Category: लेख, विचार

  • इस्लाम धर्म ने 1450 वर्ष पूर्व ही लॉक डाउन,क़ुरन्टीन, हॉट-स्पॉट,आइसोलेशन,फेस मास्क और हैंड वाश को परिभाषित कर दिया था।

    घोसी (मऊ)कोविड-19 के विश्वव्यापी संकट के दौरान यदि इस्लाम की सलाह पर पूरे विश्व मे अमल किया जाता तो शायद इस मुसीबत को कम किया जासकता था।
    कुरान शरीफ की सूरा संख्या 5 में स्पष्ट कहा गया है कि जिस मुल्क में रहते हो, उसके कायदे-कानून और वहां के हुक्मरानों की बात को मानो।

    ईसलाम मज़हब की आसमानी किताब और उसके पैगंबर मुस्तफ़ा मुहम्मद सल्लेअलाहुअलैहिवसल्लम (SAW) ने इन पाबंदियों एवं एहतियातों का जिक्र 1450 साल पहले ही किया था, आज 21वीं शताब्दी में विज्ञान तो उन्हीं बातों का पालन करने को कह रहा है।
    ऐसे में इस्लाम के मानने वालों का फर्ज बनता है कि वे अपने मज़हब के बताए हुए रास्तों पर चलें एवं अपने, समाज की तथा पूरे मुल्क के लोगों की हिफाज़त करें और सरकार के निर्देशों का पालन करें।
    ऐसे स्पष्ट धार्मिक निर्देश के बावजूद भी यदि कोई कोरोना वायरस की महामारी के दौरान सरकार के निर्देशों का उल्लंघन करे, तो समाज के खिलाफ हरकतें करनेवाले ऐसे इंसान को गैरजिम्मेदार ही माना जाएगा।

    हज़रत मुहम्मद मुस्तफा सलललाहु अलैहिवसल्लम (SAW) की पृष्ठ हदीस में संक्रामक रोग के दौरान *लॉक डाउन और हॉट स्पॉट* जैसे उपाय के निर्देश भी दिए गए हैं। हदीस में कहा गया है कि संक्रामक बीमारी के दौरान उन जगहों पर जाने से परहेज करें, जहाँ पर ये महामारी हो, और अगर आप उसी जगह पर हैं, जहां बीमारी है तो उस जगह को छोड़कर बाहर न जाएं। *बुखारी (5739) एवं अल मुस्लिम (2219)*
    आज सरकार *‘सोशल डिस्टैंसिंग’* एवं *‘कोरेंटाइन’* की बात कर रही है। हदीस में भी संक्रामक रोग से पीड़ित व्यक्ति को सेहतमंद लोगों से दूर रखने की हिदायत दी गई है। *[अल बुखारी 6771 एवं अल मुस्लिम 2221]*
    *आइसोलेशन* की बात आप आज सुन रहे है, मगर नबी करीम (SAW) ने 14 सदी पहले फरमाया था के सेहतमंद ऊंटों को बीमार ऊंटों से अलग बांधो।

    आप सल्लाहोअलैहे वसल्लम ने ये भी फरमाया के जिस शख्स को संक्रामक रोग हो, शेष समाज को उससे दूर रहना चाहिये। *[सही बुखारी वाल्यूम 07- 71- 608 ]*
    अपने एक जगह ये भी फरमाया के किसी संक्रमित से ऐसे भागो जैसे जंगल मे शेर को देखकर भागते हो। हदीस में साफ कहा गया है यदि आप संक्रमित है तो दूसरों को मुसीबत में न डालें *[इब्न मजहा (2340)]*

    महामारी और संक्रमण के समय के लिय भी इस्लाम मे कहा गया है कि ऐसी महामारी के वक्त आपका घर ही आपकी मस्जिद है। जो सवाब (पुण्य) मस्जिद में नमाज का है, ऐसे समय में वही सवाब घर में पढ़ी हुई नमाज का भी है। *[अल तिरमज़ी(अल-सलाह, 291)]*
    इन दिनों कोरोना वायरस से बचने के लिए *फेस मास्किंग* एवं *हैंड वाशिंग* को जरूरी बताया जा रहा है। ये बात तो 1450 साल पहले इस्लाम ने बताया थी कि साफ-सफाई आधा ईमान है।

    पुष्ट हदीस में बताया गया है कि मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहेवसल्लम को जब छींक या खांसी आती थी, तो वह खुद के कपड़े से अपना मुंह ढक लिया करते थे। ये भी कहा गया है कि हुजूर ने फरमाया कि बाहर से अपने घर आते ही अपने हाथ धो लिया करो। *(तिरमज़ी, बुक 43, हदीश 2969)*

    वैसे भी इस्लाम में हर बालिग मुसलमान मर्द व औरत पर पांच वक़्त की नमाज अनिवार्य है, और नमाज से पहले वज़ू (हाथों, पैरों और मुंह को ठीक से धुलना) अनिवार्य है। *[अल मुस्लिम (223)]*
    इन हदीसो को पढ़ने और समझने के बाद ये बात समझ से दूर है कि कोरोना वायरस के संक्रमण से बचने के लिये आखिर इस्लाम के कुछ मानने वालों को समझाना क्यों पड़ रहा है। जो लोग आज भी इस बीमारी को गम्भीरता से नही लेरहे हैं तो क्या उन मुसलमानों तक इस्लाम का संदेश ठीक से नही पहुच रहा है या वो लोग इस बात को समझना नही चाह रहे हैं।


    लेखक*अरशद जमाल पूर्व चेयरमैन मऊ*

  • बिहारी मज़दूर का दर्द और बिहारी नेता की नेतागिरी।

    *शाह अज़मतुल्लाह अबुसईद*
    *सेव लाइफ फाउंडेशन*

    *ना मजदूरों का जाति है ना धर्म वो केवल मेरी नज़र में मज़दूर हैं।*

    हरियाणा..वही राज्य है जहां के नेता संसद में कहा था कि पानी से अगर बिजली निकाल ली जायेगी तो फिर उस पानी में फसल उगाने की ताकत कहां बचेगी.. हरियाणा..वही राज्य है जहां बाबू जगजीवन राम को “बाबूजी” उपनाम मिला। हरित क्रांति और औद्योगिकीकारण दोनों इस राज्य में एक साथ खडे हुए। किसान और मजदूर दोनों की मांग अचानक बढी। इतने बडे पैमाने पर सप्लाइ कौन करेगा। वंशीलाल, भजनलाल और देवीलाल तीनों की नजर बिहार पर पड़ी। 90 के दशक में देवी लाल ने देखा कि लालू हरियाणा की मदद कर सकते हैं। लालू को बिहार का मुख्यमंत्री बनाने के लिए देवी लाल ने न केवल लॉंबिंग की बल्कि उस जामने में पांच लाख रुपया खर्च भी किया था। शरद यादव को इस पूरे साजिश का कोओडिनेटर बनाया गया था। लोग देवीलाल और लालू में जाति और पता नहीं क्या-क्या समीकरण बताते रहे, लेकिन समीकरण एक ही था कि बिहार से मजदूरों को किसी प्रकार हरियाणा लेकर आना। लालू के 15 साल का शासन और हरियाणा का विकास कोई मुगलकाल की बात नहीं हैं, थोडी मेहनत करेंगे तो आकडे आपके हाथ में होंगे।

    लालू ने कैसे बिहार से गद्दारी कर हरियाणा की मदद की, आप खुद जान लेंगे। इधर लालू बिहार में एक एक कर कारखाने बंद करते गये, उधर हरियाणा में बिहारियों की नयी कॉलोनी बसती गयी। हरियाणा का विकास लालू राज में जिस तेजी से हुआ, उस तेजी से भारत में किसी राज्य का विकास नहीं हुआ। लालू ने केवल हरियाणा को मजदूर नहीं दिया दिया, बल्कि बिहार की बेटियां भी हजारों की तादाद में दी है। दूसरे को छोडिए खुद लालू ने ही अपनी एक से अधिक बेटियों की शादी हरियाणा में की है। हरियाणा वो इकलौता राज्य है जहां की चुनावी सभाओं में सरेआम एलान किया जाता है कि तुम अगर मुझे वोट दोगे, तो हम तुम्हारे लिए बिहार से लडकी ले आयेंगे। पतंजलि समेत कई बड़ी दिल्ली,हरियाणा की कई कंपनियों में बिहार के कई मंत्री और सांसद एवं राजनीतिक परिवार का धन लगा हुआ है। आज सवाल है कि इस महामारी में जब कारखाने बंद हुए तो आप बिहार के मजदूरों की मार खाते तस्वीर देख रहे हैं, भुखमरी के कारण उनकी जान जा रही है। कभी उन बेटियों की तस्वीर भी देख लीजिएगा, जिनको आपने हरियाणा और राजस्थान को सौंपा है ..

    *जगन्नाथ, लालू और नीतीश जैसे बिहार के नालयक नेता ने बनाया है।इस तस्वीर को बदलनी है तो इन नेताओं के को राजनीतिक विकल्प से अलग कर दीजिए।*
    *आज फिर लालू परिवार सत्ता के फिराक में है।*
    किसी और विकल्प की ज़रूरत है। तभी पलायन रुकेगा और बिहार में अपने बीवी बच्चों के साथ मज़दूरी करेगा ।
    *ईमानदारी से बात कीजिये पिछले 30 सालों से बंद चीनी मिल, पेपर मिल, कोई ऐसा आपके ज़िला या विधानसभा छेत्र में खुला या बिहार के हर ज़िला में भी एक कारखाना पिछले 30 वर्षों में सरकार ने खोला इसका जिम्मेदार कौन बिहारी मज़दूर, गरीब ?*
    आखिर कब तक जाती और के नाम पर वोट ?
    ऐसा ही दर्द देश के दूसरे राज्यों में रहने वाले गरीब मज़दूर बिहारियों की भी है।

  • माँ की ममता को सलाम:शाह अज़मतुल्लाह अबुसईद

    रज़िया बेगम हैदराबाद ने 1400 किलोमीटर की दूरी खुद स्कूटी से पूरा कर अपने लखते जिगर को अपने पास ले आई और इस बीमारी को मात देते हुए।

    मुझे पूरी उम्मीद है के इस दुनिया में माँ जब तक रहेगी ये दुनिया को बचाएगा।

    माँ की दुआओं से अल्लाह/ईश्वर इस महामारी से हम सबकी हिफाज़त करेगा।
    हम सबको अपने अंदर के इंसान को ज़िंदा करने का वक़्त है।

    अपनी ज़िंदगी को आसान और सदा बनाने की ज़रूरत है।
    घर पर ही रहें और अल्लाह/ईश्वर से मांगते रहें बड़ा दाता है वो वो हमारी ज़रूर सुनेगा।

  • बेशक मेरा रब बेनियाज़ है : मुहम्मद अकरम परतापगढ़ी

    बहुत व्यस्त रहते थे, गाड़ी, मकान, दुकान, बच्चे और कारोबार यह सब चीज़ैं रुकावट बन रहीं थीं, जब गश्त करते हुए कोई नेक नियत इनसान घर पर हमें मस्जिद की तरफ़ बुलाने आता तो हम कहते अभी फुर्सत नहीं है, कपड़े नापाक हैं, गुसल सही नहीं है, बहुत बहाने बनाते थे, तबलीग वालों को देखकर घर में छुप जाते थे, कहते थे इनके पास कोई और काम नहीं है क्या? बड़ा गुरूर था जवानी का, बहुत घमंड था दौलत का, बड़ा नाज़ था अपनी खूबसूरती का, चलते थे ऐसे अकड़ कर जैसे पहाडों की ऊचाई को छे लेंगे , और ज़मीन पर ऐसे पाँव पटखते थे कि ज़मीन फाड़ कर रख देंगे, समझते थे कि हमारे इतना बड़ शिक्षित और कोई नहीं है, खुद को दिमाग व अक्ल का बादशाह समझ बैठे थे, खयाल था की हम नेतागीरी द्वारा हर एक से पंगा ले सकते हैं, हम दलाली के चोर दरवाज़े से बच कर निकल जाएंगे, गुमान था हम मौलवी हैं कोई हीला तराश लेंगे, हम डाकटर हैं हर मर्ज़ का इलाज रखते हैं, हमारा ताल्लुक अमरीका से है हम सब पर भारी हैं, हम सऊदी अरब में रहते हैं, मक्का मदीना से बहुत करीब हैं हमें कोई नुकसान नहीं होगा,

    हमारे सारे काम चल रहे थे, दुकान, मकान, कारोबार, तिजारत, मार्कीट, कंपनी सब आबाद थे, भीड़ थी, रौनक़ थी, पैसों की रेल पेल थी, मकान बनाए जा रहे थे, कारोबार बढ़ाए जा रहे थे, स्कूल आबाद, कॉलेज आबाद, क्लब आबाद, मजलिस और जलसे आबाद, शादी विवाह, गाड़ी मोटर, चहल-पहल, हंसी मज़ाक कहकहे, सब कुछ जारी था,

    बस हम सब रब को भूले हुए थे, मस्जिदें वीरान पड़ी हुई थीं, कुरआन मजीद पर धूल जमी हुई थी, मतलबपरस्ती का ज़माना चल रहा था, नबी की सुन्नतैं बीच बाज़ार में ज़िबह की जा रही थी, माओं को रुस्वा किया जा रहा था, बुजुर्गों को बेइज्जत किया जा रहा था, मेरे रब को जलाल आ गया, रब की ग़ैरत को जोश आ गया, उसने सोए हुए इन्सानो को बेदार करना चाहा, बेहिससों को झिंझोड़ना चाहा, एक बीमारी बल्कि महामारी मुसल्लत कर दी, लोग मस्जिदों की तरफ़ भागे, लेकिन नहीं मेरे रब को किसी मतलबी के सजदे की कोई ज़रूत नहीं है, वह बेनियाज़ है, लोगों ने कोशिश की मस्जिदों में जाने की, उसने पुलिस भेज दी, रब ने मतलबी लोगों को डनडे मार मार कर मस्जिदों से निकलवा दिया, उसे डरे हुए सजदे, मतलबी पेशानी नहीं चाहिए, उसे मुहब्बतों के आंसू पसन्द हैं, रातों की गिड़गिड़ाती हुई ज़ुबान बहुत पसन्द है, शर्मिन्दा दिल को वह बहुत चाहता है, सर झुका हुआ इनसान उसे अच्छा लगता है,

    आओ तौबा करें, अभी उसने मस्जिदों के दरवाज़े बन्द करवाए हैं, कहीं ऐसा ना हो कि तौबा का दरवाज़ा भी बन्द हो जाए, फिर हम चीखते फिरें, और कोई सुनवाई ना हो,

    खुदा के वास्ते रूठे रब को मना लो, सर उसके दर पर झुका दो, आंखो से शर्मिन्दगी के आंसू बहा दो, वह मान जाएगा, वह राज़ी हो जाएगा, सुना है माँ भी गुस्सा होती है, बेटा मॉं के सामने एक आंसू गिरा दे, मां तड़प उठती है, अपने बेटे को सीने से लगा लेती है, नबी जी ने बता दिया है, की अल्लाह सत्तर माओं से ज्यादा प्यार करता है, एक बार रो कर तो देखो, आंखै भिगो कर तो देखो, कह दो अल्लाह हम आगए हैं, कह दो इलाही हम शर्मिन्दा हैं,

    सुनो! वह तुम को ताना नहीं देगा, वह कोई सवाल भी नहीं करेगा, अब तक कहाँ थे, कया ले कर आए हो, कितनी नेकियां खाते में है, कोई सवाल नहीं होगा, उस के दर पर खाली हाथ जाओगे दामन भर कर वापस लौटो गे,

    सुनो मोमिनो! सच्ची तौबा करो, तुम चल कर जाओगे वह दौड़ कर आएगा, क़दम उठाओ तो सही, आगे बढ़ाओ तो सही, वह तुम्हारे इन्तज़ार में है, आंसू गिरा कर रब को मना लो, कोरोना को भगा दो, शुक्रिया धन्यवाद!!!

  • तब्लीग़ी जमाअत केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक आंदोलन है

    Tarique Anwar Champarni

    कोरोना के बहाने तब्लीग़ी जमाअत के ऊपर जो हमला किया जा रहा है यह बहुत लम्बी रणनीति का हिस्सा है। इसको समझने के लिए थोड़ा इतिहास में जाना चाहिये। जमाअत की शुरुआत मेवात के इलाके से हुई थी। वर्तमान में मेवात का यह क्षेत्र हरियाणा, राजस्थान और उत्तरप्रदेश में बंटा हुआ है। इनमें मेव मुसलमानों की बड़ी आबादी है। कई इतिहासकार मेव को मीणा ट्राइब से जोड़कर देखतें है जब्कि कुछ लोग राजपूतों से जोड़कर देखते है। मुझें ट्राइब वाली बात सच्चाई के ज़्यादा नज़दीक लगती है। लगभग मेव की बड़ी आबादी, अनुमानित 400 गाँव, ने इस्लाम क़ुबूल किया था। इस्लाम क़ुबूल करने के बावजूद बहुत से ऐसे रिवाज़ थे जो मेव प्रैक्टिस करते थे बल्कि आज भी प्रैक्टिस करते है। उस समय नस्लीय एवं जातीय विभेद और छूत-अछूत वाली प्रैक्टिस सर चढ़कर बोल रहा था। बल्कि गौत्र-पाल आज भी प्रैक्टिस किया जा रहा है। मेव समुदाय के कई बुद्धिजीवियों का मानना है कि उस समय मेव में ‘घर वापसी’ भी शुरू हो चुकी थी।

    मौलाना इलियास साहब कांधलवी बंग्ला वाली मस्ज़िद, निज़ामुद्दीन, में एक मदरसा चलाते थे। उस मस्ज़िद के मोअज्जिन, अज़ान देने वाला, मेव मुसलमान थे। उसी मोअज्जिन के जरिये मौलाना इलियास साहब को मेव की स्थिति के बारे में जानकारी हासिल हुई थी। उसके बाद मौलाना साहब मेवात की यात्रा पर निकले और कई गाँवों का दौरा किया। अनेक लोगों से मुलाक़ात किये लोग उनकी बातों को समझने से इंकार कर दिये। लेकिन मियाँ जी मूसा, जो कि नूंह के बग़ल में एक गाँव है घासेड़ा के रहने वाले थे, उनको मौलाना की बात समझ मे आगयी। मियाँ जी मूसा के पुत्र मौलाना क़ासिम साहब भरतपुर में मिलखेड़ा मदरसा के संस्थापक है। मियाँ जी मूसा घासेड़ा गाँव के रहने वाले जरूर थे मग़र तब्लीग़ का पहला जत्था फ़िरोज़पुर नमक से सोहना कस्बा के लिए निकला था। जिसका मक़सद मुसलमानों को इस्लाम की बेसिक शिक्षा देना था। चूँकि हिन्दू धर्म को मानने वालों की तरह छूत -अछूत वाली प्रैक्टिस हो रही थी इसलिए इसको ख़त्म करने के लिए एक थाली में पांच-सात लोगों के खाने का रिवाज़ को बढ़ावा दिया गया।

    आज भी भारत में ऐसे हजारों गाँव है जहाँ दो-चार घर ही मुसलमान है। इन गाँवों में लोग हिन्दू रीति-रिवाज को फॉलो करने के लिए विवश है। यह लोग बेहद ग़रीब और दरिद्र है जिनको बहुत आसानी से घर वापसी का शिकार बनाया जा सकता है। मग़र तब्लीगी जमाअत एक ऐसी जमाअत है जिनकी पहुँच ऐसी आबादी में भी है और इस्लाम की बेसिक शिक्षा रोज़ा और नमाज़ से लोगों को जोड़ रखा है। इसलिए हिंदुत्व के एजेंडा पर काम करने वाले संघ को परिशानी है। मैं भी किसी जमाने में तब्लीग़ी जमाअत का बड़ा आलोचक हुआ करता था। बल्कि कुछ विषयों पर आज भी मतभेद है। मेरी पुरानी फेसबुक आईडी पर एक फेसबुक मित्र नरेन्द्र सिसोदिया हुआ करता था उसने 2012 में संघ के मुखपत्र पांचजन्य में इस सम्बंध में एक लेख लिखा था जिसे पढ़ने के बाद जमाअत को लेकर मेरी सोच बदल गयी। हमलोग भले ही तब्लीग़ी जमाअत को एक मसलकी तंज़ीम के तौर पर देखें मग़र आरएसएस के लोग इस तंज़ीम को एक कल्चरल और आइडेंटिटी थ्रेट के तौर पर देखतें है।

    मेरे लिए तब्लीग़ी जमाअत केवल धार्मिक नहीं बल्कि एक कल्चरल मूवमेंट है। अगर तब्लीगियों ने भारत के बाद सबसे अधिक काम कही किया है तब अफ़्रीका के देश है। भारत और अफ़्रीका के इतिहास को उठाकर देखने की ज़रूरत है। भारत में जातीय भेदभाव एवं अछूत जैसा घिनौना ब्राह्मणवादी कल्चर था जब्कि अफ़्रीका में रँग एवं नस्ल के आधार पर ग़ुलाम बनाकर भेदभाव करने जैसा क्रूर कृत्य होता था। मुसलमानों के नट, रँगरेज, पंवरिया, हलालखोर, भाँट, कुंजड़ा, धोबी, हजाम, मल्लाह, जोगी, फ़क़ीर इत्यादि ऐसी जातियाँ है जिनको तथाकथित अभिजात वर्ग के लोग पास भी नहीं बैठाते है, उनके बीच तब्लीग़ी जमाअत के लोग जाकर एक बर्तन में खाना ख़ाकर उस मिथक को तोड़कर सामाजिक समरसता बनाने का प्रयास कर रहे है। अभी इस क्षेत्र में और अधिक काम होना बाकी है। ब्राह्मणवादी सर्किल को मेन्टेन करने वाले उर्दू नामधारी लिबरल और नास्तिक लोगों को यह बात समझ नहीं आसकती है। आपने अफ़्रीका के ग़ुलामी के इतिहास को जरूर पढ़ा और समझा होगा। अगर नहीं पढ़े और समझें है तब अमेरिकन ब्लैक लेखक एलेक्स हैली द्वारा लिखित विश्व की बेस्ट सेलिंग बुक ‘His Search For Roots’ जरूर पढ़ियेगा। साथ ही ‘कुंटा किंते’ पर आधारित Roots Series नामक एक सीरीज जरूर देखें। आपको समझ आयेगा की किस तरह से अंग्रेज़ और अमेरिकन मूल के लोग अफ़्रीकन मुसलमानों को ग़ुलाम बनाया था और धीरे-धीरे अगला पुरा नस्ल अपने कल्चर को भूल गया था। ऐसे परिस्थितियों में जाकर तब्लीगियों ने अफ़्रीका के ब्लैक मुसलमानों के भीतर उनको इंसान होने का एहसास दिलाया है। उर्दू नामधारी लिबरल लोग उतना ही पढ़ें है जितना The Hindu और Ndtv ने लिख दिया है। हाँ, वही The Hindu, जो स्वयं को लिबरल तो कहते है मग़र नाम से ही हिन्दू संस्कृति का आभास होता है, ने संघियों से भी पहले कोरोना वायरस को कुर्ता-पजामा पहनाकर मुसलमान बना दिया था। हम जानते है कि हम अल्पसंख्यक है और हमको अपनी आइडेंटिटी बहुत प्यारी है। हम बैलेंस नहीं बना सकते है। हमनें भी देश की पॉलिटिकल हिस्ट्री पढ़ रखी है और हम जानते है कि किस तरह से छोटी गलतियों को भी बड़ा पेश करके मुस्लिम आइडेंटिटी के नाम पर हमको दबाया गया है। यह जानते हुए भी की मेलकॉम-एक्स की तरह हमें ख़त्म किया जा सकता है फ़िर भी हम आइडेंटिटी के नाम पर बैलेंस बनाकर नहीं लिख सकते है। क्योंकि इस देश मे भी लिबरल होने का एडवांटेज उन्हें ही मिलता है जो अपना नाम The Hindu रखता है।

    लेखक: Tarique Anwar Champarni, एक सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक है ये लेखक के निजी और व्यक्तिगत विचार हैं.

  • तब्लीग़ी जमाअत केवल धार्मिक नहीं बल्कि सामाजिक आंदोलन है

    Tarique Anwar Champarni

    कोरोना के बहाने तब्लीग़ी जमाअत के ऊपर जो हमला किया जा रहा है यह बहुत लम्बी रणनीति का हिस्सा है। इसको समझने के लिए थोड़ा इतिहास में जाना चाहिये। जमाअत की शुरुआत मेवात के इलाके से हुई थी। वर्तमान में मेवात का यह क्षेत्र हरियाणा, राजस्थान और उत्तरप्रदेश में बंटा हुआ है। इनमें मेव मुसलमानों की बड़ी आबादी है। कई इतिहासकार मेव को मीणा ट्राइब से जोड़कर देखतें है जब्कि कुछ लोग राजपूतों से जोड़कर देखते है। मुझें ट्राइब वाली बात सच्चाई के ज़्यादा नज़दीक लगती है। लगभग मेव की बड़ी आबादी, अनुमानित 400 गाँव, ने इस्लाम क़ुबूल किया था। इस्लाम क़ुबूल करने के बावजूद बहुत से ऐसे रिवाज़ थे जो मेव प्रैक्टिस करते थे बल्कि आज भी प्रैक्टिस करते है। उस समय नस्लीय एवं जातीय विभेद और छूत-अछूत वाली प्रैक्टिस सर चढ़कर बोल रहा था। बल्कि गौत्र-पाल आज भी प्रैक्टिस किया जा रहा है। मेव समुदाय के कई बुद्धिजीवियों का मानना है कि उस समय मेव में ‘घर वापसी’ भी शुरू हो चुकी थी।

    मौलाना इलियास साहब कांधलवी बंग्ला वाली मस्ज़िद, निज़ामुद्दीन, में एक मदरसा चलाते थे। उस मस्ज़िद के मोअज्जिन, अज़ान देने वाला, मेव मुसलमान थे। उसी मोअज्जिन के जरिये मौलाना इलियास साहब को मेव की स्थिति के बारे में जानकारी हासिल हुई थी। उसके बाद मौलाना साहब मेवात की यात्रा पर निकले और कई गाँवों का दौरा किया। अनेक लोगों से मुलाक़ात किये लोग उनकी बातों को समझने से इंकार कर दिये। लेकिन मियाँ जी मूसा, जो कि नूंह के बग़ल में एक गाँव है घासेड़ा के रहने वाले थे, उनको मौलाना की बात समझ मे आगयी। मियाँ जी मूसा के पुत्र मौलाना क़ासिम साहब भरतपुर में मिलखेड़ा मदरसा के संस्थापक है। मियाँ जी मूसा घासेड़ा गाँव के रहने वाले जरूर थे मग़र तब्लीग़ का पहला जत्था फ़िरोज़पुर नमक से सोहना कस्बा के लिए निकला था। जिसका मक़सद मुसलमानों को इस्लाम की बेसिक शिक्षा देना था। चूँकि हिन्दू धर्म को मानने वालों की तरह छूत -अछूत वाली प्रैक्टिस हो रही थी इसलिए इसको ख़त्म करने के लिए एक थाली में पांच-सात लोगों के खाने का रिवाज़ को बढ़ावा दिया गया।

    आज भी भारत में ऐसे हजारों गाँव है जहाँ दो-चार घर ही मुसलमान है। इन गाँवों में लोग हिन्दू रीति-रिवाज को फॉलो करने के लिए विवश है। यह लोग बेहद ग़रीब और दरिद्र है जिनको बहुत आसानी से घर वापसी का शिकार बनाया जा सकता है। मग़र तब्लीगी जमाअत एक ऐसी जमाअत है जिनकी पहुँच ऐसी आबादी में भी है और इस्लाम की बेसिक शिक्षा रोज़ा और नमाज़ से लोगों को जोड़ रखा है। इसलिए हिंदुत्व के एजेंडा पर काम करने वाले संघ को परिशानी है। मैं भी किसी जमाने में तब्लीग़ी जमाअत का बड़ा आलोचक हुआ करता था। बल्कि कुछ विषयों पर आज भी मतभेद है। मेरी पुरानी फेसबुक आईडी पर एक फेसबुक मित्र नरेन्द्र सिसोदिया हुआ करता था उसने 2012 में संघ के मुखपत्र पांचजन्य में इस सम्बंध में एक लेख लिखा था जिसे पढ़ने के बाद जमाअत को लेकर मेरी सोच बदल गयी। हमलोग भले ही तब्लीग़ी जमाअत को एक मसलकी तंज़ीम के तौर पर देखें मग़र आरएसएस के लोग इस तंज़ीम को एक कल्चरल और आइडेंटिटी थ्रेट के तौर पर देखतें है।

    मेरे लिए तब्लीग़ी जमाअत केवल धार्मिक नहीं बल्कि एक कल्चरल मूवमेंट है। अगर तब्लीगियों ने भारत के बाद सबसे अधिक काम कही किया है तब अफ़्रीका के देश है। भारत और अफ़्रीका के इतिहास को उठाकर देखने की ज़रूरत है। भारत में जातीय भेदभाव एवं अछूत जैसा घिनौना ब्राह्मणवादी कल्चर था जब्कि अफ़्रीका में रँग एवं नस्ल के आधार पर ग़ुलाम बनाकर भेदभाव करने जैसा क्रूर कृत्य होता था। मुसलमानों के नट, रँगरेज, पंवरिया, हलालखोर, भाँट, कुंजड़ा, धोबी, हजाम, मल्लाह, जोगी, फ़क़ीर इत्यादि ऐसी जातियाँ है जिनको तथाकथित अभिजात वर्ग के लोग पास भी नहीं बैठाते है, उनके बीच तब्लीग़ी जमाअत के लोग जाकर एक बर्तन में खाना ख़ाकर उस मिथक को तोड़कर सामाजिक समरसता बनाने का प्रयास कर रहे है। अभी इस क्षेत्र में और अधिक काम होना बाकी है। ब्राह्मणवादी सर्किल को मेन्टेन करने वाले उर्दू नामधारी लिबरल और नास्तिक लोगों को यह बात समझ नहीं आसकती है। आपने अफ़्रीका के ग़ुलामी के इतिहास को जरूर पढ़ा और समझा होगा। अगर नहीं पढ़े और समझें है तब अमेरिकन ब्लैक लेखक एलेक्स हैली द्वारा लिखित विश्व की बेस्ट सेलिंग बुक ‘His Search For Roots’ जरूर पढ़ियेगा। साथ ही ‘कुंटा किंते’ पर आधारित Roots Series नामक एक सीरीज जरूर देखें। आपको समझ आयेगा की किस तरह से अंग्रेज़ और अमेरिकन मूल के लोग अफ़्रीकन मुसलमानों को ग़ुलाम बनाया था और धीरे-धीरे अगला पुरा नस्ल अपने कल्चर को भूल गया था। ऐसे परिस्थितियों में जाकर तब्लीगियों ने अफ़्रीका के ब्लैक मुसलमानों के भीतर उनको इंसान होने का एहसास दिलाया है। उर्दू नामधारी लिबरल लोग उतना ही पढ़ें है जितना The Hindu और Ndtv ने लिख दिया है। हाँ, वही The Hindu, जो स्वयं को लिबरल तो कहते है मग़र नाम से ही हिन्दू संस्कृति का आभास होता है, ने संघियों से भी पहले कोरोना वायरस को कुर्ता-पजामा पहनाकर मुसलमान बना दिया था। हम जानते है कि हम अल्पसंख्यक है और हमको अपनी आइडेंटिटी बहुत प्यारी है। हम बैलेंस नहीं बना सकते है। हमनें भी देश की पॉलिटिकल हिस्ट्री पढ़ रखी है और हम जानते है कि किस तरह से छोटी गलतियों को भी बड़ा पेश करके मुस्लिम आइडेंटिटी के नाम पर हमको दबाया गया है। यह जानते हुए भी की मेलकॉम-एक्स की तरह हमें ख़त्म किया जा सकता है फ़िर भी हम आइडेंटिटी के नाम पर बैलेंस बनाकर नहीं लिख सकते है। क्योंकि इस देश मे भी लिबरल होने का एडवांटेज उन्हें ही मिलता है जो अपना नाम The Hindu रखता है।

    लेखक: Tarique Anwar Champarni, एक सामाजिक कार्यकर्ता और राजनीतिक विश्लेषक है ये लेखक के निजी और व्यक्तिगत विचार हैं.

  • क्या कोरोना का भी धर्म है?भारत के सभी नागरिकों को जानना चाहिये।

    शाह अज़मतुल्लाह अबुसईद

    इस समय में बहुत दुखी हूं। एक कोरोना के बढ़ते महामारी से तो दूसरी तरफ हमारे मुल्क की मीडिया नफ़रत वाली हरकत से। आज पूरे विश्व में इस कोरोना से निपटने के लिए लोग अपनी शक्ति लगा रहे हैं तो दूसरी तरफ हमारे देश की मीडिया शक्ति एक बार फिर आग में पेट्रोल डालने का कार्य कर ने मैं लगी है।
    यही कारण है कि बीते हुए कल देश के अधिकतर चैनलों में यह दिखाने की कोशिश हो रही थी कि कोरोना का बढ़ना मुसलमानों के कारण है।
    कियोंकि तब्लीगी जमात में देश विदेश के हजारों की संख्या में लोगों का जमा हो कर कोरोना को हौसला दिया है।
    यह स्पष्ट कर दूं कि अगर किसी को सीखना हो कि मुद्दा को कैसे डायवर्ड किया जाता है और लोगों के दिमाग़ को कैसे भटकाया जाता है तो वह देश के न्यूज चैनलों और मेन इस्ट्रीम मीडिया से सीखे।

    मित्रो बात यह कि तब्लीगी जमात का इंटरनेशनल हेडक्वार्टर हजरत निजामुद्दीन औलिया साहब की दरगाह से लगा हुआ है। वहां 10 हजार लोग सामान्य दिनों में प्रतिदिन आते जाते हैं ।इस मरकज से 40 मीटर दूर हजरत निजामुद्दीन पुलिस थाना है बल्कि ये कहना उचित होगा कि थाने का गेट और मरकज का गेट एक ही है। वहां पर पूरी दुनिया से लोग आते हैं और ज्यादा से ज्यादा कुछ घण्टे रुकने के बाद मरकज द्वारा निर्धारित जगह पर जमात के लिए निकल जाते हैं। जमात में निकले हुए लोग अधिकतम 40 दिन का ऐहराम(चिल्ला) करते हैं।इस बीच उनका घर वालों से कोई संपर्क नही होता और न ही बीच में वापसी होती है।मरकज द्वारा जो जगह निर्धारित की जाती है उस जगह पर अपने संसाधन से व्यक्ति या टोली जाती है वहां की मस्जिद में रहती है और गांव वाले जो दे उससे काम चलाते हैं और न मिले तो बाजार से खरीद कर खाते हैं।जो व्यक्ति विदेश से आए हैं उसका वापसी का टिकट पहले से फिक्स था लेकिन लॉकडाउन में न वह घर वापस जा सकते थे और न ही वह वहां से निकल सकते थे ऐसी स्थिति में मरकज में ही रुकना उनके लिए अनिवार्य हो गया। जो वर्तमान में टीवी चैनल का मुद्दा बन गया।

    यह भी जान लें कि मरकज में जो थाली सुबह एक बार लगती है तो वो वह लंगर समाप्त होने तक बिछी रहती है खाने वाले लोग बदलते रहते हैं। जगह की कमी के कारण इस 5 मंजिला इमारत में भीड़ जयादा होती है तो ज़ाहिर है कि कोरोना से यह ज़्यादा प्रभावित भी हुए होंगे इसी लिए कई लोग कोरोना पॉजिटिव पाए गए जब कि 3 की मौत की पुष्टि भी हो चुकी है। अब इस कारण इस महामारी को किसी विचारधारा पर प्रश्नचिन्ह लगाना उचित नही है। यह जमात लग भग 100 साल पहले बनी और वर्तानकालीन में कई इस्लामी मुल्कों के होते हुए भी अंतरराष्ट्रीय केंद्र हिंदुस्तान में ही स्थापित है।

    मुझे जहां जमाती संगठन के अमीर की गैर जिम्मेवारी और लापरवाही पर प्रश्न है कि वह इस मामले में इतने धीरज क्यों दिखाए वहीं केजरीवाल सरकार अधिक ज़िम्मेदार है जो दिल्ली फसाद के समय चुप्पी साधे हुए थे और बोले भी तो यह कि दिल्ली पुलिस मेरे हाथ में नहीं है में मजबूर वा लाचार हूं क्या करूं?
    वह वर्तमान में जमात के लोगों के पर्ती FIR दर्ज करवाने की बात करके एक बार फिर सियासी गेम खेलना चाह रहे हैं। जबकि इस सिलसिले में मरकज वालों का यह भी कहना है कि हमने सारी परमिशन पहले से ही ले रखा था।अंतिम में हम आप और केजरीवाल के सिलसिले में यही कहना चाहेंगे कि
    हम तो तेरे वायदे पर मुत्मइन थे
    लेकिन तेरी नीयत भी बदलती जा रही है
    मित्रों यह विवाद का विषय नहीं होना चाहिए बल्कि गंभीरता से सोचने का समय है। क्योंकि कोरोना वाइरस यह नहीं देखता कि सामने वाला वेक्ती मुसलमान है या हिन्दू है। यह आपको और हमको सोचना है कि हम कहां जा रहे हैं और क्या नकार रहे हैं।

    एक बात और आपको बता चाहता हुँ के ये ऐसा संगठन है के कभी न कोई फंड/योगदान किसी से लेती है ना कभी किसी पार्टी का समर्थन या विरोध करती है और ना कभी मीडिया मैं प्रेस जारी करती है
    अब बात करते हैं केंद सरकार की विदेशों से आने वाले सभी लोगों का सरकार को डेटा रहता है कौन वयक्ति देश कब आया और क्यों आया और कहाँ रुकेगा और और कब तक वापस जाएगा फिर लॉकडाउन करने से पहले ऐसे लोगों को सूचना क्यों नही दी गई आप सभी लोग वापस जाएं या उनके रहने की व्यवस्था क्यों नही गई।
    हम सभी नागरिकों को अभी क्रोना से जंग लड़नी है मीडिया की नफ़रत से बचना है।
    सरकार, प्रसाशन एवं पड़ोसियों का साथ दें।

  • विश्व की हालत अच्छी नही हिन्दू मुस्लिम न करे मीडिया : शाह अज़मतुल्लाह अबुसईद

    सभी डॉक्टर्स की टीमों,पुलिस कर्मियों, ईमानदार मीडिया कर्मियों एवं सामाजिक कार्यकर्ताओं को जो रात दिन अपनी ज़िंदगी की परवाह किये बिना देश की सेवा कर रहे हैं उन्हें मेरा सलाम

    देश के सभी धार्मिक संगठन, सामाजिक संगठन एवं राजनीतिक संगठन के कार्यकर्म मैं भाग लेने वाले सभी कार्यकर्ता से मेरा विनती है कि 10 मार्च के बाद जो लोग भी बड़े कार्यकर्म मैं भाग लेने के बाद लौटे या कहीं फसे हों इसकी जानकारी प्रशासन को दें। प्रशासन और स्वास्थ्यकर्मियों का सहयोग करें।

    अपनी ट्रेवल हिस्ट्री बतानी चाहिए।
    quarantine में आसानी होगी। इस बीमारी को आगे बढ़ने से रोकने की दिशा में ये सहायक क़दम होगा। इन सब लोगों को जल्द से जल्द सामने आकर लोगों को और देश को बचाना चाहिए।

    हम सभी हिन्दुस्तानी ने ठाना है
    क्रोना को हराना है।

  • कोरोना के नाम मुस्लिमों के खिलाफ नफ़रत फैलाना बन्द करो:आइसा

    *गंभीर स्वास्थ्य आपदा के दौरान साम्प्रदायिक नफ़रत फैलाने में लगे हुए संघी दुष्प्रचार तंत्र और गोदी मीडिया शर्म करो।*

    जब सरकार कोविड 19 महामारी से निपटने के हर पहलू में विफल हो रही है तो अब निजामुद्दीन में एक सामूहिक सभा को इस्लामोफोबिक सुर्खियों के साथ फैलाया जा रहा है। मार्च महीने के मध्‍य में तबलीगी जमात के दिल्‍ली में हुए एक अंतर्राष्‍ट्रीय समारोह के बाद वहां फँसे लोगों का अपराधीकरण एवं साम्‍प्रदायिकीकरण करने की हो रही कोशिशें बेहद निन्‍दनीय कृत्‍य है जिसकी भर्त्‍सना होनी चाहिए.

    दिल्‍ली सरकार ने भी तबलीगी जमात के उक्‍त आयोजन, जो पूरी तरह से कानून के दायरे में हुआ था, के खिलाफ एक आपराधिक मुकदमा दर्ज कराया है. यह आयोजन दिल्‍ली पुलिस (जो केन्‍द्रीय गृह मंत्रालय के अधीन है) और दिल्‍ली सरकार के तहत आने वाले सम्‍बंधित एसडीएम कार्यालय की अनुमति और सहयोग से किया गया था. यदि यह गैरकानूनी था तो दिल्‍ली सरकार ने उसी समय आदेश जारी कर इसे रोका क्‍यों नहीं? संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई क्यों नहीं ? जमात के अधिकारियों ने पहले ही पुलिस को उस स्थान पर फँसे हुए लोगों की स्थिति के बारे में सूचना दे दी थी तथा इस आधार पर अटके लोगों को जगह खाली करने के लिए वाहन पास मुहैया कराने के लिए त्वरित कार्रवाई करने का आग्रह भी किया गया था। अधिकारियों द्वारा अनुपालन का आश्वासन भी दिया गया था।

    *जमात के खिलाफ आपराधिक मामला, और साथ साथ टीवी चैनलों व सोशल मीडिया में चलाये जा रहे जहरीले और अमानवीय दुष्‍प्रचार से यह खतरा भी है कि उक्‍त आयोजन में हिस्‍सा लेने और वायरस से संक्रमण की संभावना वाले लोग डर के मारे अपना टेस्‍ट एवं इलाज कराने के लिए आगे आने में हिचकिचायेंगे.*

    सच तो यह है कि इसी दौरान बहुत से बड़े बड़े धार्मिक और राजनीतिक आयोजन किये गये और भारत चूंकि कोविड-19 की टेस्टिंग लगभग नहीं हो रही, इसलिए यह जानना मुश्किल है कि इन आयोजनों/समारोहों में और कितने लोग संक्रमित हुए होंगे. इस दौरान शिरडी के साईबाबा मन्दिर में समारोह हुआ, एक अन्‍य आयोजन सिख समुदाय द्वारा किया गया, और हाल ही में वैष्‍णोदेवी गये तीर्थयात्रियों के बारे में पता चला जो लॉकडाउन के कारण लौट नहीं पा रहे (इससे दूरस्‍थ पर्वतीय समुदाय में भी संक्रमण का खतरा बन सकता है). हम सभी ने देखा कि किस तरह से योगी आदित्यनाथ ने बड़ी संख्या में लोगों के साथ अयोध्या में मूर्तियों को रखने की घोषणा करने के बाद लॉकडाउन का उल्लंघन किया।

    इन सभी आयोजनों व समारोहों और तबलीगी जमात के आयोजन को, किसी भी तरह से आपराधिक कृत्‍य नहीं माना जा सकता. और न ही इनको साम्‍प्रदायिकता के चश्‍मे से देखना चाहिए. जिम्‍मेदार तो केन्‍द्र की सरकार है जो ढुलमुल रवैया अपनाती रही और स्‍पष्‍ट दिशा-निर्देश जारी नहीं किये, अत: इन आयोजनों के बारे में निर्णय करने का काम आयोजक संगठनों या व्‍यक्तियों के विवेक पर चला गया.

    ऐसे समय में जब कई श्रमिक वर्ग के लोग विभिन्न स्थानों पर फंसे हुए हैं, सरकार को चाहिए कि वह नफरत, गुस्सा और संदेह को बढ़ावा देने के बजाय सभी लोगों को स्वास्थ्य सेवा प्रदान करने के लिए काम करे, जरूरतमंद लोगों के लिए कोरोना रिलीफ फ़ंड का इस्तेमाल किया जाये।

    *सभी को स्वास्थ्य-सुरक्षा व सुविधाएं सुनिश्चित करें!*
    *सांप्रदायिक नफरत फैलाना बंद करो! “*
    (आइसा)

  • हां तबलीगी जमात से मौलाना साद के आचरण के कारण वैचारिक मतभेद है और बने रहेंगे,लेकिन आभी हम उनके साथ है:डॉ अब्दुल्लाह मदनी

    (डॉ। अब्दुल्ला मदनी)
    हां, तबलीगी जमात के साथ मेरे कुछ वैचारिक मतभेद हैं और मौलाना साद साहब के आचरण के कारण बने रहेंगे, लेकिन अब मैं कुछ वैचारिक मतभेदों के बावजूद उनके साथ हूं और इस देश के सभी संगठन अपने मतभेदों से ऊपर उठते हैं। उसे साथ आना चाहिए अन्यथा वह आज निशाने पर है। कोई और भी ऐसा ही करेगा। जिस तरह से पूरे संघ और दंगा मीडिया ने कोरोना वायरस के संदर्भ में सरकार की जगह निजामुद्दीन को केंद्र में लाने में सरकार की विफलता पर बहस की है वह एक बहुत ही दुखद और घृणित प्रक्रिया है। वह हिंदुओं, मुसलमानों के बीच इस घातक बीमारी को फैलाने और सरकार के नफरत के एजेंडे को फैलाने में भी शामिल है। मीडिया को अब सरकार से पूछना चाहिए था कि

    1. अब तक कितने अस्पतालों और परीक्षण प्रयोगशालाओं का प्रबंधन किया गया है?
    2. डॉक्टर को दी गई सभी सुविधाएं या नहीं?
    3. अब तक कितने वेंटिलेटर प्रबंधित किए गए हैं? 4. गरीब लोग हैं, किसान हैं, मजदूर हैं, फंसे हैं, खाना मिल रहा है या नहीं?
    5. उनके पास रहने की सही व्यवस्था है या नहीं?
    6. सरकार द्वारा प्रतिदिन कितने लोगों का परीक्षण किया जा रहा है?
    7. घर के राशन और पैसे देने के लोगों के वादे पर सरकार द्वारा कितना काम किया जा रहा है?
    8. मन्त्री मन्त्री राहत कोष और पीएम केयर में अब तक जुटाए गए धन का क्या हो रहा है?
    9. इन सवालों के अलावा, जो लोग तब्लीगी समूह में आए हैं, उनसे यह भी पूछा जाना चाहिए कि जब बाहरी पार्टी के अवसर पर आते हैं, तो उन्हें हवाई अड्डे पर दिखाया गया था?

    10. कोरोना वायरस से प्रभावित देशों के लोगों का परीक्षण किया गया है या नहीं? यदि हां, तो क्या वे सकारात्मक या नकारात्मक पाए गए थे? यदि सकारात्मक है, तो उनका इलाज किया जाता है या नहीं? 11. यदि निगेटिव पाए गए, तो अब उनकी क्या स्थिति है?
    जब निजामुद्दीन ने समय पर पुलिस को सूचित किया, तो उन्हें क्यों नहीं निकाला गया और उन्हें सही जगह पर ले जाया गया, और उन्हें देरी क्यों हुई?
    12. उन नेताओं के खिलाफ क्या कार्रवाई की गई है जिनके लॉकडाउन का अब तक उल्लंघन किया गया है? (जैसे योगी आदित्य आदि)
    13. क्या Ayodhya में सभी लोग testing की, और यदि नहीं, तो क्यों नहीं?
    14. सरकार ने हजारों की तादाद में सड़क पर निकले गरीबों और मजदूरों के लिए एक परीक्षण प्रयोगशाला का आयोजन किया है?
    15. सरकार ने अब तक हज़ारों लोगों के खिलाफ कार्रवाई क्यों नहीं की है, जिन्होंने प्लेट पर बाहर आकर ताली बजाई ?
    16. बिना किसी तैयारी के तालाबंदी क्यों की गई और अगर ऐसा करने के लिए मजबूर किया गया, तो आम जनता के लिए व्यवस्था क्यों नहीं की गई?
      इन सवालों पर मीडिया चुप क्यों है? क्या

    देश में एक हिंदू मुस्लिम इस घातक बीमारी को दूर कर सकता है? हमें मीडिया के खिलाफ आवाज उठाने और उनके नफरत के एजेंडे के प्रसार के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करने की जरूरत है। हम देश के सभी वकीलों और सामाजिक संगठनों से अपील करते हैं कि वे मीडिया का सहारा लें और कानून का सहारा लेते हुए उनके खिलाफ सख्त कार्रवाई करें और उन्हें ऐसा करने से रोकें, वरना एक समय ऐसा आएगा। कोई भी सरकार द्वारा गरीब लोगों की जरूरतों और उत्पीड़न के खिलाफ हमारी आवाज नहीं उठाएगा। सरकारी उत्पीड़न करने वाले न केवल गरीब लोग हैं, बल्कि वकील, डॉक्टर, सामाजिक कार्यकर्ता, व्यापारी और व्यापारी, शिक्षक, सिर्फ इसलिए कि किसी भी समुदाय के लोग हो सकते हैं और शौकीन हैं, उन्हें सभी को सच्चे मीडिया की आवश्यकता है। हमेशा रहेगा, इसलिए हमें मीडिया पर लगाम लगाने के लिए कानूनी कार्रवाई करने की सख्त जरूरत है।