Category: लेख, विचार

  • इस्लामिक स्टेटऑफ़ इराक एंड सीरिया – एक थ्रेट” विषय पर वेबिनार आयोजित

    तरन्नुम अतहर
    नोएडा – इस्लामिक स्टेटऑफ़ इराक एंड सीरिया – एक थ्रेट” विषय पर वेबिनार सीरीज का आयोजन नोएडा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी के स्कूल ऑफ़ लॉ एंड लीगलअफेयर्स ने किया। इस वेबिनार सीरीज की अतिथि वक्ता पूर्व राजनयिक सुषमा गांगुली थॉमस ने आधुनिक आतंकवाद विशेषकर “इस्लामिक स्टेट ऑफ़ इराक एंड सीरिया” से सम्बंधित संगठन की गतिविधियों एवं उनके क्रिया कलापों के विषय में विस्तार से प्रकाश डाला। वेबिनार के प्रारम्भ में सर्वप्रथम कुलपति प्रोफसर डॉक्टर जयानंद ने अतिथि वक्ता पूर्व राजनयिक सुषमा गांगुली थॉमस का स्वागत किया। वेबिनार का आरंभ बैद्यनाथ मुखर्जी द्वारा एक स्वागत नोट के साथ किया गया, तदुपरांत अतिथि वक्ता पूर्व राजनयिक सुषमा गांगुली थॉमस ने “इस्लामिक स्टेटऑफ़ इराक एंड सीरिया – एक थ्रेट”विषय पर विद्यार्थियों को संबोधित किया I

    उन्होंने बताया कि सीरिया और इराक में सक्रिय आतंकवादी संगठन आई.एस.आई.एस (ISIS) पूरी दुनिया के लिए बड़े खतरे के रूप में उभरा है। इसके खौफनाक इरादों पर यदि समय रहते दुनिया नहीं चेती तो इंसानियत के दुश्मन इस संगठन की ताकत और बढ़ जाएगी। दुर्भाग्य से इसके खिलाफ लड़ाई को लेकर अमेरिका और रूस में मतभेद हैं। आई.एस.आई.एस एक शक्तिशाली आतंकवादी समूह है जिसने मध्य पूर्व के बड़े क्षेत्रों पर नियंत्रण हासिल कर लिया है। नागरिकों पर क्रूर हिंसाऔर जानलेवा हमले के लिए बदनाम इस स्व-वर्णित ख़लीफ़ा ने अनमोल स्मारकों, प्राचीन मंदिरोंऔर अन्य इमारतों को नष्ट करने और प्राचीन स्मारकों को नष्ट करने के अलावा, दुनिया भर में सैकड़ों आतंकवादी हमलों की जिम्मेदारी ली है।

    उन्होंने आगे कहा कि इस्लामिक स्टेट इन इराक एंड सीरिया को इस्लामिक स्टेट इन इराक एंड दी लीवेंट भी कहते हैं। यह एक जिहादी संगठन है, जो कि इराक और सीरिया में इस्लाम के नाम पर हिंसा फैलाता है। आई.एस.आई.एस. को दुनिया भर में हिंसा की जघन्य वारदातों को अंजाम देने के लिए पहचाना जाता है, जिसमें सार्वजनिक फांसी, बलात्कार, हत्या और सूली पर चढ़ना शामिल है। समूह ने क्रूर हत्याओं की वीडियो टैपिंग और उन्हें ऑनला इन प्रदर्शित करने की नापाक प्रतिष्ठा अर्जित की है।

    अपने व्याख्यान में उन्होंने आगे कहा कि आई.एस.आई.एस. को दुनिया का सबसे अमीर आतंकवादी संगठन कहा गया है। जब कि अनुमानों में भिन्नता है, इस समूह को केवल 2014 में $ 2 बिलियन का बताया गया था। ISIS का ज्यादातर पैसा बैंकों, तेल रिफाइनरियों और अन्य क्षेत्रों में मौजूद संपत्ति पर नियंत्रण रखने से आया है।
    इस समूह ने अपहरणकर्ताओं, करों, जबरन वसूली, चोरी की कलाकृतियों, दान, लूटपाट और विदेशी लड़ाकों से इस के खजाने को भरने के लिए अपहरण का भी इस्तेमाल किया है। आतंकवाद हिंसा का एक गैर-कानूनी तरीका है जो लोगों को डराने के लिये आतंकवादियों द्वारा प्रयोग किया जाता है। आज, आतंकवाद एक सामाजिक मुद्दा बन चुका है। इसका इस्तेमाल आम लोगों और सरकार को डराने-धमकाने के लिये हो रहा है।

    भारत ढ़ेर सारी चुनौतियों का सामना कर रहा है जैसे गरीबी, जनसंख्या वृद्धि, निरक्षरता, असमानता आदि बहुत कुछ, फिर भी आतंकवाद इन सबसे ज्यादा खतरनाक है जो पूरी मानवजाति को प्रभावित कर रहा है। ये बहुत ही डरावनी बीमारी है जो लोगों को मानसिक और बौद्धिक स्तर पर प्रभावित कर रही है। चाहे ये छोटे देशों में होता हो (आयरलैंड, इज़रायल आदि) या बड़े देशों (यूएसए, रुस, भारत आदि) में; ये दोनों ही जगह चुनौती के रुप में है। अपने कुछ राजनीतिक, धार्मिक या व्यक्तिगत लक्ष्य की प्राप्ति के लिये आतंकवादी समूह हिंसात्मक तरीकों का प्रयोग कर के आतंकवाद को हथियार के तौर पर इस्तेमाल कर रहा है।

    उन्होंने आगे कहा कि आतंकवाद का कोई नियम कानून नहीं होता वो केवल अपनी माँगों को पूरा करने के लिये सरकार के ऊपर दबाव बनाने के साथ ही आतंक को हर जगह फैलाने के लिये निर्दोष लोगों के समूह या समाज पर हमला करते हैं। उनकी माँगे बेहद खास होती हो,जो वो चाहते हैं केवल उसी को पूरा कराना चाहते हैं। यह मानव जाति के लिये एक बड़ा खतरा है।वो कभी-भीअपने दोस्त, परिवार, बच्चे, महिलाएं बूढ़े लोगों के लिये समझौता नहीं करते हैं। वो केवल लोगों की भीड़ पर बम गिराना चाहते हैं। वो लोगों पर गोलियाँ चलाते हैं, विमानों का अपहरण करते हैं और दूसरी आतंकी गतिविधियों को अंजाम देते हैं।

    भारत मे लोकतंत्र और धर्मनिरपेक्षता की मजबूत जड़ें हैं और यह आई.एस.आई.एस. एजेंडा के लिए परेशानी पैदा करता है। लेकिन जैसा कि आई.एस.आई.एस. के तौर-तरीकों से ऊपर सुझाया गया है, स्थानीय आतंकवादियों के समूहों के साथ कट्टरता और विलय के विभिन्न आकार में आ सकता है। इसलिए, भारत को घर में पैदा हुए आतंकवाद और कट्टरता को जड़ से उखाड़ने के लिए सावधानी बरतने की जरूरत है। आतंकवाद का कोई नियम कानून नहीं होता वो केवल अपनी माँगों को पूरा करने के लिये सरकार के ऊपर दबाव बनाने के साथ ही आतंक को हर जगह फैलाने के लिये निर्दोष लोगों के समूह या समाज पर हमला करते हैं।

    कार्यक्रम के अंत में वेबिनार के संयोजक डॉ. परंतप दास, एचओडी, स्कूल ऑफ लॉ एंड लीगल अफेयर्स, नोएडा इंटरनेशनल यूनिवर्सिटी एवं बैद्यनाथ मुखर्जी सहित मिस सौमि चटर्जी – असिस्टेंट प्रोफेसर – स्कूल ऑफ लॉ एंड लीगल अफेयर्स, एन.आई.यू सहित अनेक वक्ताओं ने विचार रखे ।

  • पर्यावरण की सुरक्षा के लिए बना औषधीय पौधों का एक अनोखा बागवान

    [शौकत_नोमान,सीतामढ़ी] प्रतिदिन वृक्षों कि अवैध तरीकों से कटाई होने से हमारा जंगल सिमटता जा रहा है। पर्यावरण की सुरक्षा से ही हमारी जीवन की रक्षा संभव है, अगर हम अभी नहीं चेते पर्यावरण का संतुलन बिगड़ जाएगा। जिससे पृथ्वी पर जीवन यापन दुश्वारियां भरा हो जाएगा।
    आज हम बात करेंगे ऐसे ही पर्यावरण मित्र मो. जावेद की जिन्होंने कई सालो से पर्यावरण की सेहत बचने का संकल्प लिया साथ ही अपने मित्रो व रिश्तेदारों को भी प्रेरित करते है।

    सीतामढ़ी शहर राजोपट्टी, अंसारी रोड के निवासी पेशे से आयुर्वेद अस्पताल में फार्मासिस्ट है। उनके पिता नुरुल हसन भी औषधीय पौधों की खेती करते थे। जावेद अपने 3 कट्टे जमीन के एक कट्टा मे मकान एंव मकान के बाहरी हिस्से 2 कट्टे मे फलदार व औषधीय पौधे उगाकर उसे हरा भरा बना दिया दिया, जिसमे सजावटी, फलदार, सब्जी, औषधीय समेत कई प्रकार के पौधे है। जैसे:-बागवानी में सफेद तुलसी, स्याह तुलसी, रुद्राक्ष, प्रह्लाद, बड़ी व छोटी इलायची, दालचीनी, तेजपत्ता, आलू बुखारा, व्हाइट जामुन, चेरी, सेब, नाशपाती, मैंगो स्टार, पपीता, आम, केला, अमरूद, हरफरौली, खीरा, मौसमी, ऑल स्पाइस, जायफल, अंजीर, हींग, कागजी बेल, जैतून, बेदाना, कैराना, बालम खीरा, साइकस, चाइनीज बैंबू और भंगरिया जैसे औषधीय पौधे हैं।

    शुगर फ्री केला और सेंदुर का पेड़ देखने आते है लोग

    यहां केले की अलग-अलग प्रजातियां आकर्षण का केंद्र हैं। यहां शुगर फ्री केला है। छोटे आकार वाले इस केले की कलम हैदराबाद से मंगवाई है। केले की एक और प्रजाति है, जिसमें ऊपर की ओर फल निकलता है। इसी बाग में फूल झाडू़ का पेड़ है। खीरे का पेड़ भी आकर्षण है। इतना ही नहीं कर्पूर और सिंदूर का पेड़ भी लोग देखने आते हैं।

    जावेद ऐसे करते है पेड़ो का देखभाल

    वो प्रतिदिन करीब 3 से 4 घंटे पौधे की देखरेख करते है, सुबह दफ्तर जाने से पहले शाम को आने के बाद रोजाना अलग-अलग पौधों को हिफ़ाज़त करते है। पौधों में नियमित रूप से पानी देना,कटाई-छटाई करना, छोटे-बड़े पौधों को उनके साइज अनुसार आकार देना, इसका पूरा ध्यान रखते है। जावेद बताते हैं, जब भी किसी औषधीय पौधों की जानकारी मिलती, जाकर लाते हैं। जिसमे उनके परिवार के सदस्य भी खास रुचि रखते है! सामाजिक कार्यकर्ता कमर अख़्तर कहते है उनका आवास एक बागवान है जिसमें औषधीय पौधे व फलदार पेड़-पौधे पर्यावरण की रक्षा का संदेश दे रहा है, इन पेड़ों के फल भी काफी मजेदार है।
    वहीं आसपास के लोग भी इस गार्डन का खूब तारीफ करते है।

  • लोगों की लाशों पर राजनीति करना बंद करे नेता

    लेखिका :सुमरा परवेज़

    भूखी प्यासी बच्ची के मरने का इंतजार करता एक गिद्ध और दूसरा वो शख़्स जिसने उस मौके को भुनाने की कोशिश की।
    जी हां मैं बात कर रही हूं #केविन_कार्टर की, जिन्हें 1993 में #पुलित्ज़र_अवार्ड से नवाज़ा गया था।केविन कार्टर सूडान के एक मशहूर फोटोग्राफर थे।एक बार उन्होंने देखा कि एक गिद्ध एक भूख से बेहाल बच्ची के पास बैठा है, शायद उसके मरने का इंतजार कर रहा था।फोटोग्राफर की आंखों को वो मंज़र इतना भाया कि उन्होंने उसे अपने कैमरे में क़ैद कर लिया, जिसके लिए उन्हें सबसे प्रतिष्ठित अवार्ड से नवाज़ा गया।

    लगभग 4 महीने बाद उनके पास एक फोन आया जिसमें एक अज्ञात शख्स ने उनसे पूछा कि उस बच्ची का क्या हुआ ? उन्होंने जवाब दिया कि मुझे नहीं पता मैं फोटो खींचने के बाद वहां से चला गया था।अनजान शख्स ने कहा आपको पता है उस वक्त वहां एक नहीं दो गिद्ध थे।एक जो उसके मरने का इंतजार कर रहा था और दूसरा जिसने उस बच्ची की भूख को अपने फायदे के लिए भुनाया।
    इस बात का कार्टर पर बहुत गहरा असर हुआ और उन्होंने 33 साल की उम्र में ही आत्महत्या कर ली।

    The vulture and the little girl

     

    यह कहानी नहीं बल्कि असल जिंदगी थी केविन कार्टर की।उनसे जो एक गलती हुई थी उसके एहसास ने उनकी जान ले ली।
    शायद उनका ज़मीर मरा नहीं था।

    क्या आज यही हाल सत्ता में बैठे हुए लोगों का नहीं है? क्या आज सत्ता में बैठे हुए लोग उस गिद्ध की तरह नहीं है, जो बैठकर ग़रीब मज़दूरों के मरने का इंतज़ार कर रहे हैं ताकि अपनी गंदी राजनीति के लिए उनको इस्तेमाल कर सकें।

    क्या आज राजनीतिक दल इन अवसरों को भुनाने की कोशिश नहीं करते ? आज भारत पर खतरे के बादल मंडरा रहे हैं लेकिन राजनेता सिर्फ अपनी राजनीति चमकाने में लगे हैं।आज हमारे देश पर एक नहीं बल्कि सैकड़ों गिद्धों का साया है। जो आपके ऊपर निगाहें गड़ा कर बैठे हैं कि कब आप मरें और कब वो आपकी बूटियां नोच खाये ।

    ज़रा सोचिए कि आप ने किन लोगों को गद्दी पर बैठा रखा है। अगर इस परिस्थिति में भी वो आपके साथ नहीं हैं तो फिर कब होंगे? काश इन राजनेताओं और सत्ताधारियों का ज़मीर भी जाग जाए।आज देश को इनकी ज़रूरत है, राजनीति करने के लिए पूरी ज़िंदगी पड़ी है।
    कम से कम आज लोगों की लाशों पर राजनीति करना बंद करें नहीं तो खुद से कभी निगाहें नहीं मिला पाएंगे।

    (ये उनके अपने विचार हैं )

  • इस लॉकडाउन में कैसे मनाएं ईद उल-फितर,क्या है इस पर्व का महत्व:शौकत नोमान

    रमजान के 30 रोजों के बाद चांद का दीदार कर ईद मनाई जाती है। पवित्र कुरान के अनुसार, रजमान के महीने में रोजे रखने के बाद अल्लाह अपने बंदों को बख्शीश और इनाम देता है। बख्शीश और इनाम के इस दिन को ईद-उल-फ़ित्र कहा जाता है। इस दिन लोग गरीबों और जरूरतमंदों की मदद करने के लिए एक खास रकम निकालते हैं, जिसे जकात कहते हैं।

    रमज़ान-उल-मुबारक माह के बाद ईद उल-फ़ित्र के इस मुबारक दिन के सुबह मुस्लिम समुदाय के लोग ईदगाह में जमा होकर ईद की नमाज अदा करते है! लेकिन इस बार कोरोना वायरस और लॉकडाउन् के मद्देनजर लोगो को ईद की नमाज़ अपने घरों में ही अदा करनी होगी! इस लॉकडाउन् के कारण कहीं भी इकठ्ठा होने पर मनाही है। इस साल चांद के दीदार के बाद ईद उल-फ़ित्र 25 मई को अपने घरों मनाई जाएगी! इस्लाम धर्म का यह त्यौहार भाईचारे का संदेश देता है। ईद कोई हल्ला मचाने या बाइक राइडिंग का त्योहार नहीं, यह आपसी रंजिशो को मिटा कर एक दूसरे के साथ खुशियां बाटने का त्यौहार है। लेकिन इस बार कोरोना संकट के कारण सोशल डिस्टेंसिग का पूरा ध्यान रखा जाएगा, ईद की खुशी यही होगी के हम इस ईद गले ना मिले और हाथ ना मिलाए। जैसा कि आप जानते है कि ये रमज़ान का पाक महीना अपने अंतिम चरणो में है।

    रमज़ान का पाक महीना,चांद का दीदार, अल्लाह से पूरी दुनिया के अमनो-व-शुकून कि दुआए करना, वो हर पुराने गीले सिकवे को भुला कर मुहब्बत के साथ अपने इसी वतन के मिट्टी में ज़िन्दगी बसर करेंगे। बताते चले, इस बार की ईद में थोड़ी दूरियां होंगी, जहां भाव तो वहीं होगा पर दूरियां जरूर होंगी। हमे इस बीमारी के संक्रमण से बचने के लिए इस लॉकडाउन् के नियमो का पालन करना होगा। इस बार भले ही हम घरों से बाहर नहीं निकल सकते और दोस्तो और रिश्तेदारों से नहीं मिल सकते। लेकिन परिवार के साथ घर पर रहकर ईद मनाने का आइडिया भी बुरा नहीं। आप अपने परिवार के साथ मिलकर सिवाईया के इलावा एक नए डिस का आगाज कर सकते है और साथ ही उस डीस रेसिपी(recipe) का वीडियो क्लिप बनाए और अपने दोस्तो और रिश्तेदारों में सेंड कर उन्हें भी प्रोत्साहित कीजिए के वो भी एक नए डीस का आगाज करे। इस बार ईदी पर सबसे ज्यादा संकट मंडरा रहा है, तो कोई बात नहीं, ई-ड्रांसफर तो जानते ही है। बच्चो को ई-ड्रांसफर के माध्यम से ईदी भेजे। जब बच्चो को ई-ट्रांजैक्शंस के जरिए सरप्राइज ईदी मिलेगी तो यकीन मानिए, उसकी खुशी दोगुनी हो जाएगी।
    आखिर में,

    ईद की नमाज़ पढने से पहले फितरा अदा करना होता हैं। फितरा हर मुसलमान पर वाजिब है। अल्लाह ने हम सभी को एक ऐसी जिंदगी दी है, जहां हम लोगों की दुःख-दर्द को कम करने की पूरी कोशिश ताउम्र करते रहें। इसलिए अल्लाह की इबादत करते हुए इबादत करते हैं। इस आने वाली ईद में अल्लाह का रहमो करम कयामत तक बना रहे, ऐसी ख्वाहिश करते हुए शुरिया अदा करें।

  • इस लोक डाउन में कैसे पढे़ं ईद की नमाज़

    ख़ुर्रम मलिक

    कोरोना वायरस की वजह से आज पुरा विश्व एक अजीब सी परिस्थिति से गुज़र रहा है. और इस का असर हर ओर देखा जा सकता है. इस महामारी की वजह से जहाँ स्कूल कॉलेज, बाज़ार बंद हैं वहीं दूसरी ओर मस्जिद मंदिर गिर्जा गुरुद्वारा बंद पड़े हैं. और ऐसे में मुसलमानों का पवित्र महीना रमज़ान भी आया जिस में मुसलमानों ने पुरी तरह सरकार और प्रशासन का सहयोग करते हुए अपने अपने घरों में ही नमाज़ ए तरावीह पढी़ ,और फिर देखते ही देखते यह पवित्र महीना भी गुज़रने को है. और उम्मीद की जा रही है के 25 मई सोमवार को मुसलमानों का पवित्र त्यौहार ईद उल फ़ितर मनाया जाएगा. जैसा के हम सब जानते हैं कि यह पवित्र त्यौहार रमज़ान में किये गए इबादतों का बदला है जिसे अल्लाह ने खुश हो कर मुसलमानों को दिया है.

    और जिस की नमाज़ ईद गाह में होती है. लेकिन इस साल कोरोना वायरस की वजह से ईद की नमाज़ घरों में ही पढ़नी है. हम यहाँ आप को यह बताना चाहते हैं कि कैसे ईद की नमाज़ पढ़ने का तरीक़ा है. सब से पहले तो हमें किसी भी नमाज़ की नियत करनी होती है. वैसे नियत दिल से होनी चाहिए. अगर ज़ुबान से बोल दिया तो और भी अच्छा है.

    नियत इस तरह करना है.

    नियत करता हूँ मैं नमाज़ ईद उल फ़ितर की वाजिब. छे ज़ाएद तकबीरों के साथ, वास्ते अल्लाह त’आला के. रुख़ मेरा काबा शरीफ़ की तरफ़.
    नियत के बाद तक्बीर ए तहरीमा (हाथों को कंधे तक उठाना है और फिर पेट पर बांध लेना) के बाद सना पढ़ना है उस के बाद दो और तक्बीर कही जाएगी. पहली तक्बीर के बाद हाथों को कंधे तक ले कर जा कर छोड़ देना है, फिर दूसरी बार भी ऐसा ही करना है. तीसरी तक्बीर के बाद हाथों को बांध लेना है और सुरह फ़ातिहा और उस के बाद कोई भी सुरह पढ़ना है. उस के बाद रुकु में जाना है फिर सज्दे में और इस तरह एक रकत पूरी करनी है.

    दूसरी रकत के लिये खड़े होंगे तो सब से पहले सुरह फ़ातिहा और फिर कोई सुरह मिलाएंगे और उस के बाद रुकु में जाने से पहले पहले तीन ज़ाएद तक्बीरें (अल्लाह हु अकबर) कहते हुए हाथ छोड़ देंगे और और चौथी तक्बीर कह कर रुकु में जाएंगे और सजदा के साथ सलाम फेर कर नमाज़ मुकम्मल करेंगे. नमाज़ के बाद जो सब से अहम है वह है ईद का खु़त्बा. नमाज़ के बाद जो सब से अहम है वह है ईद का खु़त्बा। यह दो है.
    ईद उल फ़ितर का खु़त्बा यह है.

    खु़त्बा सुनना वाजिब है.

    पहला खु़त्बा –
    अल्लाह हु अकबर ,अल्लाह हु अकबर, अल्लाह हु अकबर, अल्लाह हु अकबर, अल्लाह हु अकबर, अल्लाह हु अकबर, अल्लाह हु अकबर, अल्लाह हु अकबर, अल्लाह हु अकबर,

    अल्हम्दु लिल्लाही रब्बिल आ लमीन वस सलातु अला सय्येदेना मुहम्मदिन खा़तिमिन नबीय्यीन. व’अला आ’लिही व’अस’हाबिही अज्म’ईन,अम्मा बा’द, फ़क़द क़ालल्लाहु त’आला ,क़द अफ़्लहा मन त’ज़क्का, व’ज़करस्मा रब्बिही फ़सल्ला, बल तु’सिरुनल हयातअद दुनिया, वल’आखि़रतु खै़रु व’अब्क़ा, इनना हाज़ा लफ़िस सुहुफ़िल ऊला, सुहुफ़ी इब्राहीमा वमुसा, वक़ाला रसुलुल्लाह सo अo वo इनना लिकुल्ली क़ौमिन ईदन वहाज़ा ईदुना, बा’रकल्लाहु लना वलकुम फ़िल्क़ुराआन इल अज़ीम, वनफ़ाना व’इय्याकुम बिहदी सय्येदिल मुरसलीन

    दूसरा खु़त्बा-
    अल्लाह हु अकबर ,अल्लाह हु अकबर, अल्लाह हु अकबर, अल्लाह हु अकबर, अल्लाह हु अकबर, अल्लाह हु अकबर, अल्लाह हु अकबर,
    अल्हम्दु लिल्लाही नहमदुहू व’नस्तईनुहु व’नस्तग्फ़िरुहु ,वनु मिनु बिही, व’नतवक्कलु अलैही ,व’न’ऊज़ु बिल्लाही मिन शुरुरी अन्फ़ुसिना व’मिन सैय्येआती आमालिना ,वनश्हदु अल्लाह ही लाहा इल’ल्लाहु ,व’नश’हदु अन्ना मुहम्मदन रसुलुल्लाह, व’अला आलिही व’सहबिही ,व’बारका व’सल्लम, अम्मा बाद, क़ाला रसूलुल्लाह सल्लल्लाहु अलैही वसल्लम, ज़कातुल फ़ितरी तुहरत उन लिस’साइमी मिनल लग़वी वर’रफ़सी व’तोमत उन लिल मसाकीनी औ कमा क़ाला अलैहिस सलामो, व’क़ाला त’आ’ला ,इननललाहा या’मुरु बिल अदली वल इहसानी व’ईता’ई ज़िल क़ुरबा व’यन्हा अन’इल फ़हशाई वल’मुन्करि वल’बग्यि़ , य’ईज़ुकुम ल’अल्लकुम तज़्कुरून, वलज़िक्रुल्लाही अकबर.

    यह है दोनों खु़त्बा जिसे लोक डाउन की वजह कर छोटा किया गया है. जिस से के कोई भी अरबी ज़ुबान का जानकार इसे पढ़ सकता है.

    इस लिए आप सभी मुसलमान भाई से यह गुज़ारिश है के ईद उल फ़ितर की नमाज़ घरों में पढे़ं ,अगर किसी को नमाज़ पढ़ना नहीं आये तो वह चाश्त की नमाज़ पढ़ ले.

    ख़ुर्रम मलिक इस्लामिक स्कॉलर और स्वतंत्र पत्रकार है। ये लेखक के निजी और व्यक्तिगत विचार हैं

  • पूर्ण विजय तो दूर,जीत आधी भी नहीं हुई और आसमान से कराई जा रही है पुष्प वर्षा

    कोविड-19 के कारण पिछले 24 घंटे में 83 लोगों की मौत हुई है। इससे पहले 24 घंटे में इतनी मौतें नहीं हुईं। संक्रमण से मरने वाले मरीज़ों की संख्या 1300 से अधिक हो चुकी है।

    क्या यह हर्ष और उल्लास का समय है कि हम आसमान से पुष्प वर्षा करें और वो भी सेना को आगे करके ताकि सेना के नाम पर सारे सवाल देशद्रोही बताए जाने लगें?

    तालाबंदी के दौरान हमें ऐसा क्या हासिल कर लिया जिसके लिए हम पुष्प वर्षा कर रहे हैं? संक्रमित मरीज़ों की संख्या धीमी गति से बढ़ रही है लेकिन बढ़ तो रही है। लेकिन क्या वाकई गति इतनी धीमी है कि हम पुष्प वर्षा करने लग जाएं?

    3 मई की सुबह स्वास्थ्य मंत्रालय की बुलेटिन के अनुसार संक्रमित मरीज़ों की संख्या 39,980 हो चुकी थी। 24 घंटे में 2644 मामले सामने आए हैं। ज़ाहिर है शाम तो यह संख्या 40,000 के पार भी कर जाएगी। अगर दस दिनों में डबल होने का औसत ही देखें तो 13 मई तक हम 80,000 के आस-पास होंगे। क्या इसे कामयाबी कहेंगे?

    हर बार डाक्टर और हेल्थ स्टाफ के नाम पर यह सब किया जा रहा है। लेकिन अभी तक हेल्थ स्टाफ को सारी सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई गईं हैं। अलग से नहीं बताया जाता है कि देश भर में कितने हेल्थ स्टाफ संक्रमित हैं? जिस अस्पताल के ऊपर फूलों की वर्षा हो रही है उसके भीतर बैठा डॉक्टर या नर्स क्या बिल्कुल इस सच्चाई को नहीं देख पाएंगे?

    आई टी सेल की ताकत पर हर प्रश्नों को किनारे लगा देने से प्रश्न मर नहीं जाते हैं। क्या यह प्रश्न नहीं है कि इस वक्त पुष्प वर्षा की ज़रूरत ही क्या थी? वो भी जिस दिन 2644 मामले सामने आने की खबर आई हो उस दिन हम पुष्प वर्षा कर रहे हैं। मुझे पता है आई टी सेल लगा कर प्रोपेगैंडा होगा कि सेना का विरोध कर रहा हूं लेकिन यह सेना का विरोध नहीं है। सेना कभी भी आधी अधूरी लड़ाई के बीच पुष्पवर्षा नहीं करती है। वो सलामी देती है संपूर्ण विजय की प्राप्ति के बाद।

    आप इस प्रश्न को अर्थव्यवस्था के संदर्भ में देखिए। छोटे दुकानदार से लेकर मध्यमवर्ग परेशान है। किसी का धंधा चौपट हो गया तो किसी की नौकरी चली गई। किसी की सैलरी कम हो गई। हर सरकारी कर्मचारी से नए बनाए गए पीएम केयर फंड में पैसा लिया गया। सांसदों की सैलरी काटी गई। इसीलिए न कि कोविड-19 से लड़ने के लिए पैसा चाहिए। तो फिर बीच लड़ाई में पुष्प वर्षा पर पैसे लुटाने का क्या मतलब है?

    सेना की मदद लेनी ही थी और जब ये जहाज़ उड़े ही थे तो इनसे कुछ मज़दूरों को उनके ज़िलों तक पहुंचाया जा सकता था। लेकिन फूल वर्षाए गए ताकि न्यज़ चैनलों के लिए हर रविवार को प्रोपेगैंडा की सामग्री मिल सके। और सवाल उठाने वाले को सेना विरोधी बता कर डिबेट की दिशा मोड़ी जा सके और सरकार को जवाबदेही से बचाया जा सके। लेकिन मोदी समर्थकों को भी सोचना चाहिए कि क्या वाकई इससे कुछ हासिल हुआ है ?

    शुक्रवार के दिन सुबह से दिल्ली में चर्चा थी कि कोई बड़ी ख़बर होने वाली है। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ भारतीय सेना के तीनों प्रमुख के साथ प्रेस कांफ्रेंस करेंगे। जब प्रेस कांफ्रेंस हुई तो उसमें पुष्प वर्षा की योजना के बारे में जानकारी दी गई। क्या ये जानकारी एक ट्विट और एक राज्य मंत्री से नहीं दी जा सकती थीं? क्या ये इतनी बड़ी ख़बर थी कि इसके लिए सेना के तीनों प्रमुखो के साथ चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ प्रेस कांफ्रेंस करें ?

    अगस्त 2018 में मेरठ में कांवड़ियों पर पुष्प वर्षा हुई थी। मेरठ ज़ोन के अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक प्रशांत कुमार ने पुष्प वर्षा की थी। उस वक्त हिन्दुस्तान टाइम्स की एक ख़बर छपी है। यह ख़बर दूसरी जगहों पर भी है। यूपी सरकार ने कांवड़ियों के दो रूट पर पुष्प वर्षा के लिए 14 लाख रुपये से अधिक की राशि मंज़ूर की थी। इससे आप हिसाब लगा सकते हैं कि देश भर में पुष्प वर्षा पर आज सरकार ने कितना ख़र्च कर दिया। अगर पैसे की कमी नहीं फिर पूछ लीजिएगा कि तब नौकरियां क्यों जा रही हैं, सैलरी क्यों कट रही है और ई एम आई क्यों नहीं भर पा रहे हैं?

    लेखक:रवीश कुमार,वरिष्ठ पत्रकार

  • छात्रों की गिरफ्तारी पर लोग ख़ामोश क्यों है?

    CAA/NRC के प्रोटेस्ट का केंद्र बिंदु जामिया मिल्लिया इस्लामिया रहा है। छात्रों ने बख़ूबी अपनी जिम्मेदारियों का निर्वाहन किया है। आज उसकी क़ीमत भी चुकानी पड़ रही है। जामिया के छात्र मीरान हैदर और सफूरा जरगर जब्कि जामिया ओल्ड बॉयज एलुमनी के शफाउर्रह्मान को UAPA के अंतर्गत गिरफ्तार किया जा चुका है। इनकी गिरफ्तारी के बाद चारों तरफ़ ख़ामोशी छायी हुई है। विशेष रूप से उन ख़ेमों में खामोशी है जो लोग संविधान बचाने की लड़ाई लड़ रहे थे।

    चूँकि जामिया मिल्लिया इस्लामिया इस आंदोलन का केंद्र था इसलिए बड़े-बड़े नेता संविधान बचाने के लिए जामिया के आंदोलन में शामिल होने आये थे। शशि थरूर, सलमान खुर्शीद, कन्हैया कुमार, स्वरा भाष्कर, मेधा पाटेकर, सुशांत सिंह राजपूत, अनुराग कश्यप, यशवंत सिन्हा, एसटी हसन, प्रोफेसर मनोज झा, अल्का लाम्बा, पप्पू यादव इत्यादि के नाम प्रमुख है। आंदोलन की शुरुआत जामिया से हुई थी इसलिए सरकार की नज़र जामिया के ऊपर अधिक है।

    सबसे पहले शाहीनबाग़ आंदोलन की शुरुआत करने वाले शरजील ईमाम को UAPA और सेडिशन के चार्ज में गिरफ्तार किया गया। उसकी गिरफ्तारी पर सारे लिबरल और सेक्युलर गैंग ख़ामोश रहे। बल्कि मुसलमान एक्टिविस्टों ने भी शरजील के नाम पर किनारा कर लिया। इसी बीच डॉ कफ़ील खान के ऊपर रासुका लगाया गया। उनकी गिरफ्तारी भी कुछ दिन के बाद सोशल मीडिया में दबकर रह गयी।

    लेकिन मेरे लिए चिंता करने वाला विषय जामिया के छात्रों की लगातार हो रही गिरफ्तारी है और उससे भी अधिक चिंता की बात संविधान बचाने के लिए भाषण देने जामिया आये नेताओं की ख़ामोशी है। मैं शशि थरूर, सलमान खुर्शीद, कन्हैया कुमार, स्वरा भाष्कर, मेधा पाटेकर, सुशांत सिंह राजपूत, अनुराग कश्यप, यशवंत सिन्हा, एसटी हसन, प्रोफेसर मनोज झा, अल्का लाम्बा, पप्पू यादव इत्यादि के ट्विटर पोस्ट को लगातार फॉलो करने की कोशिश कर रहा था। मैं ट्विटर देखकर बिल्कुल अंदर से हिल गया हूँ। इस लॉकडाउन वाले दौर में जब भीड़ के साथ विरोध दर्ज नहीं कर सकते है तब विरोध करने के लिए ट्विटर ही एकमात्र जरिया है। मग़र मुझें निराशा हाथ लगी।

    लॉकडाउन में सरकार अपना काम कर रही है। वह छात्रों को लगातार गिरफ्तार कर रही है। लेकिन उसका विरोध ट्विटर के जरिये एक पोस्ट लिखकर भी नहीं किया जा रहा है। स्वरा भाष्कर की तरफ़ से जामिया के छात्रों के लिए एक भी ट्वीट नहीं है। बल्कि एक-दो रिट्वीट है। लेकिन उसमें भी जामिया के छात्रों पर नहीं बल्कि उमर ख़ालिद, तेलतुंबड़े और नौलखा की चर्चा है। छात्र राजनीति से उभरे कन्हैया कुमार के ट्विटर हैंडल पर भी सन्नाटा नज़र आता है। हालाँकि अभिनेता सुशांत सिंह राजपूत ने एक भी ट्वीट नहीं किया है मगर कुछ रिट्वीट पड़े हुए है। यही हाल अभिनेता जीशान अय्यूब का है। सलमान खुर्शीद अपने ट्विटर हैंडल का इस्तेमाल राजनीति के लिए कम और मुक़दमा लड़ने के लिए क्लाइंट ढूंढने में अधिक इस्तेमाल कर रहे है। शशि थरूर रोमांटिक साहित्य से सम्बंधित पोस्ट कर रहे है। बड़बोले नेता पप्पू यादव अर्नब गोस्वामी से ट्विटर पर जंग लड़ रहे है। एसटी हसन का ट्विटर तो मुर्दाघर बन चुका है। एक हद तक मनोज झा अपनी पार्टी छात्र नेता होने के कारण मीरान के लिए खड़े नजर आये है। वह मीरान से मिलने भी गये थे और लीगल सहायता की बात भी कर चुके है। बाक़ी जो लोग ठीक-ठाक भीड़ को प्रभावित करते है वह सभी लोग ख़ामोश है।

    मेरी चिंता इस बात को लेकर है कि जब लॉकडाउन में सरकार अपना काम कर रही है और छात्रों को गिरफ़्तार करके UAPA का चार्ज लगा रही है तब बड़े-बड़े नेता ख़ामोश क्यों है? क्या सिर्फ़ इसलिए ख़ामोश है कि लॉकडाउन चल रहा है? लेकिन ट्विटर पर ख़ामोशी का कोई कारण समझ नहीं आता है। इस पूरे मामले में जेएनयू छात्रसंघ की भूमिका भी बहुत निराशजनक है। पूछताछ के दौरान दिल्ली विश्वविद्यालय में वामदल की छात्रनेता कंवलप्रीत कौर का मोबाइल फोन दिल्ली पुलिस क़ब्ज़ा कर लेती है। इस मामले को लेकर सभी एक्टिविस्टों की नींद खुलती है और धड़ाम-धड़ाम ट्विट और पोस्टर जारी होने लगते है। यह सेलेक्टिव एक्टिविज़्म बेहद निराशाजनक है। आज जब संविधान बचाने के लिए मीरान, सफूरा और शफाउर्रह्मान UAPA जैसा ख़तरनाक चार्ज झेल रहे है तब बड़े नेताओं की चुप्पी बड़ी परिशान कर रही है।

    (लेखक:तारिक़ अनवर चम्पारणी)

  • रमजान का महीना बहुत ही अजमत व नेअमत वाला है।

    मेराज आलम ब्यूरो:रमजान का महीना बहुत ही अजमत व नेअमत वाला है। रमजान मुसलमानों के लिये खास मायने रखता है। रमजान ईमान, सबर और समर्पण के साथ खुदा की इबादत का महीना है। रोजा हमें नफस ( स्वयं) पर काबू रखने की तरबीयत (सीख) देता है। हममें परहेजगारी पैदा करता है। यह महीना ट्रेनिंग का है, जिस तरह रमजान मे इंसान बुरे कामों से दुर रहता है, नेक कार्य करता है उसी तरह उसे साल भर गुजारना चाहिए। अललाह ने कुरान मे रोजे का हुक्म देते हुए इरशाद फरमाया कि, ऐ इमान वालों तुम पर रोजे फरज किए गए जिस तरह तुम से पहली उममतो पर भी फरज किए गए थे ताकि तुम मे तकवा पैदा हो। गलतियों के लिए तौबा करने ,नेकी के बदले सवाब पाने, अपनी मगफिरत करवाने का महीना रमजान है।

    रोजा मे अहले सुबह से लेकर शाम सुरज डूबने तक कुछ भी खाने पीने की मनाही है। रमजान में ही 27वीं की रात को कुरान का नुजूल हुआ। इसलिए इस महीने में कुरान ज्यादा पढना चाहिए । रमजान मे रोजा रखना, जकात और सदका देना, फितरा अदा करना, कुरान पढ़ना, बुरे कामो से दूर रह कर पुरे महीने इबादत करते हैं। अललाह का वादा है कि जो इमान के साथ रमजान गुजारे उसके पिछले तमाम गुनाह माफ कर दिए जायेंगे। रमजान में ज्यादा से ज्यादा इबादत करना चाहिए क्योंकि इस महीने मे हर नेक अमल का सवाब बढा दिया जाता है। लाक डाउन का पालन करें और समाजिक दूरी बनाये रख कर इबादत करें, घर पर सुरह तरावीह पढ ले, जितना संभव हो इबादत करें। अपने गुनाहों की माफी मांगे। कोरोना वायरस से समाज और देश के बचाव की दुआ मांगे। अललाह से यह भी दुआ करे की देश में अमन शांति रहे, आपसी भाईचारा एव मुहब्बत कायम रहे। मो कमर अखतर अध्यक्ष मुस्लिम सिटीजंस फार एमपावरमेंट

  • जानिए क्या है माहे रमजान का महत्व? सुरक्षित प्रक्रिया कैसे अपनाएं कोरोना वायरस संकट के समय

    खुर्रम मालिक

    जैसा के हम सब को पता है के इस समय पूरी दुनिया कोरोना नामक महामारी से पीड़ित है और इस से बचाव के लिए हर वह उपाय किये जा रहे हैं जो इस बीमारी से मनुष्य को बचा सके. पूरी दुनिया में लाक डाउन हैऔर लोगों को अपने अपने घरों में रहने के लिये कहा गया है.जिस का पालन सभी लोग कर रहे हैं. और इसी बीच कल इस्लामिक पवित्र महीना रमज़ान का चांद पूरे देश में देखा गया और आज से रोज़ा शुरु हो गया. और इसी के साथ पूरी दुनिया के मुसलमानों ने रोज़ा रख कर इस पवित्र महीना का आरंभ किया. सब से पहले बात करते हैं के यह महीना है किया?इसकी महत्ता किया है और इसे इतना पवित्र कियु कहा गया है?

    ○इस्लामिक कैलेंडर का 9वां महीना रमजा़न है। इस महीने में मुसलमान रोजा़ रखते हैं। रोजे़ के दौरान सूर्योदय(सूरज निकलने)से लेकर सूर्यास्त(सुरज डूबने)तक कुछ भी नहीं खाते-पीते। इसके साथ ही रमजा़न में बुरी आदतों से दूर रहने के लिए भी कहा गया है। रमजा़न में मुसलमान लोग अल्लाह को उनकी नेमत के लिए शुक्रिया अदा करते हैं। महीने भर रोजे़ के बाद शव्वाल की पहली तारीख़ को ईद उल फि़तर मनाया जाता है। इन सबके बीच क्या आप जानते हैं कि रमजान क्यों मनाया जाता है? और इसका इतिहास क्या है? आज हम आपको इस बारे में विस्तार से बताने जा रहे हैं।

    ○रमज़ान या रमदान (उर्दू – अरबी – फ़ारसी : رمضان) इस्लामी कैलेण्डर का नवां महीना होता है. मुस्लिम समुदाय इस महीने को परम पवित्र मानते हैं . रमजान शब्द अरब से निकला है. अर्थात यह एक अरबिक शब्द है जिसका अर्थ है कि “चिलचिलाती गर्मी तथा सूखापन”

    ○ऐसा माना जाता है कि मोहम्मद साहब को साल 610 में लेयलत उल-क़द्र के मौके़ पर पवित्र कु़रान शरीफ़ का ज्ञान प्राप्त हुआ था। उसी समय से रमजा़न को इस्लाम धर्म के पवित्र महीने के तौर पर मानाया जाने लगा। इस पवित्र महीने में मुसलमान लोगों को कुछ खास सावधानियां बरतने की सलाह दी गई है।

    ○रमज़ान या रमदान (उर्दू – अरबी – फ़ारसी : رمضان) इस्लामी कैलेण्डर का नवां महीना होता है. मुस्लिम समुदाय इस महीने को परम पवित्र मानते हैं . रमजान शब्द अरब से निकला है. अर्थात यह एक अरबिक शब्द है जिसका अर्थ है कि “चिलचिलाती गर्मी तथा सूखापन”.
    ○इस पवित्र महीने का महत्व यह भी है के उसी पवित्र महीने में चारों आसमानी किताबें उतारी गई, जिस में तौरैत, ज़बूर(दाऊद अ) , इन्जील, और पाक किताब क़ुरान ए पाक हज़रत मुहम्मद सo पर. इस महीने की महत्ता का अंदाज़ा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि अल्लाह ने कहा के यह महीना मेरा महीना है और मैं इस महीने का बदला लोगों को उन के कर्मो के अनुरूप दूँगा. इस का सीधा अर्थ यह है के यह महीना अल्लाह के नज़्दीक बहुत महत्व वाला है.
    ○इस पवित्र महीने में इब्लीस (शैतान) को बंदी बना कर क़ैद कर लिया जाता है. इस पवित्र महीने में कुछ चीज़ें हैं जिन को करना अत्यंत महत्वपूर्ण है. ○1- रोज़ा- इस पवित्र महीने में सारे मुसलमानों को रोज़ा अर्थात उप्वास रखने का आदेश दिया गया है जो सुर्युदय से ले करसुर्यास्त तक होता है.अर्थात सुबह की अज़ान जिसे इस्लाम में फ़ज्र कहा गया है उस समय से ले कर शाम को सुरज डूबने तक सभी मुसलमानों को बिना दाना पानी खाए भूखा रहना होता है. लेकिन इस्लाम ने ऐसे लोगों के लिए छूट भी दी है जो बीमार हैं या जिन्हें डाक्टर ने भूखा रहने को मना किया है. तो ऐसे लोगों के लिये इस्लाम ने यह आदेश दिया है के वह रमज़ान के रोज़े ना रखे और जब वह स्वस्थ हो जाए तो बाद में वह रोज़े रख ले. कियु के इस्लाम में कहीं कोई ज़ोर ज़बरदस्ती नहीं है. जैसा लोग समझ्ते है.

    ○2- तरावीह -यह एक नमाज़ है जिसे तरावीह की नमाज़ कहा जाता है. इस का पढ़ना सुननत ए मो’अक्कदा है अर्थात जिस के पढ़ने पर पुनय मिलता है. जो के 20 रकात पढी़ जाती है. इस नमाज़ में क़ुरान को एक हाफ़िज़ साहब (क़ुरान को याद किया हुआ इंसान) पढ़ते हैं और पीछे लोग उसे सुनते हैं.

    ○3-इफ़्तार -यह सुर्युदय के बाद अर्थात मग़रिब की अज़ान होने पर किया जाता है.जिस में सब से पहले खजूर खाने को कहा गया है या अगर यह नहीं है तो किसी मीठी चीज़ से अपना रोज़ा(उप्वास) खोले.

    ○4-सेहरी- यह सुबह के समय के खाने को कहा जाता है अर्थात ठीक सुर्युदय से पहले कुछ भी भोजन गर्हण कर लेना होता है. और इस की महत्ता के बारे में खु़द मुहम्मद साहब ने कहा है के

    قال رسول الله ص: تسحروا فان في السحور بركة..(بخاری شریف)

    क़ाला रसूलुल्लाह सo..
    तसह्हरु फ़’इनना फ़िस-सुहूरी बर’कतन (बुखा़रीशरीफ़)

    रोज़ा रखने के लिए सेहरी मस्नून है,हदीस में इस अमल को बरकत क़रार दिया गया है इस लिए सेहरी का ख़ास एहतेमाम करना चाहिए.

    5-ज़कात – ज़कात या ( अरबी : زكاة ) इस्लाम के पाँच स्तंभों में से एक है, जिसका शाब्दिक अर्थ है शुद्ध या पोषण करना। इसका मुख्य उद्देश्य ग़रीबों की मदद करना, सामाजिक कल्याण में अमीरों को शामिल करना और योग्य लोगों के लिए निर्वाह के साधन उपलब्ध कराना है।
    इस्लाम में जिस तरह नमाज़ पढ़ने पर ज़ोर दिया गया है ठीक इसी तरह ज़कात निकलने पर भी सख़्त आदेश दिये गए हैं. कियु के नमाज़ के बाद इस पर सब से ज़ियादा बात की गई है. वह इस लिये के इस के निकलने से ग़रीबों की मदद हो जाती है और इस का हुक्म मुहम्मद साहब के समय ही हुआ था जिस का पालन अब तक किया जा रहा है .
    इस की व्याख्या अगर सरल शब्दों में की जाए तो इस का अर्थ यह निकलता है के वैसे मुसलमान जो माल्दार हैं, पैसे से सम्पन्न हैं और पूरे साल में जो कमाता है और उस के बाद अगर उस के पास पैसे बच जाते हैं तो वह उस का ढाई अर्थात 2.5 पर्तिशत निकाल कर ग़रीबों, मोह्ताजों को देना होता है. इस्लाम ने इसे इस लिये लागू किया था के इस से समाज में गरीब लोगों का भी उद्धार हो और वह भी एक बेहतर जीवन व्यतीत कर सकें.

    6-ऐतेकाफ़- रमज़ान के पवित्र महीने के आखि़री के दस दिनों में मुसलमानों को अपने अपने मोहल्ले की मस्जिद में पूरे दस दिनों के लिए अल्लाह की इबादत के लिए बैठना होता है. एक मोहल्ले से अगर एक भी आदमी बैठ गया तो सब की तरफ़ से अदा हो जाता है. लेकिन अगर एक भी आदमी नहीं बैठा तो पूरी मोहल्ले को गुनाह मिलता है. और इस दौरान वह व्यक्ति मस्जिद से बाहर नहीं जा सकता है,.आप यह कह सकते हैं के मनुष्य का पूरी तरह से इश्वर की साधना में लीन हो जाना ही ऐतेकाफ़ है. और इस का अल्लह के क़रीब बहुत सवाब (पुण्य) है. और यह ईद का चांद देखने के बाद समाप्त हो जाता है और मो’तकिफ़ (मस्जिद में इबादत के लिए बैठने वाला) अपने घर चला जाता है.
    इस्लाम में कहा गया है के अगर कोई मुसलमान पूरी निष्ठा और श्रद्धा से रमज़ान के इन आखि़री के दस दिनों में मस्जिद में अल्लाह की इबादत के लिये बैठता है तो उस पर अल्लाह की खा़स रहमत होती है. और जब वह मस्जिद से निकलता है तो ऐसे होता है जैसे एक पैदा हुआ बच्चा.अर्थात जैसे एक बच्चा गुनाह से पाक होता है वैसे ही वह इंसान भी हो जाता है. इस पवित्र महीने में अल्लाह ने मुसलमानों को झूट,लड़ाई झगड़े से बचने को कहा है. आपस में भेद भाव मिटाने को कहा गया है. ग़रीब और बे सहारा लोगों की मदद करने का आदेश दिया गया है. अर्थात झूट की जगह सच, बुराई की जगह अच्छाई,बद की जगह नेक को दर्शाने के लिए कहा गया है.

    इसी के साथ मौजूदा रमज़ान कुछ अलग तरह का हो गया है. कोरोना की वजह कर लोग सरकारी आदेश का पालन कर रहे हैं. इस लिये मस्जिद में तरावीह नहीं हो रही है, और लोग अपने अपने घरों में ही नमाज़, तरावीह पढ़ रहे हैं जो के मुसलमानों के लिये अत्यंत दुख का कारण है. किन्तु महामारी के चलते सभी मुसलमान बाहर भी नहीं जा सकते हैं. कियु के हदीस के अनुसार अगर कहीं भी कोई वबा (महामारी) फैलती है तो ऐसे में नमाज़ घरों में पढ़ने का हुक्म दिया गया है. इस साल के रमज़ान में मुसलमान मस्जिद में तरावीह को याद कर के अफ़्सोस का इज़्हार तो कर रहा है है लेकिन दूसरी और वह इस महामारी के विक्राल रूप को भी देख रहा है और इस्लाम में अपनी और अपने परीवार की रक्षा करने को भी कहा गया है.साथ ही मुसलमानों के बड़े उलेमा ने भी घर में ही रह कर इबादात करने का आदेश दिया है और मुसलमान इस का पूरी तरह पालन भी कर रहे हैं. कुल मिला कर यह कहा जा सकता है के इस साल का रमज़ान इतिहास में ऐसा पहला रमज़ान है जिस में मुसलमान मस्जिद में ना जा कर घर में ही इबादात कर रहा है और अपने अल्लाह के हुक्म को मानने के साथ ही अपने देश की सरकार और प्रशासन का पूरी तरह से सहयोग कर रहा है जो के सराहनिय है.
    इस लिये हम भी दुआ करते हैं के यह पवित्र महीना रमज़ान हम तमाम इंसानियत के लिये बेहतर साबित हो और इस मुबारक महीने की बरकत से हमारे देश और पूरी दुनिया से कोरोना नामक बीमारी को अल्लाह ख़त्म कर दे और तमाम इंसानियत की हिफ़ाज़त फ़रमाए. और देश में अमन शान्ती और भाई चारे को बनाए रखे. आमीन

    खुर्रम मालिक इस्लामिक स्कॉलर और पत्रकार है। ये लेखक के निजी और व्यक्तिगत विचार हैं

  • मंडल का वह सैलाब जो कई दलों के तम्बूओं को बहा ले गया: बी पी मंडल की पुण्यतिथि विशेष

    1977 में जनता पार्टी की सरकार बनते ही मोरारजी देसाई ने अपने घोषणापत्र में किये वादे के अनुरूप पिछड़े वर्ग के लिए उत्थान के लिए आयोग गठन के लिए कदम उठाया और पुराने पड़ चुके काका कालेलकर आयोग की जगह बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री स्व बी पी मंडल की अध्यक्षता में नए आयोग की घोषणा की जिसे मंडल आयोग के नाम से आम लोगों के बीच जाना गया। स्व मंडल ने अपनी टीम के साथ काम करना शुरू किया और इससे पहले कि वे अपनी रिपोर्ट तैयार कर पाते , जनता पार्टी की सरकार अपने ही बोझ और पदलोलुप सहयोगियों के कुचक्र से धराशायी हो गयी। फिर से चुनाव हुए और जनता पार्टी की पिछली भारी -भरकम जीत को देख कई राजनीतिक पंडितों के द्वारा कांग्रेस और इंदिरा गाँधी जबरदस्त तरीके से कमबैक की। सिर्फ दो साल पहले हुए चुनाव में जिस जनता पार्टी और अलायन्स ने 345 सीटें हासिल कर कांग्रेस को महज 154 सीटों पर धकेल दिया , वही 1979 में हुए चुनाव में कांग्रेस ने 354 सीटें बटोर ली और पदलोलुपों की पार्टी जनता पार्टी महज 31 सीट ही हासिल कर सकी। खैर , यह इस पोस्ट का विषय नहीं है।

    14 जनवरी 1980 को इंदिरा गाँधी पुनः प्रधानमंत्री पद की शपथ ली और तब तक बी पी मंडल अपनी रिपोर्ट भी लगभग तैयार कर चुके थे। 31 दिसंबर 1980 को मंडल कमिशन ने अपनी रिपोर्ट इंदिरा गाँधी को सौंप दिया। इंदिरा गाँधी को मंडल कमिशन की सिफारिशों को नहीं लागू करना था , सो उन्होंने नहीं किया और उस पर कुंडली मार कर बैठ गयी। इंदिरा गाँधी ने इसे क्यों नहीं लागू किया , राजनीति के छात्रों को इसे समझ पाना बहुत मुश्किल नहीं है। कांग्रेस का आधार वोट जो भी रहा हो लेकिन शीर्ष नेतृत्व समूह अगड़ी जातियों का ही समूह था। इक्के -दुक्के दलित और पिछड़ा चेहरा यदि था भी तो वह सिर्फ चेहरा चमकाने के लिए था , डिसिशन मेकिंग में ये लोग कोई तवज्जो नहीं पाते थे। इनके आधार वोट्स में मुस्लिम के अलावा सवर्ण जातियों का बहुत बड़ा समूह था जिसे नाराज कर मंडल आयोग की अनुशंसाओं को लागू कर पाना इंदिरा के लिए इतना सहज नहीं था। मँझोली जातियाँ और दलितों के वोट्स कांग्रेस को नहीं मिलते थे , ऐसा नहीं है लेकिन ऐसे वोट्स किसी एक जगह न जाकर समाजवादी खेमों , वामपंथी खेमों में बँटे हुए थे। खैर , इंदिरा बिना कुछ कहे -सुने इस आयोग की रिपोर्ट को अनंत काल के लिए दबाने के मकसद से ठंढे बस्ते में डाल दिया।
    इंदिरा ने भले इस रिपोर्ट को दबा दिया लेकिन वह वर्षों पुरानी माँगों को लेकर उठ रही आवाजों को कैसे दबा पाती ? मंडल कमिशन की अनुशंसाओं को लागू करने की माँग समाजवादी खेमों (तत्कालीन जनता पार्टी ) द्वारा होती रही और छोटे -बड़े आंदोलन होते रहे। गौरतलब है कि इस दौरान वामपंथी दलों का इस रिपोर्ट पर क्या रुख रहा होगा ? उस समय की घटनाओं का यदि गौर से अवलोकन किया जाय तो पता चलता है कि वामपंथी दलों का भी लगभग वही रवैया था कि जबतक पानी गर्दन से ऊपर न बहने लगे , मौन धारण ही श्रेयस्कर है। यह मौन इस रिपोर्ट से सहमति नहीं , असहमति के लक्षण थे।

    इधर जनता पार्टी में क्या चल रहा था ? भारी -भरकम हार के बाद क्या पार्टी नीतिगत स्तर पर किसी मंथन या सुधार के दौर से गुजर रही थी ? अब इसे जो भी कहें , लेकिन हार का ठीकरा एक -दूसरे पर फोड़ने के चक्कर में जनता पार्टी के नेता सरफुट्टौवल के अलावा कुछ नहीं कर रहे थे। हार के बाद जनता पार्टी के जनसंघ वाले खेमे जिनमें वाजपेयी , आडवाणी प्रमुख थे , की दोहरी सदस्य्ता पर सवाल उठाये जाने लगे। यह माँग जोर पकड़ने लगी कि पार्टी का सदस्य रहते हुए कोई आरएसएस की भी सदस्य्ता कैसे रख सकता है और संघ की कार्यशालाओं में हिस्सा कैसे ले सकता है। यह विवाद इतना बढ़ा कि जनता पार्टी टूट गयी और जनता पार्टी का जनसंघ वाला खेमा 1980 में ही उस पार्टी से अलग होकर नए दल का निर्माण किया और भारतीय जनता पार्टी का जन्म हुआ जिसके अध्यक्ष बने अटल बिहारी वाजपेयी। शुरू में दिखावे के लिए ही सही इस पार्टी ने अपने लिए गांधीयन समाजवाद का रास्ता चुना , हालाँकि इस पर जनसंघ और आरएसएस की विचारों का ही प्रभाव था। लेकिन फिर भी आरएसएस का इस नयी बनी पार्टी पर वह नियंत्रण नहीं था जो आज नरेंद्र मोदी और अमित शाह की भारतीय जनता पार्टी पर है। कुछ सालों तक यह दल गाँधी और समाजवाद के इर्दगिर्द ही अपने संघर्ष का तानाबाना बुनता रहा लेकिन 1984 के आमचुनावों में मात्र 2 सीटे हासिल कर पाने की भारी असफलता ने इस दल के कलेवर और विचार , दिशा और दशा सब बदल कर रख दिया। हालाँकि यदि इस चुनाव से ठीक पहले इंदिरा गाँधी की हत्या नहीं हुई होती तब क्या गुणा -गणित होता , यह कहना मुश्किल है। इस दल ने गाँधी और समाजवाद के चोले को उतार फेंक उग्र हिंदुत्व की राह पकड़ ली और यही वह समय था जब आडवाणी के नेतृत्व में राममंदिर आंदोलन ने जोड़ पकड़ना शुरू किया।

    उधर बाकी की जनता पार्टी क्या कर रही थी ? 1979 की हार ने इस पार्टी में कोहराम ही मचा दिया था। जैसे यह दल कुनबा – कुनबा जोड़कर बना था , वैसे ही यह बिखड़ता गया , एक दिल के टुकड़े हजार हुए कोई यहाँ गिरा कोई वहाँ गिरा। उधर जनसंघ वाला खेमा भारतीय जनता पार्टी बना तो भारतीय लोक दल जिनका नेतृत्व चौधरी चरण सिंह के हाथों था , 1980 में ही अलग होकर पुनः लोकदल के नाम से नया दल बना बैठे। जनता पार्टी खत्म तो नहीं हुई लेकिन ख़त्म जैसी ही हो गयी। एक जनता पार्टी चंद्रशेखर चलाते रहे और एक तो सुब्रमण्यम स्वामी 2013 तक चलाते रहे जिसका विलय अंतत उन्होंने भारतीय जनता पार्टी में कर लिया। जनता पार्टी हालत यह हो गयी कि 1984 के आम चुनाव में इंदिरा की मौत के बाद जिसमें राजीव गाँधी को 414 सीट मिले वहीँ जनता पार्टी 10 सीट , चौधरी चरण सिंह का दल लोक दल महज 3 सीट और भारतीय जनता पार्टी मात्र 2 सीटों पर सिमट कर रह गयी। जनता पार्टी की आहुति 11 अक्टूबर 1988 को तब दे दी गयी जब कांग्रेस पर बोफोर्स तोप के सौदे में सीधा राजीव गाँधी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाते हुए तत्कालीन रक्षा मंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह अलग हुए और जनता दल नामक नए दल का गठन हुआ। जनता पार्टी का विलय इस जनता दल में हो गया और विश्वनाथ प्रताप सिंह इसके अध्यक्ष बने।

    1989 के आम चुनाव में जनता दल के नेतृत्व में कई अन्य छोटी -छोटी पार्टियाँ एकत्रित हुई जिसे राष्ट्रीय मोर्चा का नाम दिया गया। जनता दल ने अपने चुनावी घोषणापत्र में कई वादे किये जिसमें एक प्रमुख वादा था मंडल कमिशन की सिफारिशों को लागू करना। जनता दल को भारतीय जनता ने पसंद किया और बोफोर्स के हल्ले ने कांग्रेस को काफी नुकसान पहुँचाया। कांग्रेस 414 के टैली से धड़ाम होकर 197 पर आ गिरी। नए बने जनता दल को पहली ही बार में 143 सीट मिले। उग्र हिंदुत्व और राममंदिर के आंदोलन की नाव पर सवार होकर भारतीय जनता पार्टी को अप्रत्याशित बढ़त मिली और उसका आंकड़े पिछले चुनाव के मुकाबले 2 सीट से 85 सीट पर जा पहुँचा। चुनाव उपरांत राष्ट्रीय मोर्चा ने वाम मोर्चा की सहायता से और भारतीय जनता पार्टी के बाहरी समर्थन से वी पी सिंह के नेतृत्व में सरकार बनायीं। 10 दिसंबर 1989 को वी पी सिंह प्रधानमंत्री बने।

    सरकार बनते ही समाजवादी खेमों ने जिनमें शरद यादव , लालू प्रसाद यादव , राम बिलास पासवान जैसे प्रमुख लोग थे , वी पी सिंह पर मंडल आयोग की रिपोर्ट की अनुशंसाओं को लागू करने का दबाव बनाने लगे। उधर जनता दल के ही लहर में कई राज्यों में विधानसभा के चुनाव हुए जिसमें बिहार समेत अन्य राज्यों में जनता दल का जबरदस्त प्रदर्शन हुआ। बिहार, कर्नाटक , हरियाणा , उत्तरप्रदेश , ओडिसा आदि राज्यों में जनता दल की सरकार बनी। यह किन परिस्थितियों में हुआ , किसने दबाव बनाये , परदे के पीछे क्या -क्या खेल चल रहा था , इसके विस्तार में जाना भी इस पोस्ट का मकसद नहीं है। 7 अगस्त 1990 को जनता दल सरकार ने अपनी मंशा इस आयोग की रिपोर्ट को लेकर जता दी और इसके ठीक 6 दिन बाद 13 अगस्त को गवर्नमेंट आर्डर के जरिये इसके कुछ हिस्सों को लागू करने की घोषणा कर दी गयी और अगले दो दिनों बाद 15 अगस्त को स्वतंत्रता दिवस के मौके पर प्रधानमंत्री वी पी सिंह ने अपने भाषण में लाल किले की प्राचीर से भी इस बात का जिक्र किया।

    इसकी घोषणा होते ही असली खेल शुरू हो गए। कांग्रेस की त्योरियाँ तो चढ़ी ही , सरकार को समर्थन दे रही भारतीय जनता पार्टी ने भी इसका प्रत्यक्ष -अप्रत्यक्ष विरोध किया। दोनों के वजूद दाँव पर लगने वाले थे। सड़कों पर आरक्षण विरोधी और आरक्षण समर्थकों के प्रदर्शन होने लगे। पूरे हिन्दुस्तान में खासकर उतर भारतीय बेल्ट में जमकर तोड़-फोड़ और हिंसा हुई। सैकड़ों लोग मारे गए। पिछड़ी -दलित जातियाँ जो अब तक कांग्रेस , कम्युनिस्ट के झंडे ढो रही थीं , जनता दल के पीछे लामबंद होती दिखने लगी। जगह -जगह मशाल जुलूस , रैलियाँ आम बात थीं। मुझे याद है मेरे गाँव से भी एक बहुत बड़ा मशाल जुलूस निकलकर 4 किलोमीटर तक गया जिसमें वी पी सिंह जिंदाबाद , लालू यादव जिंदाबाद जैसे नारों से आसमान गूँज रहा था। भारतीय जनता पार्टी यह सब देख घबरा गयी। बड़े जतन से हिंदुत्व की लहर पर सवार होकर वह 2 से 85 पर पहुँची थी और उसे अपने लिए बेहतर भविष्य दीख रहा था। लेकिन मण्डल कमिशन की सिफारिश को लागू करने की घोषणा के साथ ही उसे यह उम्मीद क्षीण नजर आने लगी। इसकी काट के लिए आडवाणी ने रथयात्रा का प्रपंच रचा। उधर कांग्रेस से नाउम्मीद सवर्ण जातियों को भी भारतीय जनता पार्टी में एक उम्मीद की किरण दिखने लगी थी। इधर आडवाणी ने रथयात्रा की घोषणा की उधर सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन ने सरकार के इस घोषणा के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका दायर कर इस पर रोक की माँग कर दी।

    आडवाणी की रथ यात्रा का बिहार में क्या हश्र हुआ , यह मालूम है. हालाँकि वी पी सिंह नहीं चाहते थे कि आडवाणी को गिरफ्तार किया जाय। क्यों नहीं चाहते थे , इसका अलग -अलग लोग अपने तरीके से जवाब देते हैं लेकिन मैं साफ़ -साफ़ कहने का आदी हूँ। वी पी सिंह को पता था कि आडवाणी उधर गिरफ्तार हुए और इधर सरकार गिरेगी। भाजपा चाहती भी थी कि उसे कोई ठोस बहाना मिले ताकि वी पी सिंह से समर्थन वापस लेकर सरकार गिरा दी जाय और मंडल आयोग की अनुशंसा जो एक गवर्नमेंट आर्डर के जरिये लागू की गयी थी , ठोस संवैधानिक अमलीजामा पहने बगैर फिर से ठंढे बस्ते में चला जाय। यदि ऐसा करने में भाजपा सफल होती है तो उसे कांग्रेस से उन सवर्ण समर्थकों को झटकने में कामयाबी मिलती जिसे अब तक लगता था कि सवर्णों का हित कांग्रेस के ही हाथ में सुरक्षित है। भाजपा को बहुत हद तक कामयाबी मिली भी। इधर लालू यादव ने आडवाणी को दबोचा , उधर वी पी सिंह की सरकार गिरी। तिस पर सुप्रीम कोर्ट ने गवर्नमेंट आर्डर पर अंतिम सुनवाई तक स्टे लगा दिया।

    वी पी सिंह की सरकार तो गिर गयी लेकिन राज्यों में जनतादल के क्षत्रप मजबूत होकर उभरे। एक तरफ मंडल कमिशन के उफान ने पिछड़ों -दलितों वामपंथियों के चंगुल से निकलकर को लालू , मुलायम जैसे नेताओं के पीछे गोलबंद कर दिया वहीँ सवर्ण जाति के लोग कांग्रेस के इतर भाजपा को अपना सच्चा प्रतिनिधि महसूस करने लगे। एक और वर्ग था मुसलमान। जो मुसलमान अब तक कांग्रेस के पीछे लामबंद थे , भाजपा के चढाव के बीच कांग्रेस की आक्रामकता में कमी देखकर उसका भी कांग्रेस से मोहभंग होने लगा था। शाहबानो का मामला मुस्लिमों का कांग्रेस से विश्वास दरकने में एक महत्वपूर्ण भूमिका अदा कर रहा था तो अब भाजपा के उग्र हिंदुत्व के बीच लालू यादव और मुलायम सिंह यादव का आडवाणी और राममंदिर आंदोलन के करता-धर्ता से सीधा टकराना , मुस्लिम समुदाय के मन में इन क्षेत्रीय नेताओं के लिए एक सम्मान और समर्थन का भाव बटोर रहा था। रही -सही कसर 1992 में बाबरी मस्जिद के विध्वंस में नरसिम्हा राव की संदिग्ध भूमिका को लेकर पूरी हो गयी जिसमें कम से कम राज्यों के चुनाव में उत्तर भारत के मुस्लिम कांग्रेस को पूरी तरह छोड़ चुके थे और अपना समर्थन इन क्षेत्रीय क्षत्रपों को दे चुके थे। कांग्रेस का तम्बू बिहार , उत्तरप्रदेश , हरियाणा , झारखण्ड और अन्य राज्यों से उखड चुका था। वहीँ वामपंथी पार्टियाँ जो अब तक दलितों , पिछड़ों के लिए संघर्ष के नाम पर वोट पाकर सवर्ण चेहरों को सदन में भेजने का जो कारनामा अब तक कर रही थी , उसकी भी दुकानें बंद होने के कगार पर पहुँच गयी। मंडल के बाद उभरे राजनीतिक परिदृश्य में वामपंथी पार्टी के वैसे समर्थक जो सवर्ण वर्ग से थे , भाजपा का दामन थम चुके थे। दलित ,पिछड़े, मुस्लिम समर्थक लालू। मुलायम जैसों का हाथ थाम चुके थे। वामपंथी दलों का भी तम्बू मंडल की सुनामी में बह गया और बहकर इतनी दूर चला गया कि लाख चाहने के बाद भी नया आशियाना बसाया न जा सका।

    Lal Babu Lalit, लेखक सुप्रीम कोर्ट के वकील है.  ये लेखक के निजी और व्यक्तिगत विचार हैं अतः इसे पढते समय पाठक जन अपने विवेक का प्रयोग करें, और इस लेख को पढने के बाद अपनी प्रतिक्रिया जरूर देवें।