Category: लेख, विचार

  • नागरिक संशोधन एक्ट 2019: संविधान और मुस्लिम विरोधी एक्ट है

    खुर्रम मालिक

    जैसा के अपा सबको पता है के देश की मौजूदा सरकार ने दो दिन पहले एक कानून पास किया है जिसे CAB citizen ship amendment bill का नाम दिया गया है, जिस में सरकार ने कहा है के पाकिस्तान, अफ़गानिस्तान, और बांग्लादेश से आ कर जितने भी हिन्दू, सिख, ईसाई,जैन,बौद्ध धर्म के लोग जो भारत में रह रहे हैं उन सबको भारत की नागरिकता प्रदान की जाएगी। लेकिन इस बिल में कहीं भी यह नहीं लिखा गया है के जो मुसलमान इन देशों से आ कर भारत में बस गया है उसे भी हम भारत की नागरिकता प्रदान करेंगे। जिस के नतीजे में देश भर में विरोध प्रदर्शन किया जा रहा है। और इसी क्रम में आज बिहार की राजधानी पटना के पटना सिटी इलाक़े में एक मौन जुलूस का आयोजन किया गया था, जिस में
    एजाज़उल्लाह खां, मोहम्मद महताब आलम, आदिल अहमद, अयाज़ उल हक़ और मोहम्मद इंतेखाब आलम आयोजक थे।
    जुलूस में विशेष रूप से लाल इमली से शहज़ादा, सदर गली से मुमताज़, सुल्तानगंज से ख़ुर्रम मल्लिक, पटना यूनिवर्सिटी से JACP के महासचिव शौकत अली शामिल थे।
    जुलूस सदर गली से निकल कर पश्चिम दरवाज़ा पर ख़त्म हुई।
    जुलूस में लगभग 20 हज़ार लोगों ने अपनी भागीदारी सुनिश्चित की।

    आप को बता दें के इस बिल के विरोध में देशव्यापी आंदोलन हो रहे हैं। ख़ास तौर से उत्तर पूर्व राज्यों के लोगों का प्रदर्शन बहुत तेज़ हो रहा है। यह बिल संविधान विरोधी है। इस से ग्रह युद्ध होने की आशंका जताई जा रही है।पूरे देश में एक अजीब सी बेचैनी पाई जा रही है।ख़ास तौर से भारत का मुस्लिम समाज ख़ुद को ठगा महसूस कर रहा है। पटना के अलग अलग हिस्सों में यह जुलूस निकाला गया है,इस जुलूस में शामिल लोगों का कहना है के यह बिल मुस्लिम विरोधी है।इस से अनार्की फैलने की आशंका है।इस लिए भारत सरकार इस बिल को वापस ले। और देश की चरमराती अर्थ्यवस्था पर अपना ध्यान केंद्रित करे।

    लेखक एक स्वतन्त्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता है

  • भारत को इसराइल बनाने की साज़िश:प्रोफेसर मोहम्मद सज्जाद

    (धर्म-आधारित नागरिकता के लिए विधेयक : इस अनर्थ तक कैसे पहुंचा है भारत ?)

    प्रोफेसर मोहम्मद सज्जाद

    दिसंबर को केंद्रीय मंत्रिमंडल ने नागरिकता संशोधन विधेयक (सीएबी) को अगले सप्ताह संसद में पेश करने की अनुमति दे दी. यह एक ऐसा क़ानून होगा जो निहायत ही विभेदकारी और धर्म/मत पर आधारित होगा. यह विधेयक भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 और 15 के खिलाफ होगा. और इसी वजह से यह धर्मनिरपेक्षता के विरुद्ध होगा और संविधान की मौलिक संरचना के खिलाफ भी. उत्तर पूर्वी राज्यों में नेशनल रजिस्टर ऑफ़ सिटीजन्स (एनआरसी) को लागू करने के अनुभव के बाद यह विधेयक लाया जा रहा है.

    एनआरसी ने असम के लगभग 19 लाख लोगों को मताधिकार से वंचित और उन्हें राज्यविहीन कर दिया है. और यह सब न्यायमूर्ति रंजन गोगोई की देखरेख में हुआ जो खुद भी असम के हैं. सो, एक विशेष धार्मिक समुदाय को जानबूझकर उसके मताधिकार से वंचित करने के इस प्रयास के खिलाफ इस देश की शीर्ष अदालत की भी मदद नहीं ली जा सकती. इस बात के दूसरे दृष्टांत भी हैं – अयोध्या में 9 नवंबर 2019 को टाइटल सूट का फैसला जिसने नागरिकों को इस कदर निस्सहाय बना दिया है जो कल्पना से भी परे है.

    भारत जैसे देश में जहां पर सत्ता के शीर्ष में बैठे लोगों के लिए अपने शैक्षिक डिग्री और जन्म का विश्वसनीय प्रमाणपत्र तक पेश करना मुश्किल है, आम लोगों को अपने पुरखों के बारे में एक से अधिक दस्तावेज पेश करने को कहा जा रहा है. आम लोगों में इस वजह से भयंकर डर बैठ गया है. असम में इसके अनुभव से लोगों को पता चल चुका है कि इसने भारी संख्या में हिन्दुओं को भी गैर-नागरिक बना दिया. सांघातिक रूप से अपने विभाजनकारी और घृणा-भरी बहुसंख्यकवादी विचारधारा और दस्तूर के लिए कुख्यात बीजेपी अब एक विधेयक ला रही है जिसकी मंशा सिर्फ ऐसे लोगों को राहत दिलाना है जो मुसलमान नहीं हैं.

    फिलिस्तीनियों के खिलाफ इस्राइल जिस तरह का व्यवहार कर रहा है, सीएबी एकदम वैसा ही है. इसमें यहूदियों की विचारधारा Zionism की स्पष्ट छाप है. यह मानव इतिहास की सबसे बड़ी विडंबना है कि सत्ताधारी हिंदुत्ववादी सरकार की विचारधारा हिटलर के नात्सीवाद (और मुसोलिनी के फासीवाद) से प्रेरित है जो यहूदियों के खिलाफ नृशंस हिंसा और उनके नरसंहार के लिए जिम्मेदार रहे हैं. पर इसके साथ ही वह विचारधारा और दस्तूर के स्तर पर यहूदीपरस्त यहूदी Zionist state राज्य का भी मित्र है. उपनिवेश के खिलाफ अपने समावेशी राष्ट्रीय संघर्ष और हर तरह के अत्याचार और उत्पीड़न के खिलाफ आवाज उठाने वालों का नेतृत्व करने की अपनी साकांक्ष भूमिका को समझते हुए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने 9 नवंबर 1938 के हिटलर के यहूदी-विरोध और उनके नरसंहार, जो ‘क्रिस्टल नाईट’ के नाम से कुख्यात है, की नींदा की थी. 12 दिसंबर 1938 को कांग्रेस ने जर्मनी के यहूदियों को शरण देने का प्रस्ताव दिया था. और यह भी आज के इतिहास की विडंबना के रूप में याद किया जाएगा कि अत्याचार के शिकार ऐसे यहूदी, आज उस हिन्दुत्वादी ताकतों के साथ खड़े दिख रहे हैं, जो उस भारतीय राष्ट्रीयता जिसका साथ भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने दिया था, के विरोधी और अपने चरित्र में प्रतिगामी थे.

    हिंदुत्व के मुख्य सिद्धांतकार विनायक दामोदर सावरकर (1883-1966) पहले ही इस तरह के भेदभावकारी नागरिकता राष्ट्रीयता का प्रस्ताव कर चुके हैं. सावरकर ने अंडमान के सेल्यूलर जेल में चोरी-छिपे 1917 में ‘हिंदुत्व’ नाम से एक पुस्तक लिखी. यह पुस्तक उनके भूमिगत रहते हुए 1923 में छपी. 1937-1942 के दौरान सावरकर हिन्दू महासभा के अध्यक्ष थे जबकि केबी हेडगेवार (1889-1940) जिन्होंने आरएसएस की नींव रखी, 1926-1931 के दौरान इसके सचिव थे.

    सावरकर ने 1 अगस्त 1938 ‘भारत की विदेश नीति’ पर पुणे में एक भाषण दिया था. इसमें उन्होंने कहा था : “जर्मनी को नात्सीवाद और इटली को फासीवाद को अपनाने का पूरा अधिकार है…जर्मनी के लिए क्या उचित है यह पंडित नेहरू से ज्यादा अच्छी तरह हिटलर जानता है…”. मालेगांव में 14 अक्टूबर 1938 को सावरकर ने कहा : “बहुसंख्यकों से राष्ट्र बनता है…यहूदी जर्मनी में क्या कर रहे हैं? चूंकि वे अल्पसंख्यक हैं, उन्हें जर्मनी से बाहर भगा दिया जाना चाहिए.” और 11 दिसंबर 1938 को अपने एक अन्य भाषण में सावरकर ने कहा : “जर्मनी में जर्मनों का आन्दोलन राष्ट्रीय आन्दोलन है पर यहूदियों का आन्दोलन सांप्रदायिक”. उनकी ये बातें एमएस गोलवलकर (1906-1973) की 1939 में प्रकाशित पुस्तक “वी और आवर नेशनहुड डिफाइंड” में प्रतिध्वनित हुई हैं. उन्हों ने लिखा, “मुसलमानों को भारत में रहना है तो हिंदुओं के अधीन, बिना किसी नागरिकता अधिकारों के साथ रह सकते हैं”. मराठी अखबार “द महरत्ता” ने 1939 में और “केसरी” (दिसंबर 8 और 15, 1939) में इन या ऐसे विचारों का समर्थन किया गया और इनको लोकप्रिय बनाया गया.

    सावरकर ने 1966 में अपनी मौत से कुछ साल पहले मराठी भाषा में एक किताब, Six Glorious Epochs in Indian History, में यह अनुमोदित किया कि दंगों में मुस्लिम औरतों का बलात्कार उचित है.

    हेडगवार के संरक्षक बीएस मूंजे (1872-1948) मार्च 1931 में इटली के तानाशाह से संपर्क करने वाले पहले हिंदुत्ववादी नेता थे. वे पहले गोलमेज सम्मलेन के बाद यूरोप की यात्रा पर थे. उस दौरान मूंजे ने ‘फासीवादी सैनिक प्रशिक्षण स्कूलों का दौरा किया और आरएसएस को इटली के फासीवादी आधार पर ढालने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाई’. हिंदु महासभा के दूसरे नेता, एम. आर. जयकर (1873-1959) भी फासीवादी सैन्य संगठन से प्रेरित थे.

    पर इन पूरी बातों पर राजनीतिक विपक्ष या तो चुप है या कुछ भी बोलने से डर रहा है. जैसा की लग रहा है, अभी जो हो रहा है उससे अधिक से अधिक संख्या में हिन्दुओं में कोई नाराजगी नहीं दिख रही है. अगर राज्य-समर्थित भीड़ की हिंसा (लिंचिंग) भी लोगों में आक्रोश पैदा नहीं कर पाया है तो फिर किसकी बात की जाए!

    आधुनिक भारतीय इतिहास के छात्र के रूप में मेरे लिए यह बड़ी चिंता की बात है : भारत इस कदर खतरनाक कैसे हो गया?

    भारत के विगत को उपनिवेशवादियों ने कुछ इस तरह से गढ़ा है ताकि मुसलमान शासक सिर्फ हमलावर माने जाएं और मध्यकालीन भारते में मुसलमान शासकों ने जो भी किया उसके लिए सभी मुसलमानों को जिम्मेदार माना जाए.

    आजादी के बाद भी, बंटवारे का जो इतिहास लिखा गया है उसमें मुसलमानों को अलगावादी मानकर उन्हें बदनाम किया गया है, देश के दुश्मनों का साथ देनेवाला माना है. बंटवारे का लगभग सारा दोष मुसलमानों के सिर मढ़ दिया गया है. ऐसा उन इतिहास-लेखनों में भी हुआ है जिसे राष्ट्रवादी और उदारवादी-धर्मनिरपेक्ष विचार रखने वाला माना जाता है. सिर्फ हिंदुत्ववादी ताकतों के अंदर ही नहीं बल्कि कांग्रेस के अन्दर भी, विशेषकर 1938 के बाद, बहुसंख्यावादी ताकतें सिर उठा रही थीं और यहाँ तक कि अकादमिक इतिहासकार भी इससे अनभिज्ञ रहे. मतलब यह कि, भारत के बंटवारे में इन बहुसंख्यावादियों की निश्चित रूप से कोई छोटी भूमिका नहीं थी, यह तथ्य लोकप्रिय नहीं हो सका और आज भी लोग भारतीय इतिहास के इस तथ्य के बारे में कम ही जानते हैं. मुसलमानों के खिलाफ बहुसंख्यकों की घृणा को बढ़ाने में इसने बहुत योगदान दिया है. इस स्थिति ने धीरे-धीरे अधिक से अधिक संख्या में हिन्दुओं के बीच हिंदुत्ववादी विचारधारा की स्वीकार्यता की जमीन तैयार कर दी है.

    आपातकाल-विरोधी आन्दोलन के दौरान “समादृत समाजवादियों’ ने इस तरह के विभाजनकारी ताकतों को मान्यता दिला दी. जैसा कि अरविन्द राजगोपाल ने कहा है : “अपने माथे पर गांधी की हत्या का कलंक ढो रहा आरएसएस राजनीतिक अछूत बन गया था. पर आपातकाल के बाद, सत्ता हासिल करना उसके लिए संभव हो गया. इसके बाद धर्मनिरपेक्षता और हिंदुत्व दोनों का भाग्य निर्णायक रूप से बदल गया”. आरएसएस ने लोकप्रिय लामबंदी के महत्त्व को समझा और बाद में ‘लोकतांत्रिक संघर्ष की फर्जी कहानी गढ़ी जो सिर्फ उसी के रिकॉर्ड में उपलब्ध है”. इस बात को वे अपने माथे पर लिखकर घूमते हैं और गर्व से इसे ‘दूसरा स्वतन्त्रता आन्दोलन’ बताते हैं. ये लोग अंग्रेजों के खिलाफ आजादी की लड़ाई से दूर रहे और यहाँ तक कि उनके साथ समझौता भी किया. बॉम्बे में 9 अक्टूबर 1939 को वायसराय लॉर्ड लिनलिथगो के साथ एक भेंट में सावरकर ने उन्हें आश्वासन दिया : ‘हिन्दू महासभा दूसरे विश्वयुद्ध के बाद डोमिनियन स्टेटस को स्पष्ट रूप से स्वीकार कर लेगा और इस तरह आजादी के लिए उनके खिलाफ लड़ने के बदले वह अंग्रेजों की मिलीभगत से उनकी जगह काबिज होने में दिलचस्पी रखती थी’.

    केवल इतना ही नहीं, 1980 में सत्ता में वापसी करने पर इंदिरा गांधी का रुख भी दक्षिणपंथी हो गया. उन्होंने वीएचपी की एकता माता यात्रा (जिसे गंगाजल यात्रा भी कहा जाता है) के लिए आमंत्रण स्वीकार कर लिया जो उसका पहला जनसंपर्क कार्यक्रम था. रामजन्मभूमि आंदोलन इस यात्रा के बाद शुरू हुआ और उसके बाद जो हुआ वह इतिहास का हिसा बन चुका है और जो भष्मासुर की तरह आज भी हमारा पीछा कर रहा है. आज हम जिस ऊंची चट्टान पर खड़े होकर वहाँ से फिसलने की स्थिति में पहुंचे गए हैं उसके लिए राजीव गाँधी का असम समझौता (1985) जिम्मेदार है.

    सत्ता में बैठी सरकार आर्थिक मोर्चे पर लगातार फिसलती जा रही है और इससे ध्यान बंटाने के लिए वह देश में सांप्रदायिक उन्माद फैला रही है. इस देश की जनता को इस विनाशकारी षड्यंत्र को समझना चाहिए.

  • याद रखना मुसलमानों तुम मिटोगे(Annihilate) नहीं “तक़दीर ए ज़माना तुम ही हो”

    Mohammad Seemab Zaman

    आज सोशल मिडिया पर देख रहे हैं लोग NRC/CAB पर ऐहतजाज की बात कर रहे हैं तो कोई मौलवी या रहनुमाओ को बूरा भला कह रहा हैं। वह सब ठीक है मगर आज तक किसी मुस्लिम ने या किसी मौलवी ने नही लिखा के रोड पर आकर ऐहतेजाज के बदले “दो रिक्त” नेमाज़ पढ़ी जाये और दुआ हो कि अललाह ख़ौफ़ और बरबादी से बचाये और जो मूल्क या मुस्लिम दुश्मन लोग है उन को हिदायत दे के सही फैसला ले वग़ैरह वग़ैरह ………………

    मौलवी लोगो से मेरी गुज़ारिश है आप रोड पर नही तो कम से कम अपने मस्जिद मे ही मग़रीब और अेशॉ के बीच सनिचर/ऐतवार को इस नेमाज का ऐलान कर ऐहतमाम से “नेमाज़े इसतखासा/नेमाज़े हाजत/क़ूनूते नाज़ला” पढ़े और देखे दूसरों पर कैसा ख़ौफ़ तारी होता है। मगर जो मुस्लिम आज आप को बूरा भला कह रहे हैं वह ख़ूद उस नेमाज मे शामिल नही होंगे, वह सिर्फ़ बोलते हैं।

    बूरा नही मान्ना जब अमेरिका मे टावर 2001 (9/11) मे गिरा था तो हम ने कई दिन ऐसी नेमाज मस्जिद मे सऊदी अरब मे पढ़ी है जब राष्ट्रपति बुश ने धमकी दी थी “you are either with us or against us ……….” उस नेमाज़ और दुआ का असर यह हुआ के सब बच गये वरना “साज़िशी दिमाग़” तो तुर्की से इंडोनेशिया तक को बमबारडमेनट करवाने वाले थे।

    और भी कई बार हम ने किसी दूसरे मौका पर वहॉ पढ़ी है। आज लोग देर ही से सही मगर नतिजा देख रहा है अमेरिका/यूरोप का ताज उड़ गया और कहीं तीन-तीन चुनाव के बाद भी सरकार नही बन रही है। भारत मे मुस्लिम को यही करने की ज़रूरत है न की रोड पर आकर ऐहतजाज करने की। सरकार तो चाह ही रही है आप रोड पर आओ और वह आप को देशद्रोही और आतंकवादी साबित करे।

  • भ्रष्टाचार के आरोपी अजित पवार को गृह मंत्री बधाई दे रहे है और प्रत्रकार इसे मास्टर स्ट्रोक बता रहे हैं:रविश कुमार

    लेखक:रविश कुमार (भारतीय हिंदी पत्रकारिता का एक जाना माना नाम)
    95,000 करोड़ के भ्रष्टाचार के आरोपी अजित पवार को रातों रात एक खेमे से उठाकर राज्यपाल के सामने लाया जाता है। उन्हें देवेंद्र फड़णवीस के साथ शपथ दिलाई जाती है। जिस देवेंद्र फड़णवीस ने 70000 करोड़ के सिंचाई विभाग घोटाले को उठाकर अपनी राजनीतिक पहचान बनाई, वो उसी शख़्स को उप मुख्यमंत्री बना रहे थे। पिछले साल ही उनकी सरकार के एंटी करप्शन ब्यूरो ने हाईकोर्ट में हलफनामा देकर अजित पवार को मुख्य आरोपी बताया था। यानि पहले कार्यकाल के 5 वर्षों में इस मामले में कुछ भी खास नहीं हुआ। एक तलवार लटका कर रखी गई ताकि अजित पवार बुरे वक्त में काम आ सकें।

    इसी 22 अगस्त को बांबे हाई कोर्ट के आदेश पर मुंबई पुलिस की अपराध शाखा ने 25000 करोड़ के गबन का मामला दर्ज किया था। इसमें 70 लोग आरोपी बनाए गए जिनमें से एक अजित पवार भी थे। इसके बाद ED प्रत्यर्पण निदेशालय ने छापे भी मारे। यह केंद्र की एजेंसी है। आप ही बताएं जिस आरोपी का स्वागत प्रधानमंत्री करें, गृहमंत्री बधाई देंगे उस पर अब ईडी हाथ डालने की हिम्मत करेगा। या फिर ईडी से बचाने की गारंटी के नाम पर ही अजित पवार को उप मुख्यमंत्री बनाया गया है? कांग्रेस की सरकार में होता तो बीजेपी कहती कि कांग्रेस ने 95000 करोड़ लेकर उप मुख्यमंत्री का पद बेच दिया। बीजेपी की सरकार है। बीजेपी जो करती है वो अच्छा ही करती है।

    भारत के इतिहास में पहली बार हुआ है जब देश के प्रधानमंत्री ने 95,000 करोड़ के घोटाले के आरोपी के नाम के आगे जी लगाकर डिप्टी मुख्यमंत्री बनने की बधाई दी हो। कांग्रेस सरकार के घोटालों के खिलाफ चुनाव लड़कर आए मोदी 95,000 करोड़ के भ्रष्टाचार के आरोपी का स्वागत कर रहे हैं। गृहमंत्री अमित शाह बधाई दे रहे हैं। मीडिया के प्रत्रकार इसे मास्टर स्ट्रोक बता रहे हैं।

    NCP को नेचुरली करप्ट पार्टी कहने के बाद उसके विधायकों को ‘ईमानदारी’ से तोड़ कर सरकार बनाने की कला में माहिर प्रधानमंत्री ही बता सकते हैं कि जब पूरी पार्टी को ही नेचुरली करप्ट कहा था तो उस पार्टी से दर्जन भर विधायक ईमानदार कहां से निकल आए?

    2015 में विश्वास मत के दौरान ही बीजेपी की एन सी पी ने मदद की थी। विश्वास मत के दौरान शिव सेना मत विभाजन चाहती थी लेकिन स्पीकर ने ध्वनिमत से पास कर दिया। शिवसेना खुल कर अपने मत के बारे में नहीं कह रही थी और बीजेपी जोखिम नहीं लेना चाहती थी। इसलिए एनसीपी की मदद लेनी पड़ी। नतीजा यह हुआ कि तीन साल तक सिंचाई घोटाला मामले में कुछ खास नहीं हुआ। नवंबर 2018 में बांबे हाईकोर्ट के नागपुर बेंच में सिर्फ हलफनामा दायर किया गया। भविष्य में पवार काम आने वाले थे इसलिए जांच के नाम पर जांच ही होती रही।

    आरोप बीजेपी ने लगाया था। ज़िम्मेदारी बीजेपी की थी कि साबित करती। अजित पवार को सज़ा दिलाती। लेकिन अब तो अजित पवार उप मुख्यमंत्री हैं।

    झारखंड में भी बीजेपी ने भानुप्रताप शाही को टिकट दिया है। इन पर 130 करोड़ के दवा घोटाले का ट्रायल चल रहा है। ईडी और सीबीआई ने चार्जशीट दायर किया है। जब प्रधानमंत्री रैली करने जाएंगे तो मंच पर दवा घोटाले का आरोपी भानुप्रताप शाही होगा और ऐसे घोटाले को उजागर करने वाले सरयु राय मंच से उतार दिए गए होंगे। उनका टिकट कट चुका है।

    तेलुगु देशम पार्टी के राज्य सभा सांसद वाई एस चौधरी अपनी सदस्यता छोड़ बीजेपी में शामिल हो गए। चौधरी के खिलाफ भी ईडी और सीबीआई ने छापे मारे थे। सीबीआई ने चौधरी को 364 करोड़ के बैंक फ्राड के मामले में समन जारी किया था। अप्रैल 2019 में ED ने 315 करोड़ की मनी लाउंडरिंग और बैंक फ्राड मामले में चौधरी की संपत्ति अटैच कर ली थी। लोकसभा चुनाव के बाद चौधरी राष्ट्र निर्माण के लिए बीजेपी में शामिल हो गए।

    अभी तक 150 करोड़ या 350 करोड़ के गबन के मामलों के आरोपी बीजेपी में शामिल हो रहे थे। लेकिन यह पहली बार हुआ है जब 95,000 करोड़ के मामले का आरोपी बीजेपी सरकार में उप मुख्यमंत्री बना है। शपथ दिलाई गई है। कई बार लगता है कि ईडी के छापे काले धन को मिटाने के लिए नहीं बल्कि उन पर हाथ डालने के लिए होते हैं। वर्ना छापे के बाद ऐसे लोगों को बीजेपी अपनी पार्टी और सरकार में क्यों लेती।

    महाराष्ट्र पर कई लोग हैं जो मुझसे ज्यादा जानकार हैं। आप उनका लिखा पढ़ें। मैं न तो हर विषय पर लिख सकता हूं और न लिखना चाहिए। किसी ने यह नहीं कहा कि उन तीन कंपनियों के बारे में विस्तार से क्यों नहीं लिखते हैं जिन्होंने बीजेपी को 20 करोड़ का चंदा दिया है और केंद्र सरकार उन कंपनियों पर आतंकी फंडिंग के मामले में जांच कर रही है। किसी ने नहीं कहा कि इलेक्टोरल फंड पर क्यों चुप हैं? नितिन सेठी ने छह छह कड़ियों में दस्तावेज़ों के साथ बताया है कि कैसे वित्त मंत्रालय ने झूठ बोलकर यह बान्ड संसद से पास कराया और अब इसके ज़रिए काले धन को सफेद करने का बड़ा खेल चल रहा है।

    महाराष्ट्र में अनैतिकता की राजनीति हो रही है। सबका चेहरा उजागर हो रहा है। अनैतिकता का भंडार विपक्ष के खेमे में भी है। वहां भी वैचारिक गठबंधन में घोर अनैतिकता है। लेकिन बीजेपी ने अजित पवार को उप मुख्यमंत्री बनाकर चाल चल दी है। उसके लिए सत्ता से ज्यादा कुछ नहीं है। अगर कोई भ्रष्टाचारी है, लुटेरा है तो वो मुख्यमंत्री है, उपमुख्यमंत्री है। ऐसे राजनेताओं से हम जनता की भलाई की उम्मीद करते हैं। सचमुच जनता भोली है। 95000 करोड़ के घोटाले के आरोपी को बीजेपी की उप मुख्यमंत्री बना सकती है। इससे पता चलता है कि यह दौर उसी का है।

  • मौलाना अबुल मोहासिन मोहम्मद सज्जाद साहब का महत्व और अहमियत: आज भी बिहार में महसूस होती है

    मरना और जीना दुनिया के रोज़ाना के कारोबार में है, कौन नही मरा और कौन नही मरेगा, आज उसकी तो कल हमारी बारी है, इस पर भी अज़ीज़ों और दोस्तों की मौत पर रोने वाले रोते हैं, उनकी याद में मातम करते हैं, उनकी एक एक ख़ूबी को याद कर नोहा पढ़ते हैं, लेकिन कुछ मौत ऐसी होती है कि ख़बर सुन कर ज़ुबान बंद हो जाती है, आँसू सूख जाते है, दिल की धड़कन बढ़ने के बजाए घटने लग जाती है, अंदर ही अंदर घुटन महसूस होने लगता है, जी नही चाहता कि कुछ बोल कर जी का भड़ास निकाले और आँसू बहा कर ग़म दूर करें। मौलाना अबुल मोहासिन मोहम्मद सज्जाद साहब की मौत की ख़बर जब 23 नवम्बर 1940 (21 शव्वाल 1359 हिजरी) की शाम को मिली तो जिस्म और दिमाग़ पर यही कैफ़ियत तारी हो गई।

    मौलाना सज्जाद की विलादत ज़िला नालंदा के पनहस्सा नाम के गाँव में हुई थी, मौलाना वहीद उल हक़ साहब के क़ायम किए हुए मदरसे में तालीम की शुरुआत हुई और फिर इलाहाबाद के मदरसा सुभहानिया में अपनी तालीम मुक्कमल की और वहीं तदरीस का काम चालू कर दिया। गया में मदरसा अनवार उल उलूम की बुनियाद मौलाना अब्दुल वाहब के साथ मिलकर डाली गयी, मौलाना सज्जाद मदरसा अनवार उल उलूम में हर साल जलसा करवाते जिसके मुल्क भर से उल्मा को बुलाया जाता।

    मौलाना सज्जाद को सियासत का ज़ौक़ जंग अज़ीम में तुर्की के हार के बाद हुआ, वो उस वक़्त इलाहाबाद में थे उनके शागिर्द अंग्रेज़ी अख़बार से ख़बरें पढ़ कर सुनाते, आग रोज़ बा रोज़ भड़कती जाती, मौलाना आज़ाद के अल हिलाल ने इस आग में पेट्रोल डाल दिया और मौलाना सज्जाद ने मौलाना अबुल कलाम के कलाम पर लब्बैक कहने में देरी नही की। 1919 में तहरीक ए ख़िलाफ़त के साथ साथ मौलाना के क़दम सियासत में बढ़ते चले गए, 1920 में मौलाना अब्दुल बारी साहब फ़िरंगी महली और हकीम अजमल ख़ान साहब की कोशिश से क़याम हुए जमियत उल्मा दिल्ली की बुनियाद पड़ी, मौलाना सज्जाद इसके शामिल होने वाले में सबसे आगे थे, बिहार में ईमारत शरिया का क़याम इनकी सबसे बड़ी करामत थी।

    मौलाना सज्जाद की सबसे बड़ी ख़्वाहिश थी कि उल्मा मैदान ए सियासत में आए और क़ौम की रहबरी करें, मुसलमानो में दीनी तँज़ीम क़ायम हो, तमाम तबलीगी, मज़हबी व तालीमी काम तंंज़ीम के ज़रिए किया जाए, दारूल क़जा की बुनियाद डाली जाए, बैतूल माल का क़याम किया जाए। मौलाना ने अपने ज़िंदगी के आख़िरी बीस साल इसी में लगा दिया। मौलाना की सबसे बड़ी खसुसियत ये थी कि मौलाना राह और मंज़िल के फ़र्क़ को समझते थे, इसलिए राह के लुत्फ़ में फँस कर कभी मंज़िल से हटना गवारा नही किया, जज़्बा ए आज़ादी की पूरी लगन के बाद भी वो कभी कांग्रेस या उनकी हुकूमत के ग़लत फ़ैसले पर ख़ामोशी अख़्तियार नही की।

    मौलाना सज्जाद का वजूद सारे मुल्क के लिए ख़ास था मगर हक़ीक़त ये है कि वो बिहार की तनहा दौलत मौलाना सज्जाद थे, बिहार में जो कुछ तालीमी, तबलीगी, तंज़ीमी, सियासी और मज़हबी तहरीक की चहल पहल थी वो सब मौलाना सज्जाद के ज़ात से थी, वही एक चिराग़ था जिससे सारा बिहार रौशन था, वो वतन की जान तो बिहार की रूह थे, वो क्या मरे सारा बिहार मर गया। मौलाना के जिस्म पर खद्दर का साफ़ा, खद्दर के कुर्ते, पैर में देशी जूते ही होते थे। उनकी ज़िंदगी सादा थी, ग़ुरबत की ज़िंदगी थी, घर ख़ुशहाल ना था, सफ़र मामूली सवारियों में और मामूली दर्जे के डिब्बे में होता था, उनका दिन कहीं गुज़रता तो रात कहीं, कहीं सैलाब आए, आग लगे, लोगों पर झूठे मुक़दमे डाले गए हों, कहीं क़ुर्बानी का झगड़ा हो मौलाना पहुँच जाते, मामले की सचाई जान लोगों की मदद करते।

    बिहार में ज़लज़ले के दौर में मौलाना ने जिस तरह काम किया वो एक मिसाल है, एक एक गाँव में जाकर लोगों की मदद करने से आप पीछे नही हटे। हर लीडर के पास तीन चीज़ में से एक होती है दौलत, तक़रीर या क़लम लेकिन मौलाना सज्जाद इन तीनो चीज़ से ख़ाली थे, उनके पास जो कुछ था वो बस अख़लाक़ था जो उनकी हर कमी को पूरा कर देता। मौलाना उन इलाक़ों में जाते जहाँ जाना कोई गवारा नही करता, उत्तर बिहार के इलाक़े मलेरिया के चपेट में थे, लोग वहाँ से भाग रहे थे, और मौलाना उत्तर बिहार का सफ़र कर रहे थे, लोगों की मदद में आगे आगे थे, मौलाना की ज़िंदगी का आख़िरी सफ़र भी उत्तर बिहार था, जहाँ मलेरिया ने उन्हें भी चपेट में ले लिया, जो उनकी मौत की वजह बनी।

    मार्च 1941 में सैयद सुलैमान नदवी साहब द्वारा लिखे गए इस बात का हिन्दी तर्जुमा Abdur Rasheed साहब ऩे किया है।

  • स्तनपान”कितने जागरुक हैं हम?

    माँ का दूध बच्चे केलिए अमृत के समान होता है”, माँ के दूध से ना केवल शिशु का पोषण होता है बल्कि यह बच्चे को रोगों से लड़ने मे मदद करता हैl जन्म से पहले छ: महीने तक शिशु को केवल माँ का दूध पिलाना चाहिएl माँ का दूध बच्चे मे रोग प्रतिरोधक क्षमता बढाने मे सहायक होता है, माँ के दूध मे लेक्टोफोर्मिंग नामक तत्व होता है, जो बच्चे की आंत मे लौह तत्व को बांध लेता है और लौह तत्व के अभाव मे शिशु की आंत मे रोगाणु पनप नही पातेl माँ के दूध से आए साधारण जीवाणु शिशु की आंत मे पनपते हैं और रोगाणुअो से प्रतिस्पर्धा कर उन्हे पनपने नही देतेl अगर नवजात शिशु को गाय का दूध पीतल के बर्तन मे उबाल कर दिया गया तो उसे लीवर का रोग इडियन चाइल्डहुड सिरोसिस हो सकता हैl इसके आतिरिक्त स्तनपान कराने वाली माँ और शिशु के बीच एक भावनात्मक रिश्ता बन जाता हैl

    माँ को स्तनपान के लाभ-:
    स्तनपान कराने से माँ को गर्भावस्था के बाद होने वाली शिकायतो से मुक्ति मिल जाती है, इससे तनाव कम होता है, इससे माँ को स्तन कैसर या गर्भाश्य के कैंसर का खतरा काफी कम हो जाता हैl

    स्तनपान कब से कब तक-:
    शिशु को जन्म के उपरांत शीघ्र स्तनपान प्रारंभ कर देना चाहीए, शिशु के जन्म के उपरांत माँ के स्तन से निकलने वाले पीले द्रव जिसे “कोलोस्ट्रम” कहते हैं को शिशु को पिलाना चाहिए, यह शिशु को संक्रमण से बचाने और उसकी प्रतिरोधक क्षमता बढाने मे सहायक होता है, यह एक प्रकार का टिका होता हैl शिशु को कम से कम छ: माह तक स्तनपान कराना चाहिए और 2 वर्ष या इससे इसके बाद तक भी उसे हम स्तनपान कराया जा सकता हैl

    स्तनपान को लेकर कितने जागरुक हैं हम-:
    एक अनुमान के अनुसार 820,000 विश्वस्तर पर 5 साल की उम्र के तहत हो जाती है जिसे स्तनपान से हर साल रोका जा सकता है, कई माँए जो अपने आप को ज्यादा आधुनिक समझती हैं वो भी स्तनपान नही करातीं ज़िसका बुरा प्रभाव शिशु पर पड़ता है,स्वस्थ जच्चा-बच्चा केलिए स्तनपान अतिआवश्यक हैl
    लेखक: मो.फैज़ान, छात्र मौलाना आज़ाद नेशनल उर्दू यूनिवर्सिटी( हैदराबाद)

  • नागरिकों के नाम रवीश कुमार का एक पत्र, बंद कर दें न्यूज़ चैनल और सामान्य रहें।

    भारत के शानदार नागरिकों,

    9 नवंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट बाबरी मस्जिद रामजन्मभूमि मामले पर फ़ैसला सुनाने जा रहा है। दशकों पुराना मुक़दमा है। दोनों पक्षों की तरफ़ से ऐसी कोई बात नहीं जिसे लेकर पब्लिक में बहस नहीं हुई है। दोनों समुदाय के लोगों ने जान भी दी है। जितना कहना था, सुनना था, लिखना था वो सब हो चुका है। झूठ और सच सब कुछ कहा जा चुका है। पचासों किताबें लिखी गईं हैं। हम या आप किसी बात से अनजान नहीं हैं। कई साल तक बहस और हिंसा के बाद सभी पक्षों में इस राय पर सहमति बनी थी कि जो भी अदालत का फ़ैसला आएगा वही मान्य होगा। यहीं बड़ी उपलब्धि थी कि सब एक नतीजे पर पहुँचे कि अदालत जो कहेगा वही मानेंगे। तो अब इसे साबित करने का मौक़ा आ रहा है।

    30 सितंबर 2010 को भी इस मामले में फ़ैसला आ चुका है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने विवादित 2.77 एकड़ ज़मीन को तीन पक्षों में बाँट दिया था। दो तिहाई ज़मीन मंदिर पक्ष को ही मिला था। तीनों पक्ष अपने अपने दावे लेकर सुप्रीम कोर्ट गए। तो कुछ नया नहीं होगा। जो भी होगा उसका बड़ा हिस्सा 2010 में आ चुका है। उस साल और उस दिन भारत के नागरिकों ने अद्भुत परिपक्वता का परिचय दिया था। लगा ही नहीं कि इस मसले को लेकर हम दशकों लड़े थे । हमने साबित किया था कि मोहब्बत से बड़ा कुछ नहीं है। कहीं कुछ नहीं हुआ। तब भी नहीं हुआ जब इलाहाबाद कोर्ट से निकल कर सब अपनी अपनी असंतुष्टि ज़ाहिर कर रहे थे और सुप्रीम कोर्ट जाने की बात कर रहे थे।

    हम इस बार भी साबित करेंगे। ठीक है हम बहस करते हैं। मुद्दों को लेकर भिड़ते रहते हैं लेकिन जब मोहब्बत साबित करने की बारी आएगी तो हम मोहब्बत साबित करेंगे। हर्ष करना है न मलाल रखना है। जिसके हिस्से में फ़ैसला आए उसी में शामिल हो जाइये। यह मुल्क एक फ़ैसले से बहुत बड़ा है। कल का दिन ऐतिहासिक नहीं है। 30 सितंबर 2010 को भी ऐतिहासिक घोषित किया गया था। अब किसी को न वो फ़ैसला याद है और न इतिहास। इसलिए सामान्य रहिए। फ़ैसले को सुनिए। बातें भी कीजिए लेकिन संतोष मनाइये कि यह मसला ख़त्म हो रहा है।

    हमें अपने प्यारे वतन को और ऊँचा मक़ाम देना है। अच्छे स्कूल बनाने हैं। अस्पताल बनाने हैं। ऐसी न्यायपालिका बनानी है जहां जज का इक़बाल हो। इंसाफ समय पर मिले। पुलिस को ऐसा बनाना है कि जहां एक महिला आई पीएस भीड़ से पिट जाने के बाद चुप न रहे। हमें बहुत बनाना है। राजनीति ऐसी बनानी है जिसे कोई उद्योगपति पीछे से न चलाए। बहुत कुछ करना है। नौकरियाँ जा रही हैं। लोगों के बिज़नेस डूब रहे हैं। नौजवानों का जीवन बर्बाद हो रहा है। हम सबको इन सवालों पर जल्दी लौटना होगा।

    इसलिए दिलों में दरार न आए। बाहों को फैला कर रखिए। कोई हाथ मिलाने आए तो खींच कर गले लगा लीजिए। इस झगड़े को हम मोहब्बत का मक़ाम देंगे। हम बाक़ी ज़िम्मेदारियों में फेल हो चुके नेताओं को ग़लत साबित कर देंगे। राजनीति को छोटा साबित कर देंगे। भारत के नागरिकों का किरदार ऐसे फ़ैसलों के समय बड़ा हो जाता है। 9 नवंबर का दिन आम लोगों का है। आम लोग 2010 की तरह फिर से साबित करेंगे कि हम 2019 में भी वहीं हैं।

    मैं जैसे ही शारजाह पुस्तक मेले के लिए दुबई एयरपोर्ट पर उतरा, ख़बर मिली कि 9 नवंबर को फ़ैसला आ रहा है। मेरी प्रतिक्रिया सामान्य थी। 2010 में सिहरन पैदा हो गई थी। जाने क्या होगा सोच सोच कर हम लखनऊ गए थे । फ़ैसले के दिन यूपी और शेष भारत ने इतना सामान्य बर्ताव किया कि शाम तक लगने लगा कि बेकार में सुरक्षा को लेकर इतनी बैठकें हुईं। झूठमूठ कर मार्च होते रहे। सब अपने अपने काम में लगे थे। अच्छा होता हम भी लखनऊ न आते और अपनी फ़ैमिली के साथ होते।

    मुझे पूरा यक़ीन है कि 9 नवंबर का दिन भी विकिपीडिया में कहीं खो जाएगा। लोग सामान्य रहेंगे और सोमवार से अपने अपने काम पर जुट जाएँगे। जैसे मैं जिस काम के लिए आया हूँ वो काम करता रहूँगा। गीता में समभाव की बात कही गई है। समभाव मतलब भावनाओं को संतुलित रखना। एक समान रखना। कल इस मुद्दे से छुटकारा भी तो मिल रहा है।

    फ़ैसले को लेकर जो भी विश्लेषण छपे उसे सामान्य रूप से पढ़िए। भावुकता से नहीं। जानने के लिए पढ़िए।याद रखने के लिए पढ़िए। हार या जीत के लिए नहीं। पसंद न आए तो धमकाना नहीं है और पसंद आए तो नाचना नहीं है। सच कहने का वातावरण भी आपको ही बनाना है। साहस और संयम का भी।

    2010 में मीडिया ने शानदार काम किया था। ग़ज़ब का संयम था। इस बार ऐसा नहीं है। लेकिन हम इस मीडिया की असलियत जान गए हैं। कल से लेकर सोमवार तक न्यूज़ चैनल बंद कर दें। दो चार दिनों तक न्यूज चैनलों से दूर रहें। मोहल्लों में आवाज़ दें कि टीवी से दूर रहें। और भी माध्यम हैं जिनसे समाचार सुने जा सकते हैं। रेडियो सुनिए। प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री और विपक्ष के मुख्य नेताओं को सुनिए। सुप्रीम कोर्ट की वेबसाइट पर जाकर फ़ैसले को खुद पढ़िए। चैनलों में आने वाले फ़ालतू प्रवक्ताओं से दूर रहे हैं। किसी नेता की बात मत सुनिए। किसी एंकर के चिल्लाने से तनाव मत लीजिए। मुस्कुराइये। जो घबराया हुआ मिले उसे पकड़ कर चाय पिलाइये। कहिए रिलैक्स। टेंशन मत लो।

    आपका,

    रवीश कुमार

  • कौन थे अब्दुल क़वी???

    खुर्रम मलिक

    जैसा की आप जानते ही होंगे की गूगल कुछ खास मौक़ो पर ही अपना डूडल जारी करता है। आज से ठीक दो साल पहले आज की ही तारीख़ को मतलब 1 नवम्बर 2017 को गूगल ने अपना डूडल अब्दुल क़वी देसनवी को समर्पित किया था, आख़िर क्यों ? क्या है इनके बारे में ख़ास जो गूगल ने इन्हे याद किया है। अाइए जानते हैं।

    मशहूर वेब पोर्टल हेरिटेज टाइम्स के एडिटर उमर अशरफ़ और साहित्य पर गहरी पकड़ रखने वाले अब्दुर रशीद इब्राहिमी साहब लिखते हैं के अब्दुल क़वी देसनवी को उनकी उर्दू में लिखी गयी साहित्यिक पुस्तकों के लिए जाना जाता है; उन्होने भारत में उर्दू साहित्य के प्रोत्साहन में अहम भूमिका निभाई।।

    अब्दुल क़वी देसनवी का जन्म बिहार के नालंदा ज़िले के देसना गांव में 1 नवम्बर 1930 को हुवा था। अब्दुल क़वी का जन्म प्रमुख मुस्लिम विद्वान सैयद सुलैमान नदवी के परिवार में हुआ था। सैयद सुलैमान नदवी ने हजरत मोहम्मद(स०) की जीवनी ‘सीरतुन्नबी’ लिखी थी, जिसे भोपाल की बेगम ने प्रकाशित करवाया था।

    अब्दुल क़वी देस्नवी के वालिद साहब का नाम सैयद मुहम्मद सईद रज़ा था जो सेंट जेवियर कॉलेज, मुंबई मे उर्दू, फ़ारसी और अरबी के प्रोफ़ेसर थे। अब्दुल क़वी देसनवी ने शुरुआती तालीम आरा से हासिल करने के बाद ग्रेजुएशन और पोस्ट ग्रेजुएशन सेंट जेवियर कॉलेज, मुंबई से किया जहां आपके वालिद प्रोफ़ेसर थे।

    अब्दुल क़वी देसनवी ने अल्लामा इक़बाल , मौलाना आज़ाद और मिर्ज़ा ग़ालिब की ज़िन्दगी पर कई किताबें लिखीं।

    उनकी कुछ रचनाएं कुछ इस तरह हैं
    “इक़बाल भोपाल मे” भोपाल और ग़ालिब” “सात तहरीरे” “इक़बाल उन्नीसवी सदी मे” “इक़बाल और दिल्ली” “मुतालाए ग़ुब्बारे ख़ातिर” “अबुल कलाम आज़ाद” “यादगार-ए-सुलैमान” “एक शहर पांच मशाहीर” “मता-ए-हयात (जीवनी)” “बंबई से भोपाल तक” “उर्दू शायरी की ग्यारह आवाजें” “इकबाल की तलाश” “इकबाल और दारुल इकबाल, भोपाल” “तलाश-ओ-तास्सुर” “सात तहरीरें” “मुताला खुतूत-ए-गालिब” “हसरत की सियासी जिंदगी” “एक और मशरिकी कुतुबखाना” वग़ैरा। और भी दर्जन भर किताबे हैं। जिनकी तादाद पचास से अधिक है। अपने पचास साल के केरियर मे अब्दुल क़वी देसनवी ने उर्दु की बहुत ख़िदमत की। इसके अलावा उन्होंने कई कविताएं और फिक्शन भी लिखा।

    अब्दुल कवी देसनवी के शागिर्द मे जावेद अख़्तर (हिंदी फिल्मों में गीतकार), कवी मुश्ताक़ सिंह, इक़बाल मसुद, प्रो मुज़फ़्फ़र हनफ़ी, सेलानी सिलवटे, प्रो ख़ालिद महमूद सहित सैकड़ो नामी हस्तियां रही हैं।

    उर्दू के मशहूर शायर कैफ़ी आज़मी अब्दुल कवी देसनवी के साथियों मे से थे।

    बहुत सारे अवार्ड भी अपने झोली मे रखने वाले अब्दुल क़वी देसनवी साहब नवाब सिद्दीक़ी हसन ख़ान अवार्ड भोपाल, बिहार उर्दू एकेडमी अवार्ड, आल इंडिया परवेज़ शहीदी अवार्ड वेस्ट बंगाल से नवाज़े गए हैं।

    अब्दुल क़वी देसनवी पैदा बिहार के एक गांव मे हुए पर पढ़ाई मुम्बई मे की और अपने जीवन के पचास साल भोपाल मे गुज़ारा। पहली बार उन्होने भोपाल का नाम बचपन मे सुना था; वही 1946 के आस पास जब देसना के रहने वाले मुस्लिम विद्वान सैयद सुलैमान नदवी भोपाल रियासत के क़ाज़ी थे।

    उनके केरियर को नया आयाम मिला फ़रवरी 1961 मे; जब वो भोपाल के सैफ़िया कॉलेज से जुड़े और जल्द ही उर्दू भाषा के प्रोफ़ेसर हो गए साथ ही वहां के उर्दू डिपार्टमेनट के हेड बनाये गये।

    1977-78 के दौर मे कुल हिन्द अंजुमन तरक़्की ए उर्दु के मेम्बर भी रहे।

    1979 से 1984 तक मजलिस ए आम अंजुमन तरक़्की ए उर्दु (हिन्द) के चुने हुए मेम्बर रहे।

    1978 से 1979 के दौरान ऑल इंडिया रेडियो भोपाल के प्रोग्राम एडवाईज़री कमिटी के मेम्बर भी रहे।

    1977 से 1985 के बीच चार साल बरकतुललाह यूनिवर्सिटी के बोर्ड ऑफ़ स्टाडीज़ उर्दु, पर्शयन एैंड अरेबिक के चेयरमैन रहे।

    1980 से 1982 तक बरकतुललाह यूनिवर्सिटी के आर्ट फ़ैकल्टी के डीन रहे और साथ ही बरकतुललाह यूनिवर्सिटी के इसक्युटिव कांसिल के मेम्बर भी (1980–1982) के दौरान रहे

    इसके बाद 1983 से 1985 तक सैफ़िया कॉलेज भोपाल के प्रिंसपल रहे।

    अब्दुल क़वी देसनवी 1990 में अपने पद से रिटायर हुए।

    साथ ही 1991- 92 मे मध्यप्रदेश उर्दू बोर्ड के सेक्रेटरी रहे।

    7 जुलाई 2011 को भोपाल में उर्दु के इस अज़ीम सिपाहसालार ने दुनिया को अलविदा कहा।

    देसना है जिसका नाम, यही गांव है हुज़ुर
    जिसकी मची है धुम बहुत दुर दुर तक

    अब्दुल क़वी देसनवी जिस गांव के रहने वाले थे वो अपने आप में अनूठा था। इस गांव की संस्कृति व विरासत बिलकुल अलग थी। सबसे अहम बात इस गांव में स्थित अल-इस्लाह उर्दू लाइब्रेरी जिसे देखने कभी देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉ.राजेंद्र प्रसाद व तत्कालीन राज्यपाल डॉ.ज़ाकिर हुसैन भी इस गांव में पहुंचे थे।

    एशिया के सबसे बड़े इस्लामिक स्कॉलर सैयद सुलैमान नदवी(र.अ) के गांव के नाम से मशहुर देसना बिहारशरीफ़(ज़िला हेड क्वाटर) से लगभग 14 किलोमीटर दूर स्थित है। ये गांव सड़क से काफ़ी दुर है तो रेलवे स्टेशन कहां से होगा ? फिर भी इस गांव ने इतने बड़े बड़े स्कॉलर पैदा किए जिसका आज भी कोई सानी नही; इस गांव के बारे में ऐसे तो बहुत सारी बातें कही जाती थीं जिसमें से कुछ है ‘एक पत्थर भी ज़रा संभल कर मारो यारो, नहीं तो पता नहीं किसी ग्रेजुएट के सर पर गिर जाए’, ‘अगर कुछ नहीं बना तो कम से कम दरोग़ा ज़रूर बनेगा’। एैसी बहुत सारी कहावतें इस गांव के लिए मशहूर थीं।

    इस गांव की एक ख़ास बात यह थी के इस गांव में सात दरवाज़ा हुआ करता था जिससे हाथी गुजरने भर की जगह हुआ करती थी। दरवाज़ा बंद तो गांव सुरक्षित। पर अक्तुबर 1946 के फ़साद के बाद सब ख़त्म, बड़ी तादाद में लोग हिजरत कर गए। अब्दुल क़वी देसनवी भी उसी में एक थे।
    देस्ना में एक अल – इस्लाह नाम की एक मशहूर लाइब्रेरी हुआ करती थी जो उस वक़्त में कुछ बड़ी और बेहतरीन लाइब्रेरियों में शुमार थी।
    लेकिन 1946 के बाद अल-इस्लाह उर्दू लाइब्रेरी बुरे हाल में थी। जिसमे कभी हज़ारों किताबे हुआ करती थी वो अब जरजर हो रही थी। एक दिन तत्कालीन राज्यपाल डॉ. ज़ाकिर हुसैन को इस नायाब धरोहर की ख़बर मिली यहाँ पर रखी दुर्लभ पुस्तकों को सुरक्षा की दृष्टि से पटना के ख़ुदाबख़्श‌ लाइब्रेरी भेजने का निर्णय लिया। बैलगाड़ी से किताबों को बिहारशरीफ़ लाया गया तब लगभग सात ट्रक से हज़ारों किताबें ख़ुदाबख़्श लाइब्रेरी ले जाई गयी थी। इसके लिए वहां अलग से देसना सेक्शन बनाया गया है।

    यहां हाथों से लिखी क़ुरान शरीफ़ का तुर्रा, इस्लामिक साहित्य पर लिखी हज़ारो पुस्तकें, पैग़म्बर मुहम्मद (स.अ) की जीवनी आदि से सम्बंधित हज़ारों नायाब किताबें रखी थी।
    साल 2017 में मैं देस्ना गया और मुझे देख कर आश्चर्य हुआ के अपने समय की सबसे बेहतरीन लाइब्रेरी आज आज अब्दुल क़वी देस्नवी के नाम पर सुर्ख़ियां बटोरने वालों। ज़रा इसे भी देख लो।।।

    हज़ारों साल नरगिस अपनी बे’नूरी पे रोती है
    बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदःह-वर पैदा

    यह शेर इस लाइब्रेरी की मिनसिबत से बहुत सटीक है।।।
    मैं बात कर रहा हूँ देस्ना गांव की इस लाइब्रेरी की जो एक ज़माने में अपनी अलग पहचान रखती थी।।।
    जहाँ की #अल्लामा_सय्यद_सुलेमान_नदवी(र.अ) अब्दुल क़वी, प्रोफ़ेसर सय्यद मुहम्मद सईद रज़ा जैसे दीदा-वर पैदा हुए और अपनी शैक्षणिक योग्यता की बुनियाद पर पूरे आलम पर छा गए।
    जहाँ फ़ारसी और उर्दू की सदियों पुरानी किताबों का एक ज़ख़ीरा था।
    जहाँ एक ज़माने में भारत के राष्ट्रपति डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन साहब और डॉक्टर राजिंदर प्रसाद साहब जैसी हस्तियों की आमद हुई थी।
    और कह सकते हैं के एक वक़्त में यह लाइब्रेरी बिहार की शान थी।
    पढ़ने वाले लोगों के लिये यह एक नेमत से कम नहीं थी।।।
    लेकिन जब मैं ने इस लाइब्रेरी का मुआयना किया तो हैरत और अफ़सोस के मिले जुले जज़्बात के साथ रोना आ गया।
    इसी गांव के एक मास्टर साहब ने मेरी मदद की और बताया के इस लाइब्रेरी में अभी भी ऐसी दुर्लभ किताबें मौजूद हैं जो शायद ही कहीं और मिल सके।।।
    उन्हों ने यह भी बताया के इस में रखी किताबें बहुत ही ख़राब हालत में है और कई किताबों की बाइंडिंग कराना बहुत ज़रूरी है।
    लेकिन पैसे की तंगी की वजह कर यह काम नहीं हो पा रहा है।साल में गर्मी के मौसम में यह किताबों को धुप दिखाते हैं जिस से इनकी लरज़ती साँसों में थोड़ी सी जान आ जाती है और यह फिर से जीने के लाएक़ हो जाती हैं।।।
    एक वक़्त यह गांव इल्म का गहवारा था,
    लेकिन आज सिर्फ़ यह एक खंडर है इसका कोई पुरसान-ए-हाल नहीं है।
    ना ही गांव के लोग इसकी कोई सुध लेते हैं और ना ही बाहर के लोग।
    मैं ने मास्टर साहब से पुछा भी के इसकी बाइंडिंग में किया ख़र्च आएगा।।उन्हों ने बताया के ख़र्च तो काफ़ी है।
    तो मेरी एक अपील आप तमाम बिहार के अदबी लोगों से है के के इस लाइब्रेरी को बचाने के लिये आगे आएं।
    कियुं के यह एक धरोहर है।
    और धरोहरों को बचाने की ज़िम्मेदारी भी हमारी ही है।।।

  • देश का विकास पिछले पांच वर्षों में बहुत हुआ,विदेशों में भी भारत का बड़ा नाम हुआ

    अंकित कुमार

    देश का विकास बहुत हुआ है, पिछले पांच वर्षों में विदेशों में भी भारत का जितना नाम हुआ है उससे यह पता चलता है कि पांच वर्ष पहले भारत को कोई नहीं जानता था। खैर देश की मिट्टी भी बहुत महंगी हुई है अयोध्या में 2000 रुपये की कीमत तक के दिये जले हैं। यह दर्शाता है कि हमारा देश नित आगे बढ़ रहा है और इसके मूल्यों में भारी विकास हुआ है। यहीं दूसरी ओर सरदार पटेल जी को भी लगातार उनके कृत्यों हेतु याद किया जा रहा है, 31 अक्टूबर को पूरा देश उनके कार्यों को याद कर उनके आगे नतमस्तक रहा लेकिन उनकी सबसे बड़ी श्रद्धांजलि विश्व की सबसे बड़ी मूर्ति है जो एकता का परिचायक है। मूर्तियां बननी भी चाहिए, गांधी जी की बनी हैं, नेहरू की बनी है, हर नए चौक पर हर नए नेता की मूर्ति रहती है लेकिन बस श्रीराम का मंदिर सरकार नहीं बनवाती कि राजनीति खत्म हो जाएगी।

    .
    खैर देश की शिक्षा व्यवस्था और स्वास्थ्य की स्थिति बहुत सुदृढ़ हुई है, बच्चों को या तो शिक्षकों की कमी के कारण शिक्षा से वंचित रहना पड़ रहा है या ज्यादा पैसे खर्च कर निजी महाविद्यालयों या विदेशों की शरण लेनी पड़ रही है। वैसे जब डिजिटल इंडिया के लिए हर हाथ मोबाइल और सबसे तेज इंटरनेट के उद्देश्य से सरकार ने रिलायन्स टेलीकॉम के विस्तार में अपना योगदान दे ही दिया है तो विश्वविद्यालयों की कोई खास आवश्यकता महसूस नहीं होती है।

    रोजगार में लोग पकौड़े बेच रहे हैं ये कहना गलत होगा क्योंकि सरकार ने अपने पकौड़े वाले वादे के अनुसार ऐसी कोई योजना जारी नहीं की है लेकिन हां कुछ युवाओं को फुर्सत भी नहीं है ये फेसबुक और ट्विटर पर राग अलापने के अलावा, 54% युवाओं को सोशल मीडिया उद्योग में रोजगार दे दिया गया है, आई टी सेल बिना किसी निवेश के कर्मियों को पाकर काफी लाभ में आगे बढ़ रहा है। व्हाट्सएप्प विश्वविद्यालय में दिए गए ज्ञानों के आधार पर तर्कों एवं कुतर्कों का दौर आप देख सकते हैं, स्वयं को बेरोजगार पाता पुत्र भी सरकारी कर्मचारी पिता के समय में नौकरियों की कमी को इन्हीं तर्कों के दम पर साबित कर देता है और अपने ही पैसे को अपने ही खाते में सब्सिडी के रूप में पाकर सरकार के कार्यों को गिना देता है।

    खैर बात करते हैं लगभग 3000 करोड़ की एक प्रतिमा की, जी हां सरदार वल्लभ भाई पटेल की वह प्रतिमा जो विश्व पटल पर सर्वोच्च प्रतिमा के रूप में अपना नाम दर्ज करा चुकी है एवं अपने पीछे हजारों लोगों को बेघर कर, सैकड़ों की जमीन तथा कर्म भूमि को अपने अंदर समाहित कर चुकी है। हालांकि सरकार ने अनुदान भी दिया है, ये बात लगातार उन्हीं के लोगों के द्वारा कही जा रही है जिनके द्वारा कहा जाता है कि
    जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी

    हालांकि अब तो पैसे से बड़ी ना जननी है, ना जन्मभूमि, क्योंकि सरकार अनुदान दे तो ये लोग अब माँ का भी त्याग कर ही सकते हैं। छोड़िये आप भी क्या बात करते हैं, यह मूर्ति भी तो आवश्यक थी, विश्व मे नाम कैसे होता ? अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर देश की छवि और मजबूत करने में इस मूर्ति का बहुत योगदान है जो मूर्ख लोगों के समझ में नहीं आएगी। ये बात भी सही है, जिस देश का नाम वैश्विक भुखमरी सूचकांक में पड़ोसी देश पाकिस्तान से भी पीछे हो उसकी अंतर्राष्ट्रीय छवि इस मूर्ति ने बढा ही दी है। जहां लोग अस्पताल में भी तबेले सा व्यवहार महसूस करते हैं और अस्पताल की कमी, डॉक्टरों की कमी, संसाधनों की कमी में जान गंवाने वाली जनता कैसे इस मूर्ति की कीमत समझ पाएगी सोचने वाली बात है।

    मुझे लगता है कि इस पैसे का उपयोग अन्यत्र भी हो सकता था, भारत में शैक्षणिक संस्थानों की कमी है, अस्पताल नहीं हैं, और लोग बेरोजगार घूम रहे हैं, भूख से मर रहे लोगों को अन्न जल की व्यवस्था करना और देश को आंतरिक रूप से सशक्त करना शायद इस मूर्ति से मजबूत हो सकता था लेकिन चूंकि मूर्ति बनवाने में एक खास राज्य एवं कुछ विशेष विचारों के लोगों द्वारा पुनः सत्ता प्राप्ति हेतु वोट दिया जाएगा एवं फिर एक बार शुरु होगा निजीकरण का खेल इस उद्देश्य से मूर्ति आवश्यक थी। गांधी और नेहरू की मूर्ति पर कोई प्रश्न नहीं उठाता तो आखिर पटेल की मूर्ति पर प्रश्न क्यों? विषय चिंतनीय है, आप भी चिंता कीजियेगा और हां एक बार मूर्ति होकर आईयेगा क्योंकि आपके जाने से ही वहां से आय उत्तपन्न होगी जो उन किसानों को दी जाएगी जो बेघर हुए, अपने खेतों को गंवा दिए और अब कहीं और रहने के लिए बाध्य हैं। इतना ही नहीं आपका ही यह पैसा पुनः रेल व्यवस्था के निजीकरण, नवोदय विद्यालय के शिक्षार्थियों के शुल्क में वृद्धि, रिलायन्स टेलीकॉम के उत्थान आदि में किया जाएगा

  • जामिया मिल्लिया इस्लामिया-मानवता,देश प्रेम और सहिष्णुता का अदुभूत धरोहर।

    मुर्शीद कमाल

    देश के सभी शैक्षिक संस्थानों में जामिया मिल्लिया इस्लामिया का अस्थान अद्वितीय है। अद्वितीय इस लिये क्योंकि जामिया की स्थापना सिर्फ़ शिक्षा प्राप्त करने के लिये नहीं की गयी थी, और ना ही जामिया की शिक्षा मात्र रोज़गार प्राप्त करने के लिये थी बल्कि जामिया की स्थापना शिक्षा बराये जीवन के उद्देश से हुई थी, और यह अद्वितीय इस लिये भी है क्योंकि देश के दूसरे शैक्षिक संस्थानों की तरह जामिया का संस्थापक कोई एक व्यक्ति विशेष नहीं है। असहयोग आंदोलन और खिलाफ़त अांदोलन के कोख से जन्मे इस अदभुत शैक्षिक संस्थान के वैचारिक स्थापक महात्मा गांधी थे तो उनके सपनों में हकीक़त का रंग भरने के लिये कुदरत ने मौलाना मोहम्मद अली जौहर, हकीम अजमल ख़ां, डॉक्टर मुख़्तार अहमद अंसारी और अबदुल मजीद ख़्वाजा जैसे नामवर लोगों का चयन कर लिया था, और फिर जब जामिया पर सख़्त वक़्त अा पड़ा और असहयोग अांदोलन की समाप्ति पर कुछ तबकों द्वारा इसके अस्तित्व को ही बेमकसद बता कर जामिया को बंद करने की वकालत शुरू की गयी तो डॉक्टर ज़ाकिर हुसैन, डॉक्टर अाबिद हुसैन और प्रोफेसर मोहम्मद मुजीब साहब की बहूमूल्य सेवाओं ने जामिया को सहारा दिया।

    ये 20 अक्तूबर 1920 की तारीख़ थी। असहयोग आंदोलन पर समर्थन हासिल करने और उस पर अमल करवाने के लिये अलीगढ़ विश्वविद्दालय के छात्रों के अनुरोध पर महात्मा गांधी और मौलाना मोहम्मद अली जौहर अलीगढ़ आये और यूनियन हॉल में छात्रों से ब्रिटिश साम्राज्य के संरक्षण और आर्थिक मदद से चलने वाले शैक्षिक संस्थानों के बायकॉट की अपील की। ये नेता ये चाहते थे कि अलीगढ़ सरकारी संरक्षणा से बरी होने का एेलान कर दे। अलीगढ़ के छात्रों और अध्यापकों का इस सिलसिले में रवैय्या संतोषजनक था, लेकिन सरकार समर्थक तबके ने इसका विरोध शुरू कर दिया।यही नहीं बल्कि महात्मा गांधी और दूसरे देश भक्तों का मज़ाक उड़ाना शूरू कर दिया और एक बिल पास कर के इस अांदोलन के विरोध की घोषणा कर दी। ज़ाकिर साहब जो उन दिनों अर्थ शास्त्र में एम.ए करने के बाद नये नये लेक्चरर के ओहदे पर नियुक्त हुए थे उस दिन अपने चिकित्सकीय परीक्षण के लिये दिल्ली गये हुये थे। दूसरे दिन जब वो अलीगढ़ वापिस आये तो उन्हें गांधी जी के साथ हुये बरताव पर बड़ा दुख हुआ। दूसरे दिन छात्रों ने यूनियन हॉल में फिर सभा की। ज़ाकिर साहब ने इस सभा में शिरकत की। अली बंधुओं ने इस में बहूत ही मार्मिक भाषण दिये। भाषण का असर ये हुआ कि छात्रों की भीड़ बेक़ाबू हो गयी। जाकिर साहब फूट फूट कर रोने लगे। जाकिर साहब के पूराने साथी रशीद अहमद सिद्दीक़ी बताते हैं कि भीड़ बेकाबू हो गयी थी, उन्हें (जाकिर साहब) खींच कर भीड़ से बाहर लाया।पूछा जाकिर साहब ये क्या हुआ? कहने लगे रशीद साहब अलविदा! जिंदगी का आरम्भ अच्छा हुआ अब समापन के अच्छे होने की प्रार्थना करियेगा। मेरे पास मेरा जो कुछ है उसे यूसुफ और महमूद के हवाले कर दीजियेगा! कालेज के कागजात उन्हें वापिस भेज दीजियेगा। मैंने कहा मुर्शीद! इस अांदोलन के बारे में बहूत बार बातचीत हुई लेकिन आप कभी इसके समर्थक नहीं थे,अब आखिर क्या हुआ? कहने लगे “आंदोलन सही हो या ग़लत उसके बारे में यकीन के साथ कुछ कहना ना मुमकिन भी है और वक्त से पहले भी! मुझे जिस सोच ने मजबूर किया वो ये थी कि कहने वाले ये ना कहने लगें कि अलीगढ़ वालों ने उस आंदोलन में हिस्सा नहीं लिया जिसमें मुसीबतों का सामना करना पड़ता! मुझे तो ये बतलाना है कि अलीगढ़ के सपूत बज़्म और रज़म (सुख और दुख) दोनों की जिम्मेदारी उठा सकते हैं, आप मुझे ना रोकें, पाँसा फेंका जा चुका है, अब तो अंजाम जो भी हो अच्छा खुदा हाफिज़!”

    अब जबकि छात्रों की एक अच्छी संख्या ने अपनी अलग पहचान कायम करते हुये अलीगढ़ से ताल्लुक़ तोड़ लिया तो फिर उनके लिये एक दूसरे संस्थान की ज़रूरत महसूस की गयी।

    29 अक्तूबर को जुमा की नमाज़ के बाद मोहम्मडन एंगलो ओरियंटल कॉलेज की मस्जिद में एक अारंभिक सभा में शेखुल हिंद मौलाना महमूद हसन के हाथों जामिया मिल्लिया इस्लामिया की बुनियाद रखी गयी। समारोह में अलीगढ़ कॉलेज को हमेशा के लिये अलविदा कह कर एक नये भविष्य की तलाश में आए करीब 300 छात्र एवं अध्यापकों ने शिरकत की। बुनियाद भी महज औपचारिक और प्रतीकात्मक थी, ना किसी भवन का शिलान्यास, ना किसी संस्था का उदघाटन, ना किसी आर्थिक सहायता की उम्मीद,ना कोई उपकरण ना ही कोई सामानـ लेकिन प्रतिबद्धता,त्याग और कुरबानी का एैसा जुनून कि कुदरत भी हैरान। खुलासा ये कि जामिया के स्थापना की पूरी योजना पहली दृष्टि में आसमान में कायम काल्पनिक योजना लगती थी। लेकिन जो पवित्र हस्तियां इस इंकिलाबी मनसूबे को वैवहारिक आकार देने के लिये इकठ्ठा हुई थीं वो कोई साधारण हस्तियाँ नहीं थीं, उनके महत्वकांक्षा के पीछे एैसी खु़दाई ताक़त के होने का इहसास होता था जिसके बल पर पहाड़ों को अपनी जगह से खिसकने पर मजबूर किया जा सकता था। बोरियों पर बैठने वाले ये लोग दुनिया के आराम के मुकाबले में दुनिया की आजमाईशों को प्राथमिकता देते थे।

    जामिया के स्थापकों के लेख और भाषणों ने जामिया की स्थापना के उद्देश्यों को स्पष्ट कर दिया था। वो जामिया को एक एैसा शैक्षिक संस्थान बल्कि प्रयोगशाला बनाना चाहते थे जहां विचारों की आजादी हो, इंसानी मन गुलामी और शत्रुता से आजाद हो, जहां इस्लामी सभ्यता की सुखद हवाएं देश भक्ति और राष्ट्रीयता का पैगाम सुनाती हों, जहां की हवाओं में इंसानी भाईचारगी,सहिष्णुता और देशभक्ति रच बस गयी हो और जहां इस्लामी अक़ीदे और विचार संयुक्त भारतीय राष्ट्रीयता से संगत हों।

    करीब 4 सालों तक जामिया मिल्लिया अलीगढ़ में किराये की कोठियों और अस्थायी तम्बुओं से राष्ट्रीयता, मानवता, सहिष्णुता और आजादी के जज़्बे का पाठ देती रही और फिर कुछ आर्थिक व प्रशासनिक कारणों से 1925 में दिल्ली स्थानांतरित कर दी गयी। आर्थिक तंगी स्थापना के पहले दिन से ही जामिया के मुक़द्दर में रही। कुदरत ने भी जामिया के स्थापकों की परीक्षा लेने में कभी गुरेज नहीं किया। लेकिन जामिया की खुश किस्मती ये रही कि इतिहास के हर नाजुक मोड़ पर जामिया को एैसे सब्र व शुक्र करने वालों की टीम मिलती रही जिनकी कलंदरी और बोरिया नशीनी देख कर कुदरत को भी प्यार आता था। वो जितनी ज़्यादा मुसीबतों का शिकार होते उतना ही ज्यादा मेहनत और हिम्मत के साथ अपने काम में लग जाते।

    अलीगढ़ से दिल्ली स्थानांतरण भी जामिया को मुशकिलों से नजात ना दिला पाई। अभी जामिया अपने पैरों पर खड़े होने की कोशिश में लगी थी कि 1928 में हकीम अजमल खान का देहांत हो गया। हकीम साहब का देहांत जामिया के लिये किसी बड़ी त्रासदी से कम ना था। आर्थिक मुशकिलों का पहाड़ था जो टूट पड़ा था। हकीम साहब जामिया के औपचारिक कूलपति मात्र नहीं थे, बल्कि जामिया उनकी जिंदगी का मकसद थी जिसे सालों उन्होंने अपने जिगर के खून से सींचा था। जब आर्थिक तंगी का शिकार जामिया बंद होने के कगार पर पहुंच जाता तब हकीम साहब एक बेल आऊट पैकेज के साथ सामने आ जाते। वह ना सिर्फ़ अपने निजी पैसों से जामिया की मदद करते बल्कि देश के विभिन्न दूरदराज़ क्षेत्रों का दौरा करके जामिया के लिये फंड इकठ्ठा करते। कुदरत एक बार फिर जामिया के चाहने वालों की परीक्षा ले रही थी, लेकिन ये महान हस्तियां कब झुकने और डगमगाने वाली थीं सो इस परीक्षा में भी खरी उतरीं। डाक्टर जाकिर हुसैन, डाक्टर आबिद हुसैन और प्रोफ़ेसर मोहम्मद मुजीब साहब उन दिनों जर्मनी से अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद भारत वापिस आ चुके थे। जामिया की जिम्मेदारी अब इन्हीं तीन लोगों के कांधों पर आ पड़ी। एक एतिहासिक फैसला ले लिया गया। “अंजुमन तालीम ए मिल्ली” की स्थापना की गयी और उससे जुड़े लोगों ने ये प्रण लिया कि जामिया को बंद नहीं होने देंगें, 20 सालों तक जामिया नहीं छोड़ेंगें और 150 रूपये मासिक से ज़्यादा तनख्वाह नहीं लेंगें। इन तमाम मोड़ पर जामिया के जिम्मेदारों को गांधी जी की रहनुमाई और संरक्षण हासिल रही। गांधी जी किसी भी कीमत पर जामिया को बंद करने के हक़ में नहीं थे। जामिया गांधी जी के सपनों की ताबीर थी और उन्होंने जामिया से बहूत सारी उम्मीदें जोड़ रखी थीं। वो ना सिर्फ़ इस शैक्षिक संस्थान के वैचारिक स्थापक थे बल्कि सारी उम्र जामिया की जरूरतों का इहसास करते रहे।

    इतिहास के काँटेदार पथ से गुज़रती हुई जामिया आज एक भव्य राष्ट्रीय विश्वविद्धालय का रूप धारण कर चुकी है। तंगी और संसाधनों की क़िल्लत की वो यादें अब सिर्फ़ इतिहास की किताबों में महफूज हैं। बेरंग शेरवानियों और पेवंद लगे पायजामों की जगह अब बेहतरीन वस्त्रों और बरानडेड जूतों ने ले ली है। जामिया के अध्यापक और स्टाफ़ अब देश के किसी भी शैक्षिक संस्थान से बढ़कर या बराबर तनख्वाह पाते हैं। लेकिन देखना ये होगा कि इस परिवर्तन ने जामिया को कहीं उसके वजूद के मकसद से भटका तो नहीं दिया है? क्या हम अपने बच्चों के चरित्र निर्माण करके और उन्हें मानसिक प्रशिक्षण दे कर देश व कौम की वही सेवा अंजाम दे रहे हैं जो जामिया के स्थापकों का सपना था? इंसानी मूल्यों का वही उच्च गुणवत्ता आज भी कायम है जो जामिया की विशेषता थी? त्याग व बलिदान की वही मिसालें आज भी दी जाती हैं जो कभी जामिया का सरमाया हुआ करता था? फूलों की भीनी भीनी खुशबुओं से उठते हुए हवा के ख़ुशगवार झोंके क्या आज भी एक नयी सुबह का संदेश देते हैं? या फिर जामिया का शानदार अतीत इसके हाल को मूंह चिढ़ा रहा है? जामिया के कूलपति, छात्रों और सभी जिम्मेदारों को इन सवालों के जवाब ढूंढना इस स्थापना दिवस पर जामिया के अस्थापकों को बड़ी श्रद्धांजलि होगी।
    (लेखक जामिया मिल्लिया इस्लामिया छात्र संघ के पूर्व उपाध्यक्ष और इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर, नई दिल्ली की मिडल ईस्ट शाखा के संयोजक हैं.)

    मुर्शीद कमाल लेखक।