Category: लेख, विचार

  • नीतीश कुमार ना घर के ना घाट के

    नीतीश कुमार और उनकी पार्टी जदयू ख़ुद कि कोई विचारधारा नही है.सिर्फ़ सत्ता का सुख भोगना चाहे थूक कर चाटना ही क्यों ना पड़ जाये.

    वैसे मैंने जिस बिहार को देखा है उसमें ना सही से बिज़ली रहती थी ना अच्छी सड़कें थीं और बहुत सी मूलभुत सुविधाएं लेक़िन आज कह सकता हूँ कि बिहार में पिछले 10 या 12 वर्षों में बहुत कुछ बदला है.इसका गवाह मैं ख़ुद हूँ.इसका श्रेय नीतीश कुमार को जाता है और जाना भी चाहिये.

    नीतीश कुमार ने ही बिहार में बीजेपी को छोटी पार्टी से बड़ी पार्टी तक बना दिया.लेक़िन अब नीतीश कुमार ख़ुद में महसूस कर रहें होंगे अग़र बीजेपी के साथ वो ज़्यादा दिन तक रही तो उनकी पार्टी के वजूद को ख़तरा होगा.
    2015 में विधानसभा चुनाव में बड़ी जीत के बाद बिहार के उनको प्रधानमंत्री कि तरह देखने लगे थे बहुत हद तक मुमकिन था कि अगर वो महागठबंधन में बने रहते तो वो प्रधानमंत्री के संभावित उम्मीदवार होते और देश को बिहार से पहला प्रधानमंत्री मिलता.

    लेक़िन उन्होंने अपने पैर में ख़ुद कुल्हाड़ी मार ली.वैसे बीजेपी का इतिहास भी रहा है जहाँ जहाँ वो क्षेत्रीय पार्टियों से गठबंधन किया और सरकार बनाई कुछ सालों के बाद वो क्षेत्रीय पार्टी का वजूद ख़त्म होने लगता है.
    ग़ोवा एक उदहारण हैं वहाँ बीजेपी महाराष्ट्रवादी गौ माताक पार्टी जिसका ग़ोवा कि आज़ादी में बहुत बड़ा योगदान हैं बीजेपी वहाँ उनके पीठ पर बैठ कर गठबंधन में सरकार चलाती थी लेक़िन आज बीजेपी सत्ता में है वो पार्टी सिर्फ 3 सीटों पर सिमट गयी हैं.

    फ़िलहाल अग़र बिहार के मौजूदा सियासत को देखें तो आज अग़र चुनाव हुआ तो कल तेजश्वी यादव मुख्यमंत्री बन जाये.पिछले 15 सालों में पहली बार हुआ है कि नीतीश को सीधी चुनौती मिल रही है.वैसे तेजस्वी को परिवक्व करना का श्रेय नीतीश कुमार ही जायेगा क्योंकि उन्होंने बिहार को नया विकल्प दे दिया है.और बहुत हद तक बिहार कि जनता ने इसे स्वकार भी करना शुरू कर दिया है.

    क्योंकि जिस तरह से नीतीश कुमार महागठबंधन को तोड़ कर बीजेपी के साथ सरकार बना ली उससे बिहार के अवाम में गुस्सा है.किसी को यक़ीन नही था के नीतीश कुमार इस बार ऐसा करेंगे 2015 के चुनाव में जिस तरह से मोदी और नीतीश के बीच ज़ुबानी जंग चल रही थी डीएनए से लेकर बिहारी अस्मिता और मर जायेंगे लेक़िन बीजेपी से समझौता नही करेंगे.

    उसके बाद से किसी को नही लगा था कि नीतीश कुमार ऐसा करेंगे.नीतीश जब पहले बीजेपी के साथ थे तब उनको मुस्लिम वोट बहुत बड़ी संख्या में मिलता था लेक़िन इस बार शायद ऐसा ना हो क्योंकि बिहार के लोग कहीं ना कहीं ख़ुद को ठगा महसूस कर रहें हैं.

    लेक़िन नीतीश कुमार के शाख़ कि लड़ाई अब शुरू होगी 2019 लोकसभा में चुनाव में क्योंकि 2014 में मोदी लहर में वो उड़ गये थे 40 में सिर्फ़ 2 सीट मिली थी.लेक़िन इसबार मामला बिल्कुल अलग़ है महागठबंधन vs बीजेपी जदयू ये चुनाव नीतीश कुमार का भविष्य भी तय करेगा.

    एक तरफ़ कांग्रेस,राजद,हम,रालोसपा,और शरद यादव कि लोकतांत्रिक जनता दल शामिल है और दूसरी तरफ़ बीजेपी,जदयू,लोजपा शामिल है.फ़िलहाल राजनीती के चाणक्य कहे जाने वाले प्रशांत किशोर जो जदयू के उपाधयक्ष हैं उनका पिछले दिनों कहना था 2014 वाली मोदी के लिये हवा बनाना मुश्किल है इसमें कोई शक़ नही 2014 में बीजेपी हवा बना कर जीती थी.

    उसमे प्रशांत किशोर का बहुत बड़ा योगदान था.अब वो जदयू में है देखना होगा 2015 विधानसभा चुनाव की तरह वो जदयू या नीतीश के लिये किया कर पाते हैं लेकिन एक बात तय है नीतीश का उत्तराधिकारी प्रशांत किशोर के रूप में ज़रूर मिल गया है.

    Zeeshan Naiyer
    Student -Mass Communication & Journalism
    Maulana Azad National Urdu University Hyderabad

  • आर्थिक मोर्चे पर भारत की सुदृढ़ता:ललित गर्ग

    ललित गर्ग:एक बार फिर विश्व बैंक ने भारत को दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली बड़ी अर्थव्यवस्था घोषित किया है। जबकि उसने वर्ष 2021 तक वैश्विक अर्थव्यवस्था में गिरावट का पुर्वानुमान जारी किया है। हमारी अर्थव्यवस्था का दुनिया की उभरती अर्थव्यवस्था एवं मंदी से अप्रभावित अर्थव्यवस्था होना, देश के लिये एक सुखद अहसास है और भारत की सुनहरी एवं सुदृढ़ तस्वीर की प्रस्तुति है। लेकिन एक बड़ा प्रश्न है कि इस लोक-लुभावनी तस्वीर के बावजूद न तो बढ़ती महंगाई नीचे आ रही है और न ही डाॅलर के मुकाबले रुपये की फिसलन रूक रही है।

    विश्व बैंक की ग्लोबल इकोनॉमिक प्रोस्पैक्टस रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के सकल घरेलू उत्पाद में वृद्धि दर वित्त वर्ष 2017 के 6.7 प्रतिशत से बढ़कर 2018 में 7.3 प्रतिशत रहने का अनुमान है। वर्ष 2021 तक के तीन वर्षों में इसके 7.5 फीसदी बने रहने का पूर्वानुमान जारी किया गया है। वास्तव में किसी और बड़ी अर्थव्यवस्था की विकास दर 7 फीसदी को भी पार नहीं कर पाएगी। यह पूर्वानुमान एवं घोषणा नरेन्द्र मोदी सरकार के आर्थिक सुधारों, नीतियों एवं योजनाओं का परिणाम है। रिपोर्ट में मोदी सरकार की ओर से किए गए ढांचागत सुधारों की सराहना भी की गई है। सरकार के नीतिगत आर्थिक सुधारों के प्रभाव अब दिखने लगे हैं और अर्थव्यवस्था सुदृढ़ हो रही है। इससे निजी उपभोग मजबूत रहने और निवेश में तेजी जारी रहने की उम्मीद है। हम भारत की अर्थव्यवस्था को आठ प्रतिशत की वार्षिक वृद्धि दर से बढ़ते देखना चाहते हैं तो इसके लिये हमें उद्योग और सेवा क्षेत्र का भी सहारा लेना होगा, खेती को भी प्रोत्साहित करना होगा। क्योंकि दुनिया के किसी भी हिस्से में खेती का विकास अपेक्षित दर से ज्यादा नहीं हो रहा है। यदि हम गरीबी से पिंड छुड़ा कर समृद्धि का जीवन जीना चाहते हैं तो हमें अपनी सोच एवं नीतियों को बदलना ही होगा। उद्योग, खेती, रोजगार, स्वनिर्भरता, ग्रामीण विकास को बढ़ावा देना होगा, ताकि वे आर्थिक वृद्धि के इंजन बन सकें। इसके लिये मोदी सरकार के प्रयास और उन प्रयासों की अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर टंकार एवं खनक उनके लिये एक अच्छी खबर है, क्योंकि यह चुनावी वर्ष है।

    सरकार किसी भी दल की हो, भले ही योजनाकारों के नाम भी बदल जाये, और आर्थिक नियोजन के स्तर पर विश्व बैंक भले ही हमारी अर्थव्यवस्था को तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्था का खिताब दे दे, लेकिन फिर भी सभी की चिन्ता केवल यह दिखती है कि डाॅलर की तुलना में रुपये का अवमूल्यन कैसे रूके, कैसे महंगाई एवं बेरोजगारी पर नियंत्रण स्थापित हो। यह कम आश्चर्य की बात नहीं है कि जो अमेरिका मंदी से रूबरू हो रहा है और अपने समय की सबसे बड़ी बेकारी को सह रहा है, फिर भी देखिये कि आर्थिक रूप से उभरते और मंदी से अप्रभावित रुपया डाॅलर की तुलना में अवमूल्यन की ओर बना है। लगातार बढ़ती महंगाई के चलते आम आदमी अभावों का शिकार हो रहा है। जनता को पूरी तरह बाजार के रहमो-करम पर छोड़ देने की सरकार की नीति आम आदमी की जिन्दगी को बदहाल बना रही है।

    चीन की विकास दर वर्ष 2017 में 6.9 प्रतिशत रही थी जबकि भारत की उस वर्ष में जीडीपी वृद्धि दर 6.7 प्रतिशत थी। भारत अब आने वाले वर्षों में चीन को पछाड़ सकता है। विश्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट में भारत जैसी उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को सचेत करते हुए कहा है कि उन्हें भविष्य में कुछ मुश्किलें झेलने के लिए भी तैयार रहना होगा। इन देशों की सरकारों को अपना कर्ज प्रबंधन मजबूत बनाने के साथ आर्थिक सुधारों को तेजी से लागू करना होगा। भारत 2030 तक दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा बाजार होगा, उसके आगे केवल चीन और अमेरिका होंगे। इस स्थिति को पाने के लिये सरकार को रोजगार के अवसर बढ़ाने पर भी ध्यान देना होगा। विशेषतः गांवों पर आधारित जीवनशैली को बल देना होगा। जबकि आजादी के बाद से जितनी भी सरकारें आयी हैं उन्होंने शहरीकरण पर बल दिया है। एक विडम्बनापूर्ण सोच देश के विकास के साथ जुड़ गयी है कि जैसे-जैसे देश विकसित होता जायेगा वैसे-वैसे गांव की संरचना टूटती जायेगी। जिन्हें शहर कहा जा रहा है वहां अपने संसाधना से बहिष्कृत लोगों की बेतरतीब, बेचैन अरैर विस्थापित भीड़ ही होगी। जो अर्थव्यवस्था को मजबूती देने की सबसे बड़ी बाधा है।

    मजबूत अर्थव्यवस्था का अर्थ उन्नत जीवनशैली होना जरूरी है। लेकिन आर्थिक वृद्धि दर से निर्धारित होने वाला यह अर्थतंत्र क्या देश की जनता को गरिमापूर्ण जीवन दे पाया है, क्या रोजगारों का समुचित प्रबंध कर पाया है, क्या उन्नत खेती को स्थापित किया गया है। कहीं ऐसा तो नहीं हो रहा है कि आर्थिक वृद्धि दर और जीडीपी के मानकों से चलती यह अर्थव्यवस्था अनेक क्षेत्रों में उत्पादित माल- स्टील, सीमेंट, बिजली आदि को खपाने का जरिया है। आर्थिक योजनाकारों का कोई भी नक्शा इन्हीं दबावों और आर्थिक लाॅबियों और सब मिला कर मौजूदा अर्थव्यवस्था से बड़े स्तर पर लाभान्वित होने वाले उद्योग-व्यापार समूहों की चिन्ताओं से तय होता है। ऐसा होता है इसीलिये महंगाई पर नियंत्रण नहीं हो पा रहा है, रोजगार सीमित होते जा रहे हैं, किसान आत्महत्या कर रहे हैं। तभी विश्व बैंक ने अपनी रिपोर्ट में भारत जैसी उभरती और विकासशील अर्थव्यवस्थाओं को सचेत भी किया है।
    नरेन्द्र मोदी सरकार ने अर्थव्यवस्था को विकसित देशों की तर्ज पर बढ़ाने की कोशिशें की है। स्टार्टअप, मेक इन इंडिया और बुलेट ट्रेन की नवीन परियोजनाओं को प्रस्तुति का अवसर मिला। नोटबंदी और जीएसटी को लागू किया गया, भारत में भी डिजिटल इकॉनमी स्थापित करने के प्रयास हुए। भारत की विदेशों में साख बढ़ी। लेकिन घर-घर एवं गांव-गांव में रोशनी पहुंचाने के बावजूद आम आदमी अन्य तरह के अंधेरों में डूबा है। भौतिक समृद्धि बटोर कर भी न जाने कितनी तरह की रिक्तताओं की पीड़ा भोग रहा है। गरीब अभाव से तड़पा है तो अमीर अतृप्ति से। कहीं अतिभाव, कहीं अभाव। शहरी बस्तियां बस रही है मगर आदमी उजड़ता जा रहा है। भाजपा सरकार जिनको विकास के कदम मान रही है, वे ही उसके लिए विशेष तौर पर हानिकारक सिद्ध हुए हैं। इस पर गंभीर आत्म-मंथन करके ही हम भारत की बढ़ती आर्थिक वृद्धि दर एवं जीडीपी का नया धरातल तैयार कर नया भारत निर्मित कर सकेंगे।

    केन्द्रीय सांख्यिकी कार्यालय (सीएसओ) के अनुमान के अनुसार 2018-19 में प्रति व्यक्ति शुद्ध राष्ट्रीय आय 11.1 फीसदी वृद्धि के साथ 1,25,397 रुपए पर पहुंच जाएगी जो 2017-18 में 1,12,835 रुपए थी। आर्थिक मोर्चे पर विशेष रूप से बैंकिंग क्षेत्र में भी जहां सुधार के संकेत सामने आए, वहीं राजकोषीय घाटे के संदर्भ में केन्द्रीय वित्त मंत्री अरुण जेतली ने स्पष्ट रूप से कहा है कि सरकार राजकोषीय घाटा पाटने के लिए भारतीय रिजर्व बैंक के कोष का इस्तेमाल नहीं करेगी। इसमें कोई संदेह नहीं कि राजकोषीय घाटा पाटने की दिशा में मोदी सरकार का रिकार्ड पूर्व की सरकारों से कहीं बेहतर रहा है। तमाम उतार-चढ़ावों के बावजूद देश की अर्थव्यवस्था की तस्वीर निष्कंटक बन रही है। रिजर्व बैंक के कोष का उपयोग बैंकों की सहायता अथवा गरीबी निवारण के कार्यक्रमों पर किया जा सकता है, ऐसा संकेत स्वयं जेतली ने किया है। संकट के दिनों में इसकी अत्यधिक उपयोगिता रहती है। जो भी निर्णय किए जाएं, वह राजनीति से प्रेरित नहीं, बल्कि राष्ट्रहित में होने चाहिएं। आवश्यकता है कि राष्ट्रीय अस्मिता के चारों ओर लिपटे अंधकार के विषधर पर मोदी सरकार अपनी पूरी ऊर्जा और संकल्पशक्ति के साथ प्रहार करे तथा वर्तमान की हताशा में से नये विहान और आस्था के उजालों का आविष्कार करे। सदियों की गुलामी और स्वयं की विस्मृति का काला पानी हमारी नसों में अब भी बह रहा है। इन हालातों में भारत ने कितनी सदियों बाद खुद को आगे बढ़ता देखा है। इसलिए आम जनता को गुमराह करने वाली राजनीति को समझना होगा। इन मानसिकताओं से उबरे बिना हम वास्तविक तरक्की की ओर अग्रसर नहीं हो सकते।

    (ललित गर्ग)

  • भूल गये नये साल पे ,इन मांओं कि दिल कि बात कौन सुनेगा ? मोहम्मद अबशारूद्दील

    आज, लोग नए साल कि शुभ कामनाएँ देते नहीं थक रहे हैं ,उन मांओं का क्या जिनके बच्चे को विद्या मंदिर से गायब कर दिया गया हो , जिसके लिए वह दर दर भटकने के लिए मजबूर हो , लेकिन उनका कोइ पुरसान हाल नहीं , और उसकी दिल कि बात कोइ सुनने वाला नहीं । किया एक हि व्यक्ति को दिल कि बात कहने और सुनाने का इखतिआर है किया उस माँ को अपने मन कि बात कहने का अधिककार नहीं ,और उस माँ कि मन कि बात कौन सुनेगा जिस के बच्चे को मारकर आत्महत्या कहा गया

    जुनैद की मांका किया जो हर खुशी के मौके पर इंतजार किए रहती थी कि उसका बेटा उस के लिए कोइ उपहार लेकर आएगा, लेकिन इस बार नए साल पर उपहार तो दूर उनके साथ कोइ बात करने वाला भी नहीं
    उन बच्चों का किया जे हर साल कि तरफ इस साल भी नव वर्ष पर अपने बाप के साथ पिकनिक मनाते हैं, लेकिन उन बच्चों के मन कि बात कौन सुनेगा जिनके पिता को लव जिहाद के नाम पर मार दिया गया हो ,
    उन विद्यार्थियों का किया जिन्होंने धर्मनिरपेक्षता क बचाव के लिए कैद व बनद कि तकलीफ़ें झेली।
    अब हमें एक नए साल पर एक नइ उमंग और नये उत्साह के साथ ,
    , हमें अपने आप पर इन तमाम मुद्दों को उठाने के लिए तैयार रहना चाहिए और इन्साफ दिलाने के लिए हर मुमकिन कोशिश के लिए तैयार रहना चाहिएैं।

    लेखक: मुहम्मद अबशारुददीन
    छात्र चिन्तक सभा

  • उपेंद्र कुशवाहा के महागठबंधन में शामिल होने का बिहार की सियासत में क्या होगा असर??सबनवाज अहमद

    विश्लेष्ण:-
    चुनावी गणित के लिहाज से देखें तो बिहार की 243 विधानसभा सीटों में करीब 63 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां कुशवाहा समुदाय के मतों की संख्या 30 हजार से ज्यादा है.

    उपेंद्र कुशवाहा आखिरकार महागठबंधन में शामिल हो गए. गुरुवार को जब उन्होंने इस बात का ऐलान किया तो उनके साथ आरजेडी नेता तेजस्वी यादव, हम नेता जीतन राम मांझी, कांग्रेस नेता शाक्ति सिंह गोहिल और अहमद पटेल के अलावा शरद यादव भी मौजूद थे. जाहिर है यह बिहार की राजनीति के लिए बड़ा बदलाव माना जा रहा है. जातीय गोलबंदी के लिहाज से भी एक नया समीकरण बना है, लेकिन सवाल ये है कि उपेन्द्र कुशवाहा के एनडीए छोड़ने और महागठबंधन में शामिल होने का असर धरातल की राजनीति पर कितना होगा??.

    आंकड़ों के लिहाज से देखें तो 2014 के लोकसभा चुनाव में कुशवाहा की पार्टी आरएलएसपी ने एनडीए के साथ गठबंधन किया था, लेकिन पार्टी अकेले दम पर महज 3 प्रतिशत वोट ही ला पाई थी. दूसरी ओर, उस समय नीतीश कुमार की पार्टी जेडीयू ने 2014 के चुनाव में अकेले 15 प्रतिशत वोट शेयर हासिल किया था.

    जाहिर है वोट शेयर के मामले में आरएलएसपी से जेडीयू ने पांच गुना ज्यादा वोट शेयर हासिल किए थे. 2015 के विधानसभा चुनाव में आरएलएसपी के साथ आने के बाद भी कुशवाहा वोटर एनडीए के साथ नहीं आए थे. यही नहीं, कई उपचुनावों में भी कुशवाहा समाज ने एनडीए का साथ नहीं दिया था, यानी उपेन्द्र कुशवाहा फैक्टर का फायदा एनडीए को अधिक नहीं मिला है.

    चुनावी गणित के लिहाज से देखें तो बिहार की 243 विधानसभा सीटों में करीब 63 विधानसभा सीटें ऐसी हैं, जहां कुशवाहा समुदाय के मतों की संख्या 30 हजार से ज्यादा है. किसी भी विधानसभा में 30 हजार मतदाता बहुत अहम फैक्टर हैं. इसके अलावा बाकी विधानसभा सीटों पर भी कुशवाहा मतदाता की संख्या मामूली नहीं है, लेकिन सवाल यही उठता है कि कुशवाहा समुदाय में उपेन्द्र कुशवाहा कितनी पकड़ रखते हैं.

    दरअसल बिहार में कुशवाहा समुदाय 6 से 7 प्रतिशत तक की हिस्सेदारी रखती है. अब तक इस तबके का अधिकतर वोट नीतीश कुमार के पाले में ही गिरता रहा है. वहीं बिहार में अब सियासी समीकरण भी बदल गए हैं, क्योंकि नीतीश कुमार एनडीए गठबंधन में हैं. जाहिर है गठबंधन का वोट शेयर और बढ़ने की संभावना है. मीडिया के तमाम सर्वे भी यही बता रहे हैं कि नीतीश के आने से एनडीए की स्थिति मजबूत है. ऐसी स्थिति में अगर कुशवाहा एनडीए से अलग भी होते हैं तो बीजेपी को इसका खास मलाल नहीं होगा.

    हकीकत ये है कि 2013 में राष्ट्रीय लोक समता पार्टी के गठन के बाद भी कुशवाहा मास के नहीं, मीडिया के लीडर रहे हैं. जमीन पर उनका जनाधार उतना कभी नहीं रहा है, जितना उन्हें महत्व मिलता रहा है. साढ़े चार साल तक केंद्रीय मंत्री रहते हुए भी कुशवाहा का बिहेवियर सीजन्ड पॉलिटिशियन का रहा है. ऐसे में उनकी विश्वसनीयता पर हमेशा सवाल रहे हैं. वहीं 2005 में नीतीश कुमार में लोगों की एक विश्वसनीयता बनी है. 15 साल में काम के बदौलत बिहार की राजनीति में अपना एक इम्पैक्ट बना लिया है. लेकिन जबसे नितीश ने महा गठबंधन से नाता तोड़ा है माइनॉरिटी वोट बैंक राजद के साथ दिखाई दे रहा है, और इधर बढ़ते अपराध की वजह से इसमें भारी गिरावट भी आई है, जनता नीतीश कुमार की राजनीतिक पलटी की वजह से पसन्द भी नही कर रहे है।

    दूसरी बड़ी बात ये है कि कुशवाहा की पार्टी के दो विधायक और एक मात्र एमएलसी ने साथ छोड़ एनडीए का दामन थाम लिया है. वहीं कुशवाहा के समर्थन में जो नेता नजर आ रहे हैं उनमें सांसद अरुण कुमार एनडीए के साथ रहने की दलील देते रहे हैं. नागमणि और भगवान सिंह कुशवाहा जैसे नेता दलबदल में माहिर रहे हैं.

    ऐसे हालात में जिस ‘सियासी खीर’ की उम्मीद उपेन्द्र कुशवाहा कर रहे थे शायद उसका स्वाद कुछ खास न हो. क्योंकि इसका राजनीतिक लाभ उन्हें उतना नहीं मिलने जा रहा जितने की वे उम्मीद किए बैठे हैं. हालांकि इसका फायदा आरजेडी जरूर उठाएगी और बिहार में पिछड़ी और दलित जातियों के एक चेहरे के तौर पर तेजस्वी के लिए एक परसेप्शन जरूर बनेगा. बहरहाल आने वाले वक्त में बिहारी राजनीति में फिलहाल पक रही सियासी खीर जमीन पर कितना असर दिखाती है यह देखना दिलचस्प होगा.

    लेखक_
    सबनवाज अहमद
    (पत्रकारिता छात्र मानु हैदराबाद)

  • काँग्रेस देश कि पार्टी या गाँधी नेहरू परिवार कि ज़ागीर?जिशान नैय्यर

    कांग्रेस का मतलब एक ज़माने में होता था भारतीय जनमानस कि पार्टी इसमें सभी धर्मों जातियों फिरकों के लोग होते थे यही वज़ह थी कि आज़ादी का आंदोलन कामयाब रहा और देश लम्बे संघर्ष के बाद आज़ाद हुआ.

    1911 में बनारस हिन्दू विश्विद्यालय के संस्थापक और भारत रत्न पंडित मदन मोहन मालवीय जब कांग्रेस के अध्यक्ष बने उसी समय वो अख़िल भारतीय हिन्दू महासभा के भी अध्यक्ष थे.

    गाँधी जी के हत्यारे नाथू राम गोडसे उसी संगठन से जुड़े हुए थे.आरएसएस के संस्थापक के वी हेडगेवार और जनसंघ के संस्थापक डॉ श्यामा प्रसाद मुख़र्जी भी काँग्रेस के थे और नेहरू के कैबिनेट मंत्री रहें.वही जनसंघ बाद में बीजेपी बनी.

    मोहम्मद अली जिन्ना भी एक उदहारण है.पहले कांग्रेस के अधयक्ष भी रहे बाद में मुस्लिम लीग बनाई.कहने का मतलब ये है कि उस समय अलग अलग विचारधारा और जाति धर्मों के लोग भी काँग्रेस में थे.

    लेक़िन आज़ादी मिलने के बाद कांग्रेस पार्टी पर गांधी नेहरू परिवार का एकाधिकार बढ़ता चला गया जो आज अपने चरम पर है.

    गाँधी नेहरू परिवार से ज़रा सा भी इतेफ़ाक़ ना रखने का अंज़ाम के,कामराज, नरसिम्हा राव,सीताराम केसरी और प्रणव मुख़र्जी भुगत चूके हैं.

    प्रणव मुख़र्जी के बारे में कहा जाता है उनके पास तीन मौक़े थे जब वो प्रधानमंत्री बन सकतें थे 1984 इंदिरा गांधी कि हत्या के समय 2004 और 2012 लेक़िन गांधी नेहरू परिवार को उनके वफ़ादारी और ईमानदारी पर शक़ था.

    जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई थी तब उस दिन राजीव गांधी प्रणव मुख़र्जी और शीला दीक्षित कलकत्ता में किसी कार्यक्रम में थे ख़बर मिलते ही दिल्ली लौटने लगे हवाई जहाज़ में राजीव गाँधी ने प्रणव मुख़र्जी से पुछा जब पंडित नेहरू का देहांत हुआ था तब किया हुआ था.

    प्रधानमंत्री के देहांत के बाद किया प्रकिर्या होती है प्रणव मुख़र्जी का जवाब था गुलज़ारी लाल नंदा को अंतरिम प्रधानमंत्री बनाया गया था.क्योंकि उस वक़्त वो सरकार में नम्बर 2 कि हैसियत रखते थे.

    राजीव गांधी को ये बात खटक गयी क्योंकि उस वक़्त प्रणव मुख़र्जी सरकार में नम्बर 2 कि हैसियत रखते थे, जब इंदिरा गांधी विदेश जाती थी तब उनका कामकाज़ देखते थे.

    राजीव गांधी को ये बात नागवार गुज़री और उनको लगा कि प्रणव मुख़र्जी ख़ुद प्रधानमंत्री बनने के लिए ये सब बोल रहें हैं दोनों में मन मोटाव हुआ बाद में प्रणव मुख़र्जी को पार्टी से निकाल भी दिया ख़ुद कि पार्टी भी बनाई और कई साल बाद फ़िर कांग्रेस में वापिस लाये गये.

    के कामराज को भारतीय राजनीति का किंगमेकर कहा जाता है उन्होंने ने लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी को प्रधानमंत्री बनाया था बाद में इंदिरा गांधी ने ही उन्हें पार्टी में अलग थलग कर दिया.आख़िरी समय में उनको पूछने वाला कोई नही था.

    नरसिम्हा राव पर सोनिया गांधी के जासूसी का इल्ज़ाम था,कई जानकार बताते हैं कि सोनिया गांधी उनको फ़ोन पर लम्बा इंतेज़ार और मिलने के लिये घंटों इंतेज़ार कर बाती थीं.

    वैसे इतिहास उनको बाबरी विध्वंश का दोषी मनमोहन सिंह कि ख़ोज और आर्थिक उदारीकरण के नायक के तौर पर भी याद करता है लेक़िन जब 2004 में उनकी मृत्यु हुई तो उनके शव को 24 अक़बर अली रोड यानि काँग्रेस मुख्यालय भी नही ले जाने दिया गया.ये सब सोनिया गाँधी के इशारे पर हुआ.

    सीताराम केसरी काँग्रेस के आख़िरी अधयक्ष थे जो ग़ैर गाँधी नेहरू परिवार से थे, पत्रकार राशिद किदवई ने अपनी किताब ‘ए शार्ट स्टोरी ऑफ द पीपल बिहाइंड द फॉल एंड राइज ऑफ द कांग्रेस’ में लिखते हैं कि दिल्ली के 24, अकबर रोड स्थित मुख्यालय से सीताराम केसरी को बेइज्जत कर निकाला गया था.

    उन्हें कांग्रेस से निकालने की मुहिम में सोनिया गांधी को प्रणव मुखर्जी, ए के एंटनी, शरद पवार और जितेंद्र प्रसाद का पूरा सहयोग मिला.क्योंकि वो दलित समाज से थे.

    कांग्रेस पार्टी में नेहरू-गांधी परिवार से बाहर के नेताओं को याद करने की, उनकी पुण्यतिथि या जन्मदिवस मनाने की परंपरा का अभाव रहा है इसलिए वर्षों के बाद भी इतने बड़े नेता को कभी भी याद नहीं किया गया.

    पिछले महीने 11 नवम्बर को ही ले लीजिये मौलाना आज़ाद की जयंती थी पर राहुल गांधी और काँग्रेस पार्टी कि तरफ़ कोई ट्वीट भी नही किया गया मैं सुबह से शाम उसको ढूँढता रहा है.

    लेक़िन नही मिला जब संसद भवन के केंद्रीय कक्ष में श्रद्धांजलि कि बात आई तो सिर्फ 3 सांसद मौजूद थे.सोनिया राहुल तो दिल्ली में ही थे उसदिन श्रद्धांजलि देने क्यों नही गये पता नही?

    3 दिन बाद 14 नवम्बर को पंडित नेहरू की जयंती थी उसदिन सब कुछ हुआ ट्वीट भी किए गए और समाधि स्थल पर श्रद्धांजलि सभा भी आयोजित किया गया.

    मौजूदा दौर में काँग्रेस का मतलब परिवार प्राइवेट लिमिटेड हो गया है वैसे परिवारवाद का चलन सभी पार्टीयों में है लेक़िन काँग्रेस में ये सबसे ज़्यादा दिखने को मिलता है.

    किया सोनिया गाँधी के बाद राहुल ही अध्यक्ष के लायक़
    थे?

    वो तो भला हो कि काँग्रेस तीन राज्यों को जीतने में कामयाब रही वरना राहुल गाँधी के नेतृत्व पर सवालिया निशान लगे रहतें.

    काँग्रेस में तो तरह के नेता हुए हैं एक जो राज्यों में कामयाब रहें और एक दिल्ली दरबार में जो दिल्ली दरबार में कामयाब रहें उनमें कमलनाथ अशोक गहलोत अहमद पटेल जैसे लोग शामिल है

    कमलनाथ के बारे कहा जाता है वो इंदिरा गांधी के तीसरे बेटे थे,गहलोत का भी इंदिरा राजीव और संजय गाँधी के क़रीबी रहें आज इसका सिला उनको मुख्यमंत्री बना कर दिया गया है.

    जिस खानदान ने देश को 3 दिग्गज़ प्रधानमंत्री दिए उसमें राहुल गाँधी का किया स्थान है पता नही?

    लेक़िन अग़र 2019 में राहुल कामयाब हुए तो फ़िर उनकी लोकप्रियता में इज़ाफ़ा होगा अग़र हार मिली तो फ़िर पार्टी में भी बग़ावत के सुर मज़बूत होंगे.फ़िर पार्टी को कुछ नया सोंचना होगा.भले 3 राज्यों काँग्रेस ने वापसी कि हो लेक़िन पूर्वोतर इतिहास में पहली बार काँग्रेस मुक्त हो गया काँग्रेस का आख़िरी क़िला मिज़ोरम भी अब ढह गया है.2019 कि डगर बहुत कठिन राहुल एंड कंपनी के लिये देखना दिलचस्प होगा किया महागठबंधन राहुल को अपना नेता मानेगा?

    Zeeshan Naiyer
    Student Department Of Mass Communication & Journalism
    Maulana Azad National Urdu University Hyderabad

  • गंभीर स्थिति इंसाफ पसंद और धर्मनिरपेक्ष वर्ग की जिम्मेदारियां:डॉ मोहम्मद मंजूर आलम

    भारत एक महानतम लोकतांत्रिक देश है, उसका संविधान व्यापक और बहुत सारी खूबियों का हामिल है .यहाँ सभी वर्गों, धर्मों और समूह को एक तरह के अधिकार  दिए गए हैं, उनकी सामाजिक, शैक्षिक आर्थिक विकास को सुनिश्चित करने की  बात की गई है। लेकिन पिछले साढ़े चार वर्षों में जिस तरह के हालात पैदा हो गए हैं,
    जिस तरह कानून की धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। संविधान से खिलवाड़ किया जाने लगा है।इतिहास बदलने की कोशिश की जा रही है।  और कमजोर वर्गों को लगातार निशाना बनाया जा रहा है। उसके बाद इस तरह के सवाल देश भर में उठने लगे हैं कि क्या देश के संविधान को बचाने की जिम्मेदारी केवल मुसलमानों की है?

    क्या यह संभव है जिन लोगों ने देश की आज़ादी में कोई बलिदान नहीं दिया था वह संविधान की रक्षा के लिए कोई काम करेंगे ?
    क्या यह संभव है कोई समूह सीमित स्वार्थों और उद्देश्यों के लिए राजनीतिक हत्कण्डा अपनाए और वह पुरे तोर पर कानून के सुरक्षा का फ़र्ज़ अंजाम दे?
    क्या यह संभव है कि जो वर्ग नफरत की आग को लौ बनाने पर विश्वास रखता हो वह देश में  अमन और  शांति  पैदा कर सकेगा ?
    क्या यह संभव है जिस समूह का देश के संविधान पर भरोसा और विश्वास नहीं है वह संविधान का पालन कर पाएगा?
    क्या यह संभव है जो समूह देश के संविधान के खिलाफ अपना एक अलग संविधान पेश करने की योजना रखता हो वह संविधान को अमली जामा पहनाने की कोशिश करेगा?
    क्या यह संभव है जिन लोगों ने अंग्रेजों के लिए जासूसी की थी वह आज आज़ाद भारत में यहाँ के नागरिकों के लिए कोई बेहतर योजना बना सकेगा?
    यह ऐसे प्रश्न हैं जो देश के हर नागरिक की ज़ुबान पर हैं,
    साढ़े चार सालों के दौरान जो कुछ हुआ उसके आधार पर इस तरह के सवालों का उठना निश्चित और स्वाभाविक बन चुका है।

    हर कोई इन्साफ पसंद , धर्मनिरपेक्ष और सच्चा हिंदुस्तानी इसी सोच में है कि क्या भारत का संविधान खतरे में पड़ गया है? ऐसे हालात में कुछ ऐसे सवालात भी उठने लगे हैं कि आखिर भारत को आज़ादी किसने दिलाई?
    क्या देश के किसान अंग्रेजों की लाठी और गोली के शिकार नहीं हुए?
    क्या आम मजदूर और गरीबों ने गुलामी के बंधनों को गले से निकाल कर स्वतंत्रता का अलक नहीं जलाया ? क्या युवाओं और छात्रों ने देश की स्वतंत्रता के लिए बलिदान नहीं दिया?
    क्या भारत के मुसलमानों ने मौलाना आजाद के इस संदेश को स्वीकार नहीं किया, जिसमें उन्होंने जामा मस्जिद से घोषणा करते हुए कहा था कि भारतीय मुसलमानों कहाँ जा रहे हो तुम ! यहीं रुक जाओ, यह तुम्हारे पूर्वजों की भूमि है, इससे तुम्हारी यादें, इतिहास और सभ्यता जुड़ीं हैं

    क्या दलितों, आदिवासियों और पिछड़ों ने देश को आजाद कराने के लिए बलिदान नहीं दिया?.20 हजार से अधिक उल्मा को आजादी की लड़ाई के इल्ज़ाम में अंग्रेजों ने तख्ता दार पर लटका दिया था।
    क्या यह स्वतंत्रता के लिए बलिदान और संघर्ष नहीं माने जाएंगे ?।

    सच्चाई यही है कि भारत की स्वतंत्रता में सभी समूहों, वर्गों और धर्मों की भूमिका है! हाँ अगर किसी समूह ने देश की स्वतंत्रता में भाग नहीं लिया था बल्कि उसने अंग्रेजों का साथ दिया था तो वह आरएसएस और संघ के लोग हैं । जिसने उस समय भी स्वतंत्रता की लड़ाई में हिस्सा नहीं लिया और आज भी वह देश को आजाद रखने के बजाय गुलाम बनाने के प्रयासों में लगे हुए हैं ।

    आश्चर्य इस बात पर है कि ऐसी शक्ति भारत में अब सत्ता पर काबिज हो चुकी है और देश पर शासन कर रही है लेकिन कया आने वाले समय में भी जनता ऐसी शक्ति को सत्ता सौंपेगी? उन्हें केंद्र कि राजनीति में प्रतिनिधित्व का मौका देगी ? ऐसे सवालों पर सोचना और विचार करना देश की सुरक्षा, उज्जवल भविष्य और संविधान की रक्षा के लिए आवश्यक हो गया है ।और इसीलिए आजकल ऐसे सवाल पूछे जाने लगे हैं। क्या यह बात सही नहीं है कि भारतीय जनता की याददाश्त बहुत कमजोर हो चुकी है ,क्या यह बात सही नहीं है कि जब कभी देश और संविधान पर आंच आया यहाँ की जनता ने पूरी ताकत के साथ उसका मुकाबला किया .क्या यह बात ऐतिहासिक सत्य नहीं है कि जब कभी देश में किसी ने अत्याचार के पहाड़ तोड़े, क्रूर प्रणाली थोपी तो उसके खिलाफ जनता सीना सुपर हो गई .क्या यह मान लिया जाए कि इतना बड़ा बलिदान वे लोग भुला देंगे।

    संविधान ने कुछ मौलिक अधिकार दिए हैं चाहे वो मुसलमान हों ,या हिंदू ,दलित हों, या आदिवासी, ईसाई हों या बौद्ध, अल्पसंख्यक हों या बहुमत। क्या यह संभव है कि इन सबके समझदार वर्ग के सामने संविधान का उल्लंघन किया जाये । धन को चंद हाथों में गिरवी रख दिया जाये , गरीबों और मजदूरों का शोषण किया जाये , रोजगार के अवसर बंद कर दिए जाएं, शिक्षा प्रणाली को तबाह व बर्बाद कर दिया जाए , देश की सभ्यता और संस्कृति से खिलवाड़ किया जाए , इतिहास को बदल दिया जाए। और यह सब के सब अपनी आँखें बंद रखेंगे?

    क्या यह भी संभव है कि सभी मीडिया, विश्व एजंसियां ,इंटरनैशनल रिपोर्ट से नजर हटाते हुए सिर्फ पीएम मोदी की टिप्पणी को जनता स्वीकार कर लेगी जिसमें सब कुछ ठीक-ठाक बताया जाता है?
    क्या यह बात सच नहीं है कि लोकतंत्र के रक्षक जहां आम नागरिक होते हैं वहीं मीडिया को गैर लिखित रूप में चौथा स्तंभ माना जाता है
    फिर क्या इसके बावजूद मीडिया अपना योगदान नहीं देगा ? मीडिया के लोगों ने भी प्रतिज्ञा कर रखा है  कि उसे अपना कर्तव्य भुगतान नहीं करना है? क्या देश के पत्रकारों ने भी यह तय कर लिया है कि अन्याय के खिलाफ वह अपनी आवाज अब बुलंद नहीं करेंगे ? क्या तथ्य और सच बोलने वाले पत्रकारों ने भी सरकार के सामने अपनी हार स्वीकार कर ली है? क्या स्थिति यहां तक पहुंच गई है कि लोकतंत्र का चौथा स्तंभ मीडिया अब केवल जनसंपर्क (पीआर) का रोल अदा करेगा?
    क्या मीडिया अब सवाल करना बंद कर देगा ? क्या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया की जिम्मेदारी केवल खबरों को पेश करना है? क्या इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने सत्ताधारियों से सवाल करने का सिलसिला बंद कर दिया है?।
    मौजूदा परिस्थितियों में मीडिया ने अपना ट्रेंड बदल दिया है .संसी ख़बरों को पेश करने के अलावा सरकार की नीतियों पर सवाल उठाना और शासकों से सवाल करना लगभग बंद हो चूका है ,

    चुनाव आयोग, सीबीआई, आरबीआई और सुप्रीम कोर्ट जैसे संवैधानिक संस्थाओं में स्पष्ट हस्तक्षेप हो  रही है। देश की वर्तमान सरकार इन सभी संवैधानिक स्थलों के स्वतंत्रता को छीन कर अपने मर्जी के अनुसार चलाना चाहती है, इन संस्थाओं की संप्रभुता पर हमला करके उन्हें अपने राजनीतिक एजेंडे को पूरा करने  के
    लिए इस्तेमाल कर रही है ।लेकिन मीडिया में सन्नाटा और खामोशी है।

    आज के ब्लॉग में यह सारे सवाल हम इसलिए उठा रहे हैं, बहुत खुलकर इस बात को पेश करने का मुख्य कारण यह है कि 2019 के आम चुनाव हमारे सामने है। इस चुनाव में इन सरे सवालात को उठाना और जनता तक पहुंचाना बहुत जरूरी है .देश की मेनस्ट्रीम मीडिया से  हमें ज्यादा कुछ उम्मीद नहीं है, विश्वास मानिए कि मेनस्ट्रीम मीडिया और विशेष रूप से टीवी चैनलों पर हिन्दू-मुस्लिम के बीच नफरत पैदा करने वाली खबरों को प्राथमिकता दी जाएगी।भड़काऊ नेताओं के बयान दिखाये जाएंगे, मूल विषय पर कुछ चर्चा नहीं होगी, अब वहाँ हाथापाई और युद्ध भी शुरू हो गई है।
    सरकार की उपलब्धियों को गिनने के अलावा कुछ और नहीं दिखाया जाएगा .विश्व एजेंसियों की सूचना को अनदेखा करके फर्जी सर्वेक्षण और रिपोटस प्रसारित किए जाएंगे ऐसे हालात में अल्पसंख्यकों, मुसलमानों, दलितों, आदिवासियों, किसानों, युवाओं, छात्रों, देश के पिछड़ों और सभी न्यायप्रिय धर्मनिरपेक्ष नागरिकों की जिम्मेदारी बनती है कि वह जनता तक सही बात पहुंचायें।

    वैकल्पिक स्रोत का उपयोग करके उन्हें तथ्यों से अवगत कराएं, संघ और साम्प्रदायिक शक्तियों की साज़िशों से उन्हें सूचित कराएं । उनके सांप्रदायिक इरादे और नापाक मंसूबों के बारे में चर्चा करें ।
    हमें उम्मीद है कि हमारे नागरिक इन बातों का पालन करेंगे और 2019 के आम चुनाव के संदर्भ में ऐसी कोई नीति बनाएंगे। हर घर तक सही संदेश पहुंचाएंगे ।

    2019  का आम चुनाव करीब है .पांच राज्यों के चुनाव ने यह तथ्य बता दी है कि मोदी मंत्र टूट चुका है .जनता भावनात्मक और घृणा अपमानजनक राजनीति अस्वीकार कर दी  है। राम मंदिर निर्माण, नामों का परिवर्तन, मुसलमानों को भगाने, गौरक्षा , भीड़ हिंसा जैसी नीति देश की जनता ने स्वीकार नहीं किया है, उन्हें रोज़गार, शिक्षा, सामाजिक विकास, शांति और समाज में बंधुत्व चाहिए। उनकी सर्वोच्च जरूरत गरीबी से मुक्ति और रोजगार के अवसर हैं सेकुलर पार्टियों को इन्हीं एजेंडों के साथ मैदान में आना होगा ।जनता के दिल की धड़कन सुननी पड़ेगी।
    हालिया विधानसभा चुनाव के नतीजों ने यह भी बता दिया की हिन्दू-मुस्लिम और धर्म की राजनीति सफलता का तर्क नहीं  है। इसलिए अब धर्मनिरपेक्ष दलों के लिए भी आवश्यक है कि वह देश का मिजाज समझे  ।जनता के उम्मीदों को पूरा करे , देश की भलाई, अर्थव्यवस्था की मजबूती, रोजगार आपूर्ति और उत्कृष्ट शिक्षा प्रणाली मुहैया कराने पर विशेष ध्यान दे .सभी को साथ लेकर चलने का मिसाल कायम करे, समाज के सभी वर्गों के दिलों की धड़कन सुनकर राजनीति करे।

    कांग्रेस जैसी बड़ी पार्टियों पर यह जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि वे छोटे और क्षेत्रीय दलों को साथ लेकर चले, उन्हें भी मौका दे और एक मजबूत रणनीति अपनाई जाए जिसमें किसानों, अल्पसंख्यकों, कमज़ोरं, दलितों, आदिवासियों, छात्रों, महिलाओं और देश के सभी नागरिकों को बराबर का अधिकार मिले .आज़ादी, समानता और न्याय से कोई वंचित न रहे अन्यथा फिर धर्मनिरपेक्ष दलों का भी वही हश्र होगा जो भाजपा का हुआ है।

    लेखक मशहूर स्कालर और आल इंडिया मिल्ली कॉउंसिल के महासचिव हैं