव्य निभाएंगे। मौका बहुत जल्द आ गया और उन्होंने सरकार को एक लाख ७६ हजार करोड़ रुपये सौंप दिए। राष्ट्र हित के लिए पार्टी और पार्टी की खातिर व्यक्तिगत हित को तरजीह देने का दावा करने वाले मोदी ने सत्ता के लिए शक्ति कांत दास की मदद से राष्ट्रीय खजाने का बलिदान किया है। नोटबंदी के विरोध में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की डॉ मनमोहन सिंह की आलोचना याद आती है। मोदी ने कहा था कि मनमोहन की अवधि के दौरान, लगातार घपले पे घपले होते रहे, लेकिन उन्होंने खुद पर कोई दाग नहीं लगने दिया, क्योंकि वे जानते हैं कि ‘बाथरूम में रेनकोट पहन के स्नान कैसे किया जाता है। बीजेपी किसी भी दाग को उन पर साबित नहीं कर पाई थी लेकिन राफेल में एक उड़ान द्वारा मोदी की पवित्रता को मिट्टी में मीलादिया। और जब उन्होंने दाग धोने के लिए स्नान घर में प्रवेश किया, तो पानी समाप्त हो गया था, जिसका अर्थ था कि खजाना खाली हो चुका था। इस स्थिति में, उन्हें सुपर सर्फ के साथ पानी खरीदने के लिए रिजर्व बैंक से पैसे चुराने के लिए मजबूर होना पड़ा।

    आजकल, बीजेपी वाले किसी भी गिरोह से आय लोगों को इसी गंगा जल और पतंजलि साबुन से भ्रष्ट नेताओं को पवित्र कर के भाजपा में शामिल कर लेते हैं। यह आरोप किसी कांग्रेस ने नहीं बल्कि महाराष्ट्र में भाजपा के एकनाथ खडसे ने लगाया है, जिसने अपनी ही पार्टी के मुख्यमंत्री फड़नविस पर आरोप लगाया है।

  • कृष्ण जन्माष्टमी :Adil Iqbal

    बहुत सालों बाद अपने गांव में कृष्णा जन्माष्टमी देखने का मौका मिला तो बचपन के वो दिन याद आ गए जब हम लोग शौक से अपने गांव के मेले में जाया करते थे. बड़े होने के बाद भी हम लोग ऐसा ही करते थे. यकीनन वो प्यार मोहब्बत और भाईचारे के सुहाने दिन थे. उन दिनों लोगों के जेब खाली हुआ करते थे लेकिन दिलों में बेशुमार मोहब्बत होती थी. और जैसा कि आप जानते हैं बिना सम्मान के मोहब्बत तो हो ही नहीं सकती थी. तो समाज में एक दूसरे का सम्मान भी भरपूर था.

    लेकिन ये सारी बातें जो मै आपको बता रहा हूं शायद ये पूराने हिंदुस्तान की एक खूबसूरत तस्वीर है. लेकिन अब हमारा देश नाए हिंदुस्तान की तरफ कदम बढ़ा चुका है जहां पूराने सिक्के नहीं चलते हैं. बीते हुए कल और आज में सबसे बड़ा फर्क जो मैंने महसूस किया है वो ये है के पहले लोग समाज में एक दूसरे को उसके किरदार और बर्ताव की बदौलत जाना और पहचाना करते थे लेकिन नए हिंदुस्तान में अब हम एक दूसरे को उनके धर्म की बदौलत जानने और पहचानने लगे हैं. यानी पहले किरदार हमारी पहचान थी अब धर्म हमारी आइडेंटिटी है.

    दरअसल हर साल मेरे गांव में कृष्ण जी आते हैं और फिर उनको विदा भी किया जाता है. कल शाम में उनकी विदाई थी. कृष्ण जी को जिन रास्तों से नदी तक ले जाया जाता है उस रास्ते में मुस्लिम आबादी और मेरे गांव की खूबसूरत मस्जिद पड़ती है. मस्जिद के पास ही मेरा घर भी है. मगरिब के बाद एक ट्रैक्टर पर कृष्ण जी की मूर्ति को रख कर ले जाया जा रहा था, सड़क पे काफी भीड़ थी इसलिए मैंने सोचा क्यूं ना छत से ही कृष्ण जी को देखा जाए.
    इसलिए मैं छत पे चला गया.

    लेकिन जब मैंने छत से सड़क पे देखा तो मुझे अपना ही गांव बदला हुआ महसूस हुआ. मैंने पूराने हिंदुस्तान को उस भीड़ में खोजने की बहुत कोशिश की लेकिन मुझे सिर्फ नया हिंदुस्तान और कुछ पुलिस वाले दिखे जो इस भीड़ को संभालने की नाकाम कोशिश कर रहे थे . भीड़ में हिन्दू और मुसलमान दोनों थे लेकिन इनके रहनुमा गायब थे. नौजानों को शायद ना मालूम हो लेकिन सियासत में रहने वाले लोगों को अच्छी तरह मालूम होता है के कब कहां पे रहना है और कब कहां से गायब हो जाना है. खैर खुदा का शुक्र है के कोई अनहोनी नहीं हुई लेकिन क्या हमें उस दिन का इंतज़ार करना चाहिए जब कोई हादसा हमारे समाज में हो जाए ? और बचा हुआ भाईचारा भी ख़तम हो जाए? या आपसी सहमति से कोई बेहतर समाधान खोजना चाहिए?

    एक और चीज जो मैंने नोटिस किया है के सियासी लोगों को हर हाल में अपने वोट की ही फिक्र होती है. ये लोग वो काम नहीं करेंगे जिस से समाज का भला हो बल्कि वो काम करेंगे जिससे इनकी कुर्सी पे कोई आंच न आए. मेरे गांव के समझदार लोगों से मेरी गुज़ारिश है के प्लीज़ ऐसे सेंसिटिव मामले को सियासी लोगों के हवाले ना करें वर्ना ये लोग फोड़े को कैंसर में बदल देंगे. ये हुनर सियासी लोगों को बहुत अच्छी तरह आता है!

    बेहतर यही होगा के हम सब एक दूसरे का सम्मान करते हुए समाज में रहें क्युं के इसी में हम सब की भलाई है. जब हम सबको यहीं रहना है तो क्यों ना इसे रहने की जगह बने रहने दें.

    मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना
    हिंदी हैं हम, वतन है हिंदुस्तान हमारा

  • स्वतंत्रता दिवस और पुरानी दिल्ली की पतंगी आतिशबाजी:शौकत नोमान

    हम सब इस साल अपना 73वां स्वतंत्रता दिवस मना रहे है। पतंगबाजी 15 अगस्त के दिन खासतौर पर ईशान कोण(उत्तर पूर्व) दिल्ली में देखने को मिलती है।
    आज मै खास तौर से पूर्वी दिल्ली में ही स्वतंत्रता दिवस की पतंग वाजी देखने आया हूं, जब मैं छत पर 2 बजे पहुंचा तो पाया कि दिल्ली वालो की छत व आसमां का नज़ारा ही कुछ और देखने को मिला। बच्चों से लेकर युवा तक सारे लोग स्वतंत्रता दिवस की औसर पर पतंग उड़ाने का मजा लोग काफी संख्या में अपनी-अपनी छतों पर ले रहे थे। आसमान में जहां देखो पतंगें ही पतंगें नजर आ रही थी
    वो खूबसूरत नज़ारा मेरी आंखो के सामने अभी भी है।
    पूरे दिन काटा, कट गई, लूटो, पकड़ो और ये ले पैसे दुकान से पतंग ले आ जैसे शब्द गूंजते रहते हैं। लोग हाथ में माझा लेकर घंटों तक छत पर पतंग उड़ाते रहे।
    उनमें से एक लड़का अहमदाबाद से था, उसने मुझे बताया, पतंगबाजी की जब भी बात आती है तो सबसे पहला नाम हमारे अहमदाबाद की पतंगबाजी का आता है। आसमान इंद्रधनुषी रंगों जैसा दिखाई देता है आज के दिन।
    फिर मेरी बात एक चाचा से हुआ उन्होंने कहा –
    कोई खास पर्व पतंग उड़ाने के लिए नहीं है लेकिन जो खुशी आजादी के दिन पतंग उड़ाने में है वह किसी ओर दिन नहीं है। पूर्वी दिल्ली में स्वतंत्रता दिवस के दिन पतंग उड़ाना खास रिवाज है।

    वहीं मैंने देखा, पतंगबाजी ऐसा शौक है जिसके मजे लूटने के लिए बड़े भी बच्चे बन जाते हैं.
    इन पतंगों पर तरह-तरह के संदेश लिखे थे। जैसे बेटी-बचाओ, बेटी-पढ़ाओ आदि
    इस संदेश से यादा आया, जब ब्रिटिश शासन के दौरान वर्ष 1927 में जब साइमन कमीशन भारत आया था, तो लोगों ने पतंगों पर साइमन गो बैक का नारा लिखी पतंग उड़ाकर अपना विरोध दर्ज कराया था।
    मुगल बादशाहों के शासन काल में भी तो पतंग का जिक्र मिलता है. खुद बादशाह और शहजादे भी इस खेल को बड़ी ही रुचि से खेला करते थे. उस समय भी तो पतंगों के पेंच लड़ाने की प्रतियोगिताएं भी होती थीं.
    उसी बीच लोगो ने खूब अच्छे अच्छे पकवान बनवाए तो कुछ ने मोटे हलवाई की दुकान से मंगवाए, लोगों ने पतंग के लुफ्त उठते हुए पकवान के भी मजे लिए, साथ ही लोगो नी सेल्फी भी लिए अपने तिरंगे के साथ।
    शाम 7 बजे तक लोगो ने खूब मस्तियां की ओर पतंगे उड़ाए।

    जैसे-जैसे अंधेरा होता गया, पतंगे कम होने लगी, तभी पास की छत से पटाखे की आवाजे आने लगी, धीरे धीरे आसमान में खूब सारे रंग बिरंगे पटाखे जलने लगे।
    पूरा आसमान पटाखों के आवाज और रंग से रंग गया।
    हर तरफ खूबसूरत नज़ारा ही नजर आने लगा
    लेखक:सौकत नोमान

  • मौलाना ग़ुलाम मोहम्मद वास्तान्वी: मॉडर्न एजुकेशन क्षेत्र में भूमिका और योगदान

    90 एकड़ में बना एक ऐसा शैक्षणिक संस्थान जो प्राथमिक स्कूल से एमबीबीएस तक कि शिक्षा देता है, ऐसा संस्थान जिसमे लगभग 13 हजार स्टूडेंट्स एक कैंपस में अध्यन करते हैं। प्राइमरी स्कूल, मिडिल स्कूल, हाई स्कूल, बीएड कॉलेज, आई टी आई, डिप्लोमा इंजीनियरिंग कॉलेज, बी टेक इंजीनियरिंग कॉलेज, बी फार्मा, बी यूनानी मेडिसिन, 100 एमबीबीएस एडमिशन सीट, 300 बेड हॉस्पिटल, प्रतिदिन 600 ओपीडी और 230 आई पी डी पेशेंट चिकित्सा सेवा, प्रतिदिन 30 ऑपरेशन (सभी विभाग को मिलाकर) के संस्थापक एक मौलाना है, चंदे के पैसे से मौलाना ने इतना बड़ा शैक्षणिक संस्थान खोल दिया जहाँ 2 लाख से अधिक बच्चो ने प्रोफेशनल कोर्सेज में ग्रेजुएशन किया है। एक लाख से अधिक बच्चे बिल्कुल मुफ्त प्रोफेशनल कोर्सेज में ग्रेजुएट हुए हैं।

    महाराष्ट्र के अक्कलकुंवा के एक मोहल्ला “मकरानी” से एक झोपड़ी से एक मदरसे की शक्ल में शुरू हुआ जामिया इस्लामिया ईशातुल उलुम की बुनियाद 1979 में रखी गई थी। 6 बच्चों से शुरू हुआ यह मदरसा आज पुरे देश में 1 एक लाख 70 हजार स्टूडेंट्स को शिक्षा देता है। इस संस्थान का 70% से 75% खर्च चंदे से पुरा होता है, 25% से 30% अमीर बच्चों के द्वारा दिये गये फीस के द्वारा।

    इस संस्थान के संस्थापक और व्यवस्थापक एक मशहूर आलिम ए दीन हैं, नाम है : मौलाना मोहम्मद गुलाम वस्तानवी। जो लोग मौलवियों पर चंदा खाकर पेट मोटा करने वाला आरोप लगाता है , जो लोग मौलवियों पर फोरचुनर से घूमने का आरोप लगाता है, वह ऐसे मौलवी के बारे कभी जानने की कोशिश भी नही करता है, आपके मॉडर्न एडुकेशन हासिल करने वाले कई लोगों ने मेडिकल कॉलेज खोला है लेकिन एक भी एम बी बी एस की सीट में फ्री एडमिशन नही देता है, यहाँ तो 50% से 75% स्टूडेंट्स फ्री में एम बम बी बी एस भी करता है। अगर मौलवियों को अपना पेट मोटा करना होता तो लाखों स्टूडेंट्स को प्रोफेशनल कोर्सेज का शिक्षा फ्री में नही देता। आखिर आपकी मानसिकता में मौलवीयों को चन्दाखोर कहने का क्या कारण है? आप ने आजतक कितने बच्चों को मुफ्त बी एड, इंजीनियरिंग, बी फार्मा, एम बी बी एस कराया है? नही कराया है तो क्युँ नही कराया? नही कराया है तो मौलवियों पर सवाल क्युँ उठाते हैं? एक नही, कई मौलवियों ने तो शिक्षा के छेत्र में इतिहास रच दिया है। कहिये तो इस पर एक सिरीज चला दुं, आप इतिहास नही जानते हैं तो खामोश क्युँ नही रहते? बिला वजह मौलवियों पर उँगली क्युँ उठाते?

    यह अलग बात है की ऐसे शिक्षाविद को भी आर एस एस का दलाल, बीजेपी का एजेंट और कई बेबुनियाद आरोप लगाकर इंसल्ट किया गया है लेकिन सच तो सच होता है, ऐसे इल्जामात के बाद भी कारवाँ नही रुका और न रुकेगा। मेरी अपील मिल्लत के उस मॉडर्न लोगो से है की मौलवियों को चन्दाखोर कहने से पहले मौलवियों के इतिहास को पढ़ लें, हर जमाने मे मौलवियों ने इतिहास रचा है। आप तो 40 व 50 या 100 की भीड़ को नही संभाल सकते, छोटे से संस्था को नही संभाल सकते, एक दूसरे पर चन्दाखोर का आरोप लगाकर अपने को ऊंचा दिखाना चाहते हो। खुले आम भसढ़ मचाते हो। अपने को ऊंचा बनने के लिए किसी को नीचा करने के लिए ऊर्जा को बर्बाद न करें, लंबी लाइन खिंचे, मौलवियों ने एक मेडिकल कॉलेज खोला है, मौलवी 50% से 75% फ्री शिक्षा देता है तो आप 100% फ्री शिक्षा दीजिये, मौलवी छोटे छोटे मौलवियों से चंदा करवाता है, आप प्रोफेशनल बिज़नेस डेवलपमेंट एग्जीक्यूटिव से डोनेशन / फण्ड जेनेरेट कीजिये। किसने मना किया। आप दो खोलिये, फिर मिल्लत का हक़ अदा होगा।

    लेखक: Mustaqim Siddiqui 
    इंसाफ इंडिया

  • अनिल चमड़िया ने बीबीसी को लिखा खुला पत्र, कहा आखिर बीबीसी में भारतीय समाज के पिछड़े वर्ग, दलितों-आदिवासियों का प्रतिनिधित्व क्यों नहीं दिखाई देता है?

    मैं भारत में पैंतीस वर्षों से ज्यादा समय से पत्रकारिता और पत्रकारिता के अकादमिक क्षेत्र में लगातार सक्रिय रहा हूं। मेरे पत्रकारिता के अनुभवों में आए शब्दों में सबसे पहले नंबर पर एक शब्द आता है वह है जाति। मैं ब्रिटेन के अश्वेतों के खिलाफ भेदभाव और उनके आंदोलनों से वाकिफ हूं। दुनिया में लिंग, रंग, नस्ल, भाषा, धर्म आदि स्तरों पर भेदभाव होते रहे हैं। भेदभाव का मतलब यह देखने को मिलता है कि जो सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक स्तर पर ऊपर बैठा है, वह इन आधारों पर एक बड़ी आबादी को अपने अधीन रखना चाहता है। भारत में जब ब्रिटिश हुकूमत थी तब राष्ट्रीयता के आधार पर भेदभाव होते थे। तब भारत में ब्रिटिश सरकार के समक्ष यह गुहार लगायी जाती थी कि भारत के लोगों को भी नौकरियों में जगह दी जाए। उन्हें भी आत्म सुरक्षा का अधिकार दिया जाए। भारतीयों द्वारा ऐसी मांगों की एक लंबी फेहरिस्त हैं।

    दुनिया भर के भेदभाव के जो कारण हैं, भारत में उनसे एक बिल्कुल भिन्न कारण है जिसे हम जाति के नाम से जानते हैं। देश के संविधान के अनुसार आप धर्म बदल सकते हैं। विज्ञान जेंडर में बदलाव की सहूलियत देता है। लेकिन भारत में जाति नहीं बदली जा सकती। हर चीज पर जाति का ठप्पा मिलता है। रंगों में जाति हैं। जाति के श्मशान है। जाति में ही शादियां होती हैं। नामों में जातीय विभाजन हैं।

    मैं यदि एक सीधा सवाल करूं कि आखिर भारत के बीबीसी कार्यालय में देश की लगभग नब्बे प्रतिशत आबादी का कोई प्रतिनिधित्व क्यों नहीं है? क्यों खास तरह के जातीय वर्ग के लोग बीबीसी में पसंद किए जाते रहे हैं। जो पसंद करने वाले रहे हैं, क्या वह एक खास तरह से सोचने, उठने-बैठने, हंसने, मिलने-जुलने, लिखने-पढ़ने, पहनावे आदि को पसंद करते रहे हैं? क्या यह जाति नहीं है? जिन्हें पसंद नहीं किया जाता रहा है, क्या उन्हें केवल इसीलिए खारिज किया गया कि उन्हें अच्छी भाषा में लिखने व पत्रकारिता की समझ नहीं है? आप जिसे योग्यता कहते हैं, वह दरअसल एक पैकेजिंग है और भारत में योग्यता की पैकेजिंग की कसौटी जाति होती है। हम लोगों ने 2006 में जब भारत के लगभग सभी मीडिया संस्थानों के सम्पादकीय विभागों में सबसे ऊपर के पदों पर बैठने वाले लोगों की जातीय पृष्ठभूमि के बारे में एक अध्ययन किया तो पाया कि नब्बे फीसदी आबादी के बीच के लोग इन दफ्तरों में बैठने के लिए जगह नहीं पाते हैं। इन संस्थानों में बीबीसी का भारत का कार्यालय शामिल भी था।
    क्या यह सिर्फ संयोग है कि जिन्हें इन दफ्तरों में रखा गया, वे सभी योग्य लोग खास जाति वर्ग के लोग ही निकलते हैं। यानी नजर ऐसी है जो केवल खास जाति वर्ग को पसंद कर पाती है।

    आप स्वयं सोचें कि जाति का ऐसा पैनापन और गहरा प्रभाव किस तरह से किसी सार्वजनिक जगह पर काम करता होगा। एक जाति को अपवित्र माना जाता है। एक जाति की परछाई नफरत के लिए होती है। क्या इस तरह छुआछूत और नफरत को मानने वालों के बीच से आने वाले लोगों के बारे में यह मान लिया जाए कि वे दफ्तर पहुंचकर बीबीसी जैसी संस्था के वैश्विक मुलाजिम के रूप में खुद को परिवर्तित कर लेते हैं? जिन्हें हजारों वर्षों का जाति भेद का प्रशिक्षण मिला हुआ है।

    भारत में ब्रिटिश सत्ता के लौट जाने के बाद सामाजिक और शैक्षणिक पिछड़ेपन के आधार पर सत्ता में भागीदारी की मांग राजनीति के केन्द्र में बनी रही है। ब्रिटिश-भारत में जो लोग भारतीय के नाम पर अपने लिए सरकारी सेवा में मौका देने की मांग करते रहे हैं, वहीं लोग 1947 के बाद भी भारत में व्यावहारिक स्तर पर हुकूमत कर रहे हैं और उन्होंने ही सदियों से सामाजिक और शैक्षणिक स्तर पर पिछड़ा रखने के कानून बनाए हैं और उनसे अब उन वैदिक कानूनों को व्यावहारिक स्तर पर खत्म करने की मांग की जाती है। लेकिन एक भेदभाव बराबरी के बीच दूरी को खत्म करने के लिए होता है और दूसरा भेदभाव वास्तव में नफरत होता है और वह खत्म करने के लिए नहीं होता, बल्कि उसे घृणास्पद बनाए रखा जाता है।
    आखिर बीबीसी में भारतीय समाज के पिछड़े वर्ग, दलितों-आदिवासियों का प्रतिनिधित्व क्यों नहीं दिखाई देता है? दलित, पिछड़ा वर्ग, आदिवासी तीन हजार से ज्यादा जातियों के समूहों का सरकारी नाम है। क्या वे काले होते हैं? क्या उनके उठने-बैठने का तरीका अलग है। क्या उनके सोचने का तरीका वैसा है जैसा कि भारतीय संविधान का है? क्या उन्हें कब किसके सामने होंठों पर हल्की मुस्कुराहट देनी है ये नहीं आता। हंसते है तो तेज आवाज होती है और वर्चस्ववादी संस्कृति में उसे असभ्य माना जाता है? भारत में जाति की पहचान के लिए चूहे और चीटी की नाक लगी होती है।
    मैं आपको ये लंबा खत क्यों लिख रहा हूं क्योंकि आपके भारत स्थित कार्यालय में हिन्दी सेवा में प्रशिक्षण के लिए बहाल की गई मीना कोटवाल को काम से बाहर निकालने का एक फैसला सुनाई दिया है। आखिर आपने मीना का चयन क्यों किया था? क्या महज यह प्रचारित करने के लिए किया था कि बीबीसी में भी दलित हैं।

    मुझे पत्रकारिता के हजारों प्रशिक्षणर्थियों के साथ काम करने का मौका मिला है। राजस्थान जैसे सामंती प्रदेश के जिस श्रमिक परिवार की चार बहनों व भाईयों ने आठवीं कक्षा तक की पढ़ाई नहीं की हो और उस परिवार की सबसे छोटी लड़की मीना ने तरह-तरह की मजदूरी करके अपने बल पर देश के सबसे बेहतरीन शिक्षण संस्थानों जैसे जामिया मीलिया इस्लामिया और भारतीय जनसंचार संस्थान (आईआईएमसी) से पत्रकारिता का कोर्स किया तो उसके भीतर की इस ताकत को पहचाना जा सकता है। उसकी योग्यताओं को परखा जा सकता है। लेकिन उस अकेली दलित महिला को बीबीसी में सैकड़ों लोग बीबीसी के लायक प्रशिक्षित नहीं कर सकें। आप खुद सोचें कि इसका विश्लेषण कैसे किया जाना चाहिए। क्या यह अयोग्यता प्रशिक्षण देने वालों की नहीं है?
    मैं मीना की बीबीसी-डायरी सुन रहा था। वह अम्बेडकर नगर में जाति को महसूस नहीं कर सकी क्योंकि वहां उसके ही जैसे लोग रहते हैं। लेकिन बीबीसी में उसका यह अपराध हुआ कि उसने महसूस करना शुरू कर दिया। ऐसे सैकड़ों लोगों का हमें अनुभव है कि दलित अपनी बस्ती से जब बाहर निकलता है तभी उसे जाति का एहसास होता है। जो वर्ण व्यवस्था की ऊपरी जाति के परिवार में पैदा होता है उसके स्वभाव में यह बुरी तरह से घुला मिला होता है कि वह समाज में ऊपर वाला सदस्य है। बीबीसी में मीना को यह बताया गया कि इंटरनेट के जमाने में कोई दलित नहीं होता। यह किस स्थिति को स्वीकार नहीं कर पाने की उद्घोषणा है? बीबीसी में काम करने वाले एक दूसरे जातिवादी ने घर लौटते हुए ड्राइवर से कहा कि अब आपके लोग भी हमारे साथ बैठेंगे। यह मीना की तरफ इशारा था। ये बीबीसी के दो लोग नहीं है। ये एक ही है क्योंकि जाति की तरह सोचते हैं। जाति कैसे एक समूह के रुप में वहां काम करती होगी, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। बीबीसी रोजाना भारत में दलित होने की सजा भुगत रहे लोगों की कहानियों से रूबरू होता है। दलित बीबीसी की सामग्री भर नहीं है।

    मीना ने जिन कठिन परिस्थितियों में अपना विकास किया है, उसमें उसकी ताकत की पहचान की जा सकती है। बीबीसी में उसने पाया कि वहां उन लोगों का वर्चस्व है जो कि एक दलित और वह भी स्त्री के भरोसे की ताकत को तोड़ने के लिए सदियों से प्रशिक्षित किए गए हैं। हिन्दू मिथक ग्रंथ महाभारत के दोर्णाचार्य द्वारा एकलव्य से अंगूठा मांगने का नया रूप है- आत्म विश्वास को तोड़ना। प्रशिक्षण लेने गई एक लड़की को डिप्रेशन का शिकार होना पड़े, उसे आत्महत्या के बारे में सोचना पड़े और तो और वह इतनी डरी हो कि अपने दफ्तर के करीब पहुंचकर यह सोचे कि उसका एक्सीटेंड हो जाए और उसे अपने दप्तर कई दिनों तक नहीं जाना पड़े, तो इस हालात का विश्लेषण किया जा सकता है। उसकी अपनी ताकत की पूंजी से बेदखल करने के जातीय वायरस के हमले के अलावा इसे किस रूप में देखा जा सकता है? एक उस व्यक्ति को डांट पड़ती हो, जो बशर्म हो चुका हो और चापलूसी की संस्कृति में ढला हो तो उसे डांट का कोई फर्क नहीं पड़ता। एक उस व्यक्ति को सार्वजनिक तौर पर डांट पड़े जो कि डांट को डांट की तरह ग्रहण करता हो, तो उसके लिए खाना पीना और सोना मुश्किल हो जाता है और वर्चस्ववादी संस्कृति में इसका हथियार की तरह इस्तेमाल किया जाता है। डांटने में अपमान और अपनत्व का फर्क आप जानते होंगे। भारतीय समाज में एक दलित व स्त्री को उसकी चेतना और अपेक्षाओं के साथ स्वीकार करने की संवेदना हर क्षण एक चुनौती की तरह खड़ी रहती है। मीना जो महसूस करती रही है उसे देखने वाले भी बीबीसी में हो सकते हैं। लेकिन वह सदियों के वर्चस्व को तोड़ने के लिए नाकाफी है। उन्हें अपवाद के रूप में ही हम देख सकते हैं।

    मैं आपसे आग्रह करता हूं कि भारत में बीबीसी को जाति संस्था के रूप में बनने की प्रक्रिया में हस्तक्षेप करें। आप समाज शास्त्रियों का सहयोग लें और वास्तव में भारतीय समाज का आईना बनने की कोशिश करें। बहुत ही होनहार लोग उनके बीच हैं जो कि पिछड़े, दलित, आदिवासी कहे जाते हैं।
    आशा है आपको मेरी किसी बात का बुरा नहीं लगा होगा। यदि गलती से आपकी किसी भावना को चोट पंहुची हो, तो मैं आपसे क्षमा चाहता हूं। आप मीना के पूरे मामले को आईने पर पड़ी धूल को साफ करने के एक मौके के रुप में देखेंगे, यह विश्वास करता हूं।

    आदर सहित
    अनिल चमड़िया

  • बीबीसी रँग और नस्ल के आधार पर भेदभाव करती है: तारिक अनवर चम्पारणी का सटीक विश्लेषण

    तारिक अनवर चम्पारणी

    क्या आपने कभी मोटी, नाटी, काली, कथित तौर पर भद्दी नैन नक्श वाली लड़कियों को बीबीसी हिंदी के स्क्रीन पर देखा है? आप ने नहीं देखा होगा। अगर देखा भी होगा तो कभी कभार ही, मजबूरी में। कभी कभार दिखने वाली ये कथित तौर पर कुरुप और भद्दी लड़कियां एकाएक स्क्रीन से गायब क्यों हो गई थी? दरअसल एक बार मंथली मीटिंग में बीबीसी हिंदी विभाग के संपादक मुकेश शर्मा ने यह एलान किया कि अब से स्क्रीन पर वही आएगा जो प्रेजेंटेबल फेस होगा यानी कथित तौर पर सुंदर लड़किया। फिर क्या था कथित तौर पर भद्दी और लंबाई में कम कमलेश मठेनी से फेसबुक लाइव के मौके छीन ली गई। कथित तौर पर भद्दी और मोटी दिखने वाली सिंधुवासिनी त्रिपाठी के लिए वीडियो के लिए अवसर बंद हो गए। किसी की जी हुजूरी न करने वाली गुरप्रीत कौर के वीडियो के रास्ते हमेशा के लिए बंद हो गए। सुर्यांशी टैलेंटेड जरूर है लेकिन वह सम्पादकों की जीहुजूरी नहीं करती है। इसलिए उससे भी वीडियो के सभी मौके छीन लिए गए और उसे एफएम विभाग में सड़ने को छोड़ दिया गया। अब मीना कोटवाल एक तो वह काली दिखती है और ऊपर से दलित है इसलिए मौके का कोई सवाल ही नहीं उठता था। खैर, इन सब का पत्ता कटा तो फिर किसको मौका मिला? कथित तौर पर बेहद खूबसूरत सर्वप्रिया सांगवान, प्रज्ञा सिंह को मौक़ा मिला। मैनेजरों की प्राथमिकता की सूची में पहला नाम प्रज्ञा सिंह का था। प्रज्ञा बिहार के गया से है और भूमिहार या राजपूत जाति से आती हैं। वह पहले एनडीटीवी में थीं, शायद ट्रेनी रही होंगी। जैसा मेरे स्रोत बताते हैं, वो 500 शब्दों की कॉपी लिख या फिर ट्रांसलेट भी नहीं कर पाती हैं। लेकिन उनको एकलौती दलित पत्रकार की तरह भेदभाव नहीं झेलना पड़ा और नही उनके परफॉर्मेंस पर सवाल उठाए गए। प्रज्ञा जी का बड़े ही आसानी से प्रोबेशन पूरा हुआ, कंफर्म हो गईं। आसानी और बहुत आराम की नौकरी चल रही है। क्यों, क्योंकि वो सवर्ण जाति से हैं और कथित तौर पर बेहद खूबसूरत हैं। बीबीसी के लिए यही इनकी योग्यता का पैमाना है। प्रज्ञा को रातों-रात हिंदी के संपादक ने उन्हें ‘बीबीसी हिंदी क्लिक’ कार्यक्रम का एंकर चुन लिया। वह प्रैक्टिस भी कर रही थीं। अचानक कार्यक्रम के लॉन्च से पहले बीबीसी लंदन से कुछ अंग्रेज पदाधिकारी आए। उन्होंने देखा कि प्रज्ञा का परफॉर्मेंस बहुत अच्छा नहीं था। वह ठीक से कार्यक्रम नहीं कर पा रही थी। बीबीसी के अधिकारियों ने ओपन ऑडिशन की घोषणा किया। इन हाउस जितने भी लोग थे, जो एंकर बनना चाहते थे, उन्होंने ऑडिशन के लिए अप्लाय किया। सभी लड़कियों का ऑडिशन हुआ। उस ऑडिशन में एनडीटीवी के रवीश कुमार की प्रिय और कथित तौर पर ‘महान’ पत्रकार सर्वप्रिया सांगवान भी शामिल थीं। सबका ऑडिशन लिया गया। परिणाम क्या हुआ? न प्रज्ञा सिंह उस ऑडिशन में पास हो पाई और न ही महान पत्रकार सर्वप्रिया जी। फिर पास कौन हुआ? पास हुई एक टैलेंटेड लड़की सुर्यांशी। अब क्या था, अंग्रेजों से फैसले को हिंदी के संपादक कैसे बदलते, वो तो अपना रौब दलित और पिछड़े पत्रकारों पर दिखाते हैं। उनके काम का हिसाब लेते हैं।

    इस बात से खफा संपादक जी उनदोंनों सवर्ण पत्रकार (प्रज्ञा और रवीश की प्रिय सर्वप्रिया) को आगे बढ़ाने का बीड़ा उठाया। फिर क्या किया? उन्होंने सर्वप्रिया जी को बीबीसी के हर इवेंट(पटना भी आयी थी) में एंकर बनाया। चाहे वो इवेंट में शामिल गेस्ट से सवाल अच्छी कर रही हों या न कर रही हों, चाहे वो अटक रही हों, चाहे वो बीबीसी से स्टैंडर्ट की बातें कर रही हों या ना कर रही हों मग़र उन्हें सुधार का हर मौका दिया गया। उनका कोई भी परफॉर्मेंस रिव्यू नहीं हुआ और नही उनकी कभी भरी सभा में आलोचना हुई। हर वक्त उन्हें प्रशंसा हासिल हुई। चाहे वह दूसरों की कॉपी चुरा कर वीडियो ही क्यों न बना ले। चाहे वह बेतुके सवाल ही क्यों न पूछ ले? उन्हें संपादक मंडली से स्नेह मिलता रहा भले चाहे वह गलत करे या सही। इसका बाकी के महिला पत्रकारों ने जोरदार विरोध भी किया और सवाल किया। प्रबंधन ने उत्तर दिया और कहा कि “हर कोई हर काम नहीं कर सकता है।“ संपादक मुकेश शर्मा जी ने इतना कह कर बिना किसी को सुधार का मौका दिए अयोग्य करार दे दिया। यह था उनका भेदभाव और महिला विरोधी फरमान।

    खैर, क्या ऐसे मौके कथित रूप से सुंदर नहीं दिखने वाली कमलेश मठेनी या फिर सिंधुवासिनी को नसीब हुआ। नहीं, बिलकुल भी नहीं। बीबीसी में और भी कई काले और साँवले चेहरे हैं। क्या उनको कोई ऐसा मौका मिला? नहीं, बिलकुल नही। तो फिर इतना होने के बाद कथित तौर से बेहद खूबसूरत प्रज्ञा जी का क्या हुआ? कुछ नहीं, वह ऑनलाइन में लिख नहीं पाती है। वह ट्रांसलेशन कर नहीं पाती है। फिर भी वह बीबीसी में बनी रहे, इसके लिए उन्हें दूसरे मौके उपलब्ध कराए गए। कैसे मौके? मसलन इंडिया न्यूज पर आने वाले कार्यक्रम ‘बीबीसी दुनिया’ में ‘राउंड अप न्यूज’ में उन्हें मौका दिया गया। उन्हें इलेक्शन काउंटिंग के दिन लाइव कार्यक्रम के दौरान ऑन स्क्रीन सोशल मीडिया पोस्ट पढने का मौका दिया गया। फिर वही सवाल है, क्या कथित रूप से भद्दी, मोटी, नाटी, काली दिखने वाली पत्रकारों को ये मौका मिला? बिलकुल भी नहीं।

    रंग रूप, जाति, धर्म से परे बीबीसी सबको बराबर मौका देने का दावा करती है। उनका यह दावा सार्वजनिक है, पर बीबीबी के संपादक भारत में इसे लागू करेंगे? अभी तक तो नहीं किया गया, आगे ब्राह्मणवादी ब्रॉडकास्ट कॉर्पोरेशन से उम्मीद भी नहीं की जा सकती है। बीबीसी के आलेखों पर मत जाइए। महिलाओं के बारे में की गई महान बातों पर मत जाइए। रंगभेद, जातिभेद, ऊंच-नीच वाले आलेखों पर मत जाइए। बीबीसी के अंदर भी वही होता है जो बाहर होता है। ब्राह्मणवादी सोच के लोग अपने पंसदीदा लोगों को मौका देते हैं। कथित रूप से बेहद खूबसूरत दिखने वाले को मौका देते हैं। काली, कथित रूप से बेहद भद्दी दिखने वाली लड़कियों को मौका तक नहीं दिया जाता। क्या यह बीबीसी का महिला विरोधी चेहरा नहीं है? बॉडी शेमिंग, ऊंच नीच और काले-गोरे की बात करने वाला बीबीसी इंडिया क्या महिला विरोधी फैसले नहीं ले रहा है?

    कोई गोरी होगी या नहीं, कोई पतली या सुडौल होगी या नहीं, क्या यह किसी महिला के हाथ में है? जब यह सबकुछ उनके हाथ में नहीं है तो फिर उनके साथ बीबीसी भेदभाव क्यों कर रही है? उनसे मौके छीने क्यों जा रहे है? क्या इसका जवाब भूमिहार मुकेश शर्मा, मैथिल ब्राह्मण रूपा झा और कायस्थ राजेश प्रियदर्शी देंगे?

    अरे! महिलाकर्मियों को मौका देने की बात तो दूर जब ये महिलाकर्मी वीमेन इंगेजमेंट के लिए वीडियो बनाने किसी महिला कॉलेज जाती हैं तो संपादक लोग इन्हें खूबसूरत और सेक्सी दिखने वाली लड़कियों के बाइट लेने का आदेश दिया जाता है। महिला पत्रकारों को मजबूरन यह करना पड़ता है। इससे खफा एक बार बीबीसी की महिलाकर्मी ने खुद के संस्था के खिलाफ फेसबुक पर पोस्ट भी लिखा था। उस पोस्ट पर समान पीड़ा झेल रही दूसरे महिला पत्रकार ने कमेंट भी किया। बाद में दोनों महिला पत्रकारों को ब्राह्मवादी मानसिकता के मुकेश शर्मा ने बुला कर डांटा और नौकरी से निकालने की धमकी दी और पोस्ट डिलीट करवाया। #NidarLader का कैंपने चलाने वाली बीबीसी की महिला पत्रकारों, आप कब निडर हो कर इन सभी भेदभाव के खिलाफ हल्ला बोलेंगी? क्या सारी नैतिकता आलेखों में ही लिखेंगे या फिर उसे खुद पर लागू करेंगी? ज्ञान देना आसान है बीबीसी, उसे खुद पर लागू करना बहुत मुश्किल।

    जब से सोशल मीडिया पर बीबीसी के जातिवादी चेहरे के खुलासे हो रहे हैं, तब से कथित रूप से भद्दी दिखने वाली इन महिलाओं को कुछ मौका जरुर मिलने लगा है, सिंधुवासिनी, सुर्यांशी को वीडियो का मौका दिया जा रहा है ताकि संपादक लोग अपनी नौकरी बचा सके। लंदन के अंग्रेजों के सामने खुद को साबित कर सके। प्रबंधन को मजबूरन यह सबकुछ करना पड़ रहा है। यदि आपको मेरी यह बातें झूठी लग रही है तब आप पिछले तीन-चार महीनों तक का बीबीसी हिंदी वेबसाइट का दौरा करें।

    दोस्तों! यह हमारी लड़ाई की जीत है। जब तक हम इस ब्राह्मण ब्रॉडकास्ट कॉर्पोरेशन अर्थात बीबीसी को बदल नहीं देते, तब तक यह आंदोलन चलता रहेगा। क्या आप साथ देंगे?