Category: लेख, विचार

  • पुरे उत्तर भारत में गेहूं,चना तथा सरसों फसल कटाई व खरीद के सम्बंध मे अशफाक कायमखानी ने सरकार को लिखे पत्र।

    माननीय प्रधानमंत्री,
    नरेन्द्र मोदीजी,
    भारत सरकार
    नई दिल्ली।
    विषय-पुरे उत्तर भारत में गेहूं, चना तथा सरसों की फसल पक रही है। उसकी कटाई व खरीद के सम्बंध मे।
    माननीय।
    कोराना वायरस के प्रभाव से आम लोगो को बचाने के लिये भारत व राज्य सरकारों की तरफ से लोकडाऊन चल रहा है। सरकारी आदेश की आम भारतीय पूरी तरह पालन भी कर रहा है। ऐसे हालात मे दिहाड़ी मजदूर पैदल या फिर सरकार द्वारा उपलब्ध साधनों से अपने अपने घर जा चुके है एवं जा रहे है।

    उत्तरी भारत मै गेहूं, चना ओर सरसों की फसल पक कर तैयार हो चुकी है। उनकी समय पर कटाई होना अति आवश्यक है। लोकडाऊन के कारण किसान अपने घरो मे रहने को मजबूर होने के कारण वो फसल कटाई नही कर पा रहा है। फसल कटाई के लिये कोई ना कोई रास्ता निकालना चाहिए। वही किसान की फसल की सरकारी खरीद उनके खेत से ही करने के उपाय करना होगा।
    भवदीय
    अशफाक कायमखानी
    साबिक मेम्बर-राजस्थान राज्य मदरसा बोर्ड,
    सीकर-राजस्थान।
    पिन-332001
    मोबाइल-9414313052
    प्रतिलिपि-मुख्यमंत्री
    राजस्थान, पंजाब, हरियाणा, मध्यप्रदेश, बिहार, यूपी, गुजरात व अन्य प्रदेश

  • दंगा पर काबू पाने में सरकार नाकाम क्यों ?

    नज़रिया:डॉ मोहम्मद मंजूर आलम
    हिंदुस्तान में दंगा और मुस्लिम विरोधी हमलों का इतिहास बहुत पुराना है आजादी से लेकर अभी तक मुस्लिम विरोधी दंगों का सिलसिला जारी है अन्य मौके पर विभिन्न शहरों में मुसलमानों का कत्लेआम हुआ है मुसलमानों के घर लूट गए हैं मुसलमानों के घर जलाए गए हैं उनकी दुकान तबाह व बर्बाद की गई है मस्जिद मदरसा और अन्य धार्मिक स्थल पर हमला होता रहा है और हर जगह फसाद में पुलिस का भी रोल होता है पुलिस दंगाइयों पर काबू पाने के बजाय उसका साथ देती है, जमशेदपुर फसाद हो, नीली का कत्लेआम हो ,भागलपुर फसाद हो या फिर 2002 का गुजरात कत्लेआम हर एक फसाद और कत्लेआम में मुसलमानों का जानी माली नुकसान हुआ है यही मामला 2020 के दिल्ली फसाद का है यहां भी मुसलमानों पर एकतरफा हमला हुआ उनकी दुकानों को जलाया गया मकानों को लूटा गया है और फिर आग के हवाले कर दिया गया इस पूरे फसाद में दिल्ली पुलिस ने भी दंगाइयों और फसादियों का साथ दिया

    पुलिस की जिम्मेदारी और कर्तव्य अमन व शांति बरकरार रखना लायन एंड ऑर्डर को कंट्रोल करना और देश का अमन व शांति खराब करने वालों को कानून के शिकंजे में करना है लेकिन भारत में लगातार इसके खिलाफ उल्टा हो रहा है संविधान का एहतराम खत्म हो चुका है कानून का डर नहीं रह गया है और जिनकी जिम्मेदारी कानून का पालन करना है वह खुद कानून की धज्जियां उड़ा रहे हैं दिल्ली दंगा ने एक मर्तबा फिर सारे दंगा की इतिहास को ताजा कर दिया है पुलिस और प्रशासन पर सवाल उठना शुरू हो गया है और सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि दंगा के मुजरिमों को सजा क्यों नहीं मिलती है ? मजलूमों के साथ इंसाफ क्यों नहीं होता है ? क्या भागलपुर दंगा के मुजरिमों को सजा मिल गई ? क्या मजलूम ओ को इंसाफ मिल गया ? 2002 के गुजरात दंगा में जो लोग शामिल थे उसे सजा मिल गई ? मजदूरों को इंसाफ मिल गया ? जिस पुलिस और प्रशासन ने दंगा को अंजाम दिया था उनके किरदार की जांच हो गए क्या ? मुजफ्फरनगर दंगा के मुजरिमों को सजा मिल गई क्या ? उनके खिलाफ चार्ज शीट दाखिल हो गई ? हर सवाल का जवाब नहीं मैं मिलेगा आखिर क्यों दंगा के मुजरिमों को सजा क्यों नहीं मिल रही है दंगाइयों के खिलाफ हुकूमत एक्शन क्यों नहीं लेती है हमेशा भारत में हिंदू मुस्लिम कराया जाता है क्या हिंदू मुस्लिम दंगा भारत की तरक्की के राह में रुकावट नहीं है क्या इस तरह के दंगा से देश का नुकसान नहीं होता है

    उत्तर पूर्वी दिल्ली में जो दंगा और कत्लेआम हुआ है उसके पीछे कई सारे लोगों का का हाथ है लेकिन सबसे महत्वपूर्ण दिलों में कानून का डर ना होना और दंगाइयों को पुलिस का साथ मिलना है इस दंगा के पीछे देश की मीडिया का भी हाथ है जिसने पिछले 5 सालों में सिर्फ नफरत को फैलाने और हिंदू मुस्लिम समाज को बांटने का काम किया है सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि दिल्ली भारत की राजधानी है यहां पार्लियामेंट हाउस है , सुप्रीम कोर्ट और हाईकोर्ट है राष्ट्रपति भवन है , सभी बड़े संस्थान हैं , फौज की बड़ी तादाद यहां मौजूद होती है , पुलिस की बड़ी टुकड़ी रिजर्व में होती है प्रधानमंत्री और गृहमंत्री समेत सभी महत्वपूर्ण सियासी लीडर और आला अफसर का दिल्ली केंद्र है इसके बावजूद दिल्ली में 3 दिनों तक फसाद होता रहा है इंसानों का कत्लेआम हुआ दुकानों को जलाया गया मकानों को लूटा गया तबाह बर्बाद किया गया और हर तरह से नुकसान पहुंचाया गया 3 दिनों तक यह सब होता रहा लेकिन सरकार और प्रशासन ने इस दंगा पर काबू पाने की कोई कोशिश नहीं की इस दंगा ने हिंदुस्तान की गंगा जमुनी तहजीब को एक बार फिर नुकसान पहुंचाया है हिंदू मुस्लिम एकता को खतरे में डाल दिया है अल्पसंख्यक समुदायों के दिल में बहुसंख्यक समुदायों का खौफ बैठाने की कोशिश हुई है यह मैसेज दिया गया है कि मुसलमान बहुसंख्यक समुदाय के रहमों करम पर है इसे एक दायरे में रहना होगा अगर वह उस दायरे से बाहर निकलने की कोशिश करते हैं सरकार के खिलाफ आवाज उठाते हैं तो उसे इसका अंजाम भुगतना होगा क्या यह लोकतांत्रिक है , क्या यह सेकुलरिज्म है , क्या या डेमोक्रेसी है , क्या अब संख्या को के साथ इंसाफ है , क्या यह अब संसद के हक की पासदारी है

    हिंदुस्तान की आजादी में हिंदू मुस्लिम सिख ईसाई आदिवासी और सभी धर्म के लोग शामिल थे देश का संविधान लोकतांत्रिक और सेक्युलर है इस देश पर सबका बराबर का हक है यहां सदियों से विभिन्न मजहब के मानने वाले आबाद रहे हैं ऐसे में यह कहना कि यह देश सिर्फ हिंदुओं का है मुसलमान और ईसाई दूसरे दर्जे का नागरिक है यह देश के हजारों साल पुरानी इतिहास कल्चर के खिलाफ है यह लोकतंत्र और संविधान के खिलाफ है ऐसी कोशिश देश के लिए मुसीबत और तरक्की की राह में बहुत बड़ी रुकावट है देश के संविधान संवैधानिक संस्थानों न्यालय खासतौर पर न्यालय की जिम्मेदारी है कि वह संविधान की रक्षा करें अपने खुद मुखतारी और आजादी को बरकरार रखते हुए देश के निजाम चलाने में कर्तव्य का वाहन करें इलाहाबाद हाई कोर्ट के पूर्व जज जगमोहन लाल सिन्हा जैसा किरदार अपनाने की जरूरत है जिन्होंने इंसाफ की तराजू को झुकने नहीं दिया और उस समय के प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ फैसला दिया फैसला मामूली नहीं था लेकिन अंझानी जज ने न्यालय का एहतराम बाकी रखा कानून के सामने किसी पद और सरकार को नहीं देखा यह फैसला देश के न्यालय पर लोगों के भरोसे को बढ़ाता है मजलूम और कंधों को हौसला देता है लोग चाहते हैं कि न्यायालय में आज वही हौसला वही इंसाफ और रवायत दोहराई जाए , हाल के दिनों में जस्टिस मुरली धरन ने भी इंसाफ कायम करने की कोशिश की न्यालय का वजूद और एहतराम बरकरार रखते हुए दिल्ली दंगा पर सख्त रुख अपनाया तब सरकार यह बर्दाश्त नहीं कर पाई और रातों-रात उनका ट्रांसफर कर दिया गया आम जबान में इसे कहा जाता है कि न्यायालय व इंसाफ पर काम करने वाले जज को इसकी कीमत चुकानी पड़ी जस्टिस मुरलीधरन ने जो कुछ किया वह काबिल ए मिसाल है अंजाम से घबराए बगैर इंसाफ करना देश और देश की तरक्की के लिए जरूरी है और इसी राह पर सभी जज को चलने की जरूरत है

    दंगे फसाद और बसादात से हमेशा गंगा जमुनी तहजीब को नुकसान हुआ है देश की एकता को नुकसान पहुंचा है देश की खुशहाली और समाज की तरक्की का नुकसान हुआ है दिलों में दूरियां पैदा हुई है आम नागरिकों की मौतें हुई हैं उनके दुकान और मकान बर्बाद हुए हैं और उसके बदले में कुछ लोगों ने सियासत चमकाई है कुछ को कुर्सियां मिली है इसलिए लोगों में बेदारी और उन्हें इसके नुकसान का एहसास होना जरूरी है सरकार की जिम्मेदारी है कि वह दंगा को रोके पुलिस अपना काम जिम्मेदारी के साथ अंजाम दे दंगाइयों का साथ देने के बजाय दंगाइयों के खिलाफ एक्शन ले देश में अमन व शांति बनाए क्योंकि देश और देश की तरक्की के लिए कानून की पालन कानून का खौफ और कानून पर अमल करना जरूरी है जब लोगों के दिलों से कानून का खौफ खत्म हो जाता है तो देश में अनार की फैल जाती है और फिर इसकी आग उन लोगों तक पहुंच जाती है जो इसे बढ़ावा देते हैं इसलिए देश की भलाई इसी में है कि हिंदू मुस्लिम के बीच नफरत का सिलसिला बंद किया जाए इस को पनपने से रोका जाए और भाईचारा को फरोग दिया जाए लिखना जरूरी यह है कि जब हमारे पूर्वजों ने भारत के संविधान का निर्माण किया तो इन्होंने विधायिका , प्रशासन और न्यालय सभी को एक दूसरे से अलग रखा हर एक की जिम्मेदारियां अलग-अलग दी गई इसका मकसद यही था कि देश में पारदर्शिता रहेगी करप्शन नहीं होगा एक का दूसरे पर दबाव नहीं रहेगा बल्कि सभी संस्थान पूर्ण आजादी के साथ संविधान के मुताबिक काम करेंगे खासतौर पर न्यायालय को सबसे अलग रखा गया ताकि उसकी वर्चस्व कायम रहे मुकम्मल आजादी और हथियार के साथ न्यालय अपना काम करें वह सरकार के दबाव के सामने झुकने और किसी भी बात से आकर्षित होने के बजाय हक की बुनियाद पर फैसला करें लोग चाहते हैं कि पूर्वजों का यह संविधान और दस्तूर इस तरह के मुताबिक बरकरार रहे न्यालय मुकम्मल तौर पर आजाद रहकर अपना काम करें इंसाफ का तराज़ू कभी भी थोड़ा सा भी ना झुके

    (लेखक:ऑल इंडिया मिल्ली काउंसिल के जनरल सेक्रेटरी हैं)

  • भारत मे अब कांग्रेस पार्टी को अपने वजूद के लिये संघर्ष करना होगा

    अशफाक कायमखानी,जयपुर।दिल्ली चुनाव के बाद भारत की सबसे पूरानी राजनीतिक “कांग्रेस पार्टी” को अब अपने वजूद को बचाये रखने के लिये कड़ा संघर्ष करना होगा। अगर संघर्ष नही किया तो भारत से कांग्रेस का नाम गधे के सीर से जैसे सींग घायब हुये है। उसी तरह से राजनीतिक परिद्रश्य से कांग्रेस गायब हो सकती है।

    भारत का एक मात्र दिल्ली शहर ही मात्र ऐसा है जहां भारत के हर प्रांत के लोग रहते एवं उनमे से किसी ना किसी प्रतिशत मे वो दिल्ली के मतदाता की हेसियत से मतदान भी करते है। केजरीवाल के पहले लगातार पंद्रह साल तक शीला दीक्षित के नेतृत्व मे सरकार रहने के बावजूद 2015 की तरह 2020 के विधानसभा चुनाव मे एक भी सीट नही जीत पाने से अधिक गम्भीर बात यह है कि इस चुनाव मे कांग्रेस को मात्र दो प्रतिशत मत मिलना कांग्रेस के भविष्य पर सवाल खड़ा करता है
    .
    हालांकि कांग्रेस के नेता कतई मानने को तैयार नही होगे पर यह हकीकत है कि 1980 के बाद से स्वयं सेवक संघ की विचारधारा वाले अनेक नेताओं ने कांग्रेस पर उच्च स्तर का दबदबा कायम करके हर पोलिसी बनने मे अपना पूरा दखल कायम करके धीरे धीरे उसकी जड़ो को इतना खोखला कर दिया कि वो आज दो प्रतिशत मतो पर आकर अटक गई है। भाजपा के वर्तमान सांसदों मे करीब 167 सांसद ऐसे है जो पहले किसी ना किसी रुप मे कांग्रेस के रहे है। ओर अनेक कांग्रेस नेता आज भी अपने ब्यानो या फिर अन्य तरह से भाजपा की मदद करते नजर आते है।

    राहुल गांधी अच्छे जेहन व संघर्ष वाले वाले नेताओं की सूची मे रखा जा सकता है लेकिन राहुल गांधी के अध्यक्ष बनने के साथ ही विपक्षी नेताओं की जबान मे जबान मिलाकर स्वयं काग्रेस के नेताओं के एक धड़े ने राहुल गांधी की इमेज जनता मे बनाने का काम किया है उस इमेज से अभी उभर पाना मुश्किल है। चाहे कांग्रेस राहुल को फिर से अध्यक्ष बनाकर आत्मघाती कदम ही क्यो ना उठाये। कांग्रेस को चापलूसों की राय को दरकिनार करके प्रियंका गांधी को आगे लाकर जंग लड़ने पर विचार करना चाहिए। कांग्रेस मे एक अजीब नेताओं का झूंड काम कर रहा है कि मोतीलाल बोहरा जैसे बूजुर्ग नेताओं को लोकसभा व राज्यसभा से बाहर रखकर एक नये यूग के जनाधार वाले नेताओं को आगे लाना होगा वरना दिल्ली की तरह ही अन्य प्रदेशों मे भविष्य मे कांग्रेस को अपनी गत झेलनी होगी।

    चाहे नेता अपनी पीठ कितनी भी थप थपाये लेकिन कांग्रेस ने जिस दिन से युवा कांग्रेस व NSUI के पदाधिकारियों का चुनाव करने का तरीका अख्तियार किया है उसी दिन से उक्त संगठनों का बंटाधार होना शुरू हुवा था जो अब भी जारी है। इसके पार्टी की ताकत व मजबूती को काफी नुकसान हुवा है। वैचारिक तोर पर कांग्रेस के विचारों से कतई मैल नही खाने वाले धनबल व भूजबल की ताकर पर उक्त संगठनों के सदस्य बन जाते है या फिर बना दिये जाते है जो मतदान के दिन पदाधिकारियों को चून तो लेते है फिर उनका कांग्रेस से किसी तरह का नाता भी नही रहता है। चुने गये पदाधिकारियों मे से अधिकांश पदाधिकारी एक स्वार्थ पुर्ति तक तो अपने आपको कांग्रेस कहते है। जब स्वार्थ पूर्ति मे अड़चन आती है तो वो दूसरी तरफ कूदी मारने से भी परहेज नही करते है। इस तरह की चुनावी प्रक्रिया से कांग्रेस वास्तव मे कमजोर हुई है ओर कमजोर हो रही है। चाहे कांग्रेस नेता राहुल गांधी के दवाब के कारण जबान नही खोले।

    कुल मिलाकर यह है कि जहां देश के हर कोने से तालूक रखने रहते हो उस दिल्ली के विधानसभा चुनाव मे कांग्रेस दो प्रतिशत मतो पर आकर ठहर जाये इससे बडे घातक हालात पार्टी के लिये हो नही सकते। कांग्रेस को आत्ममंथन करके उन नेताओं से छुटकारा पा लेना चाहिए जो पार्टी पर बोझ बन चुके है। संघ प्रवृत्ति के नेता जिनकी जड़े काफी गहरी हो चुकी है। उन जड़ो को खोदकर फेंकना होगा। वरना वो नेता पार्टी जड़े खोदकर रखदेगे।

  • कन्हैया की जन मन गण यात्रा का निशाना – मोदी या तेजस्वी ?

    बिहार में इन दिनों कन्हैया कुमार की जण गण मन यात्रा चल रही है। कन्हैया की इस यात्रा का फलितार्थ उसके चाहने वाले बता रहे हैं की मोदी सरकार के द्वारा लाये गए नागरिकता संशोधन कानून का विरोध और साथ में बेरोजगारी , अशिक्षा और केंद्र सरकार की विभिन्न मोर्चों पर नाकामी को लोगों के बीच सामने लाना है। लेकिन वास्तविकता इतनी मात्र है ? मैं मानता हूँ ऐसा नहीं है। मैं ऐसा क्यों मानता हूँ , इसे समझने के लिए इस यात्रा के चरित्र ,मंच पर उठने -बैठने वाले लोग ,यात्रा को सुचारू रूप से आगे बढ़ाने वाली दृश्य -अदृश्य ताकतें और इस यात्रा के साथ -साथ यात्रा कर रहे छिपे हुए निहितार्थों से होकर गुजरते हैं।

    इस यात्रा में आने वाले लोग या तथाकथित भीड़ कौन है ?
    कन्हैया की इस यात्रा में अब तक हुई सभाओं की पड़ताल करने पर यह देखा गया है कि औसतन 5000 लोगों की मौजूदगी रहती है। संयोगवश मधुबनी के जयनगर में हुई सभा का प्रत्यक्षदर्शी मैं भी था। 4 फरबरी को मैं जयनगर अपने निजी काम से गया था तभी नेशनल हाईवे के किनारे एक मैदान में लोगों के जमावड़े देखकर पता चला कि कन्हैया कुमार की सभा होने वाली है। मुश्किल से दो से ढाई हजार लोग होंगे। संयोगवश उसी दिन बिहार के छात्रों की इंटरमीडिएट की परीक्षा भी चल रही थी और वे लोग भी जयनगर के 3 -4 परीक्षा केंद्रों से निकल कर सड़क पर खड़े थे यह जानकर कि कन्हैया कुमार आने वाला है। इसलिए सोशल मीडिया पर चालाकी से अलग -अलग कोनों से खींची गयी तस्वीरों को डालकर भारी हुजूम दिखाने की कारीगरी उसकी पी आर टीम का हिस्सा है , कुछ और नहीं।
    अब बात करते हैं भीड़ की प्रकृति पर। इसकी सभा में आने वाले लोग कौन हैं ? शीशे की मानिंद साफ़ है कि कन्हैया की सभा में आये लोगों 70 -80 % मुस्लिम हैं। इसका कारण यह है कि सिर्फ बिहार में ही नहीं , देश भर में NRC ,CAA के विरोध में स्वतःस्फूर्त आंदोलन चल रहा है। अलग -अलग जगहों पर लोग महीना भर से ऊपर से लोग धरने पर बैठे हुए हैं जिसमें अधिकतर मुस्लिम हैं। और मीडिया के द्वारा कन्हैया की गढी हुई तथाकथित क्रांतिकारी और मोदी विरोध का चेहरा ऐसे में सभा के आसपास धरने पर बैठे लोगों को अनायास ही ले जा रहा है। आज मोदी CAA और NRC वापस ले ले और फिर सीपीआई के बैनर तले कन्हैया कोई सभा करे , लोग ढूँढ़ने से भी नहीं मिलेंगे। बाकी जो 20 % लोग उस सभा के हिस्सा बन रहे हैं , वह यूथ है। उस यूथ का कोई स्पेसिफिक चेहरा नहीं है। उस यूथ में वे लोग भी हैं जिसे कन्हैया में कनहैवा देशद्रोही दीखता है , वे लोग भी हैं जिसे कन्हैया में क्रांतिकारी दीख रहा है और वे बेरोजगार युवा भी जो कन्हैया के द्वारा बेरोजगारी के खिलाफ की गयी तक़रीर को सुनकर यह समझ बैठते हैं कि क्रांति अब आने ही वाली है और बेरोजगारी अब बीते दिनों की बात होगी।

    इस यात्रा का मंच कैसे सज रहा है ?

    यह सवाल भी लाजिमी है कि इस यात्रा के तहत हुई अलग -अलग सभाओं में कौन से चेहरे प्रमुखता से दीखते गए और वे किन मकसदों से जुड़े हुए हैं ? पूरी यात्रा में 3 तरह के लोगों के द्वारा मंच के इर्द -गिर्द जगह बनायी जा रही है या यूँ कहें कि ये ही लोग सभाओं के आयोजक और संचालक की तरह दीख रहे हैं। पहले किस्म के लोगों में मुस्लिम सोशल एक्टिविस्ट जो अलग -अलग जगहों पर NRC /CAA के विरोध में आंदोलन को संचालित कर रहे हैं। इस प्रकार आपको अररिया से कटिहार तक की सभाओं में जाहिद अनवर भी नजर आते हैं जो एक रिसर्च स्कॉलर तो हैं ही , NRC /CAA के विरोध में चल रहे आंदोलन के सीमांचल कोआर्डिनेशन कमिटी के प्रेजिडेंट भी हैं। वहीँ ओवैसी की पार्टी के बिहार प्रदेश अध्यक्ष अख्तरुल इस्लाम भी दीखते हैं तो कदवा के कांग्रेसी विधायक शकील अहमद खान भी दृष्टिगोचर होते हैं । श्री खान हर तरह से मददगार हैं। इस तरह 40 -50 लोगों की टीम में वैसे मुस्लिम युवा , राजनेता या अन्य लोग हैं जिसे लगता है कि कन्हैया के साथ दीखती तस्वीर कहीं उसे कहीं से वैतरणी पार करा दे। इसमें से कई आनेवाले बिहार विधानसभा चुनाव के टिकटार्थी हैं , इससे इंकार नहीं किया जा सकता।

    मंच को दूसरे तरह के लोगों ने भी कब्जाया हुआ है। शिवहर जिले में हुई सभा में मंचासीन कुछ लोगों पर नजर डालिये। श्री नारायण सिंह जो जिला पार्षद भी हैं या रह चुके हैं। बड़े ठसक से मंच पर मौजूद हैं। उनकी छवि उस इलाके में किसी दबंग से कम नहीं। भाजपा से स्वाभाविक जुड़ाव है। शास्वत पांडेय भी दीखते हैं। जदयू के पूर्व विधायक मदन तिवारी भी नजर आ जाते हैं। सबके सब दक्षिण खेमे से हैं और उन्हें कन्हैया में अब सवर्णों का भावी तारणहार नजर आने लगा है। इसलिए वोट भले वो भाजपा को दें और दिलायें , लेकिन कन्हैया के लिए माहौल बनाने में अग्रणी भूमिका निभा रहे हैं। अब जब राजनीति में हैं तो इच्छा भी होगी कि कांग्रेस , सीपीआई या अन्य जगहों से टिकट दिलाने में कन्हैया मददगार हो तो मदद लेने और बदले में मदद देने में क्या ऐतराज हो। तो इधर भी टिकटार्थियों की लम्बी कतार है।
    टीम में तीसरे किस्म के लोग में सीपीआई की कल्चरल विंग इप्टा के लोग हैं। कमोबेश सभी सभाओं में यही पैटर्न है।

    आगामी बिहार विधानसभा चुनाव और जण -गण -मन यात्रा।

    कन्हैया से जब पत्रकार पूछता है कि आपकी इस यात्रा को क्या विधानसभा चुनाव की तैयारी समझा जाय ? वह सिरे से इंकार करता है और बेरोजगारी , गरीबी ,अशिक्षा, फलाना -ढिमकाना कहकर निकल लेता है। लेकिन यह सच नहीं है। सच यह है कि इस यात्रा के जरिये बिहार विधानसभा चुनाव में अपनी और अपनी पार्टी का क्लेम और शेयर चाह रहा है जो बुरा नहीं है। ऐसे कई लोग यह कहते मिल जायेंगे जिसमें राजद के समर्थक अधिक हैं कि वह संघ और भाजपा द्वारा प्लांटेड है ताकि अधिक से अधिक मुस्लिम वोट्स को तीतर -बीतर कर सके। मैं फ़िलहाल यह नहीं मानता कि उसे संघ ने प्लांट किया है। लेकिन आगे बढ़ते हैं।
    कन्हैया का सारा फोकस मुसलमानों और दलितों में हैं। ज्यादा मुस्लिम वोट्स पर , उसमें भी खासकर मुस्लिम युवाओं पर। आंबेडकर और आरक्षण से दशकों तक छत्तीस का रिश्ता रखने वाली वामपंथी दलों ने अब चोला बदला या बदलने को मजबूर हुआ और लाल सलाम से चलकर नील सलाम तक पहँच गया। जय भीम और जय मीम गाये जाने लगे हैं। तो इसका साफ़ -साफ़ सन्देश है मुस्लिम और दलित वोटों में सेंधमारी कर राजद को समझौते की टेबल पर लाना और अपना अधिक से अधिक शेयर क्लेम करना। वामपंथी दलों की आखिरी उम्मीद अब कन्हैया से ही है जो बीते कई सालों से सत्ता और संसद की चासनी से महरूम है। कन्हैया में अब उसके अपनी बिरादिरी के लोगों को भी भविष्य नजर आने लगा है जो बीते 30 सालों से सत्ता से या तो दूर रहा है या सीधे तौर पर मजा न लेकर नितीश कुमार की मदद से मजा लेने को मजबूर हुआ। इसलिए दल चाहे भाजपा हो , जदयू हो या कांग्रेस हो , कान्हा की बिरादिरी के नेता कान्हा की अदा पर लहालोट हैं।

    नीतीश की मुस्कुराहट और तेजस्वी की त्योरियाँ।

    स्वाभाविक है नितीश मंद -मंद मुस्कुरा रहे होंगे कान्हा की चपल चालों को देखकर। वर्तमान हालात में जब देश भर में NRC /CAA के विरोध में आंदोलन चल रहा है , यह तो तय है कि मुसलमानों का एक भी वोट जदयू और नितीश कुमार को नहीं जाने वाला जिन्हें इस समुदाय के अच्छे -खासे वोट मिल जाते थे । तब इनका वोट जायगा किसे ? स्वाभाविक है जदयू -भाजपा को हराने में जो सबसे ज्यादा सक्षम होगा उसे ही। और आज की तारीख में भी राजद ही वह दल है और मुसलमानों का एक मुश्त वोट राजद और सहयोगी दलों को ही जाना है। और यह स्थिति नितीश कुमार की पेशानी पर बल लाने के लिए काफी है। ऐसे में कान्हा जब मुसलमानों के घर सेंधमारी करेंगे तो नितीश जी का मुस्कुराना और तेजस्वी की त्योरियाँ चढ़ना लाजिमी है। नितीश बहुत सादगीपसंद और किफायती व्यक्ति हैं। वह बिना मतलब के न तो मुस्कुराते हैं , न गुस्सा होते हैं , न किसी को पुचकारते हैं। इसलिए यदा -कदा जब कान्हा को दुलार कर देते हैं तो उसके निहितार्थ हैं। पश्चिमी चंपारण में जब पुलिस कान्हा को रोकने और डिटेन करने गयी तो आनन -फानन में नितीश जी का अपनी पुलिस का फटकारना बस यूँ ही नहीं था। जब भाजपा और जदयू को यह लग जायगा कि कान्हा उसकी राजनीति के लिए खतरा है , अंदर करने में सेकंड भर की देर नहीं करेगी। लेकिन भाजपा को यह पता है कि कान्हा मुस्लिमों के घर जितना अधिक सेंध मारेंगे , राजद का उतना अधिक नुकसान होगा। ऊपर से कन्हैया को देशद्रोही का ख़िताब देकर उसे मिडिल क्लास हिन्दूओं को एक जगह रखने में उतनी ही अधिक सहूलियत होगी। और यह स्थिति राजद और तेजस्वी की राजनीति के लिए निश्चित तौर पर खतरे वाली है।

    लालबाबू ललित
    अधिवक्ता सुप्रीम कोर्ट

  • दिल्ली विधानसभा चुनाव: पूर्वांचल फैक्टर कितना असर डालेगा, तीस सीटों पर निर्णायक भूमिका में हैं

    दिल्ली का विधानसभा चुनाव हो और हिन्दीभाषी राज्य बिहार और उत्तर प्रदेश की चर्चा न हो यह असंभव सी बात है। यह कहावत है की दिल्ली का रास्तआ उत्तर प्रदेश से होकर गुज़रता है और यह कहावत बहुत हद तक सही भी है सत्ताधारी दल भाजपा और उसके गठबंधन के पास उत्तर प्रदेश और बिहार से ही अकेले 100 से अधिक सांसद हैं इसलिए पूर्वांचल मतदाता को ध्यान में रखना हर पार्टी चाहेगी आज चुनाव प्रचार का आख़िरी दिन बचा है। जितनी रैलियां होनी है वह आज तक ही होगी। क्योंकि 8 फरवरी को दिल्ली विधानसभा चुनाव के लिए वोट डाले जाएंगे और 11 फ़रवरी को मतगड़ना होगी।

    पूर्वांचल फैक्टर

    दिल्ली में पूर्वांचली वोटरों की संख्या के अलग-अलग आंकड़े सामने आते हैं. न्यूज़लॉन्ड्री को दिए एक इंटरव्यू में दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष मनोज तिवारी बताते हैं कि दिल्ली में 43 प्रतिशत वोटर पूर्वांचल के रहने वाले हैं जनसत्ता अख़बार से जुड़े वरिष्ट पत्रकार मनोज मिश्रा जो खुद भी पूर्वांचल से आते हैं, बताते हैं, “दिल्ली में 26 से ज्यादा विधानसभा क्षेत्रों में 20 प्रतिशत वोटर पूर्वांचली हैं. वहीं 10 विधानसभा क्षेत्रों में वोटरों की संख्या 50 प्रतिशत से ज्यादा है. ऐसे विधानसभा क्षेत्र संगम विहार, बुराड़ी, किराड़ी, विकासपुरी और उत्तम नगर है.’’

    भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष पद पर मनोज तिवारी का होना।

    जहाँ भारतीय जनता पार्टी के प्रदेश अध्यक्ष मनोज तिवारी जो की भोजपुरी गायक से सांसद बन्ने तक का सफ़र तय किया है। और अभी वह दिल्ली में भाजपा की कमान संभाल रहे हैं। इसके पीछे बस एक ही वजह है की वह पूर्वांचल से आते हैं और दिल्ली विधानसभा चुनाव में पूर्वांचल मतदाता निर्णायक भूमिका में हैं इसको देखते हुए भाजपा के दिल्ली इकाई में मनोज तिवारी के विरोध के बावजूद भाजपा ने विधानसभा चुनाव की कमान मनोज तिवारी के हांथों में दे रखी है। और चुनाव प्रचार में उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और बिहार के उप मुख्यमंत्री को भी प्रचार की अहम ज़िम्मेदारी दी गई है। जिसका मुख्य कारण है पूर्वांचल के मतदाताओं की संख्या को ध्यान में रखा गया है। उत्तर प्रदेश और बिहार में अपनी सरकार होने का फ़ायदा उठाना चाहती है भाजपा तो भाजपा की तरफ़ से दिल्ली विधानसभा चुनाव प्रचार की कमान वैसे तो प्रधानमंत्री और गृह मंत्री के हांथों में है।

    कांग्रेस के लिए कितने महत्वपूर्ण हो सकते हैं कृति आज़ाद।

    उसी प्रकार कांग्रेस ने भी भाजपा के पूर्व सांसद और अब कांग्रेस के नेता कृति आज़ाद जो भारतीय क्रिकेट टीम का भी हिस्सा रह चुके हैं और पिछला 2019 का लोकसभा से पहले भाजपा से कांग्रेस में आए और झारखंड के धनबाद लोकसभा से चुनाव लड़ा जिसमें उनहें हार का सामना करना पड़ा था लेकिन उनकी भी अपनी राष्ट्रीय पहचान है। भले ही कृति आज़ाद अभी कांग्रेस में आए हैं लेकिन इनके पिता श्री भागवत झा आज़ाद बिहार के मुख्यमंत्री भी रह चुके हैं जो कांग्रेस के कद्दावर नेता थे। कृति आज़ाद भी दरभंगा से तीन बार लोकसभा सदस्य और दिल्ली के गोल मार्केट से विधानसभा के सदस्य भी रह चुके हैं। इसलिए कांग्रेस ने भी अपनी शुन्य को दूर करने के लिए और पूर्वांचल के मतदाताओं को ध्यान रखते हुए उनहें दिल्ली विधानसभा चुनाव का प्रमुख बनाया है। दिल्ली की पूर्व मुख्यमंत्री श्रीमती शिला दीक्षित जीनकी शादी उत्तर प्रदेश में कन्नौज में हुई थी और उनहोंने भी अपने को पूर्वांचल की कहकर हमेशा राजनीति की। लेकिन अभी कांग्रेस के पास शिला दीक्षित की मृत्यु के बाद कोई वैसा नेता नहीं है जो दिल्ली की जनता के पर अपना प्रभाव छोड़ सके। इसलिए कांग्रेस के पास खोने को कुछ नहीं है। कांग्रेस मैदान में अपने कुछ प्रत्याशीयों और राष्ट्रीय नेतृत्व के दम पर चुनाव लड़ रही है। इसलिए कांग्रेस की कोशिश है किसी भी तरह से अपना वोट प्रतिशत बढ़ाया जा सके और विधानसभा में अपने शून्य के नम्बर को समाप्त किया जा सके। जबकि 2013 तक पूर्वांचल के मतदाताओं साथ कांग्रेस के साथ था।

    अपने पांच साल के विकास और केजरीवाल का चेहरा।

    आम आदमी पार्टी को अपने पिछले पांच सालो के कामों पर भरोसा है। और अरविंद केजरीवाल का एक मज़बूत चेहरा है जबकि और किसी दल के पास अरविंद केजरीवाल को टक्कर देने के लिए कोई नेता नहीं है और अगर मुख्य विपक्षी पार्टी भापजा के प्रदेश अध्यक्ष जो की अरविंद केजरीवाल के सामने कहीं दिखाई नहीं देते हैं और अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली की जनता को पिछले चुनाव में किया गया वादा बिजली, पानी, स्वास्थ्य, मोहल्ला क्लिनिक और सरकारी स्कूल जैसे बुनियादी वादे को पूरा कर के दिल्ली की जनता के बीच अपने भरोसे को मज़बूत किया है। अब केजरीवाल भी क्यों पिछे रहते पूर्वांचल के मतदाताओं की बात की जाए तो पिछले विधानसभा चुनाव में आप के 14 विधायक पूर्वांचल से आते थे। इस बार भी आप ने 12 प्रतयाशी पूर्वांचल से संबंध रखते हैं। आप के राज्यसभा सांसद संजय सिंह, दिल्ली इकाई के पूर्व प्रमुख दिलीप पांडे और सरकार में मंत्री और वर्तमान दिल्ली इकाई के प्रमुख गोपाल राय भी पूर्वांचल से ही आते हैं। दिल्ली में अपने किए गए विकास और राजनीतिक समिकरण को बखूबी समझने वाले केजरीवाल को पूरी उम्मीद है की फिर से उनकी वापसी ज़रूर होगी । अब यह तो परिणाम ही बताएगा।

    Zain Shahab Usmani, Engineer, Columnist & Political Analyst. This is personal’s view of writer.

  • अंजना ओम कश्यप बदलीं, आजतक बदल रहा या शाहीनबाग की शाहीनों ने लाजवाब कर दिया ?

    अंजना ओम कश्यप से मेरी मुलाकात मोतीलाल नेहरू कॉलेज के एक सेमिनार में हुई थी। हालांकि उसके अलग-अलग सेशन में हम वक्ता थे लेकिन श्रोताओं के उनसे सवाल के उनके जवाब के बाद उन्हें काउंटर किया था मैंने। अंजना का वही फॉर्मूला जवाब था कि जो दर्शक देखना चाहता है मीडिया वही दिखाती है। बाद में खाना खाते हुए एक-दूसरे से और संवाद हुआ।

    हालांकि अंजना के जवाब में एक बात तो जरुर सच था कि कमोवेश मीडिया को उसके दर्शक प्रभावित करते हैं-कौन सा कार्यक्रम कितना देखा जाता है, इस स्तर पर। आज शाहीन बाग में उनकी रिपोर्टिंग यू ट्यूब पर उनकी दूसरी रिपोर्टिंग की तुलना में काफी ज्यादा लाइव देखी जा रही थी। तो क्या यह देखना ही अंजना और आजतक को बदल रहा है-यह अधूरा सत्य है, लेकिन सत्य तो है ही।

    मीडिया कभी भी वायनरी में नहीं होती। गोदी मीडिया और क्रान्तिकारी मीडिया की बाइनरी। पूंजी के नियंत्रण के भीतर जितनी ढील है उसी में वह कभी आजतक होगी तो कभी एनडीटीवी। हालांकि अंजना ओम होने और रवीश कुमार होने में बहुत फर्क होता है। अरुण पूरी के नेतृत्व वाले अन्य माध्यम-मसलन इंडिया टुडे, लल्लनटॉप आदि सीधे एकरूप पैकेज नहीं हैं-एक पैकेज जरूर हैं। क्रेता की रूचि के अनुरूप। (नोट: यहां मैं मीडिया की बात कर रहा जी न्यूज, रिपब्लिक टीवी जैसे मुखपत्रों की नहीं जो भाजपा के सांसदों की अपनी दुकान है।)

    लेकिन महाराष्ट्र चुनाव के बाद से आजतक थोड़ी-थोड़ी करवट ले रहा है, अपने ही हाउस के इंडिया टुडे जैसा हो रहा है, लल्लनटॉप जैसा नहीं। कुछ दिन पहले मैंने इस ओर इशारा किया था। इस बदलने के कारण ही ‘जेएनयू का स्टिंग’ हो गया या भाजपा के प्रवक्ताओं से आज थोड़े असुविधाजनक सवाल भी पूछे जा रहे हैं।

    आज जब अंजना शाहीनबाग गयीं तो लगभग एक पत्रकार थीं। इसके पहले दो लोग एजेंट की तरह शाहीनबाग में घुसने की निरर्थक कोशिश कर चुके हैं। आज कार्यक्रम का फॉरमेट कुछ ऐसा था कि बीजेपी खुद ब खुद बेनकाब होती गयी। बीजेपी के नेताओं के भाषण के क्लिप के साथ शाहीन बाग की दर्जन भर महिलाओं से रैंडम लिया गया इंटरव्यू और उनका जवाब बीजेपी को अपने फॉर्मेट में अश्लील और झूठा शक्ल देता रहा-पूरे कार्यक्रम में भाजपा को धराशायी किया। और इस कार्यक्रम की प्रस्तोता थीं खुद अंजना ओम कश्यप जिनकी पत्रकारिता/ऐंकरिंग पिछले दिनों समर्पित हो चुकी थी।

    आज की प्रस्तुति में अंजना ने स्त्री होने की संवेदना के साथ वैसे सवाल भी किये जिसे कोई गंजेडी मर्द पत्रकार अपने ठस्स के साथ नहीं कर सकता था। ऐसे गंजेडी मर्द पत्रकार शाहीनबाग से भगाये जाने के योग्य ही होते हैं। आखिर जनता का भी हक़ है कि किस पत्रकार से वो बात करे और किससे नहीं।

    रही बात औरतों के जवाब की। उन औरतों के जवाब से सीएए, एनआरसी सहित राजनीति के बारे बहुत कुछ सीखा जा सकता है। आजतक का कार्यक्रम सरकार और भाजपा में साम्प्रदायिक एजेंडे को ध्वस्त करे या न करे उसे पस्त जरूर करेगा। इस कार्यक्रम का इरादा जितना स्पष्ट था उतनी ही स्पष्टता से औरतों ने और उपस्थितों ने जवाब दिया।

    और थोड़ी राजनीतिक शर्म यदि पार्टी में बची होगी, जिसकी उम्मीद कम ही है, तो 500 रूपये पर प्रोटेस्ट में बैठने के प्रोपगंडा पर औरतों के जवाव को सुनकर वह पश्चाताप जरूर करेगी कि उसने यह मर्दवादी जुमला क्यों उछाला। वैसे अंजना ने भी क्या खूब बाइंड अप कमेंट बोला, ‘ ऐसा कोई नोट इस सरकार ने नहीं छापा है, जिससे इन महिलाओं को खरीदा जा सके।’

    Sanjeev Chandan ji के फेसबुक वॉल से ली गई है ये लेखक का निजी विचार है।

  • “शरजील इमाम, तुम इस देश में कन्हैया कुमार नहीं हो सकते” क्योंकि तुम मुसलमान हो!

    आजकल शरजील इमाम चर्चा में हैं। भाजपा की प्रतीक पॉलिटिक्स ने उसे देशद्रोह का ताजा प्रतीक बना दिया है, जबकि यही भाजपा सरकार आतंकवादी सप्लाई करने वाले देवेंदर सिंह पर देशद्रोह की धारा नहीं लगाती और न ही उसके आकाओं का कनेक्शन खंगालती है। वैसे सरकार, भाजपा और भाजपा के संबित जैसे प्रवक्ता वही कर रहे हैं जो उन्हें करना चाहिए, जो उनकी राजनीति के अनुरूप है। लेकिन हम क्या कर रहे हैं?

    3 जनवरी को शाहीनबाग में सावित्रीबाई फुले जयंती मनाने के लिए हम शरजील से मिले थे। कोई आधे घण्टे की मुलाकात थी। शरजील में हमने पाया कि वह मुसलमानों की राजनीति को वर्षों से, आजादी के दिनों से ठगा हुआ महसूस करता है। उसे कांग्रेस, गांधी, सीपीएम से लेकर आज के नेताओं और दलित नेताओं, जैसे बहन जी अथवा चन्द्र शेखर आदि से सवाल थे। वह चाहता था कि शाहीनबाग का प्रोटेस्ट भी राजनेताओं और आंदोलन को कैरियर की तरह लेने वालों से बचे। शरजील इमाम मुसलमानों की राजनीति को उसी तरह एक दिशा देना चाहता है जैसा किसी भी अस्मितावादी आंदोलन के लोग देना चाहते हैं। यानी सम्बद्ध समूह द्वारा सम्बद्ध समूह की राजनीति।

    बिहार के जहानाबाद के एक स्थानीय नेता का बेटा शरजील ईमाम यद्यपि एक अच्छा आंदोलन शाहीन बाग में खड़ा करने वाले शुरुआती लोगो में एक था लेकिन वह उतना टैक्टिकल नहीं था जितना ऐसे आंदोलनों के निरन्तर संचालन के लिए होना चाहिए। उसने और उसके साथियों ने जनता का मूड समझे बिना, सबको विश्वास में लिये बिना 3 जनवरी के पहले ही शाहीनबाग के प्रोटेस्ट को वापस लेने की घोषणा कर दी। फिर क्या था उसके इस जल्दबाज बयान के लिए उसे भाजपा और अमितशाह का एजेंट तक कहा गया-जोकि ऐसा था नहीं। शाहीनबाग के प्रोटेस्ट को हालांकि दूसरे लोगों ने संभाल लिया लेकिन शरजील की यह जल्दबाजी हमसबको अखरी। लेकिन मुझे बुरा लग रहा था कि उसे शाह का एजेंट कहा जा रहा था, जबकि वह इस आंदोलन के प्रति ईमानदार था। कई बार आप अनायास ही अनपेक्षित खेमे में या तो धकेल दिये जाते हैं या समझे जाते हैं।

    और अब! अब परसो से उसका वायरल वीडियो।वीडियो में कथित तौर पर वह आसाम से शेष भारत को काटने की बात कर रहा है। बस क्या था? शाहीनबाग जैसे आंदोलनों से व्यथित भाजपा को अपने अंदाज के डैमेज कंट्रोल का मौका मिल गया। उस वीडियो को मैंने पूरा सुना। वह आसाम को कतई अलग करने की बात नहीं कर रहा, अलग देश की बात नहीं कर रहा। वह आसाम का सम्पर्क आंदोलनों के जरिये शेष भारत से काटने की बात कर रहा है। उसकी अगली दो-तीन पंक्तियां यह सिद्ध कर देती हैं। लेकिन भाजपा को तो जैसे संजीवनी मिल गयी है। दाढ़ी बढ़ाया एक मुसलमान नौजवान इंडिया से आसाम को काटने की बात कर रहा-ऐसा बिम्ब भाजपाइयों के लिए कितना आह्लादकारी होता है! आई टी सेल के बारे में पता करिये, वीडियो मिलते ही वहां मिठाईया बंटी होगी।

    और हम, हम लिबर्ल्स। हाय। जब बात अपने से अलग लोगों की आती है तो हम जलेबी भी छीलकर खाते हैं। कन्हैया कुमार पर जब भाजपाइयों ने, संघियों ने देशद्रोह का माहौल बनाया तो कन्हैया अपना बेटा था। उसके हर उटपटांग जवाब, बयान के लिए हम तर्क तलाशने लगे। लेकिन शरजील इतना खुशनसीब कहाँ! उसे तो हम उसकी स्थापनाओं में सिद्ध करके रहेंगे। कोई मौका नहीं देंगे कि वह एक अतिरेक और जल्दबाजी से अलग भी सोचे। कन्हैया की जाति और उसके धर्म ने उसे ‘फिर भी पवित्र’ रखा। बिहार के जदयू खेमे के भूमिहारों और अन्य दलों के भूमिहारों के उस दौर के बयान गौर करने लायक हैं। भूमिहार ही क्यों सम्पूर्णता में सारे सवर्णों के बयान, प्रायः।

    पर शरजील, शरजील को यह सुविधा नहीं मिलेगी। ऊपर से उसने गलत अवसर पर अपने अतिरेकी अंदाज का भाषण दिया है। उसे आसानी से भाजपा-संघ देशद्रोही प्रतीक बना देंगे और हम ऐसा बनाने में उनका अपने पूर्वग्रहों और मूर्खताओं के साथ सहयोग ही कर रहे होंगें।

    Sanjeev Chandan की फेसबुक वाल से ली गयी है ये लेखक की निजी विचार है

  • मेक इन इंडिया की तरह फ्लॉप होने की राह पर उज्ज्वला, फ़सल बीमा और आदर्श ग्राम योजना:रवीश कुमार

    प्रधानमंत्री फ़सल बीमा योजना अपने लांच होने के साल में ही सवालों से घिर गई थी। 2016 में यह योजना लांच हुई थी। प्रीमियम देने के बाद भी बीमा की राशि के लिए किसानों को कई राज्यों में प्रदर्शन करने पड़े हैं। कंपनियों के चक्कर लगाने पड़े हैं। यहां तक गुजरात सरकार के उप मुख्यमंत्री ने कंपनियों को चेतावनी दी है कि वे बीमा राशि देने में देरी न करें।

    बिजनेस स्टैंडर्ड ने अपने संपादकीय में लिखा है कि प्रधानमंत्री ने फसल बीमा को लेकर मंत्रियों के समूह का गठन किया है। रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह इसके अध्यक्ष होंगे। गृहमंत्री अमित शाह भी इस समूह में होंगे।

    आंध्र प्रदेश, पश्चिम बंगाल, बिहार जैसे कृषि प्रधान राज्यों ने फसल बीमा योजना से अलग कर लिया है। कर्नाटक गुजरात और ओडिशा भी अलग होने का मन बना रहे हैं। राज्यों को लगता है कि इस योजना की लागत बहुत है और किसानों को लाभ कम है। यही नहीं चार निजी बीमा कंपनियां भी इस स्कीम से अलग हो गई हैं। उनका मानना है कि यह घाटे का सौदा है।

    उज्ज्वला योजना का भी यही हाल है। यह योजना भी 2016 में लांच हुई थी। जिन लोगों को सिलेंडर मिला है वो दोबारा नहीं भरवा पा रहे हैं। दोबारा सिलेंडर भरवाने वालों के राष्ट्रीय औसत में गिरावट जारी है।12 महीने में 3.08 सिलेंडर भराने का ही औसत है। इसका मतलब है कि जिनके पास सिलेंडर है वे अभी भी चूल्हे पर खाना बना रहे हैं। जो कि इस योजना के मकसद के ठीक उल्टा है। वजह यही हो सकती है कि जिन 8 करोड़ लोगों ने सिलेंडर लिए हैं उनकी आर्थिक स्थिति नियमित नहीं है कि वे लगातार सिलेंडर का इस्तमाल कर सकें। आज के इंडियन एक्सप्रेस में विस्तार से पढ़ें।

    आदर्श ग्राम योजना भी फ्लाप हो गई है। 2014 में लाल किले से प्रधानमंत्री मोदी ने इसका एलान किया था। प्रधानमंत्री ने आदर्शवादी एलान किया था कि हर ज़िले में एक गांव आदर्श हो जाए तो आस पास के गांवों को प्रेरणा मिलेगी। 5 साल बाद यह योजना ख़ास प्रगति नहीं कर सकी है। हर चरण में आदर्श ग्राम के तौर पर गोद लेने वाले सांसदों की संख्या कम होती जा रही है। इंडियन एक्सप्रेस के हरिकिशन शर्मा ने रिपोर्ट की है।

    आप जानते हैं कि मेक इन इंडिया का भी हाल वैसा ही है। अब यह योजना इतनी फ्लाप हो चुकी है कि कोई इसकी बात नहीं करता। टेलिकाम मंत्री भारत में निर्मित आई फोन दिखाकर इसकी कामयाबी तो बताते हैं लेकिन पांच साल में मैन्यूफैक्चरिंग सेक्टर का ग्रोथ रेट माइनस में पहुंच जाना बताता है कि उनके पास आई फोन के अलावा कुछ और बताने को नहीं है।

    रोज़गार का सवाल? उसकी चिन्ता न करें। अभी व्हाट्स एप यूनिवर्सिटी में हिन्दू आबादी और मुस्लिम आबादी को लेकर जो मैसेज आ रहे हैं उसमें डूबे रहें। आपको नौकरी और सैलरी की चिन्ता नहीं होगी। बेरोज़गारी में भी ऐसे ख़ुश रहेंगे जैसे रोज़गार मिल गया हो।

    क्या अब मैं आई टी सेल के लोगों और इनकी राजनीति के समर्थकों से उम्मीद कर सकता हूं कि वे इस लेख को जन जन तक पहुंचाएं? ताकि उनकी निष्पक्षता साबित हो सके।

  • मलगजा सा नया साल

    -मोहम्मद अलामुल्लाह

    नये बरस के उदास सूरज
    बता के हम क्यों खुशी मनाएं ?
    बता के हम कैसे गुनगुनाएं ?
    गले से लोगों को क्यों लगाएं ?
    सड़क पे रातें बिता रहे हैं
    सरों पे इल्ज़ाम आ रहे हैं
    बता के ऐसे नसीब वाले ?
    कहाँ पे जश्ने तरब मनाएं ?
    किसे बुलाएँ, कहाँ बिठाएं ?

    उदास चेहरे को देख सूरज
    हमारी हालत पे ग़ौर कर तू
    हमारे ऊपर निगाह करके
    हमें वो रोशन गुमान दे दे
    हमारी नज़रें उतार सूरज
    हर इक तरफ हम खड़े हुए हैं
    सितम के मौसम में हम डटे हैं
    अँधेरी रातों में जाग कर हम
    नई सेहर की तलाश में हैं
    ***

  • जामिया यूनिवर्सिटी के साथ इतनी बर्बरता और जुल्म मत करो दिल्ली पुलिस

    जामिया यूनिवर्सिटी के साथ इतनी बर्बरता मत करो

    दिल्ली पुलिस

    जामिया मिल्लिया के साथ ऐसा मत कीजिए। अंतरात्मा भी कोई चीज़ होती है। आदेश ही सब नहीं होता है। छात्रों की तरफ़ से जो वीडियो आए हैं उसमें आपकी क्रूरता झलकती है। प्लीज़ ऐसा मत कीजिए। एक बस की आग का सहारा लेकर ऐसा नहीं करना था। आपके होते आग कैसे लगी ? तब वो भीड़ बेक़ाबू थी तब तो ऐसा नहीं किया। शाम का फ़ायदा उठाकर अब आप आप लोग हास्टल और कैंपस में घुसकर मार रहे हैं यह बर्बरता है। ऐसा मत कीजिए।

    छात्रों से अपील है कि शांति बनाए रखें। वो एक ऐसे दौर में है जब पुलिस से भी बर्बर मीडिया हो गया है। लेकिन पूरी कोशिश कीजिए कि कोई भी तत्व हिंसा न करे। कौन बाहरी है उस पर खुद नज़र रखें। हो सके तो शाम के वक्त आंदोलन न करें। अंधेरे का फ़ायदा हमेशा ताकतवर को मिलता है।

    सभी पक्षों अपील है कि हिंसा का लाभ इस वक्त किसे होगा आप समझते हैं। इसलिए खुद नज़र रखें। हिंसा न होने दें। कोई भी फ़ार्मेशन ऐसा बनाएं जिसमें कोई अनजान पास भी न आ सके। अगर ऐसा नहीं कर सकते हैं तो प्रदर्शन न करें। छात्रों से अपील है कि शांति और अहिंसा का इम्तहान उन्हें देना है। पुलिस और मीडिया को नहीं। यह कैसे करना है उन्हें सोचना होगा।

    नागरिकों से अपील है कि वे तटस्थ होकर देखें कि किस तरह जामिया के छात्रों के साथ नाइंसाफ़ी हुई है। ऐसा मत कीजिए। ये ज़ुल्म आने वाले समय में भारत के लोकतंत्र के ख़ात्मे की कहानी लिख रहा है। आप इस कहानी को मत लिखने दें। बाद में कोई अफ़सोस लायक़ भी नहीं बचेगा। हिंसा की कहानी से किसे फ़ायदा होता है आप जानते हैं ।

    इस तरह से यूनिवर्सिटी पर हमला करना आपकी अकेली और समूह की आवाज़ को कुचलना है। सौ बार कह चुका है कि इस वक्त आप जिन अख़बारों और टीवी चैनलों को अपने पैसे से ज़हर पीला रहे हैं और वो आपको पीला रहे हैं उनसे दूर रहें। ज़िम्मेदारी निभाइये। जामिया से भी सख़्त सवाल करें और पुलिस से भी। वीसी की इजाज़त के बग़ैर कैंपस में पुलिस कैसे आ गई? ये सवाल वीसी से भी करें।

    शांति शांति शांति

    शुक्रिया।

    रवीश